अधिगम का मूल्यांकन

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अधिगम का मूल्यांकन

अधिगम का मूल्यांकन

                                   Evaluation of Learning
CTET परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न-पत्रों का विश्लेषण करने से
हमें यह पता चलता है कि इस अध्याय से वर्ष 2011 में
1 प्रश्न, 2012 में 2 प्रश्न 2013, 2 प्रश्न, 2014 में 2015 में
3 प्रश्न तथा वर्ष 2016 में 2 प्रश्न पूछे गए हैं। परीक्षा में विद्यालय
आधारित आकलन तथा आकलन की विधियों या तरीकों से
अधिकतम प्रश्न पूछे गए हैं।
11.1 मूल्यांकन
मूल्यांकन (Evaluation) वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा अधिगम परिस्थितियों
तथा सीखने के अनुभवों के लिए प्रयुक्त की जाने वाली समस्त विधियों और
प्रविधियों की उपादेयता की जाँच की जाती है।
मूल्यांकन शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का एक ऐसा सोपान है, जिसमें शिक्षक यह
सुनिश्चित करता है कि उसके द्वारा की गई शिक्षण व्यवस्था तथा शिक्षण को
आगे बढ़ाने की क्रियाएँ कितनी सफल रही है।
• रॉस के अनुसार, “मूल्यांकन का प्रयोग बच्चे के सम्पूर्ण व्यक्तित्व अथवा
किसी की समूची स्थितियों की जाँच प्रक्रिया के लिए किया जाता है।”
• यह सफलता शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति प्रत्युत्तर का कार्य करती है। इस
तरह मापन के आधार पर शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों में आवश्यक सुधार लाने
के उद्देश्य से मूल्यांकन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
• इसमें यह देखा जाता है कि पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हुई है या नहीं
एवं यदि नहीं हुई है तो कितनी सीमा तक? यह एक निरन्तर चलने वाली
प्रक्रिया है, जिसका शैक्षिक उद्देश्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध है।
• मूल्यांकन शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों के लिए पुनर्बलन (Reinforcement)
का कार्य करता है।
आकलन (assesment) इसका उद्देश्य बालकों की अभिवृत्ति (attitude),
क्षमता तथा ज्ञान का स्तर इत्यादि का मापन करना होता है। आकलन
मूल्यांकन की संक्षिप्त प्रक्रिया है अर्थात् ज्ञान का परीक्षण ऊपरी स्तर पर
होता है न कि विस्तृत स्तर पर।
• आकलन या मूल्यांकन दोनों का उद्देश्य बालकों की विकास दर पता
लगाना है।
11.1.1 मूल्यांकन के प्रकार
मनोवैज्ञानिकों ने मूल्यांकन प्रणाली को तीन भागों में विभाजित किया है, जो
निम्न प्रकार है
1. निर्माणात्मक या रचनात्मक मूल्यांकन (Formative
Evaluation) बालकों के विकास की लगातार प्रतिपुष्टि
(feedback) के लिए निर्माणात्मक मूल्यांकन का उपयोग किया जाता
है। इसके अन्तर्गत शिक्षक अध्यापन (पढ़ाना) के दौरान यह जाँच
करते हैं कि बच्चों ने अभिवृत्तियों, अभिभूतियों तथा ज्ञान को कितना
प्राप्त किया है। यह मूल्यांकन अध्याय के बीच-बीच में किया
जाता है।
2. योगात्मक/संकल्पनात्मक/अन्तिम मूल्यांकन (Summative
Evaluation) यह मूल्यांकन सत्र की समाप्ति के बाद होता है।
इसके अन्तर्गत शिक्षक यह जाँच करते हैं कि बच्चों ने ज्ञान को
किस सीमा तक प्राप्त किया है।
3. निदानात्मक मूल्यांकन (Diagnostic-Evaluation) जो विद्यार्थी
पढ़ाई के दौरान असफल होते हैं। उन विद्यार्थियों की असफलता के
कारणों का पता लगाना निदानात्मक मूल्यांकन कहलाता है।
11.1.2 अधिगम का मूल्यांकन
अधिगम के मूल्यांकन (Evaluation of Learning) में उपलब्ध प्रमाणों के
साथ कार्य करना शामिल है, जो स्टाफ और व्यापक मूल्यांकन समुदाय को
विद्यार्थियों की प्रगति की जाँच करने और इस सूचना को अनेक तरीको से
इस्तेमाल करने में समर्थ बनाता है।
11.1.3 अधिगम में मूल्यांकन की विशेषताएँ
अधिगम में मूल्यांकन की निम्न विशेषताएँ है
• यह मूल्यांकन शिक्षा प्राप्ति के बाद किया जाता है। सूचना अध्यापक द्वारा
एकत्र की जाती है। सूचना को सामान्य रूप से अंकों अथवा ग्रेडों में
रूपान्तरित किया जाता है।
• अन्य विद्यार्थियों के कार्य निष्पादन (performance) के साथ तुलना की
जाती है। यह इसके पहले प्राप्त की गई शिक्षा पर नजर डालता है।
11.1.4 अधिगम में अच्छे मूल्यांकन के मानदण्ड
• ये युक्तिसंगत होते है (ठोस मानदण्डों पर आधारित)। ये विश्वसनीय
होते है (मूल्यांकन और पद्धति का सही होना)।
• ये तुलनीय होते है (जब उनकी तुलना अन्य विभागों अथवा विद्यालयों में
की गई जांच-परख से की जाती है, तो वे ठीक पाए जाते है)।
11.1.5 विद्यालय आधारित मूल्यांकन
• विद्यालय आधारित मूल्यांकन (School Based Evaluation), विद्यालय
शिक्षा बोडों द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं के विपरीत, स्कूल स्तर पर
किया जाता है। यह मूल्यांकन विद्यालय द्वारा विकसित अनुसूची और बोर्ड
द्वारा जारी किए गए मार्ग निर्देशों के अनुसार अध्यापकों द्वारा किया जाता
है।
• यद्यपि यह मूल्यांकन हमेशा विद्यालय के स्तर पर किया जाता रहा है,
किन्तु इस प्रणाली में कुछ त्रुटियाँ उत्पन्न हो गई है। इन त्रुटियों के अनेक
