बिहार के ग्रामीण श्रमिकों की समस्याएं

बिहार के ग्रामीण श्रमिकों की समस्याएं

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद समाजवादी ढांचे के समाज की स्थापना के संकल्प के साथ गठित विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण श्रमिकों, खासकर खेतिहर श्रमिकों, की दशा सुध गरने के लिए लगातार कार्यक्रम तय किये जाते रहे हैं। इतना ही नहीं, उनके भौतिक हालात की जानकारी के लिए राष्ट्रीय आयोग भी गठित किये जाते रहे हैं। इधर एक दशक से चलाए जा रहे उदारीकरण के दौर में भी समाज के सभी तबकों की जीवन पद्धति में विकास की नयी अवधारणाओं को स्थापित करने के प्रयास जारी हैं। बावजूद सारे प्रयासों के खेतिहर श्रमिकों के जीवन में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहे हैं। आज भी खेतिहर श्रमिक रोजी-रोटी, स्वास्थ्य, आवास जैसी समस्याओं के चलते बेहाल हैं और इन समस्याओं से त्राण की आस लगाए महानगरों तथा विकसित राज्यों में उनका बड़े पैमाने पर पलायन जारी है।
कृषि श्रम जांच आयोग, 1960 की रपट के अनुसार साठ के दशक में कुल ग्रामीण परिवारों में कृषिक श्रमिक परिवारों की संख्या 25 प्रतिशत थी और उनमें से 85 प्रतिशत स्वतंत्र मजदूर तथा 15 प्रतिशत बंधुआ मजदूर थे। ग्रामीण श्रम से संबंधित
राष्ट्रीय आयोग के अनुसार 70 और 80 के दशक में जनसंख्या में क्रमश: 2 प्रतिशत और 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि कृषि श्रमिकों की संख्या में क्रमश: 4.1 प्रतिशत था 3.0 प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई है।
2001 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार देश में कृषि मजदूरों की संख्या 63,497,114 थी जिनमें 4,61,64,747 पुरुष तथा 22,378045 महिला कृषि मजदूर हैं। इस प्रकार उत्तरोत्तर कृषि श्रमिकों को संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। जनसंख्या वृद्धि के
अनुपात में कृषि श्रमिकों की संख्या में आनुपातिक वृद्धि ज्यादा है। जनसंख्या वृद्धि के अलावा श्रमिकों की संख्या वृद्धि को बल इस बात से भी मिल रहा कि रोजगार सृजन की गति धीमी है और रोजगार सृजन करने वाले कार्यक्रमों का लाभ पूरी तरह
ग्रामीण श्रमिकों को नहीं मिल रहा है। इतना ही नहीं, उदारीकरण के दौर में ग्रामीण अर्थव्यवस्था उपेक्षित है। कृषि, ग्रामीण कुटीर उद्योग धंधों की दशा दयनीय है और यही परिस्थिति ग्रामीण श्रमिकों के पलायन को बढ़ावा दे रही है। आयोग का भी मानना है कि कृषि के आधुनिकीकरण के तहत यांत्रिक प्रयोग परंपरागत कुटीर उद्योग की समाप्ति, मुद्रास्फीति, छोटे किसानों का सीमांत किसान बनते जाना जैसे कारणों के परिणामस्वरूप कृषि श्रमिकों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है। आयोग ने सीमांत कृषकों का कृषि श्रमिकों में शामिल होने तथा जनसंख्या वृद्धि को भी ग्रामीण खेतिहर श्रमिकों की संख्या में वृद्धि का
कारण माना है।
भारत के तीसरे सर्वाधिक आबादी वाले प्रांत बिहार के ग्रामीण श्रमिकों की स्थिति देश में सर्वाधिक दयनीय है। रोजी-रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य, कुपोषण, आवास सहित सभी क्षेत्रों में यहां मजदूरों की स्थिति अत्यंत, दयनीय है यही कारण है कि बिहार से सर्वाधिक मजदूरों का पलायन होता है। मजदूरों की माली हालत सुधारने के आश्वासनों तथा रोजगार कार्यक्रमों के प्रयास के बाद भी तस्वीर काफी चिंताजनक है। बिहर के श्रमिकों की बदतर दशा चर्चा का विषय बनी रहती है। न केवल हरियाणा, पंजाब बल्कि दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, यहां तक कि मणिपुर, अरुणाचल तथा असम जैसे राज्यों में बिहार से पलायन कर पहुंचे श्रमिक मिल जाएंगे। ये वही मजदूर हैं जो अपने मूल गांव में कृषि कार्य से जुड़े होते हैं और कृषि क्षेत्र में बाढ़-सुखाड़,
