UK 10TH HINDI

UK Board 10 Class Hindi Chapter 13 – मानवीय करुना की दिव्य चमक (गद्य-खण्ड)

UK Board 10 Class Hindi Chapter 13 – मानवीय करुना की दिव्य चमक (गद्य-खण्ड)

UK Board Solutions for Class 10th Hindi Chapter 13 मानवीय करुना की दिव्य चमक (गद्य-खण्ड)

1. लेखक – परिचय
प्रश्न – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत दीजिए- जीवन परिचय, रचनाएँ, साहित्यिक विशेषताएँ, भाषा-शैली ।
उत्तर- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
जीवन-परिचय — सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म सन् 1927 ई० में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं सम्पन्न हुई। उच्चशिक्षा के लिए सर्वेश्वरजी इलाहाबाद गए। सक्सेनाजी अपने जीवन में अध्यापक, आकाशवाणी में सहायक प्रोड्यूसर, ‘दिनमान’ नामक पत्रिका के उपसम्पादक और बाल-पत्रिका ‘पराग’ के सम्पादक रहे। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पहचान मध्यवर्गीय आकांक्षाओं के लेखक के रूप में की जाती है। सन् 1983 ई० में सक्सेनाजी का निधन हो गया ।
रचनाएँ – सर्वेश्वरजी ने साहित्य के प्रत्येक क्षेत्र में रचनाएँ की हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
कविता-संग्रह – काठ की घण्टियाँ, कुआनो नदी, जंगल का दर्द, खूँटियों पर टँगे लोग।
उपन्यास – पागल कुत्तों का मसीहा, सोया हुआ जल ।
कहानी-संग्रह — लड़ाई ।
नाटक – बकरी ।
बाल-साहित्य-भौं भौं खौं खौं, बतूता का जूता, लाख की नाक ।
लेख-संग्रह- चरचे और चरखे।
साहित्यिक विशेषताएँ – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पहचान मध्यवर्गीय आकांक्षाओं के लेखक के रूप में होती है। मध्यवर्गीय जीवन के सपनों, महत्त्वाकांक्षाओं, संघर्ष, शोषण, हताशा और कुण्ठा का चित्रण उनके साहित्य में मिलता है। सर्वेश्वरजी स्तम्भकार थे और ‘दिनमान’ नामक पत्रिका में ‘चरचे और चरखे’ नाम से स्तम्भ लिखते थे। इस स्तम्भ में वे बेबाक सच की चर्चा करते थे। ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनके लेखन में सहजता और स्वाभाविकता दिखाई देती है।
भाषा-शैली- सक्सेनाजी की भाषा आम बोलचाल की, किन्तु साहित्यिक हिन्दी है। उनका पाठक वर्ग सुनिश्चित है। उनकी भाषा में तत्सम, तद्भव, अंग्रेजी के शब्दों के साथ-साथ आम बोलचाल में प्रचलित मुहावरे भी सहजता से प्रयुक्त हुए हैं। उनकी शैली आकर्षक और प्रवाहपूर्ण है।
2. गद्यांश पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
(1) फादर को ……. करता हूँ।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय लिखिए।
(ग) गद्यांश के आधार पर फादर के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए ।
(घ) ‘ …… उसके लिए इस जहर का विधान क्यों हो?’ इस प्रश्न के द्वारा लेखक आखिर क्या कहना चाहता है?
(ङ) ‘बाँहें खोल गले लगाने को आतुर’ इस वाक्यांश के द्वारा फादर कामिल बुल्के के चरित्र की किस विशेषता का पता चलता है?
(च) लेखक किस बात का साक्षी था?
