UK Board 9 Class Hindi Chapter 6 – प्रेमचन्द के फटे जूते (गद्य-खण्ड)
UK Board 9 Class Hindi Chapter 6 – प्रेमचन्द के फटे जूते (गद्य-खण्ड)
UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 6 – प्रेमचन्द के फटे जूते (क्षितिज : गद्य-खण्ड)
I. लेखक-परिचय
प्रश्न – साहित्यकार हरिशंकर परसाई का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं, साहित्यिक विशेषताओं एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर— हरिशंकर परसाई
साहित्यकार हरिशंकर परसाई हिन्दी के चर्चित लेखकों में से हैं। जीवन-परिचय – परसाईजी का जन्म सन् 1922 ई० में, मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ था। आरम्भिक शिक्षा ग्रामीण पाठशाला में प्राप्त करने के पश्चात् वे उच्चशिक्षा के लिए नागपुर आ गए। नागपुर विश्वविद्यालय से उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। उसके पश्चात् कुछ दिनों तक वे – कॉलेजों में स्कूलअध्यापन कार्य में रत रहे। कुछ समय तक वे पत्रकारिता के व्यवसाय में भी संलग्न रहे। सन् 1947 ई० से उन्होंने स्वतन्त्र लेखन में प्रवेश किया। इसी के अनन्तर इन्होंने तब जबलपुर से ‘वसुधा’ नामक एक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इस पत्रिका का साहित्य – जगत् में जमकर स्वागत हुआ, किन्तु आर्थिक दृष्टि से यह घाटे का सौदा सिद्ध हुई और फिर अन्ततः इसको बन्द कर देना पड़ा, तथापि परसाईजी ने विकट परिस्थितियों में भी लेखन कर्म से मुँह न मोड़ा। स्वाभिमानी इतने थे कि नौकरी के लिए भी दोबारा न गए। आर्थिक तंगी से संघर्ष करते-करते परसाईजी अन्ततः सन् 1995 ई० में इस असार संसार से विदा हो गए। –
रचनाएँ – परसाईजी ने हिन्दी साहित्य को अपने व्यंग्य की ऐसी धार दी कि वे अमर हो गए। उन्होंने बड़ी मात्रा में साहित्य रचा। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में से निम्नलिखित पुस्तकें उल्लेखनीय हैं-
‘जैसे उनके दिन फिरे’ ‘हँसते हैं रोते हैं’ (कहानी-संग्रह) ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘सदाचार का तावीज’, ‘तब की बात और थी’, ‘और अन्त में’, ‘बेईमानी की परत’, ‘पगडण्डियों का जमाना’, ‘शिकायत मुझे भी है’ (निबन्ध संग्रह), ‘ठिठुरता हुआ गणतन्त्र’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘तिरछी रेखाएँ’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ (व्यंग्य-संग्रह), ‘रानी नागफनी की कहानी’, ‘तट की खोज’ (उपन्यास) आदि ।
उनके रचना-संग्रह के रूप में ‘परसाई रचनावली’ भी छह भागों में प्रकाशित हुई है।
साहित्यिक विशेषताएँ — यों तो हरिशंकर परसाई ने अनेक रचनाएँ लिखी हैं, परन्तु उनकी ख्याति समग्रतः उनके चुटीले और पैने व्यंग्य के कारण है । वे हिन्दी – साहित्य जगत् क़े सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य-रचनाकार हैं। उनके व्यंग्य में हास – उपहास कम और समाज की कुरीतियों पर कटाक्ष अधिक हैं। व्यंग्य के माध्यम से उन्होंने सामाजिक कुप्रथाओं पर बड़ी करारी चोट की है। सामाजिक, राजनैतिक और साहित्यिक क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार को अपनी रचनाओं का विषय व्यंग्य – प्रस्तुति दी है। बुराई को सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम रूप में बनाकर उन्होंने एक-एक पर अति सशक्त, पैनी और प्रभावी पहचानकर जितनी रोचक अदा से उन्होंने साहित्य में उतारा है, वह अन्यतम और अनोखी है। उनके सशक्त राजनैतिक व्यंग्य उन्हें एक उच्चकोटि के व्यंग्यकार के रूप में स्थापित करते हैं। –
भाषा-शैली- परसाईजी के साहित्य की भाषा का प्रमुख गुण है— व्यंग्यपरकता। उनकी शैली का गुण है— तीखे कटाक्ष । कहने को तो परसाईजी अपने साहित्य में सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं, परन्तु उनकी भाषा की संरचना कुछ इस प्रकार की होती है कि एक-एक शब्द मारक क्षमता में समर्थ जान पड़ता है। व्यंग्य को वह इतने सीधे – सरल ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक बिंधे बिना नहीं रहता।
आपकी भाषा में सामान्य बोलचाल की हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों का भी खुलकर प्रयोग देखने में आता है। ऐसी भाषा और व्यंग्य का धनी रचनाकार साहित्य जगत् को सौभाग्य से ही मिलता है।
उनके व्यंग्य का एक उदाहरण द्रष्टव्य है—
“मेरी अँगुली ढँकी है, पर पंजा नीचे घिस रहा है। तुम पर्दे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम पर्दे पर कुर्बान हो रहे हैं ! “
II. अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न – निम्नलिखित गद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
1. मेरी दृष्टि ………….. जाता है।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक की किसके जूते पर नजर ठहर गई? और क्यों?.
(ग) फटा जूता देखकर लेखक किस सोच में पड़ गया?
(घ) पोशाकें बदलने के गुण से क्या अभिप्राय है?
(ङ) गद्यांश में किसके किस गुण का उल्लेख हुआ है?
