आर्य संस्कृति की पहचान | Identity of Aryan Culture

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आर्य संस्कृति की पहचान | Identity of Aryan Culture

आर्य संस्कृति की पहचान

आर्य संस्कृति के ग्रन्थ

आर्य संस्कृति की मुख्य विशेषता वैदिक,ईरानी एवम ग्रीक साहित्यिक ग्रंथो
तथा प्रोटो-भारोपीय भाषाओं में पाए जाने वाले संज्ञानात्मक शब्दों से निर्धारित
की जाती हैं। आर्य संस्कृति के पुनर्निर्माण व अन्य पहलुओं में मदद करने वाले लिखित
ग्रन्थों और सामग्रियों में ऋग्वेद, जेण्ड-अवेस्ता और होमर के इलियड और ओडिसी
शामिल ग्रन्थ शामिल हैं। इन ग्रन्थों के काल-निर्धारण के मानदण्डों पर विशेषज्ञ बेशक
एकमत न हों लेकिन हम सहज रूप से स्वीकृत काल के आधार पर इसका विश्लेषण
कर सकते हैं। ऋग्वेद का काल ई.पू. 1500 बताया जाता है, हालाँकि ई.पू. 1000 में
इसमें कुछ बदलाव की बात स्वीकार की जा सकती है। जेण्ड-अवेस्ता के शुरुआती
हिस्सों को सामान्यतः ई.पू. 1400 और होमर के कामों को ई.पू. 900-800 का बताया
जाता है। भले ही इन ग्रन्थों का सम्बन्ध विभिन्न क्षेत्रों से हो लेकिन इनसे उस समय
का पता चलता है जब ताम्बा और काँस्य उपयोग में थे। होमर के परवर्ती लेखन में
लौह का भी उल्लेख है। सामान्यतः ग्रन्थों में जीवन-यापन के मुख्य स्रोत कृषि और
पशुपालन हैं। लोग समशीतोष्ण जलवायु में रहते थे। वे घोड़े पालते थे, जिनसे सवारी
और गाड़ी चलाने का काम लिया जाता था। वे आरे वाले पहियों का इस्तेमाल करते थे
और तरकश में रखे जाने वाले धनुष और तीर से लड़ते थे। वे पुरुष प्रधान समाज में रहते
थे। वे मृत शरीर को दफनाते थे, लेकिन उन्होंने शवों को जलाने की प्रथा भी निबाही।
ईरान और भारतीय उपमहाद्वीप में भारोपीय भाषाओं के बोलने वालों में अग्नि और सोम
की संस्कृतियाँ प्रचलित थीं। हालाँकि घोड़ों की बलि के साथ पशु बलि सभी भारोपीय
समुदायों द्वारा की जाती थी।
ग्रन्थों की जो सांस्कृतिक विषय-वस्तु है वह बाद के नवपाषाण और शुरुआती काँस्य
युग के हैं। ये सांस्कृतिक तत्व पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया तक विस्तृत है, जो भारत,
पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, अनातोलिया और ग्रीस से भौगोलिक रूप से
जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल से इस विशाल क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में विभिन्न समुदायों ने भारोपीय भाषाओं का उल्लेख किया। जलवायु की स्थिति, पक्षियों, जानवरों और पेड़ों जैसी
सजातीय शब्दों से पता चलता है कि आर्य गर्म क्षेत्रों में नहीं रहते थे। इसलिए, हमें पूर्वी यूरोप
और मध्य एशिया में फैले समशीतोष्ण क्षेत्र में शुरुआती भारोपीय भाषा बोलने वालों की
तलाश हैं। इसके जरिए हम उन लोगों की पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवंशिक संकेत को देख सकते
हैं जो भारोपीय भाषाओं के जरिये एक जुड़ाव को दिखाएगा। एम-17 नामक आनुवंशिक
चिल्न, मध्य एशियाई समतल मैदानों के उन 40 प्रतिशत लोगों में प्रचलित है, जो ज्यादातर
इण्डो-आर्यन भाषी में पाया जाता है। दिल्ली के हिन्दी भाषी क्षेत्र में यह 35 प्रतिशत लोगों में
पाया जाता है। इससे मध्य एशिया से इण्डो-आर्यों के प्रवास का पता चलता है।