(छ) आज लेखक क्या महसूस कर रहा है?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम – मानवीय करुणा की दिव्य चमक। लेखक – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ।
(ख) आशय – लेखक फादर कामिल बुल्के के अत्यधिक ऐसा फोड़ा होता है, जिसका जहर सारे शरीर में फैल जाता है और निकट था। फादर की मृत्यु गैंग्रीन नामक रोग से हो गई थी। गैंग्रीन एक रोगी को अत्यधिक पीड़ा होती है। लेखक सोचता है, जिसके सम्पूर्ण शरीर में दूसरों के लिए मिठासभरे अमृतरूपी वचनों के समान और कुछ नहीं था, उसके शरीर में यह जहर कैसे फैल गया। ऐसे सरल हृदय व्यक्ति के लिए ईश्वर ने यह जहर का विधान क्यों रखा। लेखक सोचने लगता है कि इसके लिए वह किससे प्रश्न करे ? कौन ईश्वर इस प्रश्न का उत्तर देगा? जो व्यक्ति जीवनभर प्रभु की आस्था में ही अपना जीवन होम करता रहा, वह उम्र के इस अन्तिम पड़ाव पर यातनारूपी परीक्षा क्यों दे? शायद इस प्रश्न का उत्तर ईश्वर के पास भी न हो। लेखक का विचार यह है कि ईश्वर को कम-से-कम ऐसे व्यक्ति को तो ऐसी पीड़ादायक मृत्यु नहीं देनी चाहिए थी ।
लेखक फादर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालता हुआ कहता है – लम्बा कद, पादरी का सफेद वस्त्र पहने गोरा रंग, सफेद झलक मारती भूरे रंग की दादी, नीली आँखें – ऐसा सुन्दर था फादर का बाह्य व्यक्तित्व। ममता, अपनत्व का भाव फादर के रोम-रोम में समाया था। इसीलिए वे अपने प्रत्येक मिलनेवाले से बहुत प्यार करते थे । लेखक पैंतीस वर्षों से फादर की इन विशेषताओं से परिचित था । लेखक ने उनके व्यक्तित्व के विषय में अभी तक जो बातें कही हैं, वे किसी की सुनी-सुनाई नहीं हैं, वरन् लेखक ने स्वयं पैंतीस वर्षों तक फादर के सान्निध्य में रहकर उनका अनुभव किया था। आज जब वे नहीं हैं तो लेखक को अपनी छाती पर फादर के प्रेमरूपी आलिंगन का दबाव अनुभव होता है।
आशय यही है कि लेखक मस्तिष्क में आज भी उनके प्रेमपूर्ण गाढालिंगन की स्मृतियाँ एकदम तरोताजा हैं। वह आज भी उन्हें अपने निकट ही पाता है।
(ग) फादर का व्यक्तित्व अत्यन्त आकर्षक था। वे अमृत के समान सभी से मृदुल व्यवहार करते थे। वे लम्बे कद के थे। उनका रंग गोरा था। पादरियों द्वारा पहना जानेवाला सफेद चोगा उनके शरीर की कान्ति को और भी चमकदार बनाता था। उनकी नीली आँखें था आलिंगन को आतुर उनकी बाँहें उनके व्यक्तित्व को सम्पूर्णता प्रदान करती थीं, उस पर उनकी भूरी दाढ़ी की उज्ज्वलता उनकी साधुता को चरम पर पहुँचा देती थी। आशय यही कि उनका व्यक्तित्व अपनत्व और ममत्व से ओत-प्रोत था ।
(घ) फादर कामिल बुल्के मानवता के लिए समर्पित व्यक्ति थे, व्यवहार अमृत के समान मृदु और अन्तरात्मा को तृप्त करनेवाला था और उनका अस्तित्व प्रभु की आस्था पर टिका था; ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पीड़ारहित होनी चाहिए, किन्तु उनकी मृत्यु अत्यन्त कष्टप्रद रोग जहरबाद (गैंग्रीन) से हुई। लेखक उसके लिए इस जहर का विधान क्यों हो?’ इस प्रश्न के द्वारा यही कहना चाहता है कि ऐसे फरिश्ते समान व्यक्ति को इतनी कष्टप्रद मृत्यु प्रदान करना निश्चय ही ईश्वर का उसके प्रति अन्याय है। क्या मानवता की सेवा और ईश्वर में अटूट आस्था रखने का यही प्रतिफल है? यदि हाँ, तो व्यक्ति क्यों यह सब करता है? ऐसे लोगों की इस प्रकार की मृत्यु क्या उस सृष्टिकर्त्ता के प्रति अनास्था नहीं उपजाती ।
(ङ) ‘बाँहें खोल गले लगाने को आतुर’ यह वाक्यांश फादर कामिल बुल्के के चरित्र की इस विशेषता को प्रकट करता है कि वे स्नेह की प्रतिमूर्ति भी थे और उसके पुजारी भी ।
(च) लेखक फादर कामिल बुल्के की व्यावहारिक मृदुता, ईश्वर में आस्था, मानव के प्रति ममता, अपनत्व और साधुता का साक्षी था।
छ) आज जब फादर इस दुनिया में नहीं हैं लेखक उनके द्वारा दिए गए स्नेह और आलिंगन के शीतल स्पर्श का स्मरण कर दुःख का अनुभव कर रहा है।
(2) फादर को ……… आशीषों से भर देते।
प्रश्न –
(क) पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए ।
(ग) ‘परिमल’ से यहाँ क्या तात्पर्य है?