उत्तर :
(क) पाठ – प्रेमचन्द के फटे जूते । लेखक – हरिशंकर परसाई ।
(ख) लेखक की नजर प्रेमचन्द के बाएँ पाँव के फटे जूते पर अटक गई। उनके फीते बेतरतीब बँधे हुए थे। फीतों के सिरे पर लगी पतरियाँ निकल गई थीं इसलिए वे जैसे-तैसे बँधे हुए थे। बाएँ पैर का जूता उँगली की दिशा से फटा हुआ था। उसमें से एक उँगली झाँक रही थो। प्रेमचन्द जैसे महान् साहित्यकार के जूते की यह दशा देख लेखक की नजर उस पर अटक गई।
(ग) फटा जूता देखकर लेखक सोच में पड़ गया। वह सोचने लगा कि यदि प्रेमचन्दजी की फोटो खिचाने की पोशाक ऐसी है तो वास्तविक जीवन में पहनी जानेवाली पोशाक कैसी होगी! अर्थात् फोटो खिंचवाते समय भी जब यह बदहाली और दुर्दशा है तो फिर असल जिन्दगी में उनकी क्या स्थिति होगी। फिर उसने सोचा कि प्रेमचन्द का जीवन असल- नकल में नहीं फँस सकता। वह दुहरे व्यक्तित्व के नहीं हो सकते। उसने सोचा कि प्रेमचन्द की फोटो और जीवन की वास्तविकता में अन्तर हो ही नहीं सकता।
(घ) पोशाकें बदलने के गुण से अभिप्राय है— अवसर के अनुकूल रूप बदल लेना, स्वयं को अवसर के अनुरूप प्रस्तुत करना । अपनी छवि को विविध अवसरों पर भिन्न-भिन्न रूप में रखना ।
(ङ) प्रस्तुत गद्यांश में प्रेमचन्द की निर्धनता में भी सहजता और आत्मविश्वास की विशेषता का उल्लेख हुआ है। प्रेमचन्द ने जिस प्रकार का जीवन जिया, उसी रूप में अपनी फोटो भी खिंचवाई। कोई दिखावा, दुराव – छिपाव की बात उनके मन में नहीं आई। अपनी सहजता के कारण जो आत्मविश्वास उनमें था, वही उनकी मुसकान में दिखता है। फोटो का अर्थ है— प्रतिकृति । जो जैसा है उसकी वैसी ही छवि। प्रेमचन्द की फोटो से उनके गुण साफ झलकते हैं।
2. तुम फोटो …………… खुशबू देती है!
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) फोटो का महत्त्व कौन नहीं समझता ? लेखक ने ऐसा क्यों कहा?
(ग) लेखक की नजर में फोटो के लिए लोग क्या-क्या करते हैं?
(घ) ‘तुम’ किसे कहा गया है?
(ङ) ‘गंदे-से-गंदे आदमी की फोटो भी खुशबू देती है’ – कहकर लेखक ने क्या कटाक्ष किया है?
उत्तर :
(क) पाठ — प्रेमचन्द के फटे जूते । लेखक – हरिशंकर परसाई ।
(ख) प्रेमचन्द फोटो का महत्त्व नहीं समझते थे। लेखक ने ऐसा इसलिए कहा है; क्योंकि उसने प्रेमचन्द की एक फोटो देखी, जिसमें वे अपनी पत्नी के साथ खड़े थे। फोटो में प्रेमचन्द के बाएँ पाँव का जूता फटा हुआ दिखाई दे रहा था। उसमें से उनकी उँगली झाँक रही थी । उनके जूतों के फीते भी ढंग से बँधे हुए नहीं थे। प्रायः फोटो देखकर लोग व्यक्ति के सामाजिक और आर्थिक स्तर का आकलन करते हैं। अनेक लोग तो उसके व्यक्तित्व का प्रतिनिधि उसके फोटो को मानते हैं। इसीलिए लोग फोटो खिंचवाते समय खूब सजते-सँवरते हैं, अपने को धनी-मानी अथवा सम्पन्न दिखाने के लिए किराये अथवा मँगनी के कपड़े, जूते, चप्पल और वाहन तक का प्रयोग करते हैं। समाज की इसी प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए लेखक प्रेमचन्द को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि तुम फोटो का महत्त्व नहीं समझते।
(ग) लेखक की नजर में लोग फोटो में जैसे वे हैं, उससे भी सुन्दर और धनी – सम्पन्न दिखने की कोशिश करते हैं। वे इसके लिए उधार के जूते, उधार का कोट यहाँ तक कि बीवी भी उधार की माँग लाते हैं। कई लोग तो फोटो खिंचवाने से पहले इत्र लगाकर बैठते हैं, जिससे कि उनकी फोटो में भी उसकी महक आ जाए ।
(घ) ‘तुम’ का प्रयोग ‘प्रेमचन्द’ के लिए किया गया है।
(ङ) ऐसा कहकर लेखक ने उन लोगों पर कटाक्ष किया है, जो अपनी गन्दी छवि को फोटो में साफ-सुथरा और अच्छा बनाकर पेश करते हैं। इस उक्ति में लेखक ने व्यंग्य किया है कि गन्दे आदमी भी जब फोटो खिंचवाते हैं तो अपनी छवि सुन्दर बनाकर आते हैं। वे हर प्रकार के सौन्दर्य-प्रसाधन, तेल – फुलेल आदि का प्रयोग करके अपनी गन्दगी को छिपाने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। इस उक्ति के पीछे छिपा अर्थ यह है कि गन्दे आदमी अपने हर गन्दे काम को छिपाने के लिए ऊपरीतौर पर ‘अच्छे कार्य’ का दिखावा जरूर कर लेते हैं।
3. टोपी आठ ……………. फटा हुआ है!
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) ‘टोपी’ और ‘जूते’ का प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘तुम भी जूते और टोपी के आनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे।’ वाक्य में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए ।
(घ) लेखक को कौन-सी विडम्बना चुभी और क्यों?
