ताम्रपाषाण युग की संस्कृति | Chalcolithic culture

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ताम्रपाषाण युग की संस्कृति | Chalcolithic culture

ताम्रपाषाण युग की संस्कृति

ताम्रपाषाण युग में बसावट

नवपाषाण काल के अन्त में धातुओं का उपयोग शुरू हुआ। इस्तेमाल की जाने वाली धातु ताँबा थी ।ताँबा और पत्थल के औजारों के उपयोग पर कई संस्कृतिया
आधारित थीं। इस तरह की संस्कृति को ताम्रयुग कहा जाता है, जिसका अर्थ है ताम्रपाषाण
युग। तकनीकी तौर पर ताम्रपाषाण युग हड़प्पा-पूर्व के चरण के द्योतक हैं। हालाँकि भारत
के विभिन्न हिस्सों में काँस्य-युग यानि हड़प्पा संस्कृति के बाद ताम्र-पाषाण संस्कृति का
आरम्भ हुआ। यहाँ हम मुख्य रूप से उन संस्कृतियों पर विचार करेंगे जो हड़प्पा संस्कृति
के विकसित होने के बाद या उसके अन्त के बाद उभरी।
ताम्र-पाषाण लोग ज्यादातर पत्थर और ताम्बे की वस्तुओं का इस्तेमाल करते थे लेकिन
वे कभी-कभी निम्न श्रेणी के काँसे और लोहे का भी इस्तेमाल करते थे। वे मुख्य रूप से
ग्रामीण समुदाय के थे जो पहाड़ी भूमि और नदियों के किनारे व्यापक क्षेत्र में फैले हुए थे।
दूसरी ओर, हड़प्पा के लोग काँस्य का इस्तेमाल करते थे और उन्होंने सिन्धु घाटी में बाढ़
के फैलाव की वजह से बने समतल मैदानों के आधार पर शहरीकरण किया। ताम्रपाषाण
युग से सम्बन्धित बसावटें दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग, पश्चिमी
महाराष्ट्र और दक्षिणी और पूर्वी भारत में पाई जाती हैं। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में अहर और
गिलुन्द, दो स्थलों की खुदाई की गई। वे बनास घाटी के सूखे क्षेत्रों में हैं। पश्चिमी मध्य
प्रदेश या मालवा में कयथ और एरन की खुदाई हुई है। मालवाई बर्तनों को ताम्र-पाषाण
युगीन मिट्टी के पात्रों में सबसे समृद्ध माना जाता है। ये केन्द्रीय और पश्चिम भारत की
मालवा ताम्र-पाषाण संस्कृति से पाए गए हैं। मिट्टी के इन बर्तनों और इनके कुछ अन्य
सांस्कृतिक तत्व महाराष्ट्र में भी दिखाई देते हैं।
हालाँकि पश्चिमी महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा खुदाई हुई है। अहमदनगर जिले के जोरवे,
नेवासा, दायमाबाद व पुणे जिले में छन्दोली, सोनगाँव और इनामगाँव साथ ही प्रकाश
एवं नासिक जैसे कई ताम्र-पाषाण स्थलों में व्यापक उत्खनन किया गया है। वे सभी जोरवे
नाम से सम्बन्धित जोरवे संस्कृति पर आधारित हैं, जो कि अहमदनगर जिले में गोदावरी की एक सहायक नदी प्रवरा किनारे स्थित थी। जोरवे संस्कृति बहुत कुछ मालवा संस्कृति
से मिलती-जुलती है लेकिन इसमें दक्षिण के नवपाषाण संस्कृति के तत्व भी विद्यमान हैं।
जोरवे संस्कृति, अनुमानत: (किर्का/सी.) 1400 वर्षों से ई.पू. 700 तक विदर्भ के हिस्सों
और कोंकण के समुद्र तटीय क्षेत्रों को छोड़कर आधुनिक महाराष्ट्र में फैली रही। हालाँकि,
जोरवे संस्कृति ग्रामीण थी, दायमाबाद और इनामगाँव जैसी इसकी कुछ बस्तियाँ लगभग
शहरीकरण के चरण तक पहुँच चुकी थीं। महाराष्ट्र के ये सभी स्थल अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में
स्थित थे। इनमें ज्यादातर भूरी-काली मिट्टी थी, जिनमें बेर और बबूल के कटीले पेड़-पौधे
थे, लेकिन ये नदी-मार्ग में पड़ते थे। इसके अलावा हमारे पास नर्मदा पर स्थित नवदाटोली
है। अधिकतर ताम्र-पाषाण के तत्व दक्षिण भारत में नवपाषाण स्थलों में ही मिले।
इलाहाबाद जिले के विन्ध्य क्षेत्र में कई ताम्र-पाषाण स्थलों की खोज की गई है। पूर्वी