(घ) आशय स्पष्ट कीजिए-
‘उनको देखना करुणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था और उनसे बात करना कर्म के संकल्प से भरना था । ‘
(ङ) लेखक फादर कामिल बुल्के से सम्बन्धित किन-किन मधुर स्मृतियों खो जाता है?
(च) उपर्युक्त पंक्तियों से फादर के व्यक्तित्व की कौन-सी दो सर्वाधिक प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम – मानवीय करुणा की दिव्य चमक। लेखक – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ।
(ख) भावार्थ – लेखक कहता है कि आज जब फादर की याद आती है तो मन उदासी से भर उठता है; क्योंकि मन सदैव उनकी कमी का अनुभव करता है, किन्तु जब उनका स्नेह स्मृतियों में साकार हो उठता है तो मन ऐसे आनन्द का अनुभव करता है, मानो शान्त मधुर संगीत सुन रहे हों। उनको देखनेमात्र से मन करुणा से ऐसे ओत-प्रोत हो जाता था, मानो करुणारूपी जल से स्नान कर लिया हो। उनसे बात करने पर कैसा भी अकर्मण्य व्यक्ति कर्मनिष्ठा के दृढ़संकल्प से भर उठता था। लेखक बताता है कि मुझे साहित्यिक संस्था परिमल के वे दिन याद आते हैं, जब हम उस संस्था के अन्तर्गत पारिवारिक रिश्तों के समान आत्मीय सम्बन्धों में बँध गए थे। फादर बुल्के हमारे इस साहित्यिक परिवार के मुखिया थे। वे हम सबसे बड़े अवश्य थे, किन्तु कभी भी हमें अपने बड़प्पन का अहसास न कराते थे, वरन् समवयस्क मित्रों के समान हमारे हँसी-मजाक में बिना किसी संकोच के समग्रता के साथ सम्मिलित होते थे। जब गोष्ठियों में किसी बात पर बहस होती तो वे विषय को पूरी गम्भीरता से लेते हुए सार्थक बहस किया करते थे। हमारी साहित्यिक रचनाओं पर वे अपनी स्पष्ट और सही राय व्यक्त करते थे। वे हमारी रचनाओं की केवल आलोचनाभर न करते थे, वरन् यथावश्यक सुझाव भी देते थे। हमारे साथ उनकी यह आत्मीयता केवल साहित्यिक गोष्ठियों तक ही सीमित न थी, वरन् हमारे घरों तक विस्तृत थी। वे हमारे घर-परिवार के प्रत्येक छोटे-बड़े उत्सव अथवा संस्कार के अवसर पर बड़े भाई के समान उत्तरदायित्वों का निर्वहन करते थे और पुरोहित के समान हमारे आँचल को आशीषों से भर देते थे।
(ग) यहाँ ‘परिमल’ से तात्पर्य उस साहित्यिक संस्था से है, जिसका निराला के काव्य ‘परिमल’ से प्रेरित होकर गठन किया गया था।
(घ) जिस प्रकार जल हमारे शरीर को निर्मल व स्वच्छ बना देता है, उसी तरह फ़ादर बुल्के की करुणा का स्पर्श पाकर व्यक्ति की स्वाभाविक कठोरता और छल-कपट दूर हो जाते। उनसे बात करने मात्र से व्यक्ति इतना अधिक प्रेरित होता था कि उसी क्षण अपने मन में अपने अपूर्ण और नवीन कार्यों को पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प धारणकर लेता था।
(ङ) लेखक फादर कामिल बुल्के की उन मधुर स्मृतियों में खो जाता है, जिसमें लेखक तथा साहित्यकार बुल्के की छत्रच्छाया में परिवार की तरह बँधे रहते थे, हँसी-मजाक करते थे। उत्सव तथा संस्कार के अवसर पर वह जी भर आशीर्वाद देते थे।
(च) – भारतीयता का सम्मान करना तथा उसकी परम्पराओं और रीति-रिवाजों को मानना ।
– करुणापूर्ण सद्व्यवहार ।
(3) फादर बुल्के ……… विरल शांति भी।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय लिखिए।
(ग) फादर को क्या चिन्ता थी?