कारण हो सकते है। बुनियादी कारण मूल्यांकन के स्थान और शिक्षा की
प्रक्रिया में इसके महत्त्व के बारे में अध्यापकों की गलत धारणा है। दूसरा
कारण बाह्य परीक्षा की प्रथा का अनुकरण है, जो सामान्य रूप से सत्र के
अन्त में ली जाती है।
• मूल्यांकन की विद्यालय आधारित प्रणाली में, मूल्यांकन के प्रयोजन का
केन्द्रबिन्दु बदल गया है। अब इसमे तत्परता परीक्षण, विकास की
जाँच-परख, संज्ञानात्मक, भावात्मक और मनो-प्रेरक (Psychomotor)
क्षेत्रों में कार्य-निष्पादन का बार-बार, सुनियोजित और प्रभावकारी तरीके
से मूल्यांकन किया जाना शामिल है।
• विद्यालय आधारित मूल्यांकन बाल-केन्द्रित, विद्यालय केन्द्रित और
बहुआयामी मूल्यांकन होता है। इसलिए, यह सच्चे अर्थों में, शिक्षार्थी के
सर्वांगीण विकास का सूत्रपात करता है।
• यह विद्यालय के अन्दर और विद्यालय के बाहर दोनों जगहों पर जीवन में
सभी प्रकार की शिक्षा-प्राप्ति को प्रोत्साहित करता है।
• यह बाल-केन्द्रित होता है, क्योकि यह विकास के वैयक्तिक स्वरूप की
दृष्टि से विद्यार्थी को एक अद्वितीय अस्तित्व मानता है।
• यह अपनी शिक्षा के पहले से निर्धारित लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त
करने के लिए शिक्षार्थी को एक अलग व्यक्तित्व के रूप में, अन्य
शिक्षार्थियों की तुलना में केवल उसकी स्थिति के रूप में नहीं, बल्कि
प्रत्येक बच्चे की अपनी वैयक्तिक योग्यताओं, प्रगति और विकास के
आधार पर निर्माण करता है।
विद्यालय आधारित मूल्यांकन की विशेषताएँ
• यह पारम्परिक प्रणाली से अधिक विस्तृत, अधिक व्यापक और सतत
होता है।
• इसका मुख्य लक्ष्य शिक्षार्थी को सुनियोजित अधिगम और विकास की
ओर उन्मुख करने में सहायता देना होता है।
• विद्यालय आधारित मूल्यांकन, अध्यापकों को अपने विद्यार्थियों के बारे में
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर जानने के अवसर भी प्रदान करता है
– वे क्या सीखते है?
– वे कैसे सीखते है?
– सामूहिक रूप से सीखने में उन्हें किस प्रकार की कठिनाइयों का
सामना करना पड़ता है?
– बच्चे क्या सोचते हैं?
– बच्चे क्या महसूस करते हैं?
– उनकी रुचियाँ और प्रवृत्तियाँ क्या है?
• यह भविष्य के जिम्मेदार नागरिक के रूप में शिक्षार्थी की आवश्यकताओं
का ध्यान रखता है।
• यह अधिक पारदर्शी (Transparent), भविष्यात्मक और शिक्षार्थियो,
अध्यापको और माता-पिता के बीच सहयोजन की अधिक गुंजाइश मुहैया
कराने वाला होता है।
• विद्यालय आधारित मूल्यांकन शिक्षार्थी को अपनी क्षमता का उपयोग बेहतर
तरीके से करने में सहायता देता है। यह अध्यापकों को ऐसे तरीके को ढ़ूँढ़़ने
के लिए सूक्ष्म दृष्टि प्रदान करता है, जो अलग-अलग शिक्षार्थियों के लिए
अपनी समस्याओं और कठिनाइयों का समाधान करने में सहायक सिद्ध हो
सकते है।
• यह मूल्यांकन बाल-केन्द्रित होने के अलावा, विद्यालय केन्द्रित भी है,
अर्थात इसका अर्थ यह है कि बाहर का कोई अभिकरण (Authority) इस
मूल्यांकन प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करता। यह पूरी तरह से विद्यालय
आधारित है और अध्यापक द्वारा किया जाता है। अध्यापक पर भरोसा किया
जाता है और इस संक्षिप्त विवरण के साथ ही अध्यापक अपने विद्यार्थियों के
बारे में सबसे अधिक जानता है, उसे विद्यार्थियो का मूल्यांकन करने की
जिम्मेदारी दी जाती है।
• विद्यालय आधारित मूल्यांकन बहुआयामी होता है। इसके बहुआयामी स्वरूप
का पता इस बात से लगता है कि यह शिक्षार्थियों के सामाजिक, भावात्मक,
शारीरिक, बौद्धिक विकास और विकास के उन अन्य क्षेत्रों की आवश्यकता
को स्वीकार करता है और उनका ध्यान रखता है, जो परस्पर-सम्बन्धित
होते है और जिन पर अलग से विचार नहीं किया जा सकता है।
विद्यालय आधारित मूल्यांकन को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता
• पारम्परिक मूल्यांकन में केवल सीमित तकनीकों का प्रयोग किया जाता है,
जिससे विद्यार्थियो की परख अच्छी तरह नहीं हो पाती। इसलिए विद्यालय
आधारित नवीनतम मूल्यांकन पद्धतियों को आवश्यकता है। वास्तव में, बाह्य
परीक्षाओं ने स्कूलो में मूल्यांकन की स्थिति को प्रभावित करना शुरू कर
दिया था और अध्यापन की समूची प्रक्रिया सार्वजनिक परीक्षा के अनुकूल
बननी शुरू हो गई थी।
• पारम्परिक बाह्य परीक्षा विद्यालय शिक्षा की अन्तिम व्यवस्था में वर्ष के अन्त
में एक प्रयास परीक्षा होती है। यह मुख्यतः विद्यार्थियों के ज्ञान के केवल
शैक्षिक पहलुओं का मूल्यांकन करती है। यह बच्चों की सभी योग्यताओं का
मूल्यांकन नहीं करती है। लिखित परीक्षा में प्राप्त किए गए अंकों के आधार
पर विद्यार्थियों को उत्तीर्ण अथवा अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता है और
उन्हें पूर्व-निर्धारित डिविजनों में और आगे वर्गीकृत किया जाता है।
• उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण प्रणाली निराशा उत्पन्न करती है और अमानवीय है,
क्योकि अनुत्तीर्ण उम्मीदवार यह महसूस करने लगते हैं कि वे पढ़ने में
कमजोर हैं।
• इसमे-शैक्षिक क्षेत्रों की लगभग पूरी तरह से उपेक्षा कर दी जाती है और