घोड़े, इनका पालन और प्रसार

घोड़ा आर्य संस्कृति की अपरिहार्य विशेषता है, क्योंकि इसने भारोपीय प्रारम्भिक जीवन में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। घोड़े के लिए ऋग्वेद में अश्व शब्द है और संस्कृत, अवेस्तन,
ग्रीक, लैटिन और अन्य भारोपीय भाषाओं में इसके लिए समतुल्य शब्द ही हैं। प्राचीन
समय में विशेष रूप से वैदिक और अवेस्तन में कई व्यक्तिगत नाम अश्व केन्द्रित हैं।
प्राचीन वैदिक काल में पचास से अधिक घोड़े और तीस रथ के नाम हैं। इसी तरह अस्य
या अश्व अवेस्ता में कई ईरानी प्रमुखों के नाम का हिस्सा है। हेरोडोटस द्वारा वर्णित कुछ
ईरानी जनजातियों को नाम घोड़े के नाम पर रखे गए। ऋग्वेद में 215 बार अश्व शब्द
विभिन्न रूपों में आया है जबकि किसी अन्य जानवर का इतना उल्लेख नहीं है। गौ (गाय)
शब्द 176 बार और वृषभ (बैल) शब्द 170 बार आया है। इन दोनों को एक साथ देखने
से मवेशी पालन के महत्व का पता चलता है। हालाँकि, पशु पालने वालों में घोड़े रखने
वाले अभिजात वर्ग का प्रभुत्व था। बाघ और गैण्डे भारतीय उष्णकटिबन्धीय और सामान्य
समशीतोष्ण जलवायु विशेषता वाले, मध्य एशिया की ठण्डी परिस्थितियों में नहीं पाए जाते।
इसलिए इनका उल्लेख ऋग्वेद में नहीं मिलता और इसी तरह के अन्य उष्णकटिबन्धीय
और समशीतोष्ण तापमान के क्षेत्र वाले जानवर जैसे कि शेर, हिरण, भैंस और हाथी के
सन्दर्भ घोड़े, गाय और बैल की तुलना में कम मिलते हैं। यह फर्क मध्य एशिया में ऋग्वेद
के प्रभाव को दर्शाता है।
घोड़े की प्रशंसा में ऋग्वेद में पूरे दो श्लोक समर्पित हैं। लगभग सभी वैदिक देवता इससे
जुड़े हैं और यह विशेष रूप से इन्द्र और उसके साथी मारुत के सन्दर्भ में हैं। हालाँकि
वैदिक लोग प्रजा (बच्चों) और पसु (पशु) के लिए अक्सर प्रार्थना करते हैं। वे विशेष रूप
से घोड़ों की माँग करते हैं, कभी-कभी हजारों की संख्या में घोड़ों की मांग का उल्लेख है।
अवेस्ता में पशु धन अधिक महत्वपूर्ण लगता है, लेकिन घोड़े का अपना महत्व है। अवेस्ता
मित्र (जो ऋग्वेद में भी भगवान् मित्र ही हैं) से बार-बार घोड़े और रथ की प्राप्ति के लिए
प्रार्थना की जाती है। अवेस्ता में कई देवताओं के लिए ‘तेज-अश्वारोही’ विशेषण आया है। इस ग्रन्थ में भगवान से प्रार्थना की गई है कि राजा को तेज घोड़े और क्षमतावान पुत्र
की प्राप्ति हो। होमर के यहाँ अश्व और अश्व-रथ का उल्लेख समान रूप से महत्वपूर्ण
है। ओडिसी में अश्वपाल, या शासक के घोड़ों के प्रभारी जैसे प्रचलित शब्द मिलते हैं।
इस प्रकार वैदिक, ईरानी और ग्रीक ग्रन्थ निःसन्देह बताते हैं कि भारोपीय भाषा के प्राचीन
भाषी घोड़े से परिचित थे।
शुरुआती दौर के पालतू घोड़े भारतीय उपमहाद्वीप से काफी दूरी पर पाए गए। यह
महत्वपूर्ण है कि पश्चिम में दनीपर नदी और पूर्व में वोल्गा नदी के बीच सबसे अधिक संख्या
में घोड़े दिखाई पड़ते हैं। ई.पू. छठी सहस्राब्दि में घोड़े के शुरुआती सबूत दक्षिण उराल
क्षेत्र और काला सागर क्षेत्र में पाए जाते हैं। चौथी सहस्राब्दि ई.पू. में घोड़े अनातोलिया
में पाए गए जो काले सागर के करीब है। ई.पू. तीसरी सहस्राब्दि तक दक्षिण साइबेरिया
में घोड़े बड़ी संख्या में पाए गए। जाहिर है, घोड़े का उपयोग उत्पादन के पूर्व लम्बे समय
तक होता रहा। हालाँकि काला सागर और दक्षिण उराल के बीच के क्षेत्र में ई.पू. 6000
के आस-पास घोड़ा अस्तित्व में था, लेकिन यूरेशिया में यह लगभग ई.पू. 2000 में एक
सामान्य उपयोग में आया।
पश्चिमी एशिया में घोड़े के इस्तेमाल का सबसे प्रारम्भिक सबूत ई.पू. उन्नीसवीं सदी
के उत्तरार्द्ध में अनातोलिया में मिला है। पश्चिमी एशिया में इसके प्रभावी उपयोग का श्रेय
ई.पू. 1595 में बेबिलोनिया के कसित आक्रमण को जाता है। जब बेबीलोनिया में घोड़े
पहली बार आए, इसे पहाड़ी गधा कहा गया था।

