UK Board 10th Class Science – Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास
UK Board 10th Class Science – Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास
UK Board Solutions for Class 10th Science – विज्ञान – Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास
अध्याय के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. यदि एक ‘लक्षण – A’ अलैंगिक जनन वाली समष्टि के 10 प्रतिशत सदस्यों में पाया जाता है तथा ‘लक्षण – B’ उसी समष्टि में 60 प्रतिशत जीवों में पाया जाता है तो कौन-सा लक्षण पहले उत्पन्न हुआ होगा?
उत्तर : ‘लक्षण – B’ पहले उत्पन्न हुआ होगा, क्योंकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनुकूलनता के कारण लक्षण का प्रतिशत बढ़ता जाता है।
प्रश्न 2. विभिन्नताओं के उत्पन्न होने से किसी स्पीशीज का अस्तित्व किस प्रकार बढ़ जाता है?
उत्तर : किसी प्रजाति में वातावरणीय कारकों के प्रभाव से उत्पन्न विभिन्नताएँ उसे विपरीत परिस्थितियों में जीवित रखने में सहायक होती हैं। विभिन्नताएँ जैव विकास का आधार हैं।
प्रश्न 3. मेण्डेल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं?
उत्तर : मेण्डेल ने विकल्पी लक्षण वाले पौधे लिए जैसे लम्बा और नाटा पौधा। मेण्डेल ने लम्बे और नाटे पौधों के पुष्पों के मध्य परपरागण (cross pollination) कराया। जो लक्षण प्रथम पुत्रीय पीढ़ी (F1 Generation) में प्रदर्शित होता है। उसे प्रभावी लक्षण (dominant) कहते हैं और जो लक्षण प्रदर्शित नहीं होता उसे सुप्त या अप्रभावी (recessive) लक्षण कहते हैं।

प्रश्न 4. मेण्डेल के प्रयोगों से कैसे पता चला कि विभिन्न लक्षण स्वतन्त्र रूप से वंशानुगत होते हैं?
उत्तर : मेण्डेल ने दो या अधिक तुलनात्मक लक्षण वाले शुद्ध पौधों का चयन किया; जैसे—पीले, गोल तथा हरे एवं झुर्रीदार बीज वाले पौधे । इन पौधों के मध्य परपरागण कराने पर प्रथम पुत्रीय पीढ़ी में तो सभी पौधे पीले और गोल बीज वाले लक्षण को दर्शाते हैं, क्योंकि ये प्रभावी लक्षण हैं। F1 पीढ़ी के पौधों के मध्य स्वपरागण कराने पर F2 पीढ़ी में जो पौधे प्राप्त होते हैं, वे पीले एवं गोल बीज वाले, पीले एवं झुर्रीदार बीज वाले, हरे एवं गोल बीज वाले तथा हरे एवं झुर्रीदार बीज वाले होते हैं। इनका अनुपात 9 : 3 : 3 : 1 का होता है। प्रयोग से स्पष्ट होता है कि बीजों के रंग एवं आकृति की वंशागति एक-दूसरे से प्रभावित नहीं होती। ये लक्षण स्वतन्त्र रूप से वंशागत होते हैं।
प्रश्न 5. एक ‘A – रुधिर वर्ग’ वाला पुरुष एक स्त्री जिसका रुधिर वर्ग ‘O’ है, से विवाह करता है। उनकी पुत्री का रुधिर वर्ग – ‘O’ है । क्या यह सूचना पर्याप्त है यदि आपसे कहा जाए कि कौन-सा विकल्प लक्षण – रुधिर वर्ग – ‘A’ अथवा ‘O’ प्रभावी लक्षण है? अपने उत्तर का स्पष्टीकरण दीजिए। · रहे
उत्तर : ‘A’ तथा ‘O’ रक्त वर्ग में कौन-सा लक्षण प्रभावी है, यह बताने के लिए यह सूचना कि पुत्री का रक्त वर्ग ‘O’ है, पर्याप्त नहीं है। रक्त वर्ग का निर्धारण प्रतिजन तथा प्रतिरक्षी की उपस्थिति के आधार पर किया जाता है। ‘A’ रक्त वर्ग में ‘A’ प्रतिजन और ‘b’ प्रतिरक्षी पाया जाता है जबकि ‘O’ रक्त वर्ग में कोई प्रतिजन नहीं होता और ‘a’ तथा ‘b’ दोनों प्रतिरक्षी पाए जाते हैं। aa ab तथा a0 जीन प्रतिजन के लिए उत्तरदायी होते हैं। aa तथा ab क्रमश: a0 पर प्रभावी होते हैं। ‘A’ रक्त वर्ग वाले पुरुष की जीन संरचना aa a0 तथा ‘O’ रक्त वर्ग वाली स्त्री की जीन संरचना aa a0 होने पर पुत्री पिता से a0 तथा माता से a0 जीन अर्थात् दोनों सुप्त जीन प्राप्त करने के कारण ‘O’ रक्त वर्ग वाली होती है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि ‘A’ प्रभावी होता है।
प्रश्न 6. मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण कैसे होता है?
उत्तर : मानव में 46 गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 जोड़ी गुणसूत्र समजात (autosomes) होते हैं। 23वाँ जोड़ी गुणसूत्र स्त्रियों में XX और पुरुषों में XY होता है। इसे लिंग गुणसूत्र कहते हैं। स्त्रियों में बने सभी अण्डाणु ‘22 + X’ गुणसूत्र वाले होते हैं, इसके विपरीत पुरुषों में बने 50% ‘शुक्राणु ’22 + X ‘ तथा 50% 22 + Y गुणसूत्र वाले होते हैं।
जब अण्डाणु का निषेचन ’22 + X’ गुणसूत्र वाले शुक्राणु से होता है तो शिशु पुत्री (44 + XX) होती है, और जब अण्डाणु का निषेचन ‘22 + Y’ गुणसूत्र वाले शुक्राणु से होता है तो शिशु पुत्र (44+ XY) होता है। पुत्री और पुत्र का लगभग अनुपात 1:1 का होता है। |
प्रश्न 7. वे कौन-से विभिन्न तरीके हैं जिनके द्वारा एक विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में बढ़ सकती है?
उत्तर : किसी विशिष्ट लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या आबादी निम्नलिखित कारणों से बढ़ सकती है-
(i) अगर विशिष्ट लक्षण पर्यावरण के अनुकूल हों और इसका प्राकृतिक चयन होता रहे तो इस लक्षण वाले जीवों (व्यष्टि) की संख्या आबादी में बढ़ जाती है; जैसे लाल भृंग की समष्टि (आबादी) में हरे रंग वाले भृंग का उत्पन्न होना। पक्षी हरे रंग वाले भृंगों को पत्तियों के मध्य पहचान नहीं पाते जबकि वे लाल भृंगों का शिकार सुगमता से करते रहते हैं, इसके फलस्वरूप लाल रंग के भृंग की संख्या कम होती जाती है और समष्टि में हरे रंग के भृंग की संख्या बढ़ती जाती है।
(ii) आकस्मिक दुर्घटना के कारण जब एक समष्टि के अधिकांश सदस्य समाप्त हो जाते हैं तो जीन राशि (gene pool) सीमित रह जाता है। इससे समष्टि का रूप बदल जाता है। जीवित सदस्यों के लक्षण ही उनकी संतति में परिलक्षित होते हैं। इसे जीनी अपवहन (genetic drift) कहते हैं। ऐसा प्राय: महामारियों (epidemics), परभक्षण (predation) आदि के कारण होता है।
प्रश्न 8. एक एकल जीव द्वारा उपार्जित लक्षण सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत नहीं होते। क्यों?
उत्तर : किसी जीवधारी द्वारा अपने जीवनकाल में उपार्जित लक्षण सामान्यतया वंशागत नहीं होते क्योंकि ये उसके कायिक द्रव्य (somatoplasm) या कायिक कोशिकाओं (somatic cells) को ही प्रभावित करते हैं । उपार्जित लक्षण जननद्रव्य ( germplasm) को प्रभावित नहीं करते; अतः ये लक्षण वंशागत नहीं होते ।
प्रश्न 9. बाघों की संख्या में कमी आनुवंशिकता के दृष्टिकोण से चिन्ता का विषय क्यों है ?
उत्तर : बाघों (tigers) की संख्या में निरन्तर होने वाली कमी से प्रदर्शित होता है कि ये स्वयं को अपने वातावरण से अनुकूलित नहीं कर पा हैं। वातावरण से अनुकूलन के फलस्वरूप ही इनकी संख्या में वृद्धि हो सकती है।
छोटी आबादी (समष्टि) पर प्रतिकूल परिस्थितियों, दुर्घटनाओं आदि का प्रभाव अधिक पड़ता है। जीन राशि (gene pool) के घट जाने के कारण छोटी-छोटी दुर्घटनाएँ प्रजाति की उत्तरजीविता को प्रभावित करती हैं। प्राकृतिक चयन और आनुवंशिक अपवहन के कारण बाघों की प्रजाति लुप्त के कगार पर पहुँच गई है। बाघों के संरक्षण हेतु टाइगर प्रोजेक्ट होने (Tiger Project) प्रारम्भ किए गए हैं। इसके अन्तर्गत इन्हें उनके प्राकृतिक आवास से हटाकर सुरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों एवं संरक्षित क्षेत्रों में रखा जाता है।
प्रश्न 10. वे कौन-से कारक हैं जो नई स्पीशीज के उद्भव में सहायक हैं?
उत्तर : नई स्पीशीज के उद्भव (speciation) में निम्नलिखित कारक सहायक होते हैं-
(1) आनुवंशिक अपवहन (genetic drift)।
(2) लिंगी प्रजनन के फलस्वरूप उत्पन्न उत्परिवर्तन ।
(3) दो उपसमष्टियों का एक-दूसरे से भौगोलिक पृथक्करण। इसके फलस्वरूप समष्टियों के सदस्य परस्पर एकलिंगी प्रजनन नहीं कर पाते।
(4) प्राकृतिक चयन ।
प्रश्न 11. क्या भौगोलिक पृथक्करण स्वपरागित स्पीशीज के पौधों के जाति उद्भव का प्रमुख कारण हो सकता है? क्यों अथवा क्यों नहीं ?
उत्तर : जाति उद्भव ( speciation) तब ही होता है जब एक समष्टि की दो उपसमष्टियाँ परस्पर लैंगिक प्रजनन नहीं कर पातीं। लैंगिक प्रजनन के कारण गुणसूत्र संरचना में भिन्नता आती जाती है। इसके में फलस्वरूप उत्पन्न विभिन्नताओं का प्राकृतिक चयन होता रहता है। इसी के साथ भौगोलिक पृथक्करण के कारण एक उपसमष्टि दूसरी उपसमष्टि से भिन्न होती जाती है और अन्ततः एक नई प्रजाति का उद्भव हो जाता है।
स्वपरागत प्रजाति की समष्टि में पौधों की जीन संरचना में सामान्यतया कोई परिवर्तन न आने के कारण विभिन्नताएँ उत्पन्न नहीं होती; अतः भौगोलिक पृथक्करण के कारण किसी जाति की उपसमष्टियाँ एक-दूसरे से इतनी भिन्न हो जाती हैं कि इनमें परस्पर जनन नहीं होता और ये स्वयं को एक जाति के रूप में स्थापित कर लेती हैं।
प्रश्न 12. क्या भौगोलिक पृथक्करण अलैंगिक जनन वाले जीवों के जाति उद्भव का प्रमुख कारक हो सकता है? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर : भौगोलिक पृथक्करण अलैंगिक जनन करने वाले जीवों में जाति उद्भव का प्रमुख कारण नहीं हो सकता, क्योंकि अलैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न संतति में परस्पर बहुत कम विभिन्नता पाई जाती हैं। इनमें परस्पर अत्यधिक समानताएँ ही पाई जाती हैं। इनकी विभिन्नताएँ नई जाति उद्भव के लिए पर्याप्त नहीं होती हैं।
प्रश्न 13. उन अभिलक्षणों का एक उदाहरण दीजिए जिनका उपयोग हम दो स्पीशीज के विकासीय सम्बन्ध निर्धारण के लिए करते हैं?