(घ) लेखक को विरल शान्ति कब मिली?
(ङ) फादर बुल्के संकल्प से संन्यासी थे, किन्तु वे लेखक को कभी-कभी मन से संन्यासी नहीं लगते थे, क्यों?
(च) संन्यासी क्या नहीं करता?
(छ) फादर को क्या चिन्ता थी?
(ज) लेखक को दी गई वह सांत्वना क्या थी, जो फादर द्वारा उसे उसकी पत्नी और पुत्र की मृत्यु पर दी गई थी।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम – मानवीय करुणा की दिव्य चमक। लेखक – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ।
(ख) आशय – लेखक फादर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालता हुआ कहता है कि फादर बुल्के केवल संकल्प से ही संन्यासी प्रतीत होते थे। वे मन से कभी संन्यासी नहीं रहे। संन्यासी कभी किसी से रिश्ता नहीं रखता; जबकि फादर बुल्के सभी से मन से रिश्ता बनाते थे, जिसे तोड़ते नहीं थे। उनसे यदि वर्षों बाद भी मिलते थे तो वे बड़े अपनत्व से मिलते थे। फादर जब भी दिल्ली आते; सर्दी, गर्मी, बरसात कुछ भी हो, वे लेखक से मिलने के लिए समय जरूर निकालते थे। यह समय चाहे दो मिनट का ही क्यों न हो। क्या संन्यासी ऐसा मोह करते हैं? अर्थात् संन्यासी कभी भी इस प्रकार मोह में नहीं फँसता । फादर बुल्के की एक चिन्ता हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की थी। वे जहाँ भी होते, जिस मंच पर भी होते, हिन्दी के राष्ट्रभाषा न बन पाने की तकलीफ का बयान करते। इसके लिए वे ऐसे-ऐसे तर्क देते, जिनकी कोई काट नहीं होती थी। अगर किसी प्रश्न पर वे कभी झुंझलाते थे तो वह हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का ही प्रश्न होता। हिन्दीवालों द्वारा हिन्दी की उपेक्षा पर वे बहुत दु:खी होते थे। प्रत्येक परिचित के घर-परिवार के विषय में, व्यक्तिगत दुःख तकलीफ के विषय में पूछना उनका स्वाभाविक गुण था। चाहे कितना भी बड़ा दुःख हो, उनके मुख से सांत्वना के जो शब्द निकलते, वे जादू से भरे होते थे और हृदय में एक रोशनी भर देते थे। ऐसी रोशनी, जो किसी गहन तपस्या के बाद ही प्राप्त होती है। लेखक यहाँ अपनी पत्नी और पुत्र की मृत्यु पर फादर द्वारा कहे गए सांत्वना के शब्दों को याद करते हुए कहता है कि उनके उन शब्दों से विरल शान्ति झरती थी, जब उन्होंने सांत्वना देते हुए लेखक से कहा था- ‘हर मौत दिखाती है, जीवन को नई राह ।’
