बाल विकास के सिद्धान्त

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बाल विकास के सिद्धान्त

 बाल विकास के सिद्धान्त

                   Principles of Child Development
विगत वर्षों के CTET परीक्षा के प्रश्न-पत्रों का विश्लेषण करने
से यह पता चलता है कि इस अध्याय से वर्ष 2011 में 3 प्रश्न,
2012 में 2 प्रश्न, 2013 में 1 प्रश्न, 2014 में 1 प्रश्न, 2015 में
1 प्रश्न प्रश्न पूछे गए हैं। इस अध्याय से बाल विकास के
सिद्धान्तों पर अधिकतम प्रश्न पूछे जाते हैं।
                              2.1 बाल विकास की अवधारणा
बाल-विकास का सामान्य अर्थ होता है-बालकों का मानसिक व शारीरिक
विकास। विकास शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक, भाषायी तथा
धार्मिक इत्यादि होता है। विकास का सम्बन्ध गुणात्मक (कार्य कुशलता, ज्ञान,
तर्क, नवीन विचारधारा) एवं परिमाणात्मक (लम्बाई में वृद्धि, भार में वृद्धि
तथा अन्य) दोनों से है।
शिक्षकों को एक निश्चित आयु के सामान्य बालकों की शारीरिक, मानसिक,
सामाजिक तथा संवेगात्मक परिपक्वता का ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे वे
उनकी क्रियाओं को नियन्त्रित करके अपेक्षित दिशा प्रदान कर सकें।
    स्कीनर के अनुसार, “विकास एक क्रमिक एवं मन्दगति से चलने वाली
प्रक्रिया है।”
हरलॉक के अनुसार, “बाल मनोविज्ञान का नाम बाल विकास इसलिए
रखा गया क्योंकि विकास के अंतर्गत अब बालक के विकास के
समस्त पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, किसी एक पक्ष पर
नहीं।”
क्रो और क्रो के अनुसार, “बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक की वह शाखा
है जिसमें जन्म से परिपक्वावस्था तक विकसित हो रहे मानव का
अध्ययन किया जाता है।”
                           2.2 बाल विकास के सिद्धान्त
बाल विकास के सन्दर्भ में कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का वर्णन निम्न प्रकार से
किया जा रहा है
1. निरन्तरता का सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार विकास ‘एक न रुकने वाली’ प्रक्रिया है। माँ के गर्भ
से ही यह प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है और मृत्युपर्यन्त चलती रहती है। एक
छोटे से नगण्य आकार से अपना जीवन प्रारम्भ करके हम सबके व्यक्तित्व
के सभी पक्षों-शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि का सम्पूर्ण विकास इसी
निरन्तरता के गुण के कारण भली-भाँति सम्पन्न कर सकते हैं।
2. समान प्रतिमान का सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार बालकों का विकास और वृद्धि उनकी अपनी
वैयक्तिकता के अनुरूप होती है। वे अपनी स्वाभाविक गति से ही वृद्धि और
विकास के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ते रहते हैं और इसी कारण उनमें पर्याप्त
विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। किसी के विकास की गति तीव्र और किसी
की मन्द होती है।
        गेसल के अनुसार, “दो व्यक्ति समान नहीं होते, परन्तु सभी बालकों में
विकास का क्रम समान होता है।”
3. विकास क्रम की एकरूपता
यह सिद्धान्त बताता है कि विकास की गति एक जैसी न होने तथा पर्याप्त
वैयक्तिक अन्तर पाए जाने पर भी विकास क्रम में कुछ एकरूपता के दर्शन
होते हैं। उदाहरण के लिए मनुष्य जाति के सभी बालकों की वृद्धि सिर की
ओर प्रारम्भ होती है। इसी तरह बालकों के गत्यात्मक और भाषा विकास में
भी एक निश्चित प्रतिमान और क्रम के दर्शन किए जा सकते हैं।
4. वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक-सी नहीं रहती
विकास की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती तो है, किन्तु इस प्रक्रिया में विकास
