UK Board 10th Class Science – Chapter 15 हमारा पर्यावरण
UK Board 10th Class Science – Chapter 15 हमारा पर्यावरण
UK Board Solutions for Class 10th Science – विज्ञान – Chapter 15 हमारा पर्यावरण
अध्याय के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. क्या कारण है कि कुछ पदार्थ जैव निम्नीकरणीय होते हैं और कुछ अजैव निम्नीकरणीय?
उत्तर : जिन पदार्थों का विभिन्न सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटन हो जाता है तथा अपघटित सरल पदार्थ जैव भू-रासायनिक चक्र (biogeochemical cycle) में प्रवेश कर जाते हैं, जैव निम्नीकरणीय पदार्थ (bio degradable substances) कहलाते हैं। इनकी अत्यधिक मात्रा के कारण वातावरण में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, तब इन पदार्थों का सुगमता से अपघटन नहीं होता और ये पदार्थ वातावरण को प्रदूषित करते हैं; जैसे— रसोईघर का कचरा, कृषि उत्पादित अपशिष्ट, मल-मूत्र, कागज आदि ।
जिन पदार्थों का विभिन्न सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन नहीं हो पाता उन्हें अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ (Non-bio degradable substances) कहते हैं। ये पर्यावरण में बहुत अधिक समय तक बने रहते हैं और इसे प्रदूषित करते हैं; जैसे—कीटनाशक, पीड़कनाशक रसायन, पारा, आर्सेनिक, ऐलुमिनियम, प्लास्टिक, थर्मोकोल, रेडियोधर्मी कचरा आदि।
प्रश्न 2. ऐसे दो तरीके सुझाइए जिनमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर : जैव निम्नीकरणीय पदार्थ निम्न प्रकार से पर्यावरण को प्रभावित करते हैं-
(1) जैव निम्नीकरणीय पदार्थों के विघटन से मुक्त विषाक्त एवं दुर्गन्धमय गैसें वातावरण को प्रदूषित करती हैं।
(2) कार्बनिक जैव निम्नीकरणीय पदार्थों की अधिकता से ऑक्सीजन की कमी हो जाने से सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, अपघटन प्रक्रिया प्रभावित होती है तथा वातावरण दुर्गन्धमय हो जाता है।
प्रश्न 3. ऐसे दो तरीके बताइए जिनमें अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर : अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ निम्न प्रकार से पर्यावरण को प्रभावित करते हैं-
(1) अजैव निमीकरणीय पदार्थ लम्बे समय तक पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। ये पदार्थों के चक्रण (cycling) में बाधा पहुँचाते हैं।
(2) अनेक कीटनाशक एवं पीड़कनाशक रसायन खाद्य श्रृंखला के माध्यम से जीवधारियों (मनुष्य) के शरीर में पहुँचकर उसे क्षति पहुँचाते हैं।
प्रश्न 4. पोषी स्तर क्या है? एक आहार श्रृंखला का उदाहरण दीजिए तथा इसमें विभिन्न पोषी स्तर बताइए ।
उत्तर : पोषी स्तर ( Trophic level) – किसी आहार श्रृंखला के विभिन्न स्तरों को पोषी स्तर कहते हैं।
आहार श्रृंखला का उदाहरण-
घास → कीट → मेढक → साँप → बाज
आहार श्रृंखला के विभिन्न पोषी स्तर निम्नवत् हैं-
(1) प्रथम पोषी स्तर ‘घास’ है। यह उत्पादक कहलाती है। यह प्रकाश या सौर ऊर्जा को कार्बनिक भोज्य पदार्थों के रूप में संचित करती है।
(2) द्वितीय पोषी स्तर ‘कीट’ है। यह प्राथमिक शाकाहारी उपभोक्ता है। यह अपना भोजन घास से प्राप्त करता है।
(3) तृतीय पोषी स्तर ‘मेढक’ है। यह द्वितीयक मांसाहारी उपभोक्ता है। यह अपना भोजन कीटों से प्राप्त करता है।
(4) चतुर्थ पोषी स्तर ‘साँप’ है। यह तृतीयक मांसाहारी उपभोक्ता है। यह अपना भोजन मेढक से प्राप्त करता है ।
(5) पंचम पोषी स्तर ‘बाज’ है। यह सर्वोच्च मांसाहारी उपभोक्ता है। यह अपना भोजन साँप से प्राप्त करता है।
प्रश्न 5. पारितन्त्र में अपमार्जकों की क्या भूमिका है?
उत्तर : अपमार्जक (Decomposers) — इन्हें प्राकृतिक सफाईकर्ता (natural scavengers) भी कहते हैं। ये मृत जीवधारियों के शरीर को सड़ा देते हैं अर्थात् अपघटन (decompose) कर देते हैं। | जीवाणु तथा कवक मृत शरीर के जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल पोषक तत्वों में अपघटित कर देते हैं। ये तत्व विभिन्न चक्रों के माध्यम पुनः जैव जगत में प्रवेश कर जाते हैं। इस प्रकार अपमार्जक वातावरण के पोषक तत्वों का सन्तुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं।
प्रश्न 6. ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितन्त्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर : ओजोन (Ozone ) — इसका निर्माण तीन ऑक्सीजन परमाणुओं से होता है। इसका रासायनिक अणुसूत्र O3 है। यह विषाक्त होती है।

ओजोन वायुमण्डल के समताप मण्डल (stratosphere) में पृथ्वी से लगभग 50 km ऊपर एक पर्त (ozone shield) के रूप में पाई जाती है। यह सूर्य की पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करके पृथ्वी पर आने से रोकती है। पराबैंगनी किरणें जीवधारियों के लिए घातक होती हैं; अतः ओजोन पर्त पर्यावरण की सुरक्षा करती है।
प्रश्न 7. आप कचरा निपटान की समस्या कम करने में क्या योगदान कर सकते हैं? किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए । अथवा आप अपने आस-पड़ोस में जैविक एवं अजैविक कचरे की समस्या दूर करने के लिए क्या-क्या उपाय करेंगे?
उत्तर : कचरा निपटान (disposal of waste) के लिए निम्नलिखित युक्तियाँ प्रयोग की जा सकती हैं—
(1) जैव निम्नीकरणीय तथा अजैव निम्नीकरणीय कचरे को सर्वप्रथम पृथक् कर लिया जाना चाहिए। अजैव निम्नीकरणीय कचरे अपशिष्ट को पुन: चक्रण हेतु फैक्ट्री में भेज देना चाहिए, जिससे इसका पुनः उपयोग किया जा सके; जैसे प्लास्टिक, पॉलिथीन आदि के कचरे को पिघलाकर इसमें सल्फर तथा एस्फाल्ट आदि रसायनों को मिलाकर इसका उपयोग सड़क निर्माण में किया जाने लगा है।
(2) जैव निम्नीकरणीय (bio degradable) पदार्थों का उपयोग ह्यूमस या खाद बनाने में करके इन पदार्थों का पुन: उपयोग पौधों के माध्यम से किया जा सकता है।
(3) बाजार से सामान लाने के लिए कपड़े के थैले का उपयोग करना।
(4) दैनिक आवश्यकताओं के लिए ऐसे पदार्थों का उपयोग करना चाहिए जो जैव निम्नीकरणीय होते हैं।
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. निम्न में से कौन-से समूहों में केवल जैव निम्नीकरणीय पदार्थ हैं—
(a) घास, पुष्प तथा चमड़ा
(b) घास, लकड़ी तथा प्लास्टिक
(c) फलों के छिलके, केक एवं नीबू का रस
(d) केक, लकड़ी एवं घास ।
उत्तर : (a) घास, पुष्प तथा चमड़ा।
(c) फलों के छिलके, केक एवं नीबू का रस ।
(d) केक, लकड़ी एवं घास ।
प्रश्न 2. निम्न से कौन आहार श्रृंखला का निर्माण करते हैं-
(a) घास, गेहूँ तथा आम
(b) घास, बकरी तथा मानव
(c) बंकरी, गाय तथा हाथी
(d) घास, मछली तथा बकरी ।
उत्तर : (b ) घास, बकरी तथा मानव |
प्रश्न 3. निम्न में से कौन पर्यावरण मित्र व्यवहार कहलाते हैं-
(a) बाजार जाते समय सामान के लिए कपड़े का थैला ले जाना
(b) कार्य समाप्त हो जाने पर लाइट ( बल्ब) तथा पंखे का स्विच बन्द करना
(c) माँ द्वारा स्कूटर से विद्यालय छोड़ने के बजाय तुम्हारा विद्यालय तक पैदल जाना
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर : (d) उपर्युक्त सभी।
प्रश्न 4. क्या होगा यदि हम एक पोषी स्तर के सभी जीवों को समाप्त कर दें ( मार डालें )?
उत्तर : खाद्य श्रृंखला के सभी पोषी स्तर एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं, ये एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। यदि किसी एक पोषी स्तर के सभी जीवों को नष्ट कर दिया जाए तो खाद्य श्रृंखला छिन्न-भिन्न हो जाएगी क्योंकि पारितन्त्र में ऊर्जा का प्रवाह रुक जाएगा। विभिन्न पोषी स्तर के जीवधारियों को ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ेगी; इससे पारितन्त्र के जैवीय घटकों की संरचना प्रभावित होगी।
प्रश्न 5. क्या किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग होगा? क्या किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितन्त्र को प्रभावित किए बिना हटाना सम्भव है?
उत्तर : (1) नहीं; किसी भी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग नहीं होता ।
(2) किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितन्त्र को प्रभावित किए बिना हटाना सम्भव नहीं है।
(3) पोषी स्तर के जीवधारियों को हटाने से पारितन्त्र में असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
प्रश्न 6. जैविक आवर्धन (Biological magnification) क्या है? क्या पारितन्त्र के विभिन्न स्तरों पर जैविक आवर्धन का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होगा?
उत्तर : जैविक आवर्धन
मनुष्य फसलों की सुरक्षा हेतु कीटनाशी एवं पीड़कनाशी रसायनों का उपयोग करता है। ये रसायन जल में घुलकर मृदा में पहुँच जाते हैं। ये रसायन पौधों द्वारा जल के साथ मृदा से अवशोषित कर लिए जाते हैं। पौधों से ये हानिकारक रसायन खाद्य श्रृंखला के माध्यम से एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर पर पहुँचते रहते हैं। अन्तिम उपभोक्ताओं में इनका सर्वाधिक सान्द्रण पाया जाता है। विभिन्न पोषी स्तरों में रसायनों के सान्द्रित होते रहने की क्रिया को जैविक आवर्धन (biological magnification) कहते हैं।
मनुष्य सर्वाहारी होता है। यह प्रत्येक पोषी स्तर से अपने लिए भोजन प्राप्त कर सकता है। जैविक आवर्धन का सर्वाधिक प्रभाव मनुष्य पर देखा है। मनुष्य के शरीर में कीटनाशी रसायनों (मच्छरों को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त रसायन आदि) की मात्रा सर्वाधिक होती है। गया
विभिन्न पोषी स्तरों के जीवधारियों पर जैविक आवर्धन का प्रभाव भिन्न-भिन्न होता है; जैसे- जलीय पारितन्त्र में कीटनाशी रसायन डी०डी०टी० का जैविक आवर्धन निम्नलिखित होता है-

