UK 10th Science

UK Board 10th Class Science – Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय

UK Board 10th Class Science – Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय

UK Board Solutions for Class 10th Science – विज्ञान – Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय

अध्याय के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. प्रतिवर्ती क्रिया तथा टहलने के बीच क्या अन्तर है?
उत्तर : प्रतिवर्ती क्रिया तथा टहलने के बीच अन्तर
क्र०सं० प्रतिवर्ती क्रिया टहलना
1. यह अनैच्छिक क्रिया है। इस क्रिया के लिए सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं है। यह ऐच्छिक क्रिया है। यह सोचने-समझने के फलस्वरूप सम्पन्न होती है।
2. इन क्रियाओं पर मेरुरज्जु का नियन्त्रण होता है। इन क्रियाओं पर मस्तिष्क का नियन्त्रण होता है।
प्रश्न 2. दो तन्त्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन) के मध्य अन्तर्ग्रथन (सिनेप्स) में क्या होता है?
उत्तर : दो तन्त्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन) के मध्य अन्तर्ग्रथन (synapse) पर एक तन्त्रिका कोशिका के तन्त्रिकाक्ष का घुण्डीनुमा अन्तिम छोर दूसरी तन्त्रिका कोशिका के वृक्षाभ के साथ सन्धि बनाता है। दोनों के मध्य एक सँकरा अवकाश होता है। तन्त्रिकाक्ष के घुण्डीनुमा भाग में स्थितः स्रावी पुटिकाओं (synaptic vesicle) से न्यूरोहॉर्मोन्स स्त्रावित होकर उद्दीपन को अगली तन्त्रिका कोशिका के वृक्षाभ ( dendrite) पर विद्युत आवेश के रूप में स्थापित कर देते हैं। युग्मानुबन्ध के कारण उद्दीपन (प्रेरणा) एक ही दिशा में प्रवाहित होता है।
प्रश्न 3. मस्तिष्क का कौन-सा भाग शरीर की स्थिति तथा सन्तुलन का अनुरक्षण करता है?
उत्तर : पश्चमस्तिष्क का अनुमस्तिष्क (cerebellum) हमारे शरीर की भंगिमा तथा सन्तुलन को बनाए रखता है।
प्रश्न 4. हम एक अगरबत्ती की गन्ध का पता कैसे लगाते हैं?
उत्तर : हम अगरबत्ती की गन्ध का पता नासिका में स्थित घ्राण संवेदांगों (olfactory receptors) द्वारा लगाते हैं।
प्रश्न 5. प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क की क्या भूमिका है?
उत्तर : मध्यमस्तिष्क सिर, गर्दन और धड़ की प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियन्त्रण करता है। यह नेत्र पेशियों (eye muscles); आइरिस पेशियों के संकुचन शिथिलन, नेत्र लेन्स की फोकस दूरी परिवर्तन आदि क्रियाओं को भी नियन्त्रित करता है। पश्चमस्तिष्क का मस्तिष्क पुच्छ (medulla. oblongata) हृदय स्पन्दन, श्वास दर, रक्तदाब, खाँसना, छींकना, वमन, लार स्रावण, पसीना आदि क्रियाओं का नियमन करता है। सामान्यतया दैहिक प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियन्त्रण मेरुरज्जु द्वारा होता है।
प्रश्न 6. पादप हॉर्मोन्स क्या हैं?
उत्तर : पादप हॉर्मोन्स (Plant Hormones) – पौधे के तने और जड़ के शीर्ष भागों पर संश्लेषित होने वाले विशेष प्रकार के रसायन पादप हॉर्मोन्स कहलाते हैं। पादप हॉर्मोन्स पौधे के अन्य भागों में स्थानान्तरित होकर अपना प्रभाव डालते हैं। ये वृद्धि, दीर्घीकरण, पुष्पन, फलों के विकास एवं परिपक्वन आदि को प्रभावित करते हैं। पादप हॉर्मोन्स की कमी या अधिकता पौधों के विभिन्न भागों पर भिन्न-भिन्न प्रभाव डालते हैं। ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन्स, ऐब्सिसिक अम्ल, एथिलीन आदि प्रमुख पादप हॉर्मोन्स समूह हैं।
प्रश्न 7. छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्ररोह की गति से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर : छुई-मुई पादप (Sensitive Plant — Mimosa pudica) के पर्णकों को छूने पर पर्णक बन्द हो जाते हैं। इसे कम्पानुकुंचन (seismonastic ) गति कहते हैं। (देखिए चित्र 7.9) अनुकुंचन (nastic) गतियों में उद्दीपन की दिशा और अनुकुंचन गति की दिशा में कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं होता। उद्दीपन किसी भी दिशा में हो गति एक निश्चित दिशा में ही होती है। इन गतियों को निद्रा गतियाँ (sleep movements) पत्तियाँ आदि) में ही होती हैं। ये गतियाँ अस्थायी होती हैं और कोशिकाओं भी कहते हैं। इस प्रकार की गतियाँ पौधों के पाश्वय भागों (जैसे— पुष्प, की आशूनता से प्रभावित होती हैं। एकतरफा प्रकाश के कारण तने का शीर्ष प्रकाश की ओर मुड़ जाता है। इसे प्रकाशानुवर्तन (Phototropism) कहते हैं। अनुवर्तनी गतियों (tropic movements) में उद्दीपन तथा गति की दिशा में निश्चित सम्बन्ध होता है। ये गतियाँ स्थायी होती हैं। ये पादप हॉर्मोन्स द्वारा नियन्त्रित होती हैं। तना +ve प्रकाशानुवर्ती और प्राथमिक जड़ -ve प्रकाशानुवर्ती होती है।
प्रश्न 8. एक पादप हॉर्मोन का उदाहरण दीजिए जो वृद्धि को बढ़ाता है। 
उत्तर : ऑक्सिन (Auxin)।
प्रश्न 9. किसी सहारे के चारों ओर एक प्रतान की वृद्धि में ऑक्सिन किस प्रकार सहायक है ?
उत्तर : प्रतान में स्पर्शानुवर्तन (thigmotropism) वृद्धि गति होती है। ये वृद्धि गतियाँ स्पर्श के उद्दीपन के कारण होती हैं। प्रतान प्रारम्भ में वायु में अभिसर्पण करते रहते हैं। किसी आधार (support) के सम्पर्क में आने पर इसके चारों ओर लिपटना प्रारम्भ कर देते हैं। इसका कारण यह है कि आधार के सम्पर्क में आने पर ऑक्सिन आधार से दूर वाले भाग में स्थानान्तरित होने लगते हैं। ऑक्सिन की कमी के कारण आधार के सम्पर्क वाले भाग में वृद्धि दर कम हो जाती है और दूर वाले भाग में ऑक्सिन की अधिकता के कारण वृद्धि दर बढ़ जाती है। इस कारण प्रतान आधार के चारों ओर लिपट जाता है।
प्रश्न 10. जलानुवर्तन दर्शाने के लिए एक प्रयोग की | अभिकल्पना कीजिए।
उत्तर : जलानुवर्तन (Hydrotropism ) — नमी के कारण होने वाली गति को जलानुवर्तन कहते हैं। ये गतियाँ उच्च श्रेणी के पौधों की जड़ों में ब्रायोफाइट्स के मूलाभास (rhizoids) में, कवक के हाइफा आदि में होती हैं।
एक छिछले बर्तन में जिसकी तली छिद्रयुक्त हो, लेकर उसमें लकड़ी का गीला बुरादा भरकर बीज बो देते हैं। बुरादे पर पानी छिड़कते रहते हैं जिससे बुरादा नम बना रहे और बीज अंकुरित हो सकें। बीजों के अंकुरित हो जाने के पश्चात् बर्तन को चित्रानुसार तिरछा कर देते हैं। कुछ दिनों के पश्चात् नवोद्भिद् की जड़ों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि जड़ें जलानुवर्तन के कारण जल की ओर मुड़ जाती है। जड़ें गुरुत्वाकर्षण की अपेक्षा जल या नमी की ओर गति करती हैं।
प्रश्न 11. जन्तुओं में रासायनिक समन्वय कैसे होता है?
उत्तर : जन्तुओं में रासायनिक समन्वय विशिष्ट रसायनों हॉर्मोन्स द्वारा होता है। हॉर्मोन्स रासायनिक सन्देशवाहकों के रूप में लक्ष्य कोशिकाओं में पहुँचकर उनके कार्यों का समन्वय तथा नियन्त्रण करते हैं। हॉर्मोन्स मन्द गति से प्रतिक्रियाओं का समन्वय करते हैं।
प्रश्न 12. आयोडीनयुक्त नमक के उपयोग की सलाह क्यों दी जाती है?
उत्तर : थाइरॉइड ग्रन्थि से थाइरॉक्सिन हॉर्मोन स्त्रावित होता है। थाइरॉक्सिन में लगभग 65% आयोडीन होती है। थाइरॉक्सिन शरीर में ऑक्सीकारक उपापचय को नियन्त्रित करके ऊर्जा उत्पादन और उपापचय दर को बढ़ाते हैं और जीवन की रफ्तार को बनाए रखता है।
आयोडीन की कमी के कारण थाइरॉक्सिन का स्त्रावण कम होता है। थाइरॉक्सिन की कमी के कारण जड़वामनता (क्रिटिनिज्म), मिक्सीडीमा तथा घेंघा (simple goiter) रोग हो जाते हैं। हॉर्मोन स्रावण हेतु नियमित मात्रा में आयोडीन उपलब्ध होते रहना आवश्यक है, इसी कारण आयोडीनयुक्त नमक के उपयोग की सलाह दी जाती है।
प्रश्न 13. जब एड्रीनलीन रुधिर में स्त्रावित होती है तो हमारे शरीर में क्या अनुक्रिया होती है?
उत्तर : अधिवृक्क ग्रन्थि के भीतरी भाग मेड्यूला से एड्रीनलीन हॉर्मोन स्त्रावित होता है। इसके फलस्वरूप रक्त दाब, हृदय स्पन्दन दर, श्वास दर, ग्लूकोज की खपत, उपापचय दर आदि बढ़ जाती है। शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रक्त का थक्का बनने का समय कम हो जाता है। शरीर की पेशियों को रक्त, ऑक्सीजन तथा भोजन की सप्लाई बढ़ जाती है। शरीर संकटावस्था में एक उग्र प्रतिक्रिया (violent reaction) के लिए तैयार हो जाता है अथवा संकटावस्था का सुगमता से सामना कर लेता है।
प्रश्न 14. मधुमेह के कुछ रोगियों की चिकित्सा इंसुलिन के इंजेक्शन देकर क्यों की जाती है?