की गति हमेशा एक जैसी नहीं होती। शैशवावस्था के शुरू के वर्षों में यह
गति कुछ तीव्र होती है, परन्तु बाद के वर्षों में यह मन्द पड़ जाती है। पुनः
किशोरावस्था के प्रारम्भ में इस गति में तेजी से वृद्धि होती है, परन्तु यह
अधिक समय तक नहीं बनी रहती।
5. विकास सामान्य से विशेष की ओर चलता है
विकास और वृद्धि की सभी दिशाओं में विशिष्ट क्रियाओं से पहले उनके
सामान्य रूप के दर्शन होते हैं। उदाहरण के लिए अपने हाथों से कुछ चीज
पकड़ने से पहले बालक इधर से उधर हाथ मारने या फैलाने की कोशिश
करता है। इसी तरह शुरू में एक नवजात शिशु के रोने और चिल्लाने में
उसके सभी अंग-प्रत्यंग भाग लेते हैं, परन्तु बाद में वृद्धि और विकास की
प्रक्रिया के फलस्वरूप यह क्रियाएँ उसकी आँखों और वाक्तन्त्र (Vocal
System) तक सीमित हो जाती हैं।
6. परस्पर-सम्बन्ध का सिद्धान्त
विकास के सभी आयाम; जैसे- शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक
आदि एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित हैं। इनमें से किसी भी एक आयाम में
होने वाला विकास अन्य सभी आयामों में होने वाले विकास को पूरी तरह
प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उदाहरण के लिए जिन बच्चों में औसत
से अधिक वृद्धि होती है, वे शारीरिक और सामाजिक विकास की दृष्टि से भी
काफी आगे बढ़े हुए पाए जाते हैं। दूसरी ओर, एक क्षेत्र में पाई जाने वाली
कमियाँ दूसरे क्षेत्र में हो रही प्रगति में बाधक सिद्ध होती हैं। यही कारण है कि
शारीरिक विकास की दृष्टि से पिछड़े बालक संवेगात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक
विकास में भी उतने ही पीछे रह जाते हैं।
7. एकीकरण का सिद्धान्त
विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धान्त (Principle of Integration) का
पालन करती है। इसके अनुसार, बालक पहले सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग
के भागों को चलाना सीखता है। इसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना
सीखता है। सामान्य से विशेष की ओर बढ़ते हुए विशेष प्रतिक्रियाओं तथा
कोशिशों को एक साथ प्रयोग में लाना सीखता है।
उदाहरण के लिए, एक बालक पहले पूरे हाथ को, फिर अंगुलियों को फिर हाथ
एवं अँगुलियों को एकसाथ चलाना सीखता है।
8. विकास की भविष्यवाणी की जा सकती है
एक बालक की अपनी वृद्धि और विकास की गति को ध्यान में रखकर उसके
आगे बढ़ने की दिशा और स्वरूप के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है।
उदाहरण के लिए, एक बालक की कलाई की हड्डियों का एक्स किरणों से लिया
जाने वाला चित्र यह बता सकता है कि उसका आकार-प्रकार आगे जाकर किस
प्रकार का होगा? इसी तरह बालक की इस समय की मानसिक योग्यताओं के ज्ञान
के सहारे उसके आगे के मानसिक विकास के बारे में पूर्वानुमान (prediction)
लगाया जा सकता है।
9. विकास की दिशा का सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार, विकास की प्रक्रिया पूर्व दिशा में आगे बढ़ती
है। विकास की प्रक्रिया की यह दिशा व्यक्ति के वंशानुगत एवं वातावरणजन्य
कारकों से प्रभावित होती है। इसके अनुसार बालक सबसे पहले अपने सिर और
हाथों की गति पर नियन्त्रण करना सीखता है और उसके बाद फिर टाँगों को।
इसके बाद ही वह अच्छी तरह बिना सहारे के खड़ा होना और चलना
सीखता है।
10. विकास लम्बवत् सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है
बालक का विकास लम्बवत् सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है। वह एक-सी
गति से सीधा चलकर विकास को प्राप्त नहीं होता, बल्कि बढ़ते हुए पीछे हटकर
अपने विकास को परिपक्व और स्थायी बनाते हुए वर्तुलाकार आकृति की तरह
आगे बढ़ता है। किसी एक अवस्था में वह तेजी से आगे बढ़ते हुए उसी गति से
