UP Board Class 10 Hindi Chapter 13 – नदी (काव्य-खण्ड)
UP Board Class 10 Hindi Chapter 13 – नदी (काव्य-खण्ड)
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 13 नदी (काव्य-खण्ड)
जीवन-परिचय
समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर श्री केदारनाथ सिंह का जन्म वर्ष 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में चकिया नामक गाँव में हुआ था। उन्होंने बनारस विश्वविद्यालय से वर्ष 1956 में हिन्दी एम. ए. और वर्ष 1964 में पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। वे अनेक कॉलेजों में पढ़ाते हुए अन्त में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में हिन्दी के विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए । हिन्दी साहित्य की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें अनेक सम्मानों द्वारा सम्मानित किया गया। उनकी कविता में गाँव एवं शहर का द्वन्द्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ‘बाघ’ नामक लम्बी कविता को नई कविता के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है। श्री केदारनाथ सिंह को उनकी कविता ‘अकाल में सारस’ के लिए वर्ष 1989 का साहित्य अकादमी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, दिनकर सम्मान, जीवन भारती सम्मान और व्यास सम्मान दिया गया है। हिन्दी साहित्य अकादमी के वर्ष 2009-10 के प्रतिष्ठित और सर्वोच्च शलाका सम्मान से उन्हें सम्मानित किया गया, पर यह सम्मान उन्होंने ठुकरा दिया। साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ उन्हें वर्ष 2013 में प्रदान किया गया। इनका निधन वर्ष 2018 में हो गया।
केदारनाथ सिंह की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है – अपनी संस्कृति, सभ्यता, भाषायी सिद्धपन, मानवता और अपनी ज़मीन से जुड़े रहना। इनसे उनका जुड़ाव शाश्वत और सकारात्मक है। उनकी कविताओं में सर्वत्र निराशा में भी आशा की किरण दिखाई देती है, पतझड़ में वसन्त की आहट सुनाई देती है। वे काव्य की भाषा का परिष्कार करते हुए दिखाई देते हैं। उनका झुकाव भाषा की मुक्ति की ओर है।
कृतियाँ (रचनाएँ)
केदारनाथ सिंह की प्रमुख कृतियाँ निम्नांकित हैं- अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहाँ से देखो, कब्रिस्तान में पंचायत, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, बाघ, टॉलस्टॉय और साइकिल ।
भाषा-शैली
केदारनाथ सिंह की भाषा अत्यन्त सरल व स्पष्ट है। इनकी शैली मानव मूल्यों के संचार के लिए सदैव प्रयासरत् रही है, जिसमें मनुष्य की कभी न नष्ट होने वाली ऊर्जा तथा अदम्य जिजीविषा है। इन्होंने मुक्तक शैली का प्रयोग किया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
केदारनाथ सिंह समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे भाषा की मुक्ति चाहते हैं, पर उसमें गुणात्मक परिवर्तन भी करते रहते हैं। यह सुधार उनकी कविता तक ही सीमित नहीं रहता है। अपनी कृतियों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य को अत्यधिक समृद्ध किया है। हिन्दी साहित्य जगत में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त है।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. अगर धीरे चलो
वह तुम्हें छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जायेगी कहीं भी
यहाँ तक कि कबाड़ी की दुकान तक भी
शब्दार्थ अगर-यदि; धीरे-आहिस्ते ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) उपर्युक्त पद्यांश में ‘नदी’ किसका प्रतीक है?