उत्तर : अग्न्याशय (Pancreas) की लैंगरहैन्स की द्वीपिकाओं में 60% Å-कोशिकाएँ, 25% – कोशिकाएँ, 10% &-कोशिकाएँ तथा शेष PP कोशिकाएँ पाई जाती हैं। B – कोशिकाओं से इंसुलिन हॉर्मोन स्त्रावित होता है। यह रक्त शर्करा की सामान्य मात्रा को बनाए रखता है। इंसुलिन आवश्यकता से अधिक शर्करा को ग्लाइकोजन में बदलता है । जाती है, इससे
इंसुलिन की कमी से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ मधुमेह (diabetes) रोग हो जाता है कोशिकाएँ रक्त शर्करा का उपयोग नहीं कर पातीं। ऊर्जा उत्पादन के लिए कोशिकाएँ वसा तथा प्रोटीन्स का उपयोग करने लगती हैं, इससे विषाक्त कीटोनकाय बनते हैं। इसकी अधिकता के कारण मृत्यु भी हो जाती है। “
अतः मधुमेह उपचार हेतु इंसुलिन के इंजेक्शन दिए जाते हैं।
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-सा पादप हॉर्मोन है-
(a) इंसुलिन
(b) थाइरॉक्सिन
(c) एस्ट्रोजन
(d) साइटोकाइनिन ।
उत्तर : (d) साइटोकाइनिन ।
प्रश्न 2. दो तन्त्रिका कोशिका के मध्य खाली स्थान को कहते हैं
(a) द्रुमिका
(b) सिनेप्स
(c) एक्सॉन
(d) आवेग ।
उत्तर : (b ) सिनेप्स।
प्रश्न 3. मस्तिष्क उत्तरदायी है-
(a) सोचने के लिए
(b) हृदय स्पन्दन के लिए
(c) शरीर का सन्तुलन बनाने के लिए
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर : (d) उपर्युक्त सभी।
प्रश्न 4. हमारे शरीर में ग्राही का क्या कार्य है? ऐसी स्थिति पर विचार कीजिए जहाँ ग्राही उचित प्रकार से कार्य नहीं कर रहे हों। क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
उत्तर : शरीर विभिन्न संवेदांग शरीर के बाहर और भीतरी वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को अनुभव करके केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र को संवेदी तन्त्रिकाओं (sensory nerves) द्वारा पहुँचा देते हैं। घ्राणग्राही (olfactoreceptors) गन्ध का, स्वादग्राही (gustatoreceptor) स्वाद का, त्वक् ग्राही (cutaneousreceptors) स्पर्श, दबाव, पीड़ा, ऊष्मा आदि का, प्रकाशग्राही दृष्टि का, श्रवण-सन्तुलन ग्राही ध्वनि तथा सन्तुलन आदि के उद्दीपनों का ज्ञान कराते हैं।
जब संवेदांग अपना सामान्य कार्य सम्पन्न नहीं करते तो उपर्युक्त संवेदनाओं को ग्रहण नहीं किया जा सकता। इसके अभाव में कभी-कभी परिस्थितियाँ विकराल रूप धारण कर सकती हैं; जैसे— गर्म वस्तु पर हाथ पड़ने पर यदि ऊष्मा (ताप) या पीड़ा का उद्दीपन संवेदी तन्त्रिका द्वारा केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तक प्रेषित नहीं होगा तो व्यक्ति जलकर घायल हो जाएगा। सामान्य स्थिति में प्रतिवर्ती क्रिया के फलस्वरूप गर्म वस्तु पर हाथ के पड़ने पर ताप का उद्दीपन संवेदी तन्त्रिका द्वारा मेरुरज्जु में पहुँचता है और चालक तन्त्रिका (motor nerve) द्वारा सम्बन्धित कंकाल पेशी को पहुँचा दिया जाता है। कंकाल पेशी में संकुचन के कारण हाथ गर्म वस्तु से हट जाता है। मस्तिष्क तक इसकी सूचना बाद में पहुँचती है अर्थात् हाथ के हट जाने के बाद हमें ज्ञात होता है कि वस्तु गर्म थी।
प्रश्न 5. एक तन्त्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की संरचना बनाइए तथा इसके कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : तन्त्रिका कोशिका या न्यूरॉन
कार्य (Function)- तन्त्रिका कोशिकाएँ उद्दीपन और प्रेरणाओं को विद्युत आवेश के रूप में द्रुत गति से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती हैं जिससे क्रियाएँ तुरन्त सम्पन्न हो जाती हैं।
प्रश्न 6. पादप में प्रकाशानुवर्तन किस प्रकार होता है?
उत्तर : प्रकाशानुवर्तन (Phototropism or Helio tropism) – एकतरफा प्रकाश (unilateral light) के उद्दीपन के कारण पौधों में वक्रता उत्पन्न हो जाती है। इसे प्रकाशानुवर्तन कहते हैं।
कमरे में रखा हुआ पौधा खिड़की में प्रकाश की और झुक जाता है। तरुण तने अधिकतर धनात्मक प्रकाशानुवर्ती (positively phototropic ) होते हैं, अर्थात् वे प्रकाश की और मुड़ जाते हैं। यह ऑक्सिन के असमान वितरण के कारण होता है। यह वक्रता तने के अन्धकार वाले भाग में ऑक्सिन की अधिक सान्द्रता हो जाने से अधिक वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है। साधारण तौर पर जड़ें प्रकाश के प्रति ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती (negatively phototropic ) होती है। ये प्रकाश से दूर जाने की चेष्टा करती हैं।
एकतरफा प्रकाश का प्रभाव भी गुरुत्वानुवर्ती की तरह क्लाइनीस्टेट द्वारा समाप्त किया जा सकता है। तनों के शीर्ष प्रकाश संवेदी होते हैं। अगर शीर्ष को काटकर अलग कर दिया जाए तो तना एकतरफा प्रकाश के प्रति अनुक्रिया प्रदर्शित नहीं करता।
प्रश्न 7. मेरुरज्जु आघात में किन संकेतों के आने में व्यवधान होगा?
उत्तर : मेरुरज्जु आघात में मस्तिष्क को आने-जाने वाले विद्युतीय सिग्नल तितर-बितर हो जाएँगे।
प्रश्न 8. पादप में रासायनिक समन्वय किस प्रकार होता है?
उत्तर: पादप में रासायनिक समन्वय (chemical COordination) पादप हॉर्मोन्स द्वारा होता है। पादप हॉर्मोन्स तने तथा जड़ की शीर्ष कोशिकाओं द्वारा संश्लेषित होकर पौधे के अन्य भागों में विसरित हो जाते हैं। ये पौधों के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रभाव डालते हैं; जैसे ऑक्सिन (auxin) समूह के पादप हॉर्मोन्स वृद्धि, अनुवर्तन गतियों, शीर्ष प्रभावित, पुष्प, फल तथा पत्तियों का बिलगन, अनिषेकफलन, अपतॄण निवारण (खरपतवारनाशक), जड़ विभेदन, प्रसुप्तता नियन्त्रण आदि का कार्य करते हैं।
साइटोकाइमन समूह के पादप हार्मोन्स जीर्णता को रोकते हैं और ऑक्सिन के साथ मिलकर कोशिका विवेदन को प्रेरित करते हैं। ऐब्यकि अम्ल (वृद्धिरोधक पादप हॉर्मोन्स) पत्तियों के विलगन, जीर्णावस्था, पुण्णन, वाणीत्सर्जन नियन्त्रण, कन्द निर्माण आदि की प्रभावित करते हैं। एथिलीन हॉर्मोन्स एक उपापचय उत्पाद है। फलों के पकने में सहायता करता है और फल, पुष्य और पक्षियों के विलगन की तीव्र करता है।
प्रश्न 9. एक जीव में नियन्त्रण एवं समन्वय के तन्त्र की क्या आवश्यकता है?
उत्तर : उच्च जीवधारियों में नियन्त्रण तथा समन्वय तन्त्र निम्नलिखित कार्य सम्पन्न करता है-
(i) यह तन्त्र शरीर के विभिन्न तन्त्रों के मध्य समन्वय स्थापित करता है जिससे सभी अंग संगठित रूप में कार्य करते हैं; जैसे—संकटावस्था में भागने के लिए टाँगों की मांसपेशियों को जल्दी-जल्दी और अधिक कार्य करना होता है, इसके फलस्वरूप मांसपेशियों में ऑक्सीजन तथा ग्लूकोज की खपत बढ़ जाती है। पेशियों तक ग्लूकोज तथा ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य रक्त परिसंचरण तन्त्र करता है। श्वसन अंगों द्वारा O2 तथा CO2 का विनिमय होता है। उपापचय क्रियाओं के फलस्वरूप बने उत्सर्जी पदार्थों को शरीर से बाहर त्यागने का कार्य उत्सर्जी तन्त्र करता है। इन सभी तन्त्रों के मध्य समन्वय एवं नियन्त्रण आवश्यक है अन्यथा हमारा अस्तित्व खतरे में पढ़ जाएगा।
(ii) नियन्त्रण तथा समन्वय तन्त्र शरीर के अन्तः वातावरण तथा बाह्य वातावरण के मध्य सतत (steady) स्थिति को बनाए रखता है : जैसे-ग्रीष्म ऋतु मैं हमें अधिक पसीना आता है। पसीने के वाष्पीकृत होने से शरीर ठण्डा हो जाता है। पसीने में जल-हानि होने से हमें प्यास लगती है। पानी पीकर हम शरीर में जल की कमी की पूर्ति करते हैं। पसीना आना और प्यास लगना शरीर के ताप नियमन में सहायता करते हैं।
प्रश्न 10. अनैच्छिक क्रियाएँ तथा प्रतिवर्ती क्रियाएँ एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर : अनैच्छिक क्रिया तथा प्रतिवर्ती क्रिया में अन्तर
अनैच्छिक क्रिया प्रतिवर्ती क्रिया
इनका नियन्त्रण मध्य तथा पश्चमस्तिष्क द्वारा होता है। इन क्रियाओं पर तन्त्रिका तन्त्र का दोहरा नियन्त्रण होता है। उदाहरण- रक्तदाब, हृदय स्पन्दन दर, श्वास दर आदि । इनका नियन्त्रण मेरुरज्जु द्वारा होता है। क्रियाओं के सम्पन्न होने पर इनकी सूचना मस्तिष्क को प्रेषित कर दी जाती है। उदाहरण-गर्म वस्तु पर हाथ पड़ने से हाथ का हटना, पलक झपकना, उबासी लेना, खाँसना, छींकना आदि।
प्रश्न 11. जन्तुओं में नियन्त्रण एवं समन्वय के लिए तन्त्रिका तथा हॉर्मोन क्रियाविधि की तुलना तथा व्यतिरेक (contrast ) कीजिए । 
उत्तर : जन्तुओं के विभिन्न तन्त्रों एवं उनके अंगों के मध्य पूर्ण समन्वय एवं नियन्त्रण दो तन्त्रों के अधीन होता है-
(1) तन्त्रिका तन्त्र (Nervous System) तथा
(2) हॉर्मोनल तन्त्र (Hormonal System) या अन्त: स्रावी तन्त्र (Endocrine System)
क्र०सं० तन्त्रिकीय नियन्त्रण हॉर्मोनल नियन्त्रण
1. यह तन्त्रिकाओं द्वारा होता है। शरीर में तन्त्रिकाओं का जाल फैला होता है। यह हॉर्मोन्स (hormones) द्वारा होता है। इनका स्त्रावण अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से होता है।
2. यह एक द्रुतगति सेवा (high-speed service) होती है। तन्त्रिकाओं द्वारा उन क्रियाओं का नियन्त्रण एवं नियमन होता है, जिनका तुरन्त होना आवश्यक है। यह एक मन्दगति सेवा (low-speed service) होती है।
3. तन्त्रिका कोशिकाएँ संवेदी अंगों से उद्दीपनों को ग्रहण करके मस्तिष्क या मेरुरज्जु तक पहुँचाते हैं। ये उद्दीपन, प्रेरणाओं के रूप में मस्तिष्क या मेरुरज्जु द्वारा कार्यकर ( effectors) अंगों तक विद्युत आवेगों के रूप में प्रेषित कर दिए जाते हैं। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से स्रावित हॉर्मोन्स रक्त द्वारा वितरित होकर लक्ष्य कोशिकाओं तक पहुँचकर प्रायः उनकी उपापचय क्रियाओं को प्रभावित करते हैं।
4. कार्यकर अंग (effectors organs) प्राय: पेशियाँ या ग्रन्थियाँ होती हैं। ये अंग प्रतिक्रिया को प्रदर्शित करते हैं। हॉर्मोन्स प्राय: पाचन, वृद्धि, जनन, स्रावण, उपापचय आदि क्रियाओं का नियमन तथा नियन्त्रण करते हैं।
प्रश्न 12. छुई-मुई पादप में गति तथा हमारी टाँग में होने वाली गति के तरीके में क्या अन्तर है?