(ङ) ‘एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं।’ कथन का लाक्षणिक अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
(च) भारत में लेखकों की क्या विडम्बना रही है?
उत्तर :
(क) पाठ – प्रेमचन्द के फटे जूते । लेखक – हरिशंकर परसाई ।
(ख) ‘टोपी’ सिर पर पहनी जाती है, उसे ऊँचा स्थान प्राप्त है। इस प्रकार ‘टोपी’ का प्रतीकार्थ — ‘ऊँचे लोग’, ‘सम्मानित व्यक्ति’ या ‘मान-सम्मान’ है। ‘जूते’ पैरों में पहने जाते हैं। उन्हें शरीर का सबसे नीचे का स्थान दिया जाता है। इस प्रकार ‘जूते’ का प्रतीकार्थ ‘नीचे ‘लोग’ या ‘तुच्छ प्राणी’ अथवा ‘निम्न स्तर’ है।
(ग) इस वाक्य में प्रेमचन्द जैसे महान् साहित्यकार की निर्धनता पर व्यंग्य किया गया है। प्रेमचन्द ‘टोपी’ के समान हिन्दी साहित्य जगत् के शीर्षस्थ साहित्यकार थे। इस दृष्टि से भारत में उनका खूब आदर-सत्कार होना चाहिए था। उन्हें किसी भी प्रकार की कठिनाई से दूर रखा जाना चाहिए था। उनकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी होनी चाहिए थी, परन्तु हमारे समाज में ‘टोपी’ का दाम कम है और जूते का ज्यादा। जिसका दाम ज्यादा है उसका महत्त्व भी ज्यादा है। जिसके पास महँगी चीज है अर्थात् जो महँगी चीज खरीद सकता है, उसकी ही समाज में इज्जत भी है। सब मिलाकर टोपी को जूते के सामने झुकना पड़ता है। लेखक सोचता है कि प्रेमचन्द के साथ भी यही हुआ। वे उच्चकोटि के साहित्यकार होकर भी निम्नस्तर का, गरीबी और सुविधाहीनता का जीवन जीते रहे।
(घ) लेखक को यह विडम्बना बहुत चुभी कि प्रेमचन्द जैसा शीर्षस्थ साहित्यकार ; जिसे उच्चकोटि का कथाकार, महान् उपन्यासकार, युग प्रवर्तक आदि न जाने क्या-क्या कहकर सम्मान दिया जाता रहा, पहनने के लिए एक जोड़ी ठीक-ठाक जूता भी न जुटा सका। उन्हें ऐसी दरिद्रता में जीना पड़ा, यही विडम्बना लेखक को अखरी ।
(ङ) प्रस्तुत कथन का लाक्षणिक अर्थ यह है कि आज समाज में पैसेवालों का ही बोलबाला है। जिसके पास धन-सम्पदा है वही मान-सम्मान भी अर्जित करता है। गुणी लोग उनके सामने गिड़गिड़ाते हैं। ‘जूते’ पैसेवालों का और ‘टोपी’ कम पैसेवालों या निर्धनों का प्रतीक है। ‘टोपी’ का सम्बन्ध बुद्धि से तो है, परन्तु वह धनहीन है, जबकि ‘जूता’ भले ही पैरों में पहना जाता हो, परन्तु है पैसे का मजबूत। इसलिए लेखक ने कहा है कि ‘टोपी’ को जूते के सामने झुकना पड़ता है, कुर्बान होना पड़ता है— यह कैसी विडम्बना है।
(च) भारत में लेखकों के साथ यह विडम्बना रही है कि उन्हें मान-सम्मान तो बहुत मिलता है, परन्तु आर्थिक दृष्टि से पर्याप्त धन नहीं मिलता। प्रेमचन्द जैसे शीर्षस्थ लेखक भी लेखन के द्वारा अपनी यथेष्ट आजीविका नहीं कमा सके, यह बहुत बड़ी विडम्बना है।
4. मेरा जूता …………….. ही छाप दे।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का व्यंग्यार्थ स्पष्ट कीजिए ।
(ग) “ अंगुलि ढँकी है पर पंजा नीचे घिस रहा है” – में छिपा व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।
(घ) परदे के महत्त्व पर प्रेमचन्द और लेखक के विचारों का मौलिक अन्तर बताइए।
(ङ) प्रेमचन्द फटा जूता भी ठाठ से क्यों पहन सके? लेखक ऐसा क्यों नहीं कर सकता?