भारत में गंगातट के चिरान्द के अलावा, इसमे पश्चिमी बंगाल के बर्धमान जिले के पाण्डु
राजर धिबी और बीरभूम जिले के महिषदल का उल्लेख किया जा सकता है। इसके
अतिरिक्त भी स्थलों की खुदाई की गई हैं, जिनमें सेनुआर, सोनपुर और बिहार में ताराडीह
हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश में खैराडीह और नरहन है।
ताम्र-पाषाण युगीन लोग छोटे औजारों का इस्तेमाल करते थे और ये औजार पत्थर के
बने होते थे। जिनमें पत्थर की ब्लेड एवं अन्य धारदार औजार महत्त्वपूर्ण थे। कई जगहों
पर विशेष रूप से दक्षिण भारत में पत्थर की ब्लेडों के उपक्रम विकसित हुए और पत्थर
की कुल्हाड़ियों का उपयोग जारी रहा। जाहिर है ऐसे इलाके पहाड़ियों से बहुत दूर नहीं थे।
कुछ बस्तियों में ताम्र वस्तुओं की बहुलता स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसा अहर और गिलुन्द
में देखने को मिलता है जो कमोवेश राजस्थान में बनास घाटी के सूखे क्षेत्रों में स्थित था।
अन्य समकालीन ताम्र-पाषाण कालीन कृषि संस्कृतियों के विपरीत अहर में लगभग कोई
माइक्रोलिथिक उपकरण (पत्थर के छोटे औजारों) का इस्तेमाल नहीं हुआ। पत्थर की
कुल्हाड़ियाँ या ब्लेड यहाँ लगभग न के बराबर पाए जाते हैं। ताम्बे चद्दर से बनी सीधी
कुल्हाड़ी, चूड़ी, पत्तर इत्यादि वस्तुएँ इससे सम्बन्धित हैं, हालाँकि एक काँस्य धातु की
चद्दर भी है। ताम्बा स्थानीय रूप से उपलब्ध था। अहर के लोग प्रारम्भ से ही धातुओं को
गलाने और धातु सम्बन्धी तकनीक का प्रयोग करते थे और अहर का मूल नाम ताम्बावती
या ताम्बा का स्थान था। अहर संस्कृति ई.पू. 2100-1500 के बीच मानी जाती है और
गिलुन्द इसका एक क्षेत्रीय केन्द्र माना जाता है। गिलुन्द में केवल ताम्बे के टुकड़े मिलते हैं
लेकिन इसमें पत्थर की ब्लेड का भी उपयोग होता था। महाराष्ट्र के जोरवे और चन्दोली
में चिपटी, आयताकार ताम्बे की कुल्हाड़ियाँ और चन्दोली में ताम्बे की छेनी पाई गई है।
ताम्रपाषाण युग के लोग मिट्टी के विभिन्न प्रकार के बर्तनों का उपयोग करते थे, जिनमें
से एक को काला और लाल कहा जाता है। यह ई.पू. 2000 के आस-पास व्यापक रूप से
विद्यमान था। इससे पहिये मढ़े जाते थे और कभी-कभी रैखिक सफेद रंग से इसे रंगा भी
जाता था। ऐसा न केवल राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में होता था, बल्कि बिहार और पश्चिम बंगाल में भी यही स्थिति थी। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और बिहार में रहने वाले
लोगों ने टोंटीनुमा पानी के बर्तन और स्टैन्ड वाली थाली और स्टैन्ड वाले कटोरों का निर्माण
किया। ऐसा भी नहीं था कि काले और लाल मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करने वाले सभी
लोग उसी संस्कृति के थे। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान से काले और लाल रंग
के बर्तनों को चित्रित किया गया था, लेकिन पूर्वी भारत के बहुत कम बर्तन ही चित्रकारी
वाले होते थे।
दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र और अन्य जगहों में
ताम्र-पाषाणयुगीन लोग पशुपालन और कृषि करते थे। उन्होंने गाय, भेड़, बकरी, सूअर,
भैंस आदि पाले और हिरणों का शिकार किया। ऊँटों के अवशेष तो मिले हैं पर वे सामान्यत:
घोड़े से परिचित नहीं थे। कुछ पशु-अवशेष मिले हैं जिनकी पहचान घोड़े, खच्चर या जंगली
गधे के रूप में हुई है। यहाँ के लोग निश्चय ही गाय का माँस और सूअर का माँस खाते थे
