वर्ग संघर्ष और ग्रामीण बिहार

वर्ग संघर्ष और ग्रामीण बिहार

बिहार में साठ के दशक के बाद से दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा वर्ग संघर्ष ही वह चिंगारी है, जो खेती से जुड़े किसानों, श्रमिकों
और उनका शोषण करने वालों के बीच अरसे से संलग्न रही है। राज्य की ग्रामीण संरचना में एक वर्ग कृषि कार्य चलाता है तो दूसरी ओर उच्च तबके वाला सामंती चाल-ढाल में वह वर्ग है जो श्रमिकों तथा छोटे किसानों की मेहनत का सारा मुनाफा न केवल खुद खा जाता है बल्कि सदैव इस फिराक में रहता है कि कैसे अधिकाधिक शोषण कर मुनाफा बढ़ाया जाये। इस शोषण का सीधा शिकार बनता है खेतों में पसीना बहाने वाला श्रमिक और छोटे किसानों का वर्ग। इस प्रकार इन दोनों वर्गों के
अपने-अपने हित हैं, जो एक-दूसरे के खिलाफ जाते हैं। और आपसी कटुता तथा संघर्ष का वातावरण तैयार करते हैं।
भारत की तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य बिहार का इतिहास देश में आये सामाजिक-ऐतिहासिक परिवर्तनों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में देश में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्थापना की प्रक्रिया आरंभ हुई तथा इसके साथ ही भारत पहली बार विश्व की पूंजीवादी व्यवस्था के संपर्क में आया। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के जनकों ने भारतीय समाज की तात्कालिक सामंतवादी कृषि व्यवस्था को बिना किसी विशेष परिवर्तन के अपना लिया था। इस व्यवस्था में जमीन से जुड़े व्यक्तियों का विभिन्न वर्ग था, जो विभिन्न प्रकार से एक के ऊपर दूसरे के रूप में सवार था। इस प्रकार हल चलाने वाला किसान इस व्यवस्था की तह में था और उसे ऊपर से मौजूद सभी वर्गों, राजा, जमींदार, बटाईदार आदि के हित की रक्षा करनी होती थी।
ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने इस पर एक तुर्रा और जड़ दिया कि अपने व्यापारिक हितों के लिए उन्होंने कृषि हितों की बलि चढ़ा दी। किसानों पर भू-राजस्व का असह्य बोझ लाद दिया गया। इस प्रकार गुलाम भारत में असमान विकास की नयी परंपरा आरंभ हुई। जिस कारण देश के अधिकांश हिस्से औद्योगीकरण की हवा का एहसास तक नहीं कर पाये और पुराने घिसे-पिटे तरीकों से खेती द्वारा अपना निर्वाह चलाते रहे। ऐसी ही किस्मत के मारे इलाकों में से बिहार भी एक था और स्वतंत्रता प्राप्ति के
वक्त भी इसकी यही सही तस्वीर थी।
स्वतंत्रता के पश्चात् कृषि उत्पादन समूचे भारत में फलने-फूलने लगा। जिसके कुछ कारण थे- देश की कृषि संरचना पर अर्द्ध-सामंतीवादी व्यवस्था के लगे अंकुश में कुछ ढिलाई आयी, जिसका कारण था- समूचे भारत में प्रारंभ किया गया भूमि सुधार का पहला चरण। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उत्पन्न भीषण मुद्रास्फीति के कारण पहले ही भू-राजस्व के बोझ में कुछ राहत आयी थी। इस कारण कृषि व्यवस्था कोष का भी कुछ अंश कृषि क्षेत्र में लगा। लेकिन जल्द ही शक्तिशाली और औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग ने सत्ताधारियों के मध्य घुसपैठ कर सार्वजनिक कोष का पैसा कृषि क्षेत्र में लगने से रोक दिया।