प्रश्न 7. हमारे द्वारा उत्पादित अजैव निम्नीकरणीय कचरे से कौन-सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं?
उत्तर : अजैव निम्नीकरणीय (Non-bio degradable) कचरे से पर्यावरण सम्बन्धी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं; जैसे-
(1) अजैव निम्नीकरणीय रसायन खाद्य श्रृंखला के माध्यम से जैविक आवर्धन प्रदर्शित करते हैं। हानिकारक रसायनों का संचय जीवधारियों के लिए हानिकारक होता है।
(2) अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों के संचित होने से जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण तथा मृदा प्रदूषण होता है। जल, वायु और मृदा के प्रदूषित होने का प्रभाव जीवधारियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
(3) अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों के कारण पारिस्थितिक असन्तुलन उत्पन्न होता है।
(4) अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ नालियों में संचित होकर जल प्रवाह को रोकते हैं। सीवर को अवरुद्ध कर देते हैं।
(5) अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों के संचय होने से पदार्थों का पुनः चक्रण प्रभावित होता है।
प्रश्न 8. यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तो क्या इनका हमारे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?
उत्तर : जैव निम्नीकरणीय पदार्थ (bio degradable substances) का पर्यावरण पर कोई दूषित प्रभाव अधिक समय तक नहीं रहता, क्योंकि सभी कार्बनिक जैव निम्नीकरणीय पदार्थ सूक्ष्म जीवों (जीवाणु, कवक आदि) द्वारा अपघटित कर दिए जाते हैं। अपघटन प्रक्रिया के दौरान मुक्त होने वाली कुछ दुर्गन्धमय गैसें वातावरण को कुछ समय के लिए प्रदूषित करती हैं, लेकिन वातावरण शीघ्र ही सामान्य हो जाता है। इसलिए यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तो यह वातावरण को शुद्ध बनाए रखने में सहायक होगा। वायु, जल और मृदा प्रदूषण के कारण होने वाले रोग नहीं होंगे।
प्रश्न 9. ओजोन परत की क्षति हमारे लिए चिन्ता का विषय क्यों है ? इस क्षति को सीमित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
उत्तर : ओजोन परत के क्षतिग्रस्त या पतली होने को ओजोन छिद्र (ozone hole) कहते हैं। जैसा कि अण्टार्कटिका क्षेत्र में ओजोन की परत पतली हो गई है।
ओजोन परत का पतला हो जाना चिन्ता का विषय है, क्योंकि इसके कारण पराबैंगनी किरणें (ultra violet-rays) पृथ्वी तक पहुँचने लगेगी। पराबैंगनी किरणें हमारे लिए निम्नलिखित प्रकार से हानिकारक हैं-
(1) पराबैंगनी किरणें उत्परिवर्तन (mutations) को प्रेरित करती हैं।
(2) पराबैंगनी किरणों के कारण त्वचा का कैन्सर (skin cancer), मोतियाबिन्द ( cataract) आदि रोग हो जाते हैं।
(3) रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity) कुप्रभावित होती है।
(4) पराबैंगनी किरणों के प्रभाव से हमारा स्वास्थ्य तथा भोजन स्त्रोत प्रभावित होते हैं।
(5) पराबैंगनी किरणें अपघटकों को नष्ट करती हैं। इससे मृत पदार्थों के विघटन की क्रिया प्रभावित होगी और पदार्थों का पुनः चक्रण रुक जाएगा।
ओजोन की पर्त की सुरक्षा के लिए उपाय
(1) क्लोरो – फ्लुओरोकार्बन सबसे अधिक घातक रसायन है। फ्रेऑन में इसकी मात्रा सर्वाधिक होती है। फ्रेऑन का प्रयोग रेफ्रीजरेटर, कण्डिशनर, फोम तथा ऐरोसोल स्प्रे बनाने में किया जाता है। विश्व के वैज्ञानिक क्लोरो-फ्लुओरोकार्बन के प्रयोग को सीमित करने पर एकमत हैं। इसके विकल्पों की तलाश की जा रही है।
(2) सुपरसोनिक विमानों का कम-से-कम प्रयोग करना चाहिए ।
(3) संसार में नाभिकीय विस्फोटों पर नियन्त्रण करना चाहिए।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर
- विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. पारितन्त्र से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख घटकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : पारितन्त्र
किसी स्थान विशेष में पाए जाने वाले जैविक तथा अजैविक घटकों के पारस्परिक सम्बन्धों को सामूहिक रूप से पारितन्त्र (ecosystem) कहते हैं। पारितन्त्र के दो प्रमुख घटक होते हैं-
(I) सजीव या जैविक घटक (Biotic components),
(II) निर्जीव या अजैविक घटक (Abiotic components)।
(I) सजीव या जैविक घटक
समस्त जन्तु एवं पौधे जीवमण्डल में जैविक घटक के रूप में पाए जाते हैं। जैविक घटक को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है-
(1) उत्पादक (Producers) – हरे प्रकाश संश्लेषी पौधे उत्पादक कहलाते हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में पौधे कार्बन डाइऑक्साइड एवं पानी की सहायता से प्रकाश एवं पर्णहरिम की उपस्थिति में ग्लूकोज का निर्माण करते हैं। ग्लूकोज अन्य भोज्य पदार्थों (प्रोटीन, मण्ड व वसा) में परिवर्तित हो जाता है, जिसको जन्तु भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं।

(2) उपभोक्ता (Consumers ) – जन्तु पौधों द्वारा बनाए गए भोजन पर आश्रित रहते हैं, इसलिए जन्तुओं को उपभोक्ता कहते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, वसा, विटामिन तथा खनिज तत्व हमारे भोजन के अवयव हैं जो अनाज, बीज, फल, सब्जी आदि से प्राप्त होते हैं। ये सभी पौधों की ही देन हैं। कुछ जन्तु मांसाहारी होते हैं जो अपना भोजन शाकाहारी जन्तुओं का शिकार करके प्राप्त करते हैं। उपभोक्ता निम्न प्रकार के होते हैं-
(i) प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता (Primary consumers) – ये शाकाहारी होते हैं। इसके अन्तर्गत वे जन्तु आते हैं जो अपना भोजन सीधे हरे पौधों से प्राप्त करते हैं; जैसे – खरगोश, बकरी, टिड्डा, चूहा, हिरन, भैंस, गाय, हाथी आदि।
(ii) द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता या मांसाहारी (Secondary consumers or Carnivores) – ये मांसाहारी होते हैं एवं प्राथमिक उपभोक्ताओं या शाकाहारी प्राणियों का शिकार करते हैं; जैसे— सर्प, मेढकगिरगिट, छिपकली, मैना पक्षी, लोमड़ी, भेड़िया, बिल्ली आदि।
(iii) तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता या तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary consumers ) – इसमें द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ताओं को खाने वाले जन्तु आते हैं; जैसे- सर्प मेढक का शिकार करते हैं, बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों का शिकार करती हैं, चिड़ियाँ मांसाहारी मछलियों का शिकार करती हैं। कुछ जन्तु एक से अधिक श्रेणी के उपभोक्ता हो सकते हैं (जैसे- बिल्ली, मनुष्य आदि) । ये मांसाहारी एवं शाकाहारी दोनों होते हैं; अतः ये सर्वभक्षी ( omnivore) कहलाते हैं।
(3) अपघटनकर्त्ता या अपघटक (Decomposers)—ये जीवमण्डल के सूक्ष्म जीव हैं; जैसे- जीवाणु व कवक । ये उत्पादक तथा उपभोक्ताओं के मृत शरीर को सरल यौगिकों में अपघटित कर देते हैं। ऐसे जीवों को अपघटक (decomposers) कहते हैं। ये विभिन्न कार्बनिक पदार्थों को उनके सरलं अवयवों में तोड़ देते हैं। सरल पदार्थ पुनः भूमि मिलकर पारितन्त्र के अजैव घटक का अंश बन जाते हैं।
(II) निर्जीव या अजैविक घटक
इसके अन्तर्गत निर्जीव वातावरण आता है, जो विभिन्न जैविक घटकों का नियन्त्रण करता है। अजैव घटक को निम्नलिखित तीन उप-घटकों में विभाजित किया गया है—
(1) अकार्बनिक ( Inorganic) – इसके अन्तर्गत पोटैशियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, लोहा, सल्फर आदि के लवण, जल तथा वायु की गैसें; जैसे – ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, अमोनिया आदि; आती हैं।
(2) कार्बनिक (Organic) – इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा आदि सम्मिलित हैं। ये मृतक जन्तुओं एवं पौधों के शरीर से प्राप्त होते हैं। अकार्बनिक एवं कार्बनिक भाग मिलकर निर्जीव वातावरण का निर्माण करते हैं।
(3) भौतिक घटक (Physical Components ) — इसमें विभिन्न प्रकार के जलवायवीय कारक; जैसे- वायु, प्रकाश, ताप, विद्युत आदि; आते हैं।
प्रश्न 2. जलीय पारितन्त्र का सचित्र विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर : जलीय पारितन्त्र
स्वच्छ जल का तालाब जलीय पारितन्त्र का एक अच्छा उदाहरण है। इस प्रकार के पारितन्त्र में अनेक प्रकार के स्वतन्त्र रूप से तैरने वाले या स्थिर जलीय तैरने वाले पौधे जैसे— एजोला (Azolla), ट्रापा (Trapa), हाइड्रिला (Hydrilla), वैलिसनेरिया (Vallisneria), कारा (Chara) एवं अनेक सूक्ष्म शैवाल इत्यादि प्राथमिक उत्पादक (primary producers) होते हैं। ये हरे पौधे स्वपोषी होते हैं। ये प्रकाश ऊर्जा (solar energy) ) को अवशोषित करके प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा भोजन निर्माण करते हैं। इन भोज्य पदार्थों में सौर ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा के रूप में स्थिर हो जाती है। विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे जीवधारी; जैसे—कोपिपोड्स (copepodes), जलीय कीट (water flees), निम्फ ( nymphs ) तथा कीट – लारवा (insect larvae ) तथा अन्य प्राणी प्लवक (zooplanktons) प्राथमिक उपभोक्ता (primary consumers) होते , हैं। छोटी मछलियाँ, मेढ़क तथा क्रस्टेशियन्स द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता (consumers of second order) होते हैं, जो प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते हैं और स्वयं तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता; जैसे बड़ी मांसाहारी मछली तथा परभक्षी चिड़ियाँ (predatory birds); जैसे बत्तख इत्यादि का भोजन बन जाते हैं। अपना-अपना जीवन चक्र पूरा करने के बाद इन पौधों की तथा विभिन्न श्रेणी के उपभोक्ताओं की मृत्यु हो जाती है। अपघटक (decomposers) इनके मृत शरीर को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। ये सरल अकार्बनिक पदार्थों (abiotic components) में बदलकर जल और वातावरण में विलीन हो जाते हैं। इस प्रकार से जलीय पौधों द्वारा जो पदार्थ जल और वातावरण से ग्रहण किए जाते हैं वे फिर से जल में मिल जाते हैं।