लेकिन वे सूअर का माँस कम खाते थे। उल्लेखनीय है कि इन लोगों ने गेहूँ और चावल का
उत्पादन किया और इन मुख्य फसलों के अतिरिक्त उन्होंने बाजरे की भी खेती की। उन्होंने
मसूर, काला चना, हरा चना और मटर जैसी कई दालों का उत्पादन किया। महाराष्ट्र में
नर्मदा किनारे स्थित नवदाटोली में लगभग सभी अनाज पाए गए हैं। शायद ही भारत में किसी
अन्य स्थान पर खुदाई के परिणामस्वरूप इतने सारे अनाज पाए गए हों। नवदाटोली के लोग
भी बेर और अलसी का उत्पादन करते थे। दक्कन में कपास उपजाने लायक काली मिट्टी
में कपास का उत्पादन किया गया और निचले दक्कन में राई, बाजरा और कई मोटे अनाज
का उत्पादन किया गया। पूर्वी भारत में, बिहार और पश्चिम बंगाल में मछली पकड़ने वाले
काँटे पाए गए साथ ही जहाँ हमें चावल भी मिलते हैं। इससे पता चलता है कि पूर्वी क्षेत्र के
ताम्र-पाषाणयुगीन लोग मछली और चावल खाया करते थे, जो अब भी देश के उस हिस्से
में एक लोकप्रिय आहार है। राजस्थान में बनास घाटी में अधिकांश बस्तियाँ छोटी हैं लेकिन
लगभग चार हेक्टेयर के क्षेत्र में अहर और गिलुन्द फैले हुए हैं।
ताम्र-पाषाण लोग आम तौर पर पकी ईंटों से परिचित नहीं थे। उस दौरान विरले ही कभी
पकी ईंट का इस्तेमाल हुआ, जैसा ई.पू. 1500 के आस-पास गिलुन्द में हुआ करता था।
कभी-कभी उनके घर मिट्टी की ईंट से बने होते थे, लेकिन ज्यादातर फूस और टाट को
लीप-पोतकर बनाए जाते थे जो झोपड़ीनुमा लगते हैं। हालाँकि, अहर में लोग पत्थर के घरों
में रहते थे। अभी तक 200 जोरवे स्थलों की खोज की गई, जिसमें सबसे
घाटी में दायमाबाद है। यह करीब 20 हेक्टेयर का है, जिसमें लगभग 4000 लोग रहते थे।
यह मिट्टी की दीवार से घिरा था, जिस पर पत्थर के ढेर लगे होते थे। दायमाबाद कई काँस्य
वस्तुओं की खोज के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें से कुछ हडप्पा संस्कृति से प्रभावित हैं।
प्राचीन ताम्र-पाषाण चरण में, पश्चिमी महाराष्ट्र के इनामगाँव में चूल्हे और वृत्ताकार
गड्ढेनुमा मिट्टी के घरों की खोज की गई है। बाद के चरण (ई.पू. 1300-1000) में चार
आयताकार और एक वृत्ताकार अर्थात् पाँच कमरों वाला घर पाया गया है। यह बस्तियों के
बड़ा गोदावरी केन्द्र में स्थित था। यह सम्भवत: उस बस्ती के प्रमुख का घर हो सकता है। इसके पास
निकटवर्ती भण्डारगृह में अन्य लोगों द्वारा प्रदत्त अनाज को भण्डारित किया जाता होगा।
लगभग सौ से अधिक घरों और कब्रों को मिलाकर इनामगाँव बड़ी ताम्र-पाषाण बस्ती थी।
यह किले की तरह चारों तरफ से खांई बनाकर घेरा गया था।
हम ताम्र-पाषाण कला और शिल्प के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। वे लोग ताम्र
और पत्थर-शिल्प के बेहद कुशल कारीगर भी थे। औजार, हथियार और ताम्बे की चूड़ियों
का भी पता चला है। उन्होंने कार्नेलियन, स्टीटाइट (शैलखटी) और क्वार्ट्ज क्रिस्टल जैसे
कम मूल्य वाले पत्थरों की मोतियों का निर्माण किया। मालवा में बुनाई वाले यन्त्र की खोज
से स्पष्ट होता है कि उन्हें कताई और बुनाई का भी ज्ञान था। सूती रेशम और सेमल रेशम
(कपास के पेड़) से बने कपास-सूत और रेशमी धागे महाराष्ट्र में मिले हैं जो कपड़ा निर्माण
की कुशलता के द्योतक हैं। इन कारीगरों के अलावा जो विभिन्न स्थलों पर अपनी हस्तकला
में निपुण थे, इनामगाँव में कुम्हार, लोहार, हाथी दाँत निकालने वाले, चूना-निर्माता और
टेराकोटा जैसे विभिन्न शिल्पों के काम करने वाले कारीगर भी थे।
ताम्रपाषाण युग में सामाजिक संरचना, अनाज, मिट्टी के बर्तनों आदि से क्षेत्रीय अन्तर