उचित मजदूरी नहीं मिलने तथा गैरकृषि मौसम में भी काम के अभाव में रोजगार की तलाश में बाहर निकल जाते हैं।
2001 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार बिहार में कृषि मजदूरों की संख्या 90,20,151 थीं। रोजी-रोजगार के ठोस अवसर नहीं होने के कारण इन मजदूरों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों के जिन बच्चों को विद्यालयों में होना चाहिए। वे जानलेवा श्रम करने को विवश होते हैं। अन्य महिलाओं की बात दूर,  जिन महिलाओं को आराम करना चाहिए, वे गर्भवती महिलाएं भी अपने अभिभाहक की अनुपस्थिति में भारी से भारी कार्यों को पूरा कर बच्चों का पेट पालती है।
बिहार में पर्याप्त एवं उन्नत किस्म की कृषि भूमि है। यहां पंजाब तथा हरियाणा जैसे उन्नत प्रांतों जैसी उपजाऊ भूमि है। अंग्रेज जॉन इंटर तथा संसदीय समिति ने भी यहां की मिट्टी को सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी बतलाया है। बिहार में, पर्याप्त जलस्रोत भी हैं। गंगा, कोसी, घाघरा, बागमती, बूढी गंडक, कमला, अधवारा समूह सहित सैकड़ों नदियां हैं जो हिमालय से निकलती हैं और
उनमें सालभर जल का प्रवाह मौजूद होता है। उत्तर बिहार में जमीन के नीचे का जलस्तर भी काफी ऊपर है जिसमें कम लागत में पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध हो सकती है। इन सभी स्रोतों के बावजूद इस क्षेत्र का मात्र 28 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है। जबकि अपर्याप्त जलस्रोत होने के बावजूद हरियाणा तथा पंजाब का संपूर्ण कृषि क्षेत्र सिंचित है। इतना ही नहीं, देश के सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में से 64.61 लाख हेक्टेयर क्षेत्र यानी देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का 16 प्रतिशत बिहार में है। इसमें भी अकेले उत्तर बिहार में कुल 58.81 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल का 44.47 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है, यानी उत्तर बिहार का 76 प्रतिशत भाग बाढ़ प्रभावित है।
यहां उन्नत खाद और बीज समय से उपलब्ध नहीं हो पाता है। व्यवसायी खाद-बीज का बनावटी अभाव पैदा कर किसानों से नाजायज पैसे वसूलते हैं। इतना ही नहीं नकली सामग्रियों की आपूर्ति भी की जाती है। संपूर्ण राज्य में घोर विद्युत संकट व्याप्त
रहता है। राज्य में बैंकों का विस्तार अवश्य हुआ है, परंतु इनका लाभ अधिकांश व्यवसायी वर्ग तथा कुछ संपन्न किसानों को ही मिल पाता है। इस प्रकार छोटे तथा सीमांत कृषक परिस्थितियों की मार से खेतिहर श्रमिक बनते जा रहे हैं। राज्य के संपूर्ण कृषि क्षेत्र को सिंचाई, बिजली, आधुनिक कृषि यंत्र तथा बाजार उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। दुर्भाग्य है कि मिट्टी जांच तक की व्यवस्था जिला मुख्यालय में नहीं है, परिणामस्वरूप कृषि क्षेत्र में रोजी-रोजगार के अभाव और समुचित मजदूरी नहीं मिलने के कारण मजदूरों का पलायन हो रहा है। छोटे कृषक भी मजदूरों की संख्या में इजाफा कर रहे हैं।
इस स्थिति पर ग्रामीण श्रम पर राष्ट्रीय आयोग की टिप्पणी है कि कृषि में नयी टेक्नोलॉजी बाजार प्रेरित और पूंजी प्रधान होने के कारण मुख्यत: बड़े किसानों के पक्ष में है, छोटे किसानों के पास न तो आवश्यक संसाधन हैं और न ही वे आवश्यक जानकारी
और जोखिम सहन करने की शक्ति रखते हैं। नई तकनीक अपनाने में वे पिछड़ गये हैं अत: छोटे किसान बड़े किसानों की तुलना में अलाभकर स्थिति में हैं और कई बार आर्थिक दबाव उन्हें बाध्य कर देते हैं कि वे कृषि श्रमिकों की बढ़ती हुई सेना में शामिल हो जाएं।
केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने भी गैर-बराबरी मिटाने, पिछड़े तथा दलितों की माली हालत सुधारने, भूमि सुधार लागू करने के तहत हदबंदी कानूनों को अमल में लाने पर जोर दिया है, 1948 में कानून बनने के बावजूद भूमि सुधार अभी तक आंशिक रूप से लागू हो सका है। यहां के अधिकांश खेतिहर मजदूर भूमिहीन हैं तथा कुछ ऐसे भी मजदूर हैं जिनके पास रहने के लिए भी अपनी भूमि नहीं है। वे सड़कों के किनारे गैर-मजरूआ भूमि पर जिस तिस ढंग से गुजारा कर राज्य के परंपरागत कुटीर उद्योग पूंजी संकट, प्रशिक्षण, बाजार का संकट तथा वैश्वीकरण की मार से समाप्त हो रहे हैं। परंपरागत कुटीर उद्योग खेती
से इतर समय में बड़े सहायक होते थे। बढ़ईगिरी, लोहरगिरी, कुंभकारी, रस्सी, डलिया, टोकरी, गुड़ बनाना, कशीदाकारी, रंगरेजी, चटाई, पत्ता बनाना, मूर्तिकारी इत्यादि कार्यों में काफी रोजगार तथा नकदी आय की गुंजाइश रहती थी। संरक्षण तथा सुविधा के अभाव में ये सभी उद्योग-धंधे लुप्त होते जा रहे हैं और बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है, अज्ञानता भी इन मजदूरों की बदहाली में काफी सहायक बनती है। गांवों में खासकर पिछड़े, अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय में शिक्षा का घोर अभाव है। अनुसूचित जाति-जनजाति में साक्षरता का प्रतिशत 19.49 है। महिला साक्षरता का प्रतिशत तो बिल्कुल नहीं के बराबर है। अज्ञानता के कारण भी राज्य के दलित तथा पिछड़े वर्ग के ग्रामीण मजदूर अपना हक पाने में विफल होते हैं।
रोजी-रोजगार प्रदान करने हेतु केंद्र सरकार द्वारा जवाहर ग्राम समृद्धि योजना, स्वर्णजयंती ग्राम, स्वरोजगार योजना, सुनिश्चित रोजगार योजना, सघन रोजगार योजना जैसे कई महत्वाकांक्षी कार्यक्रम प्रारंभ कर इन पर काफी राशि आबंटित की जाती है। परंतु कुछ अपवादों को छोड़कर इन योजनाओं की राशि रोजगार के अवसर प्रदान करने के बजाय अधिकारियों तथा ठेकेदारों के पास पहुंच रही है। अन्य योजनाओं में बैंको के अधिकारियों तथा दलालों के कारण योजना अपने उद्देश्यों से भटकती
दिखती है।
खेतिहर मजदूरों की मौजूदा परिस्थितियों के लिए मजदूरों का कम मिलना भी महत्वपूर्ण कारण है। न्यूनतम मजदूरी भी संपूर्ण राज्य में समान स्तर पर नहीं मिल पाती है तथा कहीं-कहीं आज भी परंपरागत मजदूरी पर कार्य करना मजदूरों की विवशता है। बिहार के बड़े हिस्से में खेती की दयनीय स्थिति के कारण किसानों की बदहाली उन्हें न्यूनतम मजदूरी प्रदान करने की शक्ति नहीं देती है, न ही इस दिशा में सरकारी स्तर पर कोई समन्वित मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित किया गया है। स्वाभाविक है कि कृषि श्रमिकों की दशा में अपेक्षित सुधार नहीं होने की स्थिति में कृषि मजदूरों की बेरोजगारी तथा पलायन दोनों में इजाफा होगा।
बिहार के पिछड़े ग्रामीण श्रमिकों की स्थिति सुधारने के लिए सरकार को आधुनिक कृषि तकनीक के लाभ को छोटे तथा सीमांत किसानों तक पहुंचाना आवश्यक है। उपलब्ध जल स्रोत के उपयोग तथा सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ शत्-प्रतिशत खेती को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराकर उन्नत खाद-बीज, कृषि संयंत्र प्रत्येक किसान के दरवाजे पर उपलब्ध कराना होगा। कृषि साख प्रदान करने वाले सभी बैंकिंग संस्थानों को छोटे तथा सीमांत किसानों से जोड़ने की सरकारी नीति पर अमल की दिशा में सरकार को विशेष ध्यान देना होगा। किसान क्रेडिट कार्ड योजना एक अच्छा प्रयास है परंतु बिहार में इस दिशा में
बैंकों का रवैया काफी निराशाजनक है।