प्रश्न 3. पदार्थों के पुनः चक्रण की व्याख्या कीजिए। एक पारितन्त्र में नाइट्रोजन चक्र का वर्णन कीजिए।
अथवा पृथ्वी पर पदार्थों का चक्रीय प्रवाह उदाहरण सहित समझाइए । चक्रीय प्रवाह का महत्त्व बताइए ।
अथवा प्रकृति में नाइट्रोजन चक्र का रेखाचित्र बनाकर संक्षेप में उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर : पृथ्वी पर जीवधारियों में पदार्थों का चक्रीय प्रवाह
प्रत्येक जीवधारी को जीवन की क्रियाओं के लिए आवश्यक पदार्थों की आवश्यकता होती है। प्रकृति में ये पदार्थ सीमित मात्रा में पाए जाते हैं, किन्तु इनके चक्रीय उपभोग के कारण ये सभी जीवों को उपलब्ध होते रहते हैं। चक्रीय उपभोग में एक ओर, मनुष्य जैसे परपोषी हैं तो दूसरी ओर, हरे पौधे जैसे स्वपोषी हैं। इसके अतिरिक्त, अनेक सूक्ष्म जीव; जैसे जीवाणु, इन चक्रीय उपभोगों में विशेष सहायता करते हैं। पौधे हरे होने के कारण प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन निर्माण करने के साथ-साथ ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं, जबकि जन्तु इस संश्लेषित भोजन का उपभोग करते हैं। जीवाणु तथा कवक जन्तुओं द्वारा उत्पन्न व्यर्थ और वर्ज्य पदार्थों को तोड़-फोड़कर सरल पदार्थों के रूप में वातावरण में स्वतन्त्र कर देते हैं। पौधे इन सरल पदार्थों का पुनः उपभोग कर लेते हैं। इस प्रकार, प्रकृति में कार्बन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन आदि के चक्र चलते रहते हैं और प्रकृति की सीमित वस्तुएँ ही लौट लौट कर जीवों के द्वारा काम में लाई जाती रहती हैं। इसी को पदार्थों का चक्रीय उपभोग कहते हैं।

इन चक्रीय प्रवाहों में जीवों के शरीर में मिलने वाले लगभग 30 मुख्य अकार्बनिक पदार्थ आते हैं, जो पौधों को उनके पर्यावरण से प्राप्त होते हैं। ऑक्सीजन कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन आदि पदार्थों का जैवीय अंश में प्रवाह (flow) होता रहता है, जिसका प्रारम्भ प्रमुखतः पौधे (उत्पादक) करते हैं; इसलिए इन चक्रों को भू-जैवीय रासायनिक चक्र (Bio-geochemical cycle) कहा जाता है।
चक्रीय प्रवाह का उदाहरण जल चक्र
जीवधारियों के शरीर का सबसे बड़ा अंश लगभग 80-90% जल होता है। जीवधारी जल को वायुमण्डल अथवा भूमि से प्राप्त करते हैं। भूमि पर नदियों, तालाबों तथा बड़े-बड़े सागरों का जल वाष्पीकरण द्वारा वायुमण्डल में जाता है तथा पुनः वर्षा द्वारा भूमि पर आ जाता है। जीवधारियों के शरीर में जल की एक निश्चित मात्रा होती है, क्योंकि जल जीवधारियों की संरचना एवं जैव क्रियाओं के संचालन के लिए आवश्यक है। पौधे जल को भूमि या जलाशयों से तथा जन्तु जल को सीधे ग्रहण कर अथवा भोज्य पदार्थों से प्राप्त करते हैं। पौधों की पत्तियों से वाष्पीकरण द्वारा, जीवधारियों से श्वसन तथा उत्सर्जी अंगों द्वारा जल का अधिकांश भाग वातावरण में मुक्त हो जाता है। जीवधारियों की मृत्यु के पश्चात् कार्बनिक पदार्थों के अपघटन से भी जल मुक्त होकर पुनः वातावरण में वापस चला जाता है। इस प्रकार, वातावरण से जीवधारी जितना जल प्राप्त करते हैं, उतना वातावरण में मुक्त कर देते हैं। इस प्रकार जल चक्र निरन्तर चलता रहता है।

पदार्थों के चक्रीय प्रवाह का महत्त्व
चक्रीय प्रवाहों का, प्रकृति में अत्यधिक महत्त्व है। इसी से पदार्थों का सभी स्थानों पर सन्तुलन बना रहता है। ये पदार्थ जीवों में अजैवीय पदार्थों के रूप में प्रवेश करते हैं, जिससे उनका जीवद्रव्य बढ़ता रहता है और उनकी सक्रियताएँ चलती रहती हैं। चक्रीय प्रवाह न हो, तो प्रकृति में आवश्यक पदार्थ समाप्त होते चले जाएँगे और पारिस्थितिक तन्त्रों का चलना असम्भव हो जाएगा।
नाइट्रोजन चक्र
(I) भूमि में नाइट्रोजन
भूमि में नाइट्रोजन अकार्बनिक तथा कार्बनिक यौगिकों के रूप में उपस्थित रहती है।
(1) अकार्बनिक नाइट्रोजनी पदार्थ – पृथ्वी में पाए जाने वाले अकार्बनिक नाइट्रोजनी पदार्थ (inorganic nitrogenous substance) तीन प्रकार के होते हैं—
अमोनियम (NH4+), नाइट्राइट (— NO2−) तथा नाइट्रेट (—NO3−) आदि।
(2) कार्बनिक नाइट्रोजनी पदार्थ – सामान्य रूप से नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक ह्यूमस में पाए जाते हैं। ह्यूमस का निर्माण जन्तुओं एवं मृत पौधों के सड़ने से होता है। ह्यूमस निर्माण में निम्नलिखित दो प्रकार क्रियाएँ होती हैं-
(i) अमोनीकरण (Ammonification) – नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक पदार्थों के अमोनियम आयन (NH4+)) में टूटने की क्रिया को अमोनीकरण कहते हैं। भूमि में यह क्रिया अमोनीफाइंग जीवाणुओं (जैसे— बैसिलस व क्लॉस्ट्रीडियम जीवाणु आदि । ) द्वारा होती है।

(ii) नाइट्रीकरण (Nitrification) – अमोनियम आयन को नाइट्रेट में बदलने की क्रिया को नाइट्रीकरण कहते हैं। मिट्टी में पाए जाने वाले नाइट्रीफाइंग जीवाणु (जैसे— नाइट्रोसोमोनास व नाइट्रोकोकस आदि) अमोनियम आयनों को नाइट्राइट (NO2−) में बदल देते हैं। नाइट्राइट अन्य प्रकार के नाइट्रीफाइंग जीवाणुओं (नाइट्रोबैक्टर) द्वारा नाइट्रेट में परिवर्तित होता है। इसे पौधे खाद के रूप में अपनी जड़ों द्वारा अवशोषित करते हैं।

(II) नाइट्रोजन यौगिकीकरण
वायुमण्डल में लगभग 79% नाइट्रोजन स्वतन्त्र गैस के रूप में होती है । स्वतन्त्र नाइट्रोजन द्वारा नाइट्रोजनयुक्त पदार्थों के निर्माण को नाइट्रोजन स्थिरीकरण या नाइट्रोजन यौगिकीकरण कहते हैं। यह मुख्य रूप से दो प्रकार से होता है—
(1) अजैविक (Non-biological) नाइट्रोजन यौगिकीकरणइसमें वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन तड़ित एवं वर्षा के जल से नाइट्रोजन एवं नाइट्रेट में परिवर्तित हो जाती है, जिन्हें पौधे अपनी जड़ों द्वारा अवशोषित करते हैं। यह अग्रलिखित प्रकार से होता है-
(i) पानी बरसते समय बिजली (तड़ित) के चमकने से वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन ऑक्सीजन से संयोग करके नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) बनाती है।

(ii) नाइट्रिक ऑक्साइड ऑक्सीजन की अधिकता में नाइट्रोजन परॉक्साइड (NO2) में बदल जाती है।
(iii) नाइट्रोजन परॉक्साइड ऑक्सीजन एवं वर्षा के जल से क्रिया करके नाइट्रिक अम्ल (HNO3) बनाती है।
(iv) नाइट्रिक अम्ल भूमि में अमोनिया, कैल्सियम तथा पोटैशियम यौगिकों के साथ मिलकर नाइट्राइट तथा नाइट्रेट में परिवर्तित हो जाता है, जिन्हें पौधे जड़ों द्वारा ग्रहण करते हैं।

(2) जैविक नाइट्रोजन यौगिकीकरण- इसमें जीवाणु, यीस्ट, शैवाल जैसे सूक्ष्म जीव भाग लेते हैं। यह दो प्रकार का होता है-
(A) असहजीवी (Non-symbiotic), (B) सहजीवी (Symbiotic)।
(A) असहजीवी (Non-symbiotic) – यह निम्न प्रकार से होता है-
(i) जीवाणुओं द्वारा – मिट्टी में उपस्थित नाइट्रोजन यौगिकीकरण जीवाणु: (जैसे— एजोटोबैक्टर, क्लोरोबियम आदि) स्वतन्त्र नाइट्रोजन को नाइट्रेट में बदल देते हैं।
(ii) हरी नीली शैवाल द्वारा-मिट्टी में पाई जाने वाली हरी नीली शैवालें; जैसे— नॉस्टॉक, एनाबीना, ऑसिलेटोरिया आदि नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं।
(B) सहजीवी (Symbiotic) – लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों; जैसे—मटर, अरहर, मूँगफली आदि की जड़ों में अनेक छोटी-छोटी गाँठें (nodules) होती हैं। इनमें राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम (Rhizobium |leguminosarum) नामक जीवाणु होते हैं। ये जीवाणु वायु की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को लेकर नाइट्रेट में बदल देते हैं; जिसे पौधे जड़ों द्वारा ग्रहण करते हैं। पौधे इसके बदले में जीवाणुओं को भोजन एवं रहने के लिए उचित स्थान देते हैं। इस प्रकार ये एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।
(III) विनाइट्रीकरण
“मिट्टी में उपस्थित नाइट्रेट तथा अमोनिया को स्वतन्त्र नाइट्रोजन में बदलने की क्रिया को विनाइट्रीकरण कहते हैं।” यह कार्य विनाइट्रीकरण जीवाणुओं द्वारा होता है; जैसे—बैक्टीरियम डिनाइट्रीफिकेन्स (Bacterium denitrificans) एवं माइक्रोकोकस डिनाइट्रीफिकेन्स (Micrococcus denitrificans) आदि। इससे मृदा ऊसर हो जाती है।
नाइट्रोजन चक्र का महत्त्व — जीवों में नाइट्रोजन प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल आदि को बनाने के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
प्रश्न 4. खाद्य – श्रृंखला से आप क्या समझते हैं? खाद्य श्रृंखला तथा खाद्य- जाल में क्या अन्तर है? उचित उदाहरणों की सहायता से समझाइए ।
उत्तर : आहार श्रृंखला या खाद्य-श्रृंखला
किसी भी पारिस्थितिक तन्त्र में अनेक ऐसे जीव होते हैं जो एक-दूसरे को खाकर ( उपभोग करके) अपनी आहार सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। किसी पारिस्थितिक तन्त्र में एक जीव द्वारा दूसरे जीव को | खाने (उपभोग करने) की क्रमबद्ध प्रक्रिया को आहार- श्रृंखला कहते हैं।
किसी पारिस्थितिक तन्त्र में खाद्य श्रृंखला विभिन्न प्रकार के जीवधारियों का वह क्रम है, जिसमें जीवधारी भोज्य एवं भक्षक के रूप में सम्बन्धित रहते हैं और इनमें होकर खाद्य ऊर्जा का प्रवाह एक ही दिशा | (unidirectional) में होता रहता है।
प्राथमिक उत्पादक ( हरे पौधे); प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता एवं अपघटनकर्त्ता (कवक एवं जीवाणु) आपस में मिलकर खाद्य श्रृंखला का निर्माण करते हैं, क्योंकि ये आपस में एक-दूसरे का भक्षण करते हैं और भक्षक या भोज्य के रूप में सम्बन्धित रहते हैं।
आहार- श्रृंखला में ऊर्जा व रासायनिक पदार्थ उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटनकर्ता व निर्जीव प्रकृति में क्रम से प्रवेश करते रहते हैं। खाद्य – श्रृंखला को निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है—
(1) घास स्थलीय पारिस्थितिक तन्त्र में खाद्य श्रृंखला के जीवधारियों का क्रम
(i) घास → हिरन → शेर
(ii) घास → कीड़े-मकोड़े → चिड़िया → बाज → गिद्ध
(2) तालाब के पारिस्थितिक तन्त्र में खाद्य श्रृंखला के जीवधारियों का क्रम
उत्पादक → प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता → द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता → तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता → उच्च मांसाहारी
(i) हरे पौधे (पादप प्लवक) → कीड़े-मकोड़े (जन्तु प्लवक ) → मेढक → साँप → बाज
(ii) शैवाल (पादप प्लवक ) → जलीय पिस्सू (जन्तु प्लवक ) → छोटी मछली → बड़ी मछली → बगुला, बत्तख, सारस