स्पष्ट हो जाते हैं। पूर्वी भारत में चावल का उत्पादन हुआ और पश्चिम भारत में जौ और
गेहूँ की खेती की गई। कालक्रम के अनुसार मालवा और मध्य भारत में कयथ और एरन
जैसी कुछ बस्तियाँ पहले स्थापित हुईं। पश्चिमी महाराष्ट्र और पूर्वी भारत में बसावट बहुत
बाद में हुई।
अन्तिम संस्कार और धार्मिक सम्प्रदायों के बारे में विचार करने में हम सक्षम हैं।
महाराष्ट्र के लोग अपने मृतकों को अस्थि-कलश में अपने घर के नीचे उत्तर-दक्षिण की
स्थिति में लिटा कर समाधिस्थ करते थे। हड़प्पा के लोगों की तरह उन्होंने अलग कब्रिस्तान
का इस्तेमाल नहीं किया। परलोक में इस्तेमाल के लिए मृतकों के साथ बर्तन और कुछ
ताम्बे की वस्तुएँ कब्र में डाली जाती थीं।
महिलाओं की टेराकोटा मूर्तियों से पता चलता है कि ताम्रपाषाण युग के लोग माता
देवी की पूजा करते थे और पूजा के लिए मिट्टी की कुछ बगैर पकी हुई नग्न मूर्तियों का
भी उपयोग किया जाता था। पश्चिमी एशिया में पाई गई मूर्तियों के समान ही माता देवी का
एक चित्र इनामगाँव में भी पाया गया है। मालवा और राजस्थान में विशिष्ट ढंग के टेराकोटा
साँढों की मूर्तियाँ दर्शाती हैं कि साँढ़ एक धार्मिक पन्थ का प्रतीक था।
बसावट के प्रकार और अन्त्येष्टि की प्रक्रिया से स्पष्ट होता है कि ताम्र-पाषाण समाज
में सामाजिक असमानताओं की शुरुआत हो चुकी थी। महाराष्ट्र के कई जोरवे बस्तियों में
यह पदानुक्रम स्पष्ट दिखाई देता है। उनमें से कुछ बीस हेक्टेयर के बराबर हैं लेकिन अन्य
केवल पाँच हेक्टेयर या इससे भी कम हैं। यह द्वि-स्तरीय बस्तियों को दर्शाता है। बस्तियों
के आकार में अन्तर से पता चलता है कि बड़ी बस्तियाँ छोटी बस्तियों पर शासन करती
थीं। हालाँकि, बड़ी और छोटी दोनों बस्तियों में समाज-प्रमुख और उनके रिश्तेदार, जो आयताकार घरों में रहते थे वे गोलाकार झोपड़ियों में रहने वाले लोगों पर वर्चस्व बनाए
रखते थे। इनामगाँव में कारीगर पश्चिमी किनारे पर रहते थे और यहाँ के समाज-प्रमुख केन्द्र
में रहते थे। इससे वहाँ के रहवासियों के बीच सामाजिक दूरी का पता चलता है। पश्चिमी
महाराष्ट्र में चण्डोली और नेवासा की कब्रगाहों में कुछ बच्चों को उनके गले में ताम्बा
आधारित हार के साथ दफन किया गया था जबकि अन्य में केवल बर्तन ही मिला है।
इनामगाँव में एक वयस्क को मिट्टी के बर्तनों और कुछ ताम्बे के साथ दफनाया गया था।
कयथ में एक घर में ताम्बे की उनतीस चूड़ियाँ और दो विशिष्ट कुल्हाड़ी पाई गई हैं। उसी
स्थान पर बर्तनों में शैलखटी और कार्नेलियन मोती जैसे थोड़ा कीमती पत्थरों के हार पाए
गए थे। इससे स्पष्ट है कि जिन लोगों के पास ऐसी वस्तुएँ थीं, वे समृद्ध थे।
कालानुक्रम के आधार पर राजस्थान के खेतरी ताम्र-क्षेत्र के सीकर-झुनझुनू इलाके की
समृद्ध ताम्र-खदान के करीब स्थित गणेश्वर स्थल को विशेष रूप से देखा जा सकता है।
इस क्षेत्र में खुदाई से प्राप्त ताम्बे की वस्तुओं में तीर, भाले, बंशी (मछली फँसाने की हुक),
औजारों की मूठे, चूड़ियाँ, छेनियाँ आदि शामिल हैं। उनमें से कुछ के आकार सिन्धुघाटी की
साइटों पर पाई जाने वाली वस्तुओं के समान हैं। इससे मिलती-जुलती टेराकोटा की एक
टिकिया भी पाई गई थी। कई भालेनुमा औजार भी थे जो ताम्र-युगीन-संस्कृति की विशेषताएँ
हैं। हमें ओसीपी (गेरूए रंग के बर्तन) भी मिलते हैं जो कि लाल रंग से मिलते-जुलते हैं
और ज्यादातर फूलदान के रूप में काले रंग से चित्रित हैं। गणेश्वर के संकलन को ई.पू.