इस शक्तिशाली औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग को मनमर्जी का परिणाम प्रथम पंचवर्षीय योजना की समाप्ति के बाद से ही दिखने लगा। प्रथम योजना में जहां बड़ी तथा मंझोली सिंचाई परियोजनाओं के लिए कुल योजना व्यय का 16 प्रतिशत निर्धारित किया गया था। वहीं दूसरी पंचवर्षीय योजना में इस मद पर व्यय का प्रतिशत गिरकर 9 प्रतिशत पर पहुंच गया। तीसरी योजना में इस मद में और गिरावट आयी। जिससे देश को भीषण खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ा। इस समय अनाजों का औसत सालाना आय जो 50 के दशक में 264 लाख टन था, वह 60 के दशक में बढ़ कर 57.5 लाख टन हो गया। 1966 में देश में  34 लाख टन अनाज का रिकार्ड आयात हुआ।
इस अभूतपूर्व आयात वृद्धि से जहां भारत का विदेशी मुद्रा भंडार खाली हुआ, वहीं विश्व साम्राज्यवाद पर उसकी निर्भरता बढ़ी। परिणामत: 1966 में भारत अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करने पर मजबूर हो गया। ऐसी स्थिति से निबटने के लिए देश में हरित क्रांति लायी गयी। चौथी तथा पांचवीं पंचवर्षीय योजना में बड़ी तथा मंझोली सिंचाई परियोजनाओं पर लागत का अनुपात कुल
योजना व्यय का वहीं 9 प्रतिशत रहा। लेकिन हरित क्रांति योजना ने कृषि के असमतल विकास में एक नया आयाम जोड़ने का काम किया। आज देश के सारे गेहूं की पूर्ति केवल पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश से होती है जबकि चावल के लिए पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश का मुंह देखना पड़ता है। देश के कुल खाद्यान्न भंडार का 95 प्रतिशत भाग केवल गेहूं और चावल से बनता है।
वर्ष 1980-81 से 1984-85 के पांच वर्षों में कुल गेहूं तथा चावल का क्रमश: 97 तथा 82 प्रतिशत केवल उपर्युक्त राज्यों से ही
प्राप्त किया गया। इस प्रकार वर्ष 1970-71 में खाद्यान्न तथा खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी इस वर्ष केंद्र सरकार के कुल खर्च का 1.07 प्रतिशत थी, जो 1980-81 में बढ़कर 4.65 तथा 1985-86 में वृद्धिकर 7.20 प्रतिशत हो गयी। अभी भी देश के 67 प्रतिशत श्रमिकों की आय तथा जीवन निवार्ह का क्षेत्र कृषि ही है। पचास के दशक में उत्पन्न कृषि के अपेक्षाकृत उच्चतम विकास की गति तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की गतिविधियों में फैलाव के कारण औद्योगिक उत्पादों की मांग में भी गति आयी थी, लेकिन साठ के दशक के मध्यकाल से कृषि विकास के असमतल रूप के कारण स्थिति में काफी अंतर आ गया। इसके अतिरिक्त सत्तर के दशक से औद्योगिक रुग्णता एक स्थायी संकट के रूप में उभरी है। दिसंबर 1976 में 241 बीमार
इकाइयां थी, जिनकी संख्या जून 1984 तक बढ़कर 513 हो गयी। 1983 में बीमार लघु उद्योगों की संख्या 78,363 थी जो कुल पंजीकृत लघु उद्योगों की संख्या का 10 प्रशित है। इतना ही नहीं 1970 के बाद के दस वर्षों में औद्योगिक इकाइयों की उत्पादन क्षमता में भी गिरावट आयी है।
इस असंतुलित विकास का सबसे बड़ा खामियाजा बिहार को भुगतना पड़ा, जो अंततः देश का सबसे गरीब राज्य बनकर रह गया। साठ के दशक में केंद्र सरकार के गैर-विभागीय उपक्रमों में कुल पूंजी विनियोग का 25 प्रतिशत बिहार में हुआ, बावजूद इसके राज्य की आर्थिक संरचनाओं में विशेष अंतर नहीं आया तथा कृषि क्षत्र म आवश्यकतानुसार की गई कोशिशें कामयाब
नहीं हो पायीं। इसका कारण यह था कि कोयले, लोहे तथा भारी पूंजीगत सामानों के उद्योगों में पूंजी विनियोग के पीछे सरकारी छाया में आत्मनिर्भर औद्योगिकी की गति तैयार करने की मंशा थी। इसके लिए यहां मौजूद इन प्राकृतिक संसाधनों की रॉयल्टी