आहार-श्रृंखला के विभिन्न स्तरों पर भोजन (ऊर्जा) का स्थानान्तरण होता है। इन स्तरों को पोषण रीति’ या ‘पोषण स्तर’ (trophic level) कहते हैं।
खाद्य-जाल
प्रकृति में खाद्य श्रृंखला एक सीधी कड़ी के रूप में नहीं होती है। एक पारिस्थितिक तन्त्र की सभी खाद्य श्रृंखलाएँ कहीं-न-कहीं आपस में सम्बन्धित होती हैं अर्थात् एक खाद्य श्रृंखला के जीवधारियों का सम्बन्ध दूसरी खाद्य – श्रृंखलाओं के जीवधारियों से होता है। इस प्रकार, अनेक खाद्य श्रृंखलाओं (food-chains) के पारस्परिक सम्बन्ध को खाद्य-जाल (food-web) कहते हैं।

खाद्य-श्रृंखला एवं खाद्य-जाल में अन्तर

- लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. सुपोषण की परिभाषा लिखिए।
अथवा सुपोषण से क्या समझते हैं?
उत्तर : जल में मल-मूत्र के अत्यधिक बहाव से जल प्लवकों की वृद्धि होती है। इनकी अत्यधिक संख्या से जल में विलेय ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। जल, प्लवकों के मृत होने पर उनके सड़ने के कारण भी जल में घुली अधिकांश ऑक्सीजन की मात्रा में कमी आ जाती है। अतः पोषको का अत्यधिक संभरण तथा शैवालों (algae) की वृद्धि या फलने-फूलने के फलस्वरूप जल में ऑक्सीजन की मात्रा में कमी आने की प्रक्रिया को सुपोषण या यूट्रोफिकेशन (eutrophication) कहते हैं।
प्रश्न 2. आप कचरे की मात्रा को किस प्रकार कम कर सकते हैं?
उत्तर : कचरे की मात्रा को कम करने के उपाय-कचरे के निपटान का अर्थ है कि कचरे की मात्रा को कम करना। इसके लिए निम्नलिखित कई विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं जो कचरे की प्रकृति पर निर्भर करती हैं-
(1) भूमि भराव – शहरों में ठोस कचरे का प्रयोग भूमि भराव के लिए किया जाता है।
(2) पुनः चक्रण – इस विधि में जैव विकृतीय कचरे का प्रयोग प्रयुक्त हुई धातुओं की पुनः प्राप्ति के लिए किया जाता है जिससे उन्हें दोबारा प्रयोग में लाया जा सके। औद्योगिक कचरे विशेष संयन्त्रों में उपचारित किए जाते हैं तथा इनमें उपलब्ध मूल्यवान कचरे का पुनः चक्रण करते हैं; जैसे- पिघले हुए प्लास्टिक को कोलतार के साथ मिश्रित करके सड़क निर्माण में प्रयुक्त किया जाता है।
(3) जलाने से – कचरे को अधिक ताप पर जलाकर इसकी मात्रा कम करते हैं।
(4) बायोगैस तथा खाद के उत्पादन द्वारा — जैव अपघटनीय कचरे से बायोगैस तथा खाद का उत्पादन कर सकते हैं जो ऊर्जा के अन्य स्रोतों तथा उर्वरकों से बहुत अधिक सस्ती होती है।
प्रश्न 3. आप पर्यावरण एवं विकास में सम्बन्ध किस प्रकार स्थापित कर सकते हैं?
उत्तर : पर्यावरण तथा विकास में सम्बन्ध – विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के इस युग में मनुष्य के प्राकृतिक संसाधनों उपयोग की क्षमता में वृद्धि हुई है। अत: वह अपने पर्यावरण का निर्माता स्वयं बन गया है। अब प्राकृतिक वातावरण की रूपरेखा, मार्गदर्शन तथा निर्देशन सामाजिक-आर्थिक अनुचिंतनों पर निर्भर करता है। इससे प्राकृतिक वातावरण का निम्नीकरण हुआ है। प्राचीन गाँव, पर्वत तथा समुद्र तट अब शहरों तथा महानगरों में बदल गए हैं। सड़कों का निर्माण हुआ है जिससे परिवहन व्यवस्था में सुधार आया है। पर्यटन का महत्त्व बढ़ने से बड़े-बड़े होटलों का निर्माण हुआ है। कृषि योग्य भूमि पर भी होटलों तथा अन्य उद्योगों का निर्माण हो रहा है। विद्युत उत्पादन के लिए बड़े-बड़े बाँध बनाए जा रहे हैं।
पर्यावरण तथा विकास में सन्तुलन बनाए रखने के लिए संपोषणीय विकास (sustainable development) की तुरन्त आवश्यकता है। इसके लिए हमें विकास के विभिन्न पहलुओं पर समग्रता से विचार करना चाहिए। संरक्षण, स्थायित्व तथा जैव विविधता एक- – दूसरे से सम्बन्धित हैं। मनुष्य को प्रकृति के साथ सामंजस्य और अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए, वृक्षारोपण में वृद्धि करनी पड़ेगी। इसके साथ-साथ उसको कंक्रीट भवनों के बीच हरित क्षेत्र विकसित करने होंगे। हमें उन्हीं प्रौद्योगिकियों को अपनाना चाहिए जो पर्यावरण की दृष्टि से ठीक हों और पुनः चक्रण तथा संसाधनों के दक्षतापूर्ण उपयोगों पर आधारित हों।
प्रश्न 4. जल किस प्रकार प्रदूषित होता है?
उत्तर : (i) जल स्रोत के निकट बिजली घर, भूमिगत कोयला खदानों तथा तेल के कुओं से प्रदूषक सीधे जल में पहुँचकर उसे प्रदूषित करते हैं।
(ii) खेतों, बगीचों, निर्माण स्थलों, गलियों आदि से बहने वाला जल भी प्रदूषित होता है।
(iii) जल में कैल्सियम या मैग्नीशियम के यौगिकों का घुलकर प्रदूषित करना ।
(iv) प्रोटोजोआ, जीवाणु तथा अन्य रोगाणु जल को प्रदूषित करते हैं।
(v) जल में तेल, भारी धातुएँ, घरेलू कचरा, अपमार्जक, रेडियोधर्मी कचरा आदि उसको प्रदूषित करते हैं।
प्रश्न 5. मृदा अपरदन क्या है? इसके कारण कथा प्रभाव क्या हैं? इसे किस प्रकार रोका जा सकता है?
उत्तर : मृदा अपरदन – प्राकृतिक कारक; जैसे— जल तथा वायु मृदा की ऊपरी परत को हटाने के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस प्रक्रम को मृदा अपरदन (soil erosion) कहते हैं।
मृदा अपरदन के कारण-
(i) तीव्र वर्षा मिट्टी की अनावृत ऊपरी परत को बहा ले जाती है।
(ii) धूल भरी आँधी से भी मृदा अपरदन होता है।
(iii) मनुष्य के क्रियाकलापों से मृदा अपरदन होता है। मनुष्य द्वारा बढ़ते आवासों तथा शहरी क्षेत्रों के विकास से बहुत बड़े क्षेत्र वनस्पतिविहीन हो गए हैं। वनस्पति का आवरण हट जाने से नग्न भूमि पर वायु तथा जल का सीधा प्रभाव पड़ता है। इससे मृदा का अपरदन होता है।
(iv) भूमि की त्रुटिपूर्ण जुताई से भी मृदा अपरदन होता है।
मृदा अपरदन के प्रभाव — इसके निम्नलिखित हानिकारक प्रभाव होते हैं-
(i) मृदा अपरदन से हरे जंगल मरुस्थलों में बदल जाते हैं, जिससे पर्यावरण सन्तुलन बिगड़ जाता है। |
(ii) इससे फसल ठीक प्रकार से नहीं होती है, जिससे भोजन की कमी हो सकती है।
(iii) पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन से भूस्खलन हो सकता है।
(iv) इससे भूमि जल धारण नहीं कर सकती है। पानी के तीव्रता से नदियों में बह जाने से बाढ़ आ सकती है। इससे जान-माल का नुकसान हो सकता है।
मृदा अपरदन रोकने के उपाय- इसके लिए हम निम्नलिखित विधियों का प्रयोग करते हैं-
(i) वृक्षारोपण तथा घास उगाकर ।
(ii) सघन खेती तथा बहाव के लिए ठीक नालियाँ बनाकर ।
(iii) ढलवाँ स्थानों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाने से जल बहाव की गति कम हो जाती है।
प्रश्न 6. निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए-
(1) अम्ल वर्षा
(2) ओजोन की न्यूनता
(3) वैश्विक ऊष्मन या पौधघर प्रभाव (green house effect)।
उत्तर : (1) अम्ल वर्षा — अम्ल वर्षा वायु में उपस्थित नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड के कारण होती है। ये गैसीय ऑक्साइड वर्षा के जल के साथ मिलकर क्रमश: नाइट्रिक अम्ल तथा सल्फ्यूरिक अम्ल बनाते हैं। वर्षा के साथ ये अम्ल भी पृथ्वी पर नीचे आ जाते हैं। इसे ही अम्ल वर्षा या अम्लीय वर्षा (acid rain) कहते हैं। इसके कारण अनेक ऐतिहासिक भवनों, स्मारकों मूर्तियों का संक्षारण हो जाता है जिससे उन्हें काफी नुकसान पहुँचता है। अम्लीय वर्षा के कारण, मृदा भी अम्लीय हो जाती है जिससे धीरे-धीरे उसकी उर्वरता कम हो जाती है। इस कारण वन तथा कृषि उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(2) ओजोन की न्यूनता – स्त्रोत : रेफ्रीजरेटर, अग्निशमन यन्त्र तथा ऐरोसॉल स्प्रे में उपयोग किए जाने वाले क्लोरो-फ्लुओरो कार्बन (CFC) से वायुमण्डल में ओजोन परत का ह्रास होता है।
हानियाँ – ओजोन परत में ह्रास के कारण सूर्य से पराबैंगनी (UV) किरणें अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पहुँचती हैं। पराबैंगनी विकिरण से आँखों तथा प्रतिरक्षी तन्त्र को नुकसान पहुँचता है। इससे त्वचा का कैंसर भी हो जाता है। ओजोन परत के ह्रास के कारण वैश्विक वर्षा, पारिस्थितिक असन्तुलन तथा वैश्विक खाद्यान्नों की उपलब्धता पर भी प्रभाव पड़ता है।
(3) वैश्विक ऊष्मन या पौधघर प्रभाव – जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम आदि) के जलने से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड तथा मेथेन जैसी गैसें पृथ्वी से होने वाले ऊष्मीय विकिरण को रोक लेती हैं। इस कारण पृथ्वी का ताप बढ़ता है, इस प्रभाव को पौधघर प्रभाव कहते हैं। जिससे मौसम में परिवर्तन के साथ-साथ समुद्र तल में भी वृद्धि हो रही है। ताप बढ़ने से पहाड़ों पर हिम से ढकी चोटियाँ तथा हिमखण्ड पिघलने लगेंगे जिससे बाढ़ आ सकती है।
प्रश्न 7. व्यावसायिक विकृतियाँ क्या होती हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर : अनेक रोग ऐसे होते हैं जो मानव के विशिष्ट व्यवसाय से सम्बन्धित होते हैं। कुछ विशेष पदार्थों, वस्तुओं के लगातार प्रयोग या वायु के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करने से उनमें निम्नलिखित विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं—
(i) सिलिकोसिस या सिलिको ट्यूबरकुलोसिस – खदानों, व्यक्तियों की साँस के साथ सिलिका या सिलिकन डाइऑक्साइड (SiO2) सिरेमिक काँच, चीनी मिट्टी के उद्योग तथा भवन निर्माण में कार्य करने वाले के कण लगातार प्रवेश करते रहते हैं। इस कारण मजदूरों के वक्ष में पीड़ा तथा खाँसी बलगम की शिकायत होती है।
(ii) ऐस्बेस्टॉसिस – यह रोग ऐस्बेस्टॉस जमा होने के कारण होता है, जिसका उपयोग छत की चादर बनाने में होता है। यह कैंसरजनक भी होता है।
(iii) न्यूमोकोनियोसिस – कोयला खदानों में कार्यरत व्यक्तियों द्वारा साँस के साथ कोयले के महीन कण प्रवेश कर जाते हैं। इससे साँस सम्बन्धी विकार हो जाते हैं।
(iv) बाइसिनोसिस – कपड़ा मिल में काम करने वाले मजदूरों की साँस के साथ रुई के रेशे लगातार शरीर में प्रवेश करते रहते हैं। फेफड़ों में इन रेशों के एकत्र होने से फेफड़े निष्क्रिय हो जाते हैं। इस कारण साँस लेने में कठिनाई होती है। इससे दमा और खाँसी की शिकायत होती है।
प्रश्न 8. जल प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : जल प्रदूषण के प्रमुख स्रोत – इनका वर्णन निम्न प्रकार है-
(i) जल प्रदूषण के बिन्दु स्रोत- ये स्रोत प्रदूषकों को सीधे ही जल में प्रवाहित कर देते हैं। सामान्यत: जल प्रवाहित करने से पूर्व इन प्रदूषकों को दूर करना सम्भव है। जल स्रोत के पास बिजलीघर, भूमिगत कोयला खदानें तथा तेल के कुएँ इस वर्ग के उदाहरण हैं।
(ii) जल प्रदूषण के अबिन्दु स्रोत- ये स्रोत जल में किसी एक बिन्दु या निश्चित स्थान से प्रवाहित नहीं होते। ये अनेक स्थलों पर फैले रहते हैं। खेतों, बगीचों, निर्माण स्थलों, जल भराव, सड़क तथा गलियों आदि से बहने वाला जल इस वर्ग के उदाहरण हैं। अबिन्दु स्रोत का नियमन तथा उपचार आसान नहीं होता है।
प्रश्न 9. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-
(1) यू०ए०एस० बी० (UASB) (2 ) संपोषणीय विकास
उत्तर : (1) यू० ए० एस० बी० – मल-मूत्र के जल को नदियों में या समुद्र में प्रवाहित करने से पहले उपचारित करना चाहिए। आधुनिक तकनीक द्वारा यह कार्य सरल हो गया है। इस प्रक्रिया के तीन भाग हैं-
