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UP Board Class 10 Hindi Chapter 12 – हल्दीघाटी (काव्य-खण्ड)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 12 – हल्दीघाटी (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 12 हल्दीघाटी (काव्य-खण्ड)

जीवन-परिचय
श्यामनारायण पाण्डेय का जन्म श्रावण कृष्ण पंचमी को वर्ष 1907 में डुमराँव गाँव, आजमगढ़ उत्तर प्रदेश में हुआ था। आरम्भिक शिक्षा के बाद श्यामनारायण पाण्डेय संस्कृत अध्ययन के लिए काशी (बनारस) आए। काशी विद्यापीठ से वे साहित्याचार्य की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। स्वभाव से सात्विक, हृदय से विनोदी और आत्मा से निर्भीक स्वभाव वाले पाण्डेय जी के स्वस्थ-पुष्ट व्यक्तित्व में शौर्य, सत्त्व और सरलता का अनूठा मिश्रण था। उनके संस्कार द्विवेदीयुगीन, दृष्टिकोण उपयोगितावादी और भाव-विस्तार मर्यादावादी थे। लगभग दो दशकों से ऊपर वे हिन्दी कवि-सम्मेलनों के मंच पर अत्यन्त लोकप्रिय रहे। उन्होंने आधुनिक युग में वीर काव्य की परम्परा को खड़ी बोली के रूप में प्रतिष्ठित किया। पाण्डेय जी का देहान्त वर्ष 1991 में डुमराँव नामक ग्राम में हुआ था।
साहित्यिक परिचय
श्यामनारायण पाण्डेय आधुनिक काव्यधारा के प्रमुख वीर कवियों में से एक थे। वीर काव्य को इन्होंने अपनी कविताओं का मुख्य विषय बनाया। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को अपने काव्य का आधार बनाकर इन्होंने पाठकों पर गहरी छाप छोड़ी है।
कृतियाँ (रचनाएँ)
श्यामनारायण पाण्डेय ने चार उत्कृष्ट महाकाव्यों की रचना की थी, जिनमें से ‘हल्दीघाटी (वर्ष 1937-39)’ और ‘जौहर (वर्ष 1939-44)’ को अत्यधिक प्रसिद्धि मिली। ‘हल्दीघाटी’ में वीर राणा प्रताप के जीवन और ‘जौहर’ में चित्तौड़ की रानी पद्मिनी के आख्यान हैं। इनके अतिरिक्त पाण्डेय जी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं तुमुल (वर्ष 1948), रूपान्तर (वर्ष 1948), आरती (वर्ष 1945-46), ‘जय हनुमान’ (वर्ष 1956)। तुमुल (‘क्रेता के दो वीर’ नामक खण्ड काव्य का परिवर्धित संस्करण है) जबकि ‘माधव’, ‘रिमझिम’ आँसू के कण’ और ‘गोरा वध’ उनकी प्रारम्भिक लघु कृतियाँ हैं।
भाषा-शैली
श्यांमनारायण पाण्डेय ने अपने काव्यों में खड़ी बोली का प्रयोग किया है। श्यामनारायण पाण्डेय वीर रस के सुविख्यात हिन्दी कवि थे। इनके काव्यों में वीर रस के साथ-साथ करुण रस का गम्भीर स्थान है। पाण्डेय जी ने काव्य में गीतात्मक शैली के साथ-साथ मुक्त छन्द का प्रयोग किया है। भाषा में सरलता और सहजता इस स्तर पर है कि उनके सम्पूर्ण काव्य के पाठन में चित्रात्मक शैली के गुण दिखाई पड़ते हैं।
हिन्दी साहित्य में स्थान
श्यामनारायण पाण्डेय जी हिन्दी साहित्य के महान कवियों में से एक हैं। इन्होंने इतिहास को आधार बनाकर महाकाव्यों की रचना की, जोकि हिन्दी साहित्य में सराहनीय प्रयास रहा। द्विवेदी युग के इस रचनाकार को वीरग्रन्थात्मक काव्य सृजन के लिए हिन्दी साहित्य में अद्वितीय स्थान दिया जाता है।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. मेवाड़-केसरी देख रहा,
केवल रण का न तमाशा था।
वह दौड़-दौड़ करता था रण,
वह मान रक्त का प्यासा था।।
चढ़कर चेतक पर घूम-घूम
करता सेना रखवाली था।
ले महामृत्यु को साथ-साथ
मानों प्रत्यक्ष कपाली था।।
शब्दार्थ मेवाड़ केसरी-महाराणा प्रताप; रण-युद्ध; मान-सम्मान; कपाली – शिव जी ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