दर कम रखी गयी तथा मूल्य संरचना ऐसी बनायी गयी, जिससे बड़े औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग को महत्तम फायदा मिल सके। इन नीतियों से वस्तुत: उन्हीं क्षेत्रों को लाभ पहुंचा, जो औद्योगिक तथा आर्थिक दोनों रूप में विकासित थे। इस प्रकार औद्योगीकरण के अभाव में कृषि ही बिहारवासियों का मुख्य जीवनधार बना रहा।
लेकिन पचास के दशक में बिहार के कृषि जीवन में भी भारी उथल-पुथल मची थी। पारंपरिक रूप से ग्राम्य जीवन में सत्ता चलाने वाला वर्ग बदलते परिवेश में अपनी सुरक्षा के लिए हाथ पांव मार रहा था जबकि किसानों के बीच एक मध्य वर्ग तेजी
से शक्तिशाली होता जा रहा था। साथ ही पारंपरिक सत्ता संरचना में अपना हिस्सा पाने की जी-तोड कोशिश कर रहा था। साठ के दशक का उत्तरार्द्ध आते-आते जहां किसानों का यह मध्य वर्ग एक सशक्त राजनीतिक ताकत के रूप में उभरा, वहीं
पारंपरिक सत्ता पकड़ वाला वर्ग (जिसमें उच्च जाति के हिंदुओं की प्रधानता थी) बिहार की राजनीति में अपना प्रभुत्व जमाने में कामयाब हो गया। नतीजा यह निकला कि यहां भूमि सुधार की प्रक्रिया ठप्प होने लगी। इस संदर्भ में भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 1969 में तैयार की गयी
रिपोर्ट के अनुसार बिहार में कुल रैयतों के करीब 82 प्रतिशत का कृषि पर अधिकार अस्थायी है तथा मुख्य रूप से वे बटाई पर आश्रित हैं। रिपोर्ट के अनुसार भूमि हदबंदी कानून के 19 अप्रैल, 1962 से लागू होने के बावजूद कहीं भी सीमा से अधिक कृषि भूमि को जब्त करने की कार्यवाही नहीं हुई है। राज्य के कृषि क्षेत्र को जकड़े अर्द्ध सामंतवादी इतने मजबूत हैं कि 1952-53 से 1964-65 के बीच कृषि उत्पादन में विकास की दर 2.94 प्रतिशत रहने के बावजूद इसका कोई लाभ खेती से जुड़े प्रत्यक्ष किसानों व श्रमिकों को नहीं पहुंच पाया। रिपोर्ट के अनुसार भूमि सुधार नियमों के लागू किये जाने के बावजूद भी छोटे किसानों व श्रमिकों को कोई लाभ नहीं पहुंचा बल्कि उनकी हालत और खराब हो गयी। इन सबों का मिला-जुला नतीजा था कि कृषि उत्पादन संबंध वहीं पारंपरिक अर्द्ध सामंतवादी ढांचे में सने रहे और इन्होंने बिहार में सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को
हर संभव तरीके से रोकने की कोशिशें की हैं।
पटना स्थित ए.एन. सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान ने जेनेवा के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सहयोग से बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों का अध्ययन किया, जिसके अनुसार अभी भी (वर्ष 1981-82) राज्य में निम्न स्तरीय उत्पादन परिवार के अधिकांश सदस्यों का कृषि कार्य में बंधा रहना, बटाईदारी, बंधुआ मजदूरी तथा सूदखोरों द्वारा किसानों व श्रमिकों का शोषण आम बात है। इस सर्वेक्षण में बिहार के 6 जिलों के 12 गांवों का अध्ययन किया गया, जिनमें पाया गया कि कृषि योग्य भूमि का वितरण बडे असंतलित ढंग पर टिका हुआ है। जिसमें 10 प्रतिशत परिवारों का 45 प्रतिशत भूमि पर कब्जा है तथा ये कृषि श्रमिकों का
इस्तेमाल करने के बावजूद औसत से कम उत्पादन करा पाते हैं और अपने उसी पारंपरिक घिसे-पिटे तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।
सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि ग्रामीण परिवारों का 39 प्रतिशत जमीन बटाई पर लगता है तथा कृषि उपज का आधा भाग बदले में प्राप्त करता है। बटाई पर लगने वाली कृषि भूमि का रकबा अधिकांश मामलों में बहुत छोटा है तथा बटाई पर लगी कुल जमीनों में से आधे से अधिक का रकबा एक एकड़ या कम है। इस प्रकार बिहार के कृषि क्षेत्र में व्याप्त बटाईदार वस्तुत: पारंपरिक अर्द्ध-सामंतवादी व्यवस्था का चल रहा स्वरूप है, जिसमें भूमि का मालिक बटाईदारों को भूमि के अलावा कृषि के अन्य खचों में कोई हिस्सा नहीं बंटाता है। आज भी बिहार के ग्रामीण परिवेश में पारंपरिक स्रोत से बांटा गया कर्ज (यानि गांव के महाजनों, जमींदारों आदि के माध्यम से दिया गया कर्ज) ग्राम्य जीवन की आर्थिक व्यवस्था पर सशक्त अंकुश लगाने का कार्य करता है। सर्वेक्षण के अनुसार गांवों के 67 प्रतिशत परिवार तथा खेत से सीधे जुड़े किसानों का 97 प्रतिशत इस पारंपरिक कर्ज की डोर में बढ़ा हुआ हैं,इन कर्जो की सूद की दर जानलेवा होती है जो 48.79 प्रतिशत या उससे भी अधिक होती है।
वास्तविकता यह है कि सूद पर दिया गया कर्ज तथा बटाई पर दी गयी जमीन ये दोनों ऐसे मुख्य स्रोत हैं, जिनके द्वारा खेतिहर मजदूरों तथा छोटे किसानों के उत्पादन का लाभांश उच्च वर्ग द्वारा हजम कर लिया जाता है। सर्वेक्षण से यह भी जात होता है कि विहार में बंधुआ मजदूरी की प्रथा अभी भी बड़े पैमाने पर प्रचलित है। इस प्रदेश में 45.04 प्रतिशत परिवार कृषि मजदूरी के रूप में मिले, जिसमें 25.10 प्रतिशत स्वयं की खेती में लगे हुए हैं। कषि श्रमिकों का 32.16 प्रतिशत विभिन्न भू-स्वामियों के साथ जुड़ा हुआ है तथा इन श्रमिकों की 93.42 प्रतिशत आबादी को सबसे पहले अपने मालिकों का कृषि कार्य संपादित करना
पड़ता है। 12.16 प्रतिशत श्रमिक ऐसे हैं, जो कहीं और कार्य कर ही नहीं सकते जबकि 5.40 प्रतिशत श्रमिक ऐसे हैं जो कहीं और यदि कार्य करते हैं, तो मालिक उनकी मजदूरी काट लेता है।
भू-स्वामियों से जुड़े 17.86 प्रतिशत मजदूर आदि अपने मालिक को छोड़ते हैं तो उन्हें इस हालत में बटाई । पर मिली जमीन भी छोड़नी होगी। 32.14 प्रतिशत र मजदूर तब तक अपने मालिक को नहीं छोड़ सकते, जब तक कि वे अपने कर्ज की चुकती नहीं कर देते। करीब 17.86 प्रतिशत मजदूर कर्ज तथा बटाईदारी दोनों बंधनों से जकड़े हुए हैं। ग्रामीण बिहार में कृषि मजदूरों तथा अन्य सेवा प्रदान करने वाले वर्गों की मजदूरी की व्यवस्था वही पारंपरिक रूप से निर्धारित जजमानी व्यवस्था के तहत है। बटाईदारी के तहत भू-स्वामी का निर्धारित हिस्सा, महाजन के सूद की दर, कृषि श्रमिकों की मजदूरी दर तथा मजदूरों को बांधने वाले बंधन इनमें कोई वर्तमान कानूनी कसौटी पर वैध नहीं है। बावजूद इसके, ये सारी व्यवस्थाएं इस ग्रामीण समाज
में खुलेआम प्रचलित हैं तथा यहां का सत्ताधारी इन्हें लागू करने में प्रमुख भूमिका निभाता है।
बिहार के 12 गांवों के सर्वेक्षण में पाया गया कि किसानों का ऐसा वर्ग जिसके पास 5 एकड तक की जमीन थी, कृषि पैदावार के मामले में सबसे अधिक चुस्त हैं जबकि 5 एकड़ से कम जमीन वाले किसान महाजनों के कर्ज में इस प्रकार बंधे हुए हैं।
कि वे ढंग से खेती कर सकें, इसके लिए संसाधन जुटाना ही उनके लिए असंभव था। इतना ही नहीं बटाई पर खेती का परिणाम भी सुखद नहीं था क्योंकि जमीन के मालिक कृषि खर्च में हिस्सा बांटने को तैयार नहीं थे। फलतः देखा गया है कि ऐसे गांवों में जहां अधिकांश जमीन बटाईदारी पर लगी हुई है, पैदावार अपेक्षाकृत कम है, जबकि ऐसे क्षेत्रों में जहां किसान के पास 5 एकड़ से 2 एकड़ तक जमीन है और उस पर वे खुद अपने परिवार की मदद से कृषि कार्य करते हैं, पैदावार अपेक्षाकृत काफी अच्छी है। महाजनों के कर्ज में बंधे हुए किसान, जो पारंपरिक तकनीक से कृषि कार्य करते हैं, खेत के बड़े हिस्से से भी अच्छी पैदावार