(i) प्राथमिक उपचार – इस प्रक्रम में मल जल को एक घर्षण अभिक्रिया से प्रवाहित करते हैं। इसके बाद इसे अनेक अवसाद हौजों से गुजारते हुए चूने की सहायता से उदासीन करते हैं।
(ii) द्वितीय या जैव उपचार – उदासीन मल-जल को उच्चस्तरीय अवायवीय बहाव आवरण (Upflow Anaerobic Sludge Blanket-UASB) में भेजा जाता है। यह एक रिऐक्टर होता है। इसमें अवायवीय जीवाणु जल में उपस्थित जैव- निम्नीकरणीय पदार्थों का अपघटन करते हैं। इस प्रक्रम में दुर्गन्ध समाप्त हो जाती है और मेथेन गैस बाहर निकलती है, जिसका उपयोग कहीं और सार्थक स्थान में किया जाता है । यहाँ से जल को वायु मिश्रण टैंकों में भेजा जाता है, जहाँ इस जल में वायु तथा जीवाणु मिलाए जाते हैं। जीवाणु जैववर्ज्य का अपमार्जन करते हैं। यह जैन उपचार कहलाता है।
(iii) तृतीय उपचार – उपर्युक्त प्रकार के उपचार के बाद भी जल पीने योग्य नहीं होता है। इस प्रक्रम में क्लोरीनीकरण, वाष्पीकरण, विनिमय, अवशोषण विधियों द्वारा जल में घुले अजैविक पदार्थों तथा जीवाणुओं को पूर्णतः मुक्त किया जाता है। यह उपचार जल की अभीष्ट गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
(2) संपोषणीय विकास – आज के विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के युग प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की क्षमता में वृद्धि हुई है। प्राकृतिक वातावरण का निम्नीकरण हुआ है जिससे पर्यावरणीय प्रदूषण अधिक होता है। पर्यावरण तथा विकास में सन्तुलन बनाए रखने के लिए संपोषणीय विकास की आवश्यकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें विकास के विभिन्न पहलुओं पर समग्रता से विचार करना होगा। यदि मनुष्य को अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो उसे प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना होगा। वृक्षारोपण में वृद्धि के साथ-साथ, कंक्रीट के भवनों के बीच हरित क्षेत्र विकसित करने होंगे। हमें उसी प्रौद्योगिकी को अपनाना चाहिए जो पर्यावरण की दृष्टि से ठीक हो और पुनः चक्रण तथा संसाधनों के दक्षतापूर्ण . उपयोगों पर आधारित हो ।
प्रश्न 10. पर्यावरण सम्बन्धी नियम क्या हैं? इन्हें लागू करने की क्यों आवश्यकता होती है?
उत्तर : बढ़ती जनसंख्या, तकनीकी विकास तथा औद्योगीकरण के कारण हमारा वायुमण्डल प्रदूषित होता जा रहा है। मानव ने अपने स्वार्थ के लिए वनों को काटना, पक्षियों व जानवरों को मारना शुरू कर दिया। जैविक सम्पदाओं का दुरूपयोग करना शुरू कर दिया। इन सबसे पारिस्थितिक सन्तुलन बिगड़ गया है। वायुमण्डल में पारिस्थितिक सन्तुलन बनाए रखने के लिए विभिन्न देशों ने और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यूनेस्को (UNESCO) ने. पर्यावरण प्रदूषण रोकने के लिए कई कानून बनाए। यही पर्यावरण सम्बन्धी नियम कहलाते हैं। कुछ अधिनियम निम्न प्रकार हैं-
(i) प्राणियों के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960
(ii) जल ( संरक्षण तथा प्रदूषण नियन्त्रण) अधिनियम, 1974
(iii) वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980
(iv) वायु प्रदूषण नियन्त्रण तथा रोकथाम अधिनियम, 1981
(v) पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986
(vi) मोटर वाहन अधिनियम, 1938; संशोधित वर्ष 1988
(vii) वन्य जीव (सुरक्षा) अधिनियम, 1972; संशोधित वर्ष 1991
प्रश्न 11. अम्लीय वर्षा क्या है? इसके दो हानिकारक प्रभाव लिखिए।
उत्तर : वायु में उपस्थित नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड वर्षा के जल के साथ मिलकर क्रमश: नाइट्रिक अम्ल तथा सल्फ्यूरिक अम्ल बनाते हैं। वर्षा के साथ ये अम्ल भी पृथ्वी पर नीचे आ जाते हैं। इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं।
अम्लीय वर्षा के हानिकारक प्रभाव –
(i) इससे मृदा अम्लीय हो जाती है। इस कारण उसकी उर्वरता कम हो जाती है।
(ii) अनेक ऐतिहासिक स्मारकों, भवनों तथा मूर्तियों का संक्षारण हो जाता है।
प्रश्न 12. अम्लीय वर्षा घनी आबादी और बड़ी संख्या में फैक्ट्रियों के चारों ओर वाले क्षेत्रों में क्यों होती है?
उत्तर : घनी आबादी तथा फैक्ट्रियों के चारों ओर क्षेत्र में वायु को प्रदूषित करने वाली SO2, SO3 व नाइट्रोजन के ऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है। अतः ये गैसें वर्षा जल के साथ मिलकर क्रमश: H2SO4 तथा HNO3 बनाती हैं। ये अम्ल वर्षा के साथ-साथ पृथ्वी पर अम्लीय वर्षा करते हैं।
प्रश्न 13. जैव विकृतीय कचरा, अजैव विकृतीय कचरे से किस प्रकार भिन्न है? निम्नलिखित पदार्थों को उपर्युक्त दो वर्गों में विभाजित कीजिए—
सूती कपड़ों का कचरा, थर्मोकोल के टुकड़े, पॉलिथीन की थैली, अखबार ।
उत्तर : (i) जैव विकृतीय कचरा सूक्ष्म जीवों द्वारा आसानी से अपघटित जाता है, जबकि अजैव विकृतीय कचरा उनके द्वारा अपघटित नहीं होता है।
(ii) जैव विकृतीय कचरा, जानवरों तथा वनस्पतियों (सजीवों) प्राप्त होता है, जबकि अजैव विकृतीय कचरा इनसे प्राप्त नहीं होता है।
जैव विकृतीय कचरा – अखबार तथा सूती कपड़ों का कचरा ।
अजैव विकृतीय कचरा – थर्मोकोल के टुकड़े, पॉलिथीन की थैली ।
प्रश्न 14. पौधघर प्रभाव किस प्रकार वातावरण का ताप बढ़ा सकता है? किन्हीं दो वातावरणीय कारकों के नाम बताइए जो इसके लिए उत्तरदायी होते हैं।
उत्तर : कार्बन डाइऑक्साइड के अणुओं में पृथ्वी से परावर्तित होने वाली अवरक्त विकिरणों को अवशोषित करने की क्षमता होती है। अवरक्त विकिरणों का जाल वायुमण्डल को गर्म करता है। अवशोषित किए गए विकिरणों के कारण होने वाली ऊष्मीयता को पौधघर प्रभाव कहते हैं। इस प्रभाव के लिए निम्नलिखित वातावरणीय कारक उत्तरदायी हैं—
(i) कार्बन डाइऑक्साइड तथा (ii) मेथेन ।
प्रश्न 15. पारिस्थितिक सन्तुलन का क्या अर्थ है? जैव विकृतीय अपशिष्टों का पुनः चक्रण पारिस्थितिकी में किस प्रकार सहायता करता है?
उत्तर : पारिस्थितिक सन्तुलन वह नियन्त्रित अवस्था है जिसमें पर्यावरण के विभिन्न जीवों की गतिविधियाँ आती हैं। इसमें विभिन्न जीव एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं, प्रभावित करते हैं और इस प्रकार से सन्तुलित होते हैं, ताकि वे सदैव साम्यावस्था में रहें ।
जैव विकृतीय अपशिष्टों के पुनर्चक्रण के द्वारा उनमें उपस्थित पोषक तत्वों को पर्यावरण के पोषक निकाय; जैसे— जल तथा मृदा में पुन: लौटाया जाता है। ये पौधों द्वारा पुनः अवशोषित होते हैं तथा उपयोग में लाए जाते हैं। जैसे – गोबर गैस ऊर्जा देती है तथा अपशिष्ट अच्छे खाद के रूप में काम आता है।
प्रश्न 16. सूर्य प्रकाश का कौन-सा घटक हमारे लिए हानिकारक है ? सामान्यतः इसे हम तक पहुँचने से कैसे रोका जाता है? इस प्राकृतिक संरक्षण को क्या नष्ट कर सकता है?
उत्तर : सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणें हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं। वायुमण्डल में उपस्थित ओजोन परत पराबैंगनी विकिरणों को हमारे पास आने से रोकती है। इस परत को नष्ट करने के लिए क्लोरो-फ्लुओरोकार्बन (CFC) उत्तरदायी होता है । यह यौगिक (CFC) रेफ्रीजरेटर, अग्निशमन यन्त्र तथा ऐरोसॉल स्प्रे में उपयोग होता है।
प्रश्न 17. ओजोन परत द्वारा अवशोषित की जाने वाली किरणों का नाम बताइए। ओजोन परत के क्षीण होने के कोई दो कारण बताइए। इस क्षीणता से होने वाली सम्भावित बीमारी का नाम बताइए ।
उत्तर : पराबैंगनी किरणें ओजोन परत द्वारा अवशोषित की जाती हैं।
कारण- (i) क्लोरो-फ्लुओरोकार्बन (CFC) ओजोन परत के क्षय के लिए उत्तरदायी है।
(ii) स्वतेल धातुएँ भी ओजोन परत के क्षरण का कारण बन सकती हैं। सुपरसोनिक भी ओजोन परत को क्षयित कर सकते हैं।
बीमारियाँ – (i) त्वचा का कैंसर हो सकता है तथा (ii) त्वचा जल सकती है।
प्रश्न 18. निम्नलिखित में अन्तर लिखिए-
(i) उत्पादक तथा उपभोक्ता,
(ii) स्थलमण्डल तथा वायुमण्डल,
(iii) पारिस्थितिक तन्त्र तथा जीवोम,
(iv) समष्टि तथा समुदाय ।
उत्तर : (1) उत्पादक तथा उपभोक्ता में अन्तर
| क्र०सं० | उत्पादक (Producer ) | उपभोक्ता (Consumer ) |
| 1. | उत्पादकों में पर्णहरिम होता है। इस कारण ये अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। | इनमें पर्णहरिम नहीं होता है। इस कारण ये अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते हैं। |
| 2. | उत्पादक सूर्य की विकिरण ऊर्जा (radiant energy) को स्थितिज ऊर्जा (potential energy) में बदल कर संचित करते हैं। | उपभोक्ता भोज्य पदार्थों में संचित स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में बदल कर प्रयोग करते हैं। |
| 3.
|
उत्पादक एक ही प्रकार के होते हैं।
उदाहरण- हरे पौधे उत्पादक होते हैं। |
उपभोक्ता प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के होते हैं।
उदाहरण— जन्तु उपभोक्ता होते हैं। |
(ii) स्थलमण्डल तथा वायुमण्डल में अन्तर
| क्र०सं० | स्थलमण्डल (Lithosphere) | वायुमण्डल (Atmosphere) |
| 1. | यह पृथ्वी का ठोस भाग है जिस पर मिट्टी होती है। | यह पृथ्वी का बाहरी गैसीय भाग है। |
| 2. | यह समुद्र तल से ऊपर तथा समुद्र के नीचे पाए जाने वाला भाग है जिसमें पृथ्वी की केवल ऊपरी पर्त, जिसे मृदा कहते हैं, ही जीवन का पोषण करने में सक्षम होती है। | समुद्र तल से 1000 किमी ऊपर तक वायु पाई जाती है, जिसमें 7-8 किमी तक ही जीवों की उपस्थिति सम्भव है। |
(iii) पारिस्थितिक तन्त्र तथा जीवोम या बायोम में अन्तर
| क्र०सं० | पारिस्थितिक तन्त्र (Ecosystem) | जीवोम या बायोम (Biome) |
| 1. | पारितन्त्र बायोम से छोटी इकाई है। अनेक पारितन्त्र मिलकर जीवोम बनाते हैं। | एक बायोम में कई पारितन्त्र हो सकते हैं; अतः यह पारितन्त्र से उच्च स्तर का जैव संगठन है। |
| 2.
|
पृथ्वी के किसी भी भाग में अनेक पारितन्त्र हो सकते हैं।
उदाहरण- तालाब, झील, खेत, वन आदि । |
पृथ्वी पर कुल आठ बायोम हैं।
उदाहरण – टुण्ड्रा, टैगा, समुद्र, मरुस्थल आदि । |
(iv) समष्टि तथा समुदाय में अन्तर
| क्र०सं० | समष्टि (Population) | समुदाय (Community) |
| 1. | समष्टि एक जाति का समूह है, जो एक प्राकृतिक क्षेत्र में रहता है। | अनेक जातियों के समूह से मिलकर समुदाय बनता है, जो एक प्राकृतिक क्षेत्र में रहता है। |
| 2.
|
समूह के सभी जीव; इसी प्रकार की दूसरी समष्टि के अन्य जीवों के साथ लैंगिक जनन कर सकते हैं।
उदाहरण – गेहूँ का खेत, आलू की फसल, आम का बगीचा आदि। |
इस समूह के जीव परस्पर लैंगिक जनन करने में असमर्थ हो सकते हैं।
(भिन्न-भिन्न जातियों के कारण)
उदाहरण- जंगल : पेड़, पौधे, जानवर इत्यादि ।
तालाब : शैवाल, पानी के कीड़े, मछली आदि।
|
प्रश्न 19. ‘कार्बन चक्र’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : कार्बन चक्र
सभी जीवधारियों के शरीर में उपस्थित कार्बन, वायुमण्डल की कार्बन डाइऑक्साइड से प्राप्त होती है। प्रकृति में कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में हरे पौधों के शरीर में प्रवेश करती है, जहाँ प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा इससे भोजन (ग्लूकोज) का निर्माण होता है।