उत्तर : छुई-मुई पादप में निद्रा या अनुकुंचन ( nastic ) गति होती है। इस गति में उद्दीपन और गति की दिशा में कोई सम्बन्ध नहीं होता । इसमें उद्दीपन की दिशा निश्चित नहीं होती। उद्दीपन की तीव्रता गति का क्षेत्र निर्धारित करती है। यह गति पत्तियों के पर्णाधार (pulvinus) की कोशिकाओं के श्लथ स्थिति में आने से होती है। कोशिकाओं के स्फीत स्थिति में आ जाने पर पत्तियाँ सामान्य स्थिति में आ जाती हैं।
हमारे पैरों की गति ऐच्छिक पेशियों के संकुचन और शिथिलन के कारण होती है। संवेदी तन्त्रिकाएँ (sensory nerves) उद्दीपनों को ग्रहण करके मस्तिष्क को पहुँचाती हैं। मस्तिष्क प्रेरणाओं के रूप में प्रतिक्रिया को चालक तन्त्रिकाओं ( motor nerves) द्वारा ऐच्छिक पेशियों तक पहुँचाता है। इसके फलस्वरूप टाँगों द्वारा गति होती है।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर
  • विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. विभिन्न पादप हॉर्मोन एवं उनके महत्त्व का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर : पौधों में पादप हॉर्मोन का पता सर्वप्रथम एफ० डब्ल्यू. वेण्ट (F. W. Went; 1928) ने लगाया था। रासायनिक संघटन के आधार पर पादप हॉर्मोन्स को निम्नलिखित समूहों में बाँट सकते हैं-
(1) ऑक्सिन (Auxins ) — (i) ये मुख्यतया कोशिका विभाजन एवं दीर्घीकरण को प्रभावित करते हैं।
(ii) इनके कारण सामान्यतया पाश्र्वय कलिकाओं की वृद्धि नहीं होती। इसे शीर्ष प्रमुखता कहते हैं।
(iii) ये अनुवर्तनी गति के लिए उत्तरदायी होते हैं। ऑक्सिन कीसान्द्रता तने में वृद्धि की दर को बढ़ा देती है, जबकि जड़ में वृद्धि दर को कम करती है।
(iv) ऑक्सिन के कारण कटे हुए तनों पर जड़ें शीघ्र निकलती हैं।
(v) ऑक्सिन के कारण बिना निषेचन के अण्डाशय से फल बन जाते हैं। इसे अनिषेकफलन (parthenocarpy) कहते हैं।
(vi) ऑक्सिन का छिड़काव करके फल एवं पत्तियों को समय से पूर्व गिरने से रोका जा सकता है।
(vii) ऑक्सिन का उपयोग करके खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।
(viii) ऑक्सिन का उपयोग करके कन्द, प्रकन्द, घनकन्द आदि भूमिगत तनों की प्रसुप्तता (dormancy) को बढ़ाया जा सकता है।
(2) जिबरेलिन (Gibberellins ) — इसकी खोज कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने की थी। यह पादप शरीर की अनेक क्रियाओं को प्रभावित करता है; जैसे-
(i) यह कोशिका दीर्घीकरण को प्रभावित करता है।
(ii) यह प्रसुप्ति ( dormancy) को भंग करता है। बीजों के अंकुरण को प्रेरित करता है।
(iii) इसके उपयोग से नाटे पौधे लम्बे हो जाते हैं और द्विवर्षी पौधे प्रथम वृद्धिकाल में ही पुष्पन करने लगते है।
(iv) इसके उपयोग से अनिषेकफलन को प्रेरित किया जा सकता है। इसके फलस्वरूप द्वितीयक वृद्धि होती है।
(v) यह’ एधा (cambium) की क्रियाशीलता को बढ़ा देता है।
(3) साइटोकाइनिन्स (Cytokinins) – ये कोशिका विभाजन एवं पार्श्वीय कलिकाओं को प्रेरित करते हैं। ये कोशिका विभेदीकरण को प्रेरित करते हैं।
(4) ऐब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid ) – यह ऑक्सिन तथा जिबरेलिन विरोधी होता है। इसे डॉरमिन (dormin ) भी कहते हैं। यह प्रसुप्तता को बनाए रखता है। यह कलिकाओं की वृद्धि को रोकता है।
(5) एथिलीन (Ethylene ) — यह गैस रूप में पाया जाने वाला एकमात्र पादप हॉर्मोन है। यह मुख्यतया फलों को पकाने में सहायक होता है।
यह विलगन प्रक्रिया को तीव्र करता है। यह अनन्नास (pineapple) में पुष्पन प्रेरित करता है।
प्रश्न 2. कीट के तन्त्रिका तन्त्र का स्वच्छ चित्र बनाइए ।
अथवा किसी कीट के तन्त्रिका तन्त्र का आरेख खींचिए। उसमें निम्नलिखित भाग नामांकित कीजिए-
(i) मस्तिष्क, (ii) तन्त्रिका गुच्छ, (iii) तन्त्रिका रज्जु ।
उत्तर : कीट का तन्त्रिका तन्त्र
प्रश्न 3. मानव के केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का वर्णन कीजिए। अथवा मानव मस्तिष्क के मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
अथवा मानव मस्तिष्क का एक आरेख खींचकर उस पर मस्तिष्क के निम्नलिखित भाग नामांकित कीजिए—
(i) प्रमस्तिष्क, (ii) मस्तिष्कावरण, (iii) मेड्यूला ऑब्लांगेटा, (iv) अनुमस्तिष्क ।
उत्तर : मानव के तन्त्रिका तन्त्र को तीन भागों में बाँटते हैं-
(क) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र,
(ख) परिधीय तन्त्रिका तन्त्र,
(ग) स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र।
केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र
इसके अन्तर्गत मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु आते हैं। मस्तिष्क शरीर का मुख्य नियन्त्रक एवं समन्वयन केन्द्र होता है।
मानव मस्तिष्क की संरचना तथा कार्य
मस्तिष्क अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं कोमल अंग होता है। यह खोपड़ी के मस्तिष्क कोष (cranium) में सुरक्षित रहता है। यह चारों ओर से दोहरी झिल्ली से घिरा होता है। बाहरी झिल्ली को दृढ़तानिका या ड्यूरामेटर (duramater) मध्य झिल्ली को जालैतानिका और भीतर की झिल्ली को मृदुतानिका या पाइआमेटर (piamater) कहते हैं। इनमें रुधिर केशिकाओं का एक सघन जाल होता है। इन्हीं के द्वारा मस्तिष्क को भोजन तथा O2 मिलती है। जालतानिका और मृदुतानिका झिल्लियों के बीच में एक तरल पदार्थ भरा रहता है जो मस्तिष्क की बाह्य आघातों से सुरक्षा करता है। मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग होते हैं- (1) अग्रमस्तिष्क, (2) मध्यमस्तिष्क तथा (3) पश्चमस्तिष्क ।
(1) अग्रमस्तिष्क (Fore brain) – इसके अन्तर्गत घ्राण पिण्ड, प्रमस्तिष्क तथा डाइएनसिफैलॉन आते हैं। प्रमस्तिष्क (cerebrum) मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग बनाता है। प्रमस्तिष्क पर पाई जाने वाली दरारें इसके तल धरातल में वृद्धि करती हैं। इसका बाह्य भाग धूसर पदार्थ (grey matter) से बना होता है, यह श्वेत पदार्थ को ढके रहता है। प्रमस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्र विभिन्न क्रियाओं का नियन्त्रण तथा नियमन करते हैं।
अग्रमस्तिष्क के कार्य — (i) घ्राण पिण्ड (Olfactory lobe) – गंन्ध ज्ञान के केन्द्र होते हैं।
(ii) प्रमस्तिष्क (Cerebrum) – स्मृति, सोचने, विचारने, चेतना, तर्क शक्ति, सीखने आदि का केन्द्र होता है।
(iii) डाइएनसिफैलॉन (Diencephalon)— अनैच्छिक क्रियाओं; जैसे- भूख, प्यास, नींद, ताप नियन्त्रण, उपापचय आदि क्रियाओं का नियन्त्रण तथा नियमन करता है।
(2) मध्यमस्तिष्क (Mid brain) – मध्यमस्तिष्क का अधिकांश भाग अनुमस्तिष्क से ढका होता है। यह दृष्टि ज्ञान करता है।
(3) पश्चमस्तिष्क (Hind brain) – इसके अन्तर्गत अनुमस्तिष्क, पोन्स तथा मस्तिष्क पुच्छ आता है। अनुमस्तिष्क (cerebellum) प्रमस्तिष्क के पश्च भाग के नीचे स्थित गोलाकार भाग होता है। अनुमस्तिष्क | शरीर का सन्तुलन बनाए रखता है। यह पेशियों को नियन्त्रित करके प्रचलन को नियन्त्रित करता है।
पोन्स (Pons) अनुमस्तिष्क के सामने तथा मस्तिष्क पुच्छ के ऊपर स्थित होता है। यह हृदय स्पन्दन तथा श्वसन आदि प्रतिवर्ती तथा गति को | नियन्त्रित करता है।
मस्तिष्क पुच्छ (Medulla oblongata ) – मस्तिष्क का पश्च बेलनाकार भाग होता है । यह शरीर की अनैच्छिक क्रियाओं; जैसे— श्वसन, हृदय स्पन्दन, परिसंचरण आदि का नियन्त्रण करता है।.
मानव मेरुरज्जु या सुषुम्ना
मस्तिष्क का पश्च भाग लम्बा होकर, खोपड़ी के पश्च छोर पर उपस्थित महारन्ध्र (foramen magnum) से निकलकर, रीढ़ की हड्डी में फैला रहता है। यही मेरुरज्जु या सुषुम्ना (spinal cord) है। रीढ़ की हड्डी कशेरुकाओं से बनी होती है तथा इनके मध्य में एक तन्त्रिका नाल (neural canal) होती है। इसी तन्त्रिका नाल में मेरुरज्जु स्थित रहती है। यह भी मस्तिष्क के समान मृदुतानिका (piamater) तथा दृढ़तानिका (duramater) से ढकी रहती है। इन दोनों झिल्लियों के बीच में एक लसदार तरल पदार्थ भरा रहता है।
मेरुरज्जु के कार्य (Functions of Spinal Cord ) — इस प्रकार सम्मिलित रूप में मेरुरज्जु के दो प्रकार के कार्य होते हैं-
(1) मस्तिष्क से प्राप्तं तथा मस्तिष्क को जाने वाले आवेगों के लिए | मेरुरज्जु पथ प्रदान करता है ।
(2) प्रतिवर्ती क्रियाओं (reflex actions) का संचालन एवं नियमन करने का कार्य मेरुरज्जु का ही है।
प्रश्न 4. स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र का वर्णन कीजिए। 
उत्तर : स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र
यह तन्त्र स्वतन्त्र रूप से कार्य करता है किन्तु इसका नियन्त्रण अन्तत: केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र द्वारा ही होता है।
स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र या आंतरांगीय तन्त्रिका तन्त्र (visceral nervous system) का निर्माण केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र द्वारा निकले तन्त्रिका तन्तुओं द्वारा होता है जो स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के गुच्छकों (ganglia) में प्रवेश कर जाते हैं। इन तन्तुओं को पूर्वगुच्छीय तन्तु (preganglionic fibres ) कहते हैं। स्वायत्त गुच्छकों (autonomic ganglia) से निकलने वाले तन्त्रिका तन्तुओं को पश्च-गुच्छीय तन्तु (post-ganglionic fibres ) कहते हैं । ये तन्तु शरीर के विभिन्न अंगों में प्रवेश करते हैं।
स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के दो घटक होते हैं-
(क) परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र (Parasympathetic nervous system) तथा
(ख) अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र (Sympathetic nervous system)।
अनुकम्पी तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र का अंगों पर परस्पर विरोधी नियन्त्रण होता है। अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र प्रतिकूल अवस्था में ऊर्जा व्यय करके शरीर की सुरक्षा प्रतिक्रियाओं को बढ़ाता है, जबकि परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र ऊर्जा संचय से सम्बन्धित क्रियाओं को बढ़ाता है।