(ग) फादर की चिन्ता हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की थी। वे हर मंच से इस बात की तकलीफ बयान करते थे। फादर इसके लिए अकाट्य तर्क प्रस्तुत करते थे। वे हिन्दीवालों द्वारा हिन्दी की उपेक्षा से दुःखी थे।
(घ) पत्नी तथा पुत्र की मृत्यु पर लेखक का हृदय बड़ा व्याकुल था। ऐसे समय फादर के मुँह से सांत्वना के दो शब्द सुनकर लेखक को विरल शान्ति प्राप्त हुई।
(ङ) फादर बुल्के संकल्प से संन्यासी थे, किन्तु वे लेखक को कभी-कभी मन से संन्यासी नहीं लगते थे; क्योंकि संन्यासी को किसी भी व्यक्ति से कोई माया-मोह नहीं होता, नाते-रिश्ते उनके लिए बेमानी होते हैं, किन्तु बुल्के का स्वभाव इसके विपरीत था। वे जिससे रिश्ता बनाते थे तो तोड़ते नहीं थे।
(च) संन्यासी किसी भी व्यक्ति से रिश्ता नहीं बनाता, उसका एकमात्र रिश्ता ईश्वर से होता है। वह किसी व्यक्ति से मिलने के लिए उसे खोजता नहीं फिरता ।
(छ) फादर को चिन्ता हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की थी। हर मंच से इसकी तकलीफ बयान करते, इसके लिए अकाट्य तर्क देते।
बस इसी एक सवाल पर उन्हें झुंझलाते देखा जा सकता था। वे हिन्दी वालों द्वारा ही हिन्दी की उपेक्षा किए जाने से बड़े दुःखी थे।
(ज) ‘हर मौत दिखाती है जीवन को नयी राह’ यह लेखक को दी गई वह सांत्वना थी, जो फादर द्वारा उसे उसकी पत्नी और पुत्र की मृत्यु पर दी गई थी।
3. पाठ पर आधारित विषयवस्तु सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – फादर किस देश के थे? उनके परिवार के विषय में आप क्या जानते हैं? पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर- फादर की जन्मभूमि, बेल्जियम का रैम्सचैपल शहर था। वे भारत को ही अपना देश मानते थे।
फादर अक्सर माँ की स्मृति में डूब जाते थे। उनकी माँ की चिट्ठियाँ अक्सर उनके पास आती रहती थीं। अपने अभिन्न मित्र डॉ० रघुवंश को वह उन चिट्ठियों को दिखाते थे। पिता और भाइयों के लिए उनके मन में बहुत लगाव नहीं था। उनके पिता व्यवसायी थे। एक भाई बेल्जियम में पादरी हो गया। एक भाई काम करता था, उसका परिवार था। बहन सख्त और जिद्दी स्वभाव की थी। बहुत देर से उसने शादी की। फादर को एकाध बार उसकी शादी की चिन्ता अवश्य हुई थी। भारत में बस जाने के बाद दो या तीन बार फादर अपने परिवार से मिलने भारत से बेल्जियम गए थे।
प्रश्न 2 – फादर ने भारत में रहकर किस प्रकार अध्ययन किया?