शिक्षा तथा मूल्यांकन की इस समय प्रचलित स्कीम में उनका कोई स्थान
नहीं होता। परीक्षा-परिणामो का विश्लेषण और व्याख्या वैज्ञानिक तरीके से
नहीं की जाती है।
• पारम्परिक बाह्य परीक्षा को उपरोक्त कमियों को दूर करने के लिए विद्यालय
आधारित सतत और व्यापक मूल्यांकन प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए।
जिसके निम्नलिखित उद्देश्य होते है
– बच्चों पर पड़ने वाले दबाव को कम करना।
– मूल्यांकन को व्यापक और नियमित बनाना।
– अध्यापक को सृजनात्मक अध्यापन के लिए वातावरण उपलब्ध कराना।
– निदान और उपचार के साधन की व्यवस्था करना।
– अपेक्षाकृत अधिक कौशलो वाले शिक्षार्थियों का निर्माण करना।
– अध्यापको, विद्यार्थियों, माता-पिता और समाज के प्रभावकारी उपयोग
के लिए परिणामों की कार्यात्मक और अर्थपूर्ण घोषणा।
– विद्यार्थियों की न केवल उपलब्धियों और प्रवीणताओं के स्तरों के
निर्धारण के प्रयोजन के लिए, बल्कि निदान और उपचार को समृद्ध
बनाने वाले कार्यक्रमों के जरिए उनमें सुधार करने के लिए परीक्षा के
परिणामों का अधिक व्यापक रूप से उपयोग।
– बहुत-से अन्य सम्बन्धित प्रयोजनों को पूरा करने के लिए परीक्षाएँ लेने
की क्रियाविधि में सुधार।
– शिक्षण सामग्री और प्रणाली में समय के अनुसार परिवर्तन करना।
– माध्यमिक अवस्था से लेकर आगे तक सेमेस्टर प्रणाली लागू करना।
– विद्यार्थी के कार्य-निष्पादन (work performance) और उसकी
प्रवीणता के स्तर के निर्धारण के लिए और उसकी घोषणा करने के
लिए अंकों के स्थान पर ग्रेडों का उपयोग।
11.2 ‘सतत और व्यापक’ मूल्यांकन
आज हमारे समक्ष पारम्परिक परीक्षा प्रणाली और मूल्यांकन पद्धति को
बदलने की चुनौती उभरकर आई है। माध्यमिक स्तर पर सतत एवं व्यापक
मूल्यांकन को अपने सभी विद्यालयों में लागू करते हुए सीबीएसई ने यह स्पष्ट
सन्देश दिया है कि मूल्यांकन करते समय विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास को
ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अधिगम एक सतत प्रकिया है, इसलिए मूल्यांकन भी सतत होना चाहिए।
मूल्यांकन अध्यापन एवं अधिगम की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। सतत
एवं व्यापक मूल्यांकन में मूलरूप से विद्यार्थी के ज्ञान की परीक्षा के स्थान पर
उसके अधिगम की प्रक्रिया को मूल्यांकन के लिए चुना गया है।
• सतत और व्यापक मूल्यांकन (Continuous and Comprehensive
Evaluation) (CCE) का अर्थ छात्रों के विद्यालय आधारित मूल्यांकन की
प्रणाली से है, जिसमें छात्रों के विकास के सभी पक्ष शामिल है। यह एक
बच्चे की विकास प्रक्रिया है, जिसमें दोहरे उद्देश्यों पर बल दिया जाता है।
ये उद्देश्य एक ओर मूल्यांकन में निरन्तरता और व्यापक रूप से सीखने
‘के मूल्यांकन पर तथा दूसरी ओर व्यवहार के परिणामों पर आधारित है।
• यहाँ ‘निरन्तरता’ का अर्थ इस पर बल देना है कि छात्रों की वृद्धि और
विकास’ के अभिज्ञात पक्षों का मूल्यांकन एक बार के कार्यक्रम के बजाय
एक निरन्तर प्रक्रिया है, जिसे सम्पूर्ण अध्यापन-अधिगम प्रक्रिया में निर्मित
किया गया है और यह शैक्षिक सत्रों की पूरी अवधि में फैली हुई है।
इसका अर्थ है मूल्यांकन की नियमितता, अधिगम अन्तरालों का निदान,
सुधारात्मक उपायों का उपयोग, स्वयं मूल्यांकन के लिए अध्यापकों और
छात्रों के साक्ष्य का फीडबैक अर्थात् प्रतिपुष्टि।
• दूसरा पद ‘व्यापक’ का अर्थ है शैक्षिक और सह-शैक्षिक पक्षों को शामिल
करते हुए छात्रों की वृद्धि और विकास को परखने की योजना। चूँकि
क्षमताएँ, मनोवृत्तियाँ और सोच अपने आप को लिखित शब्दों के अलावा
अन्य रूपों में प्रकट करती हैं, इसलिए यह पद अनेक साधनों और
तकनीकों के अनुप्रयोग को सन्दर्भित करता है (परीक्षणकारी और
गैर-परीक्षणकारी दोनो) और यह सीखने के क्षेत्रों में छात्र के विकास के
मूल्यांकन पर लक्षित है; जैसे– ज्ञान, समझ, व्याख्या, अनुप्रयोग,
विश्लेषण, मूल्यांकन एवं सृजनात्मकता।
11.2.1 सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के उद्देश्य
• बोधात्मक, मनोप्रेरक और भावात्मक कौशलों के विकास में सहायता।
• सीखने की प्रक्रिया पर बल देना और याद रखने पर बल नहीं देना।
• मूल्यांकन को अध्यापन-अधिगम प्रक्रिया का अविभाज्य हिस्सा बनाना।
• नियमित निदान के आधार पर उपचारात्मक अनुदेशों के बाद छात्रों की
उपलब्धि और अध्यापन-अधिगम कार्य नीतियों के सुधार के लिए
मूल्यांकन का उपयोग करना।
• मूल्यांकन को निष्पादन के वांछित स्तर बनाए रखने के लिए गुणवत्ता
नियन्त्रण युक्ति के रूप में इस्तेमाल करना।
• सामाजिक उपयोगिता, वांछनीयता या एक कार्यक्रम की प्रभावशीलता का
निर्धारण करना और छात्र, सीखने की प्रक्रिया तथा सीखने के परिवेश के
बारे में उपयुक्त निर्णय लेना।
• अध्यापन और अधिगम प्रक्रिया को छात्र केन्द्रित क्रिया-कलाप बनाना।
11.2.2 सतत और व्यापक मूल्यांकन की विशेषताएँ
• सतत और व्यापक मूल्यांकन के ‘सततं’ पहलू के अन्तर्गत मूल्यांकन के
‘सतत’ और ‘आवधिक’ पहलू का ध्यान रखा जाता है।
• निरन्तरता का अर्थ है शिक्षा के प्रारम्भ में विद्यार्थियों का निर्धारण (स्थापन
