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UK Board 9 Class Hindi Chapter 2 – ल्हासा की ओर (गद्य-खण्ड)

UK Board 9 Class Hindi Chapter 2 – ल्हासा की ओर (गद्य-खण्ड)

UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 2 – ल्हासा की ओर (क्षितिज : गद्य-खण्ड)

I. लेखक – परिचय
प्रश्न – प्रसिद्ध साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं, साहित्यिक विशेषताओं तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर- राहुल सांकृत्यायन
बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न महापण्डित राहुल सांकृत्यायन हिन्दी साहित्याकाश के एक शाश्वत जाज्वल्यमान् दीपक हैं।
जीवन-परिचय- राहुलजी का जन्म सन् 1893 ई० में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के गाँव ‘पन्दहा’ में हुआ था। उनका मूल नाम था — केदार पाण्डेय । काशी, आगरा तथा लाहौर से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् सन् 1930 ई० में उन्होंने श्रीलंका की यात्रा की। वहीं उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया और ‘राहुल सांकृत्यायन’ नाम ग्रहण किया।
राहुलजी भारतीय प्राचीन भाषाओं – पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत के तो ज्ञाता थे ही, उन्हें चीनी, जापानी, रूसी आदि विदेशी भाषाओं का भी पर्याप्त ज्ञान था। उनका शब्द भण्डार असीम था। अपने अपरिमित ज्ञान के कारण ही उन्हें ‘महापण्डित’ की सम्मानजनक उपाधि प्राप्त थी। उनका निधन सन् 1963 ई० में हो गया ।
रचनाएँ – राहुलजी विविध साहित्यिक प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास, निबन्ध, आत्मकथा, यात्रावृत्त, जीवनी, आलोचना आदि विविध विधाओं में अच्छा साहित्य हिन्दी के पाठकों को उपलब्ध कराया। अनेक प्राचीन ग्रन्थों का हिन्दी भाषा में अनुवाद भी उन्होंने किया। उनके द्वारा रचित ग्रन्थों की संख्या 150 के लगभग है।
उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ इस प्रकार हैं— मेरी जीवन-यात्रा (छह भाग), दर्शन – दिग्दर्शन, बाइसवीं सदी, वोल्गा से गंगा, भागो नहीं दुनिया को बदलो, दिमागी गुलामी, घुमक्कड़शास्त्र आदि। इसके साथ ही राहुलजी ने दर्शनशास्त्र, धर्म, इतिहास तथा विज्ञान आदि विषयों से सम्बन्धित प्रभूत साहित्य की भी रचना की ।
साहित्यिक विशेषताएँ- राहुलजी का साहित्य जीवन की जिजीविषा एवं जीवन्तता से भरपूर है। उसमें जीवनदायिनी शक्ति एवं साहस के दर्शन होते हैं। उनके द्वारा रचित ‘घुमक्कड़शास्त्र’ आज भी यायावरों (पर्यटन के शौकीनों) की प्रिय पुस्तक है। इसमें उन्होंने घुमक्कड़ी से होनेवाले लाभों का बड़ा ही मनोरंजक एवं लालित्यपूर्ण वर्णन किया है। जीवनभर देश-विदेश की अनेक यात्राएँ करनेवाले राहुलजी ने अपने अनुभवों को यात्रा – वृत्तान्त के रूप में, पुस्तक में संगृहीत किया है। घुमक्कड़ी को उन्होंने मनोरंजन की अपेक्षा एक साधना माना है। ‘ल्हासा की ओर’ नामक यात्रा – वृत्तान्त में उनकी इसी घुमक्कड़ी की साधना का साक्षात्कार होता है।
उन्होंने बताया है कि घुमक्कड़ी से मनोरंजन, स्वास्थ्यलाभ तथा ज्ञानवर्द्धन तो होता ही है, साथ-साथ विभिन्न स्थानों की लोक-संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज आदि का आदान-प्रदान भी होता है। भौगोलिक सौन्दर्य के साथ-साथ राहुलजी ने पर्यटन स्थलों के जन-जीवन का सुन्दर वर्णन भी किया है।
भाषा-शैली – महापण्डित राहुलजी के साहित्य की भाषा में उनके घुमक्कड़ जीवन की पूरी छाप देखने को मिलती है। उन्होंने जहाँ-जहाँ की भी यात्रा की वहाँ से सम्बन्धित लेखों में वहीं की स्थानीय भाषा के शब्दों की प्रचुर मात्रा का उपयोग किया। सामान्यतः उनकी भाषा सरल, सहज, स्वाभाविक एवं संवाद – क्षमता से युक्त है। उनकी रचना – शैली रोचक, सरल एवं प्रभावशाली है।
II. अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न – निम्नलिखित गद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
1. वह नेपाल से ……….. दिखाई पड़ते हैं।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ख) नेपाल-तिब्बत मार्ग का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
(ग) इस मार्ग पर फौजी चौकियाँ और किले क्यों बने हुए हैं?