अनुकम्पी तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र के कार्य
सं० क्र० अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र
1. आँख की पुतली को फैलाता है। आँख की पुतली को सिकोड़ता है।
2. अश्रु ग्रन्थियों से अश्रु स्रावण को प्रेरित करता है। अश्रु स्रावण को रोकता है।
3. लार ग्रन्थियों से लार के स्रावण को कम करता है। लार स्रावण को बढ़ाता है।
4. श्वास दर (breathing rate) को बढ़ाता है। श्वास दर को कम करता है।
5. हृदय की स्पंदन दर को बढ़ाता है। हृदय की स्पंदन दर को कम करता है।
6. रुधिर वाहिनियों को सिकोड़कर रुधिर दाब बढ़ाता है। त्वचा आदि की रुधिर वाहिनियों को फैलाकर रुधिर दाब को घटाता है।
7. आहारनाल में पेशियों को शिथिल करके क्रमाकुंचन तरंगों को कम करता है। आहारनाल में क्रमाकुंचन तरंगों को बढ़ाता है।
8. एड्रीनल ( adrenal), अन्त: स्रावी ग्रन्थि को प्रेरित करके सुरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ाता है। इंसुलिन के स्रावण को उत्तेजित करता है।
9. यकृत तथा अग्न्याशय के स्रावण को कम करता है। यकृत तथा अग्न्याशय के स्रावण को बढ़ाता है।
10. मूत्राशय की पेशियों को शिथिल कर फैलाता है। मूत्राशय की पेशियों को सिकोड़ता है।
प्रश्न 5. वृद्धि को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : पौधों में वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारक
पौधों में वृद्धि को बाह्य तथा आन्तरिक कारक प्रभावित करते हैं।
बाह्य कारक
इसके अन्तर्गत वे कारक आते हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं; जैसे-
(1) पोषक पदार्थ (Nutrients) – ये पौधों को मृदा से उपलब्ध होते हैं। उचित मात्रा में पोषक तत्त्व उपलब्ध होने पर पौधों के शरीर में वृद्धि होती है।
(2) जल (Water) – यह जैविक क्रियाओं के लिए अति आवश्यक है। समस्त जैविक क्रियाएँ जल की उपस्थिति में ही होती हैं। गैसोंका आदान-प्रदान, खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण आदि जल की उपस्थिति में ही होता है। जल जीवद्रव्य का अधिकांश भाग बनाता है।
(3) ऑक्सीजन (Oxygen ) – जैविक कार्यों के लिए आवश्यक ऊर्जा भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है; अत: उपयुक्त मात्रा में पौधे के विभिन्न भागों को ऑक्सीजन का उपलब्ध होना अि आवश्यक है।
(4) प्रकाश (Light) – हरे पौधे प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोज्य पदार्थों का संश्लेषण करते हैं। CO2 तथा जल से पर्णहरित और प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण क्रिया होती है। प्रकाश की मात्रा, अवधि एवं तीव्रता पौधों की स्वस्थ वृद्धि को प्रभावित करती हैं। यद्यपि पौधों की लम्बाई कम प्रकाश में अधिक बढ़ती है। प्रकाश पौधों में पुष्पन को भी प्रभावित करता है ।
(5) ताप (Temperature ) — यह प्रकाश से सम्बन्धित कारक है।पौधों को वृद्धि के लिए उपयुक्त ताप की आवश्यकता होती है। कम या अधिक ताप पौधों की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
आन्तरिक कारक
इसके अन्तर्गत पौधे के आनुवंशिक कारक (genetic factors) तथा पादप हॉर्मोन्स (plant hormones) आते हैं। पौधों की संरचना का विकास उनकी आनुवंशिक जीन संरचना पर निर्भर करता है। आनुवंशिक कारक पौधों की लम्बाई, पुष्पन, प्रतिरोध क्षमता आदि को प्रभावित करते हैं। पौधों की वृद्धि कुछ विशेष प्रकार के रासायनिक पदार्थों द्वारा नियन्त्रित होती है।
प्रश्न 6. गति तथा प्रचलन में क्या भिन्नता है? विभिन्न पादप अनुकुंचन गतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : गति एवं प्रचलन
पौधे वातावरणीय या आन्तरिक कारणों से उद्दीपनों के फलस्वरूप प्रतिक्रिया करते हैं। इस प्रतिक्रिया को गति ( movement) कहते हैं। सामान्यतया पौधों में स्थान परिवर्तन नहीं होता, जबकि जन्तुओं में भोजन की तलाश और सुरक्षा की दृष्टि से प्रचलन (locomotion) होता है। प्रचलन में स्थान परिवर्तन होता है।
अनुकुंचन गतियाँ
ये गतियाँ विभिन्न उद्दीपनों के फलस्वरूप होती हैं; जैसे-प्रकाश, ताप, स्पर्श आदि। अनुकुंचन गतियों में उद्दीपन की दिशा एवं गति की दिशा में कोई सम्बन्ध नहीं होता। ये गतियाँ एक पूर्व-निर्धारित निश्चित दिशा में ही होती हैं। अनुकुंचन गतियाँ निम्न प्रकार की होती है-
(1) प्रकाशानुकुंचन (Photonasty ) – प्रकाश के प्रभाव से पौधों की पत्तियों, पुष्पों आदि में प्रकाशानुकुंचन गति होती है; जैसे-ऑक्सेलिस (Oxalis), गुलमोहर की पत्तियाँ, कम्पोजिटी, लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों के पुष्प दिन में खिल जाते हैं और रात्रि में बन्द हो जाते हैं। रात की रानी, हरसिंगार आदि के पुष्प रात में खिलते हैं। तम्बाकू के पुष्प सायंकाल में खिलते हैं और रातभर खिले रहते हैं तथा दिन के समय बन्द हो जाते हैं।
(2) तापानुकुंचन (Thermonasty ) – केसर (Crocus), ट्यूलिप (Tulip) आदि के पुष्प एक निश्चित तापमान पर खुलते हैं और ताप कम होने पर बन्द हो जाते हैं।
(8) रसायन-अनुकुंचन (Chemonasty ) – कीटभक्षी पौधों के विभिन्न अंग प्रोटीन के उद्दीपन से प्रेरित होकर इस प्रकार की वक्रण गति प्रदर्शित करते हैं।
(4) स्पर्शानुकुंचन (Thigmonasty ) — कीटभक्षी पादप ड्रॉसेरा (Drosera) की पत्तियों के स्पर्शक (tentacles) कीट के बैठते ही बन्द हो जाते हैं। इसी प्रकार डायोनिया (Dionaea ) की पत्तियों में ट्रिगर रोम (trigger hairs) के कीट द्वारा छुए जाते ही पत्तियाँ मध्य शिरा पर से बन्द हो जाती हैं।
(5) कम्पानुकुंचन (Seismonasty) – बाहरी उद्दीपनोंजैसे – स्पर्श, आघात, वर्षा, ताप इत्यादि के कारण छुई-मुई (sensitive plant = Mimosa pudica) के पौधे के पर्णक, सम्पूर्ण पत्ती, पर्णवृन्त इत्यादि, यहाँ तक कि सम्पूर्ण पौधा ही मुरझा जाता है। किसी स्थान पर पहुँचाया हुआ आघात कितना तीव्र है, इसी से यह तय होगा कि कितनी दूरी तक उद्दीपन जाता है। आघात के उद्दीपन से होने वाली यह क्रिया कम्पानुकुंचन (seismonasty) कहलाती है। यह गति पत्ती के फूले हुए पर्णाधारों (pulvinus) की कोशिकाओं में, स्फीति (turgidity) में परिवर्तन के कारण होती है। सामान्य अवस्था में पर्णवृन्त तल्प (pulvinus) की मृदूतकी कोशिकाएँ स्फीत अवस्था में होती हैं। ये कोशिकाएँ उद्दीपन से प्रभावित होकर श्लथ (flaccid ) स्थिति में आ जाती हैं, जिससे पत्ती के पर्णक बन्द हो जाते हैं।
प्रश्न 7. तन्त्रिका कोशिका की संरचना का वर्णन कीजिए। हैं— तन्त्रिका कोशिकाएँ कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर : तन्त्रिका कोशिका अथवा न्यूरॉन
तन्त्रिका ऊतक का निर्माण तन्त्रिका कोशिकाओं (nerve cells or neurons) से होता है।
ये कोशिकाएँ अत्यधिक जटिल और सबसे लम्बी होती हैं। एक तन्त्रिका कोशिका में निकलने वाले प्रवर्धी (processes) की संख्या के आधार पर इन्हें — एकध्रुवीय (unipolar), द्विध्रुवीय (bipolar) तथा बहुध्रुवीय (multipolar) कहते हैं। कुछ निम्न श्रेणी के जन्तुओं में अध्रुवीय (non-polar) तन्त्रिका कोशिकाएँ पाई जाती हैं। इनमें प्रवर्ध तो होते हैं किन्तु प्रवर्धी में क्रियात्मक विभेदीकरण नहीं होता । बहुध्रुवीय तन्त्रिका कोशिका में निम्नलिखित भाग होते हैं— (चित्र – 7.2 देखिए ) (
(क) कोशिकाकाय (Cyton) – तन्त्रिका कोशिका का यह प्रमुख भाग है। कोशिकाकाय के जीवद्रव्य में केन्द्रक, माइटोकॉण्ड्रिया, गॉल्जीकाय, वसा बिन्दु, अन्तः प्रद्रव्यी जालिका आदि के अतिरिक्त अनियमित आकार के निसल के कण (Nissl’s granules) होते हैं।
(ख) तन्त्रिका कोशिका प्रवर्ध (Neurites ) – तन्त्रिका कोशिकाओं में दो प्रकार के प्रवर्ध मिलते हैं-
(i) वृक्षाभ या द्रुमाश्म (Dendrites) – ये अपेक्षाकृत छोटे प्रवर्ध होते हैं जो सिरों की ओर क्रमशः सँकरे होते जाते हैं। ये निकलने के स्थान से ही कभी-कभी अत्यधिक शाखित तथा झाड़ी के समान हो सकते हैं। इनमें निसल के कण तथा तन्त्रिका तन्तुक (neurofibrill) भी होते हैं।
(ii) अक्ष तन्तु या तन्त्रिकाक्ष ( Axon ) – इस प्रकार का प्रवर्ध एक | तथा लगभग बराबर मोटाई का लम्बा प्रवर्ध होता है। प्रायः यह केवल दूसरे | सिरे पर ही शाखित होता है किन्तु अनेक बार कहीं-कहीं समकोण पर कुछ शाखाएँ निकलती हैं। पहले प्रकार की शाखाएँ अन्तिम शाखाएँ जबकि | समकोणीय शाखाएँ समपार्श्वीय कहलाती हैं। अन्तिम शाखाओं पर गोल, घुण्डी के आकार के बटन (button) होते हैं। अक्ष तन्तु में निसल के कण नहीं होते। यह तन्त्रिका तन्तुओं से बना होता है तथा इनके बाहर आवरण के रूप में एक्सिओप्लाज्म (axioplasm ) होता है। अक्ष तन्तु अनेक बार एक या अधिक आच्छदों से घिरा रहता है, तब इसे मज्जावृत्त (medullated) कहते हैं अन्यथा मज्जारहित (non-medullated)। अक्ष तन्तु से बाहर उपस्थित कोमल आच्छद को न्यूरीलेमा (neurilemma ) या श्वान का आच्छद (sheath of Schwann ) कहते हैं। इसको श्वान कोशिकाएँ (Schwann cells) बनाती हैं। इस आच्छद के बाहर एक महीन आधारीय कला होती है। इसके भी बाहर संयोजी ऊतक से बना हेनले का आच्छद (Henle’s sheath) पाया जाता है । श्वान कोशिकाएँ न्यूरीलेमा तथा अक्ष तन्तु के मध्य एक आच्छद का निर्माण करती हैं जो मायलिन आच्छद (myelin sheath) बनाते हैं। निश्चित दूरी पर मायलिन आच्छद विच्छिन्न होती है। इन स्थानों पर न्यूरीलेमा अक्ष तन्तु से चिपकी रहती है। ये स्थान रैन्वियर के नोड (nodes of Ranvier) कहलाते हैं।
अक्ष तन्तु चेतनाओं को कोशिका से दूर ले जाते हैं। आवेग को दूर-दूर तक ले जाने के लिए तन्तु एवं गुच्छकों (ganglia) में तन्त्रिका कोशिकाएँ अपने-अपने तन्त्रिकाक्षों एवं द्वमाश्मों की शाखाओं द्वारा एक-दूसरे से सम्बन्धित रहते हैं। इन्हीं स्थानों को युग्मानुबन्धन (synapse) कहते हैं।
तन्त्रिका कोशिकाएँ (neurons) निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं-
