UK Board 10th Class Science – Chapter 14 उर्जा के स्रोत
UK Board 10th Class Science – Chapter 14 उर्जा के स्रोत
UK Board Solutions for Class 10th Science – विज्ञान – Chapter 14 उर्जा के स्रोत
अध्याय के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. ऊर्जा का उत्तम स्रोत किसे कहते हैं?
उत्तर : ऊर्जा का उत्तम स्रोत, वह स्रोत है-
(1) जिसके प्रति एकांक द्रव्यमान से अधिक ऊर्जा प्राप्त हो सके,
(2) जो आसानी से प्राप्य हो,
(3) जिसका भण्डारण, परिवहन तथा उपयोग सरल हो,
(4) जो लम्बे समय तक नियत दर से ऊर्जा उपलब्ध करा सके,
(5) जिसकी लागत कम हो ।
प्रश्न 2. उत्तम ईंधन किसे कहते हैं?
उत्तर : उत्तम ईंधन वह ईंधन है—
(1) जिसके जलने पर प्रति एकांक द्रव्यमान से अधिक ऊष्मा प्राप्त हो सके,
(2) जो जलने पर न्यूनतम धुआँ उत्पन्न करे,
(3) जो आसानी से उपलब्ध हो।
प्रश्न 3. यदि आप अपने भोजन को गरम करने के लिए किसी भी ऊर्जा स्त्रोत का उपयोग कर सकते हैं तो आप किसका उपयोग करेंगे और क्यों?
उत्तर: हम रसोई गैस या माइक्रोवेव ओवन का प्रयोग करेंगे क्योंकि उपर्युक्त दोनों स्त्रोत उपयोग में आसान हैं, आर्थिक रूप से सस्ते हैं तथा प्रदूषण भी नहीं फैलाते हैं।
प्रश्न 4. जीवाश्मी ईंधन की क्या हानियाँ हैं?
उत्तर : जीवाश्मी ईंधन की हानियाँ
(1) पृथ्वी पर जीवाश्मी ईंधन का सीमित भण्डार ही मौजूद है जो कुछ ही समय में समाप्त हो जाएगा, हमें इनका संरक्षण करना चाहिए ।
(2) जीवाश्मी ईंधन, जलाए जाने पर वायु प्रदूषण फैलाते हैं।
(3) जीवाश्मी ईंधन को जलाने पर निकलने वाली गैसें ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती हैं जिसके कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ता चला जा रहा है।
(4) ये गैसें अम्लीय वर्षा का भी कारण बनती हैं।
प्रश्न 5. हम ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर क्यों ध्यान दे रहे हैं?.
उत्तर : वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर ध्यान देने के कारण- आज हम अपनी अधिकांश ऊर्जा जरूरतों के लिए जीवाश्मी ईंधन पर निर्भर हैं। ऊर्जा का कुछ भाग हमें जल विद्युत संयन्त्रों से प्राप्त होता है। जिस दर से हम जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग कर रहे हैं, अतिशीघ्र ही पृथ्वी पर मौजूद जीवाश्म ईंधन के भण्डार समाप्त हो जाएँगे। जल विद्युत की भी कुछ अपनी सीमाएँ हैं जिसके कारण हमारी सभी ऊर्जा आवश्यकताएँ जल से पूरी नहीं की जा सकतीं। शीघ्र ही एक ऐसा समय आने वाला है जब हमें भयंकर ऊर्जा संकट का सामना करना होगा। अतः भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर ध्यान दिया जा रहा है। विखण्डन वाले अथवा उदाहरण प्रदूषण होता
प्रश्न 6. हमारी सुविधा के लिए पवनों तथा जल ऊर्जा के पारम्परिक उपयोग में किस प्रकार के सुधार किए गए हैं?
उत्तर : प्राचीनकाल पवन ऊर्जा का उपयोग पालदार नावों को चलाने में तथा पवन चक्की की सहायता से यान्त्रिक कार्य करने के लिए किया जाता था। इसी प्रकार जल ऊर्जा का उपयोग जल परिवहन में किया जाता था। परन्तु तकनीकी विकास के साथ मनुष्य यह जान चुका है कि किसी भी अन्य प्रकार की ऊर्जा की तुलना में विद्युत ऊर्जा का उपयोग सर्वाधिक सुविधाजनक है। इसीलिए आज पवन ऊर्जा का उपयोग विद्युत उत्पादन में किया जाने लगा है। इसके लिए समुद्र तट के समीप के स्थानों में बहुत सी पवन चक्कियाँ एक साथ लगाई जाती हैं। ये सब मिलकर पर्याप्त विद्युत ऊर्जा का उत्पादन करती हैं।
इसी प्रकार जल ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा के रूप में प्रयोग करने के लिए पहाड़ी ढालों पर ऊँचे बाँध बनाकर जल एकत्र किया जाता है। इस जल को जनित्र की टरबाइन पर डालकर विद्युत ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है।
प्रश्न 7. सौर कुकर के लिए कौन-सा दर्पण – अवतल, उत्तल अथवा समतल – सर्वाधिक उपयुक्त होता है?
उत्तर : अवतल दर्पण सर्वश्रेष्ठ रहेगा, क्योंकि यह अपने तल पर गिरने वाली सम्पूर्ण सौर ऊर्जा को अपने फोकस पर सूक्ष्म बिन्दु के रूप में केन्द्रित कर देता है।
प्रश्न 8. महासागरों से प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जाओं की क्या सीमाएँ हैं?
उत्तर : (1) ज्वार-भाटा की ऊर्जा का उपयोग करने के लिए बाँध बनाने योग्य स्थान सीमित हैं।
(2) तरंग ऊर्जा भी केवल उन्हीं स्थानों पर उपयोग की जा सकती हैं। जहाँ तरंगें पर्याप्त शक्तिशाली हों।
(3) महासागरीय तापीय ऊर्जा के दोहन के लिए आवश्यक तकनीक बहुत ही कठिन है।
प्रश्न 9. भूतापीय ऊर्जा क्या होती है?
उत्तर : भूतापीय उर्जा – कभी-कभी पृथ्वी के आन्तरिक भाग में स्थित पिघली हुई चट्टानें भूगर्भीय हलचल के कारण केन्द्रीय भाग से सतह की ओर विस्थापित हो जाती हैं और इस प्रकार तप्त क्षेत्रों का निर्माण करती हैं। जब कभी भूगर्भीय जल इस प्रकार के तप्त क्षेत्रों के सम्पर्क में आता है तो वाष्प में बदल जाता है। इस जल वाष्प को पाइपों की सहायता से बाहर लाकर टरबाइन चलाकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है।
पृथ्वी के गर्भ में स्थित उच्च ताप क्षेत्रों से सम्बद्ध ऊर्जा को भूतापीय ऊर्जा कहते हैं।
प्रश्न 10. नाभिकीय ऊर्जा का क्या महत्त्व है?
उत्तर : (1) जीवाश्मी ईंधन से प्राप्त ऊर्जा की तुलना में यूरेनियम के से बहुत अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
(2) जहाँ अन्य परम्परागत ऊर्जा स्रोत अतिशीघ्र समाप्त हो जाने हैं, वहीं नाभिकीय ऊर्जा बहुत लम्बे समय तक हमारी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है।
प्रश्न 11. क्या कोई ऊर्जा स्त्रोत प्रदूषण मुक्त हो सकता है? क्यों क्यों नहीं?
उत्तर : नहीं, कोई भी ऊर्जा स्रोत प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकता। के लिए – सौर सेल विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते समय कोई उत्पन्न नहीं करता, परन्तु सौर सेल के निर्माण में प्रदूषण उत्पन्न है। वास्तव में प्रत्येक ऊर्जा स्रोत किसी-न-किसी रूप में प्रदूषण उत्पन्न करता है। कोई स्रोत ऊर्जा उत्पन्न करते समय प्रदूषण उत्पन्न करता है तो किसी स्रोत के निर्माण में प्रदूषण उत्पन्न होता है।
प्रश्न 12. रॉकेट ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता रहा है। क्या आप इसे CNG की तुलना में अधिक स्वच्छ ईंधन मानते हैं? क्यों अथवा क्यों नहीं ?