आगे नहीं जाता, बल्कि अपनी विकास की गति को धीमा करते हुए वर्षों में
विश्राम लेता हुआ प्रतीत होता है ताकि प्राप्त वृद्धि और विकास को स्थायी रूप
दिया जा सके।
11. आंशिक पुनर्बलन का सिद्धान्त
इसके प्रतिपादक जॉन डोलार्ड नील मिलर हैं। पुनर्बलन से यह तात्पर्य है कि
किसी अनुक्रिया (Response) को बार-बार दोहराने की सम्भावना का बढ़ना।
यह सतत पुनर्बलन की अपेक्षा अधिक प्रभावी होता है। चूँकि पुनर्बलन के
माध्यम से नवीन प्रतिक्रियाओं को भी जन्म मिलता है।
12. वृद्धि और विकास की क्रिया वंशानुक्रम और वातावरण का संयुक्त परिणाम है
बालक की वृद्धि और विकास को किसी स्तर पर वंशानुक्रम और वातावरण की
संयुक्त देन माना जाता है। दूसरे शब्दों में, वृद्धि और विकास की प्रक्रिया में
वंशानुक्रम जहाँ आधार का कार्य करता है, वहाँ वातावरण इस आधार पर
बनाए जाने वाले व्यक्तित्व सम्बन्धी भवन के लिए आवश्यक सामग्री एवं
वातावरण जुटाने में सहयोग देता है। अत: वृद्धि और विकास की
प्रक्रियाओं में इन दोनों को समान महत्त्व दिया जाना आवश्यक हो जाता है।
2.3 बाल विकास के सिद्धान्तों का शैक्षिक महत्त्व
बाल विकास के सिद्धान्तों के ज्ञान के फलस्वरूप शिक्षकों को बालकों की
स्वभावगत विशेषताओं, रुचियों एवं क्षमताओं के अनुरूप सफलतापूर्वक
अध्यापन में सहायता मिलती है।
निचली कक्षाओं में शिक्षण की खेल-पद्धति मूलरूप से वृद्धि एवं विकास
के मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है।
बाल विकास के सिद्धान्तों से हमें यह जानकारी मिलती है कि विकास की
किस अवस्था में बालकों में सीखने की प्रवृत्ति किस प्रकार की होती है?
यह उचित शिक्षण-विधि अपनाने में शिक्षकों की सहायता करता है।
• बालकों की वृद्धि और विकास के सिद्धान्तों से बालकों की भविष्य में होने
वाली प्रगति का अनुमान लगाना काफी हद तक सम्भव होता है। इस तरह
बाल विकास के सिद्धान्तों की जानकारी बालकों के मार्गदर्शन, परामर्श एवं
निर्देशन में सहायक होकर उनके भविष्य निर्माण में प्रमुख भूमिका
निभाती है।
• वृद्धि और विकास की सभी दिशाएँ अर्थात् विभिन्न पहलू; जैसे–मानसिक
विकास, शारीरिक विकास, संवेगात्मक विकास और सामाजिक विकास
आदि परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। इस बात का ज्ञान शिक्षकों और
अभिभावकों को बालक के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देने के लिए प्रेरित
करता है।
• बाल विकास के सिद्धान्तों के ज्ञान से बालक की रुचियों, अभिवृत्तियों,
क्षमताओं इत्यादि के अनुरूप उचित पाठ्यक्रम के निर्धारण एवं
समय-सारणी के निर्माण में सहायता मिलती है।
• बालक के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि
उसके व्यवहार की जानकारी शिक्षक को हो तथा बालक के व्यवहार के
बारे में जानने के बाद उसकी समस्याओं का समाधान करना आसान हो
जाता है।
• बाल विकास का अध्ययन शिक्षक को इस बात की स्पष्ट जानकारी दे
सकता है कि बालक की शक्तियों, योग्यताओं, क्षमताओं तथा व्यवहार
एवं व्यक्तिगत गुणों के विकास में आनुवंशिकी तथा वातावरण किस
सीमा तक, किस रूप में उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं? यह जानकारी
शिक्षक को अपने उत्तरदायित्वों का सही ढंग से पालन करने में सहायक
होती है।
• किस अवस्था विशेष में बालक के विकास का क्या सामान्य स्तर होना
चाहिए? इस बात के ज्ञान से अध्यापक को अपने शिक्षण के उचित
नियोजन में पूरी सहायता मिलती है। विकास स्तर की दृष्टि से वह
बालकों को सामान्य, अति सामान्य तथा सामान्य से नीचे जैसी श्रेणियों
में विभाजित कर सकता है तथा फिर उनकी शिक्षा एवं समायोजन
व्यवस्था को उन्हीं के उपयुक्त रूप में ढालने का प्रयत्न कर सकता है।