अथवा रेखांकित अंश में अलंकार का नाम लिखिए।
(iv) कवि के अनुसार महाराणा प्रताप की वीरता का वर्णन कीजिए।
(v) मेवाड़-कैसरी किसे कहा गया है तथा वह मानसिंह पर रक्त का प्यासा
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी के ‘काव्य खण्ड’ के ‘हल्दी घाटी’ शीर्षक से उद्धृत है। यह श्री ‘श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा रचित है।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने महाराणा प्रताप की वीरता का वर्णन करते हुए, हल्दीघाटी के युद्ध का सजीव चित्रण किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि मेवाड़ – केसरी अर्थात् महराणा प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध को मात्र देख ही नहीं रहे थे, बल्कि वह स्वयं युद्ध क्षेत्र में जाकर उत्साहपूर्वक युद्ध कर रहे थे। वे मुगलों से युद्ध अपने मान-सम्मान की रक्षा के लिए कर रहे थे। इसके लिए वे बलिदान तक देने को तत्पर थे। उन्होंने अपने घोड़े पर चढ़कर पूरा युद्ध किया और मुगलों की सेना को ध्वस्त करते हुए अपनी सेना की रखवाली भी की। उन्होंने मुगलों की सेना का सामना दृढ़तापूर्वक किया था और सदैव उन पर हावी रहे थे। वे मृत्यु की परवाह किए बिना ही इस प्रकार रणक्षेत्र में युद्ध कर रहे थे मानो महाराणा प्रताप ने शिवजी का रूप धारण कर लिया हो ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने महाराणा प्रताप की वीरता का वर्णन किया है।
भाषा खड़ी-बोली
शैली प्रबन्ध
गुण ओज
रस वीर
छन्द मुक्त
शब्द शक्ति-अभिधा
अलंकार
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘दौड़-दौड़’, घूम-घूम तथा ‘साथ-साथ’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
उत्प्रेक्षा अलंकार ‘मानो प्रत्यक्ष कपाली था’ में ‘मानो’ बोधक शब्द है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि महाराणा प्रताप की वीरता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि महाराणा प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध को मात्र देख हीं नहीं रहे थे, बल्कि वह स्वयं युद्ध क्षेत्र में जाकर उत्साहपूर्वक युद्ध कर रहे थे। वे मुगलों से युद्ध अपने मान-सम्मान की रक्षा के लिए कर रहे थे। इसके लिए वे बलिदान तक देने को तत्पर थे। उन्होंने अपने घोड़े पर चढ़कर पूरा युद्ध किया और मुगलों की सेना को ध्वस्त करते हुए सेना की रखवाली भी की। वे मृत्यु की परवाह किए बिना हीं इस प्रकार रणक्षेत्र में युद्ध कर मानो महाराणा प्रताप ने शिवजी का रूप धारण कर लिया हो । थे
(v) महाराणा प्रताप को मेवाड़ केसरी कहा गया है। वह मानसिंह पर रक्त का प्यासा बनकर इसलिए टूट पड़े, क्योंकि मानसिंह हल्दीघाटी के युद्ध में विपक्षी सेना का नेतृत्व कर रहा था। इसलिए महाराणा प्रताप अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए मानसिंह और उसकी सेना पर रक्त के प्यासे बनकर टूट पड़े थे।
2. चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
रखता था भूतल पानी को ।
राणा प्रताप सिर काट-काट,
करता था सफल जवानी को ।।
सेना-नायक राणा के भी,
रण देख-देखकर चाह भरे।
मेवाड़ सिपाही लड़ते थे,
तिगुने उत्साह भरे । ।
शब्दार्थ चेतक-राणा प्रताप का घोड़ा; भूतल-जमीन के नीचे; चाह-इच्छा।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश में कवि एवं शीर्षक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(iv) उपर्युक्त पद्यांश में किस योद्धा का वर्णन किया गया है?