युद्ध रथ

वैदिक, अवेस्तन और होमर ग्रन्थों से प्राप्त उल्लेखों से भारोपीय नागरिकों के द्वारा
अश्वरथों के व्यापक उपयोग का पता चलता है। उत्तर-वैदिक ग्रन्थों के वाजपेय बलिदान
में रथ दौड़ का उल्लेख मिलता है जो एक ग्रीक परम्परा थी। जिसका व्यापक वर्णन
होमर ने किया है। माना जाता है कि पहिएदार रथ ई.पू. चौथी सहस्राब्दि में पश्चिमी
एशिया में शुरू हुआ और उसी दौरान दक्षिण रूस के समतल मैदानी क्षेत्र तक पहुंच गया।
ई.पू. 3000 के बाद रथ के अस्तित्व के पर्याप्त सबूत दक्षिण रूस की खुदाई से प्राप्त
हुए हैं। ई.पू. तीसरी सहस्राब्दि के दो या तीन पहियों वाले रथ के अस्तित्व के पर्याप्त
साक्ष्य मिले हैं। घुड़सवार सहित रथों के अस्तित्व के संकेत ई.पू. 1400 के आस-पास
और बाद के मितानी शासकों के शासन काल में मिलते हैं। इनमें प्रमुख हैं-‘इनमें चलने
वाले रथ’, ‘एक दूसरे का आमना-सामना करने वाले रथ’ और ‘बड़े घोड़ों वाले रथ’
थे। हम इण्डो-ईरानियन ‘घुड़सवार’ के बारे में भी सुनते हैं। दशरथ नाम के मितान्नी राजा
का उल्लेख भी है; जिसका अर्थ है दस रथ रखने वाला व्यक्ति। लकड़ी के पहिये भारत
के बाहर होते थे, लेकिन ई.पू. 2000 तक उनकी बनावट सामान्यतः कठोर या सॉलिड होती थी। हड़प्पा के सन्दर्भ में मिट्टी के पहियों का उल्लेख मिलता है, यद्यपि ई.पू. 2500
से पहले तक उनका अस्तित्व नहीं दिखता।

स्पोक वाला पहिया

ईरान के हिसार में और उत्तरी काकेशिया में ई.पू. 2300 के आस-पास स्पोक वाले पहिये
दिखाई देते हैं। ई.पू. 1800 के आस-पास के हिसार की एक बेलनाकार मुहर पर छह स्पोक
वाले पहिये के रथ का चित्र अंकित है। कहा जाता है कि ई.पू. उन्नीसवीं शताब्दी में हित्तियों
ने अनातोलिया को जीतने के लिए हल्के पहिये वाले रथ का इस्तेमाल किया था। पश्चिमी
कजाकिस्तान के निकटवर्ती दक्षिणी उराल के सिन्ताश्ता क्षेत्र में स्पोकयुक्त पहियों वाले
युद्ध-रथ दिखाई देते हैं। ई.पू. 1500 तक, पूर्वी यूरोप और पश्चिमी एशिया में कई जगहों
पर स्पोक वाले पहिए अस्तित्व में थे।
स्पोक वाला पहिया न तो हड़प्पा में मिलता है, न मुहनजो-दड़ो में; जबकि वहाँ खिलौने
वाली सारी गाड़ियाँ ठोस पहिये की थीं। हड़प्पा काल में हरियाणा के हिसार जिले के
बनावली में स्पोक वाले पहियों का इस्तेमाल होता था, लेकिन यह उत्तर-हड़प्पा काल का
चरण माना जाता है।
ई.पू. दूसरी सहस्राब्दि में घोड़ों के अवशेष दक्षिण मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान
में पाए गए हैं। ई.पू. 1500 तक घोड़े और रथ के संकेत किरगीजिया, अल्ताई, मंगोलिया,
पामीर पर्वत श्रृंखला और सबसे अधिक दक्षिण ताजिकिस्तान में मिले हैं।

