बिहार में पंचायती राज और महिला भागीदारी

बिहार में पंचायती राज और महिला भागीदारी

बिहार सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद 3 फरवरी, 2002 के पंचायतीराज चुनाव की घोषणा करने तथा 6 चरणों में 11 से 30 अप्रैल, 2002 के बीच 38 जिलों में त्रिस्तरीय पदों के लिए मतदान कराने तथा इसमें बड़ी संख्या में महिलाओं के चुने जाने के बाद महिलाओं की सामाजिक सक्रियता एवं भूमिका में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है।
स्मरणीय है कि बिहार विभाजन के बाद 65 प्रतिशत आबादी बिहार में रही जबकि मात्र 35 प्रतिशत झारखंड के हिस्से में आई। दूसरी तरफ 67 प्रतिशत राजस्व स्रोत झारखंड में चले गए जबकि 33 प्रतिशत ही बिहार में बचे रहे। अप्रैल 1993 में पारित किए गए 73वें संविधान संशोधन का मकसद पंचायत. स्तरीय अनियमित चुनाव पद्धति को समाप्त करना और पंचायतों को नागरिकों के प्रति पूर्ण जवाबदेह बनाते हुए उनमें महिलाओं एवं कमजोर वर्गों की उचित भागीदारी सुनिश्चित करना हैं। उल्लेखनीय है कि इस संविधान संशोधन के परिणामस्वरुप पहली बार बिहार के पंचायतीराज चुनावों में महिलाओं को लगभग 33 प्रतिशत स्थान मिला। ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों एवं जिला परिषदों के त्रिस्तरीय स्वशासन के चुनाव में राज्य
के 38 जिलों में कुल 1,37,239 सदस्य निर्वाचित हुए, जिनमें महिला प्रतिनिधियों की संख्या 44,824 थी। राज्य की 8,438 ग्राम पंचायतों के लिए कुल निर्वाचित ।,16,028 सदस्यों में महिला सदस्यों की संख्या 40,472 थी। ग्राम पंचायत में वार्ड सदस्यों
एवं पंचायत समिति के सदस्य के पद पर जहाँ आरक्षण की व्यवस्था थी, वहीं मुखिया के पद पर महिलाओं एवं कमजोर वर्गों को कोई आरक्षण नहीं मिला। इस कारण सामाजिक सत्ता एवं विकास में भागीदारी महिलाओं एवं कमजोर वर्गों के हाथों में
समुचित ढंग से नहीं जा पाई, लेकिन इससे भविष्य की ओर उन्मुख एक दरवाजा तो खुल ही गया। राज्य के 38 जिलों में जिला परिषद सदस्यों की कुल संख्या, 1,162 थी, जिनमें 398 स्थानों से महिला प्रतिनिधि निर्वाचित हुई। इसी तरह प्रखंड स्तर पर
निर्मित 529 पंचायत समितियों के लिए कुल 11611 प्रतिनिधियों में महिला प्रतिनिधियों की संख्या 3454 थी।
इतनी बड़ी संख्या में पंचायतीराज चुनाव प्रक्रिया में महिलाओं के भाग लेने एवं पंचायतों, प्रखंडों और जिला स्तरीय स्वशासन में उनकी सक्रियता, अर्द्धसक्रियता एवं निष्क्रियता के कारणों की खोज करना भी दिलचस्प होगा। विगत पंचायतीराज चुनाव के सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि जिन जिलों में साक्षरता अभियान तीव्र चला और उनमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही, वहां
चुनाव में एवं उसके बाद स्थानीय स्वशासन में महिला प्रतिनिधियों की जबर्दस्त भूमिका रही है। उदाहरण के लिए बेगूसराय जिले को लिया जा सकता है। यहां जिला परिषद में साक्षरता से जुड़ी छह महिला प्रतिनिधियों ने चुनाव में जीत हासिल की। इनमें से तीन अनारक्षित स्थानों से जीतीं। उषा देवी जो एक दलित महिला हैं, बेगूसराय साक्षरता समिति के महत्वपूर्ण पद पर रहीं और आज जिला परिषद की उपाध्यक्ष हैं।