(i) संवेदी न्यूरॉन (Sensory neuron ) — यह अंगों से संवेदनाओं को ग्रहण करके केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र ( मस्तिष्क या मेरुरज्जु) को पहुँचाते हैं।
(ii) प्रेरक न्यूरॉन (Motor neuron) – यह केन्द्रीय तन्त्रिका से प्रेरणाओं को लेकर अपवाहक (effectors) अंगों तक पहुँचाते हैं।
(iii) मिश्रित न्यूरॉन (Mixed neuron) – ये उपर्युक्त दोनों कार्यों को सम्पन्न करते हैं।
प्रश्न 8. मनुष्य के नेत्र की आन्तरिक संरचना नामांकित चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए ( वर्णन की आवश्यकता नहीं ) । नेत्र की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर : नेत्र की आन्तरिक संरचना
नेत्र की क्रियाविधि
जब प्रकाश किरणें कॉर्निया पर पड़ती हैं, तब कॉर्निया तथा तेजोजल प्रकाश किरणों का अपवर्तन (refraction) कर देते हैं। ये किरणें तारे से होकर लेन्स पर पड़ती हैं। लेन्स इनका पूर्ण अपवर्तन कर देता है और उल्टा प्रतिबिम्ब रेटिना पर बना देता है । आइरिस तारे को छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा का नियन्त्रण करता है। तीव्र प्रकाश में तारा सिकुड़ जाता है तथा कम प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है, कम प्रकाश में तारा फैल जाता है तथा अधिक प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है।
सीलियरी काय तथा निलम्बन स्नायु (suspensory ligaments) लेन्स के फोकस में अन्तर लाकर वस्तु के प्रतिबिम्ब को रेटिना पर केन्द्रित करते हैं।
प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन
जब विशिष्ट तरंगदैर्घ्य वाली प्रकाश की किरणें रेटिना पर पड़ती हैं, तब ये शलाकाओं तथा शंकुओं में उपस्थित रसायनों में परिवर्तन करती हैं।
जब प्रकाश की किरणें शलाकाओं के रोडॉप्सिन पर पड़ती हैं, तब यह रेटिनीन (retinene) तथा ऑप्सिन (opsin) में टूट जाता है। अन्धकार में, शलाकाओं में एन्जाइम्स की सहायता से रेटिनीन तथा ऑप्सिन, रोडॉप्सिन का संश्लेषण करते हैं। यही कारण है कि जब हम तीव्र प्रकाश से अन्धकार में जाते हैं, तब एकदम कुछ दिखाई नहीं देता किन्तु धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगता है ।
शंकुओं में आयोडॉप्सिन उपस्थित होता है। शंकु तीन प्रारम्भिक रंगों को ग्रहण करते हैं जो लाल, नीला व हरा होते हैं। इन्हीं तीन प्रकार के शंकुओं द्वारा विभिन्न मात्रा में उद्दीपन ग्रहण करने से अन्य रंगों का ज्ञान होता है।
मनुष्य व दूसरे प्राइमेट्स में दोनों नेत्रों द्वारा एक ही प्रतिबिम्ब बनता है। ऐसी दृष्टि को द्विनेत्री दृष्टि (binocular vision) कहते हैं।
प्रश्न 9. हॉर्मोन्स क्या हैं? इनके विशिष्ट लक्षण लिखिए। हॉर्मोन तथा एन्जाइम में अन्तर बताइए ।
उत्तर : हॉर्मोन
अन्त:स्त्रावी ग्रन्थियों द्वारा उत्पन्न विशिष्ट रासायनिक पदार्थ, जिनके द्वारा जीवधारी के शरीर में रासायनिक समन्वयन होता है, हॉर्मोन कहलाते हैं। हॉर्मोन के अन्य विशिष्ट लक्षण अग्र प्रकार स्पष्ट किए जा सकते हैं-
(1) रासायनिक रूप में हॉर्मोन्स प्रोटीन, स्टीरॉएड अमीनो अम्ल होते हैं।
(2) हॉर्मोन कम अणुभार वाले (low molecular weight) जल में घुलनशील अणु होते हैं।
(3) हॉर्मोन्स की केवल थोड़ी-सी मात्रा ही उनकी क्रिया के लिए पर्याप्त होती है।
(4) सभी हॉर्मोन कोशा कला के आर-पार जा सकते हैं।
(5) एक विशिष्ट हॉर्मोन विशिष्ट अंग या कोशिकाओं पर ही प्रभाव डालता है जिसे लक्ष्य अंग (target organ) कहते हैं। इस प्रक्रिया को अंग विशिष्टता (organ specificity) कहते हैं।
(6) हॉर्मोन शरीर में संचित नहीं होते हैं; अतः इनका संश्लेषण शरीर में निरन्तर होता रहता है।
हॉर्मोन तथा एन्जाइम में अन्तर
क्र०सं० हॉर्मोन्स एन्जाइम्स
1. रासायनिक स्वभाव में ये प्रोटीन्स (proteins), पेप्टोन्स (peptones), पेप्टाइड्स (peptides), अमीनो अम्ल ( amino acids), स्टीरॉएड्स (steroids) अथवा इनके व्युत्पन्न होते हैं। रासायनिक स्वभाव से ये कोलॉइडी प्रोटीन्स (proteins) ही होते हैं।
2. इनका आण्विक भार (molecular weight) कम होता है। इनका आण्विक भार बहुत अधिक होता है।
3. इनका उत्पादन तथा स्रावण अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (endocrine glands) के द्वारा होता है। ये रुधिर के माध्यम से अपने कार्यकारी अंग में पहुँचते हैं। इनका उत्पादन तथा स्रावण बाह्यस्त्रावी ग्रन्थियों (exocrine glands) के द्वारा होता है। ये प्रायः नलिकाओं द्वारा स्थल पर पहुँचाए जाते हैं अन्यथा उसी स्थान पर कार्य करते हैं।
4. ये रासायनिक क्रियाओं के बाद विघटित ( decompose) हो जाते हैं तथा इनका पुन: उपयोग नहीं किया जाता है। ये रासायनिक क्रियाओं के पश्चात् पूर्ववत् (as before) बचे रहते हैं। अतः इनका पुनः प्रयोग किया जाता है।
5. ये उपापचयी क्रियाओं में सीधे भाग नहीं लेते हैं। ये रासायनिक क्रियाओं में सीधे भाग तो नहीं लेते किन्तु उन्हें उत्प्रेरित ( catalyze) करते हैं।
प्रश्न 10. अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियाँ किसे कहते हैं? मानव शरीर में पाई जाने वाली दो प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : अन्त:स्त्रावी ग्रन्थि (Endocrine gland) — ये शरीर में पाई जाने वाली नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ (ductless glands) हैं। ये हॉर्मोन्स का स्रावण करती हैं। हॉर्मोन्स का वितरण रक्त के माध्यम से होता है। ये शरीर के अन्तः वातावरण को स्थिर बनाए रखने में एवं जैविक क्रियाओं के संचालन में महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं।
I. थाइरॉइड ग्रन्थि
यह स्वर यन्त्र के पार्श्व-अधर तल पर स्थित द्विपालिक (bilobed ग्रन्थि है। इसकी रचना अनेक छोटे-छोटे पिण्डकों (lobules) से होती है जिन्हें एक प्रकार का संयोजी ऊतक बाँधे रहता है। पिण्डकों में पारदर्शक तथा कोलॉइडी (colloidal ) तरल पदार्थ थाइरोग्लोब्यूलिन (thyroglobulin) होता है। इसमें मुख्य रूप से थाइरॉक्सिन (thyroxine) होता है। यह हॉर्मोन शरीर की उपापचयी (metabolic) क्रियाओं का नियमन तथा नियन्त्रण करता है। इस हॉर्मोन के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-
(i) शरीर में उपापचय की दर को बनाए रखता है। प्रोटीन संश्लेषण, ग्लूकोज की खपत तथा हृदय स्पन्दन की दर को बढ़ाता है।
(ii) उभयचरों में कायान्तरण को प्रेरित करता है।
(iii) शीत रुधिर वाले जन्तुओं में त्वक्पतन (moulting) को नियन्त्रित रखता है।
थाइरॉक्सिन हॉर्मोन की कमी से निम्नलिखित रोग हो जाते हैं-
(अ) जड़वामनता या क्रिटिनिज्म (Cretinism ) – बाल्यावस्था में थाइरॉक्सिन की कमी से शरीर की समस्त उपापचयी क्रियाएँ मन्द पड़ जाती हैं, त्वचा मोटी तथा झुर्रीदार हो जाती है। शरीर की वृद्धि नहीं होती, मानसिक विकास भली-भाँति नहीं हो पाता तथा जननांग अल्पविकसित होते हैं। ऐसे बच्चे अल्प बुद्धि वाले बौने रह जाते हैं।
(ब) मिक्सीडीमा (Myxoedema ) – वयस्क अवस्था में थाइरॉक्सिन का अल्पस्रावण होने से मिक्सीडीमा (myxoedema) रोग | हो जाता है। इसमें शरीर का विकास तो सामान्य होता है, लेकिन समय से पूर्व बुढ़ापे के लक्षण प्रदर्शित होते हैं। मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, जनन क्षमता कम हो जाती है।
(स) घेंघा (Simple Goiter ) – थाइरॉइड ग्रन्थि से हॉर्मोन्स की उचित मात्रा स्रावित न होने से ग्रन्थि स्वयं फूलकर बड़ी हो जाती है। इस रोग को घेंघा कहते हैं। आयोडीन की उचित मात्रा का उपयोग करने से रोग को नियन्त्रित किया जा सकता है।
थाइरॉक्सिन हॉर्मोन की अधिकता से होने वाला रोग एक्सोफ्यैल्मिक ग्वायटर (Exophthalmic Goiter ) – थाइरॉक्सिन के अतिस्रावण से उपापचयी क्रियाएँ तीव्र हो जाती हैं, अनावश्यक ऊर्जा के कारण थकान अनुभव होती है। नेत्र उभर आते हैं। नेत्रों के पीछे श्लेष्म एकत्र हो जाने से नेत्र गोलक उभरकर बाहर की ओर उठ जाते हैं। इस रोग को एक्सोफ्यैल्मिक ग्वायटर कहते हैं।
II. लैंगर हैन्स की द्वीपिकाएँ
अग्न्याशय (pancreas) एक मिश्रित ग्रन्थि है। इसके अग्न्याशयिक पिण्डक पाचक रस स्रावित करते हैं। यह ग्रन्थि का बहिःस्रावी (exocrine) भाग होता है। इसके बीच-बीच में कुछ विशेष प्रकार की कोशिकाओं के समूह होने के कारण यह एक अन्त:स्त्रावी ग्रन्थि (endocrine gland) भी है, इसी कारण अग्न्याशय को मिश्रित ग्रन्थि कहते हैं। इन कोशिकाओं के समूहों को लैंगरहैन्स के द्वीप (Islets of ) Langerhans) कहते हैं। इसमें तीन प्रकार की कोशिकाएँ – कोशिकाएँ, B- कोशिकाएँ तथा 8- कोशिकाएँ होती हैं। ∝ तथा (insulin) नामक हॉर्मोन्स बनते हैं, जो शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स के B- कोशिकाओं से क्रमश: ग्लूकैगॉन (glucagon ) तथा इंसुलिन उपापचय (metabolism) पर नियन्त्रण रखते हैं।
इन्सुलिन के कार्य (Functions of insulin) — रक्त में शर्करा की सामान्य मात्रा लगभग 0.1% होती है। यह आवश्यकता से अधिक | ग्लूकोज से ग्लाइकोजन संश्लेषण एवं संचय को प्रेरित करता है।
मधुमेह (Diabetes ) — इंसुलिन के अल्पस्त्रावण के कारण शरीर की कोशिकाएँ रक्त शर्करा का उपयोग नहीं कर पातीं, इस कारण रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। अधिक मूत्र स्त्रावण के कारण निर्जलीकरण | ( dehydration) होने लगता है। वसाओं के अधिक उपयोग के कारण विषैले कीटोनकाय (ketone bodies) बनने लगते हैं।
हाइपोग्लाइसीमिया (Hypoglycemia) – इंसुलिन के अतिस्रावण के कारण शरीर की कोशिकाएँ रक्त से अधिक मात्रा में ग्लूकोज लेने लगती हैं, जिससे तन्त्रिका कोशिकाओं को शर्करा कम मात्रा में उपलब्ध होती है, इससे थकावट तथा ऐंठन महसूस होती है।
ग्लूकैगॉन का कार्य (Function of glucagon)—यह आवश्यकता पड़ने पर संचित ग्लाइकोजन को रक्त शर्करा में बदलने के लिए प्रेरित करता है ।
प्रश्न 11. मनुष्य के कर्ण (श्रवण सन्तुलन अंग ) की संरचना का | वर्णन कीजिए। यह किस प्रकार श्रवण एवं सन्तुलन में सहायक होता है?
