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UK Board 10 Class Hindi Chapter 12 – लखनवी अन्दाज (गद्य-खण्ड)

UK Board 10 Class Hindi Chapter 12 – लखनवी अन्दाज (गद्य-खण्ड)

UK Board Solutions for Class 10th Hindi Chapter 12 लखनवी अन्दाज (गद्य-खण्ड)

लखनवी अन्दाज (यशपाल)
1. लेखक – परिचय
प्रश्न—यशपालजी का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत दीजिए-
जीवन-परिचय, रचनाएँ, साहित्यिक विशेषताएँ, भाषा-शैली | 
उत्तर- यशपाल
ज़ीवन-परिचय — यशपालजी का जन्म सन् 1903 ई० में, पंजाब प्रान्त के फिरोजपुर नगर में हुआ। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गुरुकुल काँगड़ी में हुई। उन्होंने लाहौर में डी०ए०वी० व नेशनल कॉलेज में उच्चशिक्षा ग्रहण की। यहीं उनका सम्पर्क क्रान्तिकारी भगतसिंह व सुखदेव से हुआ और वे भी स्वतन्त्रता – संग्राम में कूद पड़े। कई बार जेल गए। सन् 1938 ई० में जेल से मुक्ति मिली। सन् 1976 ई० में उनकी मृत्यु हो गई।
रचनाएँ – यशपालजी मुख्य रूप से कथाकार थे। इन्होंने अनेक कहानियों की रचना की। इनके प्रमुख कहानी – संग्रह हैं – पिंजरे की उड़ान, ज्ञानदान, धर्मयुद्ध, चिंगारी, तर्क का तूफान, फूलों का कुर्ता, चित्र का शीर्षक, उत्तमी की माँ, अभिशाप, उत्तराधिकार, वो दुनिया, तुमने क्यों कहा था?, मैं सुन्दर हूँ।
यशपालजी ने उपन्यास भी लिखे। इनका ‘झूठा सच’ उपन्यास भारत विभाजन की त्रासदी का मार्मिक दस्तावेज है। अमिता, दिव्या, पार्टी कामरेड, दादा कामरेड, मेरी तेरी उसकी बात, उनके अन्य प्रमुख उपन्यास हैं।
साहित्यिक विशेषताएँ — यशपालजी ने विभिन्न प्रकार की कहानियों की रचना की है, जिनको विषयवस्तु अथवा कथातत्त्व की दृष्टि से सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, प्रतीकात्मक, हास्य-व्यंग्यात्मक आदि विभिन्न वर्गों में रखा जा सकता है। डॉ० इन्द्रनाथ मदान के शब्दों में- “इनकी कहानियों को तीन वर्गों में — चिन्तन, उपदेश व विचार के रूप में स्वीकार करते हैं। यशपालजी की कहानियाँ मार्क्सवादी विचारधारा से परिपुष्ट यथार्थवाद पर आधारित हैं। यही कारण है कि इनकी कहानी के कथानक मध्यमवर्गीय जीवन के खोखलेपन का परदाफाश करते हैं। ये मार्क्सवाद के संघर्षात्मक भौतिकवाद से प्रभावित हैं, यही कारण है कि इन्होंने अपनी कहानियों में शोषण का विरोध किया है।”
भाषा-शैली-भाषा-शैली के क्षेत्र में यशपालजी ने प्रेमचन्दजी का पूर्ण अनुसरण किया है। उनकी भाषा जन- मानव की सामान्य भाषा है। कहीं-कहीं भाषा का संवेदनात्मक रूप भी देखने को मिला है, जहाँ भाषा भाव – प्रवण हो गई है, परन्तु सामान्यतः भाषा सहज व स्वाभाविक है। इनकी भाषा में बोलचाल के अरबी-फारसी व अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी द्रष्टव्य है। संस्कृत के तत्सम शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।
यशपालजी की शैली बड़ी ओजस्विनी व सफल है। उन्होंने अपनी कला में समस्त प्रचलित शैलियों का प्रयोग किया है, जिनमें वर्णनात्मक, संवादात्मक, आत्म-प्रयास, चरित्र प्रयास, व्यंग्य प्रयास शैलियाँ प्रमुख हैं।
2. गद्यांश पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
(1) गाड़ी छूट ……. आँखें चुरा लीं।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) इस गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) नवाब साहब को बैठा देख लेखक क्या सोचने लगा ?