उत्तर :
(क) पाठ—प्रेमचन्द के फटे जूते। लेखक – हरिशंकर परसाई।
(ख) लेखक कहता है- मेरा जूता अर्थात् मेरी आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं है। ऊपर से देखने में भले ही मेरी स्थिति अच्छी दिखाई पड़ती है, परन्तु ऐसा है नहीं। मेरे जूते से उँगली बाहर नहीं निकली है, किन्तु अँगूठे के नीचे जूते की तली फटी हुई है। मैंने अपनी उँगलियाँ तो प्रयासपूर्वक ढंक रखी हैं, किन्तु तला घिस जाने के कारण पंजे नीचे से घिस रहे हैं। मैं आँखों का परदा बनाए रखना चाहता हूँ, अपनी दुर्दशा को छिपाए रखना चाहता हूँ। मैं प्रकट नहीं होने देता कि मेरी हालत खराब है, परन्तु प्रेमचन्द ऐसे लेखक नहीं थे। वे अपनी दुर्दशा को छिपाते नहीं थे। उनके जूते से उँगली दिखती रही तो भी वे कभी घबराए नहीं, या उसे छिपाते नहीं फिरे। वे बड़े ही निश्चिन्त व्यक्ति थे। वे फटा हुआ जूता भी बड़ी शान से पहनते थे। वे वास्तव में सच्चे यथार्थवादी थे। फटेहाल रहकर भी हँसना- मुसकाना उन्हें आता था । लेखक सोचता है कि वह तो कभी भी प्रेमचन्द की तरह नहीं जी सकता, न फोटो ही खिचवा सकता है; अर्थात् ऐसी भयानक दरिद्रता और बदहाली में अपनी फोटो खिचवाने की तो वह सोच भी नहीं सकता, चाहे कुछ भी हों जाए। भले ही कोई उसकी जीवनी बिना फोटो के ही छाप दे।
(ग) लेखक ने प्रकट रूप में अपनी दुर्दशा को ढक रखा है, परन्तु अन्दर ही अन्दर उसका हाल भी प्रेमचन्द की ही तरह बुरा है। ऊपर से देखने में भले ही उसकी आर्थिक स्थिति प्रेमचन्द से बेहतर दिख रही है, परन्तु वह भी अन्दर ही अन्दर इस समस्या से पीड़ित है। लेखक का स्वयं के माध्यम से व्यंग्य यही है कि आज समाज के बहुसंख्य लोग अपनी दयनीय स्थिति को अपने बाहरी आचरण से प्रकट नहीं होने देते। वे उस पर सम्पन्नता का पर्दा डाले रखते हैं, जबकि भीतर ही भीतर अपनी विपन्नता की पीड़ा को अपनी बनावटी हँसी के साथ सहते रहते हैं।
(घ) परदे के महत्त्व पर लेखक और प्रेमचन्द के विचारों में मौलिक अन्तर था। प्रेमचन्द परदे को महत्त्व नहीं देते थे। वे अन्दर-बाहर के व्यक्तित्व में एक समान थे। वे अपनी असलियत को छिपाने में विश्वास नहीं करते थे। वे सोचते थे कि वे जैसे हैं वैसे ही दिखें भी। नकली या दिखावटी रूप उन्हें पसन्द नहीं था ।
लेखक के विचार प्रेमचन्द से भिन्न हैं। लेखक अपने जीवन में परदे का पक्षधर है। वह चाहता है कि उसकी कमजोरियाँ छिपी रहें, समाज के सामने न आने पाएँ। वह अपनी कमियों को उजागर न होने देने के लिए सब कष्ट सहने को तैयार है।
(ङ) प्रेमचन्द फटा जूता भी ठाठ से पहन सकते थे। प्रेमचन्द ने अपनी दरिद्रता को बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया था। इसलिए उनके मन में किसी प्रकार की हीनता की ग्रन्थि नहीं थी। वह अपनी गरीबी को छिपाना भी नहीं चाहते थे, जैसे कि यह उनकी नियति थी । उन्हें दुर्भाग्य या अपनी निर्धनता से कोई शिकायत नहीं थी; क्योंकि इसे वे अपनी कर्मी नहीं मानते थे और न ही उसे आत्मसम्मान से जोड़कर देखते थे। इसीलिए वे पूरे आत्मबल के साथ ठाठ से फटा जूता पहन सके।
लेखक ऐसा नहीं कर सकता। लेखक को अपनी गरीबी में अपनी हीनता नजर आती है। गरीब होने को वह अपनी कमी मानता है, उसे आत्मसम्मान से जोड़कर देखता है, इसीलिए वह फटा जूता ठाठ से नहीं पहन सकता।
5. तुम्हारी यह ………… लौटते रहे?
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए ।
(ख) किसकी व्यंग्य – मुसकान लेखक के हौसले पस्त कर देती है और क्यों?
(ग) लेखक को प्रेमचन्द की मुसकान के पीछे क्या रहस्य छिपा मालूम होता है?
(घ) होरी का गोदान होने में क्या व्यंग्य है?
(ङ) माधो कौन है? उसके किस कर्म पर प्रेमचन्द व्यंग्य से मुसकराते प्रतीत होते हैं?
(च) ‘जनता का लेखक’ किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर :
(क) पाठ – प्रेमचन्द के फटे जूते । लेखक – हरिशंकर परसाई ।
(ख) प्रेमचन्द की फोटो में उनकी मुसकान लेखक को व्यंग्य से भरी दिखती है। लेखक को ज्ञात है कि प्रेमचन्द जीवनभर आर्थिक तंगी से जूझते रहे। संघर्ष ही उनके जीवन की कथा रही। उन्होंने गरीबी, शोषण जैसी विपत्तियाँ केवल देखी ही नहीं थीं, उन्हें भोगा भी था। वे स्वयं बहुत गरीबी में रहे। एक जोड़ी साबुत जूते भी वे नहीं खरीद सकते थे। इतनी निर्धनता के बावजूद वे इतनी जिन्दादिली से जीवन जीते थे कि लेखक हैरान था। यह उनकी जिन्दादिली का ही जादू है, जो वे व्यंग्य से औरों पर हँस सकते थे। उनकी यही हँसी लेखक का साहस कमजोर कर देती है। वह कभी इतना जिन्दादिल नहीं हो पाता।