(घ) नेपाल-तिब्बत मार्ग के बाद भारत से तिब्बत जाने के लिए अब नया मार्ग कौन-सा खुल गया है?
उत्तर :
(क) पाठ का नाम – ल्हासा की ओर । लेखक – राहुल सांकृत्यायन ।
(ख) नेपाल – तिब्बत मार्ग, नेपाल से तिब्बत जाने-आने का मुख्य मार्ग है। इसी रास्ते से दोनों देशों के व्यापारी आते-जाते हैं। अब तो एक नया मार्ग-फरी – कलिङपोङ, भारत से तिब्बत जाने के लिए और खुल गया है। पहले भारत-तिब्बत व्यापार भी इसी मार्ग से होता था। यह तब तक केवल व्यापार का ही नहीं, सेना के भी आवागमन का मार्ग था।
(ग) नेपाल-तिब्बत मार्ग पर अनेक फौजी चौकियाँ और किले बने हुए हैं; क्योंकि पहले कुछ समय तक यह सैनिक मार्ग भी था। इसमें चीनी पलटन के सैनिक रहा करते थे। आजकल ये खण्डहरनुमा किले किसानों के रहने के काम आ रहे हैं।
(घ) नेपाल-तिब्बत मार्ग के बाद भारत से तिब्बत जाने के लिए अब एक नया मार्ग और खुल गया। इस मार्ग को फरी – कलिङपोङ मार्ग भी कहते हैं।
2. परित्यक्त चीनी …………. दुरुस्त रखते हैं। 
प्रश्न –
(क) पाठ तथा उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ख) परित्यक्त चीनी किला किसे कहा गया है? लेखक वहाँ क्यों गया था?
(ग) ‘राहदारी’ का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए ।
(घ) लेखक इस समय किस वेश में था? उसे ठहरने को अच्छी जगह कैसे मिली?
(ङ) लेखक गरीब झोपड़े में कब और क्यों ठहरा ?
(च) लेखक को चीनी आतिथ्य के नाम पर क्या अनुभव मिले?
उत्तर :
(क) पाठ का नाम- ल्हासा की ओर। लेखक – राहुल सांकृत्यायन।
(ख) नेपाल-तिब्बत मार्ग पर कई किले बने हुए हैं। इनमें कभी चीनी पलटन के सैनिक रहा करते थे। आजकल इनमें कोई रहता नहीं, ये गिरी हुई -सी दशा में हैं। ऐसे ही किले को लेखक ने ‘परित्यक्त चीनी किला’ कहा है। लेखक वहाँ चाय पीने के उद्देश्य से गया था।
(ग) ‘राहदारी’ से अभिप्राय है— यात्रा करने का कर।
(घ) लेखक इस समय भिखमंगे के वेश में था। उसे ठहरने की अच्छी जगह तो केवल इसलिए मिल गई कि सुमति से उसका परिचय था और सुमति की वहाँ के लोगों से अच्छी जान पहचान थी ।
(ङ) लेखक एक गरीब झोपड़े में आज से पाँच साल पहले ठहरा था। तब वह भिखमंगे के वेश में नहीं था। एक भद्र पुरुष के वेश में वह घोड़े पर सवार होकर वहाँ पहुँचा था। उस समय उसे वहाँ ढूँढने पर भी ठहरने के लिए अच्छी जगह नहीं मिली थी। तब एक बहुत गरीब झोपड़े में विवश होकर उसे ठहरना पड़ा था।
(च) चीनी आतिथ्य के नाम पर लेखक का अनुभव यह रहा था कि जान-पहचान हो तो ठहरने के लिए अच्छी जगह मिलना कोई कठिन बात नहीं है, परन्तु सामान्यतः अच्छी जगह मिल पाना लोगों की उस समय की मनोवृत्ति ‘मूड’ पर निर्भर करता है; क्योंकि शाम के वक्त वहाँ के अधिकांश निवासी छङ पीकर मदहोश से हो जाते हैं। उसके बाद उन्हें दुनिया की कोई सुध नहीं रहती है।
3. अब हमें सबसे …………… खतरा है।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ख) तिब्बत में डाँड़ा किसे कहते हैं? ये खतरे की जगहें क्यों कही गई हैं?