(v) मेवाड़ के राजकुमार ने जवानी की सार्थकता को सिद्ध किया। स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने महाराणा प्रताप और उनके सेनानायक के वीरत्व का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या उन्होंने अपने घोड़े चेतक पर बैठकर तलवार उठा ली और अपने विरोधियों का संहार करना आरम्भ कर दिया।
महाराणा प्रताप की सेना और मुगलों की सेना के मध्य भयानक युद्ध चल रहा था। जिस प्रकार भूमि के नीचे पानी में हलचल होने पर उफान उठता है और उस उफान में बहुत कुछ तहस-नहस हो जाता है। उसी प्रकार अपने मान-सम्मान की रक्षा हेतु महाराणा प्रताप के हृदय में उफान उठ गया था।
मेवाड़ के राजकुमार ने मुगलों की सेनाओं के सर धड़ से अलग करके अपनी जवानी की सार्थकता को सिद्ध किया था। महाराणा प्रताप के इस रौद्र रूप को देखकर मेवाड़ सेनानायक और सिपाहियों में उत्साह का संचार होने लगा था। पहले की अपेक्षा अब मेवाड़ की सेना ने भी युद्ध में अपना प्रयास बढ़ा दिया और विपक्षियों को ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेवाड़ के सिपाही दोगुने तिगुने उत्साह से लड़ रहे थे।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी-बोली
शैली प्रबन्ध
गुण ओज
रस वीर
छन्द मुक्त
शब्द-शक्ति अभिघा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार चढ़ चेतक’ में ‘च’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार काट-काट में ‘काट’ शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
(iv) उपर्युक्त पद्यांश में मेवाड़ के राजा तथा महान योद्धा महाराणा प्रताप का वर्णन किया गया है, जिनका हल्दीघाटी के मैदान में मुगलों की सेना से भयंकर युद्ध हुआ था।
(v) प्रस्तुत पद्यांश में कवि के अनुसार मेवाड़ के राजकुमार ने पूरे उत्साह और दृढ़ता के साथ मुगलों की सेनाओं के सर धड़ से अलग कर दिए. फिर भी वे रुके नहीं, अपनी जान की परवाह किए बिना वे युद्ध क्षेत्र में डटकर मुगल सेनाओं का सामना करते रहे और अपनी मातृभूमि की रक्षा की। इस प्रकार इस मेवाड़ राजकुमार ने अपनी जवानी की सार्थकता को सिद्ध किया।
3. क्षण मार दिया कर कोड़े से,
रण किया उतर कर घोड़े से ।
राणा रण कौशल दिखा-दिखा,
चढ़ गया उतर कर घोड़े से ।।
क्षण भीषण हलचल मचा मचा,
राणा-कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने का यह,
रण चण्डी जीभ पसार बढ़ी।।
शब्दार्थ कोड़े- चाबुक, रण कौशल-युद्ध कला; भीषण भयानक, कर-हाथ, रण चण्डी-दुर्गा।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग कवि ने हल्दीघाटी के युद्ध का भीषण चित्रण करते हुए राणा प्रताप के रौद्र रूप का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि महाराणा प्रताप ने मुगल सैनिकों को क्षण भर में कोड़े (चाबुक मारकर रणभूमि में गिरा दिया था। अब महाराणा प्रताप कभी अपने घोड़े से नीचे उतरकर और कभी घोड़े पर बैठकर युद्ध-कौशल दिखा-दिखाकर मुगल सैनिकों को मार रहे थे। अपने घोड़े से उतरकर ऐसा आक्रामक युद्ध करते थे कि चारों ओर हाहाकार मच जाता था, उसके बाद वे फिर अपने घोड़े पर सवार हो जाते थे। अब ऐसा क्षण देखने को मिल रहा था, जो वास्तव में अत्यन्त भीषण था । महाराणा प्रताप ने विरोधी सैनिकों पर अपनी तलवार से आक्रमण कर दिया और यह देखकर कुछ ही क्षणों में चारों ओर भोषण हाहाकार मच गया था। रणभूमि में मचे इस भीषण नरसंहार को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो रणचण्डी (दुर्गा) की खून की प्यास बुझाने के लिए, राणा अपने विरोधियों का संहार कर रहे हों।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी-बोली
शैली प्रबन्ध
गुण ओज
रस वीर और वीभत्स
छन्द मुक्त
शब्द-शक्ति अभिधा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘राणा रण’ में ‘र’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘दिखा दिखा’ और ‘मचा-मचा’ में शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
4. वह हाथी दल पर टूट पड़ा,
मानो उस पर पवि छूट पड़ा।
कट गई वेग से भू, ऐसा
शोणित का नाला फूट पड़ा । ।
जो साहस कर बढ़ता उसको,
केवल कटाक्ष से टोक दिया।
जो वीर बना नभ-बीच फेंक,
बरछे पर उसको रोक दिया ।।
शब्दार्थ पवि-वज्र; वेग – शक्ति / प्रचण्डता; शोणित- रक्त; कटाक्ष – वक्र दृष्टि / व्यंग्य; बरछे – भाला नामक अस्त्र ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने महाराणा प्रताप के शौर्य का बखान करते हुए विरोधी सेना की पराजित मनोवृत्ति का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि महाराणा प्रताप के प्रहार से मुगल सेना के समस्त हाथी दल ध्वस्त हो गए थे। मानो उन पर वज्र गिर गया हो। उनके प्रहार में इतनी शक्ति थी कि उसकी प्रचण्डता से ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे धरती फट गई हो और उसमें से रक्त की धारा बह निकली हो । विरोधी दल के जो सैनिक अपने पराक्रम एवं साहस के बल पर कुछ आगे बढ़ते, उन्हें महाराणा अपनी तिरछी दृष्टि से ही बीच रणभूमि में रोक देते थे। यह महाराणा के प्रति विरोधियों में भय की स्थिति को दर्शाता है। दूसरी ओर विपक्षी दल के जो सैनिक बहादुरी करते हुए आगे बढ़ रहे थे, उन्हें महाराणा के भाले के प्रहार ने बीच रणभूमि में ही रोक दिया। इन सब परिस्थितियों से स्पष्ट होता है कि मेवाड़ के राजा के सम्मुख मुगल सेना परास्त रही थी।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी-बोली
शैली प्रबन्ध
गुण ओज
रस वीर
छन्द मुक्त
शब्द – शक्ति अभिधा
अलंकार
उत्प्रेक्षा अलंकार ‘मानो उस पर पवि छूट पड़ा’ में ‘मानो’ बोधक शब्द है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है ।
5. क्षण उछल गया अरि घोड़े पर

क्षण लड़ा सो गया घोड़े पर ।
बैरी दल से लड़ते-लड़ते,
क्षण खड़ा हो गया घोड़े पर
क्षण भर में गिरते रुण्डों से
मस्त गजों के शुण्डों से। 
घोड़ों से विकल वितुण्डों से, 
पट गई भूमि नरमुण्डों से।
शब्दार्थ अरि- दुश्मन; रुण्डों-धड़ शुण्डों-हाथी की सूँड़; विकल- व्याकुल; वितुण्डों-हाथी; नरमुण्डों- नर (मनुष्य) के कटे हुए सिर ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) पद्यांश में महाराणा प्रताप के किस रूप का वर्णन है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने महाराणा प्रताप के युद्ध-कौशल एवं वीरता का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि महाराणा प्रताप की वीरता का वर्णन करते हुए कहता है कि रणक्षेत्र में युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप के घोड़े ( चेतक) पर मुगल सैनिक चढ़ गया था। उसने महाराणा प्रताप से युद्ध करते हुए अपनी जान गँवा दी। महाराणा प्रताप ने अपने युद्ध कौशल का परिचय देते हुए विपक्षी दल युद्ध किया। युद्ध में कुछ समय पश्चात् ही राणा प्रताप ने मुगल सेना को परास्त कर दिया। उन्होंने विपक्षी दल के सर धड़ ‘अलग कर दिए। मुगलों की हाथी की सेना और मेवाड़ के घोड़ों की सेना के मध्य चल ‘युद्ध में विरोधी दल का संहार इस प्रकार हुआ कि सम्पूर्ण रणक्षेत्र मुगलों के हाथियों के सूँड़ और मुगल सेना के कटे हुए सिरों से पट रहे गया था।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बताया है कि महाराणा प्रताप युद्ध में निपुण थे तथा वे अपने शत्रु का वीरतापूर्वक सामना करते थे ।
भाषा खड़ी-बोली
शैली प्रबन्ध
गुण ओज
रस वीर और वीभत्स
छन्द मुक्त
शब्द-शक्ति अभिधा
अलंकार
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘लड़ते-लड़ते’ में शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
अनुप्रास अलंकार ‘विकल वितुण्डों’ में ‘व’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में महाराणा प्रताप के रौद्र रूप का वर्णन किया गया है। मेवाड़ के राजा ने मुगल सैनिकों को क्षण भर में कोड़े मारकर रणभूमि में गिरा दिया। यहाँ महांराणा प्रताप अपने घोड़े से उतरकर युद्ध – कौशल दिखा-दिखाकर मुगल सैनिकों को मार रहे थे। उनका क्रोध इतना अधिक था कि विरोधी सैनिकों पर अपनी तलवार से आक्रमण कर कुछ क्षणों में ही भीषण हाहाकार मचा दिया।
6. ऐसा रण राणा करता था,
पर उसको था सन्तोष नहीं।
क्षण-क्षण आगे बढ़ता था वह,
पर कम होता था रोष नहीं । ।
कहता था लड़ता मान कहाँ,
मैं कर लूँ रक्त स्नान कहाँ,
जिस पर तय विजय हमारी है,
वह मुगलों का अभिमान कहाँ ?
शब्दार्थ मान-सम्मान; सन्तोष- सन्तुष्टि; विजय-जीत; रोष-क्रोध; अभिमान – घमण्ड ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) कवि के अनुसार महाराणा प्रताप के युद्ध कौशल का वर्णन कीजिए।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने महाराणा प्रताप के युद्ध-कौशल और देश-प्रेम की भावना को उजागर किया है।
(ii) व्याख्या कवि महाराणा प्रताप के युद्ध करने की कला का वर्णन करते हुए कहता है कि ऐसा आक्रामक युद्ध करते हुए महाराणा प्रताप युद्ध के मैदान में चारो तरफ मानसिंह को ही खोज रहे थे ( मानसिंह एक हिन्दू राजा था, जो अकबर से मिल गया था) और क्रोधित होकर कह रहे थे कि जब तक मैं मानसिंह के रक्त में स्नान नहीं कर लूँगा तब तक मुझे सन्तोष नहीं मिलेगा। उसी मानसिंह पर हमारी विजय भी निश्चित है, लेकिन महाराणा प्रताप का क्रोध कम नहीं हो रहा था, बल्कि उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा था।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी-बोली
शैली प्रबन्ध
गुण ओज
रस वीर और रौद्र
छन्द मुक्त
शब्द-शक्ति अभिधा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘रण राणा’ में ‘र’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘क्षण-क्षण’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
(iv) कवि के अनुसार, महाराणा प्रताप निडर होकर अपने विरोधियों से युद्ध कर रहे थे, परन्तु उनको विरोधियों को परास्त करने से ही सन्तुष्टि नहीं मिलती थी। वह जितने अधिक शत्रुओं का नाश करते थे, उतना ही रोष और क्रोध . उनमें बढ़ता चला जाता था।

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