2800-2200 से जोड़ा जाता है। कुल-मिलाकर ये परिपक्व हड़प्पा संस्कृति को दर्शाती हैं।
गणेश्वर मुख्यत: हड़प्पा को ताम्बे की वस्तुएँ आपूरित करता था और वे इससे ज्यादा कुछ
नहीं लेते थे। गणेश्वर के लोग आंशिक रूप से कृषि, किन्तु मुख्य रूप से शिकार पर निर्भर
थे। यद्यपि उनका प्रमुख शिल्प ताम्र-वस्तुओं का निर्माण था परन्तु वे नगरीकरण करने में
असमर्थ थे। गणेश्वर समूह में न तो पूरी तरह शहरी वातावरण था न ही विधिवत ओसीपी/
ताम्बा संग्रह की संस्कृति थी। गणेश्वर संस्कृति का अधिकांश भाग भालेनुमा औजारों एवं
पत्थर के अन्य औजारों के साथ हड़प्पा-पूर्व ताम्र-पाषाण संस्कृति का माना जा सकता है।
जिसने परिपक्व हड़प्पा संस्कृति के निर्माण में योगदान दिया।
कालानुक्रमिक रूप में देखें तो भारत में कई ताम्र-पाषाण बस्तियों की श्रृंखलाएँ हैं। कुछ
हड़प्पा-पूर्व की हैं, बाकी हड़प्पा संस्कृति की समकालीन हैं। फिर भी कुछ उत्तर-हड़प्पा
यानि हड़प्पा के बाद की भी हैं। हड़प्पा क्षेत्र के कुछ स्थलों पर हड़प्पा-पूर्व चट्टानी परतों
को व्यवस्थित परिपक्व शहरी सिन्धु सभ्यता से अलग बताने के कारण उन्हें प्रारम्भिक-
हड़प्पन कहा जाता है। इस प्रकार राजस्थान के कालीबंगा और हरियाणा के बनावली में
हड़प्पा-पूर्व चरण स्पष्ट रूप से ताम्र-पाषाणकालीन हैं। पाकिस्तान के सिन्ध में कोट दीजी
के साथ भी ऐसा ही है। उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भारत में हड़प्पा-पूर्व एवं उत्तर-हड़प्पा की
ताम्र-पाषाण संस्कृतियों तथा हड़प्पा के साथ उसके सह-सम्बन्ध पाए जाते हैं। अनुमानतः
(किर्का/सी.) 2000 वर्षों से ई.पू. 1800 तक की कयथ संस्कृति इसका उदाहरण है। जो कि हड़प्पा संस्कृति के अन्त तक बनी रही थी। मिट्टी के बर्तनों में कुछ हड़प्पा-पूर्व तत्व
मौजूद हैं परन्तु इनमें हड़प्पा का भी प्रभाव है। इन क्षेत्रों की कई उत्तर-हड़प्पा या ताम्र-
पाषाण संस्कृतियाँ हड़प्पा-संस्कृति के उत्तर-शहरीकरण काल से प्रभावित हैं।
कई अन्य ताम्र-पाषाण संस्कृतियाँ भी हैं जो सिन्धु सभ्यता से जुड़ी हुई नहीं हैं। हालाँकि
वे परिपक्व हड़प्पा संस्कृति की तुलना में अल्पकालीन हैं। नवदाटोली, एरन और नगदा
में पाई गई मालवा संस्कृति (ई.पू. 1700-1200) को गैर-हड़प्पन संस्कृति माना जाता है।
जोरवे संस्कृति (ई.पू. 1400-700) के साथ भी ऐसा ही है जिसमें विदर्भ और कोंकण
के कुछ हिस्सों के अलावा पूरा महाराष्ट्र शामिल है। भारत के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में
ताम्र-पाषाण बस्तियाँ हड़प्पा संस्कृति से बिल्कुल स्वतन्त्र थी। दक्षिण भारत में वे निश्चित
रूप से नवपाषाण बस्तियों के क्रमिक विकास में पाई जाती हैं। विन्ध्य क्षेत्र, बिहार और
पश्चिम बंगाल की ताम्र-पाषाण बस्तियाँ हड़प्पा संस्कृति से सम्बन्धित नहीं हैं।
जाहिर है कि विभिन्न प्रकार की हड़प्पा-पूर्व ताम्र-पाषाण संस्कृतियों ने सिन्ध,
बलुचिस्तान, राजस्थान और अन्य जगहों में कृषक के समुदायों के प्रसार को बढ़ावा दिया
और हड़प्पा की शहरी सभ्यता के विकास के लिए उपयुक्त स्थितियों का निर्माण किया।
सिन्ध में अमरी और कोट दीजी, राजस्थान में कालीबंगा यहाँ तक कि गणेश्वर का भी
उल्लेख किया जा सकता है। ऐसा लगता है कि कुछ ताम्र-पाषाण कृषक समुदाय सिन्धु के
बाढ़ से बने मैदानों की तरफ चले गए। उन्होंने काँस्य की कारीगरी सीखी और शहरों की
स्थापना करने में सफल रहे।
कुछ काम मध्य गंगा घाटी के ताम्र-पाषाण स्थलों पर किया गया है, जहाँ 138 स्थल
पाए गए हैं। मध्य गंगा घाटी क्षेत्र को देखते हुए, यह संख्या बड़ी नहीं है। जबकि हमें दक्षिण
भारत में 854 नवपाषाण स्थल मिलते हैं। सभी 138 स्थलों में उत्तर प्रदेश और बिहार में
अभी तक चौदह स्थलों की ही खुदाई हुई है और यहाँ ताम्बे का इस्तेमाल नगण्य ही मिलता