उत्तर : हाँ, हाइड्रोजन, सम्पीडित प्राकृतिक गैस (CNG) की तुलना में स्वच्छ ईंधन है क्योंकि हाइड्रोजन के जलने से केवल जल उत्पन्न होता है, जबकि सम्पीडित प्राकृतिक गैस के जलने से CO2 जैसी ग्रीन हाउस गैस उत्पन्न होती है।
प्रश्न 13. ऐसे दो ऊर्जा स्त्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप नवीकरणीय मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर : जैव-मात्रा तथा बहते हुए जल की ऊर्जा, ऊर्जा के दो नवीकरणीय स्रोत हैं। चूँकि जैव – मात्रा ( वनों से प्राप्त लकड़ी) को बार-बार प्राप्त किया जा सकता है। अत: इसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत माना जा सकता है।
चूँकि बहते हुए जल की ऊर्जा भी वास्तव में सौर ऊर्जा का ही एक रूप है; अत: यह भी ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है।
प्रश्न 14. ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप समाप्य मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर : कोयला तथा पेट्रोलियम, दोनों ऊर्जा के दो समाप्य स्रोत हैं।
कोयला तथा पेट्रोलियम, दोनों के पृथ्वी पर उपलब्ध भण्डार जल्दी ही समाप्त हो जाने वाले हैं तथा इन्हें कभी भी पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता; अतः ये दोनों ऊर्जा के समाप्य स्रोत हैं।
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. गर्म जल प्राप्त करने के लिए हम सौर जल तापक का उपयोग किस दिन नहीं कर सकते—
(a) धूप वाले दिन
(b) बादलों वाले दिन
(c) गरम दिन
(d) पवनों (वायु) वाले दिन ।
उत्तर : (b) बादलों वाले दिन ।
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन जैव-मात्रा ऊर्जा स्त्रोत का उदाहरण नहीं है-
(a) लकड़ी
(b) गोबर गैस
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) कोयला ।
उत्तर : (c) नाभिकीय ऊर्जा।
प्रश्न 3. जितने ऊर्जा स्रोत हम उपयोग में लाते हैं, उनमें से अधिकांश सौर ऊर्जा को निरूपित करते हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा स्रोत अन्ततः सौर ऊर्जा से व्युत्पन्न नहीं है-
(a) भूतापीय ऊर्जा
(b) पवन ऊर्जा
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) जैवमात्रा।
उत्तर : (c) नाभिकीय ऊर्जा ।
प्रश्न 4. ऊर्जा स्रोत के रूप में जीवाश्मी ईंधनों तथा सूर्य की तुलना कीजिए और उनमें अन्तर लिखिए।
उत्तर : जीवाश्म ईंधनों तथा सूर्य की तुलना
क्र०सं० | जीवाश्मी ईंधन | सूर्य |
1. | जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा, प्रत्येक समय, प्रत्येक परिस्थिति में प्राप्त की जा सकती है। | बादलों से घिरे आकाश वाले दिन तथा रात्रि में सूर्य से ऊर्जा प्राप्त नहीं की जा सकती। |
2. | जीवाश्म ईंधन प्रदूषण फैलाते हैं। | सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने के प्रक्रम में कोई प्रदूषण नहीं फैलता। |
3. | जीवाश्म ईंधन से हमारी सभी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है। | सौर ऊर्जा से हमारी सभी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं है। |
4. | जीवाश्म ईंधन भण्डार समाप्त होने के बाद इन्हें पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। | सूर्य से ऊर्जा हमें लगातार बहुत अधिक लम्बे समय तक प्राप्त होती रहेगी। |
प्रश्न 5. जैवमात्रा तथा ऊर्जा स्रोत के रूप में जल विद्युत की तुलना कीजिए और उनमें अन्तर लिखिए।
उत्तर : जैवमात्रा तथा जल विद्युत की तुलना
क्र०सं० | जैवमात्रा | जल विद्युत |
1. | जैवमात्रा केवल सीमित मात्रा में ही ऊर्जा प्रदान कर सकती है। | जल विद्युत ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत है। |
2. | जैवमात्रा से ऊर्जा प्राप्त करने के प्रक्रम में प्रदूषण फैलता है। | जल विद्युत ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत है। |
3. | जैवमात्रा से प्राप्त ऊर्जा को सीमित स्थान में ही प्रयोग किया जा सकता है। | जल विद्युत ऊर्जा को पारेषण लाइन की सहायता से कहीं भी ले जाया जा सकता है। |
प्रश्न 6. निम्नलिखित से ऊर्जा निष्कर्षित करने की सीमाएँ लिखिए –
(a) पवनें
(b) तरंगें
(c) ज्वार-भाटा।
उत्तर : (a) पवन ऊर्जा की सीमाएँ — यद्यपि बहती हुई पवन में सदैव ही ऊर्जा होती है, परन्तु इस ऊर्जा का दोहन करने के लिए वायु का न्यूनतम वेग 15 km/h होना आवश्यक है। इसलिए पवन ऊर्जा फार्म केवल उन्हीं स्थानों पर स्थापित किए जा सकते हैं जहाँ पवन का प्रवाह वर्ष – भर बना रहता है। इसीलिए पवन ऊर्जा फार्म गुजरात में समुद्र तट के समीप बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त पवन ऊर्जा की कुल उपलब्धता इतनी पर्याप्त नहीं है कि वह हमारी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सके।
(b) समुद्री तरंगों से प्राप्त ऊर्जा की सीमाएँ – समुद्र तल पर जल तरंगें तीव्र वेग से चलने वाली समुद्री हवाओं के कारण उत्पन्न होती हैं। केवल कुछ ही स्थानों पर ये तरंगें इतनी शक्तिशाली हो पाती हैं कि उनसे सम्बद्ध ऊर्जा का दोहन किया जा सके।
(c) ज्वार-भाटा ऊर्जा की सीमाएँ— प्रत्येक ज्वार के समय जल का चढ़ाव इतना पर्याप्त नहीं हो पाता है कि उससे विद्युत उत्पन्न की जा सके। इसके अतिरिक्त समुद्र तट का केवल कुछ ही स्थान बाँध बनाने के लिए उपयुक्त होता है; अतः ज्वारीय ऊर्जा को विश्वसनीय ऊर्जा स्रोत नहीं माना जा सकता।
प्रश्न 7. ऊर्जा स्रोतों का वर्गीकरण निम्नलिखित वर्गों में किस आधार पर करेंगे-
(a) नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय
(b) समाप्य तथा अक्षय
क्या (a) तथा (b) के विकल्प समान हैं?
उत्तर : (a) नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय स्रोत
यदि कोई ऊर्जा स्रोत एक बार अपनी ऊर्जा दे चुकने के बाद पुन: ऊर्जा देने की स्थिति में आ सकता है तो ऐसे स्रोत को नवीकरणीय स्रोतों के वर्ग में रखा जाएगा। उदाहरण के लिए — जैवमात्रा तथा जल विद्युत नवीकरणीय स्रोतों के अन्तर्गत आएँगे ।
यदि कोई स्रोत अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा दे चुकने के पश्चात् पुनर्जीवित नहीं हो सकता तो ऐसे स्रोत को अनवीकरणीय स्रोतों के वर्ग में रखा जाएगा। उदाहरण के लिए – जीवाश्मी ईंधन अनवीकरणीय स्रोत हैं क्योंकि इनके भण्डार जब समाप्त हो जाएँगे तो इन्हें पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकेगा।
(b) समाप्य तथा अक्षय स्रोत
यदि कोई ऊर्जा स्रोत एक निश्चित समय के पश्चात् अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा खर्च करके समाप्त हो जाता है और जिसको पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता तो ऐसे स्रोत को समाप्य ऊर्जा स्रोतों के वर्ग में रखा जाएगा। उदाहरण के लिए – जीवाश्मी ईंधन एक समाप्त हो जाने वाला ऊर्जा स्त्रोत है।
इसके विपरीत यदि किसी ऊर्जा स्रोत को एक बार समाप्त हो जाने के बाद बार-बार प्राप्त किया जा सकता है तो ऐसे स्रोत को अक्षय स्रोत कहेंगे। उदाहरण के लिए – जैव – मात्रा ( वनों से प्राप्त लकड़ी) कभी समाप्त न होने वाला ऊर्जा स्रोत है क्योंकि एक बार काट लेने के पश्चात् पेड़ दोबारा बड़े हो जाते हैं तथा वन बार-बार लगाए जा सकते हैं।
उपर्युक्त से स्पष्ट है कि (a) तथा (b) में दिए गए विकल्प एक जैसे हैं।
प्रश्न 8. ऊर्जा के आदर्श स्रोत में क्या गुण होते हैं?
उत्तर : ऊर्जा के आदर्श स्रोत के गुण
(1) ऊर्जा स्रोत ऐसा होना चाहिए जो पर्याप्त मात्रा में उपयोगी ऊर्जा उपलब्ध करा सके।
(2) इसका भण्डारण, परिवहन तथा उपयोग सरल होना चाहिए।
(3) यह पर्यावरण के लिए हितकारी होना चाहिए ।
(4) ऊर्जा स्रोत ऐसा होना चाहिए जो दीर्घकाल तक नियत दर पर ऊर्जा प्रदान कर सके।
(5) यह आर्थिक दृष्टि से सस्ता होना चाहिए।
प्रश्न 9. सौर कुकर का उपयोग करने के क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? क्या ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ सौर कुकरों की सीमित उपयोगिता है?
उत्तर : सौर कुकर के लाभ – सौर कुकर के निम्नलिखित लाभ हैं- .
(1) सौर कुकर से किसी प्रकार का धुआँ अथवा गन्ध नहीं निकलती है; अतः इसके प्रयोग से प्रदूषण नहीं होता ।
(2) सौर कुकर में मिट्टी का तेल, कोयला, विद्युत आदि जैसे किसी ईंधन की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार इसके प्रयोग से ईंधन तथा विद्युत दोनों की बचत होती है।
(3) सौर कुकर बहुत धीमी गति से खाना पकता है; अतः इसके द्वारा पके भोजन से पोषक तत्व नष्ट नहीं होते ।
(4) सौर कुकर से खाना पकाते समय निरन्तर देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है।
सौर कुकर की हानियाँ- सौर कुकर की निम्नलिखित हानियाँ हैं—
(1) सौर कुकर रात्रि में, बरसात में तथा बादल वाले दिनों में काम नहीं करते।
(2) सौर कुकर को रोटी बनाने में प्रयुक्त नहीं करते।
(3) सौर कुकरों को खाने वाली वस्तुओं को तलने में प्रयुक्त नहीं कर सकते।
(4) सौर कुकर से खाना बहुत धीमी गति से पकता है; अतः खाना पकाने में बहुत अधिक समय लग जाता है।
हाँ, पृथ्वी पर कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ सौर कुकर का उपयोग अत्यन्त सीमित है। उदाहरण के लिए – चारों ओर पर्वतों से घिरी घाटी में सूर्य की धूप पूरे दिन में बहुत कम समय के लिए ही आती है। पहाड़ी ढालों पर प्रति एकांक क्षेत्रफल पर आपतित सौर ऊर्जा की मात्रा भी कम ही होती है। इसके अतिरिक्त, पृथ्वी पर दोनों गोलाद्ध में भूमध्य रेखा से सुदूर क्षेत्रों में सूर्य की किरणें पृथ्वी की सतह पर लम्बवत् आपतित नहीं होती; अतः ऐसे क्षेत्रों पर सौर कुकर का प्रयोग करने के लिए पर्याप्त सौर ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती।
प्रश्न 10. ऊर्जा की बढ़ती माँग के पर्यावरणीय परिणाम क्या हैं? ऊर्जा की खपत को कम करने के उपाय लिखिए।
उत्तर : हम जानते हैं कि मनुष्य अपनी बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मुख्यतः जीवाश्मी ईंधनों पर निर्भर करता है, साथ ही नाभिकीय ऊर्जा को भविष्य के ऊर्जा स्रोत के रूप में देखा जा रहा है। बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए जीवाश्मी ईंधनों को तेजी से प्रयोग किया जा रहा है। ये ईंधन, जलाए जाने पर वायु प्रदूषण फैलाते हैं तथा ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न करते हैं। इसके कारण पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, वर्षा की मात्रा कम हो रही है तथा ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। वह दिन दूर नहीं है जब सभी ग्लेशियर समाप्त हो चुकेंगे, नदियाँ समाप्त हो जाएँगी, पृथ्वी का तापमान बहुत बढ़ चुकेगा, बाढ़-तूफान की विभीषिकाएँ झेलनी होंगी।
नाभिकीय ऊर्जा का प्रयोग बढ़ाने पर भी भयंकर परिणाम सामने आएँगे। इसका कारण यह है कि नाभिकीय रिएक्टर से निकलने वाला कचरा जीवन के लिए हानिकारक विकिरण उत्सर्जित करता रहता है; अतः इस कचरे को ठिकाने लगाना एक जटिल समस्या बन जाएगी। इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुष्य की बढ़ती हुई ऊर्जा जरूरतें पर्यावरण को गम्भीर हानि पहुँचा रही हैं जिससे बचाव के उपाय अभी से प्रारम्भ करना आवश्यक है।
ऊर्जा की खपत को कम करने के लिए उपाय – इसके लिए ‘निम्नलिखित उपाय उपयोग में लाए जा सकते हैं-
(1) घरों में विद्युत उपकरणों को अनावश्यक प्रयोग में न लाया जाए।
(2) पंखे, कूलर, ए०सी० आदि का प्रयोग करते समय परिवार सभी सदस्य एक ही कमरे में रहने का प्रयास करें।
(3) सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को विकसित किया जाए और इसे अधिक बेहतर बनाया जाए। निजी गाड़ियों के प्रयोग को हतोत्साहित किया जाए।
(4) स्ट्रीट लाइटों को दिन में बन्द किए जाने की समुचित व्यवस्था की जाए।
(5) केवल परम्पराओं (दीपावली, शादी समारोह आदि) का पालन करने के नाम पर की जाने वाली ऊर्जा की बरबादी पर रोक लगाई जाए।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर
- विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. गोलीय परावर्तक- युक्त सौर-कुकर का नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए ।
उत्तर : गोलीय परावर्तक- युक्त सौर-कुकर — इस प्रकार के सौर-कुकर में उच्च ताप प्राप्त करने के लिए सूर्य की किरणों का संकेन्द्रण किया जाता है। इस कार्य हेतु गोलीय परावर्तक (अवतल परावर्तक अथवा परवलयिक परावर्तक) प्रयुक्त करते हैं। जब सूर्य के प्रकाश की किरणें गोलीय परावर्तक के पृष्ठ पर गिरती हैं तो वे इसके फोकस F पर केन्द्रित हो जाती हैं (चित्र – 14.1 ) ।

सूर्य की प्रकाश किरणों के एक ही स्थान पर केन्द्रित होने के कारण वहाँ पर अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है, जिसके कारण उस स्थान का ताप अधिक हो जाता है। यदि भोजन पकाने वाले बर्तन को गोलीय परावर्तक के फोकस पर रख दें तो वह बर्तन गर्म होने लगता है और भोजन पकना आरम्भ हो जाता है, क्योंकि इस सौर- कुकर से बॉक्सनुमा सौर-कुकर की अपेक्षा अधिक उच्च ताप प्राप्त होता है, इसलिए इसे रोटियाँ सेंकने तथा सब्जियाँ फ्राई करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। 1
प्रश्न 2. सौर जल-ऊष्मक का नामांकित चित्र बनाकर उसकी क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर : सौर जल-ऊष्मक — यह एक ऐसी युक्ति है, जिसके द्वारा सौर ऊर्जा का उपयोग करके जल को गर्म किया जाता है। इसका नामांकित चित्र, चित्र – 14.2 में दिखाया गया है। यह एक ऊष्मारोधी बक्से B का बना । के होता हैं, जिसको अन्दर से काला पोत दिया जाता है। इस बक्से के अन्दर काले रंग से पुती ताँबे की ट्यूबें T कुण्डली के रूप में लगी रहती हैं। इन ट्यूबों के काले पुते होने से ये अधिक दक्षता से सूर्य की ऊष्मीय किरणों को अवशोषित करती हैं। संवहन तथा विकिरण द्वारा ऊष्मा की हानि को रोकने के लिए बक्से के ऊपर शीशे का एक ढक्कन लगा देते हैं। ताँबे की ट्यूबों को मकान की छत के ऊपर लगा देते हैं, जिससे इन्हें पूरे दिन सूर्य का पर्याप्त प्रकाश अर्थात् धूप मिल सके।

क्रिया – विधि – सर्वप्रथम ठण्डे पानी को पाइप P के रास्ते भण्डारण टैंक में प्रवेश कराते हैं। इसके पश्चात् यह ठण्डा पानी पाइप M के रास्ते ताँबे की ट्यूबों T में चला जाता है। ये ताँबे की ट्यूबें सौर ऊर्जा का अवशोषण करके गर्म हो जाती हैं। जब ठण्डा पानी इन गर्म ताँबे की ट्यूबों में से गुजरता है तो वह भी गर्म हो जाता है। चूँकि गर्म जल हल्का होता है; अतः गर्म जल ताँबे की ट्यूब के दूसरे सिरे से निकलकर पाइप N के रास्ते होता हुआ पाइप S में चला जाता है, जहाँ पर इस जल का उपयोग करते हैं।
प्रश्न 3. जैव- गैस प्राप्त करने के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए। स्पष्ट कीजिए कि अवायुजीवी ( अनॉक्सी) अपघटन से क्या तात्पर्य है?