मूल्यांकन) और शिक्षण प्रक्रिया के दौरान निर्धारण (रचनात्मक
मूल्यांकन), जो मूल्यांकन की बहुविद् तकनीकों का उपयोग करके,
अनौपचारिक रूप से किया जाता है।
• नियतकालिकता का अर्थ है कार्य निष्पादन का निर्धारण, जो यूनिट/अवधि
के समाप्त होने पर बार-बार किया जाता है (सारांशात्मक)।
• सतत और व्यापक मूल्यांकन का ‘व्यापक’ संघटक बच्चों के व्यक्तित्व के
पूर्ण विकास के निर्धारण का ध्यान रखता है। इसमें विद्यार्थियों के विकास
के शैक्षिक और इसके अलावा सह-शैक्षिक पहलुओं का निर्धारण
शामिल है।
• शैक्षिक पहलुओं में पाठ्यक्रम के क्षेत्र होते हैं, जबकि सह-शैक्षिक पहलुओं
में जीवन-कौशल, सह-पाठ्यचर्या अभिवृत्तियाँ और मूल्य शामिल होते है।
• शैक्षिक क्षेत्रों में निर्धारण, निरन्तर और नियतकालिक रूप से मूल्यांकन की
बहुविद् तकनीकों का इस्तेमाल करके अनौपचारिक और औपचारिक रूप
से किया जाता है।
• नैदानिक मूल्यांकन यूनिट। परीक्षा के समाप्त होने पर किया जाता है। कुछ
यूनिटों में घटिया कार्य-निष्पादन (Per Formance) के कारणों का पता
नैदानिक (Diagnostic) परीक्षणों का उपयोग करते हुए लगाया जाता है।
इसके बाद उपयुक्त रूप से हस्तक्षेप किया जाता है और कार्यवाही की
जाती है और तत्पश्चात् पुनः परीक्षण किए जाते हैं।
• सह-शैक्षिक क्षेत्रों में निर्धारण निर्धारित मानदण्डो के आधार पर बहुविद्
तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए किया जाता जब जीवन-कौशलों का
निर्धारण के सूचको और जाँच-सूचियो के आधार पर किया जाता है।
• यह देखा गया है कि आमतौर पर किसी विषय के तथ्यों (Facts), उसकी
संकल्पनाओ (Concepts), उसके सिद्धान्तो आदि के ज्ञान और उनकी
समझ जैसे शैक्षिक क्षेत्रों का मूल्यांकन किया जाता है। सह-शैक्षिक तत्त्वों
को या तो मूल्यांकन की प्रक्रिया से बिल्कुल बाहर रखा जाता है अथवा
उनकी ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
• मूल्यांकन को व्यापक बनाने के लिए, शैक्षिक और सह-शैक्षिक दोनो क्षेत्रों को
महत्त्व दिया जाना चाहिए। संवृद्धि (Growth) के सह-शैक्षिक पहलुओं के
मूल्यांकन के सरल और प्रबन्धकीय तरीको को व्यापक मूल्यांकन स्कीम में
अवश्य शामिल किया जाना चाहिए।
• राष्ट्रीय शिक्षा नीति सम्बन्धी दस्तावेज (Document), 1986 जिसका 1992 में
संशोधन किया गया है, में इस बात का उल्लेख किया गया है कि मूल्यांकन
योजना में शिक्षा के विषयों और सह-शिक्षा के सभी शिक्षण सम्बन्धी अनुभवो
को शामिल किया जाना चाहिए।
• व्यापक मूल्यांकन के लिए अनेक प्रकार की तकनीको और साधनों का
उपयोग करना जरूरी होना है। इसका कारण यह है कि शिक्षार्थी की संवृद्धि
के विभिन्न विशिष्ट क्षेत्रो का मूल्यांकन कतिपय विशेष तकनीको के जरिए
किया जा सकता है।
11.2.3 सतत और व्यापक मूल्यांकन के कार्य एवं महत्त्व
अध्यापन शिक्षा प्राप्ति प्रक्रिया में, मूल्यांकन से शैक्षिक और सह-शैक्षिक
पहलुओं का ध्यान रखने की अपेक्षा की जाती है। यदि कोई किसी क्षेत्र में
कमजोर है, तो नैदानिक मूल्यांकन किया जाना चाहिए और उपचारी उपाय
अपनाए जाने चाहिए।
सतत और व्यापक मूल्यांकन के कार्य एवं महत्त्व निम्न हैं
• यह अध्यापक को प्रभावकारी कार्यनीतियाँ आयोजित करने में सहायता देता है।
• सतत मूल्यांकन शिक्षार्थी की प्रगति की सीमा और मात्रा को नियमित रूप से
ऑकने में सहायता देता है (विशिष्ट शैक्षिक और सह-शैक्षिक क्षेत्रों के सन्दर्भ
में योग्यता और उपलब्धि)।
• सतत् मूल्यांकन कमजोरियों का निदान करने का कार्य करता है और
अध्यापक को अलग-अलग शिक्षार्थियों की शक्तियो और कमजोरियों और
उसकी आवश्यकताओं का पता लगाने में सहायता देता है। यह अध्यापक को
तत्काल फीडबैक मुहैया कराता है, जो तब यह फैसला कर सकता है कि
कोई विशेष यूनिट अथवा संकल्पना समूची कक्षा को फिर से पढ़ाए जाने की
आवश्यकता है अथवा केवल कुछ शिक्षार्थियों को उपचारी शिक्षा की
आवश्यकता है।
• सतत मूल्यांकन के द्वारा, बच्चे अपनी शक्तियों और कमजोरियों को जान
सकते हैं। यह बच्चों में अध्ययन की अच्छी आदतें विकसित करने, गलतियों
को सुधारने और अपने क्रिया-कलापों को वांछित लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा
में मोड़ने के लिए अभिप्रेरित कर सकता है। इससे शिक्षार्थी को शिक्षा के उन
क्षेत्रों को निर्धारित (Motivated) करने में सहायता मिलती है, जिनमें अधिक
जोर दिए जाने की आवश्यकता हो।
• सतत् और व्यापक मूल्यांकन अभिरुचियों और प्रवृत्ति वाले क्षेत्र अभिज्ञात
करता है। यह अभिवृत्तियों और मूल्य प्रणालियों में होने वाले परिवर्तनों का
पता लगाने में सहायता देता है। यह विषयों, पाठ्यक्रमों और जीवनवृत्तियों
(Carrier) के चुनाव के बारे में, भविष्य के लिए फैसले करने में सहायता
देता है।
• यह शैक्षिक और सह-शैक्षिक क्षेत्रों में विद्यार्थियों की प्रगति के बारे में
सूचना/रिपोर्ट देता है और इस प्रकार शिक्षार्थी की भावी सफलताओं के बारे
में पूर्वानुमान लगाने में सहायता देता है।
• सतत मूल्यांकन समय-समय पर बच्चे, अध्यापकों और माता-पिता को