2.4 बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक
बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को विद्वानों ने दो भागों में
विभाजित किया है, जो निम्न प्रकार है
1. आन्तरिक कारक
2. बाह्य कारक
2.4.1 आन्तरिक कारक
बाल विकास को आन्तरिक कारक बहुत हद तक प्रभावित करते हैं, जो कि
उसके विकास के लिए महत्त्वपूर्ण आधार निर्मित करते हैं। आन्तरिक कारक
निम्न प्रकार से है
• वंशानुगत कारक (Heredity Factor) बालक के रंग-रूप, आकार,
शारीरिक गठन, ऊँचाई इत्यादि के निर्धारण में उसके आनुवंशिक गुणों का
महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। बालक के आनुवंशिक गुण उसकी वृद्धि एवं
विकास को भी प्रभावित करते हैं।
• शारीरिक कारक (Physical Factor) जो बालक जन्म से ही
दुबले-पतले, कमजोर, बीमार तथा किसी प्रकार की शारीरिक समस्या से
पीड़ित रहते हैं, उनकी तुलना में सामान्य एवं स्वस्थ बच्चे का विकास
अधिक होना स्वाभाविक ही है। शारीरिक कमियों का स्वास्थ्य पर ही नहीं
अपितु वृद्धि एवं विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार किसी
दुर्घटना के कारण भी शरीर को क्षति पहुँचती है और इस क्षति का
बालक के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
• बुद्धि (Intelligence) बुद्धि को अधिगम (सीखने) की योग्यता,
समायोजन योग्यता, निर्णय लेने की क्षमता इत्यादि के रूप में परिभाषित
किया जाता है। जिस प्रकार बालक के सीखने की गति अधिक होती है,
उसका मानसिक विकास भी तीव्र गति से होगा। बालक अपने परिवार,
समाज एवं विद्यालय में अपने आपको किस तरह समायोजित
(Adjustment) करता है, यह उसकी बुद्धि पर निर्भर करता है।
• संवेगात्मक कारक (Emotional Factor) बालक में जिस प्रकार के
संवेगों/भावों (Emotions) का जिस रूप में विकास होगा वह उसके
सामाजिक, मानसिक, नैतिक, शारीरिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास को
पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यदि बालक अत्यधिक
क्रोधित या भयभीत रहता है अथवा यदि उसमें ईर्ष्या एवं वैमनस्यता की
भावना अधिक होती है, तो उसके विकास की प्रक्रिया पर इन सबका
प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। संवेगात्मक रूप से असन्तुलित
बालक पढ़ाई में ठीक से ध्यान नहीं दे पाते, फलस्वरूप उनका मानसिक
विकास भी प्रभावित होता है।
• सामाजिक प्रकृति (Social Nature) बच्चा जितना अधिक सामाजिक
रूप से सन्तुलित होगा, उसका प्रभाव उसके शारीरिक, मानसिक,
संवेगात्मक, भौतिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास पर भी उतना ही अनुकूल
पड़ेगा। सामाजिक दृष्टि से कुशल बालक अपने वातावरण से दूसरों की
अपेक्षा अधिक सीखता है।
2.4.2 बाह्य कारक
बालक के विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने में उपरोक्त आन्तरिक कारकों
के साथ ही निम्नलिखित बाह्य कारको (Exernal Factors) की भी महत्त्वपूर्ण
भूमिका होती है
• गर्भावस्था के दौरान माता का स्वास्थ्य एवं परिवेश (Physical Health
of Mother and Environment During Pregnancy) गर्भावस्था में माता
को अच्छा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने की सलाह इसलिए
दी जाती है कि उससे न केवल गर्भ के अन्दर बालक के विकास पर असर
पड़ता है, बल्कि आगे के विकास की बुनियाद भी मजबूत होती है।
• जीवन की घटनाएँ (Events of Life) जीवन की घटनाओं का बालक के जीवन
पर प्रभाव पड़ता है। यदि बालक के साथ अच्छा व्यवहार हुआ है, तो उसके
विकास की गति सही होगी अन्यथा उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जिस
बच्चे को उसकी माता ने बचपन में ही छोड़ दिया हो, वह माँ के प्यार से वंचित हो