अथवा जैव अपशिष्ट से जैव-गैस प्राप्त करने की विधि का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर : जैव-गैस का निर्माण – जैव- गैस; कई ईंधन गैसों का मिश्रण है। इसे ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जैव पदार्थों के अपघटन से प्राप्त किया जाता है। जैव- गैस का मुख्य घटक मेथेन (CH4) गैस है जो कि एक आदर्श ईंधन है।

जैव-गैस उत्पन्न करने के लिए गोबर, वाहित मल, फल-सब्जियों तथा कृषि आधारित उद्योगों के अपशिष्ट आदि का प्रयोग किया जाता है। जैव – गैस बनाने के लिए दो प्रकार के संयन्त्रों का प्रयोग किया जाता है – (1) स्थायी गुम्बद प्रकार तथा (2) प्लावी (तैरती) टंकी प्रकार ।
गोबर से जैव-गैस प्राप्त करने के लिए प्राय: ‘प्लावी टंकी प्रकार’ के संयन्त्र का प्रयोग करते हैं— जबकि मानव मल तथा अन्य अपशिष्टों से जैव-गैस प्राप्त करने के लिए ‘स्थिर गुम्बद प्रकार’ के संयन्त्र का प्रयोग किया जाता है।
जैव-गैस प्राप्त करने के विभिन्न चरण
प्रथम चरण : स्लरी का निर्माण – सर्वप्रथम गाय-भैंस आदि घरेलू पशुओं के गोबर को पानी के साथ मिलाकर मिश्रण – टंकी में एक गाढ़ा घोल ( स्लरी) तैयार कर लेते हैं। तत्पश्चात् स्लरी को डाइजेस्टर में डालकर छोड़ देते हैं। डाइजेस्टर, ईंटों का बना हुआ एक भूमिगत टैंक होता है जो चारों ओर से बन्द रहता है।

द्वितीय चरण : स्लरी का अपघटन — डाइजेस्टर में उपस्थित अवायुजीवी या अनॉक्सी सूक्ष्मजीव, पानी की उपस्थिति में, स्लरी में उपस्थित जैव – मात्रा का अपघटन कर उसे सरल यौगिकों में बदलने लगते हैं। इस क्रिया को पूरा होने में कुछ दिन लग जाते हैं तथा क्रिया पूर्ण होने पर डाइजेस्टर में मेथेन, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन तथा सल्फर डाइऑक्साइड गैसों का मिश्रण प्राप्त होता है। यह मिश्रण ही जैव- गैस है।
यह गैसीय मिश्रण डाइजेस्टर में ऊपर उठकर प्लावी टंकी या स्थिर गुम्बद में एकत्र हो जाता है। प्लावी टंकी या स्थिर गुम्बद के ऊपरी भाग में लगी नलिका द्वारा इस गैस को उपभोक्ता की रसोई तक ले जाया जाता है और गैस चूल्हों में जलाया जाता है।
जैव- गैस के लाभ – जैव- गैस एक उत्तम ईंधन है जो बिना धुआँ दिए जलती है। इसको जलाने से राख जैसा कोई ठोस अपशिष्ट भी नहीं बचता है। इस प्रकार, जैव- गैस एक पर्यावरण हितैषी ईंधन है।
डाइजेस्टर में, जैव गैस प्राप्त करने के पश्चात् शेष स्लरी में नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस के यौगिक प्रचुर मात्रा में होते हैं; अत: यह एक उत्तम खाद का कार्य करती है।
इस प्रकार, जैव- गैस प्राप्त करने की क्रिया में न केवल हमें एक उत्तम ईंधन प्राप्त होता है, साथ ही खेतों के लिए खाद भी प्राप्त होता है तथा पर्यावरण भी प्रदूषित होने से बच जाता है ।
अवायुजीवी ( अनॉक्सी) अपघटन – डाइजेस्टर में उपस्थित अवायुजीवी सूक्ष्मजीवों को ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है; अतः ये ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ही स्लरी का अपघटन करते हैं। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होने वाला इस प्रकार का अपघटन अवायुजीवी अथवा अनॉक्सी अपघटन कहलाता है।
प्रश्न 4. नामांकित चित्र की सहायता से लकड़ी के भंजक आसवन के प्रक्रम को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : लकड़ी का भंजक आसवन — उच्च गलनांक वाले काँच की दो परखनलियाँ लीजिए। समकोण पर मुड़ी काँच की दो नलियाँ तथा दो कॉर्क लीजिए। अब एक परखनली में लकड़ी के कुछ टुकड़े तथा दूसरी में जल लीजिए। सम्पूर्ण उपकरण को चित्र – 14.5 में प्रदर्शित व्यवस्था के अनुसार व्यवस्थित कीजिए। जिस नली में लकड़ी के टुकड़े पड़े हैं, उसकी तली को बर्नर से धीरे-धीरे गर्म कीजिए। थोड़ी देर में दूसरी परखनली में भरे जल में एक काला द्रव टपकने लगता है। यह द्रव ‘टार’ कहलाता है । नलिका के खुले मुख पर जलती हुई माचिस की तीली लाने पर नलिका से निकलने वाली गैस तेजी से जलने लगती है। यह गैस लकड़ी से उत्पन्न गैसों का मिश्रण है। अब परखनली को गर्म करना बन्द कर देते हैं। परखनली के ठण्डा होने पर उसमें काले रंग का अपशिष्ट पदार्थ बचता है। यह पदार्थ लकड़ी का कोयला है।

प्रश्न 5. पवन चक्की का कार्य सिद्धान्त क्या है? पवन चक्की का विवरण चित्र सहित समझाइए ।
अथवा पवन चक्की के कार्य सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : पवन चक्की – पवन चक्की एक ऐसी युक्ति है, जिसमें वायु की गतिज ऊर्जा ब्लेडों को घुमाने में प्रयुक्त की जाती है। यह बच्चों के खिलौने ‘फिरकी’ जैसी होती है। पवन चक्की के ब्लेडों की बनावट विद्युत पंखे के ब्लेडों के समान होती है। इनमें केवल इतना अन्तर है कि विद्युत पंखे में जब पंखे के ब्लेड घूमते हैं तो पवन अर्थात् वायु चलती है। इसके विपरीत, पवन चक्की में जब पवन चलती है तो पवन चक्की के ब्लेड घूमते हैं। घूमते हुए ब्लेडों की घूर्णन गति के कारण पवन चक्की से गेहूँ पीसने की चक्की को चलाना, जल- पम्प चलाना, मिट्टी के बर्तन के चाक को घुमाना आदि कार्य किए जा सकते हैं। पवन चक्की ऐसे स्थानों पर लगाई जाती है, जहाँ वायु लगभग पूरे वर्ष तीव्र वेग से चलती रहती है। यह पवन ऊर्जा को उपयोगी यान्त्रिक – ऊर्जा के रूप में बदलने का कार्य करती है।
पवन चक्की की रचना—पवन चक्की की रचना को चित्र – 14.6 में प्रदर्शित किया गया है। इसमें ऐलुमिनियम के पतले- चपटे आयताकार खण्डों के रूप में, बहुत-सी पंखुड़ियाँ लोहे के पहिये पर लगी रहती हैं। यह पहिया एक ऊर्ध्वाधर स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर लगा रहता है तथा अपने केन्द्र से गुजरने वाली लौह शाफ्ट (अक्ष) के परित: घूम सकता है । पहिये का तल स्वतः वायु की गति दिशा के लम्बवत् समायोजित हो जाता है, जिससे वायु सदैव पंखुड़ियों पर सामने से टकराती है । पहिये की अक्ष एक लोहे की फ्रैंक से जुड़ी रहती है। क्रैंक का दूसरा सिरा उस मशीन अथवा डायनमो से जुड़ा रहता है, जिसे पवन ऊर्जा द्वारा गति प्रदान करनी होती है।

कार्य-विधि – चित्र में पवन चक्की द्वारा पानी खींचने की क्रिया का प्रदर्शन किया गया है। पवन चक्की की फ्रैंक एक जल पम्प की पिस्टन छड़ से जुड़ी है। जब वायु, पवन चक्की की पंखुड़ियों से टकराती है तो चक्की का पहिया घूमने लगता है और पहिये से जुड़ी अक्ष घूमने लगती है। अक्ष की घूर्णन गति के कारण फ्रैंक ऊपर-नीचे होने लगती है और जल पम्प की पिस्टन छड़ भी ऊपर-नीचे गति करने लगती है तथा जल पम्प से जल बाहर निकलने लगता है।
पवन चक्की का कार्य सिद्धान्त – तेजी से बहती हुई पवन जब पवन चक्की के ब्लेडों से टकराती है तो वह उन पर एक बल लगाती है जो एक प्रकार का घूर्णी प्रभाव उत्पन्न करता है और इसके कारण पवन चक्की के ब्लेड घूमने लगते हैं। पवन चक्की का घूर्णन उसके ब्लेडों की विशिष्ट बनावट के कारण होता है जो विद्युत के पंखे के ब्लेडों के समान होती है। पवन चक्की को विद्युत के पंखे के समान माना जा सकता है जो कि विपरीत दिशा में कार्य कर रहा हो, क्योंकि जब पंखे के ब्लेड घूमते हैं तो पवन चलती है। इसके विपरीत, जब पवन चलती है तो पवन चक्की के ब्लेड घूमते हैं। पवन चक्की के लगातार घूमते हुए ब्लेडों की घूर्णन गति से जल पम्प तथा गेहूँ पीसने की चक्की चलाई जा सकती है। पवन चक्की की भाँति ‘फिरकी’ भी पवन ऊर्जा से ही घूमती है।
प्रश्न 6. जल-विद्युत किस प्रकार उत्पन्न की जाती है? समझाइए । नदियों पर बाँध बनाने से किस प्रकार की हानियाँ हो सकती हैं?