(घ) लेखक ने आँखें क्यों चुराई ?
(ङ) लेखक क्या सोचकर सेकण्ड क्लास के डिब्बे में चढ़ा था?
(च) नवाब साहब की आँखों में किस बात का असन्तोष दिखाई दिया?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज ।
लेखक – यशपाल |
(ख) आशय—लेखक पैसेन्जर ट्रेन के द्वितीय श्रेणी के डिब्बे को खाली समझकर उसमें जा बैठा। लेखक के अनुमान के अनुसार डिब्बा बिल्कुल खाली नहीं था, डिब्बे में लखनऊ के नवाबनुमा एक भद्रपुरुष पालथी लगाकर बैठे थे। उनके सामने दो ताजे चिकने खीरे तौलिये पर रखे हुए थे। डिब्बे में लेखक के अचानक पहुँच जाने से उन नवाबी सज्जन को कुछ विघ्न पड़ा हो या उनकी एकान्तता भंग हुई हो ऐसा असन्तोष उनके चेहरे से स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उनके इस असन्तोष पर लेखक विचार करने लगा कि हो सकता है यह भी कहानी के लिए विषय के चयन की चिन्ता में हो या फिर मेरे द्वारा खीरे जैसी अत्यन्त मामूली वस्तु को खाते देखने के कारण स्वयं लज्जित अनुभव कर रहा हो ।
नवाब साहब ने लेखक के साथ मेल-जोल बढ़ाने में कोई रुचि न दिखाई तो लेखक भी उनके सामने की बर्थ पर बैठ गया और आत्मसम्मान को बनाए रखने के लिए उसने भी नवाब साहब से नजरें न मिलाई।
(ग) नवाब साहब को बैठा देख लेखक सोचने लगा कि एकान्त में बैठे नवाब साहब कहीं उन्हीं के समान किसी कहानी की विषयवस्तु के विषय में चिन्तन करने के लिए डिब्बे को एकान्त समझकर तो नहीं आ गए हैं।
(घ) जब नवाब साहब ने लेखक से मेल-जोल बढ़ाने में कोई रुचि न दिखाई तो लेखक ने भी आत्मसम्मान की रक्षा में उनसे आँखें चुरा लीं।
(ङ) लेखक यह सोचकर सेकण्ड क्लास के डिब्बे में चढ़ा था कि डिब्बा एकदम खाली होगा और वह वहाँ एकान्त में बैठकर अपनी कहानी की विषय-वस्तु (कथ्य) के विषय में भली प्रकार चिन्तन कर सकेगा।
(च) नवाब साहब की आँखों में एकान्त चिन्तन में विघ्न पड़ने का असन्तोष दिखाई दिया।
(2) हम गौर …………. नहीं बन सकती?
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) इस गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) लेखक ने नई कहानी के विषय में क्या सोचा?
(घ) नवाब साहब ने डकार लेकर लेखक के सामने क्या व्यक्त करना चाहा ?
(ङ) ज्ञान चक्षु खुलने का आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज ।
लेखक – यशपाल ।
(ख) आशय-लेखक के सामने नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को सूँघा और उन्हें डिब्बे से बाहर फेंक दिया। खीरे के उपयोग के इस तरीके को देखकर लेखक आश्चर्यचकित रह गया। खीरे की सुगन्ध और स्वाद की कल्पना मात्र से सन्तुष्ट होने का इतना बारीक और बढ़िया या सूक्ष्म तरीका लेखक ने अब से पहले कभी न देखा था । लेखक विचार करने लगता है कि क्या सूँघनेमात्र से उदरपूर्ति हो सकती है। नवाब की ओर से पेट भर जानेवाली सन्तुष्टि की ऊँची डकार का शब्द भी सुनाई दिया। नवाब साहब ने लेखक की ओर देखकर कहा- खीरा स्वादिष्ट होता है, लेकिन आसानी से नहीं पचता, वह आमाशय पर वजन डाल देता है अर्थात् आमाशय को उसे पचाने के लिए अधिक कार्य करना पड़ता है। यह देख और सुनकर लेखक की ज्ञानरूपी आँखें खुल गईं। वे जानते तक न थे कि सुगन्धमात्र से ही उदरपूर्ति भी हो जाती है। लेखक ने व्यंग्य किया—ये हैं नई कहानी के लेखक जो कि बिना खाए पेट भर जाने की तरह बिना कथ्य के कहानी लिख देते हैं। लेखक की बुद्धि तर्क करती है कि यदि खीरे की सुगन्ध और स्वाद की कल्पना से पेट भर जाने पर डकार बिना सोचें- विचारे, घटना और पात्रों के इच्छा मात्र करने से कहानी का सृजन क्यों नहीं हो सकता है। अर्थात् इन सब तत्त्वों के बिना भी कहानी लिखी जा सकती है।
(ग) लेखक ने सोचा कि ‘नई कहानी’ बिना विचार, घटना, पात्र के; केवल इच्छा करने मात्र से ही लिखी जा सकती है।
(घ) नवाब साहब ने डकार लेकर लेखक के सामने यह व्यक्त किया कि खीरे को सूँघने मात्र से ही उनकी उदरपूर्ति हो गई है। उन्होंने लेखक के सामने अपनी नवाबी नजाकत भी बयाँ कर दी कि वे इतने नाजुक हैं कि खीरे जैसी वस्तु को भी नहीं पचा पाते हैं।
(ङ) ज्ञान चक्षु खुलने का आशय ज्ञान का द्वार खुलने से है। यहाँ लेखक इस मुहावरे का प्रयोग व्यंग्य के रूप में करते हुए कहता है कि मुझे अभी तक इस बात का ज्ञान नहीं था कि बिना खाए भी व्यक्ति का पेट खाद्य-पदार्थ को सूँघनेमात्र से भर जाता है। इस आधार पर वह यह निष्कर्ष निकालने में भी सफल हो जाता है कि जब बिना खाए पेट भर सकता है तो बिना कथ्य और पात्रों के भी ‘नई कहानी’ लिखी जा सकती है।
3. पाठ पर आधारित विषयवस्तु सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – नवाब साहब ने खीरा खाने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर – नवाब साहब ने खीरे की फाँकों पर जीरा मिला नमक और लाल मिर्च की सुरखी बुरक दी। उनके मुँह से ऐसा लगने लगा कि इस प्रक्रिया में उनका मुँह खीरे के रस की परिकल्पना से पानी से भर उठा हो। अब नवाब साहब खीरे की एक-एक फाँक उठाकर होंठों तक ले गए। फाँक को सूँघा । स्वाद के आनन्द में उनकी पलकें बन्द हो गईं। उनके मुँह में जो पानी भर आया था वह घूँट बनकर गले से नीचे उतर गया। तब नवाब साहब ने फाँक को खिड़की के बाहर छोड़ दिया। नवाब साहब खीरे की फाँकों को नाक के पास ले जाकर वासना से रसास्वादन कर खिड़की के बाहर फेंकते गए। खीरे की सब फाँकों को बाहर फेंककर उन्होंने तृप्ति की डकार ली। इस प्रकार एक विशेष प्रक्रिया से नवाब साहब खीरा खाया।
प्रश्न 2 – ‘लखनवी अंदाज’ व्यंग्य की भाषा पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर – भाषा-शैली के क्षेत्र में यशपालजी ने प्रेमचन्दजी का पूर्ण अनुसरण किया है। उनकी भाषा सामान्य जन की सामान्य भाषा है। कहीं-कहीं भाषा का संवेदनात्मक रूप भी देखने को मिला है, जहाँ भाषा भावप्रवण हो गई है, परन्तु सामान्यतः भाषा सहज व स्वाभाविक है। उनकी भाषा में बोलचाल के अरबी, फारसी व अंग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग द्रष्टव्य है। उदाहरणार्थ-
‘मुफस्सिल की पैसेंजर ट्रेन चल पड़ने की उतावली में फूँकार रही थी। आराम से सेकंड क्लास में जाने के लिए दाम अधिक लगते हैं। दूर तो जाना नहीं था। भीड़ से बचकर, एकांत में नई कहानी के संबंध में सोच सकने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देख सकने के लिए टिकट सेकंड क्लास का ही ले लिया।”
उपर्युक्त उदाहरण में मुफस्सिल, पैसेन्जर ट्रेन, सेकण्ड क्लास, टिकट आदि शब्द उर्दू तथा अंग्रेजी भाषा के हैं।
संस्कृत के तत्सम शब्दों का भी प्रयोग हुआ है, परन्तु वे भाषा के जटिल होने की सीमा तक लादे नहीं गए हैं, वरन् स्वाभाविक रूप से भाषा में समाहित हो गए हैं। पाठ के सरल वाक्य विन्यास, मुहावरों का स्वाभाविक समावेश, स्थान-स्थान पर व्यंग्यपरक सूक्तियों और सबसे अधिक कथा और भाषानुकूलता आदि गुणों ने भाषा को पूर्णतः गुणयुक्त व प्रभावशाली बना दिया है।
4. विचार/सन्देश से सम्बन्धित लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – यशपालजी ने ‘लखनवी अंदाज में क्या विचार रखे हैं?
उत्तर – वैसे तो यशपालजी ने ‘लखनवी अंदाज’ नामक व्यंग्य यह सिद्ध करने के लिए लिखा था कि बिना कथ्य के कहानी नहीं लिखी जा सकती है, परन्तु नई कहानी के कहानीकार नवाब साहब की तरह उसी प्रकार बिना कथ्य के ही कहानी लिख देते हैं, जिस प्रकार नवाब साहब बिना खाए ही तृप्त हो जाते हैं। इस व्यंग्य-रचना में यशपाल उस पतनशील सामन्ती वर्ग पर व्यंग्य करते हैं, जो वास्तविकता से हटकर एक बनावटी जीवन शैली का आदी है। हम आज के समय में भी समाज में ऐसी परजीवी संस्कृति के वाहकं लोगों को देख सकते हैं।
प्रश्न 2 – ‘लखनवी अंदाज’ रचना में लेखक ने बनावटी जीवन जीनेवाले सामंती वर्ग पर कटाक्ष किया है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर- ‘लखनवी अंदाज पाठ में एक ऐसे नवाब साहब का वर्णन किया गया है, जो ट्रेन के सेकण्ड क्लास में यात्रा करते हुए. अपनी रईसी का प्रदर्शन करने के लिए खीरे में नमक मिर्च मिलाकर उसे खाते नहीं बल्कि सूँघते हैं और सूंघकर उसे ट्रेन से बाहर फेंक देते हैं। इसके बाद वह डकार लेकर यह दिखाते हैं कि उनका पेट बिना खाए भी भर जाता है। यह घटना बनावटी जीवन जीनेवाले सामंती वर्ग पर लेखक का कटाक्ष है और यह कटाक्ष सब प्रकार से उपयुक्त ही है।
5. पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1 – लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं? (2008)
उत्तर – लेखक की गाड़ी छूट रही थी। लेखक जरा दौड़कर सेकण्ड क्लास के एक डिब्बे में जा बैठे। डिब्बे में पहले से ही एक भद्र से दिखाई देनेवाले लखनऊ के नवाब साहब बैठे थे। लेखक के अचानक डिब्बे में आ जाने से उन भद्र सज्जन की आँखों में एकान्त चिन्तन में विघ्न का असन्तोष दिखाई देने लगा। नवाब साहब ने लेखक से मेल-जोल बढ़ाने अथवा संवाद स्थापित करने में जरा भी रुचि न दिखाई। इससे लेखक को लगा कि नवाब साहब उससे बातचीत करने को तनिक भी उत्सुक नहीं हैं।
प्रश्न 2 – नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, नमक मिर्च बुरका, अंततः सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? उनका ऐसा करना उनके कैसे स्वभाव को इंगित करता है?
उत्तर – नवाब साहब ने ऐसा अपनी अमीरी और नवाबी तबीयत को दर्शाने के लिए किया होगा । ऐसा करने से प्रकट होता है कि नवाब साहब का स्वभाव सनकी था। वे बलपूर्वक स्वयं को लेखक के समक्ष नवाबी तबीयत का प्रस्तुत करना चाहते थे।
प्रश्न 3 – बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है । यशपाल के इस विचार से आप कहाँ सहमत हैं?
उत्तर – बिना विचार, घटना और पात्रों के कभी भी कहानी नहीं लिखी जा सकती। यशपालजी ने तो केवल ऐसा नवाब साहब के रेखाचित्र को स्पष्ट करते हुए व्यंग्यस्वरूप में कहा है।
प्रश्न 4 – आप इस निबंध को और क्या नाम देना चाहेंगे?
उत्तर- ‘नवाबी अन्दाज’ अथवा ‘लखनवी नवाब’ ।

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