है। भले ही ये लोग बड़े पैमाने पर कृषि पर निर्भर थे। ताम्र-पाषाण बस्तियाँ पहाड़ियों से
सटे नदी-तट और ऊपरी क्षेत्रों तक ही सीमित थी। पूरी तरह से समतल मैदानी क्षेत्रों में बड़े
आकार की बस्तियाँ लौह-युग के पहले की नहीं हैं। मध्य गंगा क्षेत्र के ताम्र-पाषाण स्थल
और पश्चिम बंगाल के स्थल ई.पू. 1500-700 या फिर इसके बाद के हैं। पाण्डु राजर
धिबी और महिषदल, पश्चिम बंगाल में महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। मध्य और निम्न गंगा क्षेत्र के
इन सभी स्थलों ने अधिकतर पत्थर के औजार और कम ताम्बे के औजार के इस्तेमाल किए
थे। बाद में ताम्बा विरले ही प्रयोग में था हालाँकि मछली फँसाने के कुछ हुक पाए गए हैं।
मध्य और पश्चिम भारत में ताम्र-पाषाण संस्कृतियाँ ई.पू. 1200 या उसके बाद गायब
हो गईं। केवल जोरवे संस्कृति ई.पू. 700 तक जारी रही। भारत के कई हिस्सों में ताम्र-
पाषाणकालीन काले और लाल बर्तन ई.पू. दूसरी सदी के ऐतिहासिक काल तक थे।
हालाँकि ताम्र-पाषाण संस्कृतियों के अन्त और मध्य एवं पश्चिम भारत में प्रारम्भिक
ऐतिहासिक संस्कृतियों के उदय के बीच लगभग चार से छह शताब्दियों का बड़ा अन्तर था।
ई.पू. 1200 के आस-पास बारिश के स्तर में गिरावट के कारण पश्चिम भारत और पश्चिमी
मध्य प्रदेश में ताम्र-पाषाण बस्तियों का क्षरण हुआ। लेकिन पश्चिम बंगाल और मध्य गंगा
क्षेत्रों में वे लम्बे समय तक जारी रहीं। सम्भवतया पश्चिम भारत में ताम्र-पाषाणकालीन लोग
सूखे मौसम में काली मिट्टी वाले क्षेत्र में खन्ती (जुताई या खुदाई का औजार) के सहारे लम्चे
समय तक निर्वाह करने में असमर्थ थे। क्योंकि सूखे मौसम में जमीन को जोतना मुश्किल
होता था। जबकि लाल मिट्टी वाले क्षेत्रों में, खास तौर से पूर्वी भारत में लौह युग के आते ही
उसी समय ताम्र-पाषाण संस्कृति के जीवन स्वरूप को अपना लिया गया। जिसने धीरे-धीरे
लोगों को पूरी तरह से खेतिहर समाज में बदल दिया। मध्य गंगा के समतल मैदानों की
ताम्र-पाषाण संस्कृतियों के बारे में भी यही बात लागू होती है। इसी तरह दक्षिण भारत में कई
जगह लोहे के इस्तेमाल से ताम्र-पाषाण संस्कृति, मेगालिथिक संस्कृति (छोटे औजार और
उपकरण वाली संस्कृति) में तब्दील हो गई।

ताम्रपाषाण युग का महत्त्व

जलोढ़ समतल मैदानी इलाकों और घने जंगलों के क्षेत्रों को छोड़कर, ताम्र-पाषाण
संस्कृतियों के निशान लगभग पूरे भारत में पाए जाते हैं। मध्य गंगा क्षेत्र के जलोढ़ समतल
मैदानों में कई ताम्र-पाषाण स्थल पाए गए हैं। विशेषकर झील या नदियों के प्रयाग के
आस-पास। इस चरण में ज्यादातर लोगों ने ऐसी नदियों के किनारों पर ग्रामीण बस्तियों
की स्थापना की जो पहाड़ियों के निकट थी। जैसा कि पहले कहा गया उन्होंने ताम्बे के
औजारों के साथ-साथ माइक्रोलिथ और पत्थर के अन्य औजारों का इस्तेमाल किया। ऐसा
लगता है कि उनमें से अधिकतर लोग ताम्बा गलाने की कला जानते थे। लगभग सभी
ताम्र-पाषाणयुगीन समुदायों ने चाक पर तैयार काले और लाल बर्तन का इस्तेमाल किया।
अपने पूर्व-काँस्य चरण के विकास को देखते हुए, हम पाते हैं कि उन्होंने सबसे पहले
चित्रित बर्तनों का इस्तेमाल किया। उनके बर्तन खाना पकाने, खाने-पीने और भण्डारण के
लिए होते थे। उन्होंने लोटा और थाली दोनों का इस्तेमाल किया। दक्षिण भारत में नव-पाषाण
काल सहजता से ताम्र-पाषाण काल में प्रवेश कर गया और इसलिए इन संस्कृतियों को
नवपाषाण-ताम्रपाषाण कहा जाता है। अन्य भागों में विशेष रूप से पश्चिमी महाराष्ट्र और
राजस्थान में ताम्र-पाषाणयुगीन लोगों को उपनिवेशवादी माना जाता है। उनकी सबसे पुरानी
बस्तियाँ मालवा और मध्य भारत में थीं, जैसे कयथ और एरन में। पश्चिमी महाराष्ट्र में ये
बाद में स्थापित हुई और बिहार और पश्चिम बंगाल में तो बहुत बाद में।
ताम्र-पाषाणयुगीन समुदायों ने प्रायद्वीपीय भारत के पहले बड़े गाँवों की स्थापना की