उत्तर : जल-विद्युत का उत्पादन – जल-विद्युत के उत्पादन के लिए प्रायः पहाड़ी ढालों पर नदियों के रास्ते में बड़े बाँध बनाए जाते हैं। इससे पानी का रास्ता रुक जाता है और पानी बाँध में एकत्र होने लगता है। जब बाँध में पानी का तल पर्याप्त ऊँचाई प्राप्त कर लेता है तो इस जल को पानी के पाइपों या सुरंगों के रास्ते से टरबाइनों तक ले जाते हैं। इससे बाँध में रुके हुए पानी की स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदल जाती है। पानी की गतिज ऊर्जा टरबाइन चलाने में खर्च होती है। इससे टरबाइन के साथ जुड़े जनित्र चलने लगते हैं तथा जल विद्युत का उत्पादन करते हैं।

नदियों पर बाँध बनाने से हानियाँ – नदियों पर बाँध बनाने से निम्नलिखित हानियाँ हैं—
(1) ऊपजाऊ भूमि का बहुत बड़ा क्षेत्र बाँध के पानी में डूब जाता है।
(2) बाँध के डूब क्षेत्र में आने वाले गाँव तथा शहरों के लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है।
(3) बाँध के आस-पास के क्षेत्रों के पर्यावरण में अनैच्छिक परिवर्तन आ जाते हैं।
(4) बाँध के डूब क्षेत्र में आने वाली वनस्पति जल में डूबने के बाद मेथेन गैस उत्पन्न करती है जो ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती है।
प्रश्न 7. आइन्स्टीन का द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध प्रयुक्त संकेतों का अर्थ समझाते हुए लिखिए।
उत्तर : द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध (Mass-Energy Relation)— आइन्स्टीन ने सापेक्षता के सिद्धान्त से सिद्ध किया कि द्रव्यमान तथा ऊर्जा एक-दूसरे से भिन्न न होकर एक-दूसरे के तुल्य हैं अर्थात् ऊर्जा को द्रव्यमान में तथा द्रव्यमान को ऊर्जा में बदला जा सकता है। इस नियमानुसार, प्रत्येक पदार्थ में उसके द्रव्यमान के कारण भी ऊर्जा होती है। यदि किसी अभिक्रिया में Δm द्रव्यमान लुप्त (नष्ट) हो जाता है तो इससे उत्पन्न ऊर्जा
ΔE = (Δm) c2
जहाँ, c प्रकाश की चाल है। इसे ‘आइन्स्टीन का द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण’ कहते हैं। इस सम्बन्ध के अनुसार पदार्थ का 1 ग्राम द्रव्यमान 19 × 1013 जूल ऊर्जा के तुल्य होता है।
- लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. जीवाश्म ईंधन क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : जीवाश्म ईंधन – आज से करोड़ों वर्ष पूर्व पृथ्वी पर उपस्थित विशालकाय पेड़ पृथ्वी की भूपर्पटी के नीचे दब गए थे। ये वनस्पति अवशेष, समय बीतने के साथ, उच्च ताप तथा उच्च दाब की अवस्था में, ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ईंधन के रूप में बदलते चले गए। वनस्पति अवशेषों से बने इस प्रकार के ईंधन को जीवाश्म ईंधन कहते हैं। कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन के उदाहरण हैं।
प्रश्न 2. पेट्रोलियम गैस कैसे प्राप्त की जाती है? उस गैस का नाम लिखिए जो पेट्रोलियम गैस का मुख्य घटक है।
उत्तर : पेट्रोलियम गैस, तेल शोधक संयन्त्रों में पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन के दौरान उपोत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त पेट्रोलियम गैस, पेट्रोल के भंजन से भी प्राप्त की जाती है।
पेट्रोलियम गैस का मुख्य घटक ब्यूटेन नामक गैस है।
प्रश्न 3. जीवाश्म ईंधनों को अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के रूप में क्यों वर्गीकृत किया गया है? इन स्रोतों के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?
उत्तर : जीवाश्म ईंधन – आज से करोड़ों वर्षों पूर्व पृथ्वी पर उपस्थित विभिन्न पेड़ों भूपर्पटी के नीचे दब जाने से, उच्च दाब तथा उच्च ताप की स्थिति में तथा सीमित ऑक्सीजन की उपस्थिति में इन पेड़ों अपघटन से जो ईंधन निर्मित हुए उन्हें जीवाश्म ईंधन कहा जाता है।
पत्थर का कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन के ही रूप हैं।
जीवाश्म ईंधन की सीमित मात्रा ही भूपर्पटी के नीचे उपस्थित है तथा अब वे परिस्थितियाँ भी नहीं हैं जिनसे इन जीवाश्म ईंधन भण्डारों का पुन: निर्माण अथवा उनमें किसी प्रकार की वृद्धि सम्भव हो । यही कारण है कि जीवाश्म ईंधनों को अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
जीवाश्म ईंधन-स्रोतों के संरक्षण के उपाय – (1) ऊर्जा स्रोतों के रूप में जीवाश्म ईंधन का उपयोग केवल अन्तिम विकल्प के रूप में करना चाहिए जिससे कि वे अधिक समय तक चल सकें।
(2) ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों के उपयोग को अधिकाधिक बढ़ावा देना चाहिए।
प्रश्न 4. स्पष्ट कीजिए कि वायुमण्डल के ऊपरी भागों पर टकराने वाली सौर ऊर्जा का केवल कुछ भाग ही पृथ्वी की सतह तक क्यों पहुँच पाता है?
उत्तर : वायुमण्डल की परिरेखा पर लगभग 1.4 किलोजूल सौर ऊर्जा प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकण्ड प्राप्त होती है। इस ऊर्जा का कुछ भाग वायुमण्डल द्वारा बाह्य अन्तरिक्ष में परावर्तित कर दिया जाता है तथा कुछ भाग वायुमण्डल द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। इसी कारण कुल सौर ऊर्जा का लगभग 47% भाग ही पृथ्वी तल तक पहुँच पाता है।
प्रश्न 5. कुछ ऐसे कार्यों के नाम बताइए जिनमें सौर ऊर्जा का प्रत्यक्ष उपयोग किया जाता है।
उत्तर : सौर ऊर्जा के प्रत्यक्ष उपयोग — सौर ऊर्जा का प्रत्यक्ष उपयोग- ( 1 ) कपड़े सुखाने के लिए, (2) समुद्री जल से नमक प्राप्त करने के लिए, (3) फसल की कटाई के बाद खाद्यान्नों में नमी की मात्रा को कम करने के लिए, (4) फलों, सब्जियों तथा मछली को सुखाने के लिए किया जाता है।
प्रश्न 6. ऊर्जा का सबसे बड़ा स्त्रोत क्या है? सौर ऊर्जा को अप्रत्यक्ष रूप से दोहन करने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं?
उत्तर : ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है।
सौर ऊर्जा का अप्रत्यक्ष रूप में दोहन – सौर ऊर्जा को अप्रत्यक्ष रूप में दोहन करने की निम्नलिखित विधियाँ हैं-
(1) पवन ऊर्जा का उपयोग करके ।
(2) समुद्री लहरों की ऊर्जा का उपयोग करके ।
(3) समुद्र की बिभिन्न गहराइयों पर जल के तापान्तर का उपयोग करके आदि।
प्रश्न 7. सौर-कुकर के सीमा बन्धन कौन-कौन से हैं?
उत्तर : सौर-कुकर के सीमा बन्धन – सौर-कुकर की निम्नलिखित सीमाएँ हैं—
(1) रात के समय सौर ऊर्जा न होने के कारण सौर-कुकर पर भोजन नहीं पकाया जा सकता।
(2) दिन में आसमान पर बादल आ जाने के कारण सौर-कुकर पर भोजन नहीं पकाया जा सकता।
(3) बॉक्सनुसा सौर-कुकर पर रोटियाँ नहीं बनाई जा सकतीं।
(4) बॉक्सनुमा सौर-कुकर तलने अर्थात् फ्राई के काम में भी प्रयुक्त नहीं किया जा सकता।
प्रश्न 8. सौर-कुकर के लाभ बताइए ।
उत्तर : सौर-कुकर के लाभ – सौर-कुकर के निम्नलिखित लाभ हैं-
(1) सौर-कुकर के उपयोग से धुआँ नहीं निकलता। इस कारण पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता ।
(2) सौर-कुकर के उपयोग से ईंधन की बचत होती है।
(3) सौर – कुकर द्वारा भोजन पकाने से भोजन के पोषक तत्व भी नष्ट नहीं होते।
(4) सौर- सकते हैं। र कुकर में एक ही समय में कई खाद्य पदार्थ पकाए जा
प्रश्न 9. सौर ऊर्जा तापन युक्तियों के अवगुण बताइए ।
उत्तर : सौर ऊर्जा तापन युक्तियों के अवगुण – इसके निम्नलिखित अवगुण हैं-
(1) सभी सौर तापन युक्तियों का एक प्रमुख अवगुण यह है कि इनकी दिशा थोड़ी-थोड़ी देर बाद बदलनी पड़ती है, जिससे कि इन पर सूर्य का प्रकाश सीधा पड़े। आजकल ऐसी व्यवस्था की गई है कि ये स्वयं धीरे-धीरे घूमती रहे और इन पर सूर्य का प्रकाश पूरे दिन गिरता रहे।
(2) रात के समय सौर ऊर्जा उपलब्ध न होने के कारण इन सौर तापन युक्तियों का उपयोग नहीं किया जा सकता ।
(3) दिन में आसमान में बादल आ जाने के कारण इन सौर तापन युक्तियों का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
प्रश्न 10. यह समझाइए कि किसी सौर तापन युक्ति की दक्षता विद्युत प्रचालित युक्ति की दक्षता से कम क्यों होती है?