उत्तर- भारत आकर फादर ने पहले ‘जिसेट संघ’ में दो साल पादरियों के बीच धर्माचार की पढ़ाई पूरी की। फिर 9-10 वर्ष तक वे दार्जिलिंग में पढ़ते रहे। कलकत्ता (कोलकाता) से बी०ए० किया और फिर इलाहाबाद से एम०ए० किया। उस समय डॉ० धीरेन्द्र वर्मा हिन्दी विभाग के अध्यक्ष थे। फादर ने अपना शोधप्रबन्ध प्रयाग विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में रहकर सन् 1950 ई० में पूरा किया- रामकथा : उत्पत्ति और विकास। ‘परिमल’ में उसके अध्याय पढ़े गए थे। फादर मातरलिंक के प्रसिद्ध नाटक ‘ब्लू बर्ड’ का रूपान्तर भी ‘नीलपंछी’ के नाम से किया था। कालान्तर में फादर सेण्ट जेवियर्स कॉलेज, राँची में हिन्दी तथा संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष हो गए और यहीं उन्होंने अपना प्रसिद्ध अंग्रेजी – हिन्दी कोश तैयार किया। उन्होंने ‘बाइबिल’ का भी अनुवाद किया।
प्रश्न 3 – फादर बुल्के की माँ ने बचपन में ही घोषित कर दिया था कि लड़का हाथ से गया।’ इस कथन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर— फादर बुल्के आध्यात्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे। उनकी माँ ने अध्यात्म के प्रति फादर बुल्के के लगाव को देखकर बचपन में ही घोषित कर दिया था कि ‘लड़का हाथ से गया। और सचमुच इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर फादर संन्यासी हो गए।
एक माँ अपने बालक की आदतों को देख-समझकर निश्चित ही उसके भविष्य का अनुमान लगा लेती है। ऐसा ही फादर बुल्के के साथ भी हुआ।
4. विचार / सन्देश से सम्बन्धित लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ में लेखक ने ‘क्या विचार प्रकट किए हैं?
उत्तर – प्रस्तुत संस्मरण में लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने फादर कामिल बुल्के के व्यक्तित्व और कृतित्व का भावपूर्ण विवेचन किया है। उन्होंने साररूप में बताया है कि स्वयं को भारतीय कहनेवाले फादर बुल्के जन्मे तो बेल्जियम (यूरोप) के रैम्सचैपल शहर में थे, जो कि गिरजों, पादरियों, धर्मगुरुओं और सन्तों की भूमि कहा जाता है, परन्तु उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया भारत को । फादर बुल्के एक संन्यासी थे, परन्तु पारम्परिक अर्थ में वे संन्यासी नहीं थे। सर्वेश्वर (लेखक) का फादर बुल्के से अन्तरंग सम्बन्ध था, जिसकी झलक हमें उनके इस संस्मरण में स्पष्ट दिखाई देती है। भारतीय भाषाओं और साहित्य के उत्थान और विकास में उनके योगदान को स्पष्ट करते हुए लेखक का मानना है कि जब तक रामकथा है, इस विदेशी भारतीय साधु को याद किया जाएगा तथा उन्हें हिन्दी भाषा और बोलियों के अगाध प्रेम का उदाहरण माना जाएगा।
5. पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1 – फादर की उपस्थिति देवदार की छाया जैसी क्यों लगती थी?
उत्तर — देवदार हिमालय पर 6,000 फुट से 8,000 फुट तक की ऊँचाई पर पाया जानेवाला एक बहुत बड़ा पेड़ होता है। इसकी लकड़ी सुन्दर, हल्की व सुगन्धित होती है। यह अपनी मजबूती के लिए प्रसिद्ध है। इसमें घुन नहीं लगता है।
फादर में भी देवदार के समान सभी गुण थे। उनका व्यवहार सुगन्ध देनेवाला अर्थात् अच्छा था। विचारों से फादर सुदृढ़ थे। फादर संन्यासी थे, जो पवित्रता का प्रतीक है। इन सब कारणों से फादर की उपस्थिति लेखक को देवदार की छाया जैसी लगती थी।
प्रश्न 2 – फादर बुल्के भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं, किस आधार पर ऐसा कहा गया है ?
अथवा किस आधार पर ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ पाठ में फादर बुल्के को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग कहा है? 