बिहार जैसे अल्पसाक्षर, सामंती संरचना वाले और भौतिक विकास के क्षेत्र में पिछड़े राज्य में । पंचायतीराज चुनाव में महिलाओं का पार्षद पदों पर अनारक्षित चुना जाना, यहां की महिला जागरुकता का नए सिरे से मूल्यांकन के लिए मजबूर करता है।
जिन जिलों में साक्षरता दर अधिक रही, महिला साक्षरता की तुलनात्मक स्थिति सुदृढ़ रही एव सामाजिक संघर्ष तीव्र रहा है, वहां स्थानीय स्वशासन के प्रति सक्रिय एवं राजनीतिक दृष्टि से सचेत महिलाओं की ज्यादा हिस्सेदारी हुई है। जहां निरक्षरता अधिक है या सामंती जकड़न ज्यादा मजबूत है, वहां पुरुषवादी समाज ने हथकंडे के रुप में महिलाओं का चुनावी प्रयोग किया है।
स्थानीय स्वशासन में महिला प्रतिनिधियों की अर्द्धसक्रियता एवं निष्क्रियता के कई कारण हैं। बिहार का समाज खासकर ग्रामीण समाज, स्वाधीनता के 55 वर्षों बाद भी आधुनिक नहीं हो पाया है। भूमि समस्या जहां महिलाओं एवं कमजोर वर्गों के शोषण की आधारशिला है, वहीं इस राज्य का औद्योगिक दृष्टि से अति पिछड़ा होना भी इस समस्या का मूलाधार है। आबादी के हिसाब के कृषि योग्य भूमि नहीं होने से बेरोजगार नौजवानों एवं उनकी महिलाओं का पलायन जारी है।
उत्तर बिहार में अनेक ऐसी पंचायतें मिल जाएंगी जहां घरों में केवल महिलाएं, बच्चे और बूढ़े हैं। मर्दो का बड़ा हिस्सा रोजी-रोटी की जुगाड़ में दिल्ली जैसे महानगरों और पंजाब जैसे समृद्ध राज्यों की ओर चला गया है। इसके अतिरिक्त, महिला साक्षरता
की नाजुक स्थिति तथा समाज एवं सत्ता का अपराधीकरण भी स्थानीय स्वशासन में महिलाओं की भागीदारी या भागीदारी के बावजूद उनकी सक्रियता को रोकता है।
सबसे पहले ग्राम पंचायतों में महिला प्रतिनिधियों की भूमिकाओं एवं समस्याओं पर विचार किया जाना चाहिए। इन्हीं भूमिकाओं की सफलता असफलता से उनकी समस्याओं और चुनौतियों का भी पता चलता है। पंचायत स्तर पर महिलाओं को वार्ड
सदस्यों के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण मिला है। इस तरह ग्राम पंचायत समिति में एक तिहाई महिलाएं आई हैं। किसी भी योजना एवं कार्यक्रम को पारित करने में चूंकि आधे से अधिक मत की जरूरत पड़ती है, इसलिए क्रांतिकारी परिवर्तन वाले मुद्दों का पारित होना प्राय: असंभव हो जाता है। दूसरी बात, मुखिया (प्रधान) का पद अनारक्षित होने से बिहार बराबर है।
मुखिया का पद चूंकि सामाजिक दृष्टि से काफी प्रभावी होता है। इसलिए पुरुष वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं की मांगों का तुरंत सफल होना कठिन होता है। तीसरी समस्या यह है कि वार्ड से चुनी गई महिलाएं अधिकांशतः घरेलू, कामकाजी और अल्पसाक्षर होती हैं। जो महिला सदस्य थोड़ी जागरुक व सक्रिय होती हैं, वे पंचायत के कार्यों में, खासकर वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, राशनिंग तथा महिला विकास से जुड़ी योजनाओं में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाती हैं। लेकिन ऐसा भी मामला