(ग) डाँड़े डाकुओं के लिए सबसे सुरक्षित जगहें क्यों हैं?
(घ) निर्जन स्थानों पर खून की सजा होना कठिन क्यों है?
(ङ) सरकार खुफिया विभाग और पुलिस पर क्यों खर्च नहीं करती होगी?
(च) डकैत लूटने से पहले आदमी को क्यों मार डालते हैं?
(छ) तिब्बत में लाठी की बजाय पिस्तौल या बन्दूक रखना आम बात क्यों है?
उत्तर :
(क) पाठ का नाम- ल्हासा की ओर। लेखक – राहुल सांकृत्यायन ।
(ख) तिब्बत में पहाड़ों के सीमान्त ऊँचे स्थलों को डाँड़ा कहा जाता है। ये डाँड़े समुद्रतल से सोलह-संग्रह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित हैं। अत्यधिक ऊँचाई के कारण इनके दोनों ओर निर्जन प्रदेश है। दूर-दूर तक गाँव-गिराँव नहीं दिखाई पड़ते। पहाड़ों के कोनों और नदियों के मोड़ों पर दूर तक कहीं आदमी नजर नहीं आता, इसलिए ये जगहें खतरों से भरी रहती हैं। निर्जनता के कारण यहाँ डकैतियाँ और खून हो जाना बड़ी आम बात है।
(ग) डाँड़े डाकुओं के लिए सबसे सुरक्षित जगहें इसलिए हैं; क्योंकि यहाँ उन पर पलटवार करनेवाला कोई नहीं होता। न ही उन्हें हत्या या डकैती करते देखनेवाला कोई होता है। डाँड़े पूर्णत: निर्जन स्थान होते हैं, इसलिए डाकुओं को अपनी सुरक्षा का कोई खतरा नहीं होता। पुलिस का प्रबन्ध भी यहाँ पर नहीं होता है।
(घ) निर्जन स्थानों पर खून की सजा होना कठिन इसलिए है; क्योंकि वहाँ हत्या का गवाह कोई नहीं होता और सजा के लिए गवाह का होना आवश्यक होता है। यही कारण है कि यहाँ डकैत पहले आदमी को मार डालते हैं फिर देखते हैं कि उसके पास रुपया-पैसा आदि कुछ है अथवा नहीं।
यहाँ दूसरी बात यह है कि इस घोर निर्जन प्रान्त के प्रति सरकार भी उदासीन है, इसलिए यहाँ की सरकार पुलिस और गुप्तचर विभाग पर बहुत खर्च नहीं करती, जिस कारण यहाँ ऐसी अव्यवस्था व्याप्त है।
(ङ) सरकार खुफिया विभाग और पुलिस पर उतना खर्च नहीं करती, जितना करना चाहिए; क्योंकि यह निर्जन प्रदेश है, दूर तक यहाँ कोई गाँव अथवा बस्ती नहीं है। केवल आने-जानेवाले यात्री ही यहाँ से गुजरते हैं और ये भी बहुत थोड़ी ही संख्या में। सम्भवतः ऐसे स्थानों पर पुलिस अथवा गुप्तचर विभाग की व्यापक व्यवस्था करने को सरकार फिजूलखर्ची मानकर उसकी उपेक्षा करती है।
(च) डकैत लूटने से पहले आदमी को मार डालते हैं; क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि यहाँ के लोग पिस्तौल या बन्दूक रखते हैं और यदि उन्हें जरा भी अवसर मिल गया तो वे उन्हें भी मार सकते हैं।
(छ) तिब्बत में हथियार रखने या न रखने को लेकर कोई कानून नहीं है; दूसरे यहाँ डकैतों का बोलबाला है; अतः नागरिक अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखकर लाठी आदि की बजाय पिस्तौल या बन्दूक रखने में अधिक विश्वास करते हैं।
4. अब हम तिङ्करी …………. बना लेते थे।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ख) तिङ्करी- समाधि-गिरि कहाँ स्थित थी?