जाएगा। ऐसी स्थिति में उसका सर्वांगीण विकास प्रभावित होता है।
• भौतिक वातावरण (Physical Environment) बालक का जन्म किस
परिवेश में हुआ, वह किस परिवेश में किन लोगों के साथ रह रहा है? इन
सबका प्रभाव उसके विकास पर पड़ता है। परिवेश की कमियों, प्रदूषणों,
भौतिक सुविधाओं का अभाव इत्यादि कारणों से भी बालक का विकास
प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है।
• सामाजिक-आर्थिक स्थिति (Socio-Economic State) बालक की
सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का प्रभाव भी उसके विकास पर पड़ता है।
निर्धन परिवार के बच्चे को विकास के अधिक अवसर उपलब्ध नहीं होते।
अच्छे विद्यालय में पढ़ने, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने इत्यादि का
अवसर आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को नहीं मिलता, इसके कारण
उनका विकास सन्तुलित नहीं होता। शहर के अमीर बच्चों को गाँवों के
गरीब बच्चों की तुलना में बेहतर सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण
मिलता है, जिसके कारण उनका मानसिक एवं सामाजिक विकास
स्वाभाविक रूप से अधिक होता है।
2.5 बाल मनोविज्ञान
‘बाल मनोविज्ञान (Child Psychology) मनोविज्ञान की एक शाखा है, जिसके
अन्तर्गत बालकों के व्यवहार, स्थितियों, समस्याओं तथा उन सभी कारणों का
अध्ययन किया जाता है, जिसका प्रभाव बालक के व्यवहार एवं विकास पर
पड़ता है।
इसके अन्तर्गत बालकों के जन्म से लेकर बाल्यावस्था तक का अध्ययन किया
जाता है। यह शिक्षकों को शिक्षण की प्रक्रिया में मदद करता है तथा बालकों
के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है
      क्रो एवं क्रो ने बाल मनोविज्ञान को इस प्रकार परिभाषित किया है, “बाल
मनोविज्ञान एक वैज्ञानिक अध्ययन है, जिसमें बालक के जन्म के पूर्व
काल से लेकर उसकी किशोरावस्था तक का अध्ययन किया जाता है।”
थॉमसन के अनुसार, “बाल मनोविज्ञान सभी को एक नई दिशा में संकेत
करता है। यदि उसे उचित रूप में समझा जा सके तथा उसका उचित
समय पर उचित ढंग से विकास हो सके, तो हर बच्चा एक सफल
व्यक्ति बन सकता है।”
बाल मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्त्व
बाल मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्त्व (Uility and Importance of
Child Psychology) को निम्न प्रकार से समझाया जा सकता है
• बाल मनोविज्ञान के द्वारा बालकों के स्वभाव एवं विकास को समझने के बाद
उनको शिक्षित करने की प्रक्रिया सरल हो जाती है। बाल मनोविज्ञान बालकों के
व्यक्तित्व-विकास को समझने में सहायक होता है।
• बच्चों को समय-समय पर निर्देशन (Direction) की आवश्यकता होती है। इस निर्देशन के द्वारा ही बालकों में उनकी रुचियों के अनुरूप विभिन्न कौशलों
का विकास किया जा सकता है। बाल मनोविज्ञान की सहायता के बिना बाल निर्देशन सम्भव नहीं।
• बाल मनोविज्ञान की सहायता से बालकों के व्यवहार के अध्ययन के बाद विद्यालय एवं घर के वातावरण को बच्चों के अनुकूल उपयुक्त बनाने में सहायता
मिलती है। बाल मनोविज्ञान बालकों के व्यवहार एवं उसके कारणों के बारे में बताता है। इसलिए बालकों की आदतों एवं व्यवहार में सुधार करने में इसकी
प्रमुख भूमिका होती है।
• बाल मनोविज्ञान के जरिए बालक के व्यक्तित्व का अध्ययन कर उसके भविष्य के बारे में बताया जा सकता है एवं आवश्यकता पड़ने पर उसे बेहतर भविष्य
के लिए सलाह दी जा सकती है। बाल मनोविज्ञान का अध्ययन प्राथमिक शिक्षकों के लिए अति आवश्यक है, ताकि वे बालकों को सही तरीके से पढ़ा सके।
                                       अभ्यास प्रश्न
1. “विकास एक क्रमिक एवं मन्द गति से
चलने वाली प्रक्रिया है।” इसका सम्बन्ध
निम्न में से किस विचारक से है?