उत्तर – फादर की कर्मभूमि भारत ही रही। वे 47 वर्षों तक भारत में ही रहे। फादर हिन्दी से बहुत प्यार करते थे। भारत उनकी. रग-रग में बसा था। वे स्वयं को भारतीय कहते थे। हिन्दी की उन्होंने सबसे अधिक हानि पहुँचाई है। फादर हिन्दी को राष्ट्रभाषा न बनाए महती सेवा की, जबकि हिन्दीवालों ने हिन्दी की उपेक्षा करके उसको जाने को लेकर चिन्तित रहते थे। ये सभी कारण ऐसे हैं, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि फादर बुल्के भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं।
प्रश्न 3 – पाठ में आए उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए, जिनसे फादर बुल्के का हिंदी प्रेम प्रकट होता है।
उत्तर- फादर ने अपनी शिक्षा की अवधि में हिन्दी में ही शोध किया। उनके शोधप्रबन्ध का विषय था- ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ । फादर सेण्ट जेवियर्स कॉलेज, राँची में हिन्दी तथा संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष रहे। फादर ने अंग्रेजी-हिन्दी कोश तैयार किया । ‘बाइबिल’ का हिन्दी अनुवाद भी किया। फादर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्षधर थे। वे प्रत्येक मंच से इस विषय में अपनी चिन्ता प्रकट करते रहते थे। इन सभी प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि फादर को हिन्दी से बहुत प्रेम था।
प्रश्न 4- इस पाठ के आधार पर फादर कामिल बुल्के की जो छवि उभरती है, उसे अपने शब्दों में लिखिए ।
उत्तर – ‘गद्यांश पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर’ शीर्षक के अन्तर्गत गद्यांश 1 का प्रश्न (ग) देखें।
प्रश्न 5 – लेखक ने फादर बुल्के को ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ क्यों कहा है?
उत्तर- फादर ने अपने सम्पूर्ण जीवन में मानव सेवा की । प्रत्येक से उसके घर-परिवार के बारे में, उसकी व्यक्तिगत दुःख- -तकलीफ के बारे में पूछना फादर का स्वभाव था। बड़े-से-बड़े दुःख में उनके मुख से सांत्वना के जादूभरे दो शब्द सुनना व्यक्ति को एक ऐसी रोशनी से भर देता था, जो किसी गहरी तपस्या से जनमती है। इसी कारण लेखक ने फादर बुल्के को ‘मानवीय करुणा की दिव्यं चमक’ कहा है।
प्रश्न 6 – फादर बुल्के ने संन्यासी की परम्परागत छवि से अलग एक नई छवि प्रस्तुत की है, कैसे ? 
उत्तर – संन्यासी की एक परम्परागत छवि है, जिसके अनुसार व्यक्ति त्यागी और विरक्त होकर सभी कार्य निष्काम भाव से करता है। फादर बुल्के संकल्प से संन्यासी थे। कभी-कभी लगता था कि वे मन से संन्यासी नहीं हैं। वे संन्यासी होते हुए भी रिश्ता बनाते थे और उसे तोड़ते नहीं थे। वर्षों बाद मिलने पर भी उस रिश्ते की जीवन्तता अनुभव होती थी। भाषा जैसे विषय पर उनकी चिन्ता किसी परम्परागत संन्यासी की चिन्ता न थी । परम्परागत संन्यासी को सदैव अपने कल्याण (उद्धार, मोक्ष) की चिन्ता रहती है, जिसके लिए वह संसार को मोह-माया का जाल समझकर उससे विरक्ति को ही अपना साधन मानता है। संसार के सुख-दुःख अथवा कल्याण (उद्धार) से उसका कोई सरोकार नहीं होता, जबकि फादर बुल्के ने संन्यासी की इस परम्परागत छवि के विपरीत संसार और उसके रिश्ते-नातों में लिप्त रहकर सबका कल्याण करने में ही अपना उद्धार समझा। इससे स्पष्ट है कि फादर बुल्के की अपनी अलग ही विशिष्ट छवि थी।
प्रश्न 7 – आशय स्पष्ट कीजिए- 
(क) नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है।
(ख) फादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है।
उत्तर —
(क) 18 अगस्त, 1982 ई० को फादर का निधन हो गया। दिल्ली में मसीही विधि से उनका अन्तिम संस्कार किया गया। अन्तिम संस्कार में बहुत-से गणमान्य लोग उपस्थित थे। लेखक कहता है कि मैं नहीं सोचता कि इस संन्यासी ने कभी सोचा होगा कि उसकी मृत्यु पर कोई रोएगा। लेकिन अन्तिम संस्कार के समय रोनेवालों की कमी न थी। यदि उनकी मृत्यु पर रोनेवालों की संख्या का वर्णन किया जाए तो वह इतना संघन और विस्तृत होगा, मानो किसी कागज पर स्याही गिरकर फैल गई हो। आशय यही है कि उनकी मृत्यु पर आँसू बहानेवालों की संख्या का अनुमान ठीक वैसे ही नहीं लगाया जा सकता, जिस प्रकार किसी लिखावट पर स्याही के गिरकर फैल जाने पर इस बात का अनुमान लगाना कठिन होता है कि वहाँ स्याही गिरने से पूर्व क्या लिखा था ।
(ख) ‘गद्यांश के अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर’ शीर्षक के अन्तर्गत गद्यांश (3) के प्रश्न (ग) का उत्तर देखें।
⇒ रचना और अभिव्यक्ति
प्रश्न 8 – आपके विचार से बुल्के ने भारत आने का मन क्यों बनाया होगा?