(ग) लेखक को प्रेमचन्द की मुसकान के पीछे छिपे रहस्य का है। खुलेआम शोषण हो रहा है। सच्चा साहित्यकार इस अन्याय और एक ही कारण प्रतीत होता है कि संसार में सब कहीं अन्याय हो रहा शौषण के खिलाफ लगातार संघर्ष कर रहा है। वह क्रान्ति और युग परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर रहा है, फिर भी संसार के सुविधा सम्पन्न और सामान्य लोगों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। वे साहित्यकार के कर्म को कोई महत्त्व नहीं देते हैं। इस प्रकार जनता का लेखक जनता से ही हार जाता है, किन्तु जनता से हारा लेखक अपने से नहीं हारता, वह परिस्थितियों की चुनौती स्वीकार करता है। परिणामस्वरूप उसकी मुसकान व्यंग्य से भर जाती है, मानो वह चुनौतियों को चुनौती दे रहा हो।
(घ) होरी, प्रेमचन्द के उपन्यास ‘गोदान’ का मुख्य पात्र है। जीवनभर तो वह अपनी एक गाय पालने की इच्छा भी पूरी नहीं कर पाता और उसके मरने के बाद धूर्तपण्डित दातादीन उसकी पत्नी से गोदान करने के लिए कहता है, परन्तु वह गोदान नहीं कर पाती । लेखक ऐसे शोषक पण्डितों पर व्यंग्य करता है और कहता है कि होरी का गोदान (जो मूलकथा में नहीं हो पाया था) शायद हो गया है इसीलिए प्रेमचन्द मुसकरा रहे हैं। उनकी यह मुसकान उन कतिपय धूर्त पण्डितों के लिए ही व्यंग्य से भरी है, जो गरीब से गरीब आदमी से भी कुछ-न-कुछ ले मरते हैं।
(ङ) ‘माधो’ प्रेमचन्द की कहानी ‘कफन’ का मुख्य पात्र है। वह भयंकर रूप से गरीब और निकम्मा है, भूखों मर रहा है। भूख कारण उसकी इनसानियत भी मर चुकी है, इसलिए अपनी मृत पत्नी के • कफन के लिए गाँववालों के चन्दे से एकत्र हुए पैसों की वह शराब पी जाता है। लेखक सोच रहा है कि प्रेमचन्द की मुसकान उसकी इसी दुष्टता पर व्यंग्य कर रही है। लेखक प्रेमचन्द के बहाने उस शोषक समाज की क्रूर व्यवस्था पर व्यंग्य करता है, जिसने जीवन की मूल आवश्यकताओं से भी आम जनता को वंचित रखा है। दरिद्रता के कारण माधो जैसे लोग मनुष्यता की हद से नीचे गिर रहे हैं।
(च) ‘जनता का लेखक’ प्रेमचन्द को कहा गया है; क्योंकि प्रेमचन्द ने जीवनभर शोषित, पीड़ित, वंचित जनता के दुःख-दर्द को अपने साहित्यकर्म का विषय बनाया है; उन्होंने किसानों की गरीबी और बदहाली के विषय में लिखा। वे सदा जनता के पक्ष में लिखते रहे इसलिए लेखक ने उन्हें ‘जनता का लेखक’ उचित ही कहा है।
6. मुझे लगता …………… चली जाती है।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक के अनुसार प्रेमचन्द के जूते फटने का क्या कारण है?
(ग) प्रेमचन्द ने किस प्रकार का जीवन जिया?
(घ) ठोकर मारने का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
(ङ) क्या चीज परत-दर-परत जम गई है, जिसे ठोकर मारते-मारते प्रेमचन्द के जूते फट गए ?.
(च) प्रेमचन्द के ‘जूता आजमाने’ का क्या कुछ लाभ हुआ? (छ) ‘रास्ते में खड़े टीले’ से क्या आशय है?
उत्तर :
(क) पाठ – प्रेमचन्द के फटे जूते । लेखक – हरिशंकर परसाई ।
(ख) लेखक के अनुसार प्रेमचन्द के जूते इसलिए फट गए; क्योंकि वे रास्ते में खड़ी किसी चट्टान को ठोकरें मार-मारकर हटाने का प्रयास करते रहे। वे उससे बचकर निकल जाने की बजाय उसे हटाने की कोशिश में लगे रहे। कथन का निहितार्थ है कि प्रेमचन्द ने समाज की कुप्रथाओं और रूढ़ियों को अपने जीवन में लगातार चुनौती दी, तथापि संघर्ष करते-करते उनका जूता अवश्य फट गया, किन्तु समाज की व्यवस्था न बदली। वे इतने निर्धन थे कि जीवन में फटा जूता पहनकर ही काम चलाते रहे अर्थात् सारे प्रयास के बावजूद अपने जीवन को सुविधामय न बना सके ।
(ग) प्रेमचन्द ने निर्धनता के बावजूद सहज, सरल और सज्जनता का जीवन जिया। वे संघर्षशील साहित्यकार थे। समाज की रूढ़ियों का पर्दाफाश वे अपने साहित्य में लगातार करते रहे। किसानों और गरीबों के शोषण तथा महाजनी प्रथा का उन्होंने सदा जमकर विरोध किया। समस्याओं के सामने उन्होंने हार नहीं मानी, वरन् उन्हें ठोकरें ही मारी।
(घ) ठोकर मारने का अर्थ है— विरोध करना, चोट मारना, संघर्ष करना ।
(ङ) परत-दर-परत जमनेवाली चीज है— सामाजिक रूढ़ियाँ । यह प्रेमचन्द के समय का कटु यथार्थ था। धर्म के नाम पर शोषण चरम पर था। दूसरी ओर महाजन किसानों-गरीबों से बेगार करवाते थे । चारों ओर अशिक्षा और भुखमरी व्याप्त थी। इस सब से ऊपर अंग्रेजी दासता थी। दुर्भाग्य जैसे गरीब जनता के सामने आकर जम गया था।
(च) प्रेमचन्द के जूते आजमाने का कोई विशेष लाभ नहीं हुआ, उल्टे प्रेमचन्द के जूते अवश्य फट गए। उनकी कठिनाइयाँ और निर्धनता जीवनभर समाप्त न हो पाईं।
(छ) ‘रास्ते में खड़े टीले’ से आशय है— मार्ग में आनेवाली बाधाएँ।
7. तुम समझौता ……………… करते हो?
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) ‘होरी और प्रेमचन्द की एक ही सी कमजोरी थी।’ तात्पर्य बताइए ।
(घ) जंजीर होने से क्या आशय है?