(v) प्रस्तुत पद्यांश में किसकी महत्ता की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिन्दी के ‘काव्य खण्ड’ के ‘नदी’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि केदारनाथ सिंह द्वारा रचित ‘विविधा’ से ली गई है।
प्रसंग इन पंक्तियों में कवि ने मानव जीवन में नदी की महत्ता की ओर संकेत किया है कि नदी मनुष्य का साथ प्रत्येक क्षण निभाती है।
(ii) व्याख्या कवि नदी का महत्त्व बताते हुए कहता है कि नदी सिर्फ बहते जल का स्रोत मात्र नहीं है, वह हमारी जीवन धारा है। वह हमारी सभ्यता और संस्कृति का जीवन्त रूप है। नदी हमारी रग-रग में प्रवाहित हो रही है। यदि हम गम्भीरतापूर्वक नदी को अपनी सभ्यता-संस्कृति से जोड़कर विचार करते हैं उसके साथ संवाद स्थापित करते हैं, तो नदी हमारे अन्तर्मन को छूकर हमें प्रसन्न कर देती है।
इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति आधुनिकता को पाने की होड़ में अन्धाधुन्ध भागता जाता है और नदी अर्थात् अपनी सभ्यता और संस्कृति को अनदेखा कर देता है, तो यह नदी उससे दूर हो जाती हैं और वह व्यक्ति नदी से दूर होता जाता है अर्थात् आधुनिकता की अन्धी दौड़ में शामिल व्यक्ति अपनी सभ्यता-संस्कृति को भूलता जाता है और उससे अलग होता जाता है।
यदि प्रगति की ओर बढ़ता व्यक्ति नदी ( सभ्यता और संस्कृति ) का थोड़ा-सा भी ध्यान रखता है, तो नदी उसका अनुसरण करती हुई उसके पीछे-पीछे वहाँ तक चली जाती है, जहाँ तक व्यक्ति उसे ले जाना चाहता है। फिर तो व्यक्ति उसे संसार के किसी कोने में ले जाए, यहाँ तक कि कबाड़ी की दुकान पर भी जाने के लिए नदी तैयार रहती है। वह सच्चे साथी की तरह कभी भी हमारा साथ नहीं छोड़ती, क्योंकि वह हमारे जीवन का अभिन्न अंग है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि द्वारा अपनी सभ्यता-संस्कृति से जुड़े रहने की प्रेरणा दी गई है।
भाषा सहज और सरल खड़ी-बोली
शैली वर्णनात्मक व प्रतीकात्मक
गुण प्रसाद
रस शान्त
छन्द अतुकान्त व मुक्त
शब्द – शक्ति अभिधा तथा लक्षणा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार. ‘ले लो’, ‘चलती चली’, ‘कि कबाड़ी की में क्रमशः ‘ल’, ‘च’ और ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
मानवीकरण अलंकार इस पद्यांश में ‘नदी’ को एक जीवन साथी के रूप में व्यक्त किया है, इसलिए यहाँ मानवीकरण अलंकार है।
(iv) उपर्युक्त पद्यांश में नदी ‘सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है।
(v) प्रस्तुत पद्यांश में नदी की महत्ता की ओर संकेत किया गया है।
2. छोड़ दो
तो वहीं अँधेरे में
करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एवं छोटे-से घोंघे में
सचाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
शब्दार्थ रच लेगी-बना लेगी; समूची – पूरी।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(iv) सभ्यता और संस्कृति अजर-अमर कैसे हैं?
(v) नदी हमारा साथ कब नहीं छोड़ती ?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत्।
प्रसंग कवि के कहने के अनुसार, मनुष्य भले ही सभ्यता और संस्कृति की उपेक्षा करे, किन्तु सभ्यता और संस्कृति उसका पीछा नहीं छोड़ती है।
(ii) व्याख्या कवि कहते हैं कि यदि मनुष्य अपनी सभ्यता और संस्कृति से दूरी बनाता है, थोड़े समय के लिए भी उससे दूर होता है या अलग हो जाता है, तो वह सारे समाज से अलग हो जाता है। यह सभ्यता और संस्कृति अजर-अमर है, जो किसी-न-किसी रूप में हमेशा जीवित रहती है। यदि इसका थोड़ा-सा भी अंश कहीं छूट जाता है, तो यह विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपना विकास कर लेती है। अपने अस्तित्वरूपी बीज बचाए रखने के लिए इसे घोंघे जितना कम स्थान चाहिए। उसी थोड़े से स्थान में पल बढ़ कर संस्कृति अपना विकास कर लेती है। नदी अर्थात् सभ्यता और संस्कृति जीवन के सबसे कठिन समय में भी हमारा साथ नहीं छोड़ती है। जब कभी दानवी प्रवृत्तियाँ मानवता पर आक्रमण करती है, तब भी सभ्यता और संस्कृति अपने आपको बचाए रखती है और मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती है। यह मनुष्य को बहुत प्यार करती है, तभी तो अपने से बाँधे रखकर उसे अपने से अलग नहीं होने देती।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने कहा है कि अपनी सभ्यता-संस्कृति को अनदेखी करने वाला व्यक्ति समाज से कटकर अलग-थलग पड़ जाता है।
