UK Board 10 Class Hindi Chapter 17 – संस्कृति (गद्य-खण्ड)
UK Board 10 Class Hindi Chapter 17 – संस्कृति (गद्य-खण्ड)
UK Board Solutions for Class 10th Hindi Chapter 17 संस्कृति (गद्य-खण्ड)
1. लेखक – परिचय
प्रश्न — भदन्त आनन्द कौसल्यायन का परिचय निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत दीजिए-
जीवन परिचय, रचनाएँ, साहित्यिक विशेषताएँ, भाषा-शैली ।
उत्तर— भदन्त आनन्द कौसल्यायन
जीवन-परिचय — भदन्त आनन्द कौसल्यायन एक संवेदनशील विचारक हैं। अनन्य हिन्दी सेवक कौसल्यायनजी बौद्ध भिक्षु थे। वे यायावर प्रकृति के रहे और देश-विदेश की अनेक यात्राएँ कीं। भदन्त जिले के सोहाना ग्राम में हुआ था। कौसल्यायनजी; महात्मा गांधी के आनन्द कौसल्यायन का जन्म सन् 1905 ई० में पंजाब के अम्बाला साथ बहुत समय तक वर्धा में रहे। सन् 1988 ई० में उनका निधन हो गया।
रचनाएँ – कौसल्यायनजी ने अधिकतर यात्रा – वृत्तान्तों की रचना की है। उनकी बीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें प्रमुख हैं- भिक्षु के पत्र, जो भूल ना सका, आह! ऐसी दरिद्रता, बहानेबाज़ी, यदि बाबा ना होते, रेल का टिकट, कहाँ क्या देखा।
कौसल्यायनजी ने बौद्ध धर्म के दर्शन से सम्बन्धित अनेक मौलिक और अनूदित ग्रन्थों की भी रचना की है। इनमें जातक कथाओं का अनुवाद विशेष उल्लेखनीय है।
साहित्यिक विशेषताएँ — कौसल्यायनजी को भ्रमण में बहुत रुचि थी। देश-विदेश के भ्रमण ने उन्हें अनुभव की व्यापकता प्रदान की और उनकी सृजनशीलता को समृद्ध किया। उन्होंने ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ और ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा’ के माध्यम से देश-विदेश में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। कौसल्यायनजी; महात्मा गांधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से अत्यन्त प्रभावित थे। वे कल्पना की उड़ान भरनेवाले पंछी नहीं हैं, बल्कि वास्तविकता का परिचय करानेवाले हैं।
भाषा-शैली- कौसल्यायनजी की भाषा सहज-सरल तथा आम जनता की बोलचाल की भाषा है। उसमें तत्सम तद्भव तथा लोकभाषा के शब्दों के अतिरिक्त अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग देखने को मिलता है। कौसल्यायनजी की शैली सरस, रोचक, प्रवाहपूर्ण तथा प्रसाद गुणयुक्त है। सहज बोलचाल की भाषा में लिखे उनके निबन्ध, संस्मरण और यात्रा-वृत्तान्त बहुत चर्चित रहे हैं।
2. गद्यांश पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
(1) एक संस्कृत ………. कहला सकता।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) संस्कृत कौन है?
(ग) असंस्कृत कौन है?
(घ) व्यक्ति सभ्य कैसे बनता है?
(ङ) संस्कृत और सभ्य में क्या अन्तर है?
(च) संस्कृत व्यक्ति अपनी अगली पीढ़ी के लिए किस प्रकार उपयोगी होता है?