उपमहाद्वीप में घोड़ों के अवशेष

ई.पू. तीसरी सहस्राब्दि में भारतीय उपमहाद्वीप में घोड़े के कुछेक अवशेष ही पाए गए
और वे भी सन्देहास्पद प्रकृति के हैं। अवशेषों के अध्येता रिचर्ड मेडो को ई.पू. 2000
तक भारतीय उपमहाद्वीप में घोड़े की उपस्थिति का स्पष्ट अस्थि सबूत नहीं मिला। उनके
विचार में दक्षिण एशिया में घोड़ों की उपस्थिति के सबसे प्राचीन संकेत बलूचिस्तान के
काची समतल मैदानों में बोलन पास के निकट पिरक परिसर में ई.पू. 1700 के आस-पास
मिलता है। पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमा में स्थित स्वात घाटी में गान्धार संस्कृति की
कब्रों में ई.पू. 1400 तक के घोड़ों के अवशेष एवं घोड़ों से सामान ढोने के संकेत मिले हैं।
उत्तर-पश्चिम में घोड़ों के अस्तित्व ने उत्तर भारत में इनके पहुंचने में मदद की। घोड़ों की
हड्डियाँ, चित्रित भूरे बर्तनों पर बने हुए इसके चित्र, हड़प्पा संस्कृति से सम्बद्ध हैं जो ई.पू.
1600-1000 के हैं ये हरियाणा के भगवानपुर में पाए गए हैं। कच्छ क्षेत्र के सुरकोतड़ा
घोड़े, पिरक घोड़े के समकालीन हैं। बाद के या उत्तर-शहरी हड़प्पा काल में मुहनजो-दड़ो,
हड़प्पा, लोथल और रोपर में भी घोड़े दिखाई पड़ते हैं। सन् 1986-95 में हुए सबसे हाल
के उत्खनन से हड़प्पा में घोड़े के मौजूदगी की सूचना नहीं मिली है। हालाँकि हड़प्पा स्थित कच्छ स्थल के धोलावीरा की खुदाई में कई हड्डियों का पता चला है, जिसमे घोड़े की
किसी भी अस्थि का कोई संकेत नहीं है।
ई.पू. अठारहवीं शताब्दी के बाद वाले उत्तर-हड़प्पा काल में विभिन्न स्थानों पर घोड़ों की
मौजूदगी पिरक और स्वात घाटी में इसके शुरुआती काल से ही बनी रही। यह बात पिरक,
गान्धार और चित्रित भूरे बर्तनों के स्थलों की इतर-हड़प्पा/उत्तर-हड़प्पा संस्कृतियों के लिए
महत्वपूर्ण है।

भूमिगत निवास

आर्य संस्कृति में भूमिगत निवास का उल्लेख भी किया जा सकता है। शायद ऐसा ठण्ड
के कारण हुआ होगा। ई.पू. 4500 के आस-पास यूक्रेन में घोड़े का उपयोग करने वाले
लोग ऊपरी सतह के अलावा अर्ध-भूमिगत घरों में रहते थे। पूर्व की ओर बढ़ते हुए
हम देख सकते हैं कि भूमिगत निवास यूराल-वोल्गा क्षेत्र में ई.पू. चौथी और तीसरी
सहस्राब्दि में और मध्य एशिया के एण्ड्रोनोवो संस्कृति में ई.पू. दूसरी सहस्राब्दि में शुरू
हुआ। सम्भावना यह भी है कि मृतकों को दफनाने की प्रक्रिया भूमिगत निवास के कारण
विकसित और फलीभूत हुई हो। ई.पू. 1500 के आस-पास स्वात घाटी के कुछ गाँवों में
बड़े भूमिगत निवास के संकेत मिलते हैं। इन्हें पलायन से जोड़ा जा सकता है क्योंकि इसके
बाद अन्तिम संस्कार के पश्चात दफन के भी सबूत मिले हैं। कश्मीर में श्रीनगर के पास
बुर्जहम और हरियाणा में भूमिगत रहवास प्रचलित था। यह कश्मीर की सीमाओं पर मध्य
एशिया के प्रभाव के कारण हो सकता है।