(ग) सुमति कौन था?
(घ) ‘गण्डा’ किसे कहते हैं? बोधगया का गण्डा कैसे बना लिया जाता था?
उत्तर :
(क) पाठ का नाम – ल्हासा की ओर। लेखक – राहुल सांकृत्यायन ।
(ख) तिङ्करी के विशाल मैदान के चारों ओर पहाड़ ही पहाड़ हैं। इस मैदान के बीचोबीच एक छोटी-सी पहाड़ी है, जो देखने में एक टापू-सी दिखती है। मैदान के बीच में स्थित यही पहाड़ी ‘तिङरी-समाधि-गिरि’ है।
(ग) सुमति मंगोल जाति का एक बौद्ध भिक्षु था । लेखक की ल्हासा की यात्रा के समय मार्ग में इससे भेंट व मित्रता हो गई थी।
(घ) मन्त्र पढ़कर गाँठ लगाए हुए धागे या कपड़े को गण्डा कहते हैं। यह बौद्ध धर्म का पवित्र प्रतीक चिह्न है। इसे बोधगया से लाए गए कपड़े की पतली चिरी बत्तियों से बनाया जाता है, परन्तु जब aterer से लाया कपड़ा समाप्त हो जाता है तो किसी भी कपड़े से गण्डा बना लिया जाता है।
5. दूसरे दिन हमने ………….. चल पड़े।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ख) ‘भरिया’ कौन होते हैं?
(ग) तिब्बत की धूप और ठण्ड का वर्णन कीजिए ।
(घ) लेखक को सुबह यात्रा शुरू न कर पाने का पश्चात्ताप क्यों हो रहा था?
(ङ) यात्रा के समय लेखक का रूप वर्णन कीजिए।
उत्तर :
(क) पाठ का नाम – ल्हासा की ओर । लेखक – राहुल सांकृत्यायन ।
(ख) पहाड़ों पर यात्रियों का सामान या बोझा ढोनेवालों को ‘भरिया’ कहते हैं।
(ग) तिब्बत की धूप अत्यन्त तीव्र होती है। सुबह के 10-11 बजे भी धूप में तीखी तपन आ जाती है। सूरज की ओर मुँह करके चलने पर धूप असहनीय मालूम पड़ती है। धूप से बचने के लिए सिर पर मोटा कपड़ा रखना पड़ता है।
तिब्बत की ठण्ड भी बड़ी कड़ाके की होती है। सूरज की तपन और तेज धूप में भी उसकी भीषणता कम नहीं होती। लेखक ने यात्रा के दौरान का अनुभव बताया है कि जब माथा तेज धूप से जल रहा होता है और उस पर कपड़ा डालने की जरूरत महसूस होती है तो दूसरी ओर कन्धे भीषण ठण्ड से बरफ जैसे प्रतीत होते हैं।
(घ) लेखक को सुबह यात्रा आरम्भ न कर पाने का पश्चात्ताप इसलिए हो रहा था क्योंकि तेज धूप निकल आई थी। 10-11 बजे की धूप में भी तेज तपन थी और लेखक को चलना कठिन लग रहा था । धूप की तीव्रता ऐसी थी मानो शरीर जैसे जला जा रहा था।
(ङ) यात्रा के समय लेखक एक भिखारी के वेश में था। उसने अपना सामान पीठ पर बाँधा । एक डण्डा था, जिसे उसने हाथ में ले लिया और फिर भ्रमण के लिए आगे के पहाड़ी मार्ग पर चल पड़ा।
6. तिब्बत की ………….. करना चाहिए था।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा उसके लेखक का नाम लिखिए।
(ख) तिब्बत की जागीर व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
(ग) वेश के कारण किसको किसका खयाल नहीं करना चाहिए था?
(घ) खेती का प्रबन्ध देखनेवाले भिक्षुओं की जागीर के आदमियों के लिए क्या स्थिति होती थी?