(छ) आविष्कार और संस्कृत व्यक्ति का सम्बन्ध बताइए ।
उत्तर –
(क) पाठ का नाम–संस्कृति । लेखक – भदन्त आनन्द कौसल्यायन ।
(ख) जो व्यक्ति अपनी मनीषा (बुद्धि), विवेक और परिश्रम से किसी नयी चीज की खोज करता है, वही संस्कृत है।
(ग) जिस व्यक्ति में इतनी बुद्धि, विवेक नहीं और परिश्रम करने की लालसा नहीं कि वह उनके बल पर किसी नयी वस्तु, विचार अथवा दर्शन की खोज कर सके, वह असंस्कृत है।
(घ) व्यक्ति अपने पूर्वजों द्वारा दी गई खोजों, विचारों अथवा दर्शन का अपने जीवन में अनुकरण करके सभ्य बन सकता है।
(ङ) संस्कृत व्यक्ति में रचनात्मक बुद्धि, उचित – अनुचित का निर्णय करने की क्षमता (विवेक) और परिश्रम द्वारा लक्ष्य को प्राप्त लग होती है, जबकि सभ्य व्यक्ति में रचनात्मकता और निर्णय करने की क्षमता का अभाव होता है। परिश्रम को लक्ष्य परिणत करने का विश्वास प्रायः उनमें नहीं होता। आशय यही है कि संस्कृत व्यक्ति में रचनात्मक प्रवृत्ति प्रबल होती है और सभ्य व्यक्ति में अनुकरणात्मक प्रवृत्ति ।
(च) संस्कृत व्यक्ति द्वारा खोजी गई चीज उसकी अगली पीढ़ी को अनायास ही प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार संस्कृत व्यक्ति अगली पीढ़ी के लिए उन्नति और विकास का एक नया मार्ग खोल देता है।
(छ) आविष्कार और संस्कृत व्यक्ति का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है; क्योंकि संस्कृत व्यक्ति ही किसी नए आविष्कार का आविष्कर्त्ता होता है।
(2) आग के ………… पुरस्कर्त्ता था।
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए। प्रेरणा कैसे प्राप्त हुई?
(ग) आग के आविष्कार की
(घ) आज के ज्ञान का प्रथम पुरस्कर्त्ता कौन था?
(ङ) संस्कृत व्यक्ति की सबसे मुख्य विशेषता क्या है?
(च) संस्कृति की जननी कौन है?
(छ) सभ्यता का बड़ा अंश हमें किससे मिला है?
(ज) पेट भरा और तन ढका व्यक्ति रात को क्यों नहीं सो पाता ?
(झ) लेखक के विचार से कौन-कौन-सी योग्यताएँ संस्कृति हैं ?
(ञ) लेखक ने इस अवतरण में सभ्यता की क्या परिभाषा दी है, संस्कृति व सभ्यता में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर –
(क) पाठ का नाम – संस्कृति । लेखक — भदन्त आनन्द कौसल्यायन ।
(ख) आशय – निबन्धकार के अनुसार मानव द्वारा जब आग का आविष्कार किया गया होगा तो इसकी प्रेरणा उसे पेट की आग अर्थात् भूख से मिली होगी। भूख लगने पर ही उसने आग की खोज की, जिससे वह अनेक अखाद्य पदार्थों को आग पर पकाकर खाद्य और सुपाच्य बनाकर उनका अधिकाधिक उपयोग कर सके। इसी प्रकार सुई-धागे के आविष्कार में भी ठण्ड और गर्मी से बचाव तथा सजने-सँवरने की भावना रही होगी। अर्थात् इन सभी आविष्कारों के पीछे मानव की मूलभूत आवश्यकताएँ प्रमुख कारण थीं। अब जब उसकी सभी मूलभूत आवश्यकताएँ पूर्ण हो गईं तो खुले आकाश के नीचे विश्राम करते समय आकाश के तारों को देखकर विचार करने लगा कि यह मोती भरा थाल क्या है? यह कहाँ से आया है? इसका जनक कौन है? वह ज्ञान की ओर अग्रसर हुआ । निबन्धकार का कथन है कि मूलभूत आवश्यकताएँ; जैसे— पेट भरना और तन ढकना मनुष्य की संस्कृति को जन्म नहीं दे सकतीं। ये संस्कृति की जननी नहीं हो सकतीं। पेट भर जाने और तन ढक जाने पर भी ऐसा मानव जो वास्तव में सभ्य तथा संस्कृत है, खाली नहीं बैठ सकता है, वह कुछ-न-कुछ विचार करेगा, कुछ-न-कुछ खोजेगा; क्योंकि उसका मस्तिष्क वैचारिक दृष्टि से उर्वर है। व्यक्ति की नई ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा, उसकी कर्मशीलता और वैचारिक उर्वरता ही संस्कृति की जननी है।