भोजपत्र

भूमिगत घरों के साथ भोजपत्र की लकड़ी का उपयोग आर्यों की विशेषता रही है। भोजपत्र को
संस्कृत में भुर्ज कहा जाता है और भारोपीय भाषाओं में इसके छ: पर्यायवाची शब्द हैं। भोजपत्रों
के पेड़ यूक्रेन सहित यूरेशिया के महत्वपूर्ण हिस्सों में पाए जाते हैं। इसके प्राचीन अवशेष
अन्द्रोनोवन की बसावटों में देखने को मिलते हैं, जहाँ इसका उपयोग पाइन और देवदार के
साथ ढांचों के निर्माण में किया जाता था। विशेष रूप से भूमिगत घरों को भोजपत्र से ढंका
जाता था। मध्ययुगीन भारत में कई पाण्डुलिपियाँ भोजपत्र के वृक्ष की पत्तियों पर लिखी गई थीं।

अन्तिम संस्कार

घोड़ों के उपयोग की तरह अन्तिम संस्कार भी आर्यों की एक विशेषता के रूप में विकसित
हुआ। इसका प्रचलन वैदिक, अवेस्तन और होमर ग्रन्थों में तो दिखाई पड़ता है लेकिन यह
विकसित हड़प्पा संस्कृति की विशेषता नहीं है। हड़प्पा के लोग दफनाने का काम करते थे, बाद के दौर में इस प्रक्रिया में बदलाव आया। कब्रिस्तान-1 में वर्तननुमा कब्र से इसकी
जानकारी मिलती है। जिसके तहत दफन किए गए बर्तनों में जली हुई हड्डियों के देर के
प्रमाण भी मिले हैं।
गुजरात में हड़प्पा संस्कृति के विस्तारित क्षेत्र में कई जगहों पर शवों के अन्तिम
संस्कार के बाद दफनाने के सबूत मिले हैं, लेकिन इसके समय-काल का ठीक-ठीक पता
लगाना मुश्किल है। अतः सुरकोतड़ा में मिले सबूत सन्देहपूर्ण हैं। कालानुक्रमिक स्थिति
को ध्यान में रखते हुए चाहे हम कितना भी उदार दृष्टिकोण अपना लें, किसी भी तरह से
यह ई.पू. 2000 से पहले का नहीं हो सकता। यह वह काल है जहाँ से उत्तर-शहरी चरण
की शुरुआत के संकेत मिलते हैं। इसका श्रेय बाहरी क्षेत्रों के सम्पर्क में आने को दिया
जा सकता है जहाँ यह बहुत पहले शुरू हो चुका था। पक्षियों और जानवरों की जली हुई
हड्डियों के आधार पर मानव दाह-संस्कार पर बहस करना मुश्किल है। मृतकों के दाह-
संस्कार का अस्तित्व या सुबूत ई.पू. पाँचवीं शताब्दी से है। पुरातात्त्विक रूप से हॉलैण्ड,
जर्मनी, पूर्वी यूरोप, इराक और मध्य एशिया के कजाकिस्तान में ई.पू. 5000-4000 में
इसके सुबूत पाए जाते हैं। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि घोड़े का उपयोग करने वालों
ने इसे कब और कहाँ अपनाया। लेकिन ई.पू. 1500 के आस-पास यूरोप और एशिया
दोनों के अलावा पूर्वी मध्य एशिया के चीनी भूभाग में इस तरह के अभ्यास पाए गए हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में घोड़ों का उपयोग करने वालों के द्वारा इसकी शुरुआत के सबूत
ई.पू. दूसरी सदी के उत्तरार्ध में स्वात घाटी में मिलते हैं। स्वात क्षेत्र से 500 किलोमीटर
दूर तजाकिस्तान में इसकी शुरुआत ई.पू. 1400 के आस-पास हुई। पुरातत्ववेत्ता मार्टिमर
स्वीलर हड़प्पा और मुहनजो-दड़ो दोनों में दाह-संस्कार के प्रचलन को खारिज करते हैं।
हालाँकि यह सम्भव है कि उत्तर-हड़प्पा के लोगों द्वारा बाहरी सम्पर्कों के प्रभाव में इसे
अपनाया गया होगा।