उत्तर : सौर तापन युक्ति की दक्षता इसलिए कम होती है, क्योंकि उसे सौर ऊर्जा बहुत ही विसरित रूप में प्राप्त होती है तथा सौर तापन युक्ति सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके गर्म होती है।
विद्युत प्रचालित तापन युक्ति की दक्षता इसलिए अधिक होती है, क्योंकि उसे विद्युत ऊर्जा एक अत्यधिक सान्द्रित रूप में प्राप्त होती है तथा विद्युत तापन युक्ति विद्युत धारा की ऊर्जा का उपयोग करके गर्म होती है।
प्रश्न 11. पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत क्या है? ऊर्जा के इस स्त्रोत को व्यापारिक स्तर पर उपयोग करने की क्यों आवश्यकता हुई?
उत्तर : पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे विशाल स्रोत सूर्य है। सूर्य द्वारा दी गई ऊर्जा को सौर-ऊर्जा कहते हैं। पृथ्वी पर प्रतिदिन पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश द्वारा दी गई ऊर्जा संसार के सभी देशों द्वारा एक वर्ष में उपयोग की गई कुल ऊर्जा का 50,000 गुना है।
व्यापारिक स्तर पर ऊर्जा के इस स्रोत को उपयोग करने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि जीवाश्म ईंधनों के ज्ञात भण्डार बहुत कम रह गए हैं जो कुछ ही दशकों में समाप्त हो जाएँगे। इस ऊर्जा के संकट को दूर करने के लिए मानव ने ऊर्जा के नवीकरणीय स्त्रोतों की खोज की। इनमें से एक नवीकरणीय स्रोत सौर ऊर्जा भी है।
प्रश्न 12. सोलर-सेल का सिद्धान्त तथा कार्य-विधि समझाइए ।
उत्तर : सोलर सेल का सिद्धान्त – जब किसी अर्द्धचालक पदार्थ (जैसे— सिलिकन, जर्मेनियम आदि) पर सूर्य का प्रकाश आपतित होता है तो ये पदार्थ सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदल देते हैं, सोलर सेल का निर्माण इसी सिद्धान्त पर आधारित है।
निर्माण तथा कार्य-विधि – सोलर सेल बनाने के लिए अशुद्धियुक्त अर्द्धचालक पदार्थ की पतली पर्तों को विशेष क्रम में जोड़ा जाता है। जब सूर्य का प्रकाश इन पर्तों पर गिरता है तो इनके बीच विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है। यदि इनके बीच कोई चालक तार जोड़ दिया जाए तो उसमें विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। एक सोलर सेल से लगभग 0.4 से 0.5 वोल्ट का विभवान्तर तथा लगभग्न 60 मिली ऐम्पियर की धारा प्राप्त होती है जो किसी भी उपकरण को चलाने के लिए अपर्याप्त है । विभवान्तर को बढ़ाने के लिए बहुत से सोलर-सेलों को श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है तथा धारा को बढ़ाने के लिए सेलों के समान्तर संयोजन का प्रयोग किया जाता है।
प्रश्न 13. हमारी ऊर्जा की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति सौर-सेलों के उपयोग से क्यों नहीं हो सकती? दो कारण लिखिए।
उत्तर : यद्यपि सौर-सेल विद्युत के पर्यावरण हितैषी स्रोत हैं तथापि ये हमारी सभी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं हैं। इसके निम्नलिखित कारण हैं-
(1) सौर सेलों की दक्षता बहुत कम है। आधुनिकतम सौर सेल भी ‘उन पर आपतित सौर ऊर्जा का केवल 25% भाग ही विद्युत ऊर्जा के रूप में बदल सकते हैं।
(2) सौर सेलों को संस्थापित करने में उच्च लागत आती है।
प्रश्न 14. भारत में सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने हेतु क्या-क्या प्रयास किए गए हैं?
उत्तर : भारत में सौर-ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने हेतु प्रयास – सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने हेतु निम्नलिखित प्रयास किए जा रहे हैं-
(1) भारत में भोजन पकाने के लिए सौर-कुकरों के उपयोग को बढ़ाया जा रहा है। भारत सरकार के गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत विभाग (Department of Non-conventional Energy Sources) अर्थात् (DNES) तथा प्रान्तीय स्तर पर इसी प्रकार के अन्य विभाग सौर-कुकरों के उपयोग को बढ़ावा देने के अनेक प्रयास कर रहे हैं। भारत विश्व का ऐसा पहला देश था, जिसने सौर ऊर्जा का उपयोग करने के लिए सौर-कुकरों का निर्माण सन् 1962 में व्यावसायिक स्तर पर प्रारम्भ किया था।
(2) भारत में पानी गर्म करने के लिए सौर जल – ऊष्मकों के उपयोग को बढ़ाया जा रहा है। आजकल बहुत से होटलों, अस्पतालों तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों की छतों पर सौर जल – ऊष्मकों को लगाया जा रहा है।
(3) भारत में व्यावसायिक स्तर पर सौर ऊर्जा का दोहन करने हेतु अनेक सौर ऊर्जा उद्यान स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है।
प्रश्न 15. जल-विद्युत उत्पन्न करने का मूल सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर : जल-विद्युत उत्पन्न करने का मूल सिद्धान्त – इसके लिए नदियों के बहते हुए जल को एक ऊँचा बाँध बनाकर एकत्र कर लिया जाता है। बाँध की तली के समीप जल टरबाइन लगा देते हैं। बाँध के ऊपरी भाग से इस जल को लगातार नीचे की ओर गिराते हैं। जब तेजी से गिरता हुआ जल, ‘जल टरबाइन’ के ब्लेडों पर गिरता है, तो उसकी ऊर्जा से ‘जल टरबाइन तेजी से घूमने लगता है। जल टरबाइन की शाफ्ट विद्युत जनित्र के कारण तेजी से घूमने लगता है। इस प्रकार, विद्युत का उत्पादन होने आर्मेचर से जुड़ी होने के कारण, इसका आर्मेचर भी जल टरबाइन के घूमने लगता है; अतः गतिज ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है।
प्रश्न 16. जल ऊर्जा से विद्युत-शक्ति उत्पन्न करने से क्या हानियाँ होती हैं?
उत्तर : जल ऊर्जा से विद्युत-शक्ति उत्पन्न करने से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं—
(1) ऊँचे-ऊँचे बाँध बनाकर जल ऊर्जा से विद्युत-शक्ति उत्पन्न करने से पर्यावरण सम्बन्धी अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगी हैं।
(2) जल-विद्युत उत्पन्न करने के लिए नदी पर बाँध बनाकर एक बहुत बड़े जलाशय का निर्माण किया जाता है, जिसमें अनेक पेड़-पौधे, जीव-जन्तु तथा मानव आवास स्थल डूब जाते हैं।
(3) बाँध के निर्माण से नदी के अनुप्रवाह का क्षेत्र भी अस्त-व्यस्त हो जाता है; जैसे- बाँध के निर्माण से नदी में बाद नहीं आती। इस कारण इस क्षेत्र की मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त, इस क्षेत्र की मछलियों को पर्याप्त पोषक तत्व भी नहीं मिल पाते।
इसलिए नदियों पर बाँध बनाने से पूर्व यह आवश्यक है कि विचार किया जाए। सामाजिक जीवन तथा पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों पर सावधानीपूर्वक
प्रश्न 17. स्पष्ट कीजिए कि बहते हुए पानी की ऊर्जा, सौर ऊर्जा से किस प्रकार सम्बद्ध है ?
उत्तर : बहते हुए जल की ऊर्जा वास्तव में सौर ऊर्जा का ही एक अन्य रूप है; क्योंकि सौर ऊर्जा ही प्रकृति में जल चक्र के रूप में जल का पुनः चक्रण करती है। यही जल फिर नदियों में बहता है और हमें जल – ऊर्जा उपलब्ध कराता है। यह क्रिया इस प्रकार होती है कि सौर ऊर्जा की गर्मी से सागरों तथा पृथ्वी की सतह से जल का वाष्पन होता है और सौर ऊर्जा जल के अणुओं की स्थितिज ऊर्जा के रूप में बदल जाती है। इस जलवाष्प से बादल बनते हैं जो ऊपर की ओर उठते हैं तथा ठण्डे होकर वर्षा तथा बर्फ के रूप में पृथ्वी पर वापस आ जाते हैं। वर्षा के जल तथा बर्फ के पिघलने से बना जल पुनः नदियों में तीव्र गति से बहता है और ऊर्जा प्रदान करता है। इस प्रकार, जल-अणुओं की स्थितिज ऊर्जा, बहते हुए जल की गतिज ऊर्जा में बदल जाती है।
प्रश्न 18. गोबर गैस के निर्माण के सन्दर्भ में अवायुजीवी या अनॉक्सी अपघटन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर : अवायुजीवी (अनॉक्सी) अपघटन — डाइजेस्टर में उपस्थित अवायुजीवी सूक्ष्मजीवों को ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है; अतः ये ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ही स्लरी का अपघटन करते हैं। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होने वाला इस प्रकार का अपघटन अवायुजीवी अथवा अनॉक्सी अपघटन कहलाता है।
प्रश्न 19. पशुओं के गोबर तथा जैव अपशिष्ट से जैव-गैस बनाने के क्या लाभ हैं?
उत्तर : जैव- गैस बनाने के लाभ –
(1) पशुओं के गोबर तथा जैव अपशिष्ट से जैव-गैस जैसा उत्तम ईंधन प्राप्त होता है जो बिना धुआँ दिए, बिना किसी ठोस अपशिष्ट को शेष छोड़े जलता है।
(2) शेष स्लरी के रूप में खेतों के लिए उत्तम खाद प्राप्त होता है।
(3) पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
प्रश्न 20. ईंधन के रूप में लकड़ी का उपयोग क्यों उचित नहीं है, जबकि जंगलों की पुन: पूर्ति हो सकती है?
उत्तर : यद्यपि लकड़ी, ऊर्जा का एक नवीकरणीय स्रोत है तथापि लकड़ी का ईंधन के रूप में उपयोग एक विवेकपूर्ण निर्णय नहीं है। इसका कारण यह है कि किसी वृक्ष को पूर्ण परिपक्व होने में 15 वर्ष से अधिक समय लग जाता है। इस प्रकार, किसी जंगल को काटकर उसकी पुन: पूर्ति करने में बहुत अधिक समय लग जाता है। इसके अतिरिक्त जंगलों के लगातार कटते जाने से विश्व का पर्यावरण सन्तुलन भी लगातार बिगड़ता जा रहा है।
प्रश्न 21. लकड़ी का कोयला (चारकोल ) लकड़ी से अधिक उत्तम ईंधन क्यों माना जाता है? लकड़ी को कोयले में परिवर्तित करने में क्या हानियाँ हैं ?
उत्तर : लकड़ी का कोयला, लकड़ी की तुलना में सरलता से बिना धुआँ दिए जलता है तथा समान द्रव्यमान के लिए, लकड़ी का कोयला लकड़ी की तुलना में लगभग दो गुनी ऊष्मा देता है। इन्हीं कारणों से लकड़ी का कोयला लकड़ी से बेहतर ईंधन माना जाता है।
लकड़ी को कोयले में बदलने से हानियाँ – लकड़ी को कोयले में बदलने के लिए जंगल काटने पड़ते हैं। तेजी से कटते जा रहे जंगलों से पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ता है। आजकल लकड़ी के कोयले से सस्ते तथा अच्छे ईंधन उपलब्ध हैं; अतः लकड़ी के कोयले के लिए जंगलों को काटना बुद्धिमानी नहीं है।
प्रश्न 22. परम्परागत चूल्हों में लकड़ी जलाना अलाभकारी क्यों होता है?