निबन्धकार के अनुसार हमारी सभ्यता का एक बड़ा अंश हमें ऐसे ही विचारशील व्यक्तियों से प्राप्त हुआ है, जिनके मन-मस्तिष्क पर भौतिक कारणों का प्रभाव अधिक रहा है, किन्तु इसका कुछ भाग हमें उन विद्वानों से भी मिला है, जिन्होंने कुछ विशिष्ट तथ्यों को भौतिक प्रेरणा के वशीभूत होकर नहीं बल्कि अपने अन्दर ही सहज संस्कृति से प्राप्त किया है। रात के तारों को देखकर जिस विद्वान् के मन में उनसे सम्बन्धित जिज्ञासा उत्पन्न हुई होगी, वही ज्ञान का प्रथम पुरस्कर्त्ता रहा होगा।
(ग) आग के आविष्कार की प्रेरणा पेट की भूख के कारण हुई होगी, जिससे मानव विभिन्न पदार्थों को खाद्य बनाकर अपनी भूख मिटा सके।
(घ) तारों को देखकर रातभर न सो सकनेवाला विद्वान् ही हमारे आज के ज्ञान का प्रथम पुरस्कर्त्ता था।
(ङ) संस्कृत व्यक्ति की सबसे मुख्य विशेषता यह है कि वह निठल्ला नहीं बैठ सकता है।
(च) व्यक्ति की जिज्ञासा और कर्मशीलता ही संस्कृति की जननी है।
(छ) जिन व्यक्तियों की चेतना पर स्थूल भौतिक कारणों का प्रभाव प्रधान रहा है, उन संस्कृत आदमियों से हमें सभ्यता का बड़ा अंश मिला है।
(ज) पेट भरा और तन ढ़का व्यक्ति रात को अपनी जिज्ञासा और कर्मशीलता के कारण नहीं सो पाता; क्योंकि वह अपनी इस जिज्ञासा के समाधान में प्रयासरत रहता है कि आखिर यह मोती भरा थाल क्या है।
(झ) लेखक के विचार से पेट भरा और तन ढँका होने पर कर्मरत रहना, विद्वानों का अन्त: प्रेरणा से तथ्य विशेष का उद्घाटन करना और उनकी खोज के लिए रात-रात भर जागना ऐसी योग्यताएँ हैं, जिन्हें संस्कृति कहा जा सकता है।
(अ) मानव के खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने के तरीके, आवागमन, के साधन और आपस में कट-मरने के तरीके सभ्यता कहलाते हैं।
किसी नए तथ्य की खोज में लगनेवाली प्रेरणा, प्रवृत्ति और योग्यता संस्कृति है, जबकि उस खोज से प्राप्त आविष्कार, जो मानव-कल्याण के लिए होता है, सभ्यता है।
(3) और सभ्यता ? …….. क्या होगा?
प्रश्न –
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) सभ्यता किसे कहते हैं?
(घ) संस्कृति, असंस्कृति कैसे बन सकती है?
(ङ) सभ्यता में हमारे कौन-कौन से क्रिया-कलाप सन्निहित हैं ?
(च) संस्कृति और असंस्कृति की मूलभावना का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
(छ) कौन-सी संस्कृति का परिणाम सभ्यता है?
(ज) असभ्यता किसका अवश्यंभावी परिणाम है?
उत्तर-
(क) पाठ को नाम-संस्कृति । लेखक — भद्रन्त आनन्द, कौसल्यायन ।
(ख) आशय – निबन्धकार ने उपर्युक्त गद्यांश में सभ्यता के स्वरूप पर प्रकाश डाला है। निबन्धकार कहता है कि सभ्यता संस्कृति का परिणाम है। मानव के रहन-सहन का ढंग, उसके खान-पान का ढंग, वस्त्र धारण करने का ढंग, यातायात के साधन और यहाँ तक कि मानव के परस्पर लड़ने-कटने या वाद-विवाद के तरीके- आदि सभी का समन्वित रूप सभ्यता कहलाता है। मानव में निश्चित ही बहुत योग्यता है। उसकी यह योग्यता उससे उसके ही विनाश के साधनों का आविष्कार करा रही है; यथा- परमाणु बम का निर्माण । अब यहाँ प्रश्न उठता है कि मनुष्य के इन विनाशकारी साधनों के आविष्कार को हम संस्कृति अथवा असंस्कृति में से कौन-सी संज्ञा प्रदान करें। मानव अपने द्वारा आविष्कृत इन विभिन्न संसाधनों के माध्यम से जो निरन्तर आत्म-विनाश में लगा हुआ है, उसे मानव की सभ्यता कहें अथवा असभ्यता ? यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। निबन्धकार इन प्रश्नों का उत्तर भी स्वयं प्रस्तुत करता है। निबन्धकार के अनुसार संस्कृति, यदि कल्याणकारी नहीं होगी अर्थात् संस्कृति में दूसरों के कल्याण का भाव नहीं होगा तो वह निश्चित ही असंस्कृति बन जाएगी। यदि असंस्कृति का जन्म होगा तो इसका परिणाम भी असभ्यता ही होगी अर्थात् असंस्कृति से ही असभ्यता का जन्म होता है।