अग्नि की उपासना

इण्डो-आर्यन और इण्डो-ईरानियन, दोनों के लिए आग की उपासना विशेष महत्व रखती
है। ऋग्वेद में अग्निवेदी या वेदी का उल्लेख है और अवेस्ता में भी अग्नि-पूजा बहुत
महत्वपूर्ण है। कुछ विद्वानों का मानना है कि अग्नि की पूजा हड़प्पा संस्कृति है, लेकिन
गुजरात के लोथल और राजस्थान के कालीबंगा में ‘अग्निवेदी’ की तथ्यपरकता पर स्वयं
उत्खनकों ने सन्देह व्यक्त किया है। यह महत्वपूर्ण है कि हड़प्पा के सन्दर्भ में अग्निवेदी
की खोज न तो ग्रन्थों के सन्दर्भ से मेल खाते हैं, न ही प्राचीन परम्परा से। हालांकि,
मानव अस्तित्व के लिए आग एक जरूरी चीज है। सिन्धु घाटी सहित कई क्षेत्रों में इसकी
पूजा
की जा सकती है, लेकिन इसका वैदिक वेदी में बदलना बेहद सन्देहास्पद है। हम
यहाँ इस बात का उल्लेख कर सकते हैं कि ई.पू. 4000-3500 के आस-पास यूक्रेन में प्राप्त कुछ संरचनाएँ ऐसी मिली हैं, जो ठीक वैदिक अग्निवेदियों जैसी तो नहीं हैं पर
अग्नि-पूजन का संकेत देती हैं।

पशु बलि

पशु बलि एक महत्वपूर्ण आर्य अनुष्ठान था। हालाँकि जनजातीय लोगों के बीच इसके
सार्वभौमिक प्रचलन को देखते हुए कुछ भी अनुमान करना मुश्किल है। भोजन का संग्रहण
और भण्डारण करने वाले प्राचीनतम लोग दूध एवं गव्य उत्पादों के लिए पशुपालन नहीं
करते थे। गोण्ड जनजाति के एक समूह में आज भी मान्यता है कि दूध वस्तुत: बछड़ों या
बछियों के लिए है। इसलिए प्राचीन गाँवों में पशुपालन करने वाले लोग मुख्यत: माँसाहारी
थे। माँसाहारी भोजन की आवश्यकता के कारण पशु बलि की प्रथा का विकास सम्भव हो
सकता है। यूक्रेन और दक्षिण रूस में ई.पू. चौथी और तीसरी सहस्राब्दि से सम्बन्धित कब्र
से अन्तिम संस्कार में पशु बलि के कई उदाहरण मिलते हैं। यह ई.पू. दूसरी सहस्राब्दि
और उसके बाद के काल में दक्षिण मध्य एशिया में भी दिखाई पड़ता है। स्पष्ट है कि यह
अनुष्ठान सामान्य रूप से प्रचलित था और इस दुनिया से दूसरी दुनिया यानि अगले जन्म
के लिए आवश्यकताओं के प्रतीक को दर्शाता है।

अश्व-बलि

सम्भवतः पशु बलि कई कबीलाई समूहों में प्रचलित थी, लेकिन घोड़े की बलि भारोपीय
लोगों की मुख्य विशेषता थी, खासकर वैदिक लोगों की। फ्रांसीसी वैदिक विद्वान लुई रेनु
इसे एक भारोपीय अनुष्ठान मानते हैं। घोड़े की बलि और इस प्रथा के प्रसार को लेकर
पूर्वी, मध्य, पश्चिमी एवं उत्तरी यूरोप के अलावा काकेशिया एवं मध्य एशिया में बहुत से
सबूत पाए जाते हैं। यूक्रेन और दक्षिण रूस में कई कब्रिस्तान ऐसे हैं जहाँ एक से अधिक
घोड़ों की बलि का प्रमाण मिलते हैं। यह प्रथा ई.पू. पाँचवीं सहस्राब्दि के उत्तरार्ध में शुरू
हुई होगी। उत्तरवर्ती सहस्राब्दि काल में यह और व्यापक हो गया और रोम, मध्ययुगीन
आयरलैण्ड एवं मध्य एशिया में भी जारी रहा।
हालाँकि ऋग्वेद की दसवीं पुस्तक में दो श्लोक घोड़े की बलि के प्रति समर्पित हैं। बाद
के वैदिक ग्रन्थों में घोड़े की बलि अश्वमेध में बदल दी गई। उपमहाद्वीप में पूर्व-वैदिक
समय में पशु बलि दी जाती होगी लेकिन हड्डियों पर पाए गए कटे निशानों के बावजूद,
यह नहीं कहा जा सकता कि घोड़े की बलि धार्मिक प्रयोजनों के लिए दी जाती थी। यूरोप
और मध्य एशिया में घोड़ों की बलि के पुरातात्त्विक प्रमाण भारत में कम हैं। देवी शक्ति
के विभिन्न रूपों की पूजा में भैंसे की बलि एक महत्वपूर्ण प्रथा बन गई। लेकिन पूर्वी यूरोप
और मध्य एशिया में इस जानवर की दुर्लभता के कारण इस परम्परा का फैलाव नहीं हुआ।