(ङ) ‘नेम-धरम’ प्रेमचन्द के लिए बन्धन न होकर मुक्ति है। कैसे?
(च) लेखक ने प्रेमचन्द द्वारा पाँव की उँगली दिखाए जाने का क्या कारण माना है?
उत्तर :
(क) पाठ — प्रेमचन्द के फटे जूते । लेखक – हरिशंकर परसाई ।
(ख) आशय – प्रेमचन्द अपने जीवन में समझौते नहीं कर पाए। वे रूढ़ियों से लड़ते रहे। प्रेमचन्द के जीवन की भी वही कमजोरी थी, जो उनके ‘गोदान’ उपन्यास के नायक होरी की थी। होरी के प्राण भी उसके ‘नेम-धरम’ ने ले लिए थे। जीवनभर वह अनेक प्रकार के कष्ट सहता रहा, प्रताड़नाएँ पाता रहा, परन्तु उसने अपना ‘नेम-धरम’ या मर्यादा नहीं तोड़ी। अपनी नैतिकता पर वह अड़ा ही रहा। होरी के लिए नैतिकता जीवन का सबसे बड़ा बन्धन थी। उसी डोर से वह बँधा हुआ था। मानसिक रूप से वह इस बन्धन को स्वीकार कर चुका था । चाहकर भी वह इस बन्धन को तोड़ नहीं सकता था। किन्तु लेखक सोचता है कि फोटो में प्रेमचन्द की मुसकराहट देखकर ऐसा लगता है कि उनके सामने नेम धरम का कोई बन्धन नहीं था। वह तो उनके लिए मुक्ति का मार्ग था । अर्थात् होरी का नेम-धरम तो उसकी विवशता की उपज था, परन्तु प्रेमचन्द ने इस नेम-ध -धरम को संस्कारगत रूप से स्वीकार कर लिया था। इसीलिए उन्हें इससे कोई कष्ट नहीं था, बल्कि वे इसमें स्वयं की मुक्ति खोज सके थे। उनका ‘नेम धरम’ उनके द्वारा करणीय कर्त्तव्य समझकर किया गया था, इसलिए उसमें मुक्ति का सुख था, आनन्द था। प्रेमचन्द अपने नेम-धरम के पालन से प्राप्त आनन्द के कारण मुसकरा रहे थे।
(ग) होरी और प्रेमचन्द की एक-सी ही कमजोरी थी। वे दोनों ही नेम धरम के पक्के थे। दोनों ने अपनी नैतिक मर्यादा के पालन में कोई समझौता नहीं किया। वे अपने नैतिक मूल्यों की ओर से कभी पतित नहीं हुए। अपना धर्म, कर्त्तव्य, नैतिक मूल्य, जीवन-मर्यादा के पालन में वे जीवनभर कष्ट झेलते रहे, गरीबी की मार सहते रहे। उनकी कमजोरी नेम धरम ही थी ।
(घ) जंजीर होने से आशय है— सीमा बाँधना, बाधा बनना।
(ङ) ‘नेम-धरम’ प्रेमचन्द के लिए विवशता नहीं, नैतिक आवश्यकता थी । मर्यादाओं का पालन करने में उन्हें सुख प्राप्त होता था। ऐसा करके वह अपनी संस्कृति के संरक्षण के अपने कर्त्तव्य को निभाते थे। इस प्रकार वह अपने को देश और अपने समाज के ऋण से मुक्त हो गया मानते थे।
(च) लेखक ने प्रेमचन्द द्वारा पाँव की उँगली दिखाए जाने का यह कारण माना है कि जिसे प्रेमचन्द घृणित मानते थे, उसे इस योग्य भी नहीं समझते थे कि उसकी ओर हाथ की उँगली भी उठाई जाए। उसकी हेयता और नीचता प्रकट करने के लिए वे उसकी ओर पैर की उँगली से इशारा करते थे ।
8. मैं समझता ………………. चलोगे कैसे?
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक के अनुसार प्रेमचन्द किस पर व्यंग्य कर रहे हैं?
(ग) प्रेमचन्द की मुसकान में छिपा व्यंग्य बताइए ।
(घ) प्रेमचन्द को किनके चलने की चिन्ता है?
(ङ) ‘अंगुलि छिपानें’ और ‘तलुआ घिसाने’ का गूढ़ार्थ स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) पाठ – प्रेमचन्द के फटे जूते । लेखक – हरिशंकर परसाई।
(ख) लेखक के अनुसार प्रेमचन्द उन सभी लोगों पर व्यंग्य कर रहे हैं, जो अपनी कमजोरियों को ऊपर से छिपाने में लगे हैं, किन्तु भीतर-ही-भीतर परेशान भी हैं। वे उन सभी लोगों पर भी हँस रहे हैं, जो अपने उद्देश्य के मार्ग में आई बाधाओं के कारण अपना रास्ता बदल लेते हैं। मुसीबतों को सुलझाने की बजाय उन्हें वैसा ही छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। इस प्रकार वे कुरीतियों को मिटाते नहीं हैं और उन्हें जड़ जमाते जाने का अवसर प्रदान करते हैं।
(ग) प्रेमचन्द की मुसकान में एक ऐसा व्यंग्य छिपा हुआ है जैसे वे कह रहे हों— मैंने ठोकरें मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। मेरी उँगली जूता फाड़कर बाहर निकल आई, परन्तु पाँव बचा रहा। इसलिए मैं चलता रहा, आगे बढ़ता रहा । संकेतार्थ यह है कि मैंने मुसीबतें झेलीं, कष्ट सहे, गरीबी झेली, किन्तु अपने आत्मबल को बनाए रखा। इसी आत्मशक्ति के बल पर मैं अपना साहित्यकर्म भी ईमानदारी से करता रहा। परन्तु जो लोग दिखावटी जीवन जीने में अपना आत्मबल खो रहे हैं, उनका जीवन कैसा हो जाएगा? वे अपने जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति कैसे करेंगे? उनका जीवन किसी लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकेगा?