(ग) मानव के खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने के तरीके, आवागमन के साधन और आपस में कट-मरने के तरीके सब मिलकर हमारी सभ्यता कहलाते हैं।
(घ) जब संस्कृति में कल्याण की भावना नहीं होती तब वह असंस्कृति बन जाती है।
(ङ) हमारे खाने-पीने के तरीके, हमारे ओढ़ने-पहनने के तरीके, हमारे गमनागमन के साधन, हमारे परस्पर कट-मरने के तरीके अर्थात् हमारा प्रत्येक क्रिया-कलाप सभ्यता में सन्निहित है।
(च) नवीन आविष्कार की योग्यता संस्कृति कहलाती है, किन्तु यह संस्कृति कल्याण और अकल्याण की दृष्टि से दो प्रकार की होती है। मानव कल्याण की भावना से प्रेरित आविष्कार की योग्यता ही वास्तविक संस्कृति है और मानव के अकल्याण की भावना से प्रेरित आविष्कार की योग्यता असंस्कृति कहलाती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संस्कृति की मूलभावना में मानव-कल्याण और आत्म-निर्माण की प्रवृत्ति प्रधान होती है, जबकि असंस्कृति की मूलभावना में मानव-अकल्याण और आत्म – विनाश की प्रवृत्ति ।
(छ) कल्याण की भावना से उद्भूत संस्कृति का परिणाम ही सभ्यता है।
(ज) जिस संस्कृति का कल्याण की भावना से नाता टूट जाता है, अर्थात् जो संस्कृति विनाश की ओर उन्मुख हो जाती है, वही असंस्कृति के रूप में परिणत हो जाती है और इसी असंस्कृति का अवश्यंभावी परिणाम होती है असभ्यता ।
3. पाठ पर आधारित विषयवस्तु सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – प्रस्तुत पाठ में किन शब्दों की व्याख्या की गई है?
उत्तर- प्रस्तुत पाठ में निबन्धकार द्वारा ‘संस्कृति’ और ‘सभ्यता’ नामक दो शब्दों की व्याख्या की गई है।
प्रश्न 2 – संस्कृत व्यक्ति कौन है?
उत्तर – एक संस्कृत व्यक्ति किसी नई वस्तु की खोज करता है, किन्तु उसकी सन्तान को वह अपने पूर्वज से अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति की बुद्धि ने अथवा उसके विवेक ने किसी भी नए तथ्य को खोजा था, वह व्यक्ति ही वास्तविक संस्कृत व्यक्ति है और उसकी सन्तान, जिसे अपने पूर्वज से वह वस्तुं अनायास ही प्राप्त हो गई थी, अपने पूर्वज की भाँति सभ्य भले ही बन जाए, संस्कृत नहीं हो सकती।
प्रश्न 3 – संस्कृत व्यक्ति की पहचान हेतु लेखक ने कौन-सा उदाहरण दिया है?
उत्तर – संस्कृत व्यक्ति की पहचान हेतु लेखक ने एक आधुनिक उदाहरण दिया है— न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का आविष्कार किया, इसलिए वह संस्कृत मानव था। आज युग का भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण से तो परिचित है ही; लेकिन उसके साथ उसे और भी अनेक बातों का ज्ञान प्राप्त है, जिनसे शायद न्यूटन अपरिचित ही रहा। ऐसा होने पर भी हम आज के भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी को न्यूटन की अपेक्षा अधिक सभ्य भले ही कह सकें; पर न्यूटन जितना संस्कृत नहीं कह सकते; क्योंकि आज का विद्यार्थी गुरुत्वाकर्षण के ज्ञान का आविष्कर्त्ता नहीं है और न ही वह अतिरिक्त ज्ञान का आविष्कर्त्ता है, जो न्यूटन को नहीं था और उसे है।
प्रश्न 4- सुई-धागे के आविष्कार का क्या कारण था ?