(ङ) शेकर की खेती के मुखिया भिक्षु कौन थे? उनका व्यवहार और स्वभाव कैसा था?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम – ल्हासा की ओर । लेखक – राहुल सांकृत्यायन ।
(ख) तिब्बत में सारी जमीन छोटी-बड़ी जागीरों में बँटी हुई है । इनमें से अधिकतर जागीरें बौद्ध मठों और विहारों के अधिकार में हैं। हरेक जागीर का मालिक अर्थात् जागीरदार अपनी-अपनी जागीर हैं। खेती की व्यवस्था आदि के लिए कोई भिक्षु भेजा जाता है। इस कुछ खेती स्वयं कराता है। खेती के लिए मजदूर बेगार में मिल जाते भिक्षु को जागीर के नागरिक राजा के समान आदर देते हैं।
(ग) लेखक भिखमंगे के वेश में था। ऐसी दीन-हीन दशा में, समाज में किसी से सम्मान पाने की अपेक्षा निरी मूर्खता ही है। लेखक को भी इसलिए लोगों से सम्मान पाने की आशा नहीं थी । तिब्बत में वैसे भी भिखमंगे की इज्जत नहीं होती, फिर राजा के समान पूज्य भिक्षु द्वारा ऐसे भिखमंगों की इज्जत किए जाने की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती। फिर भी भिक्षु नम्से ने लेखक का अत्यधिक सम्मान किया और उससे बड़े प्रेम से मिले। जबकि वेश के भिक्षु नम्से को लेखक का खयाल नहीं करना चाहिए था ।
(घ) जागीर के आदमियों के लिए खेती का प्रबन्ध देखनेवाले भिक्षुओं की स्थिति बड़ी सम्मानजनक होती थी। वे उन्हें राजा से कम नहीं मानते थे और अन्नदाता के रूप में देखते थे।
(ङ) शेकर की खेती के मुखिया भिक्षु का नाम था नम्से। वे स्वभाव से बड़े विनम्र, भद्र तथा स्नेही पुरुष थे। वे लेखक के वेश की परवाह किए बिना बड़े प्रेम से उससे मिले। लेखक की भिखमंगे की वेशभूषा का उनकी हार्दिकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा ।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – थोङला के पहले के आखिरी गाँव में पहुँचने पर भिखमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को ठहरने के लिए उचित स्थान मिला, जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्र वेश भी उन्हें उचित स्थान नहीं दिला सका। क्यों?
उत्तर – थोङ्ला में ठहरने के स्थान का मिलना न मिलना व्यक्ति के अपने निजी सम्बन्धों पर निर्भर करता है। यहाँ जान-पहचान के आधार पर ठहरने का उचित स्थान पाया जा सकता है। बिना ऊँचे सम्बन्ध और जान-पहचान के यात्री को भटकना पड़ता है। दूसरी बात यह है कि तिब्बत के अधिकांश लोग शाम को छह बजे के बाद छङ पीकर मस्त हो जाते हैं, फिर उन्हें दीन-दुनिया की कोई खबर नहीं होती। इस समय इनसे किसी बात की अपेक्षा करना व्यर्थ ही होता है। पहली यात्रा में लेखक के साथ बौद्ध भिक्षु सुमति था, जिसकी वहाँ बहुत अच्छी जान पहचान थी, इसलिए भिखमंगे के वेश में होने के कारण लेखक को ठहरने का उचित स्थान मिल गया, जबकि दूसरी यात्रा में लेखक भद्र वेश में था, किन्तु कोई जान-पहचान न होने के कारण वह ठहरने का उचित स्थान नहीं पा सका ।
प्रश्न 2 – उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न रहने के कारण यात्रियों को किस प्रकार का भय बना रहता था ?