उपलब्धि के बारे में जागरूक बनाने में सहायता देता है। यदि उपलब्धि में
कोई कमी हुई हो तो वे उसके सम्भाव्य कारणों की जांच कर सकते हैं और
शिक्षा के उस क्षेत्र में जिसमे अधिक जोर देने की आवश्यकता हो,
उपचारी उपाय कर सकते है। कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ
वैयक्तिक कारणो, पारिवारिक समस्याओं अथवा समायोजन की
समस्याओं के कारण, बच्चे अपने अध्ययन की उपेक्षा करना शुरू कर
देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी उपलब्धि में अचानक गिरावट आ
जाती है।
• यदि अध्यापक, बच्चे और माता-पिता को उपलब्धि में अचानक आई
गिरावट का पता न चले, तो बच्चे द्वारा अपने अध्ययन की उपेक्षा लम्बे
समय तक की जाती रहती है और इसके परिणामस्वरूप उपलब्धि निम्न
स्तरीय हो जाती है और बच्चे की शिक्षा प्राप्ति मे स्थायी रूप से त्रुटि
रह जाती है।
• सतत और व्यापक मूल्यांकन का मुख्य बल विद्यार्थियो की निरन्तर
संवृद्धि पर और उनका बौद्धिक, भावनात्मक, शारीरिक, सांस्कृतिक और
सामाजिक विकास सुनिश्चित करने पर होता है और इसलिए यह
विद्यार्थी की केवल शैक्षिक उपलब्धियों को आँकने तक सीमित नहीं
होगा। इस मूल्यांकन का उपयोग शिक्षार्थियों को अन्य कार्यक्रमों के लिए
अभिप्रेरित करने, सूचना प्रदान करने, फीडबैक की व्यवस्था करने और
शिक्षा में शिक्षा प्राप्ति में सुधार करने के लिए अनुवर्ती (उपयुक्त)
कार्यवाही करने और शिक्षार्थी के विवरणों की एक व्यापक तस्वीर
प्रस्तुत करने के एक साधन के रूप में करता है।
अध्यापकों के लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य
• शिक्षण की विभिन्न विधियों एवं योग्यताओं को समझने का प्रयास करना।
• बालकों को पढ़ाते समय प्रयोजनात्मक प्रणाली का उपयोग करना,
यथा-मौखिक प्रस्तुति, प्रोजेक्ट के माध्यम से प्रस्तुति इत्यादि।
• मूल्यांकन मापदण्ड की प्रणाली को विद्यार्थियों से साझा करना।
• अपना मूल्यांकन स्वयं करने की अनुमति देना
• विद्यार्थी को प्रयास के माध्यम से सुधरने का अवसर देना।
11.2.4 सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के साधन व विधियाँ
सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के अन्तर्गत विभिन्न तकनीकों का प्रयोग किया
जाता है; जैसे–निरीक्षण, प्रश्नावली, साक्षात्कार, जाँच सूची, विवरण आदि।
निरीक्षण
• गुडे तथा हाट के अनुसार, विज्ञान निरीक्षण (Observation) से प्रारम्भ
होता है और अपने तथ्यों की पुष्टि के लिए अन्त में निरीक्षण का सहारा
लेता है।
• इस विधि के द्वारा सामूहिक व्यवहार तथा जटिल समस्याओं का
अध्ययन भी सरलतापूर्वक किया जा सकता है।
• निरीक्षण विधि में अध्ययन सावधानीपूर्वक होता है, क्योंकि अध्यापक
स्वयं प्रत्यक्ष रूप से भाग लेता है। इस विधि में सामूहिक व्यवहार की
जाँच भी की जाती है।
• यह विधि पूर्व बाल्यकाल (Early childhood) में मूल्यांकन के लिए
अति उत्तम है, क्योकि इसमें छात्रों को मूल्यांकन किए जाने का अहसास
भी नहीं होता और अध्यापक प्राकृतिक परिस्थिति में बालक का
मूल्यांकन कर पाते हैं।
• इसकी विशेषताएं इस प्रकार होती है―वस्तुनिष्ठता, निश्चयात्मकता,
क्रमबद्धता, प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता।
प्रश्नावली
• प्रश्नावली (Questionnaire) एक प्रकार का उत्तर प्राप्त करने का साधन है,
जिसके द्वारा उत्तरदाता स्वयं उसकी पूर्ति करता है।
• यह प्रश्नों की सुनियोजित सूची होती है, जिसके आधार पर बच्चों का
मूल्यांकन किया जाता है।
• 0-6 वर्ष की अवस्था में बच्चों को चित्र प्रश्नावली दी जाती है, जिसमें
प्रश्न चित्रों के रूप में होते हैं, बच्चे सही लगने वाले चित्रों को अंकित
करते हैं।
साक्षात्कार
• साक्षात्कार (Interview) वह विधि है, जिसके द्वारा मौखिक अथवा लिखित
सूचना प्राप्त की जाती है।
• साक्षात्कार द्वारा अध्यापक बालक की प्रगति को ज्ञापित (जानना) कर पाता
है, परन्तु इसमें प्रश्न इस प्रकार से दैनिक जीवन से सम्बन्धित होते हैं कि
बालक को यह ज्ञात नहीं हो पाता है कि यह उसका मूल्यांकन हो रहा है।
• इस विधि से बालक अध्यापक के करीब आता है और निर्भय होकर बात कर
पाता है। इस विधि द्वारा विभिन्न मनोवैज्ञानिक विधियाँ भी दूर की जा सकती है।
जाँच-सूची
जाँच-सूची (Check List) में अध्यापक बालक के सभी तथ्यों; जैसे–भाषा के
प्रयोग, सामाजिकता, संवेगात्मकता, खेल के दौरान व्यवहार आदि को लिखते
जाते हैं जिसको बाद में एकत्रित कर बालक का मूल्यांकन किया जाता है। इस
विधि से बालक का उचित मूल्यांकन होता है।
विवरण
विवरण (Interpretation) में विद्यार्थी के कुछ समय के कार्य का नमूना
(Sample) एकत्र किया जाता है। यह नमूना दिन-प्रतिदिन के कार्य से भी किया
जा सकता है या शिक्षार्थी के बेहतर कार्य से भी किया जा सकता है।
विवरण का लाभ
• संचित रिकॉर्ड उपलब्ध करें। इस प्रक्रिया में यह दिखाएँ कि किस प्रकार
कौशल और ज्ञान का विकास होता है।
• इससे विद्यार्थी अपने अधिगम और प्रगति का दूसरों को प्रदर्शन कर
सकता/सकती है। क्या बच्चा अधिगम और मूल्यांकन में सक्रिय प्रतिभागी
बनता है?