सोम की उपासना

अवेस्तन भाषा में सामोमा के नाम से जानी जाने वाली सोग उपासना केवल ईरानी और
वैदिक लोगों तक ही सीमित थी। सोम के पौधे की पहचान को लेकर लाने समय से बहस
खिड़ी हुई है लेकिन अब फेडा नामक एक पौधे को सोम माना जाता है। जिसकी छोरी
रहनियाँ दक्षिण पूर्वी तुर्कमेनिस्तान के मालियाना में होगोलोक-21 मन्दिर परिसर के पथ
अनुष्ठानों में प्रयुक्त होने वाले बर्तनों में पाई गई है। हालांकि, कई विद्वानों ने इसे स्वीकार
कर लिया है, लेकिन निर्णायक तौर पर सबूत की खोज अभी भी जारी है।

स्वास्तिक

कभी-कभी स्वास्तिक को आर्यवाद का संकेत माना जाता है। यह समबाहु क्रॉस द्वारा निर्मित
प्राचीन प्रतीक चिल के रूप में प्रयुक्त है। नाजी ने इसे विशुद्ध आर्यवाद के प्रतीक के रूप
में अपनाया जिसके कारण इसे वैश्विक स्तर पर पहचाना गया। वैदिक साहित्य में इस शब्द
का उल्लेख इस्वी सन् के प्रारम्भिक ग्रन्थों में है। जब इसे धार्मिक कामों के लिए शुभ संकेत
माना जाता था। मैके के अनुसार स्वास्तिक प्रतीक का उद्भव एलम में हुआ। ई.पू. 2000
में यह हड़प्पा संस्कृति में आया। दक्षिण ताजिकिस्तान में यह ई.पू. 1200 के आस-पास
आया। ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय तक यह आर्यों द्वारा अपनाया जा चुका था और
ईसाई युग की प्रारम्भिक सदी में यह ब्राहमणवादी संस्कृति का प्रतीक माना गया था।

भाषा और अभिलेखकीय साक्ष्य

भाषा आर्य संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। भाषाविदों ने प्रोटो-भारोपीय भाषा
का पुनर्निर्माण किया है। जो ई.पू. सातवीं या छठी शताब्दी के आस-पास शुरू हुआ था।
भारोपीय भाषा को पूर्वी और पश्चिमी शाखाओं में विभाजित किया गया है। ई.पू. 4500 में
पूर्वी शाखा में ध्वनि का विकास हुआ जिसे प्रोटो-इण्डो-ईरानियन कहा जाता है। हालाँकि
प्रोटो-इण्डो-ईरानियन या इण्डो-आर्यन भाषा के लिप्यंकन के साक्ष्य ई.पू. 2200 से पहले
नहीं मिलते। इसका पहला भाषाई साक्ष्य इराक में अगाडे के राजवंश के एक शिलापट पर
मिलता है। इस अभिलेख में दो नाम अरिसेना और सोमसेना के रूप में व्याख्यायित है।
अनातोलिया के हित्तीत अभिलेख ई.पू. उन्नीसवीं सदी से ई.पू. सत्तरहवीं सदी तक के
इस क्षेत्र के भारोपीय भाषियों की पश्चिमी शाखा के लोगों का संकेत देते हैं। इसी तरह
ग्रीस के मायसीनियन अभिलेख ई.पू. चौदहवीं शताब्दी में इस शाखा के लोगों के आगमन
का संकेत देते हैं। पूर्वी शाखा की भाषाओं को बोलने वालों का उल्लेख सोलहवीं से
चौदहवीं शताब्दी तक मेसोपोटामिया के मित्तानी और कस्सित के अभिलेख में मिलता है।
लेकिन भारत में ऐसे अभिलेख नहीं पाए जाते। इसलिए इस पर बहस करना निरर्थक है कि भारोपीय भाषा बोलने वाले भारत से मेसोपोटामिया तक फैले। ऋग्वेद में मुण्डा के कई
शब्द हैं और यह स्पष्ट है कि ये उत्तर-हड़प्पा काल में शामिल किए गए हैं। अगर वैदिक
लोग उत्तर-पश्चिम में जाते तो मुण्डा शब्द उस क्षेत्र में भी पाए जाते। लेकिन उन्होंने ऐसा
नहीं किया। कुछ रूसी भाषाविदों के अनुसार भारोपीय भाषा का उद्भव स्थल काकेशिया
के दक्षिण में है। इसमें पूर्वी अनातोलिया और उत्तरी मेसोपोटामिया शामिल हैं। हालाँकि
पूर्वी अनातोलिया काला सागर से दूर नहीं है, जहाँ प्रारम्भिक तौर पर अश्वपालन शुरू हुआ
था। ई.पू. छठी-पाँचवीं सहस्राब्दि में पूर्वी अनातोलिया में न तो अश्व और न ही भारोपीय
संस्कृति के अन्य विशेष लक्षण पाए गए हैं।
रूसी भाषाविदों की खोज गॉर्डन चाइल्ड की धारणा को पुष्ट करती है कि अनातोलिया
आर्यों का मूल घर था। हाल ही में रेन्फ्रेव ने भी इसकी पुष्टि की है। उनके अनुसार, कृषि
और भारोपीय भाषा ई.पू. सातवीं सहस्राब्दि के आस-पास पूर्वी अनातोलिया में उत्पन्न हुई
थी। उनका तर्क है कि अनातोलिया में कृषि विस्तार ने विभिन्न दिशाओं में भारोपीय भाषा
को फैलाया। हालाँकि, बहुत पहले ई.पू. 10,000 के आस-पास जेरुसलम के पास एक
मेसोथिलिथ साइट पर अनाज उपजाए गए थे और सम्पूर्ण कृषि के रूप में इसका विस्तार,
थोड़े बदलाव के साथ ई.पू. 7000 के आस-पास फिलिस्तीन में हुआ। यह कृषि फिलिस्तीन
और अनातोलिया तक ही सीमित नहीं थी। ई.पू. छठी और सातवीं सहस्राब्दि में यह इराक,
ईरान और बलूचिस्तान में भी थी। भारोपीय भाषा बोलने वाले प्राचीन लोगों के जीवन में
कृषि उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी। शुरुआत में पूर्वी और पश्चिमी समूहों द्वारा उपयोग की जाने
वाली भारोपीय भाषा के लोगों में सामान्यतः कृषि से जुड़े शब्दों की कमी इसका प्रमाण
प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा अगर आर्य भाषा अनातोलिया में उत्पन्न हुई, तो वह अपने
उद्भव स्थान से पूरी तरह गायब कैसे हो गई?