उत्तर : परम्परागत चूल्हों में लकड़ी को जलाने पर लकड़ी की कुल ऊर्जा के केवल 8-10% भाग का ही पूर्ण उपयोग हो पाता है तथा शेष व्यर्थ चला जाता है। इसके अतिरिक्त, परम्परागत चूल्हों में बहुत अधिक धुआँ भी उत्पन्न होता है। इन्हीं कारणों से परम्परागत चूल्हों में लकड़ी को जलाना अलाभकारी माना जाता है।
प्रश्न 23. पवन चक्की के कार्य करने के सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : पवन चक्की का सिद्धान्त – पवन चक्की के ब्लेडों की रचना इस प्रकार की होती है कि जब पवन ब्लेडों से टकराती है तो इसके विभिन्न क्षेत्रों के बीच दाबान्तर उत्पन्न हो जाता है। यह दाबान्तर एक प्रकार का घूर्णी प्रभाव उत्पन्न करता है। इस घूर्णी प्रभाव के कारण चक्की के ब्लेड घूमने लगते हैं। घूर्णन की चाल पवन के वेग पर निर्भर करती है।
प्रश्न 24. भारत के उच्च पवन ऊर्जा वाले क्षेत्रों के नाम बताइए।
उत्तर : भारत के उच्च पवन ऊर्जा वाले क्षेत्रों के नाम – गुजरात, राजस्थान के कुछ भाग, पश्चिमी मध्य प्रदेश, समुद्रतटीय क्षेत्र, दक्षिणी तमिलनाडु, बंगाल की खाड़ी, अरब सागर के द्वीप तथा कर्नाटक के कुछ भाग पवन ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अधिक उपयुक्त पाए गए हैं, क्योंकि भारत के इन सभी क्षेत्रों में पवन वर्ष – भर, बहुत तीव्र गति से बहती है।
प्रश्न 25. पवन ऊर्जा-फार्म केवल कुछ विशेष क्षेत्रों में ही क्यों स्थापित किए जा सकते हैं? कारण लिखिए।
उत्तर : पवन चक्की के कार्य करने के लिए 15 किमी/घण्टा का न्यूनतम पवन वेग आवश्यक है। यही कारण है कि पवन ऊर्जा-फार्म केवल उन्हीं स्थानों पर बनाए जा सकते हैं जहाँ वर्ष के अधिकांश समय पवन का प्रवाह उपलब्ध रहता हो ।
प्रश्न 26. पवन-शक्ति और जल-धारा शक्ति की यान्त्रिक-ऊर्जा तथा विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने सम्बन्धी तुलना कीजिए। इनके उत्पादन में क्या बाधा है?
उत्तर : जल-धारा शक्ति द्वारा, पवन-शक्ति की तुलना में अधिक यान्त्रिक तथा विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है।
इनके उत्पादन में बाधा यह है कि पवन-शक्ति उत्पादक संयन्त्र तथा जल – धारा शक्ति उत्पादक संयन्त्र कुछ विशेष स्थानों पर ही लगाए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त, इन संयन्त्रों को स्थापित करने की लागत भी काफी अधिक आती हैं।
प्रश्न 27. महासागरों से ऊर्जा प्राप्त करने के सबसे अधिक सक्षम स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर : महासागरों से ऊर्जा प्राप्त करने के सक्षम स्रोत – महासागरों से ऊर्जा प्राप्त करने के सबसे अधिक सक्षम निम्नलिखित हैं-
(1) सागरीय तापीय ऊर्जा, (2) समुद्री लहरों की ऊर्जा, (3) ज्वारीय ऊर्जा, (4) सागरों के जल में लवणीय प्रवणता से ऊर्जा, (5) जैव-द्रव्यमान से ऊर्जा, (6) सागरीय ड्यूटीरियम के नाभिकीय संलयन से ऊर्जा ।
प्रश्न 28. सागरीय तापीय ऊर्जा किसे कहते हैं?
अथवा महासागरीय तापीय ऊर्जा का क्या अभिप्राय है?
उत्तर : सागरीय तापीय ऊर्जा — महासागर की सतह के जल तथा गहराई में स्थित जल के ताप में सदैव कुछ अन्तर होता है। इस तापान्तर के कारण सागर में उपलब्ध ऊर्जा को सागरीय तापीय ऊर्जा कहते हैं। कहीं-कहीं पर यह तापान्तर 20° C तक भी होता है। इस सागरीय तापीय ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। किस प्रकार कार्य
प्रश्न 29. OTEC शक्ति संयन्त्र क्या है? ये करते हैं?
उत्तर : OTEC शक्ति संयन्त्र – महासागरों की तापीय ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले संयन्त्रों को OTEC शक्ति संयन्त्र कहा जाता है।
OTEC शक्ति संयन्त्रों का कार्य – सिद्धान्त – ये संयन्त्र समुद्र की ऊपरी परत की ऊष्मा का प्रयोग कुछ तीव्र वाष्पशील पदार्थों को वाष्पित करने के लिए करते हैं। तत्पश्चात् इन वाष्पों की ऊष्मीय ऊर्जा का प्रयोग टरबाइन को चलाने के लिए किया जाता है। सबसे अन्त में टरबाइन की गतिज ऊर्जा द्वारा विद्युत जनित्र को चलाकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।
प्रश्न 30. ऊर्जा के उन रूपों का नाम लिखिए जिनमें महासागरों में संचित ऊर्जा स्वयं को प्रकट करती है। इनमें से किसका OTEC प्रणाली में उपयोग होता है?
उत्तर : महासागरों में संचित ऊर्जा के रूप निम्नलिखित हैं(i) ज्वारीय ऊर्जा, (ii) तरंग – ऊर्जा, (iii) सागरीय तापीय ऊर्जा । . सागरीय तापीय ऊर्जा का उपयोग OTEC प्रणाली के अन्तर्गत किया जाता है।
प्रश्न 31. यद्यपि हाइड्रोजन का ऊष्मीय मान बहुत अधिक है, फिर भी इसे ऊर्जा स्रोत की भाँति काम में लाना कठिन क्यों है? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : हाइड्रोजन को एक उपयोगी ऊर्जा स्रोत की भाँति काम में लाना इसलिए कठिन है; क्योंकि यह ऑक्सीजन की उपस्थिति में विस्फोट के साथ जलती है। इसके विस्फोटक ज्वलन को नियन्त्रित कर पाना कठिन कार्य है।
प्रश्न 32. दहन के लिए अनिवार्य शर्तें लिखिए।
उत्तर : दहन के लिए तीन आवश्यक शर्तें हैं-
(1) ईंधन अथवा ज्वलनशील पदार्थ की उपलब्धता,
(2) ऑक्सीजन की उपस्थिति,
(3) ज्वलन ताप की प्राप्ति ।
प्रश्न 33. नाभिकीय ऊर्जा प्राप्त करने में नाभिकीय विखण्डन ‘एवं नाभिकीय संलयन को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : नाभिकीय विखण्डन तथा नाभिकीय संलयनकिसी भारी नाभिक पर न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है तो यह लगभग बराबर भागों में टूट जाता है और इसके साथ ही बहुत अधिक ऊर्जा मुक्त होती है। इस प्रकार भारी नाभिकों के टूटने की प्रक्रिया को नाभिकीय विखण्डन कहते हैं। परमाणु बम एवं नाभिकीय रिएक्टर का आधार नाभिकीय विखण्डन ही है। उदाहरणार्थ-

इन अभिक्रियाओं को नाभिकीय रिएक्टर में नियन्त्रित किया जा सकता है।
इसके विपरीत, दो हल्के नाभिकों के परस्पर संयुक्त होकर एक भारी नाभिक बनाने की प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। इस क्रिया में उत्पन्न ऊर्जा नाभिकीय विखण्डन से उत्पन्न ऊर्जा से कहीं अधिक होती है। उदाहरणार्थ-

ट्राइटियम पुनः ड्यूटीरियम से मिलकर हीलियम नाभिक का निर्माण करता है।

वैज्ञानिकों के लिए इन अभिक्रियाओं पर नियन्त्रण करना अभी तक सम्भव नहीं हो पाया है।
नाभिकीय विखण्डन तथा नाभिकीय संलयन दोनों ही अभिक्रियाओं में पदार्थ का कुछ द्रव्यमान लुप्त हो जाता है। आइन्स्टीन के द्रव्यमान ऊर्जा सम्बन्ध E = Δ mc2 के अनुसार लुप्त होने वाले द्रव्यमान के तुल्य ऊर्जा ही उक्त अभिक्रियाओं में मुक्त हो जाती है। यह मुक्त ऊर्जा नाभिकीय ऊर्जा कहलाती है।
प्रश्न 34. स्पष्ट कीजिए कि कच्ची लकड़ी को जलाना कठिन क्यों होता है?
उत्तर : कच्ची लकड़ी में पानी की पर्याप्त मात्रा उपस्थित रहती हैजब कच्ची लकड़ी को जलाने का प्रयास किया जाता है तो लकड़ी में उपस्थित जल की मात्रा, लकड़ी का ताप उसके ज्वलन ताप तक नहीं पहुँचने देती जिससे लकड़ी का दहन प्रारम्भ नहीं हो पाता ।
प्रश्न 35. विखण्डन क्या होता है? नाभिकीय विखण्डन की खोज किसने और कब की ? आरम्भ में इस प्रयोग का प्राथमिक उद्देश्य क्या था?
उत्तर : नाभिकीय विखण्डन – जब किसी भारी नाभिक (जैसे- 92U235 ) पर न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है तो यह नाभिक, दो अपेक्षाकृत हल्के नाभिकों में टूट जाता है। इस अभिक्रिया को नाभिकीय विखण्डन कहते हैं। इस अभिक्रिया में पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है।
नाभिकीय विखण्डन की खोज जर्मन वैज्ञानिकों ऑटो हान तथा फ्रिट्ज स्ट्रासमान ने सन् 1939 ई० में की थी। इस प्रयोग का प्राथमिक उद्देश्य, कृत्रिम रूप से ऐसे नाभिकों का निर्माण करना था जिनके परमाणु क्रमांक यूरेनियम के परमाणु क्रमांक (92) से अधिक हों।
प्रश्न 36. यूरेनियम के विखण्डन को समीकरण से समझाइए ।
उत्तर : यूरेनियम का विखण्डन — यूरेनियम के दो आइसोटोप 92U238 तथा 92U235 हैं। 92U238 का विखण्डन केवल तीव्रगामी न्यूट्रॉनों द्वारा ही सम्भव है जबकि 92U235 का विखण्डन मन्दगामी न्यूट्रॉनों द्वारा होता है। जब मन्दगामी न्यूट्रॉन 92U235 से टकराता है तो वह उसमें अवशोषित कर लिया जाता है तथा 92U236 बन जाता है। चूँकि 92U236 अत्यन्त अस्थायी है; अत: यह दो खण्डों बेरियम तथा क्रिप्टन में टूट जाता है तथा न्यूट्रॉनों व ऊर्जा का उत्सर्जन करता है।

प्रश्न 37. नाभिकीय विखण्डन के लिए U238 अधिक उपयोगी है अथवा U235 तथा क्यों?