विवरण सम्बन्धी सुझाव
• विवरण में रखे जाने वाले चयनित कार्य का विशेष कारण होना चाहिए।
• विवरण की विषय-वस्तु के चयन में विद्यार्थी की प्रतिभागिता को प्रोत्साहित
किया जाए और विषय-वस्तु के चयन के मापदण्ड (Norms) तय किए जाएँ।
• बच्चे के विकास के साथ-साथ उसके विवरणों को भी अद्यतन
(Update) किया जाना चाहिए।
• जिन बातों का प्रदर्शन किया जाना है, उनके साथ विवरण सम्बन्धी
सामग्री चिन्तापूर्वक रखी जानी चाहिए।
• सहज सन्दर्भ के लिए विषय-वस्तु पर स्पष्ट ‘लेबल’ लगाना चाहिए
और उस पर संख्या अंकित की जानी चाहिए।
वर्णनात्मक रिकॉर्ड
अध्यापक/बच्चे के साथी शिक्षार्थी के अनुभव का वर्णनात्मक
(Descriptive) विवरण भी लिखना चाहिए। इससे बच्चे के जीवन-कौशल
के प्रत्येक पहलू का पता लगाने का उन्हें अवसर दिया जाता है और वे
शिक्षार्थी की और अधिक सम्पूर्ण छवि का सृजन करने के लिए उसके
पिछले विवरण को साक्ष्य के रूप में उसका उपयोग कर सकते हैं और
इसे संचयी रिकॉर्ड (Accumulated record) तैयार करने के उपयोग में
लाया जा सकता है।
11.3 शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण
शैक्षिक उद्देश्यों के मूल्यांकन का त्रि-स्तरीय वर्गीकरण
1. ज्ञानात्मक या संज्ञानात्मक संकल्पना Cognitive Domain
2. भावनात्मक संकल्पना Affective Domain
3. क्रियात्मक या गत्यात्मक संकल्पना Psychomotor or Conative
Domain
ब्लूम के अनुरूप शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण
ब्लूम के अनुसार व्यवहार के तीन प्रकार होते हैं
1. ज्ञानात्मक पक्ष (Cognitive Domain)इसके अन्तर्गत ज्ञान, बोध
प्रयोग विश्लेषण (Analysis), संश्लेषण (Synthesis) तथा
मूल्यांकन इत्यादि आता है।
2. भावात्मक पक्ष (Affective Domain) (ब्लूम, क्रथवाल व
मारिया) इसके अन्तर्गत ध्यान देना, अनुक्रिया (Responding),
आकलन, संगठन, मूल्यों का विशेषीकरण इत्यादि आता है।
3. क्रियात्मक पक्ष/मनोगत्यात्मक (सिंपसन तथा हेरो)
(Psychomotor Domain) इसके अन्तर्गत सहज क्रियात्मक अंग
संचालन (Reflex Movements), आधारभूत अंग संचालन
(Basic-Fundamental Movements), शारीरिक योग्यताएँ
(Physical Abilities) प्रत्यक्षीकरण योग्यताएँ (Perceptual
Abilities), सांकेतिक सम्प्रेषण (Non-Discursive
Communication) इत्यादि आता है।
1. आकलन (Assessment) मूल्यांकन की
(1) संक्षिप्त प्रक्रिया है
(2) विस्तृत प्रक्रिया है
(3) बहुआयामी संकल्पना है
(4) उपरोक्त में से कोई नहीं
2. मूल्यांकन शिक्षण एवं शिक्षार्थी दोनों के लिए
किस प्रकार का कार्य करता है?
(1) पुनर्बलन का
(2) समावेशन का
(3) अधिगमन का
(4) उपरोक्त में से कोई नहीं
3. क्रिस्टिना अपनी कक्षा को क्षेत्र-भ्रमण पर ले
जाती है और वापस आने पर अपने
विद्यार्थियों के साथ भ्रमण पर चर्चा करती
है। यह……..की ओर संकेत करता है।
(1) सीखने के लिए आकलन
(2) आकलन के लिए सीखना
(3) आकलन का सीखना
(4) सीखने का आकलन
4. निम्नलिखित में से कौन-सी अधिगम के
मूल्यांकन की विशेषता नहीं है?
(1) यह मूल्यांकन शिक्षा-प्राप्ति के बाद किया
जाता है।
(2) इसमें सूचना को सामान्य रूप से अंकों अथवा
ग्रेडों में रूपान्तरित किया जाता है।
(3) इसमें सूचना अध्यापक द्वारा एकत्र की जाती है।
(4) इसमें सूचना छात्रों के द्वारा स्वयं एकत्र की
जाती है।
5. वह मूल्यांकन, जो विद्यालय परिषदों के
दिशा-निर्देशों के आधार पर तो किया जाता
है, किन्तु परिषद् (बोर्ड) स्तर पर नहीं,
कहलाता है
(1) विद्यालय आधारित मूल्यांकन
(2) निरीक्षण
(3) अवलोकन
(4) व्यापक मूल्यांकन
6. अधिगम के अच्छे मूल्यांकन का/के
मानदण्ड है/है
(1) ये युक्तिसंगत होते हैं
(2) ये विश्वसनीय होते हैं
(3) ये तुलनीय होते है
(4) उपरोक्त सभी
7. आजकल विद्यालय आधारित मूल्यांकन की
चर्चा की जाती है, इसके अन्तर्गत अध्यापकों
को विद्यार्थियों के बारे में निम्नलिखित में से
क्या जानने का अवसर प्राप्त होता है?
A. वे क्या सीखते है?
B. वे क्या सोचते हैं?
C. वे कैसे सीखते है?
(1) केवल A
(2) B और C
(3) A और C
(4) ये सभी
8. केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने विद्यालय
आधारित सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के
दिशा-निर्देश दिए हैं, निम्नलिखित में से
कौन-सा इसका एक उद्देश्य नहीं है?
(1) बच्चों पर पड़ने वाले दबाव को कम करना।
(2) विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार पढ़ने
की छूट देना
(3) छात्रों की प्रवीणता के निर्धारण के लिए अंकों
के स्थान पर ग्रेडों का प्रयोग
(4) निदान एवं उपचार के साधन की व्यवस्था
करना
9. विद्यालय आधारित मूल्यांकन होता है
(1) बहुआयामी
(2) एकलआयामी
(3) संकीर्ण
(4) इनमें से कोई नहीं
10. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में ‘व्यापक’ का
तात्पर्य क्या है?
(1) एक बार के कार्यक्रम के बदले निरन्तर
मूल्यांकन
(2) छात्रों के शैक्षिक एवं सह-शैक्षिक पक्षों की
किसी एक क्षमता का व्यापक मूल्यांकन
(3) छात्रों की ज्ञान, समझ, व्याख्या, अनुप्रयोग,
विश्लेषण इत्यादि क्षमता का मूल्यांकन
(4) छात्रों की याद करने की क्षमता का व्यापक
मूल्यांकन
11. निम्नलिखित में से कौन-सा सतत एवं
व्यापक मूल्यांकन का एक उद्देश्य नहीं है?