उत्तर- मानव ने सुई-धागे का आविष्कार अपने शरीर को ढकने की मूलभूत आवश्यकता के कारण किया होगा। शीत और गर्मी से बचने के लिए मानव को कपड़ों की आवश्यकता अनुभव हुई या शरीर सजाने के लिए उसे कपड़ा सिलने की आवश्यकता अनुभव हुई जिनके परिणामस्वरूप सुई-धागे का आविष्कार हुआ।
4. विचार / सन्देश स सम्बन्धित लघुत्तरात्मक प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – ‘संस्कृति’ निबन्ध में निबन्धकार ने किन विचारों को प्रस्तुत किया है? .
उत्तर- भदन्त आनन्द कौसल्यायन द्वारा रचित ‘संस्कृति’ निबन्ध हमें सभ्यता और संस्कृति से जुड़े अनेक जटिल प्रश्नों को सुलझाने की प्रेरणा देता है। इस निबन्ध में कौसल्यायनजी ने अनेक उदाहरण देकर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि सभ्यता और संस्कृति किसे कहते हैं और ये दोनों एक ही हैं अथवा अलग-अलग। वे सभ्यता को संस्कृति का परिणाम मानते हुए कहते हैं कि मानव संस्कृति अविभाज्य वस्तु है। उन्हें संस्कृति का बँटवारा करनेवाले लोगों पर बड़ा आश्चर्य होता है और दुःख भी। उनकी दृष्टि में जो मनुष्य के लिए कल्याणकारी नहीं है, वह न सभ्यता है और न संस्कृति ।
प्रश्न 2 – भारत में संस्कृति का कितने तरह का बँटवारा मौजूद है? .
उत्तर – भारत में संस्कृति का भाँति-भाँति से बँटवारा किया गया है; जैसे – हिन्दू संस्कृति मुस्लिम संस्कृति, प्राचीन संस्कृति, नवीन संस्कृति आदि-आदि।
5. पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1 – लेखक की दृष्टि में ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ की सही समझ अब तक क्यों नहीं बन पाई है?
उत्तर- लेखक के अनुसार ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ शब्दों का प्रयोग तो बहुत होता है, किन्तु ये लोगों की समझ में कम आते हैं। मिलता-जुलता अर्थ होने के कारण लोग दोनों को एक ही समझ लेते हैं। इन शब्दों के सभी ने अपने-अपने अर्थ गढ़ रखे हैं किन्तु उनके वे अर्थ भी तब गड़बड़ा जाते हैं, जब इन दोनों शब्दों के साथ विभिन्न प्रकार के विशेषण लगाकर भौतिक-सभ्यता और आध्यात्मिक सभ्यता आदि नए शब्द बना लिए जाते हैं। इसलिए इनकी सही समझ अब तक नहीं बन पाई है।
प्रश्न 2 – आग की खोज एक बहुत बड़ी खोज क्यों मानी जाती है? इस खोज के पीछे रही प्रेरणा के मुख्य स्रोत क्या रहे होंगे?
उत्तर – आग की खोज मानव की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण देन है। आग की सहायता से मानव मांस को भूनकर खाने लगा। आग से मनुष्य को भोजन पकाने, प्रकाश करने तथा सर्दी से बचने में भी सहायता मिली। मुख्यतः पेट की आग (भूख) इस प्रेरणा का मुख्य स्रोत रही होगी। .
प्रश्न 3 – वास्तविक अर्थों में संस्कृत व्यक्ति किसे कहा जा सकता है?
उत्तर- ‘पाठ पर आधारित विषयवस्तु सम्बन्धी प्रश्नोत्तर’ शीर्षक के अन्तर्गत प्रश्न 2 का उत्तर देखें।
प्रश्न 4 – न्यूटन को संस्कृत मानव कहने के पीछे कौन-से तर्क दिए गए हैं? न्यूटन द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों एवं ज्ञान की कई दूसरी बारीकियों को जाननेवाले लोग भी न्यूटन की तरह संस्कृत नहीं कहला सकते, क्यों?