(घ) प्रेमचन्द को उनके चलने की चिन्ता है, जो उँगली को ढाँकने के प्रयास में अपने तलुवे को बेकार कर रहे हैं; अर्थात् प्रेमचन्द को अपने युग के उन लेखकों की चिन्ता है, जो दिखावटी जीवन जी रहे हैं और इसी कारण अन्दर-ही-अंन्दर सिमटते जा रहे हैं। जो संकटों को न झेलने के कारण आत्मबल खोते जा रहे हैं। प्रेमचन्द को ऐसा लगता है कि जीवन की वास्तविकता को उसी रूप में स्वीकार किए बिना, संकटों का आमना-सामना किए बिना लेखन या कोई अन्य कार्य ( सामाजिक या व्यक्तिगत कोई भी हो) श्रेष्ठ रूप में नहीं किया जा सकता । कर्म की श्रेष्ठता के लिए जीवन में वास्तविकता का स्पर्श आवश्यक है।
(ङ) ‘अंगुलि छिपाने’ का गूढ़ार्थ है- अपनी दुर्दशा को छुपाना। ‘तलुआ घिसाने’ का गूढ़ार्थ है— अन्दर-ही-अन्दर क्षीण होना, अपनी शक्तियों को नष्ट करना ।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – हरिशंकर परसाई ने प्रेमचन्द का जो शब्दचित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है, उससे प्रेमचन्द के व्यक्तित्व की कौन-कौन-सी विशेषताएँ उभरकर आती हैं?
उत्तर— ‘प्रेमचन्द के फटे जूते’ नामक व्यंग्य लेख के द्वारा हरिशंकर परसाई ने कथाकार के व्यक्तित्व की अग्रलिखित विशेषताएँ उद्घाटित की हैं-
(1) संघर्षशील व्यक्तित्व – प्रेमचन्द का जूता इसीलिए फटा; क्योंकि वे लगातार मार्ग में आनेवाली चट्टान सदृश बाधाओं को ठोकरें मारते रहे। कठिनाइयों के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। वे स्वयं उनसे जूझते रहे, लड़ते रहे, परन्तु हार नहीं मानी। कष्टों के सामने पड़ने पर उन्होंने बगलें नहीं झाँकी, इधर-उधर से बचकर निकलने का प्रयास नहीं किया। लेखक के शब्दों में- । “
(i) “तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो
(ii) “ठोकर मार-मारकर जूता फाड़ लिया । “
(2) अजेय व्यक्तित्व – प्रेमचन्द मजबूत, आत्मबल के धनी साहित्यकार थे। उनका व्यक्तित्व अपराजेय था । कष्टों या संकटों में उन्होंने पराजित होना कभी जाना ही नहीं। निराशा, हताशा के अवसर उनके जीवन में खूब आए यह तो उनकी पोशाक ही बताती है, परन्तु ऐसे में भी वे उन पर हँसते – मुसकराते रहे। उन्होंने दुःख को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। फोटो में उनकी नजरों से झाँकती हँसी में व्यंग्य और उपहास भी है। उनमें गजब का आत्मविश्वास था। लेखक के शब्दों में-
“यह कैसा आदमी है, खुद तो फटे जूते पहने फोटो खिचा रहा है, परन्तु किसी पर हँस भी रहा है !”
(3) आर्थिक तंगी के शिकार – प्रेमचन्द ने भी आम भारतीय ग्रामीण की तरह ही आर्थिक तंगी का जीवन गुजारा। ‘कलम का सिपाही’ बनकर भी वे अपनी आजीविका से इतनी धन-सम्पदा न जुटा सके कि सुविधामय जीवन जी पाते। यहाँ तक कि फोटो खिंचाने के लिए भी उनके पास वही फटे जूते थे, एक जोड़ी साबुत जूते भी नहीं खरीद सकते थे।
(4) मर्यादाप्रियता – प्रेमचन्द ने ‘नेम – धरम’ को, मानवीय संवेदनाओं को एक साहित्यकार के कर्त्तव्य के नाते खुशी-खुशी कष्ट सहकर भी उद्घाटित किया। वे श्रेष्ठ मनुष्य और सच्चे लेखक का प्रतिमान बने।
(5) सहजता – सरलता — प्रेमचन्द में बनावट नहीं थी। वे जैसे अपने जीवन में थे, वैसे ही फोटो में भी थे। उनकी यही सरलता उन्हें महान् बनाती है।
प्रश्न 2 – सही कथन के सामने (√) का निशान लगाइए-
(क) बाएँ पाँव का जूता ठीक है, मगर दाहिने जूते में बड़ा छेद हो गया है, जिसमें से अंगुलि बाहर निकल आई है।
(ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचाते हैं, जिससे फोटो में खुशबू आ जाए।
(ग) तुम्हारी यह व्यंग्य मुसकान मेरे हौसले बढ़ाती है।
(घ) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ अँगूठे से इशारा करते हो?