और नवपाषाणयुगीन समुदायों से बहुत अधिक अनाज उपजाए। विशेष रूप से उन्होंने
पश्चिम भारत में जौ, गेहूँ एवं दाल तथा दक्षिणी और पूर्वी भारत में चावल की खेती की।
उनके अनाजयुक्त भोजन में माँसाहारी भोजन भी शामिल होता था। पश्चिम भारत में अधिक माँसाहार किया गया। लेकिन मछली और चावल पूर्वी भारत के आहार में महत्त्वपूर्ण
तत्व बना। पश्चिमी महाराष्ट्र, पश्चिमी मध्य प्रदेश और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में अधिक
संरचनाओं के अवशेष पाए गए हैं। मध्य प्रदेश के कयथ और एरन और पश्चिमी महाराष्ट्र
के इनामगाँव में बस्तियाँ चारों तरफ से घिरी हुई होती थीं। दूसरी ओर पूर्वी भारत में चिरान्द
और पाण्डु राजर धिबी में ढाँचों के अवशेष निम्न स्तर के थे, जो गड़े खम्भों और गोल घरों
का संकेत देते हैं। दफनाने की प्रथा भिन्न थी। महाराष्ट्र में मृत शरीर उत्तर-दक्षिण की स्थिति
में लिटाया जाता था, लेकिन दक्षिण भारत में इसे पूर्व-पश्चिम की दिशा में करके रखा जाता
था। पश्चिम भारत में व्यवस्थित कब्रगाह थी लेकिन पूर्वी भारत में यह अव्यवस्थित और
संकुचित कब्रगाह के रूप में दिखाई पड़ती है।

ताम्र-पाषाण संस्कृतियों की सीमाएँ

ताम्र-पाषाणकालीन लोग मवेशी, भेड़/बकरियाँ पालते थे और उन्हें आँगन में बाँधते थे।
सम्भवतः पालतू जानवरों का उपयोग खाने के लिए होता था और दूध एवं गव्य-उत्पादों
के लिए उनका इस्तेमाल नहीं होता था। कबीलाई लोग, जैसे कि बस्तर के गोंड मानते हैं
कि दूध केवल पशुओं के बच्चों के लिए है इसलिए वे उनका दूध नहीं दूहते थे। फलतः,
ताम्र-पाषाणयुगीन लोग जानवरों का पूर्ण उपयोग करने में सक्षम नहीं थे। इसके अलावा
काले कपास उपजाने वाले भूमि-क्षेत्र में रहने वाले मध्य और पश्चिम भारत के ताम्र-पाषाण
युगीन लोग व्यापक पैमाने पर कोई खेती नहीं करते थे। ताम्र-पाषाण स्थल पर न तो कुदाल
पाया गया है और न ही हल का कोई उपकरण। खुदाई के लिए या जोतने के लिए जिस
खन्ती या हल का प्रयोग होता था उसका वजन बढ़ाने के लिए सूराखदार पत्थर की चक्की
बँधी होती थी। इसका इस्तेमाल खोदने-काटने या झूम खेती में किया जाता था। ऐसी
खुदाई वाली खन्ती की सहायता से खंगर मिट्टी या कड़ी मिट्टी में बुआई सम्भव थी। काली
मिट्टी पर गहन और व्यापक खेती के लिए लोहे के औजारों के उपयोग की आवश्यकता थी
जो कि ताम्र-पाषाण युगीन संस्कृति में शायद ही कभी हुआ। पूर्वी भारत की लाल मिट्टी के
क्षेत्रों में रहने वाले ताम्र-पाषाण युगीन लोगों को भी इसी कठिनाई का सामना करना पड़ा।
पश्चिमी महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में बच्चों के दफन से ताम्र-पाषाण युगीन संस्कृतियों
की कमजोरी स्पष्ट होती है। खाद्य-उत्पादक अर्थव्यवस्था होने के बावजूद शिशु मृत्यु दर
बहुत अधिक थी। यह कुपोषण, चिकित्सा ज्ञान की कमी या महामारी के प्रकोप के कारण
से हो सकता है। किसी भी हाल में ताम्र-पाषाण सामाजिक और आर्थिक पैटर्न ने लोगों में
दीर्घायु को बढ़ावा नहीं दे सका।
ताम्र-पाषाण संस्कृति की अनिवार्यता एक ग्रामीण पृष्ठभूमि थी। इस दौरान ताम्बे की
आपूर्ति सीमित थी। यद्यपि हमें पूर्वी भारत में ताम्बे के खदान मिलते हैं, बिहार और पड़ोसी
राज्यों के ताम्र-पाषाण स्थलों में कुछ ताम्बे के औजार पाए गए हैं। कुछ ताम्र-पाषाण लोग मुख्य रूप से माइक्रोलिथ या छोटे पत्थर के औजारों का इस्तेमाल करते थे। वैसे ताप्चे
के बने उपकरण कम मजबूत होते थे। लोग ताम्बे के साथ टिन के मिश्रण की कला से
अनभिज्ञ थे और इस प्रकार काँस्य नामक अधिक मजबूत और उपयोगी धातु नहीं बना पाते
थे। काँस्य के औजारों ने क्रेट, मिस्र, मेसोपोटामिया और सिन्धु घाटी में प्राचीन सभ्यताओं
के उदय को सुनिश्चित किया।
ताम्र-पाषाण युगीन लोग लिख नहीं सकते थे, न ही काँस्य युग के लोगों की तरह वे