सहकारी बैंकों के माध्यम से किसान क्रेडिट कार्ड के मापदंड के नीचे से किसानों को प्राथमिक कृषि साख सहयोग समिति के माध्यम से मिलने वाले छोटे ऋण प्रदान करने की प्रक्रिया बंद होने से खेतिहर मजदूर जो बहुत कम जमीन वाले हैं, उनके
लिए ऋण प्राप्त करना बहुत मुश्किल हो गया है। इस प्रक्रिया से खेतिहर श्रमिक भी प्रभावित हो रहा है। बैंक ऋण की उपलब्धता से कृषि को बढ़ावा मिलेगा, रोजगार में वृद्धि होगी और किसानों के मजदूरी भुगतान की ताकत बढ़ेगी। ग्रामीण कुटीर उद्योगों को जीवंत बनाने हेतु जवाहर ग्राम समृद्धि तथा स्वर्णजंयती ग्राम स्वरोजगार योजना के मार्फत ऋण मुहैया कराकर रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। कच्छप गति से लागू किये जा रहे भूमि सुधार को शक्ति से लागू कर (आवश्यकतानुसार पुराने कानूनों में सुधार कर) अतिरिक्त भूमि भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को आबंटित की जानी चाहिए।
रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जा सकती है। सरकार द्वारा ग्रामीण खेतीहर श्रमिकों को रोजगार प्रदान करने तथा उनके उन्नयन हेतु चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों के अनुपालन पर कड़ी नजर रखी जाये तथा विभिन्न कार्यक्रमों के लिए पंचायत, प्रखंड तथा जिलास्तर पर विभिन्न कोटि के मजदूरों के प्रतिनिधियों के साथ एक निगरानी समिति गठित की जाये। प्रशासनिक अधिकारियों को कड़े आदेश दिये प्रशासनिक अधिकारियों को कड़े आदेश दिए जाये कि वे अपने दायित्वों के प्रति सावधान रहें। भुखमरी, रोजगार के अभाव तथा पलायन रोकने के लिए गांवों में जाकर उन्हें योजनाओं के उद्देश्यों बताएं तथा रोजगार के अवसर प्रदान करें। इन प्रक्रियाओं से जहां उत्पादन में बढ़ोत्तरी होगी वहीं रोजगार वृद्धि के साथ पलायन भी रुकेगा।
ग्रामीण श्रम पर राष्ट्रीय आयोग ने भी कृषि श्रमिकों की दशा सुधारने के लिए कई सुझाव दिये हैं। आयोग ने सिंचाई, जल निकासी, बाढ़ नियंत्रण, ग्रामीण विद्युत आपूर्ति, सुखाड़ से कृषि की मुक्ति आवश्यक बताया है, इतना ही नहीं, रोजगार जनक कार्यक्रम चलाने की भी जरूरत बताई है। कृषि श्रमिकों को वास की भूमि उपलब्ध कराने को भी आवश्यक बताया गया है।
रोजगार की सुरक्षा, काम के घंटे, न्यूनतम मजदूरी का भुगतान और विवादों के निष्पादन के लिए मशीनरी की व्यवस्था तथा केंद्र एवं राज्यस्तर पर ग्रामीण श्रम के लिए पृथक विभाग की स्थापना जाये तथा उसके स्थानीय स्तर के भी अधिकारी की
नियुक्ति की जाये। कृषि श्रमिकों को मजदूर संघों की स्थापना का प्रावधान किया जाये। कृषि श्रम कल्याण कोष की स्थापना की भी सिफारिश की गयी है। प्रसूति अवकाश, वृद्धावस्था पेंशन, मृत्यु एवं चोट पर क्षतिपूर्ति की व्यवस्था का भी जिक्र है तथा
कल्याण कोष के लिए राज्य तथा केंद्र से आधी-आधी राशि ली जाये। आयोग की सिफारिशों को श्रम मंत्रियों के 42वें सम्मेलन में राज्य के श्रम मंत्रियों को भी वितरित कर उनकी राय मांगी गयी इस प्रकार आयोग द्वारा कृषि श्रमिकों के हितों में महत्वाकांक्षी सुझाव दिये गये हैं। इस दिशा में कारगर कार्रवाई से श्रमिकों की दशा सुधारने, पलायन रोकने के साथ श्रमिकों को कृषि तथा राज्य के विकास से सीधा जोड़ा जा सकेगा। छोटे तथा सीमांत कृषकों को उन्नत कृषि का लाभ मिलने से कृषि
श्रमिकों को रोजगार मिलेगा तथा बेरोजगारी घटेगी। आयोग तथा सुझावों के गत वर्षों में किये गये सरकारी प्रयासों की भी समीक्षा आवश्यक है जिससे सरकारी कार्यक्रमों को लागू करने में बरती गयी उदासीनता का भी पता चल सकेगा। राज तथा
समाज के विकास की बुनियाद खेतिहर श्रमिकों की दशा सुधारने तथा मजदूरों को राजनीतिक इस्तेमाल से बचाने के लिए भी आबादी के इस बड़े तबके को उत्पादन तथा विकास से सीधा जोड़ना आवश्यक है।

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