(1) लास्की
(2) मॉस्लो
(3) स्कीनर
(4) अरस्तू
2. बच्चे के विकास के सिद्धान्तों को समझने में
शिक्षक की सहायता करता है
(1) शिक्षार्थी की आर्थिक पृष्ठभूमि को पहचानने में
(2) शिक्षार्थियों को क्यों पढ़ाना चाहिए यह औचित्य
स्थापित करने में
(क) शिक्षार्थियों की भिन्न अधिगम-शैलियों को
प्रभावी रूप से सम्बोधित करने में
(4) शिक्षार्थी के सामाजिक स्तर को पहचानने में
3. “विकास कभी न समाप्त होने वाली प्रक्रिया
है।” यह विचार किससे सम्बन्धित है?
(1) अन्तःसम्बन्ध का सिद्धान्त
(2) निरन्तरता का सिद्धान्त
(3) एकीकरण का सिद्धान्त
(4) अन्तःक्रिया का सिद्धान्त
4. मानव विकास कुछ विशेष सिद्धान्तों पर
आधारित है। निम्नलिखित में से कौन-सा
मानव विकास का सिद्धान्त नहीं है?
(1) आनुकमिकता
(2) सामान्य से विशिष्ट
(3) प्रतिवर्ती
(4) निरन्तरता
5. बाल विकास का निम्नलिखित में से
कौन-सा सिद्धान्त यह बताता है कि लगभग
बालकों के गत्यात्मक और भाषायी विकास
में एक निश्चित प्रतिमान और क्रम दिखाई
पड़ता है?
(1) निरन्तरता का सिद्धान्त
(2) विकास क्रम की एकरूपता का सिद्धान्त
(3) एकीकरण का सिद्धान्त
(4) विकास की दिशा का सिद्धान्त
6. बाल विकास का कौन-सा सिद्धान्त यह बताता
है कि शारीरिक विकास की दृष्टि से पिछड़े
बालक संवेगात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक
विकास में भी उतने ही पीछे रह जाते हैं?
(1) परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त
(2) विकास क्रम की एकरूपता का सिद्धान्त
(3) एकीकरण का सिद्धान्त
(4) विकास की दिशा का सिद्धान्त
7. बाल विकास का कौन-सा सिद्धान्त यह
बताता है कि जिन बच्चों में औसत से
अधिक वृद्धि होती है, वे शारीरिक,
सामाजिक एवं संवेगात्मक विकास में भी
काफी आगे बढ़े हुए पाए जाते हैं?
(1) परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त
(2) विकास क्रम की एकरूपता का सिद्धान्त
(3) एकीकरण का सिद्धान्त
(4) विकास की दिशा सिद्धान्त
8. बाल विकास का निम्नलिखित में से
कौन-सा सिद्धान्त यह बताता है कि बालक
सबसे पहले अपने सिर और भुजाओं की
गति पर नियन्त्रण करना सीखता है और
उसके बाद फिर अपने पैरों पर?
(1) विकास क्रम की एकरूपता का सिद्धान्त
(2) परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त
(3) विकास की दिशा का सिद्धान्त
(4) एकीकरण का सिद्धान्त
9. बाल विकास का कौन-सा सिद्धान्त यह
बताता है कि एक बालक पहले पूरे हाथ
को, फिर अंगुलियों को और फिर हाथ और
अंगुलियों को एकसाथ चलाना सीखता है?
(1) परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त
(2) सामाजिक अधिगम का सिद्धान्त
(3) एकीकरण का सिद्धान्त
(4) निरन्तरता का सिद्धान्त
10. बाल विकास के विभिन्न सिद्धान्तों के
आधार पर निम्नलिखित में से कौन-सा/से
कथन सत्य है/है?