उत्तर : U235 अधिक उपयोगी है, क्योंकि U238 का विखण्डन केवल तीव्रगामी न्यूट्रॉनों द्वारा ही हो सकता है, जबकि U235 का विखण्डन, विखण्डन में ही उत्पन्न मन्दगामी न्यूट्रॉनों द्वारा भी हो सकता है।
प्रश्न 38. केन्द्रक विखण्डन प्रक्रियाओं में असाधारण रूप से अत्यधिक ऊर्जा के विमुक्त होने का कारण क्या होता है? प्रति विखण्डन प्राप्य ऊर्जा का परिकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर : केन्द्रीय विखण्डन प्रक्रिया में उत्पादों का कुल द्रव्यमान अभिकारकों के कुल द्रव्यमान से कम होता है, अर्थात् इस प्रक्रिया में कुछ द्रव्यमान विलुप्त हो जाता है। आइन्स्टीन के द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण (E = mc2 ) के अनुसार विलुप्त हुए द्रव्यमान के समतुल्य ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है।
ऊर्जा का परिकलन – अभिकारकों के कुल द्रव्यमान में से उत्पादों के कुल द्रव्यमान को घटाकर विलुप्त द्रव्यमान m को ज्ञात कर लेते हैं। इस द्रव्यमान m को किग्रा में व्यक्त करके सूत्र E = mc2 से प्रति विखण्डन प्राप्य ऊर्जा का परिकलन कर लिया जाता है।
प्रश्न 39. क्या यूरेनियम में विखण्डन करने वाले प्रक्षेप्य न्यूट्रॉन की ऊर्जा महत्त्वपूर्ण है? यह निम्न होनी चाहिए अथवा उच्च ?
उत्तर : हाँ, विखण्डन करने वाले न्यूट्रॉन की ऊर्जा महत्त्वपूर्ण है। यूरेनियम आइसोटोप 92U235 का विखण्डन करने के लिए न्यूट्रॉन की ऊर्जा निम्न होनी चाहिए।
प्रश्न 40. नाभिकीय रिएक्टरों से विद्युत ऊर्जा कैसे प्राप्त की जाती है?
अथवा नाभिकीय रिएक्टर द्वारा विद्युत शक्ति जनन का सिद्धान्त लिखिए ।
उत्तर : रिऐक्टर में विखण्डन की नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया द्वारा ऊष्मा उत्पन्न होती है। इस ऊष्मा को हटाने के लिए रिऐक्टर में जल प्रवाहित किया जाता है जो ऊष्मा प्राप्त करके जलवाष्प में बदल जाता है। इस जलवाष्प द्वारा टरबाइन चलाई जाती है और टरबाइन से विद्युत जनित्र चलाकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।
प्रश्न 41. आजकल के नाभिकीय विद्युत जनित्रों में किस प्रकार के नाभिकीय प्रक्रम का प्रयोग होता है? इस सन्दर्भ में निम्न प्रकार के पदार्थों का एक-एक उदाहरण दीजिए।
(i) शीतलक, (ii) मन्दक, (iii) नाभिकीय ईंधन ।
उत्तर : आजकल के नाभिकीय विद्युत जनित्रों में नाभिकीय विखण्डन की नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया का प्रयोग किया जाता है।
(i) शीतलक – जल, (ii) मन्दक– ग्रेफाइट, (iii) नाभिकीय ईंधन – U235
प्रश्न 42. नाभिकीय रिएक्टरों में मन्दक तथा तरल शीतलकों की क्या भूमिका होती है? व्यापक रूप में उपयुक्त कुछ मन्दकों तथा शीतलकों के नाम लिखिए।
उत्तर : मन्दक – नाभिकीय रिएक्टरों में, U235 के विखण्डन से उत्पन्न न्यूट्रॉनों की ऊर्जा, विखण्डन क्रिया में पुनः भाग लेने के लिए उचित सीमा तक कम करने हेतु मन्दक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। भारी जल तथा ग्रेफाइट प्रमुख मन्दक पदार्थ हैं।
शीतलक – शीतलक पदार्थ का प्रयोग रिऐक्टर में उत्पन्न ऊष्मा को हटाने के लिए किया जाता है। जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड दो प्रमुख शीतलक हैं।
प्रश्न 43. नाभिकीय संलयन अभिक्रिया का एक उदाहरण दीजिए। ऐसी अभिक्रियाओं को सम्भव बनाने की एक विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर : संलयन अभिक्रिया का उदाहरण-
1H2 + 1H2 → 2He3 + 0n1 + ऊर्जा
यदि किसी सीमित क्षेत्र में संलयित होने वाले नाभिकों को 106 K ताप तक गर्म कर दिया जाए तो उनमें स्वतः संलयन होने लगता है।
प्रश्न 44. सूर्य के प्रकाश तथा संलयन में क्या कोई पारस्परिक सम्बन्ध है? यदि है, तो किस प्रकार ?
उत्तर : सूर्य का प्रकाश तथा संलयन अभिक्रिया – सूर्य के प्रकाश तथा संलयन में सीधा सम्बन्ध है। वास्तव में सूर्य द्वारा लगातार उत्सर्जित की जाने वाली अपार ऊर्जा का स्रोत सूर्य पर चलने वाली नाभिकीय संलयन की अभिक्रिया ही है।
सूर्य के बाह्य पृष्ठ का ताप लगभग 6900 K तथा इसके भीतरी भाग का ताप लगभग 2 × 107 K है। सूर्य के द्रव्य का लगभग 90% भाग हाइड्रोजन तथा हीलियम हैं, शेष 10% भाग में अन्य हल्के तत्व हैं। सूर्य का ताप बहुत अधिक होने के कारण सभी तत्व नाभिकीय अवस्था में होते हैं। इन नाभिकों का वेग इतना अधिक होता है कि इनके परस्पर टकराने से इनका संलयन स्वत: होता रहता है तथा अपार ऊर्जा उत्पन्न होती रहती है। जब चार हाइड्रोजन नाभिक (प्रोटॉन) संलयित होकर एक हीलियम नाभिक का निर्माण करते हैं तो इस प्रक्रिया में अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। संलयन से उत्पन्न ऊर्जा ही सूर्य की ऊर्जा का स्त्रोत है।
- अति उत्तरीय प्रश्न लघु
प्रश्न 1. ईंधनों के तीन ऐसे लक्षण बताइए जो उनकी गुणवत्ता का निर्धारण करते हैं।
उत्तर : ईंधन का ऊष्मीय मान, ईंधन का ज्वलन ताप, ईंधन के दहन से उत्पन्न विषैले तथा प्रदूषक पदार्थों का उत्सर्जन, ईंधनों के तीन प्रमुख लक्षण हैं जो उनकी गुणवत्ता का निर्धारण करते हैं।
प्रश्न 2. प्रकाश संश्लेषण क्या है?
उत्तर : प्रकाश संश्लेषण – प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है, जिसमें हरे पेड़-पौधे अपना भोजन प्राप्त करने के लिए सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में बदलते हैं।
प्रश्न 3. सूखी लकड़ी को घरेलू ईंधन के रूप में प्रयोग करना अच्छा नहीं समझा जाता। इसके दो आधारभूत कारण लिखिए।
उत्तर : सूखी लकड़ी को घरेलू ईंधन के रूप में प्रयोग न करने के कारण-
(1) सूखी लकड़ी का ऊष्मीय मान बहुत कम होता है।
(2) यह धुएँ के साथ जलती हैं अर्थात् पर्यावरण को प्रदूषित करती है।
प्रश्न 4. ‘लकड़ी के भंजक आसवन’ पद का क्या अर्थ है?
उत्तर : लकड़ी का भंजक आसवन – लकड़ी को ऑक्सीजन की सीमित उपस्थिति में गर्म करके चारकोल में परिवर्तित करने की प्रक्रिया लकड़ी का भंजक आसवन कहलाती है।
प्रश्न 5. जल-ऊर्जा से विद्युत-शक्ति उत्पन्न करने के दो लाभ बताइए।
उत्तर : जल-ऊर्जा से विद्युत-शक्ति उत्पन्न करने के दो लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) इससे पर्यावरण प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता ।
(2) यह विद्युत ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है जो कभी भी समाप्त नहीं हो सकता।
प्रश्न 6. नदियों पर बाँध बनाकर जल-विद्युत उत्पादन के दो लाभ तथा दो हानियाँ लिखिए।
उत्तर: लाभ – नदियों पर बाँध बनाकर जल-विद्युत उत्पादन करने से सिंचाई के लिए जल उपलब्ध होता है तथा बाढ़ नियन्त्रण में सहायता मिलती है।
हानियाँ- बाँध बनाने से बहुत-सी भूमि जलमग्न हो जाती है तथा बाँध के डूब क्षेत्र में आने वाले गाँवों से लोगों को पलायन करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त नदी के जल प्रवाह क्षेत्र का पर्यावरण भी प्रभावित होता है।
प्रश्न 7. जैव- गैस के उत्पादन के पश्चात् डाइजेस्टर में शेष बचे गारे (अपशिष्ट ) का क्या उपयोग किया जाता है तथा क्यों?
उत्तर : इस गारे में नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस के यौगिक प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, इसलिए इस गारे का उपयोग खेतों में खाद के रूप में किया जाता है।
प्रश्न 8. बॉक्सनुमा सौर-कुकर के भीतरी बॉक्स के अन्दर काला पेन्ट अथवा रंग क्यों करते हैं?
उत्तर : जिससे कि सौर ऊर्जा का अधिक-से-अधिक अवशोषण हो सके तथा परावर्तन द्वारा कम-से-कम ऊष्मा की हानि हो।
प्रश्न 9. सौर-कुकरों के दो सामान्य डिजाइनों के बीच कोई दो अन्तर लिखिए।
उत्तर : बॉक्सनुमा सौर-कुकर में समतल परावर्तक का प्रयोग किया जाता है जो सौर ऊर्जा को एक बिन्दु पर केन्द्रित नहीं करता, जबकि गोलीय – परावर्तक युक्त सौर-कुकर में अवतल परावर्तक प्रयोग किया जाता है जो सौर ऊर्जा को एक सूक्ष्म क्षेत्र में केन्द्रित कर देता है।
प्रश्न 10. काँच की पट्टी का विशिष्ट गुण बताइए; जिसका उपयोग सौर-कुकरों के निर्माण में किया जाता है।
उत्तर : काँच की पट्टी सूर्य जैसे अत्यधिक गर्म स्त्रोत द्वारा उत्सर्जित छोटी तरंगदैर्घ्य की ऊष्मीय किरणों को तो स्वयं में से पार होने देती है, परन्तु सौर-कुकर जैसी कम गर्म वस्तुओं द्वारा उत्सर्जित बड़ी तरंगदैर्घ्य की ऊष्मीय किरणों अर्थात् अवरक्त किरणों को स्वयं में से पार नहीं होने देती है।
प्रश्न 11. आधुनिक सेलेनियम सौर सेलों तथा अर्द्धचालकों से निर्मित सौर सेलों की दक्षता कितनी होती है?