उत्तर — सन् 1929-30 ई० के समय में तिब्बत में हथियार रखने से सम्बन्धित कोई नियम-कानून नहीं था। लोग इसीलिए निःसंकोच पिस्तौल, बन्दूक आदि लेकर घूमा करते थे। दूसरे, डाँड़ों के बीच अनेक निर्जन स्थान थे, जहाँ सरकार व पुलिस का न तो कोई पहरा था और न ही कोई सुरक्षा प्रबन्ध । डाकू किसी को भी आसानी से मारकर साफ बच निकलते थे। यहाँ के डाकुओं की एक खराब बात यह थी कि वे पहले व्यक्ति को जान से मारते थे, फिर देखते थे कि उसके पास कुछ रुपया-पैसा है अथवा नहीं। इसलिए यात्रियों को लुटने का भय नहीं रहता था, बल्कि अपने प्राणों का भय उन्हें हर क्षण सताता था।
प्रश्न 3 – लेखक लङ्कोर के मार्ग में अपने साथियों से किस कारण पिछड़ गया?
उत्तर- लेखक लङ्कोर के मार्ग में अपने साथियों से निम्नलिखित कारणों से पिछड़ गया—
  1. लेखक का घोड़ा बहुत ही सुस्त था।
  2. लेखक रास्ता भटककर एक-डेढ़ मील गलत मार्ग पर चला गया था। उसे वहाँ से वापस आने में समय लगा, इसी कारण वह अपने साथियों से पिछड़ गया।
प्रश्न 4 – लेखक ने शेकर विहार में सुमति को उनके यजमानों के पास जाने से रोका, परंतु दूसरी बार रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया?
उत्तर— लेखक ने शेकर विहार में सुमति को उसके यजमानों के पास जाने से इसलिए रोका, क्योंकि उसे डर था कि वह वहां बहुत समय लगा देगा। यदि ऐसा होता तो शायद लेखक को एक सप्ताह तक उसकी प्रतीक्षा करनी पड़ती।
दूसरी बार लेखक को वहाँ के मन्दिर में रखी अनेक बहुमूल्य पुस्तकें मिल गई थीं। वह एकान्त में बैठकर उनका अध्ययन-मनन करना चाहता था, इसलिए उसने सुमति को अपने यजमानों से मिलने के लिए जाने की अनुमति दे दी।
प्रश्न 5 – अपनी यात्रा के दौरान लेखक को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
उत्तर – अपनी यात्रा के दौरान लेखक को निम्नलिखित कठिनाइयों का सामना करना पड़ा-
  1. वापसी के समय उसे रुकने के लिए अच्छा स्थान न मिला, इसलिए उसे एक बहुत गरीब झोपड़े में रुकना पड़ा।
  2. लेखक को अनेक बार ड़ाकुओं के सामने दया की भीख माँगने का नाटक करना पड़ा, जिससे उसके प्राण बच जाएँ।
  3. लेखक का घोड़ा उतराई के समय बहुत धीरे-धीरे चल रहा था, जिससे लेखक पिछड़ गया ।
  4. लेखक को भार ढोने के लिए कोई भरिया (पहाड़ी कुली) न मिला।
  5. लेखक को तिब्बत की कड़ी धूप का सामना करना पड़ा।
प्रश्न 6 – प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत के आधार पर बताइए कि उस समय का तिब्बती समाज कैसा था ?
उत्तर- तिब्बत का तिरी प्रदेश विभिन्न जागीरों में विभाजित है। इनमें से अधिकतर जागीरें विभिन्न मठों के अधीन हैं। जागीरों के मालिक खेती का प्रबन्ध स्वयं करवाते हैं। इसके लिए उन्हें बेगार मजदूर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। खेती की सम्पूर्ण व्यवस्था एक भिक्षु के हाथ में रहती है। ये भिक्षु तिब्बत की जनता में अन्नदाता राजा के समान आदर पाते हैं।
तिब्बती समाज में छुआछूत, जात-पाँत आदि कुप्रथाएँ नहीं हैं। कोई अपरिचित व्यक्ति भी किसी के घर के अन्दर तक जा सकता है। वह यदि चाय की पत्ती लाया है तो झोली में से चाय की पत्ती देकर घर की महिला से चाय बनवा सकता है या अन्दर जाकर मक्खन, सोडा, नमक मिलाकर कूट-पीसकर स्वयं चाय बना सकता है। घर की सास-बहू आदि महिलाएँ इस सबका बुरा नहीं मानती। यहाँ महिलाओं में परदा प्रथा नहीं है। हाँ, निम्नश्रेणी के भिखमंगों को चोरी के डर से घर में नहीं घुसने दिया जाता है।
तिब्बत के लोग जान-पहचान होने पर लोगों के ठहरने का अच्छा प्रबन्ध कर देते हैं; किन्तु शाम के छह बजे के बाद छङ् पीकर वे मस्त होकर दीन-दुनिया की चिन्ता से मुक्त हो जाते हैं।
प्रश्न 7– ‘मैं अब पुस्तकों के भीतर था।’ नीचे दिए गए विकल्पों में से कौन-सा इस वाक्य का अर्थ बताता है-
(क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।
(ख) लेखक पुस्तकों की शैल्फ के भीतर चला गया।
(ग) लेखक के चारों ओर पुस्तकें ही थीं।
(घ) पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्र छपा था।
उत्तर- (क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया ।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – भारत की तुलना में तिब्बती महिलाओं की स्थिति का आकलन कीजिए ।
उत्तर – भारत की तुलना में तिब्बती महिलाओं की स्थिति अधिक सुरक्षित कही जा सकती है। भारतीय महिलाएँ पुरुषों से परदा करना या दूरी बनाए रखना पसन्द करती हैं। वे किसी अपरिचित को अपने घर में प्रवेश की अनुमति नहीं देतीं। घर के भीतर तक किसी अपरिचित पुरुष के जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। कारण यह है कि भारतीय स्त्रियाँ पुरुषों से स्वयं को असुरक्षित अनुभव करती हैं।
तिब्बती महिलाएँ पुरुषों से परदा नहीं करतीं। उन्हें किसी के घर के भीतर तक आ जाने से भी कोई भय नहीं लगता। वे सहज रूप से किसी अपरिचित पुरुष को भी घर के अन्दर तक आ जाने देती हैं, उसका सहर्ष स्वागत करती हैं। उन्हें पुरुषों से अपनी सुरक्षा को लेकर कोई खतरा नहीं लगता।
प्रश्न 2 – भारतीय पहाड़ों की तुलना में तिब्बती पहाड़ों की यात्रा कितनी सुरक्षित है?
उत्तर- भारत के पहाड़ों की यात्रा तिब्बती पहाड़ों की यात्रा की अपेक्षा कहीं अधिक सुरक्षित है। यहाँ पहाड़ी यात्रा के दौरान यात्रियों को लूटपाट, डकैती, हत्या आदि का खतरा नहीं होता। भारत सरकार की ओर से अपने पहाड़ी क्षेत्र में और भी सुरक्षा के प्रयास लगातार किए जाते हैं।’
सन् 1929-30 के समय में तिब्बती पहाड़ों की यात्रा करना भयंकर और असुरक्षित था। तब वहाँ हथियार रखने से सम्बन्धित कोई कानून न था, इस कारण लोग लाठी की जगह पिस्तौल और बन्दूक लिए फिरते थे। इस समय वहाँ न तो पुलिस का कोई प्रबन्ध था और न ही गुप्तचर विभाग का। आम जनता की इस उपेक्षा से डाकुओं के हौसले बुलन्द थे। डाँड़े इनके सुरक्षित शरणस्थल थे । यहाँ यात्री का खून करना और फिर उसका माल लूटकर नौ दो ग्यारह हो जाना कोई कठिन कार्य नहीं था। संक्षेप में, तिब्बती पहाड़ों की यात्रा असुरक्षित है।
प्रश्न 3 – लङ्कोर पहुँचने में लेखक को देर क्यों हुई? सुमति ने वहाँ उसके साथ कैसा व्यवहार किया? 
उत्तर— लेखक के लङ्कोर पहुँचने में देर दो कारणों से हुई। एक तो उसका घोड़ा बहुत सुस्त था। दूसरे लेखक गलत रास्ते पर करीब डेढ़ मील आगे तक चला गया। पूछने पर उसे वापस लौटना पड़ा और तब तक शाम के चार-पाँच बज गए थे।
लेखक को देखते ही सुमति पूरे गुस्से में बोले कि दो टोकरी कण्डे तो मैंने तुम्हारी चाय तीन-तीन बार गरम करने के चक्कर में फूँक डाले। लेकिन लेखक ने जब अपनी विवशता बताई तो वह जल्दी ही शान्त भी हो गए। बाद में लेखक व सुमति ने चाय- सत्तू खाया और रात को गरमागरम थुक्पा का आनन्द भी लिया।

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