उत्तर : कान (श्रवण सन्तुलन अंग) की संरचना
कान का महत्त्व सुनने तथा सन्तुलन (hearing and equilibrium) के लिए होता है। कान को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है-
(1) बाह्य कर्ण (External ear) – बाह्य कर्ण कान के उस भाग को कहा जाता है जो हमें बाहर से दिखाई देता है। बाह्य कर्ण के दो भाग होते हैं —
(i) कर्णपल्लव या पिन्ना (Pinna ) – यह कार्टिलेज का बना होता है।
(ii) कर्ण नली (Auditory canal ) — पिन्ना के आधार पर एक पतली कर्ण नली होती है। इसकी त्वचा से कर्ण मोम (cerumin) स्त्रावित होता है जिस पर धूल के कण चिपक जाते हैं।
कर्ण नली अन्तिम सिरे पर एक झिल्ली द्वारा बन्द रहती है। इस झिल्ली को कर्णपटह ( tympanic membrane) कहते हैं।
(2) मध्य कर्ण (Middle ear ) — कान का वह भाग, जो बाह्य और अन्त:कर्ण के मध्य स्थित होता है, मध्य कर्ण कहलाता है। इसके निम्नलिखित भाग होते हैं-
(i) कण्ठकर्ण नली (Eustachian tube) – मध्य कान में एक टेढ़ी, पतली और तंग नली होती है, जिसको कण्ठकर्ण नली कहते हैं। इस नली का पीछे वाला सिरा मुखगुहा में खुलता है। इसके द्वारा कर्णपटह के दोनों ओर वायु का दाब समान रखा जाता है। इससे कान का पर्दा सुरक्षित रहता है।
(ii) कर्ण गुहा (Cavity of middle ear) – कण्ठकर्ण नली के ऊपरी भाग को मध्य कर्ण गुहा कहते हैं। इस गुहा में तीन छोटी हड्डियाँ होती हैं जिनके नाम उनकी आकृति के अनुसार ही होते हैं। इनका क्रम बाहर से भीतरी की ओर होता है। पहली मुग्दर या हथौड़े के आकार की मैलियस | (malleus), दूसरी हड्डी जो नेहाई की तरह होती है। इनकस (incus) और तीसरी को रकाब की तरह होने के कारण स्टैपीज (stapes) कहते हैं।
(3) अन्त:कर्ण (Internal ear) — इस भाग को कला गहन (membranous labyrinth) कहते हैं। यह एक सफेद रंग के द्रव में तैरता रहता है जिसको पेरिलिम्फ (perilymph) कहते हैं। कला गहन के अन्दर के द्रव भरा रहता है जिसको एण्डोलिम्फ (endolymph) कहते हैं। कला गहन के निम्नलिखित तीन भाग होते हैं—
(i) अर्द्धचन्द्राकार नलिकाएँ (Semicircular canals)—ये तीन अर्द्धचन्द्राकार नलिकाएँ होती हैं जो यूट्रिकुलस (utriculus) से जुड़ी रहती है। प्रत्येक नली एक-दूसरे से समकोण दिशा में या लम्ब रूप में जुड़ी होती है। इसमें दो नलियाँ एक खड़ी और एक क्षैतिज होती हैं। प्रत्येक नली मध्य की खाली लगह में अपने फूले स्थानों के द्वारा नीचे की ओर खुलती है। इन फूले हुए स्थानों को ऐम्पुला (ampulla) कहते हैं। इन नलिकाओं का कार्य शरीर का सन्तुलन बनाए रखना है।
(ii) वैस्टीब्यूल (Vestibule) – यह भाग अन्त:कर्ण मध्य में स्थित होता है। इसमें एक बड़ा अण्डाकार छिद्र होता है जो एक झिल्ली से ढका रहता है। यह भाग अन्त:कर्ण के प्रथम भाग को अन्तिम भाग से जोड़ता है।
(iii) कॉक्लिया (Cochlea) – अन्त:कर्ण में अत्यन्त लम्बा और घोंघे की तरह का कुण्डलित भाग कॉक्लिया होता है। इसमें 22 चक्कर दिखलाई पड़ते हैं, जो एक नलिका के घुमाव हैं। इसके अन्तिम सिरे पर एक श्रवण नाड़ी स्थित होती है। जिसका सम्बन्ध मस्तिष्क के अग्र भाग से रहता है।
मनुष्य के कान के कार्य तथा क्रियाविधि
सुनने की क्रिया – ध्वनि तरंगों के पास की वायु में कम्पन पैदा हो जाते हैं। ये कम्पन जब कान के बाहरी भाग पिन्ना से टकराते हैं तो यह उन्हें कर्णनलिका में भेज देता है। यहाँ प्रवेश करने पर ये . ध्वनि – कम्पन कान के पर्दे से टकराते हैं और तब मध्य कर्ण की हड्डियों में भी ठीक वैसे ही कम्पन पैदा हो जाते हैं जैसे कि प्रारम्भ में हुए थे। ये कम्पन यहाँ पर अपनी तीव्रता को लगभग दस गुना बढ़ाकर आगे बढ़ते हैं और अण्डाकार छिद्र के अन्दर प्रवेश कर कान के अन्दर उपस्थित द्रव में भी कम्पन उत्पन्न कर देते हैं। इस प्रकार ये कम्पन कॉक्लिया से होते हुए आगे बढ़ते हैं और श्रवण तन्त्रिका के सिरों को प्रभावित करते हैं। तुरन्त ही ये सिरे इनकी सूचना मस्तिष्क के श्रवण केन्द्र को देते हैं। मस्तिष्क की सहायता से सुनी हुई ध्वनि की पहचान की जाती है जिसमें ध्वनि तरंगों के आधार पर शब्दों का ज्ञान होता है।
कान के अन्य कार्य-कान के अन्दर उपस्थित अन्त:कर्ण के अन्दर एक द्रव, एण्डोलिम्फ भरा रहता है। इसमें अनेक छोटे-छोटे कण होते हैं। ये कण द्रव में तैरते हुए मनुष्य के शरीर के सम्पूर्ण सन्तुलन को बनाए रखने में सहायता करते हैं; अतः कान का कार्य शरीर का सन्तुलन बनाए रखना भी है।
  • लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. किन्हीं चार प्रकार के अनुवर्तन के नाम बताइए ।
उत्तर : अनुवर्तन (Tropism ) – ये एकतरफा उद्दीपनों के कारण होने वाली गतियाँ हैं। इसमें उद्दीपन तथा गति की दिशा में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है; जैसे— (i) गुरुत्वानुवर्तन (geotropism), (ii) प्रकाशानुवर्तन (phototropism), (hydrotropism), (iii) वर्तन (iv) स्पर्शानुवर्तन (thigmotropism) आदि ।
प्रश्न 2. प्राणियों में विभिन्न संवेदनाग्राही अंगों के नाम बताइए ।
उत्तर : प्राणियों में अनेक संवेदनाग्राही अंग पाए जाते हैं; जैसे- प्रकाश को ग्रहण करने के लिए नेत्र (eye), ध्वनि ग्रहण करने के लिए कर्ण (ear), स्पर्श, दबाव, ताप, पीड़ा आदि को ग्रहण करने के लिए त्वचा (skin) आदि।
प्रश्न 3. पादप में नियन्त्रण एवं समन्वय कैसे होता है?
उत्तर : पादपों में नियन्त्रण एवं समन्वय पादप हॉर्मोन या फाइटोक्रोम द्वारा होता है। इसे रासायनिक नियन्त्रण कहते हैं। पादप हॉर्मोन का संश्लेषण तने एवं जड़ के शिखर पर होता है। पादप हॉर्मोन पौधों की विभिन्न जैविक क्रियाओं का नियन्त्रण एवं नियमन करते हैं।
प्रश्न 4. अनुवर्तन तथा अनुकुंचन गतियों में अन्तर लिखिए।
उत्तर : अनुवर्तन तथा अनुकुंचन गतियों में अन्तर
प्रश्न 5. अवटु, परावटु तथा अग्न्याशय से स्त्रावित होने वाले हॉर्मोन कौन-से हैं? प्रत्येक की कमी से होने वाले मुख्य रोग कौन-कौन से हैं?
उत्तर : (i) अवदु (मुख्य रूप से थाइरॉक्सिन (thyroxin) हॉर्मोन होता है। इसकी कमी से जड़वामनता (cretinism ), मिक्सीडीमा (myxoedema), घेंघा (simple goiter) रोग हो जाते हैं। कहते हैं
थाइरॉइड – thyroid) ग्रन्थि – इसके स्राव में
(ii) परावदु (पैराथाइरॉइड – parathyroid) ग्रन्थि — इससे पैराथॉर्मोन (parathormone) नामक हॉर्मोन स्रावित होता है। इसकी कमी से टिटैनी (tetany) रोग हो जाता है।
(iii) अग्न्याशय (Pancreas) — इसकी लैंगर हैन्स द्वीपिकाओं (Islets of Langerhans) से इंसुलिन (insulin), ग्लूकैगॉन (glucagon) हॉर्मोन्स स्त्रावित होते हैं। इंसुलिन की कमी से मधुमेह (diabetes) रोग हो जाता है।
प्रश्न 6. टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन के कार्यों की सूची बनाइए ।
उत्तर : (i) टेस्टोस्टेरोन (Testosterone ) — वृषण की अन्तराली कोशिकाओं से एण्ड्रोजन्स या टेस्टोस्टेरोन (androgens or testosterone) हॉर्मोन्स स्त्रावित होते हैं। यह जनदों के विकास, परिपक्वता, द्वितीयक लैंगिक लक्षणों आदि के विकास में सहायक होते हैं। पुरुषों की भारी आवाज, अधिक मजबूत अस्थियाँ एवं पेशियाँ, शरीर आकृति, दाढ़ी-मूँछ का उगना आदि लक्षणों का विकास इन्हीं के कारण होता है।
(ii) एस्ट्रोजन (Estrogens) – ये अण्डाशय से स्त्रावित हॉर्मोन्स हैं। ये स्तन ग्रन्थियों (स्तनों), गर्भाशय, योनि आदि के विकास को प्रेरित करते हैं। इसके कारण स्त्रियों में रजोधर्म (menstrual cycle) प्रारम्भ होती है।
प्रश्न 7. पीयूष ग्रन्थि से स्त्रावित होने वाले तीन हॉर्मोन्स के नाम लिखिए।
उत्तर : पीयूष ग्रन्थि (Pituitary gland) — यह ग्रन्थि अग्रमस्तिष्क के अधर तल पर स्थित होती है। इससे स्त्रावित हॉर्मोन्स अन्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के हॉर्मोन्स के स्रावण को नियन्त्रित करते हैं। इस ग्रन्थि को मास्टर ग्रन्थि भी कहते हैं। इससे निम्नलिखित हॉर्मोन स्रावित होते हैं-
(i) वृद्धि हॉर्मोन (Growth hormone),
(ii) थाइरोट्रॉपिन (Thyrotropin) या थाइरॉइड प्रेरक हॉर्मोन (Thyroid stimulating hormone),
(iii) एड्रीनोकॉर्टिकोट्रॉपिन (Adrenocorticotropin),
(iv) वैसोप्रेसिन (Vasopressin) या प्रतिमूत्रक (antidiuretic hormone),
(v) ऑक्सीटोसिन (Oxytocin or Pitocin)।
प्रश्न 8. अनैच्छिक क्रिया किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए ।
उत्तर : अनैच्छिक क्रियाएँ (Involuntary action)— अनैच्छिक क्रियाएँ ऐसी क्रियाओं को कहते हैं जिन पर इच्छा शक्ति का कोई नियन्त्रण नहीं होता। ऐसी क्रियाएँ शरीर के अन्दर स्वतः ही होती हैं तथा हम उन्हें किसी प्रकार भी रोक नहीं सकते। ऐसी क्रियाएँ मस्तिष्क पुच्छ तथा मेड्यूला ऑब्लांगेटा (अनुमस्तिष्क) के द्वारा नियन्त्रित होती हैं। के
अनैच्छिक क्रियाओं के उदाहरण- हृदय की गति, श्वसन क्रियापाचन क्रिया आदि।
प्रश्न 9. मनुष्य के नेत्र में वृद्धावस्था में कौन-सा दृष्टि-दोष आ जाता है?