भाषा सहज और सरल खड़ी-बोली
शैली वर्णनात्मक व प्रतीकात्मक
गुण प्रसाद
रस शान्त
छन्द अतुकान्त व मुक्त
शब्द-शक्ति अभिधा तथा लक्षणा
अलंकार
उपमा अलंकार ‘छोटे-से घोंघे में’ वाचक शब्द ‘से’ होने से यहाँ उपमा अलंकार है।
(iv) सभ्यता और संस्कृति अजर-अमर है, क्योंकि किसी न किसी रूप में यह हमेशा जीवित रहती है, यदि इसका थोड़ा सा भी अंश कहीं छूट जाता है, तो यह विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपना विकास कर लेती है। अपने अस्तित्व रूपी बीज को बचाए रखने के लिए वह घोंघे जितने कम स्थान में अपना विकास कर लेती है।
(v) नदी (सभ्यता और संस्कृति) जीवन के सबसे कठिन समय में भी हमारा साथ नहीं छोड़ती है। जब कभी दानवी प्रवृत्तियाँ मानवता पर आक्रमण करती है तब भी सभ्यता और संस्कृति अपने आप को बचाए रखती है और मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती है । यह मनुष्य से बहुत प्यार करती है।
3. नदी जो इस समय नहीं है इस घर में
पर होगी जरूर कहीं न कहीं
किसी चटाई या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाए
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे-धीरे सुनना कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी ।
शब्दार्थ फूलदान – गुलदस्ता; किवाड़ – दरवाजा; घड़ियाल – मगरमच्छ जैसा एक जलीय जीव; कराह – पीड़ा की आवाज, आह।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत्।
प्रसंग कवि कह रहे हैं कि आधुनिक मानव अपनी आधुनिकता प्रदर्शित करने के लिए भले ही अत्याधुनिकता का प्रदर्शन करे, किन्तु उसके मन-मस्तिष्क में अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति एक लगाव अवश्य ही होता है।
(ii) व्याख्या कवि आधुनिक आचरण का व्यवहार करने वाले व्यक्तियों के विषय में कहता है कि आधुनिक ढंग का रहन-सहन और खान-पान करने वाले व्यक्तियों के घर में नदी रूपी सभ्यता भले ही प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे, किन्तु वह अवश्य ही उनके आचरण, मानसिकता में किसी-न-किसी रूप में विद्यमान होगी अर्थात् वह पारस्परिक सम्बन्धों की चटाई या कोमल भावनाओं के गुलदस्तों के रूप में हमारे जीवन में विद्यमान होगी ।
उस छुपी हुई सभ्यता एवं संस्कृति की आहट को जीवन की इस आपाधापी व भाग-दौड़ में सुनना अत्यन्त कठिन है। उसकी विद्यमानता को जानना हो, तो रात्रि के मौन में सुनने का प्रयास करना, जब सम्पूर्ण विश्व सो गया हो और चारों ओर शान्ति छाई हो ।
घर के प्रत्येक कोने से, उसकी प्रत्येक खिड़की और दरवाजे से कहीं दूर से आती हुई नदी की धीमी आवाज या कहीं पास से आती हुई नदी के बहने की स्पष्ट आवाज सुनाई देती है, इसके साथ ही सभ्यता और संस्कृति रूपी इस नदी में पलने वाले जीवन-मूल्य रूपी मादा घड़ियालों की कराह भी सुनाई देती है ।
मादा घड़ियाल (जीवन-मूल्य) की आवाज अवश्य ही सुनें, क्योंकि व्यक्ति यदि सभ्यता रूपी नदी के कल-कल ध्वनि में बहने की आवाज या जीवन-मूल्य रूपी घड़ियाल के कराहों की आवाज सुन लेगा, तो वह अवश्य ही इनके कष्ट को दूर करने की कोशिश करेगा अर्थात् वह अपनी विस्मृत और उपेक्षित सभ्यता और संस्कृति को अपनाएगा ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा सहज और सरल खड़ी-बोली
शैली प्रतीकात्मक व वर्णनात्मक
गुण प्रसाद
रस शान्त
छन्द अतुकान्त व मुक्त
शब्द-शक्ति अभिधा तथा लक्षणा
अलंकार
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘धीरे-धीरे’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
उपमा अलंकार नदी को मादा घड़ियाल के समान बताने से यहाँ उपमा अलंकार है।