उत्तर : आधुनिक सेलेनियम सौर सेलों की दक्षता 25% तथा अर्द्धचालकों से निर्मित सौर सेलों की दक्षता 10% से 18% तक होती है।
प्रश्न 12. उन चार क्षेत्रों के नाम लिखिए जहाँ सौर सेलों को ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है।
उत्तर : कृत्रिम उपग्रहों में, सुदूर स्थानों पर स्थित अनुसन्धान केन्द्रों में, दूरदर्शन रिले स्टेशनों में तथा ट्रैफिक लाइटों में सौर सेलों का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जाता है।
प्रश्न 13. विद्युत की घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सौर पैनलों के उपयोग में कौन-सी रुकावटें हैं?
उत्तर : घरेलू विद्युत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सौर पैनलों के उपयोग में मुख्य रुकावटें, उनको संस्थापित करने में आने वाली उच्च लागत तथा उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली ऊर्जा का अत्यन्त कम होना है।
प्रश्न 14. जल विद्युत गृह, तापीय विद्युत गृह की अपेक्षा क्यों उपयोगी है?
उत्तर : तापीय विद्युत गृह के समीपवर्ती क्षेत्रों में कोयले के धुएँ के कारण वायु प्रदूषित हो जाती है, जबकि जल विद्युत गृह से प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता। –
प्रश्न 15. पवन चक्की से उपयोगी ऊर्जा प्राप्त करने के लिए पवन का न्यूनतम वेग कितना होना चाहिए?
उत्तर : पवन चक्की से उपयोगी ऊर्जा प्राप्त करने के लिए पवन का न्यूनतम वेग 15 किमी / घण्टा होना चाहिए।
प्रश्न 16. ऊर्जा के उन तीन रूपों के नाम बताइए, जो महासागर से उपलब्ध हैं।
उत्तर : महासागर से दोहन (harness) किए जा सकने वाले ऊर्जा के तीन रूप – ( 1 ) सागरीय तापीय ऊर्जा, (2) सागरीय लहरों की ऊर्जा तथा (3) ज्वारीय ऊर्जा हैं।
- एक शब्द या एक वाक्य वाले प्रश्न
प्रश्न 1. निम्नलिखित ईंधनों में से किसका ऊष्मीय मान सबसे कम है-
मेथेन, किरोसिन, लकड़ी, चारकोल (लकड़ी का कोयला )।
उत्तर : लकड़ी का ऊष्मीय मान सबसे कम है।
प्रश्न 2. किरोसिन, पत्थर का कोयला तथा एल०पी०जी० को ऊष्मीय मानों को घटते हुए क्रम में पुनः व्यवस्थित कीजिए ।
उत्तर : ऊष्मीय मान के घटते क्रम में – एल०पी०जी०, किरोसिन, पत्थर का कोयला ।
प्रश्न 3. लकड़ी के भंजक आसवन से प्राप्त किन्हीं दो उत्पादों के नाम लिखिए।
उत्तर : चारकोल तथा मेथिल ऐल्कोहॉल |
प्रश्न 4. पेट्रोलियम के शोधन में प्राप्त किसी एक घटक का नाम जाता है ? लिखिए, जिसका उपयोग ईंधन के रूप में नहीं होता ।
उत्तर: स्नेहक तेल।
प्रश्न 5. जैव-गैस का मुख्य घटक क्या है? एक अन्य ज्वलनशील घटक का नाम भी बताइए ।
उत्तर : जैव-गैस का मुख्य घटक मेथेन (CH4) गैस है। एक अन्य ज्वलनशील घटक हाइड्रोजन (H2) गैस है।.
प्रश्न 6. सी०एन०जी० (C.N.G.) को पर्यावरण हितैषी क्यों माना जाता है?
अथवा सी०एन०जी० को अन्य पेट्रोलियम पदार्थों की अपेक्षा स्वच्छ ईंधन क्यों माना जाता है ?
उत्तर : सी॰एन॰जी॰ अन्य पेट्रोलियम पदार्थों की भाँति, जलने पर प्रदूषक तथा विषैले पदार्थ उत्पन्न नहीं करती, इसलिए इसे पर्यावरणहितैषी अर्थात् स्वच्छ ईंधन माना जाता है।
प्रश्न 7. निम्नलिखित गैसीय ईंधनों में किसका ऊष्मीय मान अधिकतम है? नाम बताइए-
हाइड्रोजन, मेथेन, एल०पी०जी० (L.P.G.), बायोगैस ।
उत्तर : हाइड्रोजन का ऊष्मीय मान अधिकतम है।
प्रश्न 8. प्रकृति में उपलब्ध कोयले की तीन किस्मों के नाम लिखिए।
उत्तर : लिग्नाइट, बिटुमिनस तथा एन्थ्रासाइट।
प्रश्न 9. वैकल्पिक ऊर्जा के दो उदाहरण दीजिए ।
उत्तर : सौर ऊर्जा तथा नाभिकीय ऊर्जा ।
प्रश्न 10. जीवाश्म ईंधन के दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर : पेट्रोल तथा प्राकृतिक गैस ।
प्रश्न 11. LPG तथा CNG के पूरे नाम बताइए । अथवा सी० एन०जी० का पूरा नाम क्या है?
उत्तर : LPG— द्रवित पेट्रोलियम गैस (Liquified Petrolium Gas) ।
CNG—सम्पीडित प्राकृतिक गैस (Compressed Natural Gas) |
प्रश्न 12. आग के ऊपर सूखी रेत डालने से आग की रोकथाम में सहायता मिलती है, स्पष्ट कीजिए, क्यों?
उत्तर : रेत एक ऐसा आवरण बना लेती है जो ऑक्सीजन की आपूर्ति रोक लेता है, इससे आग बुझ जाती है।
प्रश्न 13. उस प्रक्रम का नाम बताइए जिसमें सौर ऊर्जा, रासायनिक-ऊर्जा में परिवर्तित होती है।
उत्तर : प्रकाश संश्लेषण ।
प्रश्न 14. पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे विशाल स्रोत क्या है?
उत्तर : सूर्य
प्रश्न 15. रोटी सेंकने के लिए कौन-सा सौर-कुकर अधिक उपयोगी है ?
उत्तर : गोलीय – परावर्तक युक्त सौर- कुकर ।
प्रश्न 16. सौर भट्टी किसे कहते हैं?
उत्तर : सूर्य की ऊर्जा से गर्म होने वाली भट्टी को सौर भट्टी कहते हैं।
प्रश्न 17. सौर भट्टी का ताप कितना होता है?
उत्तर : लगभग 3000°C.
प्रश्न 18. प्रत्यक्ष रूप में सौर ऊर्जा का दोहन कैसे किया जाता है?
उत्तर : प्रत्यक्ष रूप में सौर ऊर्जा का दोहन या तो उसे ऊष्मा के रूप में संगृहीत करके या सीधे विद्युत में परिवर्तित करके किया जा सकता है।
प्रश्न 19 अप्रत्यक्ष रूप में सौर ऊर्जा का दोहन कैसे किया
उत्तर : अप्रत्यक्ष रूप में सौर ऊर्जा का दोहन उसे रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करके किया जाता है।
प्रश्न 20. तीन अर्द्धचालकों के नाम बताइए ।
उत्तर : सिलिकन, जर्मेनियम तथा गैलियम अर्द्धचालक हैं।
प्रश्न 21. सौर सेल क्या है?
उत्तर : सौर- सेल – सौर सेल एक ऐसी युक्ति है, जिसके द्वारा प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
प्रश्न 22. आजकल सौर सेल किन पदार्थों के बनाए जाते हैं?
उत्तर : आजकल सौर सेल अर्द्धचालक पदार्थों के बनाए जाते हैं।
प्रश्न 23. उन तत्वों का नाम बताइए जिनका उपयोग सौर- सेल निर्माण हेतु किया जाता है।
अथवा सौर सेल के निर्माण में आजकल कौन-से दो तत्वों का उपयोग किया जाता है?
उत्तर : सौर सेल के निर्माण हेतु सिलिकन, जर्मेनियम, गैलियम तथा सेलेनियम तत्वों का उपयोग किया जाता है।
प्रश्न 24. सोलर – सेल द्वारा किस ऊर्जा का किस ऊर्जा में रूपान्तरण होता है?
उत्तर : सोलर सेल द्वारा प्रकाश ऊर्जा का विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरण होता है।
प्रश्न 25. सेलेनियम सौर सेलों की दक्षता लगभग कितनी होती है?
उत्तर : 25% लगभग।
प्रश्न 26. अर्द्धचालकों द्वार निर्मित सौर सेलों की दक्षता लगभग कितनी होती है ?
उत्तर : 10% से 18% तक ।
प्रश्न 27. भारत के उन दो स्थानों के नाम बताइए जहाँ पवन ऊर्जा का व्यापारिक दोहन किया जाता है।
उत्तर : गुजरात में स्थित ओखा तथा लांबा |
प्रश्न 28. OTE का पूरा नाम अंग्रेजी व हिन्दी में लिखिए।
उत्तर : अंग्रेजी में – Ocean Thermal Energy. हिन्दी में – सागरीय ताषीय ऊर्जा ।
प्रश्न 29. जल का कौन-सा गुण ऊर्जा भण्डारण को आधार प्रदान करता है?
उत्तर : जल की उच्च विशिष्ट ऊष्मा का गुण ऊर्जा भण्डारण को आधार प्रदान करता है।
प्रश्न 30. किन्हीं दो नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों के नाम बताइए।
उत्तर : जल-विद्युत तथा जैव – द्रव्यमान ।
प्रश्न 31. सूर्य के प्रकाश के उस घटक का नाम बताइए, जो मुख्यतः ऊष्मा का वहन करता है।
उत्तर : अवरक्त विकिरण।
प्रश्न 32. सूर्य के प्रकाश के उन घटकों के नाम बताइए जो हमें दिखाई नहीं देते।
उत्तर : अवरक्त तथा पराबैंगनी विकिरण ।
प्रश्न 33. दो मन्दक पदार्थों के नाम बताइए ।
उत्तर : भारी जल तथा ग्रेफाइट ।
प्रश्न 34. दो शीतलक पदार्थों के नाम बताइए ।
उत्तर : जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड ।
प्रश्न 35. सूर्य का ऊर्जा स्रोत क्या है?
उत्तर : संलयन अभिक्रिया ।
प्रश्न 36. सौर – विकिरण का कौन-सा घटक हमारे स्वास्थ्य के लिए संकटकारी है?
उत्तर : पराबैंगनी विकिरण ।
प्रश्न 37. हमारे घरों में ऊर्जा का मुख्यतः किन दो रूपों में उपयोग होता है?
उत्तर : ऊष्मा तथा प्रकाश के रूप में।
- आंकिक प्रश्न
प्रश्न 1. एक स्थान के लिए सौर नियतांक 1.4 kW-m-2 है। इस स्थान पर 5 m2 क्षेत्रफल प्रति सेकण्ड कितनी सौर ऊर्जा प्राप्त करेगा?

प्रश्न 2. एक नाभिकीय रिएक्टर में प्रति मिनट 48 k-J ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि प्रति विखण्डन विमोचित ऊर्जा 3.2 × 10-11 J . हो तो रिऐक्टर में प्रति सेकण्ड होने वाले विखण्डनों की संख्या परिकलित कीजिए ।