(1) याद रखने पर बल देने के बदले सीखने की
प्रक्रिया पर बल देना
(2) छात्रों के सीखने की प्रक्रिया एवं परिवेश के
बारे में उपयुक्त निर्णय लेना
(3) अध्यापन एवं अधिगम प्रक्रिया को शिक्षक
केन्द्रित कार्यकलाप बनाना
(4) बोधात्मक, मनोप्रेरक और भावात्मक कौशलों के
विकास में सहायता करना
12. पढ़ाई के दौरान असफल होने वाले
विद्यार्थियों का मूल्यांकन निम्नलिखित में से
किस प्रणाली के तहत होता है?
(1) रचनात्मक मूल्यांकन प्रणाली
(2) योगात्मक मूल्यांकन प्रणाली
(3) निदानात्मक मूल्यांकन प्रणाली
(4) उपरोक्त में से कोई नहीं
13. निम्नलिखित में से कौन-सा मूल्यांकन सत्र
(Session) की समाप्ति के बाद होता है?
(1) योगात्मक मूल्यांकन
(2) रचनात्मक मूल्यांकन
(3) निदानात्मक मूल्यांकन
(4) इनमें से कोई नहीं
14. मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौरान शिक्षकों को
काफी सावधानी बरतने की आवश्यकता
होती है। इस दौरान शिक्षकों को
निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य करना
चाहिए?
(1) छात्रों को फीडबैक उपलब्ध कराना, ताकि वे
बेहतर उग से कार्य कर सकें
(2) छात्रों के बीच तुलना करना
(3) छात्रों के बारे में नकारात्मक बयान देना
(4) शिक्षार्थियों को मन्द, कमजोर, बुद्धिमान आदि
के रूप में वर्गीकृत करना
15. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के बारे में
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन
असत्य है?
(1) सतत और व्यापक मूल्यांकन के सतत पहलू
के अन्तर्गत मूल्यांकन के ‘सतत’ और
‘आवधिक’ पहलू का ध्यान रखा जाता है।
(12) व्यापक संघटक में विद्यार्थियों के विकास के
शैक्षिक और इसके अलावा सह-शैक्षिक पहलुओं
का निर्धारण शामिल है।
(3) इसमें छात्रों की उपलब्धिों का मूल्यांकन अंकों
के रूप में होता है।
(4) इसमें मूल्यांकन की बहुविध तकनीकों का
उपयोग अनौपचारिक रूप से किया जाता है।
16. निम्नलिखित में से कौन-सा सतत एवं
व्यापक मूल्यांकन का एक उपकरण या
साधन है?
A. निरीक्षण
B.प्रश्नावली
C. जाँच सूची
(1) केवल A
(2) केवल B
(3) केवल
(4) उपरोक्त सभी
17. पारम्परिक बाह्य परीक्षा की तुलना में
वर्तमान समय में विद्यालय-आधारित
मूल्यांकन को सुदृढ़ करने की आवश्यकता
क्यों है?
(1) क्योंकि विद्यालय आधारित मूल्यांकन में बच्चों
की सभी योग्यताओं का मूल्यांकन होता है
(2) क्योंकि विद्यालय आधारित मूल्यांकन वर्ष के
अन्त में एक बार होता है, जिससे छात्रों को
सुविधा होती है
(3) क्योंकि विद्यालय आधारित परीक्षा में अंकों के
आधार पर विद्यार्थियों को उत्तीर्ण अथवा
अनुत्तीर्ण किया जाता है
(4) उपरोक्त सभी
18. व्यापक एवं सतत मूल्यांकन के अन्तर्गत
निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य नहीं किया
जाता?
(1) इसमें परीक्षा परिणामों का विश्लेषण और
व्याख्या वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।
(2) इसमें परीक्षा के प्राप्तांकों के आधार पर
विद्यार्थियों को उत्तीर्ण अथया अनुत्तीर्ण किया
जाता है।
(3) इसमें बच्चों पर पड़ने वाले दबाव को कम
(4) मूल्यांकन को व्यापक एवं नियमित बनाया
जाता है।
19. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में निम्नलिखित
में से किसका मूल्यांकन नहीं किया जाना
चाहिए?
(1) छात्रों के विभिन्न विषय दोनों के कौशल
(2) छात्रों के विभिन्न विषय क्षेत्रों में सफलता का
स्तर
(3) छात्रों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति
(4) छात्रों के वैयक्तिक कौशल, रुचि एवं अभिवृति
20. मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौरान शिक्षको को
काफी सावधानी बरतने की आवश्यकता
होती है। इस दौरान शिक्षकों को
निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य नहीं
करना चाहिए?
(1) प्रत्येक विद्यार्थी की अनुक्रिया के बारे में
संवेदनशील होना
(2) बच्चों की प्रगति के बारे में सूचना एकत्र करते
रहना
शिक्षार्थियों को विभिन्न वर्गा में विभाजित कर,
उनके बीच तुलना करना
(4) बच्चों की विभिन्न प्रकार की सूचनाओं को
अभिलेखबद्ध करना
21. सतत एवं मूल्यांकन की निम्नलिखित में से
किस विधि में शिक्षक विद्यार्थी के विभिन्न
तथ्यों जैसे–भाषा के प्रयोग, संवेगात्मकता,
खेल के दौरान व्यवहार इत्यादि को लिखता
है एवं इस तरह एकत्र सूचनाओं के आधार
पर मूल्यांकन करता है?
(1) जाँच-सूची
(2) प्रश्नावली
(3) निरीक्षण
(4) साक्षात्कार
22. निम्नलिखित में से कौन-एक ब्लूम के
ज्ञानात्मक पक्ष के अन्तर्गत आता है?
(1) संश्लेषण
(2) अनुक्रिया
(3) प्रत्यक्षीकरण
(4) ध्यान देना
विगत वर्षों में पूछे गए प्रश्न
23. आकलन को ‘उपयोगी और रोचक प्रक्रिया
बनाने के लिए ………. के प्रति सचेत होना
चाहिए।                      [CTET June 2011]
(1) अलग-अलग विद्यार्थियों में तुलना करना
(2) विद्यार्थियों को बुद्धिमान या औसत शिक्षार्थी की
उपाधि देना
(3) शैक्षिक और सह-शैक्षिक क्षेत्रों में विद्यार्थी के
सीखने के बारे में जानकारी प्राप्त करने के
लिए विविध तरीकों का प्रयोग करना
(4) प्रतिपुष्टि (पीडबैक) देने के लिए तकनीकी
भाषा का प्रयोग करना
24. विद्यालय-आधारित आकलन मुख्य रूप से
किस सिद्धान्त पर आधारित होता है?