A.विकास की प्रक्रिया क्रमबद्ध रूप से आगे
बढ़ती है।
B.विकास धीरे-धीरे एवं निश्चित समय पर
होता है।
C.एक ही जाति विशेष के सभी सदस्यों में
विकास की कुछ समान विशेषताएँ दिखाई
पड़ती हैं।
(1) केवल A
(2) A और C
(3) केवल B
(4) ये सभी
11. बाल विकास का निम्नलिखित में से
कौन-सा सिद्धान्त यह बताता है कि बालकों
का विकास उनकी वैयक्तिकता के अनुरूप
होता है?
(1) वैयक्तिक अन्तर का सिद्धान्त
(2) निरन्तरता का सिद्धान्त
(3) विकास क्रम की एकरूपता का सिद्धान्त
(4) परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त
12. बाल विकास के विभिन्न आयामों की
जानकारी शिक्षकों के लिए क्यों आवश्यक है?
A. बालक की समस्याओं का निदान करने
के लिए
B. बालक के लिए उपयुक्त शिक्षण विधि
अपनाने के लिए
C.बालक के लिए उपयुक्त शैक्षिक
वातावरण के निर्माण के लिए
(1) केवल A
(2) केवल B
(3) केवल C
(4) ये सभी
13. निम्नलिखित में से कौन बालक के विकास
को प्रभावित करने वाला आन्तरिक कारक है?
A. बुद्धि
B.शारीरिक कारण
C.आनुवंशिक गुण
(1) केवल A
(2) A और B
(3) केवल C
(4) ये सभी
14. निम्नलिखित में से कौन बालक के विकास
को प्रभावित करने वाला बाह्य कारक है?
A.आर्थिक स्थिति
B.सामाजिक स्थिति
C.जीवन की घटनाएँ
(1) A और B
(2) B और C
(3) A और C
(4) उपरोक्त सभी
15. शिक्षक बाल मनोविज्ञान के ज्ञान द्वारा
बालकों की
A. बुद्धि तथा रुचियों की जानकारी लेकर
शिक्षा देता है।
B. प्रकृति को जानकर शिक्षा देता है।
C.आर्थिक स्थिति तथा पारिवारिक स्थिति की
जानकारी लेकर शिक्षा देता है।
(1) केवल
(2) Bऔर
(3) A और
(4) उपरोक्त सभी
16. शिक्षा मनोविज्ञान एक विज्ञान है
(1) मानव व्यवहार का
(2) मानव सिद्धान्तों का
(3) शैक्षिक सिद्धान्तों का
(4) मानव की व्यक्तिगत विभिन्नताओं का
17. बाल मनोविज्ञान में अध्ययन किया जाता
है
(1) बालक के जन्म से लेकर बाल्यावस्था तक
का
(2) बातक के जन्म के पूर्व गर्भावस्था से
लेकर किशोरावस्था तक का
(3) बालक के जन्म से लेकर मौदावस्था तक
का
(4) बालक के जन्म से लेकर युवावस्था तक
का
18. बाल मनोविज्ञान का अध्ययन
निम्नलिखित में से किसके लिए
सर्वाधिक आवश्यक है?
(1) माध्यमिक शिक्षक के लिए
(2) विश्वविद्यालय के शिक्षक के लिए
(3) प्राथमिक शिक्षक के लिए
(4) उपरोक्त सभी के लिए
19. बालक के व्यक्तित्व के सर्वांगीण
विकास के लिए यह आवश्यक है कि
उसके ………. की जानकारी शिक्षक को
हो।
(1) मित्रों
(2) व्यवहार
(3) ज्ञान
(4) कक्षा के साथियो
20. निम्नलिखित में से किसे बाल
मनोविज्ञान की उपयोगिता के अन्तर्गत
नहीं रखा जा सकता है?