सभी जीवधारी (जन्तु, पौधे) श्वसन क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं।

वायुमण्डल में अनेक वस्तुओं के जलने अथवा ऑक्सीकृत होने के कारण कार्बन डाइऑक्साइड आती रहती है। पौधे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को ग्रहण करके वातावरण की कार्बन डाइऑक्साइड को भोज्य पदार्थ में बदल देते हैं। कोयला, पेट्रोल, मूँगे के पहाड़ (Coral reef) आदि सभी कार्बन चक्र की कड़ियाँ हैं तथा प्रकृति में जैविक क्रियाओं द्वारा निर्मित होती हैं।

प्रश्न 20. ‘जीवमण्डल में ऊर्जा का प्रवाह केवल एक ही दिशा में होता है।’ स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : ऊर्जा प्रवाह (energy flow) खाद्य – श्रृंखलाओं का निर्माण करता है। पृथ्वी पर समस्त ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य से प्राप्त प्रकाशीय ऊर्जा को प्रकाश-संश्लेषण द्वारा हरे पौधे ( उत्पादक ) रासायनिक ऊर्जा अर्थात् भोजन के रूप में संचित कर लेते हैं। भोज्य पदार्थों (ऊर्जा) का प्रवाह एक उपभोक्ता से दूसरे उपभोक्ताओं में होता रहता है। ऊर्जा (भोजन) स्थानान्तरण की इस श्रृंखला को खाद्य श्रृंखला कहते हैं। खाद्य-श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह एक ही दिशा में होता है, इसे निम्नवत् प्रस्तुत कर सकते हैं-
सौर ऊर्जा → उत्पादक → प्राथमिक उपभोक्ता → द्वितीयक उपभोक्ता → तृतीयक उपभोक्ता → सर्वोच्च उपभोक्ता → अपघटक ।
(प्रत्येक खाद्य-स्तर पर लगभग 90% ऊर्जा व्यय हो जाती है।)
प्रश्न 21. ” ऊर्जा स्थानान्तरण के दस प्रतिशत नियम” पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर : ऊर्जा स्थानान्तरण का दस प्रतिशत का नियम — इस नियम का प्रतिपादन लिन्डेमान (Lindeman) ने सन् 1942 में किया था । इसके अनुसार किसी भी आहार श्रृंखला में प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा उससे पहले स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा का 10% होती है। प्रत्येक श्रेणी के जन्तुं एक पोषण स्तर (trophic level) का निर्माण करते हैं। प्रत्येक पोषण स्तर पर लगभग 90% ऊर्जा जैवीय क्रियाओं व ऊष्मा के रूप में निकल जाती है तथा केवल 10% ऊर्जा ही इसमें संचित रह जाती है। यही ऊर्जा अगले पोषण स्तर में पहुँचती है। इस प्रकार आखिरी पोषण स्तर तक पहुँचते-पहुँचते बहुत कम ऊर्जा रह जाती है। इसे लिन्डेमान का 10% ऊर्जा सम्बन्धी नियम कहते हैं।
प्रश्न 22. अम्ल वर्षा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए ।
उत्तर : NO2, SO2, NO, CO2 आदि मुख्य वायु प्रदूषक हैं। नाइट्रोजन व सल्फर के ऑक्साइड, पेट्रोल तथा डीजल व अन्य जीवाश्म ईंधन के जलने की क्रिया में वियोजित होते हैं। ये गैसें पर्यावरण में उपस्थित जल की बूँदों के साथ मिलकर पृथ्वी पर अम्ल के रूप में (सल्फ्यूरिक तथा नाइट्रिक अम्ल) वापस आती हैं। इसको अम्ल वर्षा (acid rain) कहते हैं। आमतौर पर पर्यावरण में अम्लीयता 60-90% तक H2SO4 तथा 30-40% तक HNO3 के कारण होती है। जीवाश्म ईंधन के जलने के फलस्वरूप SO2 तथा NO2 आदि गैसों की मात्रा अत्यधिक रूप से बढ़ जाती है जिससे मानव तथा अन्य जीवों को हानि की सम्भावना बढ़ जाती है।
अम्ल वर्षा के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं-
(1) अम्ल वर्षा से मृदा की अम्लता बढ़ जाती है, जिससे पादप तथा अन्य जन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना रहती है। अम्ल वर्षा से झील, नदी आदि पानी के स्रोतों की अम्लीयता बढ़ जाती है जिससे जलीय जीव-जन्तुओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
(2) अम्लीय वर्षा से ऐतिहासिक इमारतों के खराब होने की सम्भावना रहती है। संगमरमर का रंग भद्दा हो जाता है।
(3) स्वीडन, नार्वे तथा अमेरिका में झील का पानी अधिक अम्लीय होने से, मछली का उत्पादन प्रभावित हुआ है। सालमन (Salman) तथा ट्राउट (Trout) मछलियाँ स्वीडन के तालाबों में समाप्ति की ओर हैं।
प्रश्न 23. ग्रीन हाउस प्रभाव पर टिप्पणी लिखिए।
अथवा पृथ्वी ऊष्मायन पर टिप्पणी लिखिए ।
अथवा भूमण्डलीय ऊष्मायन के लिए उत्तरदायी चार कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : CO2 की बढ़ती सान्द्रता ग्रीन हाउस प्रभाव डालती है। आमतौर पर जब CO2 की सान्द्रता सामान्य हो तब पृथ्वी का ताप तथा ऊर्जा का सन्तुलन बनाए रखने के लिए ऊष्मा पृथ्वी से परावर्तित हो जाती है, परन्तु CO2 की अधिक सान्द्रता पृथ्वी से लौटने वाली ऊष्मा को परावर्तित होने से रोकती है जिससे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होने लगती है, इसको ग्रीन हाउस प्रभाव (green house effect) कहते हैं। इसके अलावा कुछ ऊष्मा पर्यावरण में उपस्थित पानी की भाप से भी रुकती है। लगभग 100 वर्ष पहले CO2 की पर्यावरण में सान्द्रता लगभग 110 ppm थी, परन्तु अब बढ़कर लगभग 350 ppm तक पहुँच गई है। आज से करीब 40 वर्ष बाद यह सान्द्रता 450 ppm तक पहुँच जाने की सम्भावना है। इससे पृथ्वी के ऊष्मायन में वृद्धि हो सकती है।