                                                 [CTETJan 2012]
(1) आउलन बहुत किफायती (मितव्ययी) होना
चाहिए
(2) बाह्य परीक्षको की अपेक्षा शिक्षक अपने
शिक्षार्थियों की क्षमताओं को बेहतर जानते है
(3) किसी भी कीमत पर विद्यार्थियों को अच्छे) ग्रेड
मिलने चाहिए
(4) विद्यालय, बाह्य परीक्षा निकायों की अपेक्षा
ज्यादा सक्षम हैं
25. सीखने के लिए आकलन निम्नलिखित का
ध्यान है, सिवाय                [CTET Nov 2012]
(1) विद्यार्थियों की आवश्यकताएँ
(2) विद्यार्थियों की कुटियाँ
(3) विद्यार्थियों की अधिगम-शैलियाँ
(4) विद्यार्थियों की क्षमताएँ
26. सतत और व्यापक मूल्यांकन ……….बल
देता है।                          [CTET July 2013]
(1) बोर्ड परीक्षाओं की अनावश्यकता पर
(2) सीखने को सुनिश्चित करने के लिए व्यापक
स्केल पर निरन्तर परीक्षण
(3) सीखने को किस प्रकार अवलोकित कर रिकॉर्ड
को और सुधारा जाए इस पर
(4) शिक्षण के साथ परीक्षाओं का सामंजस्य
27. विद्यालय आधारित आकलन      [CTET July 2013]
(1) शिक्षार्थियों और शिक्षकों को अगम्भीर और
लापरवाह बनाता है
(2) शिक्षा बोर्ड की जवाबदेही कम कर देता है
(3) सार्वभौमिक राष्ट्रीय मानकों की प्राप्ति में बाधा
उत्पन्न करता है
(4) परिचित वातावरण में अधिक सीखने में सभी
शिक्षार्थियों की मदद करता है
28. विद्यालय-आधारित आकलन प्रारम्भ किया
गया था, ताकि                          [CTET Feb 2014]
(1) राष्ट्र में विद्यालयी शिक्षा संगठनों (boards)
की शक्ति का विकेन्द्रीकरण किया जा सके
(2) सभी विद्यार्थियों के सम्पूर्ण विकास को निश्चित
किया जा सके
(3) विद्यार्थियों की उन्नति की बेहतर व्याख्या के
लिए उनकी सभी गतिविधियों के नियमित
अभिलेखन हेतु अध्यापकों को अभिप्रेरित किया
जा सके
(4) विद्यालय अपने क्षेत्रों में विद्यमान अन्य विभिन्न
विद्यालयों की तुलना में प्रतियोगिता द्वारा
अपनी विशिष्टता का प्रदर्शन करने हेतु
अभिप्रेरित हो सके
29. गणित में अधिगम निर्योग्यता का आकलन
निम्न में से किस परीक्षण द्वारा सर्वाधिक
उचित तरीके से किया जा सकता है?
                                                  [CTET Sept 2014]
(1) अभिक्षमता परीक्षण
(2) निदानात्मक परीक्षण
(3) स्क्रीनिंग परीक्षण
(4) उपलब्धि परीक्षण
30. वे शिक्षक, जो विद्यालय आधारित आकलन
के अन्तर्गत कार्य करते है              [CTET Sept 2014]
(1) उन पर अधिक कार्य का बोझ रहता है. क्योंकि
उन्हें सोमवार की परीक्षा सहित अकसर परीक्षा
लेनी पड़ती है।
(2) उन्हें प्रत्येक शिक्षार्थी को प्रत्येक विषय में
परियोजना कार्य देना पड़ता है।
(3) शिक्षार्थियों के मूल्यों और अभिवृत्तियों का
आकलन करने के लिए रोजाना उनका सूक्ष्म
अवलोकन करते हैं।
(4) व्यवस्था के लिए स्वामित्व की भावना रखते हैं।
31. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन किसलिए
आवश्यक है?
[CTET Feb 2015]
(1) शिक्षण के साथ परीक्षण का ताल-मेल बैठाने
के लिए
(2) शिक्षा बोर्ड की जवाबदेही कम करने के लिए
(3) जल्दी-जल्दी की जाने वाली गलतियों की
तुलना में कम अन्तराल पर की जाने वाली
गलतियों को सुधारना
(4) यह समझने के लिए कि अधिगम का किस
प्रकार अवलोकन किया जाता है, दर्ज किया
जाता है व सुधार किया जा सकता है
32. अधिगम में आकलन किसलिए आवश्यक
होता है?                         [CTET Feb 2015]
(1) ग्रेड एवं अंकों के लिए
(2) जाँच परीक्षण के लिए
(3) प्रेरणा के लिए
(4) पृथक्करण और श्रेणीकरण के उद्देश्य को
प्रोत्साहन देने के लिए
33. निम्नलिखित में से कौन-सा आकलन करने
का सर्वाधिक उपयुक्त तरीका है?       [CTET Sept 2015]
(1) आकलन शिक्षण अधिगम में अन्तर्निहित
प्रक्रिया है।
(2) आकलन एक शैक्षणिक सत्र में दो बार करना
चाहिए-शुरू में और अन्त में।
(3) आकलन शिक्षक के द्वारा नहीं, बल्कि किसी
बाह्य एजेन्सी के द्वारा कराना चाहिए।
(4) आकलन सत्र की समाप्ति पर करना चाहिए।
34. आकलन                           [CTET Feb 2016]
(1) बच्चों को लेबल करने (नाम देने) और वर्गीकृत
करने की अच्छी रणनीति है
(2) बच्चों में प्रतियोगितात्मक भावना को सक्रिय
रूप से बढ़ावा देना है
(3) सीखने को सुनिश्चित करने के लिए तनाव
और दबाव को उत्पन्न करना है
(4) सीखने में सुधार का एक तरीका है
35.आकलन उद्देश्यपूर्ण होता है यदि         [CTET Sept 2016]
(1) इससे विद्यार्थियों और शिक्षकों को प्रतिपुष्टि
(फीडबैक) प्राप्त हो
(2) यह केवल एक बार वर्ष के अन्त में हो
(3) विद्यार्थियों की उपलब्धियों में अन्तर करने के
लिए तुलनात्मक मूल्यांकन किए जाएँ
(4) इससे विद्यार्थियों में भय और तनाव का
संचार हो
                                              उत्तरमाला
1. (1) 2. (1) 3. (1) 4. (4) 5. (1) 6. (4) 7. (4) 8. (2) 9. (1) 10. (2)
11. (3) 12. (3) 13. (1) 14.(1) 15. (3) 16. (4) 17. (1) 18. (2) 19. (3)
20. (3) 21. (1) 22. (1) 23. (3) 24. (2) 25 (1) 26. (3) 27. (4) 28. (2)
29. (2) 30. (1) 31.(4) 32. (3) 33. (1) 34. (4) 35. (4)
                                             ★★★

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