शहरी व्यवस्था में रहते थे। भारतीय उपमहाद्वीप के सिन्धु क्षेत्र में पहली बार सभ्यता के ये
सभी तत्व देखने को मिले। यद्यपि भारत के एक प्रमुख हिस्से में मौजूद अधिकांश ताम्र-
पाषाण युगीन संस्कृतियाँ, सिन्धु घाटी सभ्यता की तुलना में नई थीं, लेकिन उन्होंने सिन्धु
लोगों के उन्नत तकनीकी ज्ञान से कोई भी लाभ नहीं लिया था।

ताम्बे के ढेर और गेरू रंग के बर्तनों का चरण

पूरब में पश्चिम बंगाल और उड़ीसा, पश्चिम में गुजरात और हरियाणा और दक्षिण में
आन्ध्र प्रदेश से लेकर उत्तर में उत्तर प्रदेश के विशाल इलाके में छल्ले, आदिम कुल्हाड़ी,
कटार, तलवार, बरछी, भाला और मानव मूर्ति मिलाकर अस्सी ताम्बे के ढेर पाए गए हैं।
सबसे बड़ा भण्डार मध्य प्रदेश के गुंगेरिया में है जिसमें 424 ताम्बे के औजार एवं हथियार
और चाँदी के 102 पतली चद्दरें पाई गई हैं। हालाँकि, ताम्बे का बहुत बड़ा ढेर गंगा-यमुना
दोआब में जमा है। अन्य क्षेत्रों में ताम्बे की बरछी, लम्बी तलवारें और मानव मूर्तियाँ पाई
गई हैं। इन कलाकृतियों ने कई उद्देश्यों की पूर्ति की। उनका मतलब न केवल मछली
पकड़ने, शिकार करने और लड़ने से था बल्कि कृत्रिम और कृषि उपयोग के लिए भी था।
इससे ताम्रकार के उच्च तकनीकी कौशल और ज्ञान का अनुमान लगाया जा सकता है।
आदिम घुमन्तू कारीगरों की हस्तकला ऐसी नहीं हो सकती थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दो
स्थानों पर खुदाई में इन वस्तुओं में से कुछ गहरे रंग के बर्तन और मृदा संरचना खोजी गई
है। एक जगह पत्थर के उपकरण के साथ-साथ, पकी ईंट के बिखरे हुए टुकड़े भी पाए
गए हैं। इससे पता चलता है कि जिन लोगों ने ताम्बे के कुछ अन्य औजारों के साधनों का
इस्तेमाल किया, उन्होंने एक स्थायी जीवन को बसाया। वे उन प्राचीन ताम्र-पाषाण कृषकों
और कारीगरों में शामिल थे, जो दोआब के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से में व्यवस्थित रूप में बसे
थे। दोआब के ऊपरी हिस्से में गेरूए रंग के कई बर्तन पाए गए हैं लेकिन झारखण्ड और
इलाके के अन्य पठारी क्षेत्रों में बिखरे ताम्बे के ढेर और राजस्थान के खेतरी क्षेत्र में ताम्बे
के कई सुबूतों की खोज की गई है।
इस अवधि में गेरू रंग के बर्तनों की संस्कृति को 2000 से 1500 ई.पू. के बीच वैज्ञानिक
तिथि श्रृंखला से आठ भागों में रखा जा सकता है। जब इस संस्कृति की बस्तियाँ गायब
हो गई तो ई.पू. 1000 के आस-पास तक दोआब में ज्यादा बस्तियों नहीं थीं। हमें लोगों द्वारा काले और लाल रंग के बर्तनों के उपयोग से कुछ बस्तियों का पता चलता है, लेकिन
उनके आवासीय जमाव इतने कम हैं और प्राचीन वस्तुओं की गुणवत्ता इतनी खराब है कि
हम उनके सांस्कृतिक उपकरणों पर अलग से विचार नहीं बना सकते। हर हाल में दोआब
के ऊपरी भाग में गेरू रंग के बर्तन बनाने वाले लोगों के आने से बस्ती की शुरुआत हुई
होगी। हरियाणा और राजस्थान की सीमा पर जोधपुर में 1.1 मीटर के सबसे बड़े गेरू रंग
के बर्तनों के संग्रह का साक्ष्य मिला है। हालाँकि, ऐसा प्रतीत होता है कि ये बस्तियाँ कहीं
भी एक शताब्दी से अधिक नहीं रह पाईं। वे न तो बड़ी थी और न ही व्यापक क्षेत्र में फैली
हुई थी। ये बस्तियाँ क्यों और कैसे समाप्त हुईं यह स्पष्ट नहीं है। ऐसा माना जाता है कि
बाढ़ के आने से किसी व्यापक क्षेत्र में जल जमाव के कारण, मानव बस्तियाँ रहने लायक
नहीं रह गईं। कुछ विद्वानों के अनुसार गेरू रंग के बर्तन नर्म व कमजोर होते थे और एक
लम्बे समय तक पानी में वे नहीं टिक सकते।
ओसीपी लोग हड़प्पा के कनिष्ठ समकालीन हो सकते थे और उनके क्षेत्र को हड़प्पा
से दूर नहीं किया गया था। इसलिए हम ओसीपी लोगों और काँसे का प्रयोग करने वाले
हड़प्पा के लोगों के बीच कुछ आदान-प्रदान की उम्मीद कर सकते हैं।

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