उत्तर : वृद्धावस्था आने पर धीरे- धीरे लेन्स का लचीलापन कम हो जाता है। इसके साथ ही सीलियरी काय तथा निलम्बन स्नायु ( ciliary. body and suspensory ligament) की भी लचक कम हो जाती है; अतः नेत्र अधिक दूर की वस्तु तथा अधिक पास की वस्तु पर ठीक से फोकस नहीं कर पाता है। पास की वस्तु साफ देखने के लिए उत्तल लेन्स तथा दूर की वस्तु साफ देखने के लिए अवतल लेन्स का चश्मा पहनना पड़ता है। वृद्धावस्था के इस दृष्टि दोष को प्रेसबायोपिया (presbyopia) ।
प्रश्न 10. कर्ण शरीर का सन्तुलन किस प्रकार बनाते हैं?
उत्तर : अन्त:कर्ण की अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं की तुम्बिका (ampulla) नलियाँ, सैक्यूलस तथा यूट्रिकुलस शरीर का सन्तुलन बनाने का कार्य करती हैं। इनमें कैल्सियम कार्बोनेट के सूक्ष्म कण ऑटोकोनिया पाए जाते हैं।
यूट्रिकुलस तथा सैक्यूलस के मैकुला तथा अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं के तुम्बिका में स्थित संवेदी कूटों द्वारा गतिक सन्तुलन (dynamic equilibrium) नियन्त्रित होता है। जब शरीर एक ओर को झुक जाता है, तब ऑटोकोनिया उसी ओर चले जाते हैं जहाँ वे संवेदी कूटों को उद्दीपन प्रदान करते हैं, इससे तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होता है और मस्तिष्क में शरीर के झुकने की सूचना पहुँच जाती है। मस्तिष्क प्रेरक तन्त्रिकाओं द्वारा सम्बन्धित पेशियों को सूचना भेजकर शरीर का सन्तुलन बनाता है।
प्रश्न 11. स्पर्शग्राही और पीड़ाग्राही संवेदांग कहाँ स्थित होते हैं? इसकी संरचना बताइए।
उत्तर : स्पर्शग्राही एवं पीड़ाग्राही संवेदांग (Tactile and Pain receptors) – ये त्वचा में स्थित होते हैं। ये तन्त्रिका तन्तुओं के शाखान्वित स्वतन्त्र छोर होते हैं।
(i) स्पर्श संवेदांग (Tactile receptors ) — इन तन्त्रिका तन्तुओं हॉर्मोन के अन्तिम छोर घुण्डीदार, चपटे या तश्तरीनुमा होते हैं।
(ii) पीड़ा संवेदांग (Pain receptors ) — त्वचा की अधिचर्म तथा चर्म में शाखामय संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं का जाल फैला होता है। इनके स्वतन्त्र छोर पुटिकाविहीन होते हैं। ये पीड़ा, खुजली, जलन आदि का ज्ञान कराते हैं।
प्रश्न 12. अधिवृक्क ग्रन्थि के मेड्यूला से स्त्रावित हॉर्मोन्स के कार्य लिखिए।
उत्तर : अधिवृक्क मेड्यूला (Adrenal Medulla) के हॉर्मोन्स कार्य निम्नलिखित हैं-
(i) एड्रीनलीन या एपीनेफ्रिन (Adrenaline or | Epinephrine) – यह मुख्य हॉर्मोन है। यह ग्लूकोजेनोलाइसिस तथा वसा के विघटन को प्रेरित करता है। यह हृदय स्पन्दन दर, श्वास दर, ग्लूकोज की खपत एवं उपापचय दर को बढ़ाता है। यह संकट की अवस्था में शरीर को उम्र प्रतिक्रिया के लिए तैयार करता है।
(ii) नॉरएड्रीनलीन या नॉरएपीनेफ्रिन (Noradrenaline or Norepinephrine ) – यह कम मात्रा में स्त्रावित होता है। इसका कार्य रक्त दाब बढ़ाना, हृदय की संकुचनशीलता का नियन्त्रण करना होता है। यह रुधिर शर्करा के स्तर को शीघ्रता से बढ़ाता है। शरीर को सामान्य स्थिति में लाने का कार्य करता है।
प्रश्न 13. अण्डाशय तथा वृषण से स्त्रावित हॉर्मोन्स के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : (1) अण्डाशय से एस्ट्रोजन्स ( estrogens) हॉर्मोन्स स्त्रावित होते हैं। ये जननांगों (गर्भाशय, योनि, स्तनों आदि ) के विकास को प्रेरित करते हैं। इनके कारण द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (secondary sexual characters) का विकास होता है। रजोधर्म (menstrual cycle) प्रारम्भ हो जाती है।
(2) वृषण (testes) की अन्तराली कोशिकाओं (लीडिंग कोशिकाओं) से एण्ड्रोजन्स (androgens) स्रावित होते हैं। यह लैंगिक परिपक्वता, जनदों के विकास, द्वितीयक लैंगिक लक्षण (secondary sexual characters) आदि के विकास में सहायक है। पुरुषों की भारी आवाज, अधिक मजबूत हड्डियाँ, पेशियाँ तथा शरीर आकृति, दाढ़ी-मूँछ का उत्पन्न होना आदि लक्षण तथा मैथुन इच्छा इसी हॉर्मोन का प्रभाव है।
प्रश्न 14. जन्तुओं के शरीर में हॉर्मोन्स का क्या महत्त्व है?
उत्तर : हॉर्मोन्स का जन्तु के शरीर में महत्त्व
हॉर्मोन्स जन्तु के शरीर में सभी जैविक क्रियाओं को नियन्त्रित, नियमित या समन्वित करते हैं। इनकी अति सूक्ष्म मात्रा ही इन क्रियाओं के नियन्त्रण के लिए काफी होती है। इनका स्रावण कम या अधिक होने पर कार्यात्मक रोग (functional diseases) हो जाते हैं।
हॉर्मोन्स किसी क्रिया को प्रारम्भ तो नहीं करते किन्तु इन क्रियाओं को नियन्त्रित या नियमित करने में सक्षम होते हैं। प्रो० हक्सले (Huxley) के अनुसार, ये शरीर के रासायनिक दूत (chemical messengers of body) हैं।
हॉर्मोन्स बहुत कुछ बाहरी वातावरण के अनुकूल प्राणी के शरीर में अनुकूलन की क्षमता प्रदान करते हैं जिससे वातावरण के कारक शरीर की जैविक क्रियाओं पर अपना प्रभाव न डाल सकें।
प्रश्न 15. कारण बताइए-
(अ) अन्धकार में उगे पौधों में तने का शीर्ष प्रकाश की ओर झुक जाता है।
(ब) गमले में लगे पौधे को भूमि पर क्षैतिज दिशा में रख दिया जाए तो कुछ दिन बाद उसकी जड़ें नीचे की ओर और ऊपर की ओर मुड़ जाता है। का शीर्ष
(स) झाड़ी को सघन बनाने के लिए माली ऊपर से काटते रहते हैं।
उत्तर : (अ) प्रकाशानुवर्तन (Phototropism ) — एकतरफा उद्दीपन के कारण पौधों में वक्रता उत्पन्न हो जाती है। एकतरफा प्रकाश के कारण तना प्रकाश की ओर मुड़ जाता है। तना धनात्मक प्रकाशानुवर्ती होता है। जड़ें ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती होती हैं। यह वक्रता ऑक्सिन के असमान वितरण के कारण उत्पन्न होती है।
(ब) गुरुत्वानुवर्तन (Geotropism ) – प्राथमिक जड़ धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती होती है। तना ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती होता है । गुरुत्वानुवर्तन ‘ऑक्सिन के असमान वितरण के कारण होता है।
गमले में लगे पौधे को यदि भूमि पर क्षैतिज दिशा में रख दिया जाए तो कुछ दिन बाद उसकी जड़ें नीचे की ओर तथा तने का शीर्ष ऊपर की ओ मुड़ जाता है। यह ऑक्सिन के असमान वितरण के कारण होता है। क्लाइनोस्टेट यन्त्र की सहायता से गुरुत्वानुवर्तन के एकतरफा उद्दीपन को समाप्त किया जा सकता है जिससे तने और जड़ में वक्रता उत्पन्न नहीं होती है।
(स) शीर्ष प्रमुखता (Apical dominance ) — इसके कारण पाश्र्वय कलिकाओं की वृद्धि नहीं होती। जब शीर्षस्थ कलिका वृद्धि बन्द कर देती है या काट दी जाती है तो कक्षस्थ कलिकाएँ वृद्धि करना प्रारम्भ कर देती हैं, इसीलिए झाड़ियाँ अधिक घनी हो जाती हैं। ऐसा समझा जाता है कि शीर्षस्थ कलिका के विभज्योतक में ऑक्सिन संश्लेषण होता है (तब तक कक्षस्थ कलिकाओं में नहीं होता)। इसके कट जाने पर कक्षस्थ कलिकाओं में यही कार्य प्रारम्भ हो जाता है। यह तो निश्चित है कि कक्षस्थ कलिकाओं को अपेक्षित ऑक्सिन दिया जाए तो इनमें वृद्धि होने लगती है। ( जब शीर्ष कलिका काट दी गई हो ) ।
प्रश्न 16. गुरुत्वानुवर्तन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : गुरुत्वानुवर्तन (Geotropism) – गुरुत्वाकर्षण बल (gravitational force) का उद्दीपन पौधे के विभिन्न भागों पर भिन्न-भिन्न प्रभाव डालता है। जड़ें इस उद्दीपन के लिए धनात्मक . ( positive) किन्तु तने ऋणात्मक (negative) अनुवर्तन प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार के अनुवर्तन को गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) कहते हैं। एक प्रयोग से इसको स्पष्ट किया जा सकता है।
प्रयोग – बुरादे या रेत में कुछ बीजों को यदि अंकुरित किया जाए तो निकले हुए अंकुर के प्रांकुर (plumule) बुरादे या रेत के बाहर निकल आएँगे इस समय यदि मूलांकुरों को देखा जाए तो सीधे भूमि की ओर बढ़ रहे होते हैं। गमले को अगर भूमि पर लिटा दें तो नवोद्भिदों (seedlings) का लम्ब अक्ष भूमि के समान्तर या क्षैतिज हो जाएगा। एक-दो दिन बाद गमले में लगे इन नवोद्भिदों को देखने से ज्ञात होगा कि प्रांकुर धनात्मक प्रकाशानुवर्ती और जड़ ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती गति को प्रदर्शित करती हैं। ये गतियाँ ऑक्सिन के असमान वितरण के कारण होती हैं।
प्रश्न 17. तन्त्रिका तन्त्र के क्या-क्या कार्य हैं?
उत्तर : (i) प्राणियों में तन्त्रिका तन्त्र शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं में समन्वयन तथा नियन्त्रण का कार्य करता है।
(ii) तन्त्रिका तन्त्र का मुख्य भाग मस्तिष्क होता है। इसका प्रमस्तिष्क सोचने-समझने, स्मृति, चेतना, तर्क शक्ति, सीखने आदि की क्षमता प्रदान करता है।
(iii) यह अनैच्छिक क्रियाओं का स्वतः संचालन करता रहता है; जैसे- श्वास लेना, हृदय स्पन्दन, उत्सर्जन, पाचन आदि ।
(iv) यह प्रतिवर्ती क्रियाओं का स्वतः संचालन करता है, प्राणी को परिस्थिति का ज्ञान होने से पहले ही प्रतिक्रिया हो जाती है।
प्रश्न 18. ‘तन्त्रिका आवेग’ पद की परिभाषा दीजिए। तंत्रिकोशिका (neuron) का कौन-सा संरचंक भाग तन्त्रिका आवेग को ले जाता है-
(i) कोशिकाकाय की ओर, (ii) कोशिकाकाय से दूर?