इण्डो-आर्यन का विस्तार

इण्डो-आर्यन का मध्य एशिया से भारत में पलायन को इंगित करने वाले आनुवंशिक संकेतों
को हम याद कर सकते हैं। मनुष्य की रक्त कोशिकाओं में आनुवंशिक विशेषता डीएनए
के रूप में जाना जाता है। वे वंशानुगत होते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी पाए जाते हैं। अनुमानत:
ई.पू. 8000 में मध्य एशिया के मैदानी क्षेत्र के एक छोर से दूसरे छोर में फैले लोगों में कुछ
विशेष आनुवंशिक संकेत दिखाई देते हैं। इन आनुवंशिक संकेतों को एम-17 कहा जाता
है। वे मध्य एशिया के 40 प्रतिशत से अधिक लोगों में पाए जाते हैं। जब वैज्ञानिकों ने उन्हें
दिल्ली में देखा तो उन्होंने 35 प्रतिशत से अधिक हिन्दी बोलने वालों में इसे पाया। लेकिन
द्रविड़ भाषी में ऐसा 10 प्रतिशत में ही पाया गया। जीव विज्ञानियों के अनुसार ई.पू. 8000
के बाद मध्य एशिया से इण्डो-आर्यों का पलायन हुआ, लेकिन भाषाविदों और पुरातत्वविदों
ने इसे ई.पू. 2000 बताया है।
हम रूसी और कई इण्डो-आर्यन भाषाओं में भूतकाल के इस्तेमाल में एक समानता
पाते हैं। रूसी में ‘Ya chital” का अर्थ “मैं पढ़ता हूँ’ और ‘Ya pishal’ का अर्थ
‘मैने लिखा’ होता है। L से अन्त होने वाले भूतकालिक शब्द बंगला, असमिया, ओड़िया,
मैथिली, भोजपुरी और मगही में प्रयुक्त होते हैं। इसका प्रयोग मराठी और कभी-कभी
राजस्थान में भी किया जाता है। पंजाबी में यह बहुत कम मिलता है। भाषाविद इण्डो-आर्यन
भाषाओं और रूसी भाषाओं के सम्बन्धों को बेहतर तौर पर खोज सकते हैं, लेकिन
इण्डो-आर्यन के पलायन में आनुवंशिक सबूत ही निर्णायक साबित होंगे।

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