पृथ्वी के ऊष्मायन का प्रभाव ध्रुवों पर सबसे अधिक होगा, इनकी बर्फ पिघलने लगेगी। एक अनुमान के अनुसार सन् 2050 तक पृथ्वी का | ताप 5°C तक बढ़ सकता है जिससे समुद्र के निकटवर्ती क्षेत्र शंघाई, सेन फ्रान्सिस्को आदि शहर प्रभावित होंगे। उत्तरी अमेरिका सूखा तथा गर्म प्रदेश बन सकता है। विश्वभर का मौसम बदल जाएगा। भारत में मानसून के समाप्त होने की सम्भावना है। विश्वभर में अनाज के उत्पादन पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। फल, सब्जी आदि के उत्पादन भी प्रभावित होंगे। बढ़ते ताप से पादप तथा जीव-जन्तुओं की जीवन क्रियाएँ भी प्रभावित होंगी।
प्रश्न 24. रेडियोधर्मी तत्वों के विकिरण से क्या हानियाँ हैं?
उत्तर : रेडियोधर्मी प्रदूषण में विभिन्न प्रकार के कण तथा किरणें उत्पन्न होती हैं। इनसे वायु, जल तथा मृदा का प्रदूषण होता है जिससे पादपों तथा जन्तुओं में अनेक व्याधियों की सम्भावना होती है। इस प्रकार के प्रदूषण से आनुवंशिक रोग उत्पन्न हो सकते हैं। रेडियोधर्मी प्रदूषण से उत्परिवर्तन (mutation) भी होते हैं।
रेडियोधर्मी धूल (radioactive fall out) पादपों की पत्तियों पर एकत्रित हो सकती है। पौधों से विभिन्न माध्यमों से मनुष्य तक पहुँच सकती है जिससे कैन्सर, ल्यूकीमिया आदि रोग हो सकते हैं।
रेडियोधर्मी धूल बच्चों पर अधिक प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इससे मानव की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है तथा तन्त्रिका तन्त्र आदि के विकार भी हो सकते हैं।
प्रश्न 25. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-
(अ) स्वचालित निर्वातक,
अथवा स्वचालित वाहनों से शहरी वायुमण्डल क्यों प्रदूषित हो जाता है?
(ब) औद्योगीकरण का मानव पर प्रभाव ।
उत्तर : (अ) स्वचालित निर्वातक
स्वचालित वाहन मोटर, ट्रक, बस, ट्रेक्टर, विमान आदि में डीजल, पेट्रोल आदि के जलने से CO2, नाइट्रोजन ऑक्साइड, लेड, अदग्ध हाइड्रोकार्बन तथा अन्य विषैली गैसें वायुमण्डल में मिलाकर वायु को प्रदूषित करती हैं। विभिन्न कार्बनिक पदार्थों के अपूर्ण दहन से धुआँ बनता . है। इसमें ठोस व तरल कण होते हैं। कालिख (soot), फ्लाईएश (flyash), गन्धक के कण, सीसा के कण तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड वायु को प्रदूषित करते हैं। अदग्ध हाइड्रोकार्बन से सूर्य के प्रकाश में फोटोकेमीकल स्मोग बनता है जिसमें O3 तथा परऑक्सीऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) होते हैं। इससे श्वास रोग, आँखों में जलन, खाँसी, सिरदर्द, रक्तस्राव आदि हो. सकते हैं। पौधों में पत्तियों के क्लोरोफिल का नष्ट होना, प्रकाश संश्लेषण, श्वसन आदि पर प्रभाव डालता है। पादप वृद्धि, पर्ण विलगन, पुष्पन, फल तथा बीज बनने आदि पर भी इसका प्रभाव होता है।
स्वचालित वाहनों से निकलने वाली गैसें अम्ल वर्षा, ग्रीन हाउस प्रभाव तथा फेफड़े के रोग, कैन्सर आदि के लिए भी उत्तरदायी होती हैं।
(ब) औद्योगीकरण का मानव पर प्रभाव
औद्योगिक कारखानों से निकलने वाली गैसें वायु प्रदूषित करती हैं। इनसे अम्ल वर्षा तथा ग्रीन हाउस प्रभाव को बढ़ने में भी सहायता मिलती है। प्रदूषित वायु अनेक रोगों में सहायक होती है; जैसे- श्वास रोग, जुकाम, खाँसी, रक्त चाप, हृदय रोग आदि । वायु प्रदूषण से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में भी कमी आती है। प्रदूषक पदार्थों में धुआँ, कार्बन, सल्फर, सीसा आदि के कण हो सकते हैं। SO2, नाइट्रोजन ऑक्साइड, CO आदि प्रदूषक अनेक रोगों को जन्म देते हैं।
उद्योगों से जो अपशिष्ट पदार्थ निकलते हैं, यदि उनका उचित निस्तारण नहीं किया जाए तो इनसे जल, मृदा आदि का प्रदूषण हो सकता है।
प्रश्न 26. जल प्रदूषण के चार विभिन्न कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : (1) घरेलू अपमार्जक (Household detergents)— घर में बर्तन, फर्श, दीमक, मक्खी, मच्छर, कॉकरोच, चूहे आदि को नष्ट गैमेक्सीन, फिनाइल आदि अपशिष्ट पदार्थों के साथ में निष्कासित होते हैं, जो करने हेतु उपयोग किए जाने वाले अपमार्जक पदार्थ; जैसे – DDT, नदी या तालाब में पहुँच जाते हैं। ये खाद्य श्रृंखलाओं के माध्यम से मनुष्य तक पहुँचकर हानि पहुँचाते हैं।
(2) वाहितमल (Sewage ) – मल-मूत्र अधिक मात्रा में जल स्त्रोतों में डालने पर अपघटकों की संख्या बढ़ जाती है। इसके फलस्वरूप जल में O2 की मात्रा कम हो जाती है। प्रदूषित जल की B.O.D. अधिक होती है। सड़ान के कारण दुर्गन्ध उत्पन्न होती है।
(3) औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों (Industrial waste ) — कारखानों से पारा, सीसा आदि अन्य हानिकारक रासायनिक पदार्थ निष्कासित होते हैं, जो नदी समुद्र आदि में डाल दिए जाते हैं जिनसे जलीय प्रदूषण होता है ।
(4) रेडियोधर्मी पदार्थ (Radioactive substances ) — परमाणु विस्फोट, शोधकार्य व प्रयोगशालाओं से रेडियोधर्मी विकिरण की सम्भावना रहती है। इससे पादप तथा जन्तुओं में उत्परिवर्तन की सम्भावना रहती है। परमाणु भट्टियों का प्रदूषित जल जलाशय तथा नदियों के जल को | प्रदूषित करता है।
(5) पीड़कनाशक, कीटनाशक तथा खरपतवारनाशक (Pesticides, Insecticides and Weedicides ) — जब फिनोल, D.D.T., गैमेक्सीन, क्लोरीन, गन्धक चूर्ण आदि का स्प्रे पादपों पर किया जाता है तो इससे वायु, मृदा तथा जल का प्रदूषण होता है। इनसे भूमि की उर्वरता कम हो जाती है।
(6) मृत शरीर का जल में डालना (To throw the Dead bodies in water) – अक्सर जीवों के अधजले शरीर को जल में बहा दिया जाता है। इससे जल प्रदूषण होता है। दूषित जल का प्रयोग करने से पशुओं के बीमार होने की सम्भावना रहती है।
प्रश्न 27. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –
(1) वाहितमल, ( 2 ) धुआँ प्रदूषण, (3) अपमार्जक ।
उत्तर : (1) वाहितमल (Sewage ) – वाहितमल में मल-मूत्र तथा कार्बनिक पदार्थ बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। कार्बनिक फॉस्फोरस तथा अमोनिकल नाइट्रोजन (ammonical nitrogen) जल में घुलकर निलम्बित ठोस कण, सायनाइड, तेल, धातु आदि वाहितमल के मुख्य घटक क्रमशः अकार्बनिक फॉस्फोरस, नाइट्रोजन बनाते हैं। इसके अतिरिक्त होते हैं।
वाहितमल की अधिकता से जीवाणु तथा कवक आदि अपघटकों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती है। इसके कारण जलाशयों में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। ऑक्सीजन की कमी के कारण अपघटक कार्बनिक पदार्थों का अपघटन नहीं कर पाते, इसके फलस्वरूप कार्बनिक पदार्थों की सड़न के कारण दुर्गन्ध फैलने लगती है। वाहितमल जलीय पारितन्त्र के लिए हानिकारक होता है।
(2) धुआँ प्रदूषण (Smoke pollution ) – ईंधन के जलने से, औद्योगिक कारखानों की चिमनियों से, वाहनों से निकलने वाला धुआँ वायु प्रदूषण का मुख्य स्रोत है। पूर्ण तथा अपूर्ण दहन से निकले प्रदूषक पादप तथा मानव पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। अदग्ध हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में फोटोकेमीकल स्मोग (photochemical smog) बनाते हैं। इसमें PAN तथा ओजोन होते हैं। इनसे मानव के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। आँख तथा श्वसन तन्त्र के रोग हो सकते हैं। पादपों की क्रियाएँ भी इससे प्रभावित होती हैं, क्लोरोफिल नष्ट होने लगता है। प्रकाश संश्लेषण की दर कम हो जाती है। O3 से पादप श्वसन दर तीव्र हो जाती है।
(3) अपमार्जक (Detergents ) — घर तथा कारखानों में सफाई हेतु विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार मक्खी, कॉकरोच, मच्छर, खटमल, दीमक आदि से छुटकारा पाने हेतु साबुन, सोडा, गैमेक्सीन, D.D.T., फिनाइल आदि का प्रयोग करते हैं। ये सभी पदार्थ नालियों से नदी या झील या समुद्र तक पहुँच जाते हैं। इनका विघटन शीघ्र नहीं होता है। ये खाद्य श्रृंखला के द्वारा मनुष्य में पहुँचकर हानि पहुँचाते हैं।