उत्तर – वह व्यक्ति ही वास्तविक संस्कृत व्यक्ति है, जिसकी बुद्धि अथवा विवेक ने किसी भी नए तथ्य का दर्शन अथवा आविष्कार किया हो । न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का आविष्कार किया था; अत: न्यूटन एक संस्कृत मानव थे। जिस व्यक्ति को कोई तथ्य, दर्शन अथवा ज्ञान अनायास विरासत अथवा ज्ञान- परम्परा में मिलता है, वह व्यक्ति संस्कृत नहीं, बल्कि सभ्य कहलाता है। आज भौतिक विज्ञान के जो विद्यार्थी न्यूटन द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त के साथ – साथ इस सिद्धान्त की उन बारीकियों से भी परिचित हों, जिनका ज्ञान न्यूटन को न रहा हो, उन विद्यार्थियों को न्यूटन से अधिक सभ्य तो कहा जा सकता है, उनकी भाँति संस्कृत नहीं ।
प्रश्न 5 – किन महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सुई-धागे का आविष्कार हुआ होगा?
उत्तर- ‘पाठ पर आधारित विषयवस्तु सम्बन्धी प्रश्नोत्तर’ शीर्षक के अन्तर्गत प्रश्न 4 का उत्तर देखें।
प्रश्न 6 – मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है।” किन्हीं दो प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जब-
(क) मानव संस्कृति को विभाजित करने की चेष्टाएँ की गईं।
(ख) जब मानव संस्कृति ने अपने एक होने का प्रमाण दिया।
उत्तर—
(क) मानव संस्कृति को हिन्दू संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति, सिख संस्कृति, ईसाई संस्कृति आदि रूपों में वर्गीकृत करके उसे विभाजित करने की चेष्टाएँ की गई।
(ख) रूस का भाग्यविधाता लेनिन अपनी डैस्क में रखे हुए डबलरोटी के सूखे टुकड़े स्वयं न खाकर दूसरों को खिला दिया करता था, संसार के मजदूरों को सुखी देखने का स्वप्न देखनेवाले कार्ल मार्क्स ने अपना सारा जीवन दुःख में बिता दिया। इसी प्रकार सिद्धार्थ ने अपना घर केवल इसलिए त्याग दिया कि मानव संस्कृति को एक देखना चाहते थे। इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि मानव संस्कृति ने अपने एक होने का प्रमाण दिया है; क्योंकि सभी देश-काल में मानव संस्कृति का एकमात्र उद्देश्य जनकल्याण रहा है।
प्रश्न 7 – आशय स्पष्ट कीजिए-
मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति?
उत्तर- ‘गद्यांश पर अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर’ शीर्षक के अन्तर्गत प्रश्न 3 ( ख ) का उत्तर देखें ।
⇒ रचना और अभिव्यक्ति
प्रश्न 8 – लेखक ने अपने दृष्टिकोण से सभ्यता और संस्कृति की एक परिभाषा दी है। आप सभ्यता और संस्कृति के बारे में क्या सोचते हैं, लिखिए।
उत्तर – संस्कृति कार्यों का कारण रूप है और सभ्यता उनका व्यावहारिक रूप। उदाहरण के लिए वस्त्रों का आविष्कार इसलिए किया गया; क्योंकि मनुष्य को अपना तन ढकने के लिए किसी आवरण की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु जो वस्त्र का आविष्कार किया गया है, यही संस्कृति है। अब वस्त्रों का आवरण के रूप में विविध रीतियों से प्रयोग करने के जो विभिन्न ढंग हमने अपनाए, वही सभ्यता कहलाते हैं। कुर्त्ता-पाजामा, धोती-कुर्त्ता साड़ी ब्लाउज, कोट-पैण्ट आदि के द्वारा शरीर ढकने की विभिन्न रीतियाँ ही के सन्दर्भ में ‘सभ्यता’ संज्ञा से अभिहित की जाती हैं। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि सभ्यता संस्कृति से अधिक व्यापक वस्तु है। – भाषा अध्ययन वस्त्र
6. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – लेखक भदन्त आनन्द कौसल्यायन के अनुसार सभ्यता और संस्कृति में क्या अन्तर है?
उत्तर – किसी नए तथ्य की खोज में लगनेवाली प्रेरणा, प्रवृत्ति और योग्यता संस्कृति है तथा उस खोज से प्राप्त आविष्कार जो मानव कल्याण के लिए होता है— सभ्यता है। सुई-धागे को खोजने की प्रेरणा (कपड़ों को सिलकर पहनने की इच्छा) संस्कृति है तथा सुई धागा (आविष्कार) सभ्यता है।