उत्तर : समजात अंगों (Homologous organs) की उपस्थिति द्वारा दो प्रजाति के सदस्यों में विकासीय सम्बन्ध स्थापित करने में सहायता मिलती है; जैसे मेढक, छिपकली, पक्षी और मानव के अग्रपाद की मूल संरचना का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि यह एकसमान ही हैं। ऐसे अंग जो मूल संरचना में समान और कार्यों में भिन्न होते हैं, समजात अंग कहलाते हैं। समजात अंगों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि इन सभी की उत्पत्ति समान पूर्वजों से हुई है। समजात अंग अपसारी उद्विकास (divergent evolution) को प्रदर्शित करते हैं।
प्रश्न 14. क्या एक तितली और चमगादड़ के पंखों को समजात अंग कहा जा सकता है? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर : तितली और चमगादड़ के पंख समजात अंग नहीं हैं। ये समरूप अंग (analogous organs) हैं जो उड़ने का कार्य करते हैं। तितली के पंख काइटिन (chitin) से बने होते हैं। ये त्वचा के विस्तार से बने होते हैं। इनमें अस्थियाँ नहीं होतीं जबकि चमगादड़ के पंख अग्रपाद के रूपान्तरण से बने होते हैं। यह अंगुलियों के मध्य की त्वचा के भंज (fold) से बना होता है, इसे पैटेजियम (patagium) कहते हैं।
प्रश्न 15. जीवाश्म क्या हैं? ये जैव विकास प्रक्रम के विषय में क्या दर्शाते हैं?
उत्तर : जीवाश्म (Fossils) – प्राचीनकालीन जीवों के अवशेष, जो आदिकाल में पृथ्वी पर रहते थे, बाद में विलुप्त हो गए, भूपटल की चट्टानों में परिरक्षित (preserved) मिलते हैं, जीवाश्म (fossils) कहलाते हैं। ज़ीवाश्मों का अध्ययन जीवाश्म विज्ञान या पुराजीव विज्ञान (Palaeontology) कहलाता है। इनसे हमें जीव जाति के उद्विकास क्रम या जातिवृत्त (Phylogeny ) का ज्ञान होता है।
जीवाश्मों की आयु के निर्धारण हेतु तलछटी चट्टानों के उन स्तरों की आयु का निर्धारण किया जाता है जिनमें जीवाश्म मिलते हैं। आयु का निर्धारण चट्टानों में उपस्थित रेडियोधर्मी तत्त्वों और इनके रेडियोधर्मिताविहीन समस्थानिक तत्त्वों के अनुपात से किया जाता है। जीवाश्मों के आधार पर युगों-युगों से जैव-विकास की एक स्थूल रूपरेखा तैयार की गई है। जीवाश्मों के अध्ययन से निम्नलिखित तथ्य प्रकट होते हैं—
(i) पृथ्वी पर आदिकाल से आधुनिक काल तक जीवन में निरन्तर परिवर्तन होता रहा है।
(ii) आधुनिक जीवों से प्राचीनकालीन जीवधारी (पादप एवं प्राणी) भिन्न थे।
(iii) ऐसी प्रजातियों का ज्ञान होता है जो कभी जीवित थीं, परन्तु अब विलुप्त हो गई हैं।
(iv) ऐसे अनेक जीवधारियों के जीवाश्म प्राप्त हुए हैं जिनमें दो वर्गों या संघों के लक्षण पाए जाते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि किस प्रकार के जीवधारियों से कौन-से जीवधारी विकसित हुए हैं; जैसे – आर्किओप्टेरिक्स (Archaeopteryx) के जीवाश्म के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पक्षियों की उत्पत्ति सरीसृपों से हुई थी।
(v) आवृतबीजी पौधे और स्तनी वर्ग के प्राणी पृथ्वी पर सबसे अधिक विकसित जीवधारी हैं।
(vi) जीवाश्मों की आयु अथवा चट्टानों के विभिन्न स्तरों से प्राप्त जीवाश्मों से जीवधारियों के भौमिक समय (geological time) का ज्ञान होता है।
प्रश्न 16. क्या कारण है कि आकृति, आकार, रंग-रूप में इतने भिन्न दिखाई पड़ने वाले मानव एक ही स्पीशीज के सदस्य हैं?
उत्तर : विभिन्न आकृति, आकार और रंग-रूप वाला मानव वास्तव में एक ही जाति होमो सैपियन्स सैपियन्स (Homo sapiens sapiens) का सदस्य है। मानव का उद्भव अफ्रीका में हुआ। अफ्रीका से मानव के पूर्वज पश्चिम एशिया, मध्य एशिया, यूरेशिया, दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, इण्डोनेशिया आदि सम्पूर्ण संसार में फैल गए। विभिन्नता आ गई है। मानव के गुणसूत्रों या DNA की संरचना में कोई वातावरणीय प्रभाव के कारण उनकी आकृति, आकार और रंग-रूप में ऐसा परिवर्तन नहीं हुआ है जिससे नई जाति का उद्भव हो पाता। विभिन्न आकार, आकृति और रंग-रूप वाले मानव परस्पर लैंगिक प्रजनन कर सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं। ये परस्पर रक्तदान या रक्त आधान कर सकते हैं। इससे भी स्पष्ट होता है कि सभी मानव एक ही जाति होमो सैपियन्स के सदस्य हैं।
प्रश्न 17. विकास के आधार पर क्या आप बता सकते हैं कि जीवाणु, मकड़ी, मछली तथा चिम्पैंजी में किसका शारीरिक अभिकल्प उत्तम है? अपने उत्तर की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : जैव विकासीय दृष्टि से यह कहना अति कठिन है कि जीवाणु, मकड़ी, मछली तथा चिम्पैन्जी में से किसका शारीरिक अभिकल्प (body design) उत्तम है । जटिलता एवं कुशलता की दृष्टि से चिम्पैन्जी का शारीरिक अभिकल्प उत्तम प्रतीत होता है, लेकिन जैव विकासीय दृष्टि से सरलतम अभिकल्प वाले जीवाणु अपने पर्यावरष्ना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं। ये अण्टार्कटिका (Antarctica) की ठण्डी जलवायु, , गर्म जल स्रोतों, गहरे समुद्र में, वायु में तथा मृदा में पाए जाते हैं। अतः यह आवश्यक नहीं है कि जटिल शारीरिक अभिकल्प वाले जीवधारी जैव विकासीय दृष्टि से सरल शारीरिक अभिकल्प वाले जीवों से उत्तम हों ।
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. मेण्डेल के एक प्रयोग में लम्बे मटर के पौधे जिनके बैंगनी पुष्प थे, का संकरण बौने पौधों जिनके सफेद पुष्प थे, से कराया गया। इनकी संतति के सभी पौधों में पुष्प बैंगनी रंग के थे, परन्तु उनमें लगभग आधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लम्बे जनक पौधों की आनुवंशिक रचना निम्नवत् थी –
(a) TTWW
(b) TTww
(c) TtWW
(d) TtWw.
उत्तर : (c) TtWW.
प्रश्न 2. समजात अंगों का उदाहरण है-
(a) हमारा हाथ तथा कुत्ते के अग्रपाद
(b) हमारे दाँत तथा हाथी के दाँत
(c) आलू एवं घास के उपरिभूस्तारी
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर : (d) उपर्युक्त सभी।
प्रश्न 3. विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किस से अधिक समानता है-
(a) चीन के विद्यार्थी
(b) चिम्पैन्जी
(c) मकड़ी
(d) जीवाणु।
उत्तर : (a) चीन के विद्यार्थी ।
प्रश्न 4. एक अध्ययन से पता चला कि हल्के रंग की आँखों वाले बच्चों के जनक (माता-पिता) की आँखें भी हल्के रंग की होती हैं। इसके आधार पर क्या हम कह सकते हैं कि आँखों के हल्के रंग का लक्षण प्रभावी है अथवा अप्रभावी? अपने उत्तर की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : उपर्युक्त अध्ययन के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि नेत्रों का हल्का रंग प्रभावी या अप्रभावी लक्षण है। हो सकता है कि माता-पिता दोनों के नेत्रों का हल्का रंग अप्रभावी जीन युग्म के कारण हो। माता-पिता के शुद्ध अप्रभावी जीन युग्म के कारण सन्तान के नेत्र हल्के रंग के ही होंगे। प्रभावी या अप्रभावी लक्षण का ज्ञान तो एक लक्षण के लिए विकल्प युग्मी लक्षण से ही हो सकता है। यदि माता-पिता के नेत्रों का रंग गहरा एवं हल्का होता और नेत्र के रंग का जो लक्षण उनकी सन्तानों में प्रदर्शित होता, वह प्रभावी लक्षण होता ।
प्रश्न 5. जैव विकास तथा वर्गीकरण का अध्ययन क्षेत्र किस प्रकार परस्पर सम्बन्धित है?
उत्तर : जैव विकास (organic evolution) के अध्ययन से ज्ञात होता है कि आदिकालीन सरलतम जीवधारियों से क्रमशः आधुनिक युग के जटिल संरचना वाले उच्चकोटि के जीवधारियों का विकास हुआ है। जैव विकास के अन्तर्गत पूर्व उपस्थित जीवधारी से नई प्रजाति का उद्भव होता है। नई प्रजाति में कुछ लक्षण पूर्वज प्रजाति के भी होते हैं। |
वर्गीकरण का भी यही आधार है। सरल संरचना वाले जीवधारियों से जटिलतम संरचना वाले जीवधारियों को उनके जातिवृत्तीय सम्बन्धों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। ज्यों-ज्यों विभिन्न जीव जातियों के मध्य जातिवृत्त अर्थात् उद्विकासीय सम्बन्ध अधिक स्पष्ट होते जाते हैं, वर्गीकरण प्रणाली में उसी के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। अत: जैव विकास तथा वर्गीकरण का अध्ययन परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित है।
प्रश्न 6. समजात तथा समरूप अंगों को उदाहरण देकर समझाइए |
उत्तर : समजात अंग (Homologous organs) – विभिन्न जीवधारियों में ऐसी संरचनाएँ पाई जाती हैं जिनकी मूलभूत रचना तथा उद्भव समान होता है, परन्तु कार्य भिन्न होते हैं। इससे इनकी बाह्य संरचना में भिन्नता आ जाती है। इन अंगों को समजात अंग (homologous organs) कहते हैं; जैसे—मनुष्य के हाथ, घोड़े के अग्रपाद, चमगादड़ के पंख, पक्षी के पंख, सील के फ्लिपर, मेढक के अग्रपाद आदि विभिन्न कार्यों में सहायक होते हैं, लेकिन इनकी मूल संरचना समान होती है। इनमें क्रमशः ह्यूमरस, रेडियोअल्ना, कॉर्पल्स, मेटाकार्पल्स एवं अंगुलास्थियाँ, पेशियाँ एवं तन्त्रिकाएँ पाई जाती हैं।

कीटों में मुखांग क्रमशः लेब्रम, मेण्डिबल, मैक्सिला, लेबियम एवं हाइपोफेरिंक्स से मिलकर बने होते हैं। इनकी मूल संरचना समान होती है, लेकिन कार्यों में भिन्नता पाई जाती है; जैसे कॉकरोच के मुखांग भोजन को काटने एवं कुतरने का कार्य करते हैं। तितली एवं मक्खी के मुखांग भोजन को चूसने और मच्छर के मुखांग त्वचा को भेदने एवं चूषण दोनों कार्य करते हैं।
जीवों में समजातता का पाया जाना इस बात को इंगित करता है कि इन जीवों की उत्पत्ति समान पूर्वजों से हुई है। अंगों की समजातता अपसारी जैव विकास को प्रमाणित करती है।
समवृत्ति अंग (Analogous organs) – ऐसे अंग जिनकी उत्पत्ति तथा मूल संरचना भिन्न होती है, लेकिन कार्य समान होते हैं, समवृत्ति अंग (analogous organs) कहलाते हैं। कीट, पक्षी और चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं। कीटों के पंख काइटिन से बने होते हैं, पक्षियों के पंख अग्रपाद का रूपान्तरण होते हैं। ये परों से बने होते हैं। चमगादड़ के पंख अग्रपाद की अंगुलियों के मध्य की त्वचा के भंज (fold) से बने होते हैं। समवृत्ति अंग अभिसारी जैव विकास (convergent evolution) को प्रदर्शित करते हैं अर्थात् समवृत्ति अंग वाले जीवधारियों की उत्पत्ति समान पूर्वजों से नहीं होती ।

प्रश्न 7. कुत्ते की खाल का प्रभावी रंग ज्ञात करने के उद्देश्य से एक प्रोजेक्ट बनाइए ।
उत्तर : कुत्तों तथा मवेशियों की खाल के बालों के रंग से सम्बन्धित जीन के ऐलील (R1 तथा R2) सह प्रभाविता (co dominance) प्रदर्शित करते हैं। इनमें खाल के बालों में भूरा या भूरा- काला रंग उत्पन्न करने वाले ऐलील R1 से सफेद रंग उत्पन्न करने वाले ऐलील को R2 से प्रदर्शित करते हैं।
भूरे या काले- भूरे रंग के बाल वाले नर कुत्ते ( R1 R1 ) तथा सफेद बाल वाले मादा कुत्ते ( R2 R2 ) के बीच संकरण कराने पर F1 पीढ़ी के विषमयुग्मी संकर पिल्लों (R1 R2 ) में भूरा या भूरा- काला और श्वेत बालों का मिश्रण बनता है। इस कारण कुत्तों तथा मवेशियों में बालों का रंग चितकबरा होता है। F2 पीढ़ी में भूरे या काले-भूरे, चितकबरा तथा श्वेत रंग के कुत्ते 1:2:1 के अनुपात में प्राप्त होते हैं। इनमें भूरे या काले-भूरे और श्वेत समयुग्मजी तथा चितकबरा विषमयुग्मजी होता है।

प्रश्न 8. विकासीय सम्बन्ध स्थापित करने में जीवाश्म का क्या महत्त्व है?
उत्तर : जीवाश्म चट्टानों से प्राप्त प्राचीनकालीन जीवधारियों के अवशेष होते हैं। जीवों के विकासीय सम्बन्धों को स्थापित करने में इनका बहुत अधिक महत्त्व है। जीवाश्मों का अध्ययन करने से पता चलता है कि अमुक जीवधारी पृथ्वी पर किस काल में निवास करता था और उसकी संरचना क्या थी । यह कब विलुप्त हो गया । जीवाश्म पृथ्वी के अन्दर विभिन्न स्तर पर खुदाई करके निकाले जाते हैं। पृथ्वी की सतह के समीप पाए जाने वाले जीवाश्म पृथ्वी की गहराई में पाए जाने वाले जीवाश्मों की अपेक्षा बाद में विकसित हुए थे। जीवाश्मों की आयु का निर्धारण उस चट्टान जिससे जीवाश्म प्राप्त हुआ था, की आयु ज्ञात करके किया जाता है। दूसरी विधि यह है कि जीवाश्मों की आयु का निर्धारण चट्टान में पाए जाने वाले रेडियोधर्मी तत्त्वों और इसके रेडियोधर्मिताविहीन समस्थानिक तत्त्वों के अनुपात से किया जाता है; जैसे जीवाश्मों की सहायता से मानव विकास के इतिहास का ज्ञान हो पाया है। |
प्रश्न 9. किन प्रमाणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि जीवन की उत्पत्ति अजैविक पदार्थों से हुई है?
उत्तर : ए०आई० ओपेरिन ( A. I. Oparin, 1924) तथा जे०बी०एस० हैल्डेन (J.B.S Haldane, 1929) के अनुसार, पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति रासायनिक उद्विकास के फलस्वरूप अजैविक पदार्थों से हुई। ओपेरिन तथा हैल्डेन के कथन की पुष्टि स्टेनले मिलर (Stanley Miller, 1953-1957) में अपने प्रयोग द्वारा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरल अकार्बनिक अणुओं से कार्बनिक अणु उत्पन्न हो सकते हैं। स्टेनले ने उपकरण में आदिकालीन परिस्थितियों का निर्माण किया। उन्होंने एक बड़े फलास्क में जलवाष्प, अमोनिया, मीथेन तथा हाइड्रोजन का गैसीय मिश्रण लिया। विद्युत विसर्जन हेतु टंगस्टन के इलेक्ट्रोड्स के मध्य 60,000 वोल्ट की विद्युत धारा एक सप्ताह तक प्रवाहित की । उपकरण में लगा कण्डेन्सर (condenser) गैसीय मिश्रण को ठण्डा करता रहता था जो पुनः जलवाष्प के साथ वाष्प रूप में उपकरण में प्रवाहित होता रहता था। सप्ताह के अन्त में प्राप्त मिश्रण का विश्लेषण करने पर ज्ञात हुआ कि यह कुछ अमीनो अम्ल तथा कुछ कार्बनिक अम्ल का मिश्रण है।

अन्य वैज्ञानिकों ने भी अकार्बनिक पदार्थों से आदिकालीन परिस्थितियाँ उत्पन्न करके विभिन्न कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण किया है। इससे इस कथन की पुष्टि होती है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति अकार्बनिक पदार्थों से हुई है।
प्रश्न 10. अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न विभिन्नताएँ अधिक स्थायी होती हैं, व्याख्या कीजिए। यह लैंगिक प्रजनन करने वाले जीवों के विकास को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर : अलैंगिक जनन में एक जनक जीवधारी से संतति का विकास हो जाता है। इससे संतति को आनुवंशिक पदार्थ DNA एक ही जनक प्राप्त होने के कारण सामान्यतया विभिन्नताएँ उत्पन्न नहीं होतीं । संतति में से विभिन्नताएँ DNA की प्रतिकृति बनते समय होने वाली त्रुटियों के कारण ही आ सकती हैं और ये न्यून होती हैं।
लैंगिक जनन में दो जनक होते हैं। दोनों जनकों से युग्मकों के माध्यम से एक-एक सैट गुणसूत्रों का संतति में पहुँचता है। इसके फलस्वरूप संतति में भिन्न-भिन्न लक्षणों का समावेश होता रहता है। विभिन्न जीन युग्मकों के कारण संतति में अधिक विभिन्नताएँ प्रदर्शित होती हैं। वातावरणीय प्रभाव के कारण इन विभिन्नताओं का प्राकृतिक चयन होता रहता है जो विभिन्नताएँ पर्यावरण के अनुकूल होती हैं उनकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागति होती रहती है। ये विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित होकर एक नई प्रजाति के रूप में प्रदर्शित होने लगती हैं अर्थात् लैंगिक प्रजनन द्वारा उत्पन्न होने वाली विभिन्नताएँ वंशागत होती हैं और जैव विकास में सहायक होती हैं।
प्रश्न 11. संतति में नर एवं मादा जनकों द्वारा आनुवंशिक योगदान में बराबर की भागीदारी किस प्रकार सुनिश्चित की जाती है ?
उत्तर : सामान्यतया विकसित जीवधारियों की कोशिकाओं में विभिन्न प्रकार के गुणसूत्रों के दो सैट होते हैं। इसे 2x या 2n से प्रदर्शित करते हैं और कोशिका को द्विगुणित ( diploid) कहते हैं । द्विगुणित जनन कोशिकाओं में युग्मक निर्माण के समय अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। इसके फलस्वरूप अगुणित (x or n गुणसूत्र ) युग्मकों (gametes) का निर्माण होता है।
संतति निर्माण के समय दो अगुणित युग्मक (gametes) का परस्पर संलयन होता है। इस क्रिया को निषेचन कहते हैं। निषेचन के फलस्वरूप संतति में गुणसूत्रों की संख्या पुनः द्विगुणित (2n या 2x ) हो जाती है। इस प्रकार युग्मक जनन तथा निषेचन क्रिया द्वारा प्रजाति में गुणसूत्रों की संख्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी निश्चित बनी रहती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि संतति में नर तथा मादा जनकों का बराबर का योगदान होता है।
प्रश्न 12. केवल वे विभिन्नताएँ जो किसी एकल जीव (व्यष्टि ) के लिए उपयोगी होती हैं, समष्टि में अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? क्यों एवं क्यों नहीं?
उत्तर : हाँ; हम इस कथन से सहमत हैं क्योंकि जो विभिन्नताएँ एकल जीव (व्यष्टि) के लिए उपयोगी हैं, वे वर्तमान पर्यावरण के अनुकूल हैं और प्राकृतिक चयन प्रक्रिया द्वारा अपने अस्तित्व को बनाए रखती हैं। ये विभिन्नताएँ समय व्यतीत होने के साथ-साथ समष्टि की मुख्य विशेषता के रूप में स्थापित हो जाती हैं। जीवधारी इन विभिन्नताओं के कारण स्वयं को वातावरण से अनुकूलित किए रहते हैं। ये जीवधारी सफल होते हैं और अपनी संतति को निरन्तर सृष्टि में बनाए रखते हैं।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर
- विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. मनुष्यों में बच्चे का लिंग निर्धारण किस प्रकार होता है? विस्तृत वर्णन कीजिए ।
उत्तर : मनुष्य में लिंग निर्धारण (Sex determination in Human) – मैक्कलंग (MeClung, 1902) के अनुसार, एकलिंगी जन्तुओं में लिंग निर्धारण ‘लिंग गुणसूत्र’ (sex chromosomes) द्वारा होता है। इस सिद्धान्त को लिंग निर्धारण का गुणसूत्रवाद (chromosomal theory of sex determination) कहते हैं।
मनुष्य की जनन कोशिकाओं में 46 गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 जोड़े नर तथा मादा दोनों में समान होते हैं। अतः इन्हें ऑटोसोम्स (autosomes) कहते हैं। मादा (नारी) में 23वाँ जोड़ा भी समान गुणसूत्रों वाला होता है किन्तु नर में 23वें जोड़े के गुणसूत्र असमान होते हैं और हेटेरोसोम्स (heterosomes ) या एलोसोम्स (allosomes) कहलाते हैं। . 23वें जोड़े के गुणसूत्र, लिंग गुणसूत्र ( sex chromosomes ) भी कहलाते हैं। इस प्रकार नारी में इस 23वें जोड़े के गुणसूत्रों को XX द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। पुरुष (नर) में 23वें जोड़े के गुणसूत्रों में एक लम्बा किन्तु दूसरा काफी छोटा होता है और इन्हें XY से प्रदर्शित करते हैं।
युग्मकजनन (gametogenesis) के समय, युग्मकों (gametes) का निर्माण होता है और गुणसूत्रों की संख्या अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के द्वारा, प्रत्येक बनने वाले युग्मक ( gamete) में अगुणित (haploid-n) रह जाती है अर्थात् युग्मक में प्रत्येक जोड़े का एक ही गुणसूत्र (chromosome) होता है। इस प्रकार नारी में बने हुए सभी युग्मक (अण्ड) 22 + X गुणसूत्रों वाले किन्तु नर (पुरुष) के युग्मक (शुक्राणु) दो प्रकार के 22 + X तथा 22 + Y गुणसूत्रों वाले होंगे।

जब निषेचन होता है तो नर से प्राप्त कोई भी शुक्राणु 22 + Y – गुणसूत्र वाला या 22 + X – गुणसूत्र वाला अण्ड से मिल सकता है। इस प्रकार, युग्मनज (zygote) में अब निषेचन के बाद, 44 + XX या 44 + XY गुणसूत्र हो सकते हैं अर्थात् लिंग का निर्धारण निषेचन के समय ही मिलने वाले शुक्राणु के गुणसूत्र के आधार पर हो जाता है; क्योंकि लिंग गुणसूत्र ( sex chromosome ) के अनुसार बनने वाले युग्मनज निम्न प्रकार नर या मादा शिशु का विकास करते हैं-
44 + XY = नर शिशु (पुत्र)
44 + XX = मादा शिशु (पुत्री)
प्रश्न 2. डार्विन के विकास के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : डार्विनवाद
चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन ( Charles Robert Darwin, 1809-1882) ब्रिटेन का प्रसिद्ध प्रकृतिवादी वैज्ञानिक ( naturalist) था, जिसने लैमार्क के पश्चात् विकास के सम्बन्ध में प्राकृतिक वरण (natural selection) का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इसे डार्विनवाद भी कहते हैं। सन् 1831 में जब डार्विन 22 वर्ष के थे, उन्हें बीगल (Beagle) नामक जहाज पर यात्रा करने का अवसर प्राप्त हुआ। यात्रा के दौरान उन्होंने विभिन्न देशों के जीव-जन्तुओं को देखा और उन्हें एकत्र भी किया।
जीव-जन्तुओं का अध्ययन करने के पश्चात् 1859 ई० में उन्होंने जैव विकास के सम्बन्ध में एक लेख अपनी पुस्तक प्राकृतिक वरण द्वारा जातियों की उत्पत्ति (Origin of Species by Natural Selection) में प्रकाशित किया। डार्विन के इस सिद्धान्त को प्राकृतिक वरणवाद (Theory of Natural Selection) कहते हैं। इसी दौरान वैलेस (Wallace) नामक वैज्ञानिक ने भी विकास के ऊपर अपना स्वतन्त्र विचार प्रकट किया जो डार्विन के मत के समान था, परन्तु अधिक श्रेय-डार्विन को ही मिला।
डार्विनवाद मुख्यत: निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है –
(1) जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता – समस्त जीवधारियों में सन्तानोत्पत्ति की अपार क्षमता होती है। इसके फलस्वरूप सदस्यों की संख्या रेखागणितीय अनुपात में बढ़ती है। एक समुद्री सीपी प्रति वर्ष लगभग 10 लाख अण्डे देती है। ऐस्कैरिस अपने जीवनकाल में 2,70,00,000 अण्डे देती है। इसी प्रकार, हाथियों के एक जोड़े से 750 वर्षों में लगभग 1,90,00,000 हाथी बन जाएँगे; अतः जीव अधिक-से-अधिक सन्तानोत्पत्ति करते हैं, जबकि इस प्रजनन दर की तुलना में भोजन की मात्रा . तथा आवास स्थल नियत रहता है।
(2) जीवन – संघर्ष – प्राणियों के पैदा होते ही जल, भोजन, प्रकाश एवं सुरक्षित स्थान की आवश्यकता होती है; अतः जब अधिक संख्या में प्राणी पैदा हो जाते हैं तो इन आवश्यकताओं हेतु संघर्ष छिड़ जाता है। यह संघर्ष तीन प्रकार का हो सकता है—
(i) अन्त: जातीय संघर्ष (Intra-specific struggle ) — यह | संघर्ष केवल एक ही जाति के सदस्यों के बीच होता है। इस संघर्ष में अधिक क्षति होती है, क्योंकि सभी सदस्यों की आवश्यकताएँ समान होती हैं।
(ii) अन्तर्जातीय संघर्ष (Interspecific struggle ) — यह संघर्ष भिन्न-भिन्न जातियों के सदस्यों के बीच होता है।
(iii) वातावरणीय संघर्ष (Environment struggle ) — जीवधारी वातावरणीय कारकों; जैसे— सूखा, बाढ़, भूकम्प, ताप, वायु आदि से बचने के लिए जीवनभर संघर्ष करते रहते हैं।
(3) विभिन्नताएँ तथा इनकी आनुवंशिकी – सभी जीवों में कुछ-न-कुछ अन्तर अवश्य ही होता है। यहाँ तक कि एक ही माता-पिता की सन्तानें भी एक सी नहीं होती। इसी प्रकार, प्रकृति में अन्य जातियों के जीवों में भी भिन्नता मिलती है। ऐसे जीव जिनमें ये विभिन्नताएँ वातावरण के अनुकूल होती हैं, जीवित रहते हैं और हानिकारक भिन्नता वाले जीवधारी नष्ट हो जाते हैं। ऐसी विभिन्नताएँ सन्तानों में वंशागत हो जाती हैं ताकि वे भी उस वातावरण में रहने के लिए उतने ही उपयुक्त हो सकें।
(4) योग्यतम की उत्तरजीविता – जीवन संघर्ष में वे ही जीव सफल होते हैं, जिनमें अनुकूलन की क्षमता एवं अच्छे लक्षण होते हैं। ऐसे जीव अपने आप को वातावरण में निरन्तर होते रहने वाले परिवर्तनों के अनुसार बदलते रहते हैं तथा जो जीव ऐसा नहीं कर पाते हैं, वे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। हरबर्ट स्पेन्सर ने प्रकृति में अपने आप अनुकूलित जीवों के जीवित रहने तथा प्रतिकूल जीवों के नष्ट होते रहने को ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ (survival of the fittest) कहा है।
(5) प्राकृतिक चयन-जीवन-संघर्ष में वे ही जीव सफल होते हैं, जो अपने आपको वातावरण के अनुकूल बदल लेते हैं। जो ऐसा नहीं कर पाते वे नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार, प्रकृति में जीवन-संघर्ष के कारण योग्यतम का चुनाव होता है। इसे ही ‘प्राकृतिक चयन’ कहते हैं।
(6) नई जातियों की उत्पत्ति – डार्विन ने बताया कि विभिन्नताएँ छोटी होती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होती रहती हैं। कई पीढ़ियों के बाद ये विभिन्नताएँ एकत्रित होकर नई प्रजाति का विकास करती हैं। नई पीढ़ी के सदस्य पुरानी पीढ़ी के सदस्यों से बिल्कुल भिन्न होते हैं। इसी आधार पर, डार्विन ने ‘जाति के उद्भव’ के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया।
उदाहरणार्थ – शेर, चीता, बिल्ली तथा तेंदुआ चारों ही रचना तथा स्वभाव में एक-दूसरे से मिलते हैं। सभी मांसाहारी होते हैं तथा इनकी अंगुलियों पर नुकीले नाखून होते हैं। इससे यह पता चलता है कि इन सभी का विकास एक ही पूर्वज से हुआ है, परन्तु धीरे-धीरे अपने को सुरक्षित रखने तथा जीवित रहने के लिए ये अलग-अलग वातावरण में बिखर गए तथा फिर वातावरण के अनुकूल परिवर्तनों के फलस्वरूप इन जन्तुओं ने अलग-अलग जातियों का निर्माण कर लिया। |
प्रश्न 3. विभिन्न प्रकार के गुणसूत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : सेन्ट्रोमियर (centromere) की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
(1) अन्तकेन्द्री (टीलोसेन्ट्रिक – Telocentric ) — इस प्रकार के गुणसूत्र में सेन्ट्रोमियर; गुणसूत्र के एक सिरे पर स्थित होता है। इससे इसमें एक ही भुजा होती है।
(2) अग्रबिन्दुक (एक्रोसेन्ट्रिक – Acrocentric ) — इस प्रकार के गुणसूत्र में सेन्ट्रमियर एक सिरे के समीप होता है। इससे इसकी एक भुजा बहुत छोटी तथा दूसरी भुजा बहुत लम्बी होती है।

(3) उपमध्यकेन्द्री (सबमेटासेन्ट्रिक – Submetacentric)—इस प्रकार के गुणसूत्र में सेन्ट्रोमियर गुणसूत्र एक ओर स्थित होता है, इससे एक भुजा छोटी तथा दूसरी भुजा लम्बी होती है ।
(4) मध्यकेन्द्री (मेटासेन्ट्रिक – Metacentric)— इस प्रकार के गुणसूत्र में सेन्ट्रोमियर के मध्य में स्थित होने के कारण गुणसूत्र की दोनों भुजाएँ लगभग बराबर होती हैं।
जब गुणसूत्र पर सेन्ट्रोमियर नहीं पाया जाता तो इसे एसेन्ट्रिक कहते हैं। जब सेन्ट्रॉमियर की संख्या दो होती है तो डाइसेन्ट्रिक और जब दो से अधिक होती है तो गुणसूत्र को पॉलिसेन्ट्रिक कहते हैं।
प्रश्न 4. भ्रूणीय अध्ययन कैसे विकास का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं?
उत्तर : भ्रूणीय अध्ययन से जैव विकास के प्रमाण (Evidences of Evolution from Embryological study ) — विभिन्न कशेरुकी जन्तुओं के भ्रूणों में अत्यधिक समानताएँ पाई जाती हैं, क्योंकि इनमें लैंगिक जनन के अन्तर्गत सर्वप्रथम एककोशिक युग्मनज (zygote) के रूप में जीवन का प्रारम्भ होता है और इन सभी जन्तुओं का यह युग्मनज बारम्बार विभाजित होकर कोशिकाओं की एक खोखली गेंद-सी बनाता है, जिसे ब्लास्टुला (blastula) कहते हैं। यह बाद में द्विस्तरीय गैस्टुला (gastrula) में विकसित हो जाता है। प्रारम्भिक अवस्था में भ्रूण एक-से प्रतीत होते हैं। मेढक, सरीसृप ( रेप्टाइल), पक्षी (मुर्गी) तथा मनुष्य व अन्य स्तनधारियों के भ्रूण प्रारम्भ में मछली के समान होते हैं। सभी में क्लोम दरारें, क्लोम, नोटोकॉर्ड इत्यादि पाई जाती हैं। यद्यपि मुर्गी तथा मनुष्य की सन्तानों में पूँछ तथा प्रसनी गिल- दरारें समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि इनमें इनकी कोई उपयोगिता नहीं होती है । ग्रसनी गिल दरारें केवल जलीय जीवन के लिए उपयुक्त होती हैं।

छिपकली, पक्षी तथा मनुष्य कभी भी जलीय प्राणी नहीं रहे किन्तु इनके भ्रूण में मछलियों जैसे क्लोम बनते हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि समस्त कशेरुकी जन्तुओं का विकास मछली या मछली के समान आदि पूर्वजों से हुआ है। इससे यह भी स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव अपने भ्रूणीय परिवर्द्धन (ontogeny ) में ऐसी सभी प्रावस्थाओं से गुजरता है जिन अवस्थाओं में कभी उसके पूर्वज (phylogeny ) धीरे-धीरे विकसित होकर बने होंगे। इसी के आधार पर हैकेल (Haeckel, 1866) नामक वैज्ञानिक ने ‘पुनरावर्तन सिद्धान्त’ (Recapitulation theory) का प्रतिपादन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक जीव अपने भ्रूणीय विकास में अपने जातीय विकास के इतिहास को दोहराता है (Ontogeny recapitulates Phylogeny)। इस सिद्धान्त को ‘हैकेल का प्रजाति-आवर्तन नियम’ (Haeckel’s biogenetic law) भी कहते हैं। इस प्रकार विभिन्न जन्तुओं के भ्रूणों के अध्ययन से जैव विकास के प्रमाण मिलते हैं।
प्रश्न 5. विकास की परिभाषा लिखिए। इसके सम्बन्ध में लैमार्क के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर : जैव विकास
जैव विकास धीमी गति से होने वाला वह क्रमिक परिवर्तन है, जिसके परिणामस्वरूप प्राचीनकाल के सरल जीवों (जन्तु तथा पौधों) से वर्तमान युग के जटिल जीवों की उत्पत्ति हुई है।
यह एक ऐसा प्रक्रम है, जो निरन्तर चलता रहता है। इसके कारण जन्तुओं एवं पौधों की नई-नई जातियों की उत्पत्ति होती रहती है।
लैमार्कवाद
जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क (Jean Baptiste de Lamarck, 1744-1829) फ्रांस के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे। लैमार्क प्रथम वैज्ञानिक थे, जिन्होंने जैव विकास की व्याख्या वैज्ञानिक ढंग से की। इन्होंने जैव विकास सम्बन्धी अपने विचारों को फिलोसोफिक जूलोजिक (Philosophic Zoologique) नामक पुस्तक में 1809 में प्रकाशित किया।
लैमार्कवाद निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है-
(1) आकार में वृद्धि की प्रवृत्ति (Tendency increase in size) – लैमार्क के अनुसार जीवधारियों में (अंगों के आकार में) वृद्धि की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है।
(2) वातावरण का सीधा प्रभाव (Direct effect of the environment)— जीवधारियों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वातावरण का प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप जीवधारी की शारीरिक रचना एवं स्वभाव तथा में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं।

(3) अंगों का उपयोग तथा अनुपयोगं (Use and disuse of organs) – वातावरण के अनुसार, अधिक उपयोग में आने वाले अंग अधिक विकसित होने लगते हैं। इसके विपरीत, उपयोग में न आने वाले अंग धीरे-धीरे ह्वासित होकर लुप्त हो जाते हैं। कभी-कभी ये अंग अवशेषी अंग (vestigial organ) के रूप में रह जाते हैं।
(4) उपार्जित लक्षणों की वंशागति (Inheritance of acquired characters) – अंगों के अधिक उपयोग अथवा अनुपयोग के फलस्वरूप उत्पन्न भिन्नताएँ उपार्जित लक्षण कहलाते हैं। ये लक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होते रहते हैं। उपार्जित लक्षणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होते रहने से अनेक पीढ़ियों के बाद की सन्तानें अपने पूर्वजों भिन्न हो जाती हैं तथा नई जातियाँ बन जाती हैं।
लैमार्कवाद के प्रमाण
लैमार्क ने अपने नियमों की पुष्टि निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा की-
(1) जिराफ का उदाहरण – लैमार्क ने अपने विचारों को जिराफ का उदाहरण देकर समझाया। उनके अनुसार, जिराफ के पूर्वज छोटी गर्दन व छोटे कद के होते थे और अफ्रीका के घने जंगलों में रहते थे तथा जमीन पर उगी घास आदि खाते थे। जलवायु शुष्क होने से मैदान की घास सूखने लगी तथा जिराफ को पेड़-पौधों की पत्तियों पर निर्भर होना पड़ा। पेड़ आदि ऊँचे होने के कारण गर्दन तथा टाँगों का उपयोग अधिक होने लगा। इस प्रकार, पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिराफ की गर्दन तथा टाँगों की लम्बाई बढ़ने लगी।

(2) सर्पों का उदाहरण – लैमार्क के अनुसार, प्रारम्भ में सर्पों की टाँगें थीं। सर्पों को घास-फूस में दौड़ने तथा बिलों में घुसने में टाँगें रुकावट डालती थीं। इस कारण सर्पों ने टाँगों का उपयोग करना छोड़ दिया। टाँगों का उपयोग न होने से वह धीरे-धीरे छोटी होती चली गईं। हजारों वर्षों बाद इनकी सन्तानों में टाँगें विलुप्त हो गईं। यही गुण वर्तमान सर्पों में स्थायी लक्षण बन गया।
प्रश्न 6. DNA की संरचना का वर्णन कीजिए। इसका महत्त्व भी लिखिए।
अथवा वाटसन तथा क्रिक द्वारा प्रतिपादित DNA की द्विकुण्डलित संरचना के मॉडल के तीन प्रमुख लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल
डी० एन०ए० की खोज सर्वप्रथम फ्रेड्रिक मीशर (Fredrich Meischer) ने की। यह केवल केन्द्रक में पाया जाता है। इसका निर्माण डिऑक्सीराइबोस शर्करा, फॉस्फेट तथा नाइट्रोजनी बेस (एडीनीन, ग्वानीन, साइटोसीन तथा थायमीन) से होता है। इसमें यूरेसिल का अभाव होता है।
DNA की आण्विक संरचना (Molecular Structure of DNA) – जे०डी० वाटसन (J. D. Watson ) और एच०एफ०सी० क्रिक (H.F.C. Crick) ने सन् 1953 ई० में DNA की रचना के बारे में एक मॉडल प्रस्तुत किया जिसे उसके नाम पर वाटसन और क्रिक का मॉडल कहते हैं। इसके लिए वाटसन (Watson) एवं क्रिक (Crick) तथा विलकिन्स (Wilkins) को सम्मिलित रूप से सन् 1982 ई० में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। उनके अनुसार-
(1) DNA द्विचक्राकार रचना (Double helical structure) है, जिनमें पॉलिन्यूक्लियोटाइड की दोनों चेन एक अक्ष रेखा पर एक-दूसरे के विपरीत दिशा में कुण्डलित अथवा रस्सी की तरह ऐंठी हुई रहती हैं।
(2) दोनों चेनों का निर्माण फॉस्फेट (P) एवं शर्करा (S) के कई अणु के मिलने से होता है। नाइट्रोजनी बेस शर्करा के अणुओं से पार्श्व में लगे होते हैं।
(3) पॉलिन्यूक्लियोटाइड चेनों के बेस लम्बी अक्ष रेखा के सीधे कोणीय तल में लगे रहते हैं तथा सीढ़ी के डण्डे के आकार की रचना बनाते हैं।
(4) दोनों चेन एक-दूसरे से दुर्बल हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़ी रहती हैं। ये बन्ध बेस के जोड़ों के बीच में पाए जाते हैं ।
(5) एडीनीन तथा थायमीन बेस के बीच में सदैव दो हाइड्रोजन बन्ध ( A = T), इसी प्रकार ग्वानीन तथा साइटोसीन बेस के बीच में सदैव | तीन बन्ध ( G≡C) पाए जाते हैं।

(6) दोनों चेनों में एडीनीन (A) के अणु थायमीन (T) से तथा ग्वानीन (G) के अणु सदैव साइटोसीन (C) से जुड़े रहते हैं और इस प्रकार सीढ़ी के समान रचना बनाते हैं।
(7) DNA अणु में बेस के डण्डों की संख्या 100 से 2,00,000 तक हो सकती है।

(8) दो बेस जोड़ों के बीच की दूरी 3-4Å तथा पूरे एक मोड़ की लम्बाई लगभग 34Å होती है। इस प्रकार प्रत्येक मोड़ में दस बेस जोड़े होते हैं। DNA के अणु का व्यास लगभग 20Å होता है।
एकसूत्री डी०एन०ए० ( Single Stranded DNA ) – कुछ वाइरस में अपवादस्वरूप पॉलि- डिऑक्सीराइबोन्यूक्लियोटाइड की एक श्रृंखला (single strand) होती है; जैसे – ∅ × 174 coliphage तथा S 13 E. coliphage वाइरस । इनमें क्षारकों का अनुपात समान नहीं होता। डी०एन०ए० का महत्त्व
(1) डी०एन०ए० का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य आनुवंशिक सूचनाओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाना है।
(2) डी० एन०ए० कोशिका की सभी जैविक क्रियाओं का नियन्त्रण तथा नियमन करता है।
(3) डी० एन०ए० आर० एन०ए० का संश्लेषण करता है। आर० एन०ए० प्रोटीन संश्लेषण के लिए अति आवश्यक होता है।
(4) डी०एन०ए० स्वयं अपने संश्लेषण को निर्देशित करता है, इसे प्रतिकृति या अनुलिपिकरण (replication) कहते हैं।
प्रश्न 7. DNA में द्विगुणन किस प्रकार होता है?
उत्तर : DNA का द्विगुणन (Duplication or Replication of DNA ) — किसी DNA अणु से उसी प्रकार के DNA अणु के निर्माण को प्रतिकृति या द्विगुणन कहते हैं। द्विगुणन एक अर्द्ध-संरक्षी (semi-conservative) क्रिया है जिसके फलस्वरूप निर्मित DNA के अणुओं में एक सूत्र पुराना मातृ DNA अणु का तथा दूसरा नवनिर्मित होता है। वाटसन एवं क्रिक ने DNA के प्रतिरूप और संरचना को समझाने के साथ ही एक अणु के द्विगुणन की क्रिया को भी निरूपित किया था। कॉर्नबर्ग (Kornberg), मेसेल्सन एवं स्टाइल (Meselson and Stahl, 1958) आदि वैज्ञानिकों ने इसकी विधि का वर्णन किया।
DNA के द्विगुणन में पहले दोनों श्रृंखलाओं के मध्य बने हाइड्रोजन बन्धों (hydrogen bonds) के खुल जाने का कारण इसका अलग-अलग होना है। अणु के एक सिरे पर यह क्रिया प्रारम्भ होती है और क्रमश: दूसरे सिरे तक चलती जाती है। इधर पहले सिरे पर उभरे हुए न्यूक्लियोटाइड्स पर नए न्यूक्लियोटाइड आकर जुड़ने लगते हैं।
इस प्रकार, जुड़ने वाली नई-नई न्यूक्लियोटाइड इकाइयाँ पूर्व स्थित न्यूक्लियोटाइड की पूरक होती हैं अथवा जिस पर जुड़ने जा रही हैं उसकी जोड़ीदार ही होंगी। इससे नए बनने वाले दो DNA, अणु पहले (मातृ अणु) के समान तथा बिल्कुल एक जैसे होते हैं। यह विशेषता जोड़े बनाने की प्रक्रिया तथा उसकी निश्चितता के ऊपर निर्भर करती है। इसके कारण नया बनने वाला कुण्डल पुराने हटे हुए कुण्डल की तरह अथवा सामने वाले का पूरक कुण्डल (complementary helix) होता है।
DNA के द्विगुणन के कारण ही जीवों में जनन (reproduction) की क्रिया सम्भव है। इसी से लक्षणों का अस्तित्व भी बना रहता है।
प्रश्न 8. गुणसूत्र की रचना का सचित्र वर्णन कीजिए। गुणसूत्रों के कार्य लिखिए।
उत्तर : गुणसूत्र (Chromosomes ) — केन्द्रकद्रव्य में स्थित क्रोमैटिन जाल (chromatin reticulum) कोशिका विभाजन के समय एक-दूसरे से पृथक् हो जाते हैं। इन्हें गुणसूत्र (chromosomes) कहते हैं। ई० स्ट्रासबर्गर (E. Strasburger, 1875) ने इन संरचनाओं को सबसे पहले देखा था। डब्ल्यू० वाल्डेयर (W. Waldeyer, 1888 ) ने इन्हें क्रोमोसोम (chromosomes) नाम दिया। सटन तथा बोवेरी (Sutton and Boveri, 1902) ने क्रोमोसोम परिकल्पना (Chromosomes hypothesis) प्रस्तुत की। इसके अनुसार, गुणसूत्र आनुवंशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाने वाली संरचना होती है। प्रत्येक जाति के जीवों में गुणसूत्रों की संख्या एवं संरचना निश्चित होती है। सामान्यतया ये 0.5 – 30μ लम्बे एवं 0.2 – 3μ व्यास के होते हैं।
संरचना
संयुक्त सूक्ष्मदर्शी से देखने पर प्रत्येक गुणसूत्र में अग्रलिखित भाग दिखाई देते हैं-
(1) पेलिकिल (Pellicle ) — यह क्रोमैटिन पदार्थ की बनी पतली सी झिल्ली के रूप में होती है। यह गुणसूत्र के पदार्थ के चारों ओर आवरण बनाती है।
(2) मैट्रिक्स (Matrix ) — यह गुणसूत्र का आधार पदार्थ है, जिसमें क्रोमोनिमेटा स्थित होते हैं।
(3) क्रोमोनिमेटा (Chromonemata) — गुणसूत्र के मैट्रिक्स में कुण्डलित धागे के समान दो क्रोमोनिमेटा होते हैं। प्रत्येक क्रोमोनिमेटा एक क्रोमेटिड को प्रदर्शित करता है। दोनों क्रोमोनिमेटा कुण्डलित होकर लगभग 800 À मोटे एक धागे जैसे दिखते हैं। क्रोमोनिमेटा पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर गहरे रंग के क्रोमोमियर्स (chromomeres ) होते हैं। किसी एक गुणसूत्र में क्रोमोनिमेटा पर क्रोमोमियर्स की संख्या व स्थिति सदैव निश्चित होती है ।

(4) सेन्ट्रोमियर या गुणसूत्र बिन्दु ( Centromere ) — इसे प्राथमिक संकीर्णन भी कहते हैं। इससे गुणसूत्र माइटोसिस के तर्क के साथ जुड़ा रहता है।
सेन्ट्रीमियर की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र मध्यकेन्द्री (metacentric), उपमध्यकेन्द्री (submetacentric), अग्रबिन्दुकी या अन्तकेन्द्री (acrocentric or telocentric) होते हैं।
(5) द्वितीयक संकीर्णन (Secondary constriction ) प्राथमिक संकीर्णन के अतिरिक्त गुणसूत्र पर द्वितीयक संकीर्णन भी मिलता है।
(6) सैटेलाइट (Satellite) – गुणसूत्र के सिरे पर स्थित यह गोलाकार संरचना होती है। जिस गुणसूत्र में सैटेलाइट पाया जाता है, उसे सैट ‘गुणसूत्र (SAT-chromosome) कहते हैं।
(7) टीलोमियर (Telomere ) — गुणसूत्र के छोरों अथवा सिरों को टीलोमियर कहते हैं।
गुणसूत्रों के कार्य
(1) गुणसूत्र पर जीन (gene) स्थित होते हैं। जीन आनुवंशिक लक्षणों के वाहक होते हैं। इनको ‘वंशागति का भौतिक आधार’ (physical basis of heredity) कहा जाता है ।
(2) गुणसूत्र जीवों की विभिन्न शारीरिक एवं उपापचयी क्रियाओं का संचालन करते हैं।
(3) गुणसूत्रों की संरचना एवं संख्या में परिवर्तन से जीवों में विभिन्न प्रकार के अनेक लक्षण दृष्टिगत होते हैं।
- लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. विविधता क्या है?
उत्तर : विविधता (Diversity ) — संसार में लगभग 10 लाख प्रकार के प्राणी और 3,43,000 पादप प्रजातियाँ ज्ञात हो चुकी हैं। इनमें संरचनात्मक, क्रियात्मक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। ये भिन्नताएँ उनकी आनुवंशिक संरचना के कारण होती हैं। आनुवंशिक संरचना के कारण जीवधारी एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। जीव- वैज्ञानिकों की दृष्टि से विविधता को, व्यष्टियों के मध्य अन्तर की उपस्थिति द्वारा परिभाषित किया जाता है। विविधता जैव विकास का मूल आधार होती है। विविधताएँ जीन संरचना में परिवर्तनों के कारण उत्पन्न होती हैं।
प्रश्न 2. जीन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर : जीन ( Gene ) — आनुवंशिक लक्षणों का नियन्त्रण तथा वंशागति की आनुवंशिक इकाइयाँ जीन कहलाती हैं। मेण्डेल ने इन्हें कारक · (factor) कहा था। जोहनसन ने इन्हें जीन कहा। ये डी० एन०ए० का भाग होती हैं। इनमें आनुवंशिक कोड (genetic code) निहित होता है। ये जैविक क्रियाओं का नियन्त्रण तथा नियमन करती हैं।
आधुनिक विचारधारा के अनुसार, जीन को कार्यिकी की इकाई ‘सिस्ट्रॉन’ (cistron), उत्परिवर्तन की क्षमता होने के कारण म्यूटॉन (muton) तथा पुनर्संगठन (recombination) की क्षमता के कारण रेकॉन (recon) कहा जाता है। सामान्यतया एक जीन एक लक्षण का निर्धारण करता है।
प्रश्न 3. आनुवंशिकी की परिभाषा दीजिए। जीव विज्ञान की इस शाखा में मेण्डेल का क्या योगदान है?
उत्तर : आनुवंशिकी (Genetics) — जीवधारी अपने जैसी सन्तानें उत्पन्न करते हैं। माता-पिता से सन्तानों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होने वाले लक्षणों को आनुवंशिक लक्षण (hereditary characters) कहते हैं। सन्तानें पूर्ण रूप से अपने जनकों (माता-पिता) के समान नहीं होतीं, इनमें विभिन्नताएँ (variations) भी पाई जाती हैं। आनुवंशिक लक्षणों की वंशागति एवं विभिन्नताओं का अध्ययन आनुवंशिकी (genetics) कहलाता है। आनुवंशिकी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डब्ल्यू० बेटसन (W. Bateson, 1905) ने किया था।
आनुवंशिकी का वैज्ञानिक अध्ययन सर्वप्रथम ग्रेगर जॉन मेण्डेल (Gregor Johann Mendel, 1822 1884) ने किया था। मेण्डेल के पश्चात् मेण्डेल के कथन की पुष्टि 1900 में ह्यूगो डी व्रीज, कार्ल कॉरेन्स तथा एरिक शेरमैक ने की। मेण्डेल को आनुवंशिकी का जनक कहते हैं।
प्रश्न 4. गुणसूत्रों को कोशिका विभाजन की किस अवस्था में देखा जा सकता है? असीमकेन्द्रकी एवं ससीमकेन्द्रकी गुणसूत्रों के लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : गुणसूत्र कोशिका विभाजन की मध्यावस्था (metaphase) में देखे जा सकते हैं।
असीमकेन्द्रकी कोशिकाओं (prokaryotic cells) में केवल एक वृत्ताकार गुणसूत्र होता है। गुणसूत्र’ आकार में बड़ा होता है। इसमें हिस्टोन प्रोटीन्स (histone proteins) का अभाव होता है।
ससीमकेन्द्रकी कोशिकाओं (eukaryotic cells) में अनेक वृत्ताकार एवं छड़नुमा गुणसूत्र पाए जाते हैं। ये डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल से बने होते हैं। इनमें हिस्टोन प्रोटीन्स पाई जाती हैं।
प्रश्न 5. डी०एन०ए० के आनुवंशिक पदार्थ होने का प्रमाण किसने प्रस्तुत किया था? डी०एन०ए० के संघटकों के नाम लिखिए।
उत्तर : डी०एन०ए० एक आनुवंशिक पदार्थ है। इसकी पुष्टि सर्वप्रथम फ्रेडरिक ग्रिफिथ (Frederick Griffith; 1928) ने की थी । इन्होंने अपने प्रयोग डिप्लोकॉकस न्युमोनी (Diplococcus pneumoniae) नामक जीवाणु पर किए थे। इसके पश्चात् ओ०टी० ऐवेरी (O.T. Avery), मैक्लॉयड (C. McLeoid) तथा मैककारटी (McCarty) ने 1944 में की थी।
डी०एन०ए० के संघटक (Components of DNA)—डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल ( deoxyribose nucleic acid) का निर्माण न्यूक्लियोटाइड्स (nucleotides) से होता है। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड में निम्नलिखित पदार्थों के अणु पाए जाते हैं-
(i) डिऑक्सीराइबोस शर्करा ( deoxyribose sugar) ।
(ii) फॉस्फोरिक अम्ल ( phosphoric acid)।
(iii) नाइट्रोजनी क्षारक (nitrogenous base ) — ये दो प्रकार के होते हैं-
(क) प्यूरीन ( Purines ) — एडीनीन ( adenine) तथा ग्वानीन (guanine)।
(ख) पिरिमिडीन (Pyrimidines ) – थायमीन (thymine) तथा साइटोसीन (cystosine)।
डी० एन०ए० अणु दो पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से बना होता है। ये एक-दूसरे के प्रतिसमानान्तर लगी होती हैं।
प्रश्न 6. डी०एन०ए० की द्विकुण्डली संरचना से आप क्या समझते हैं? इस संरचना का प्रस्ताव किसने या था?
उत्तर : डी०एन०ए० की द्विकुण्डली संरचना का निर्माण दो पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से होता है। ये शृंखलाएँ एक-दूसरे के प्रतिसमानान्तर होती हैं। ये एक अक्ष रेखा पर एक-दूसरे के विपरीत दिशा में कुण्डलित अथवा रस्सी की तरह ऐंठी हुई होती हैं। इसमें पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं के नाइट्रोजनी क्षारक अक्ष रेखा के समकोणीय तल पर लगे होते हैं। ये परस्पर हाइड्रोजन बन्धों से जुड़कर सीढ़ी के डण्डे के समान रचना बनाते हैं। (A=T; G≡C)।
DNA की संरचना का प्रतिरूप सर्वप्रथम वाटसन तथा क्रिक (Watson and Crick, 1953) ने प्रस्तुत किया था।
प्रश्न 7. अवशेषी अंग पर टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर : अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) – जीवधारियों के शरीर में अनेक ऐसी रचनाएँ पाई जाती हैं जिनकी शरीर में कोई आवश्यकता नहीं होती है। ऐसे हासित अंगों को अवशेषी अंग (vestigial organs) कहते हैं। इनकी उपस्थिति से प्रमाणित होता है कि ये अंग पूर्वजों में कभी-न-कभी उपयोगी रहे होंगे। इनसे जैव विकास प्रमाणित होता है; जैसे – मनुष्य के शरीर में पाई जाने वाली रचनाएँ – निमेषक पटल, पुच्छ कशेरुकाएँ, कृमिरूप परिशेषिका, कर्णपल्लव पेशियाँ, वक्ष स्थल बाल आदि।
प्रश्न 8. DNA तथा RNA में अन्तर लिखिए ।
उत्तर : डी०एन०ए० तथा आर०एन०ए० में अन्तर
क्र०सं० | डी०एन०ए० | आर०एन०ए० |
1. | इसका अणु दो सूत्रों का बना सीढ़ी सदृश होता है। | इसके अणु में केवल एक सूत्र होता है। |
2. | इसमें डिऑक्सीराइबोस शर्करा होती है। | इसमें राइबोस शर्करा होती है। |
3. | DNA केवल केन्द्रक में पाया जाता है। | यह केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य में पाया जाता है। |
4. | इसके अणु में एडीनीन, ग्वानीन, थायमीन तथा साइटोसीन बेस होते हैं। | इसमें थायमीन के स्थान पर यूरेसिल नामक बेस होता है। |
5. | DNA आनुवंशिक पदार्थ है, जो कोशिकाओं की समस्त क्रियाओं का नियमन करता है। | यह आनुवंशिक सूचनावाहक का कार्य करता है और प्रोटीन संश्लेषण में सहायक होता है। |
6. | DNA अपने ही समान डी० एन०ए० तथा आर०एन०ए० उत्पन्न करता है अर्थात् इसमें द्विगुणन की क्षमता होती है। | आर० एन०ए० में यह गुण नहीं होता है। इसका निर्माण DNA से होता है। |
प्रश्न 9. RNA कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर : RNA के प्रकार
RNA निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं-
(i) संदेशवाहक RNA (Messenger RNA or m-RNA ) – इसका निर्माण DNA के द्वारा केन्द्रक में होता है। यह DNA में स्थित आनुवंशिक आदेशों को राइबोसोम तक पहुँचाता है।
(ii) राइबोसोमल RNA (Ribosomal RNA or (r-RNA ) – यह राइबोसोम में पाया जाता है तथा राइबोसोम के निर्माण में भाग लेता है।
(iii) स्थानान्तरण RNA (Transfer RNA or t-RNA ) – प्रत्येक अमीनो अम्ल के स्थानान्तरण के लिए एक स्वतन्त्र t- RNA होता है। ये स्वतन्त्र रूप से कोशिकाद्रव्य में रहते हैं तथा अमीनो अम्लों को अपने साथ ले जाते हैं।
कार्य (Function ) – DNA के नियन्त्रण में तथा RNA राइबोसोम पर पहुँचकर प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करते हैं। इस प्रकार ‘आर०एन०ए० आनुवंशिक सूचनावाहक होता है।
प्रश्न 10. अणुजैविकी का केन्द्रीय सिद्धान्त क्या है?
उत्तर : डी० एन०ए० से सन्देशवाहक आर०एन०ए० ( m – RNA ) और आर०एन०ए० (RNA) से प्रोटीन संश्लेषण क्रिया में एक सूचना का संचार एक ओर से दूसरी ओर होता रहता है। इसे आण्विक जीव विज्ञान का प्रधान सिद्धान्त (Central Dogma of Molecular Biology) कहते हैं। इस एकदिशीय संचार (unidirectional flow) की विचारधारा का प्रतिपादन क्रिक (Crick, 1968 ) ने किया।

प्रश्न 11. प्रोटीन संश्लेषण को जीवन की कुंजी क्यों मानते हैं?
उत्तर : सन्तान लक्षणों में अपने जनकों (parents) से, गुणसूत्र पर स्थित विभिन्न लक्षणों के जीन (genes) के कारण मिलते हैं। जीन जीवधारियों के आनुवंशिक लक्षणों को नियन्त्रित करने के साथ-ही-साथ जैविक क्रियाओं का नियन्त्रण एवं नियमन करते हैं। मेण्डेल के आनुवंशिक कारक को जोहनसन ने जीन कहा। जीन मुख्यत: DNA से बनते हैं; कुछ विषाणुओं में इनका निर्माण RNA से भी होता है।
जीन को कार्यविधि की इकाई अथवा सिस्ट्रॉन (unit of function or cistron) माना जाता है। जीन के नियन्त्रण में प्रोटीन का संश्लेषण होता है। प्रोटीन्स विकर (enzymes) की तरह कार्य करके विभिन्न जैविक क्रियाओं का निर्धारण एवं नियमन करते हैं। अत: प्रोटीन संश्लेषण को जीवन की कुंजी माना जाता है।
प्रश्न 12. डाउन संलक्षण तथा टरनर्स संलक्षण पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए ।
उत्तर : मनुष्य में 46 गुणसूत्र (44 + XX या 44 + XY ) होते हैं। इनकी संख्या में कोई भी परिवर्तन कोई-न-कोई विकार या दोष उत्पन्न करता है।
(1) डाउन संलक्षण (Down’s syndrome) – गुणसूत्र 21 की संख्या दो के स्थान पर जब तीन हो जाती है तो ऐसे व्यक्ति की आँखें तिरछी, पलकें मंगोलों की भाँति, सिर गोल, त्वचा खुरदरी, जीभ मोटी हो जाती है तथा मुख थोड़ा खुला रहता है। बुद्धि मन्द होती है। कद छोटा होता है। जननांग सामान्य होते हैं किन्तु पुरुष नपुंसक होता है। इस प्रकार की विकृति को मंगोली जड़ता या मंगोलिक बेवकूफी (Mangolian idiocy) कहते हैं।
(2) टरनर्स संलक्षण (Turner’s syndrome ) — जब लिंग गुणसूत्र दो के स्थान पर एक ही होता है अर्थात् XO अवस्था होती है। इनमें गुणसूत्रों की कुल संख्या 45 होगी। इस प्रकार का शरीर अल्पविकसित मादा (लड़की) के समान होता है। यह लड़की बाँझ होती है। जननांग अविकसित होते हैं; कद छोटा होता है तथा वक्ष चपटा होता है। बाल्यकाल में यह सामान्य लड़की के समान दिखाई देती है किन्तु किशोरावस्था आने तक नपुंसक हो जाती है। इसमें अण्डाशय (ovaries) विकसित नहीं होते हैं।
प्रश्न 13. जीनोम तथा प्लाज्मोन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर : आनुवंशिक पदार्थ दो प्रकार का होता है-
(क) जीनोम ( Genome ) — किसी जीवधारी के गुणसूत्र के एक अगुणित समुच्चय (haploid set ) को जीनोम (genome) कहते हैं अर्थात् एक युग्मक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों की संख्या जीनोम कहलाती है।
(ख) प्लाज्मोन (Plasmone) – केन्द्रक के बाहर अर्थात् कोशिकाद्रव्य में पाए जाने वाले आनुवंशिक पदार्थ को प्लाज्मोन या प्लाज्मोजीन (plasmogene) कहते हैं।
प्रश्न 14. उत्परिवर्तन किसे कहते हैं? यह जैव विकास में क्यों सहायक है?
उत्तर : उत्परिवर्तन तथा जैव विकास में इसका महत्त्व
” जीवों में अचानक उत्पन्न होने वाले लक्षणों को उत्परिवर्तन (mutation) कहते हैं।” उत्परिवर्तन आनुवंशिक होते हैं तथा इनके द्वारा. नई-नई जातियाँ बनती हैं। ह्यूगो डी वीज के अनुसार, उत्परिवर्तन जैव विकास का मूल आधार है जो समय-समय पर जीव में अचानक स्पष्ट होकर सामने आ जाता है।
ह्यूगो डी ब्रीज के उत्परिवर्तनवाद (mutation theory) के अनुसार, नई जातियों की उत्पत्ति छोटी-छोटी क्रमिक भिन्नताओं के कारण नहीं होती बल्कि उत्परिवर्तन के फलस्वरूप नई जातियों की उत्पत्ति होती है। जैव विकास का मूल आधार विभिन्नताएँ (variations) होती हैं। विभिन्नताएँ वातावरण के प्रभाव से या जीन ढाँचों में परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं। ह्यूगो डी ब्रीज ने वंशागत विभिन्नताओं की उत्पत्ति का मूल कारण उत्परिवर्तन (mutation) को बताया; अतः उत्परिवर्तन जैव विकास में सहायक होता है।
प्रश्न 15. ” व्यक्ति – वृत्त में जाति-वृत्त की पुनरावृत्ति होती है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए ।
उत्तर : व्यक्ति-वृत्त में जाति-वृत्त की पुनरावृत्ति
जीवधारी के भ्रूणीय परिवर्द्धन के समय उसके विकास क्रम की पुनरावृत्ति होती है; अतः इसे पुनरावृत्ति सिद्धान्त या पुनरावर्तन सिद्धान्त (Recapitulation theory) कहते हैं। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन जर्मन ‘वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैकेल (Ernest Haeckel) ने किया। इसके अनुसार, जीवधारी व्यक्ति-वृत्त (भ्रूणीय विकास) में पूर्वजों के विकासीय इतिहास को दोहराता है। उदाहरण के लिए- किसी स्तनधारी भ्रूण का अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि भ्रूण के परिवर्द्धन के समय भ्रूणावस्था पहले मछली से, फिर उभयचर से तथा उसके बाद सरीसृप से मिलती है।
हैकेल के अनुसार, प्रत्येक जीव भ्रूण परिवर्द्धन या व्यक्ति-वृत्त में जाति-वृत्त की पुनरावृत्ति करता है (Ontogeny ‘repeats Phylogeny)।
प्रश्न 16. समजात तथा समवृत्ति संरचनाओं में अन्तर बताइए । प्रत्येक के दो-दो उदाहरण भी दीजिए।
अथवा समजात अंग क्या हैं?
उत्तर : समजात तथा समवृत्ति अंगों में अन्तर
क्र०सं० | समजात अंग | समवृत्ति अंग |
1. | ये अंग उत्पत्ति में समान होते हैं। | ये अंग उत्पत्ति में भिन्न-भिन्न होते हैं। |
2. | ये अंग मूल रचना में एक-जैसे होते हैं। | ये अंग मूल रचना में भिन्न होते हैं। |
3. | कार्य के अनुसार इन अंगों की आकारिकी में अन्तर होता है। | कार्य एक-जैसा होने के कारण ये एकसमान दिखाई देते हैं। |
उदाहरण – सील के फ्लीपर, पक्षी के पंख, घोड़े की अगली टाँगें तथा मनुष्य का हाथ । मूल संरचना एक-जैसी, किन्तु कार्य अलग-अलग होने के कारण बाह्य संरचना अत्यन्त भिन्न होती है। | उदाहरण – तितली, टेरोडैक्टाइल, पक्षी तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं। इनकी उत्पत्ति अलग-अलग प्रकार से होती है; अतः मूल रचना भिन्न-भिन्न होती है। |
प्रश्न 17. डी ब्रीज के उत्परिवर्तनवाद पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : ह्यूगो डी ब्रीज (Hugo de Vries) के अनुसार, उत्परिवर्तनवाद निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है—
(i) नई जातियों की उत्पत्ति, उत्परिवर्तन (mutation) या विच्छिन्न भिन्नताओं के कारण होती है।
(ii) उत्परिवर्तक (mutant) शुद्ध नस्ली होते हैं।
(iii) जीवधारियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है।
(iv) उत्परिवर्तन अनिश्चित होते हैं। ये लाभदायक या हानिकारक होते हैं।
(v) उत्परिवर्तन के फलस्वरूप एक पूर्वज जाति से अनेक प्रजातियाँ विकसित हो सकती हैं।
प्रश्न 18. जीवाश्म क्या हैं? इनके अध्ययन को क्या कहते हैं? जीवाश्म का कोई एक सामान्य उदाहरण दीजिए ।
अथवा जीवाश्मिकी से प्राप्त जैव विकास के प्रमाण दीजिए। उस जीवाश्म का नाम लिखिए जो सरीसृप तथा पक्षी के मध्य की कड़ी है।
उत्तर : “प्राचीन जन्तुओं और पौधों के पृथ्वी के भीतर या चट्टानों में बचे अवशेष या उनके चिह्न जीवाश्म (fossil) कहलाते हैं। “
जीवाश्म के अध्ययन को जीवाश्म विज्ञान कहते हैं।
आर्किऑप्टेरिक्स जीवाश्म का उदाहरण है, जिससे यह प्रमाण मिलता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ है।
प्रश्न 19. डार्विनवाद तथा नव- डार्विनवाद में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : डार्विनवाद तथा नव-डार्विनवाद में अन्तर
क्र०सं० | डार्विनवाद | नव- डार्विनवाद |
1. | इसके अनुसार, जीवधारियों में परिवर्तन धीरे-धीरे होता है। | इसमें परिवर्तन आकस्मिक तथा अचानक होता है। |
2. | डार्विनवाद में सूक्ष्म विभिन्नताओं को स्थान दिया गया है। | इसमें केवल दीर्घ विभिन्नताओं को महत्त्व दिया गया है। |
3. | डार्विनवाद केवल प्राकृतिक चुनाव पर बल देता है। | इसमें पहले उत्परिवर्तन तथा बाद में प्राकृतिक चुनाव होता है । |
प्रश्न 20. ऐल्केप्टोन्यूरिया रोग क्या है? यह किस प्रकार होता है ?
उत्तर : ऐल्केप्टोन्यूरिया (Alkaptonuria ) — इसमें उपापचय |क्रिया में टायरोसीन ( tyrosine) अमीनो अम्ल से ऐल्केप्टोन (alkapton) का निर्माण होता है। एक सुप्त जीन के प्रभाव के कारण इसका विखण्डन | नहीं होता है। ऐल्केप्टोन की रक्त में मात्रा बढ़ने लगती है और अन्त में ऐल्केप्टोन का उत्सर्जन मूत्र में होने लगता है। मूत्र हवा के सम्पर्क में आने पर काला हो जाता है। इस अवस्था को ऐल्केप्टोन्यूरिया (alkaptonuria) कहते हैं।
प्रश्न 21. Y- सहलग्न लक्षणों की वंशागति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : Y – सहलग्न लक्षणों की वंशागति (Inheritance of Y-linked characters ) – Y – सहलग्न (Y – linked ) ऐसे लक्षण हैं जिनके जीन Y गुणसूत्र के असमजात खण्ड पर स्थित होते हैं अर्थात् इसके समजात जीन X – गुणसूत्र पर नहीं होते। ये लक्षण केवल पुरुषों (पुत्रों) में | प्रदर्शित होते हैं। कर्ण पल्लव (ear pinnae) पर मोटे तथा लम्बे बालों की उपस्थिति अर्थात् हाइपरट्राइकोसिस (hypertrichosis) ऐसा ही एक लक्षण है।
प्रश्न 22. लिंग-प्रभावित लक्षण पर उदाहरण सहित टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : लिंग-प्रभावित लक्षण ( Sex Influenced character)— अनेक लक्षणों के जीन लिंग (sex) से प्रभावित होते हैं; जैसे – मनुष्यों में गंजापन ( baldness) । यह एक आनुवंशिक लक्षण है। इसकी आनुवंशिकी अलिंगी या कायिक गुणसूत्र पर स्थित जीन्स की एक जोड़ी द्वारा नियन्त्रित होती है। जीन की होमोजाइगस (homozygous) प्रभावी अवस्था (BB) में गंजापन स्त्री व पुरुष दोनों में विकसित होता है। जीन की हेटेरोजाइगस (heterozygous) अवस्था (Bb) में गंजापन केवल पुरुषों में प्रदर्शित होता है। इस अवस्था में यह नर हॉर्मोन से प्रभावित होता है। जीन की | होमोजाइगस सुप्त (bb) अवस्था में गंजापन प्रदर्शित नहीं होता। |
प्रश्न 23. समयुग्मजी तथा विषमयुग्मजी में अन्तर लिखिए ।
उत्तर: समयुग्मजी तथा विषमयुग्मजी में अन्तर
क्र०सं० | समयुग्मजी | विषमयुग्मजी |
1. | जब युग्मनज (zygote) में एक लक्षण के दोनों जीन एक जैसे होते हैं तो इन्हें समयुग्मजी कहते हैं। | जब युग्मनज में किसी एक लक्षण के दोनों जीन में प्रभावी तथा सुप्त दोनों होते हैं तो इस विषमयुग्मजी कहते हैं। |
2. | यह लक्षण शुद्ध होता है। | यह लक्षण संकर होता है। |
प्रश्न 24. (i) DNA की द्विकुण्डलित संरचना का सुझाव किसने दिया था?
(ii) DNA की संरचना से सम्बन्धित न्यूक्लियोटाइडों के तीन रासायनिक रूप से अनिवार्य अंग क्या हैं?
(iii) DNA अणु में कितने प्रकार के न्यूक्लियोटाइड होते हैं?
उत्तर : (i) DNA की द्विकुण्डलित संरचना वाटसन तथा क्रिक ने दी थी।
(ii) DNA न्यूक्लियोटाइड्स में निम्नलिखित रासायनिक अणु पाए जाते हैं-
(a) पेन्टोस शर्करा – डिऑक्सीराइबोस शर्करा,
(b) नाइट्रोजन क्षार – एडीनीन, ग्वानीन, सायटोसीन तथा थायमीन।
(c) फॉस्फोरिक अम्ल या फॉस्फेट समूह।
(iii) DNA अणु में निम्न चार प्रकार के न्यूक्लियोटाइड पाए जाते हैं-
(a) डिऑक्सीएडीनोसीन मोनोफॉस्फेट
(b) डिऑक्सीग्वानोसीन मोनोफॉस्फेट
(c) डिऑक्सीसाइटिडीन मोनोफॉस्फेट
(d) डिऑक्सीथायमिडीन मोनोफॉस्फेट
- अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. रेट्रोवाइरस क्या है?
उत्तर : रेट्रोवाइरस ( Retrovirus) – ऐसे वाइरस जिनमें आनुवंशिक पदार्थ डी०एन०ए० के स्थान पर आर०एन०ए० होता है। रेट्रोवाइरस कहलाते हैं; जैसे – HIV (एड्स का वाइरस)।
प्रश्न 2. जीन कहाँ स्थित होते हैं? इनकी रासायनिक प्रकृति क्या है?
उत्तर : जीन (Gene) गुणसूत्र के क्रोमोमियर्स (chromomeres) पर स्थित होते हैं। प्रत्येक जीन की गुणसूत्र पर स्थिति निश्चित होती है, इस बिन्दु को स्थल (locus) कहते है। जीन DNA अणु का खण्ड होता है। यह न्यूक्लियोप्रोटीन्स से बना होता है। जीन में आनुवंशिक कोड (genetic code) निहित होता है।
प्रश्न 3. समवृत्ति अंग क्या हैं? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर : वे अंग जिनकी उत्पत्ति तथा मूल संरचना भिन्न होती है लेकिन कार्य समान होते हैं, समवृत्ति अंग कहलाते हैं; जैसे-पक्षी, ड्रेको, तितली तथा चमगादड़ के पंख आदि । |
प्रश्न 4. लैमार्कवाद के दो मूल तथ्यों को लिखिए, जिन पर यह आधारित है।
उत्तर : लैमार्कवाद के दो मूल तथ्य निम्नवत् हैं-
(i) वातावरण का सीधा प्रभाव तथा अंगों का उपयोग व अनुपयोग ।
(ii) उपार्जित लक्षणों की वंशागति ।
प्रश्न 5. कभी-कभी नवजात शिशु में छोटी-सी पूँछ होती है, यह क्या सिद्ध करती है?
उत्तर : पुनरावृत्ति सिद्धान्त (Recapitulation theory) के अनुसार, भ्रूणीय विकास के दौरान जीवधारी अपने पूर्वज इतिहास को दोहराते हैं। कभी-कभी पूर्वजता (atavism) के कारण अवशेषी अंग विकसित दशा में प्रदर्शित हो जाते हैं। यह सिद्ध करती है कि हमारे पूर्वजों में पूँछ विद्यमान थी।
प्रश्न 6. क्रिस-क्रॉस वंशागति किसे कहते हैं?
उत्तर : अप्रभावी लिंग- सहलग्न लक्षण का पिता से पुत्री और उसके बाद पुत्री से उसकी सन्तानों में पहुँचना क्रिस-क्रॉस वंशागति कहलाता है।
प्रश्न 7. प्यूरीन तथा पिरिमिडीन नाइट्रोजन क्षार कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर : प्यूरीन (Purines ) — एडीनीन तथा ग्वानीन । पिरिमिडीन (Pyrimidines ) – थायमीन, साइटोसीन तथा यूरेसिल।
प्रश्न 8. उपमध्यंकेन्द्री गुणसूत्र में एक भुजा दूसरी से लम्बी क्यों होती है?
उत्तर : उपमध्यकेन्द्री गुणसूत्र (submetacentric chromosome) में सेन्ट्रोमियर के एक सिरे की ओर होने से एक भुजा छोटी तथा दूसरी भुजा लम्बी होती है।
प्रश्न 9. उस गुणसूत्र का क्या नाम है जिसकी एक भुजा बहुत लम्बी तथा दूसरी बहुत छोटी होती है?
उत्तर : अग्रबिन्दुक गुणसूत्र (एक्रोसेन्ट्रिक – acrocentric)।
प्रश्न 10. मध्यकेन्द्री गुणसूत्र तथा अग्रबिन्दुक गुणसूत्र परस्पर क्या आकृति अन्तर रखते हैं?
उत्तर : मध्यकेन्द्री गुणसूत्र (metacentric) में सेन्ट्रोमियर मध्य में होता है; अतः इसकी दोनों भुजाएँ समान होती हैं।
अग्रबिन्दुक गुणसूत्र (acrocentric) में सेन्ट्रोमियर एक सिरे के समीप होता है। इस कारण इसकी एक भुजा बहुत छोटी तथा दूसरी भुजा बहुत बड़ी होती है।
प्रश्न 11. किसी जीव में जीनों का क्या कार्य होता है?
उत्तर : जीन (gene) आनुवंशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाते हैं। एक जीन एक लक्षण का निर्धारण करता है।
प्रश्न 12. (i) पीब कोशिकाओं (pus cells) से DNA को प्रथम बार किसने पृथक् किया?
(ii) DNA को बहुन्यूक्लियोटाइडी क्यों कहा जाता है?
(iii) DNA अणु में पाए जाने वाले प्यूरीन प्रकार के दो नाइट्रोजनी क्षारों के नाम लिखिए।
उत्तर : (i) फ्रेडरिक मीशर (Frederick Meischer, 1869) ने।
(ii) DNA अणु दो पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला से बना होता है। प्रत्येक श्रृंखला हजारों-लाखों न्यूक्लियोटाइड्स से मिलकर बनी होती है। इसलिए DNA को बहुन्यूक्लियोटाइडी कहते हैं।
(iii) प्यूरीन नाइट्रोजन क्षार एडीनीन तथा ग्वानीन होते हैं।
प्रश्न 13. ट्रान्सजीन (आनुवंशिकतः रूपान्तरित ) जीव क्या होते हैं? आनुवंशिक इंजीनियरी में DNA के किस गुणधर्म को साधन बनाया जाता है?
उत्तर : ट्रान्सजीन जीव (Transgenic organism ) — जिन जीवधारियों में गुणसूत्रों का कुछ भाग अन्य जीवधारी के गुणसूत्र (DNA खण्ड) से बदल दिया जाता है, उसे ट्रान्सजीनी जीव या आनुवंशिकतः रूपान्तरित जीव (GMO) कहते हैं।
आनुवंशिक इंजीनियरी में DNA के ‘द्विगुणन करने की क्षमता के गुणधर्म को साधन बनाया जाता है।
- एक शब्द या एक वाक्य वाले प्रश्न
प्रश्न 1. उस पादप का नाम लिखिए जिस पर मेण्डेल ने प्रयोग किया था?
उत्तर : मेण्डेल ने अपने प्रयोग मटर (Pisum sativum) नामक पौधे पर किए थे।
प्रश्न 2. गुणसूत्र परिकल्पना (chromosomes hypothesis) किसने प्रस्तुत की?
उत्तर : गुणसूत्र परिकल्पना सटन तथा बोवेरी (Sutton and Boveri, 1902) ने प्रस्तुत की थी।
प्रश्न 3. गुणसूत्र नाम किस वैज्ञानिक ने दिया?
उत्तर : डब्ल्यू० वाल्डेयर (W. Waldeyer, 1888) ने गुणसूत्र (chromosomes) नाम दिया था।
प्रश्न 4. गुणसूत्र के दोनों क्रोमेटिड्स परस्पर किसकी सहायता से ने जुड़े होते हैं?
उत्तर : क्रोमेटिड्स सेन्ट्रोमियर (centromere) द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं।
प्रश्न 5. मनुष्य के लिंग गुणसूत्र को किससे प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर : स्त्रियों में XX तथा पुरुषों में XY से लिंग गुणसूत्रों को प्रदर्शित किया जाता है।
प्रश्न 6. DNA के कार्य लिखिए।
उत्तर : (i) DNA में द्विगुणन के फलस्वरूप लक्षणों की वंशागति होती है।
(ii) DNA, RNA का संश्लेषण करके जैविक क्रियाओं पर नियन्त्रण रखता है।
प्रश्न 7. मनुष्य के किसी एक अवशेषी अंग का नाम लिखिए। इससे क्या सिद्ध होता है?
उत्तर : मनुष्य का एक अवशेषी अंग कृमिरूप परिशेषिका है। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य के पूर्वज शाकाहारी थे।
प्रश्न 8. आर्किऑप्टेरिक्स किन-किन वर्गों के बीच की संयोजक कड़ी है?
अथवा एक ऐसे जीवाश्म का नाम लिखिए जो पक्षी वर्ग एवं सरीसृप वर्ग के बीच की योजक कड़ी है?
उत्तर : आर्किऑप्टेरिक्स पक्षी तथा सरीसृप वर्गों के बीच की संयोजक कड़ी है।
प्रश्न 9. ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ का सिद्धान्त किस वैज्ञानिक ने प्रतिपादित किया?
उत्तर : ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ का सिद्धान्त चार्ल्स डार्विन ने प्रतिपादित किया।
प्रश्न 10. मनुष्य में गुणसूत्रों की संख्या कितनी होती है?
उत्तर : 46.
प्रश्न 11. आनुवंशिकी का जन्मदाता किसे कहते हैं?
उत्तर : ग्रेगोर जॉन मेण्डेल को ।
प्रश्न 12. एक जीन एक एन्जाइम मत किसने प्रस्तुत किया था?
उत्तर : बीडल तथा टैटम ने।
प्रश्न 13. उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त पहली बार किसने सुझाया ?
उत्तर : जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने।
प्रश्न 14. उन वैज्ञानिकों के नाम बताइए जिन्होंने DNA की संरचना का द्विकुण्डलित मॉडल प्रस्तुत किया।
उत्तर : वाटसन तथ क्रिक ने।