उत्तर : तन्त्रिका या तन्त्रि कोशिकाओं में उद्दीपन या प्रेरणाओं के विद्युत-रासायनिक आवेग के रूप में बहाव को तन्त्रिका आवेग (nerve impulse) कहते हैं।
(i) वृक्षिकान्त या द्रुमिका (dendrite) आवेग को कोशिकाकाय ओर ले जाते हैं।
(ii) तन्त्रिकाक्ष या अक्ष तन्तु (axon) आवेग को कोशिकाकाय से दूर ले जाते हैं।
प्रश्न 19. मनुष्य के स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के दो प्रमुख भागों के नाम लिखिए। मानव शरीर में निम्नलिखित तन्त्रों पर इनका क्या प्रभाव होता है?
(i) रुधिर वाहिकाएँ, (ii) मूत्राशय ।
उत्तर : स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के दो मुख्य भाग होते हैं-
(क) अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र ( Sympathetic nervous system) तथा
(ख) परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र (Parasympathetic nervous system)।
(i) रुधिर वाहिकाएँ – अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र इनका संकीर्णन करता है, इससे रक्त दाब बढ़ जाता है। परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र इनका विस्तारण करता है जिससे रक्त दाब सामान्य हो जाता है।
(ii) मूत्राशय — अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र द्वारा इसकी पेशियों का विस्तारण होता है और परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र द्वारा इसकी पेशियों का संकुचन होता है, जिससे प्राणी मूत्र त्याग करता है।
प्रश्न 20. प्रतिवर्ती चाप को रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए । 
उत्तर : प्रतिवर्ती चाप
  • अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. अंगुलियों के किसी गर्म वस्तु पर पड़ने पर हम हाथ को अचानक झटके से हटा लेते हैं, कारण बताइए ।
उत्तर : प्रतिवर्ती क्रिया के कारण। यह क्रिया मेरुरज्जु द्वारा नियन्त्रित होती है।
बाह्य उद्दीपन जैसे गर्म वस्तु पर हाथ का पड़ना, गर्मी का यह उद्दीपन संवेदी तन्त्रिका द्वारा मेरुरज्जु में पहुँचता है और प्रेरणा के रूप में सम्बन्धित चालक तन्त्रिका द्वारा पेशियों में पहुँचा दिया जाता है। पेशियों में संकुचन के कारण हाथ हट जाता है।
प्रश्न 2. मध्य कर्ण सुनने में किस प्रकार सहायता करता है?
उत्तर : मध्य कर्ण में पाई जाने वाली कर्ण अस्थिकाएँ — मैलियस (malleus), इनकस (incus) तथा स्टैपीज (stapes ) – कर्णपटह से ध्वनि के उद्दीपनों को अन्तः कर्ण के अण्डाकार छिद्र पर स्थित झिल्ली तक पहुँचाती हैं। ये ध्वनि की तीव्रताओं को बढ़ा देती है। इस प्रकार मध्य कर्ण ध्वनि ग्रहण करने में सहायक होता है।
प्रश्न 3. मनष्य की जिह्वा स्वाद का अनुभव किस प्रकार कराती है?
उत्तर : मनुष्य की जिह्वा पर स्वाद अंकुर (taste buds) पाए जाते हैं। जीभ के स्वतन्त्र छोर पर मीठे और नमकीन, पार्श्व में खट्टा तथा पश्च भाग में कड़वे का ज्ञान कराने वाले स्वाद अंकुर होते हैं। स्वाद अंकुर की की संवेदी कोशिकाएँ तरल अवस्था में ही स्वाद के उद्दीपनों को ग्रहण करती हैं। इसी कारण गर्म और तरल के स्वाद का ज्ञान शीघ्र होता है। ठोस पदार्थ लार में घुलकर स्वाद का ज्ञान कराते हैं।
प्रश्न 4. मधुमेह रोग किस हॉर्मोन की कमी से होता है? यह हॉर्मोन किस ग्रन्थि से स्त्रावित होता है?
उत्तर : मधुमेह रोग इंसुलिन (insulin) हॉर्मोन की कमी से होता है। यह हॉर्मोन अग्न्याशय में स्थित लँगरहैन्स की द्वीपिकाओं की बीटा कोशिकाओं से स्त्रावित होता है।
प्रश्न 5. अनिषेकफलन किसे कहते हैं?
उत्तर : ऑक्सिन की अधिकता या ऑक्सिन का छिड़काव करने से बिना निषेचन के अण्डाशय से फल विकसित हो जाता है। ये फल बीज रहित होते हैं। इस प्रक्रिया को अनिषेकफलन (parthenocarpy) कहते हैं।
प्रश्न 6. खरपतवारनाशक या अपतृणनाशक पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : खरपतवारनाशक या अपतृणनाशक (Weedicides) कुछ ऑक्सिन जैसे 2-4D, 2-4-5T आदि का छिड़काव करने से द्विबीजपत्री खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है। इनका उपयोग एकबीजपत्री फसलों; जैसे गेहूँ, मक्का आदि से द्विबीजपत्री जंगली पौधों (खरपतवार) को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
प्रश्न 7. नेत्रोत्सेंधी गलगण्ड रोग किस हॉर्मोन के प्रभाव से | होता है? इसका स्रावण किस अन्तःस्रावी ग्रन्थि से होता है?
उत्तर : नेत्रोत्सेंधी गलगण्ड (Exophthalmic goitre) रोग थाइरॉक्सिन (thyroxine) हॉर्मोन के अतिस्रावण के कारण होता है। यह हॉर्मोन थाइरॉइड ग्रन्थि (thyroid gland) से स्रावित होता है।
प्रश्न 8. इंसुलिन आघात किसे कहते हैं?
उत्तर : इंसुलिन आघात ( Insulin shock ) — अधिक मात्रा इंसुलिन की उपस्थिति के कारण रुधिर में शर्करा की मात्रा बहुत कम हो जाती है तथा रोगी बेहोश हो जाता है। इस अवस्था को इंसुलिन आघात कहते हैं। मधुमेह रोगी की इस स्थिति में मृत्यु भी हो जाती है।
प्रश्न 9. आँख में दृष्टि शलाकाएँ और दृष्टि शंकु कहाँ पाए जाते हैं? इनके कार्यों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर : आँख के अन्दर दृष्टि पटल की संरचना में दृष्टि शलाकाओं (rods) तथा दृष्टि शंकुओं (cones) का एक संवेदी स्तर होता है, जो क्रमश: प्रकाश व अन्धकार में अन्तर तथा रंग भेद का ज्ञान कराता है।
प्रश्न 10. लैंगर हैंस की द्वीपिकाएँ (Islets of Langerhans) कौन-से हॉर्मोन्स स्त्रावित करती हैं?
उत्तर : लैंगर हैंस की द्वीपिकाओं द्वारा स्रावित दो मुख्य हॉर्मोन्स हैं-
(1) इंसुलिन (insulin), (2) ग्लूकैगॉन (glucagon)
  • एक शब्द या एक वाक्य वाले प्रश्न
प्रश्न 1. पश्चमस्तिष्क के उस भाग का नाम बताइए जो श्वसन को नियन्त्रित करता है?
उत्तर : पोन्स (Pons)।
प्रश्न 2. प्रतिवर्ती क्रियाओं में कौन-सी तन्त्रिकाएँ भाग लेती हैं?
उत्तर : रीढ़रज्जु तन्त्रिकाएँ ।
प्रश्न 3. मस्तिष्क तथा रीढ़रज्जु के चारों ओर पाए जाने वाले आवरण का नाम बताइए ।
उत्तर : दृढ़तानिका (duramater) तथा मृदुतानिका (piamater)।
प्रश्न 4. अनैच्छिक क्रियाओं का नियन्त्रण एवं नियमन केन्द्र कौन-सा है?
उत्तर : मस्तिष्क का मेड्यूला ऑब्लांगेटा (medulla oblongata)|
प्रश्न 5. मेड्यूला ऑब्लांगेटा का क्या कार्य है?
उत्तर : अनैच्छिक क्रियाओं पर नियन्त्रण रखना ।
प्रश्न 6. प्रतिवर्ती क्रिया का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर : गर्म’ वस्तु पर हाथ पड़ने पर हाथ का हट जाना ।
प्रश्न 7. स्वादेन्द्रियाँ कहाँ स्थित होती हैं?
उत्तर : जीभ पर ।
प्रश्न 8. आँख में उपतारा का क्या कार्य है?
उत्तर : आँख में उपतारा (pupil) प्रकाश की तीव्रता को नियमित करता है।
प्रश्न 9. ध्वनिग्राही और शरीर का सन्तुलन बनाए रखने का कार्य कौन करता है?
उत्तर : कर्ण (ear) ।
प्रश्न 10. शरीर की मास्टर ग्रन्थि किसे कहते हैं?
उत्तर : पीयूष ग्रन्थि (pituitary gland) को।
प्रश्न 11. कौन-सा हॉर्मोन स्त्रियों के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के लिए उत्तरदायी है ?
उत्तर : एस्ट्रोजन ( estrogen)।
प्रश्न 12. बाल्यावस्था में थाइरॉक्सिन के अल्प- स्त्रावण से होने वाले रोग का नाम लिखिए ।
उत्तर : जड़वामनता या क्रिटिनिज्म (cretinism)।
प्रश्न 13. एडीसन का रोग किस कारण होता है?
उत्तर : एडीसन का रोग (Addison’s disease) अधिवृक्क वल्कुट (adrenal cortex) के हॉर्मोन्स के अल्प- स्रावण से होता है।
प्रश्न 14. आपातकालीन हॉर्मोन (emergency hormone) किसे कहते हैं?
उत्तर : एड्रीनलीन ( adrenaline) हॉर्मोन आपातकालीन हॉर्मोन कहलाते हैं।
प्रश्न 15. 2-4 D किस प्रकार कृषि कार्यों में उपयोगी है?
उत्तर : खरपतवारनाशक के रूप में।
प्रश्न 16. बीजों के अंकुरण को कौन-सा हॉर्मोन प्रेरित करता है?
उत्तर : जिबरेलिन (gibberellin)।
प्रश्न 17. हृदय के ठीक ऊपर स्थित ग्रन्थि का नाम बताइए ।
उत्तर : अन्त: स्रावी थाइमस ग्रन्थि (thymus gland) ।
प्रश्न 18. कौन-सा हॉर्मोन पत्तियों के झड़ने में योगदान देता है?
उत्तर : ऐब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid) ।
प्रश्न 19. हमारे शरीर में थाइरॉक्सिन हॉर्मोन का कार्य लिखिए।
उत्तर : थाइरॉक्सिन हॉर्मोन वसा, प्रोटीन एवं कार्बोहाइड्रेट उपापचय पर नियन्त्रण रखकर जीवन की रफ्तार को बनाए रखता है।
प्रश्न 20. जब कोई सुई हाथ में चुभती है तो हम तत्काल अपना हाथ पीछे खींच लेते हैं। इस प्रक्रिया से सम्बन्धित प्रतिक्रिया किस प्रकार की होती है?
उत्तर : प्रतिवर्ती प्रतिक्रिया (reflex action ) ।
प्रश्न 21. वृक्षाभ का क्या कार्य है?
उत्तर : वृक्षाभ संवेदनाग्राही से तन्त्रिका प्रेरणाओं को ग्रहण करके कोशिकाकाय तक पहुँचाते हैं।
प्रश्न 22. क्रेनियम किसे कहते हैं?
उत्तर : मस्तिष्क शरीर का सबसे कोमल अंग है। यह अस्थि के खोल में बन्द रहता है, जिसे क्रेनियम कहते हैं।
प्रश्न 23. रसायनानुवर्तन ( chemotropism) किसे कहते हैं?
उत्तर : विभिन्न रसायनों के प्रति पौधों की अनुवर्तन गति को रसायनानुवर्तन कहते हैं।
प्रश्न 24. दीप्तिकालिता ( photoperiodism) किसे कहते हैं? 
उत्तर : पुष्पन पर प्रकाश के प्रभाव को दीप्तिकालिता कहते हैं।
प्रश्न 25. इंसुलिन ग्लूकोज को किस रूप में बदलता है?
उत्तर : ग्लाइकोजन (glycogen) में।

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