28. कीटाणुनाशक तथा अपतृणनाशक पदार्थों पर प्रश्न टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : कीटाणुनाशक तथा अपतृणनाशक पदार्थ
आजकल फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के कीटाणुनाशक तथा अपतॄणनाशक रसायनों का उपयोग किया जाता है; जैसे— D.D.T., मेथॉक्सीक्लोर, गन्धक चूर्ण, क्लोरीन, सल्फर डाइऑक्साइड आदि। ये पदार्थ कीट, कवक, खरपतवार आदि को नष्ट करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ये पदार्थ जल, वायु तथा मृदा को प्रदूषित करते हैं। खाद्य श्रृंखला के माध्यम से ये मनुष्य में पहुँचकर अनेक रोग उत्पन्न करते हैं। ये भूमि की उर्वरा शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। विभिन्न कीटनाशक, पीड़कनाशक रसायनों के कारण मृदा के सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, कार्बनिक पदार्थों का अपघटन रुक जाता है। मृदा की उर्वरता प्रभावित होती है। विभिन्न कीटाणुनाशक तथा अपतृणनाशक पदार्थ खाद्य श्रृंखला के माध्यम मनुष्य तथा अन्य प्राणियों में पहुँचकर उन्हें हानि पहुँचाते हैं। —
- अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. प्रदूषण की परिभाषा लिखिए।
उत्तर : वायु, जल तथा भूमि में उन अवांछित और अत्यधिक पदार्थों का इकट्ठा हो जाना जिनसे प्राकृतिक पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तन आ जाते हैं, प्रदूषण कहलाता है।
प्रश्न 2. प्रदूषक किसे कहते हैं?
उत्तर : वह पदार्थ या कारक जिसके कारण वायु, भूमि तथा जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों में अवांछित परिवर्तन हो, प्रदूषक कहलाता है।
प्रश्न 3. ओजोन अवक्षय के हानिकारक प्रभाव क्या होते हैं?
उत्तर : ओजोन परत के हास से सूर्य की पराबैंगनी किरणों (विकिरण) के अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पहुँचने से आँखों तथा प्रतिरक्षी तन्त्र को क्षति होती है। इनके अतिरिक्त, त्वचा का कैंसर भी ओजोन अवक्षय का दुष्परिणाम है।
प्रश्न 4. पर्यावरणीय प्रदूषण क्या होता है? मानव के लिए हानिकर जैव विअपघटनीय तीन प्रदूषकों के नाम लिखिए।
उत्तर : वायु, जल तथा भूमि में उन अवांछित अत्यधिक पदार्थों का एकत्रित हो जाना, जिनसे प्राकृतिक पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तन आ जाते हैं, पर्यावरणीय प्रदूषण कहलाता है।
जैव विअपघटनीय प्रदूषक – (i) कीटनाशी तथा पीड़कनाशी, (ii) प्लास्टिक तथा (iii) रेडियोऐक्टिव अपशिष्ट पदार्थ ।
प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन अजैव विकृतीय है?
(i) कागज, चमड़ा, नाइलॉन, काँच, अण्डे के छिलके ।
(ii) चाय पत्ती, काँच, ग्लूकोज, सूती कपड़े, सिल्वर की पन्नी ।
(iii) काँच, चमड़ा, सिल्वर की पन्नी, नाइलॉन के कपड़े, ग्लूकोज ।
उत्तर : (i) नाइलॉन तथा काँच । (ii) काँच तथा सिल्वर की पन्नी । (iii) काँच, सिल्वर की पन्नी, नाइलॉन के कपड़े।
प्रश्न 6. ओजोन परत के महत्त्व को बताइए ।
उत्तर : ओजोन परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है। इससे पराबैंगनी किरणों के विनाशकारी प्रभाव से पृथ्वी पर रहने वाले सजीव प्राणियों की रक्षा होती है।
प्रश्न 7. वायु प्रदूषण कम करने की किन्हीं दो विधियों के नाम लिखिए।
उत्तर : (i) फैक्ट्रियों में ऊँची चिमनियों का प्रयोग करके ।
(ii) सही तरीके से निर्मित यन्त्र और उद्योगों तथा घरों में धुएँरहित ईंधनों का प्रयोग करके।
प्रश्न 8. पौधे नाइट्रोजन को किस रूप में ग्रहण करते हैं?
उत्तर : पौधे नाइट्रोजन को सरल यौगिकों; जैसे— नाइट्रेट्स के रूप में ग्रहण करते हैं।
प्रश्न 9. यदि हरे पौधे अचानक समाप्त हो जाएँ तो क्या होगा?
उत्तर : हरे पौधों के समाप्त हो जाने पर पृथ्वी पर जीवन समाप्त हो जाएगा, क्योंकि हरे पौधे वायुमण्डल में ऑक्सीजन चक्र को बनाए रखते हैं।
प्रश्न 10. दो नाइट्रोजनकारी जीवाणुओं के नाम लिखिए।
उत्तर : (i) नाइट्रोसोमोनास (Nitrosomonas ) – ये जीवाणु अमोनिया को नाइट्राइट में बदल देते हैं।
(ii) नाइट्रोबैक्टर (Nitrobactor) — ये जीवाणु नाइट्राइट को नाइट्रेट्स में बदल देते हैं।
प्रश्न 11. जैव समुदाय तथा अजैव वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : अजैव जगत से विभिन्न अकार्बनिक तथा कार्बनिक पदार्थ जैव जगत में प्रवेश करते हैं। जीवधारियों के शरीर में पाए जाने वाले विभिन्न कार्बनिक पदार्थ मृत्यु उपरान्त मृदा में मिल जाते हैं। अपघटक जटिल कार्बनिक पदार्थों का विघटन कर देते हैं जिससे इनका पुन: उपयोग हो सके।
प्रश्न 12. बैक्टीरिया तथा कवक का पारितन्त्र में क्या कार्य है?
अथवा किन्हीं दो अपघटकों के नाम लिखिए और स्पष्ट कीजिए कि ये किस प्रकार हमारे लिए लाभदायक हैं?
उत्तर : बैक्टीरिया तथा कवक पारितन्त्र में अपघटक (decomposer) का कार्य करते हैं अर्थात् ये कार्बनिक पदार्थों को उनके अवयवों में तोड़कर विभिन्न पदार्थों के चक्रीय प्रवाह को बनाए रखते हैं।
प्रश्न 13. उत्पादक एवं अपघटक में क्या अन्तर होता है?
उत्तर : उत्पादक स्वयं अपना भोजन बनाते हैं तथा उसे संचित भी करते हैं। उदाहरण के लिए – सभी हरे पेड़-पौधे ।
अपघटक कार्बनिक पदार्थों को उनके अवयवों में तोड़कर चक्रीय प्रवाह द्वारा इन पोषक तत्वों को पौधों के उपयोग के लिए उपलब्ध कराते हैं। उदाहरण के लिए-बैक्टीरिया तथा कवक
प्रश्न 14. किन-किन प्रमुख स्त्रोतों से कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होकर वायुमण्डल में पहुँचती है?
उत्तर : कार्बन डाइऑक्साइड जीवधारियों के द्वारा श्वसन के अतिरिक्त पदार्थों के जलने से विभिन्न चट्टानों (कार्बोनेट्स) के ऑक्सीकृत होने से, जीवाणु एवं कवक आदि के द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन से तथा ज्वालामुखी के फटने आदि से वायुमण्डल में पहुँचती है।
- एक शब्द या एक वाक्य वाले प्रश्न
प्रश्न 1. वायु प्रदूषण के दो प्राकृतिक स्त्रोतों के नाम लिखिए।
उत्तर : (i) दावानल, (ii) ज्वालामुखी की राख ।
प्रश्न 2. जल प्रदूषण के बिन्दु स्रोत (point source) को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर : जो स्रोत जल प्रदूषकों को सीधे ही जल में प्रवाहित कर देते हैं, बिन्दु स्रोत कहलाते हैं।
प्रश्न 3. ऐसे दो पदार्थों के नाम लिखिए जिनका पुनःचक्रण किया जाता है।
उत्तर : (i) कचरे में उपस्थित धातु तथा (ii) प्लास्टिक निर्मित सामग्री ।
प्रश्न 4. दो जैव निम्नीकरणीय प्रदूषकों के नाम लिखिए।
उत्तर : घर की रसोई का कूड़ा, मल-मूत्र |
प्रश्न 5. दो अजैव निम्नीकरणीय प्रदूषकों को लिखिए।
उत्तर : कीटनाशी, प्लास्टिक ।
प्रश्न 6. रासायनिक यौगिकों के समूह बताइए जो ओजोन पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
उत्तर : क्लोरो-फ्लुओरो कार्बन (CFC) |
प्रश्न 7. दो गैसों के नाम बताइए जिनकी वातावरण में उपस्थिति से अम्लीय वर्षा होती है।
उत्तर : CO2, NO2, SO2, SO3 ( इनमें से किन्हीं दो गैसों के नाम लिख सकते हैं। ) ।
प्रश्न 8. जीवाश्म इंधन को जलाने पर किस प्रकार का प्रदूषण होता है?
उत्तर : वायु प्रदूषण।
प्रश्न 9. सल्फरयुक्त तीन प्रदूषकों के नाम लिखिए जो वायु में उपस्थित हों।
उत्तर : SO2, SO3 तथा H2S
प्रश्न 10. हरे पौधों द्वारा प्रकाश ऊर्जा किस प्रकार की ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है?
उत्तर : हरे पौधे प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलकर कार्बनिक पदार्थों में संचित कर देते हैं।
प्रश्न 11. दलहनी पौधों की जड़ों पर स्थित ग्रन्थियों में पाए जाने वाले जीवाणु का नाम लिखिए ।
उत्तर : राइजोबियम लैग्यूमिनोसैरम ।
प्रश्न 12. जैवीय समुदाय के घटक कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर : जैवीय घटकों के अन्तर्गत उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटक आते हैं।