(1) बालक के भविष्य के बारे में पूर्वकथन में
सहायक
(2) बाल निर्देशन में सहायक
(3) शिक्षक की आर्थिक प्रगति में सहायक
(4) बालकों के व्यक्तित्व विकास को समझने
में उपयोगी
                    विगत वर्षों में पूछे गए प्रश्न
21. निचली कक्षाओं में शिक्षण की खेल-पद्धति
मूल रूप से आधारित है              [CTET June 2011]
(1) शारीरिक शिक्षा कार्यक्रमों के सिद्धान्तों पर
(2) शिक्षण पद्धतियों के सिद्धान्तों पर
(3) विकास एवं वृद्धि के मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर
(4) शिक्षण के समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों पर
22. निम्न में से कौन-सा बच्चे की
सामाजिक मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के
साथ सम्बद्ध नहीं है?                    [CTET June 2011]
(1) सामाजिक अनुमोदन अथवा सराहना की
आवश्यकता
(2) संवेगात्मक सुरक्षा की आवश्यकता
(3) शरीर से अपशिष्ट पदार्थों का नियमित रूप से
बाहर निकलना
(4) सानिध्य (संगति) की आवश्यकता
23. “विकास कभी न समाप्त होने वाली प्रक्रिया
है।” यह विचार किससे सम्बन्धित है?        [CTET June 2011]
(1) अन्तःसम्बन्ध सिद्धान्त
(2) निरन्तरता का सिद्धान्त
(3) एकीकरण का सिद्धान्त
(4) अन्तःक्रिया का सिद्धान्त
24. निम्नलिखित में से कौन-सा विकास का
सिद्धान्त है?                                             [CTET Jan 2012]
(1) विकास की सभी प्रक्रियाएँ अन्तःसम्बनिधत नहीं है
(2) सभी की विकास-दर समान नहीं होती है
(3) विकास हमेशा रेखीय होता है
(4) यह निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया नहीं है
25. आंशिक पुनर्बलन                                 [CTET Nov 2012]
(1) वास्तविक क्क्षा-वक्ष में अनुपयुक्त नहीं किया जा
सकता
(2) पशुओं को प्रशिक्षित करने में सर्वाधिक कार्य
करता है
(3) सतत पुनर्बलन की अपेक्षा अधिक प्रभावी होता है
(4) सतत पुनर्बलन की अपेक्षा कम प्रभावी होता है
26. निम्नलिखित में से कौन-सा
कथन सत्य है?
(1) शिक्षक द्वारा प्रश्न पूछना संज्ञानात्मक विकासमा
बाधक है।
(2) विकास और सीखना समाज-सांस्कृतिक सन्दर्भ
से अप्रभावित रहते है।
(3) शिक्षार्थी एक निश्चित तरीके से सीखते है।
(4) खेलना संज्ञान और सामाजिक दक्षता के लिए
सार्थक है।
27. पूर्व विद्यालय में पहली बार आया बालक
मुक्त रूप से चिल्लाता है। दो वर्ष पश्चात्
वही बच्चा जब प्रारम्भिक विद्यालय में पहली
बार जाता है, तो अपना तनाव चिल्लाकर
व्यक्त नहीं करता अपितु उसके कन्धे व गर्दन
की पेशियाँ तन जाती है। उसके इस
व्यावहारिक परिवर्तन का क्या सैद्धान्तिक
आधार हो सकता है?           [CTET Feb 2014]
(1) विकास क्रमिक प्रकार से होता है।
(2) विकास निरन्तरीय होता रहता है।
(3) अलग-अलग लोगों में विकास भी भिन्न रूप से
होता है।
(4) विभेद व एकीकरण विकास के लक्षण हैं।
28. निम्नलिखित में से कौन-सा बाल विकास का
एक सिद्धान्त नहीं है? ICTET Sept 2015)
(1) विकास के सभी क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं।
(2) सभी विकास परिपक्वन तथा अनुभव की
अन्त: क्रिया का परिणाम होते हैं।
(3) सभी विकास तथा अधिगम एकसमान गति से आगे
बढ़ते हैं।
(4) सभी विकास एक क्रम का पालन करते हैं।
                                      उत्तरमाला
1. (3) 2. (3) 3. (2) 4. (3) 5. (2) 6. (1) 7. (1) 8 (3) 9. (3) 10. (4)
11. (1) 12. (4) 13. (4) 14. (4) 15. (4) 16. (1) 17. (1) 18. (3)
19. (2) 20. (3) 21. (3) 22. (3) 23 (2) 24. (2) 25. (3) 26. (4)
27. (4) 28. (3)
                                                ★★★

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