उत्तर- (क) ×, (ख) √, (ग) ×, (घ) ×
प्रश्न 3 – नीचे दी गई पंक्तियों में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए-
(क) जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं।
उत्तर : स्पष्टीकरण- जीवन की यह विडम्बना है कि जो निम्नस्तर का है परन्तु पैसेवाला है, उसे सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है। जैसे जूते का स्थान तो पाँव में है, परन्तु है वह टोपी से महँगा । इसलिए. उसकी बड़ी इज्जत है अर्थात् सिर पर बैठनेवाली टोपी का कोई महत्त्व नहीं, उसका कोई सम्मान नहीं। ‘आजकल तो जूतों का अर्थात् धनवानों का सम्मान हो रहा है। उनके समक्ष सैकड़ों टोपियाँ अर्थात् विद्वान् और गुणवान् (लेकिन गरीब) झुक रहे हैं। एक धनवान् पच्चीसों गुणवानों को बौना कर देता है, झुकने को विवश कर देता है। गुणी लोग भी अवसरानुकूल जूतों पर झुकते देर नहीं लगाते।
(ख) तुम पर्दे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम पर्दे पर कुर्बान हो रहे हैं।
उत्तर : स्पष्टीकरण – प्रेमचन्द ने कभी परदे को अर्थात् दुराव-छिपाव को महत्त्व नहीं दिया। वास्तविकता को उन्होंने बड़ी सरलता और सहजता के साथ स्वीकार कर लिया। वे इस बात से आत्मतुष्टि का अनुभव करते थे कि उनके बाहर और अन्दर के व्यक्तित्व में कोई अन्तर नहीं है, वे एक सच्चे इनसान हैं। वे कथनी-करनी में एक थे। यहाँ तक कि फोटो खिंचाते समय भी उनके पास वही आम वेशभूषा थी ।
लेखक आज के युग के लोगों का परदे के प्रति आकर्षण देखकर व्यंग्य करता है कि हम तो परदे को बड़ा गुण मानते हैं। आज के युग में अपने दोष छुपाकर अपनी अच्छी छवि दिखाना ही होशियारी है। ऐसा ही व्यक्ति आज गुणी और श्रेष्ठ माना जाता है । कम-से-कम लेखक तो ऐसा ही सोचता है।
(ग) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ हाथ की नहीं, पाँव की अंगुलि से इशारा करते हो?
उत्तर : स्पष्टीकरण – लेखक कहते हैं कि जिसे तुमने (प्रेमचन्द ने) घृणा के योग्य समझा, ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी ओर पैर की उँगली से इशारा करने के लिए ही तुमने अपने जूते का वह हिस्सा खोल लिया है। घृणित वस्तु के लिए तुमने पैर की ठोकर का सहारा ही लिया, भले ही उसमें तुमने अपना जूता फाड़ डाला। वास्तव में संघर्ष से तुम कभी चूके नहीं।
प्रश्न 4. -पाठ में एक जगह पर लेखक सोचता है कि ‘फोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी?’ लेकिन अगले ही पल वह विचार बदलता है कि ‘नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी।’ आपके अनुसार इस संदर्भ में प्रेमचन्द के बारे में लेखक के विचार की क्या वजहें हो सकती हैं?
उत्तर— प्रेमचन्द के सम्बन्ध में उनकी पोशाक को लेकर लेखक के मत बदलने के दो कारण हो सकते हैं-
लेखक की पहली टिप्पणी सामान्य जगत् के लोगों के व्यवहार पर आधारित है। आमतौर पर लोग अपने घर में पहनने और खास अवसरों पर पहनने के वस्त्रों में अन्तर रखते हैं, परन्तु प्रेमचन्द सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। वे इन सबसे अलग हैं; अतः लेखक के मन-मस्तिष्क में दूसरी प्रतिक्रिया उठी-लेखक ने देखा कि प्रेमचन्द जीवनभर सरल सहज बने रहे। उन्होंने दिखावटी जीवन कभी जिया ही नहीं, इसलिए पोशाकें बदलने की बात उनके साथ लागू नहीं होती । पोशाकें वे बदलते हैं, जो अवसरानुकूल आचरण करते हैं। प्रेमचन्द ऐसे नहीं थे।
प्रश्न 5 – आपने यह व्यंग्य पढ़ा। इसे पढ़कर आपको लेखक की कौन-सी बातें आकर्षित करती हैं?
उत्तर — इस व्यंग्य लेख में हमें लेखक की जो बात सर्वाधिक आकर्षक लगी है, वह है उसकी बात में से बात निकालने की खूबी । विस्तारण शैली के द्वारा लेखक एक सन्दर्भ से दूसरे सन्दर्भ में बड़ी चतुराई से प्रवेश कर जाता है। कोई बीज जिस प्रकार अंकुर, पल्लव, पौधे से होते हुए तना, वृक्ष, फूल और फल तक पहुँच जाता है, उसी प्रकार प्रेमचन्द के फटे जूते से व्यंग्यकार अपनी बात शुरू करता है और धीरे-धीरे प्रेमचन्द के व्यक्तित्व की अनोखी, अनजानी-सी विशेषताएँ हमारे सामने उद्घाटित कर देता है। लेखक हरिशंकर परसाई की सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि ने जिस प्रकार प्रेमचन्द के व्यक्तित्व को पहचाना है, वह अप्रतिम है।
प्रश्न 6 – पाठ में ‘टीले’ शब्द का प्रयोग किन संदर्भों को इंगित करने के लिए किया गया होगा?
उत्तर – पाठ में ‘टीले’ शब्द का प्रयोग विशेष रूप से ‘मार्ग की रुकावट या बाधाओं’ के लिए हुआ लगता है। जिस प्रकार एक प्रवहमान् नदी की धारा मार्ग में पड़ी किसी चट्टान से अपनी गति खो देती है, उसी प्रकार जीवनरूपी नदी का स्वाभाविक विकास समाज में व्याप्त कुरीतियों, रूढ़ियों, भ्रष्टाचार, शोषण, अन्याय, छुआछूत, जाति-पाँति, महाजनी सभ्यता, अशिक्षा, गरीबी, दासता आदि के रूप में स्थित ‘टीलों’ से बाधित होता है। संघर्षशील लोग इन टीलों को अपने जूते की ठोकर पर रखते हैं और अवसरवादी बचकर निकल जाते हैं।