सामने आया है कि अंगूठा छाप या मात्र हस्ताक्षर करने वाली महिला सदस्य अपने पति के सामाजिक वर्चस्व के कारण जीत तो गई लेकिन उसके बाद उसका पति ही अपने हित एवं दिमाग के हिसाब से उसके पद का इस्तेमाल करता है। इसलिए पंचायतों में महिला शिक्षा, राजनीतिक जागरुकता, महिला अधिकार और दहेज प्रथा पर पूर्ण व्यावहारिक प्रतिबंध एवं महिलाओं को टिकाऊ रोजगार उपलब्ध कराए बिना उनके पूर्ण सशक्तीकरण का सपना पूरा नहीं हो सकता। लेकिन यह भी सच है कि महिलाओं की उपर्युक्त समस्याओं के समाधान में पंचायती की अहम भूमिका होगी।
किंतु बिहार जैसे राज्य में महिलाओं का पंचायती व्यवस्था में सक्रिय होना आग के दरिया में कूद पड़ने जैसा है। फिर भी वे जनतांत्रिक व्यवस्था के इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्तर पर चुनौतियों और समस्याओं को स्वीकार कर आगे बढ़ रही हैं। ग्राम पंचायतों से ज्यादा संघर्ष महिलाओं को प्रखंड स्तरीय पंचायत समिति एवं जिला स्तरीय जिला परिषद में करना पड़ता है। ग्राम पंचायत में पंचायत समिति के लिए निवाचित महिला सदस्य मुखिया और प्रमुख दोनों की आंखों की किरकिरी बन जाती है। इसका कारण उनका अधिकार क्षेत्र है। वस्तुतः पंचायत समिति सदस्य को प्रखंड एवं ग्राम पंचायत के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बनाया गया है। प्रखंड स्तरीय कार्य में उनकी महत्वपूर्ण दखल होती है। परिणामत: कोई भी पुरुष मुखिया इस प्रकार के दखल को बर्दाश्त नहीं कर पाता कि उसकी योजनाओं पर किसी महिला सदस्य का अंकुश हो।
दूसरी ओर, प्रखंड स्तर पर महिलाओं के अधिकार बढ़ाए जाने के कारण पंचायत समिति सदस्यों, प्रमुख एवं प्रखंड विकास पदाधिकारी तीनों से उसे रचनात्मक एवं वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। इससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण कठिनाई यह है कि उसे
प्रखंड तक जाने एवं जनता के बीच अधिक समय देने के कारण पारिवारिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है।
जहां प्रताड़ना नहीं है वहां भी पारिवारिक कार्य छूटते-बिखरते रहते हैं। इसके अतिरिक्त स्थानीय ठेकेदार, भ्रष्ट कर्मचारी तथा वर्षों से भ्रष्टाचार का जाल फैलाए पेशेवर दलाल भी कई तरह की परेशानियां उत्पन्न करते हैं।
महिला जिला पार्षदों की भागीदारी से स्थानीय स्वशासन के अधिकार, समायोजन एवं लोकतंत्रीकरण में महत्वपूर्ण बादलाव
आ रहा है। निश्चित रुप से ये महिलाएं शिक्षित, संघर्षशील, प्रखर व्यक्तित्व वाली एवं जनोन्मुख होती हैं। गांधीजी कहते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। लेकिन हमारे समय की मशहूर लेखिका अरुंधति राय का वक्तव्य है कि भारत की आत्मा
गांवों में मरती है। बिहार जैसे राज्य के गांवों में मरतो हुई भारत की आत्मा को जीवित करने का काम महिलाएं और कमजोर तबके के लोग ही कर सकते हैं। स्थानीय स्वशासन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और जागरुकता से इस बात की उम्मीद
मजबूत होती है।

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