निकालने में असमर्थ रहते हैं। यहां तक कि सिंचाई सुविधा के बाद भी ऐसे किसानों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाती।
सर्वेक्षण द्वारा यह भी महसूस किया गया कि सिंचाई सुविधाओं का बढ़ाया जाना बटाईदारी व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालता
है। इससे मालूम होता है कि सिंचाई में पूंजी विनियोग का कम रहना तथा भूमि सुधार नहीं के बराबर होना ही बिहार की कृषि व्यवस्था में अर्द्ध सामंतवादी तत्वों के बोलबाले का कारण रहा है। इस प्रकार जहां ग्रामीण क्षेत्रों का राजनीतिकरण शुरू हो गया, वहीं कृषि संबंध ज्यों के त्यों रह गये। फलतः कृषि उत्पादन तो नहीं बढ़ा लेकिन आबादी में वृद्धि जारी रही। इस प्रकार साठ के दशक के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों की प्रति व्यक्ति आय में आयी गिरावट बरकरार रही। अभिजात्य वर्ग अपना पुराना
वैभव कायम रखने के लिए शोषण के नये तरीके अख्तियार करने लगे, जिसमें पुराने रैयतों को जबर्दस्ती जमीन से हटाकर नये लोगों को ‘सलामी’ के एवज में वह जमीन दी जाने लगी। इतना ही नहीं परंपरागत रूप से विभिन्न सेवाओं को दी जाने वाली
जमीन भी छिनी जाने लगी।
लेकिन अब श्रमिक तथा छोटे किसानों का भी भरपूर राजनीतिकरण हो चुका था तथा अब वे और शोषण को बर्दाश्त करने के
हक में नहीं थे। साठ के दशक के अंतिम वर्षों में इस प्रकार ‘भूमि हड़पो’ अभियान की शुरुआत हुई तथा फसलों की जर्बदस्ती कटाई एवं शोषण के खिलाफ सभा, बैठक आदि के नियमित दृश्य बनने लगे। ग्रामीण अभिजात्य वर्ग ने भी लठैतों व पुलिस
के माध्यम से जवाबी कारवाई शुरू की। जिससे रक्त संहार का सिलसिला चला। 1971 ई. में पूर्णिया जिले के रूपसपुर- चंदवा में एक ऐसा ही रक्त संहार हुआ जिसने सभ्य समाज को दहला कर रख दिया। हालांकि इन संघर्षों में ऊपर जातीय दंगों की बू आती थी, लेकिन मूल रूप से यह जमीन तथा उससे जुड़े शोषण की रक्त-रंजित गाथा थी। गरीब तबकों ने भी संगठित होकर आंदोलन शुरू किया। जिसका स्वरूप भोजपुर के संहार तथा संदेश प्रखंडों में और मुजफ्फरपुर के मुशहरी प्रखंड में देखा गया।
मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्यूनिस्ट पार्टी ने 1970 में रोहतास के नाथपुर जिले में पहली राज्य-स्तरीय बैठक का आयोजन किया। इस प्रकार वर्ग-संघर्ष की चिंगारी जो रूपसपुर में शुरू हुई थी अब विकराल रूप लेकर धर्मपुरा, बेलची, पिपरा, विश्रामपुर, पारसबीधा और फिर दियारा आदि में भभकने लगी। 1977 ई. के बाद गरीब तबके की प्रतिहिंसा और बढी तथा मई 1982 तक राज्य के 14 जिलों, 87 प्रखंडों में यह आग पूरे तौर पर फैल चुकी थी। भूपतियों ने इसके जवाबस्वरूप भूमिसेना, लोरिक सेना, ब्रह्ममर्षि सेना, कुंअर सेना आदि का गठन किया और दोनों पक्षों में क्रिया-प्रतिक्रिया हुई।
1980-81 में किये गये एक अनुमान के अनुसार इन संघर्षों के चलते 2.82 प्रतिशत खेती योग्य भूमि बंजर रह गयी तथा 1985-86 में बढ़कर 26.83 प्रतिशत तक पहुंच गयी।

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