उत्तर – भारत की सभ्यता और संस्कृति विश्वभर में अनूठी है। यहाँ की मानवता, प्रेम, भ्रातृत्व तथा जियो और जीने दो की भावना सम्पूर्ण विश्व को ‘आकर्षित’ करती है। सत्य और अहिंसा यहाँ की संस्कृति के मूलाधार हैं। सम्भवत: इन्हीं सब बातों से प्रभावित होकर ही बुल्के ने भारत आने का मन बनाया होगा ।
प्रश्न 9 – ‘बहुत सुंदर है मेरी जन्मभूमि – रेम्सचैपल । ‘ – इस पंक्ति में फादर बुल्के की अपनी जन्मभूमि के प्रति कौन-सी भावनाएँ अभिव्यक्त होती हैं? आप अपनी जन्मभूमि के बारे में क्या सोचते हैं? 
उत्तर — प्रस्तुत पंक्ति में फादर बुल्के की अपनी जन्मभूमि के प्रति अटूट प्रेम और श्रद्धा की भावना व्यक्त हुई है। इससे यह भी स्पष्ट है कि फादर बुल्के में देश-प्रेम की भावना भी फूट-फूटकर भरी थी, यही कारण है कि स्वयं को भारतीय माननेवाले फादर बुल्के ने भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभाषा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। बुल्के की भाँति हमें भी अपनी जन्मभूमि बहुत प्यारी और विश्वभर में अद्वितीय लगती है। यदि सूत्ररूप में कहें तो हमारे लिए तो जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है — “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।”
6. परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – फादर बुल्के के जीवन-प्रसंग से आपको क्या प्रेरणा मिलती है ? संक्षेप में लिखिए। 
उत्तर – फादर कामिल बुल्के के जीवन- प्रसंग से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि व्यक्ति को हृदय से करुण, आचरण से कर्मनिष्ठ और स्वभाव से मधुर, निश्छल, मिलनसार, संस्कारवान् तथा गम्भीर होना चाहिए। जिस व्यक्ति में ये सभी गुण विद्यमान होते हैं, वह नश्वर शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी अपने यशस् शरीर से अमर हो जाता है। उसके परलोकगमन पर सारा संसार आँसू बहाता है। फादर बुल्के विदेशी नागरिक थे। जब वे भारत आए तो उन्हें कोई नहीं जानता था । भारत की उन्होंने कर्मभूमि ही नहीं वरन् जन्मभूमि मानकर सेवा की। यहाँ की सभ्यता-संस्कृति को जाना – समझा और उसके विकास में ऐसा योगदान किया कि भारतीय इतिहास में ऐसा मील का पत्थर बनकर प्रतिष्ठित हो गए कि जो भी भारतीय संस्कृति का उपासक, मानवता का सेवक उधर से गुजरा उनके दिशा-निर्देश का संकेत पाकर निहाल हो गया। उनका शोध प्रबन्ध ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’, ‘अंग्रेजी-हिन्दी कोश’ उनके व्यक्तित्व की गन्ध की अनन्तकाल तक अनुभूति कराते रहेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *