UK 10th Science

UK Board 10th Class Science – Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है

UK Board 10th Class Science – Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है

UK Board Solutions for Class 10th Science – विज्ञान – Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है

अध्याय के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. डी०एन०ए० प्रतिकृति का प्रजनन में क्या महत्त्व है?
उत्तर : डी०एन०ए० प्रतिकृति के (copying) के फलस्वरूप जीवधारी की संरचना पीढ़ी-दर-पीढ़ी निश्चित बनी रहती है। इसके कारण जीवधारी अपने वातावरण का सदुपयोग कर पाता है अर्थात् अपने वातावरण से अनुकूलित रहता है।
प्रश्न 2. जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के लिए तो लाभदायक है परन्तु व्यष्टि के लिए आवश्यक नहीं है, क्यों?
उत्तर : विभिन्नताएँ प्रजाति (species) के लिए लाभदायक होती हैं। विभिन्नताओं के कारण प्रजाति के सदस्यों में कुछ ऐसे सदस्य उत्पन्न हो जाते हैं जो विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए प्रतिरोधी होते हैं। प्राकृतिक चयन के फलस्वरूप योग्यतम जीवित रहते हैं। इन योग्य या वातावरण के लिए अनुकूलित सदस्यों से प्रजाति शाश्वत् बनी रहती है। व्यक्तिगत सदस्य में उत्पन्न विभिन्नताएँ वातावरण से अनुकूलित न होने के कारण उक्त सदस्य की मृत्यु हो सकती है। इस कारण विभिन्नताएँ प्रजाति के लिए लाभदायक हो सकती हैं लेकिन व्यक्तिगत सदस्य के लिए लाभदायक हों यह आवश्यक नहीं है।
प्रश्न 3. द्विखण्डन, बहुखण्डन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर : द्विखण्डन तथा बहुखण्डन में अन्तर
क्र०सं० द्विखण्डन बहुखण्डन
1. यह क्रिया अनुकूल परिस्थितियों में होती है। यह क्रिया सामान्यतया प्रतिकूल परिस्थितियों में होती है।
2. इसमें केन्द्रक दो पुत्री केन्द्रकों में विभाजित होता है। इसमें केन्द्रक अनेक संतति केन्द्रकों में बँट जाता है।
3. इसमें केंन्द्रक विभाजन के साथ-साथ कोशाद्रव्य का बँटवारा हो जाता है। यह सामान्यतया खाँच विधि से होता है। इसमें केन्द्रकों का विभाजन पूर्ण होने के पश्चात् प्रत्येक पुत्री केन्द्रक के चारों ओर थोड़ा-थोड़ा कोशाद्रव्य एकत्र हो जाता है।
4. एककोशिकीय जीव से दो सन्तति जीव बनते हैं। इसमें एककोशिकीय जीव से अनेक सन्तति जीव (जितने भागों में केन्द्रक का विभाजन होता है) बनते हैं।
उदाहरण- अमीबा । उदाहरण — प्लाज्मोडियम ।
प्रश्न 4. बीजाणु द्वारा जनन से जीव किस प्रकार लाभान्वित होता?
उत्तर : जीवधारियों में बीजाणुओं (spores) द्वारा जनन प्रतिकूल परिस्थितियों में होता है। बीजाणु चारों ओर से मोटे रक्षात्मक आवरण से घिरा रहता है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में बीजाणु की सुरक्षा करता है। बीजाणुओं का प्रकीर्णन प्रायः वायु द्वारा होता है। अनुकूल परिस्थितियों (उचित ताप, नमी तथा भोज्य पदार्थ) के मिलने पर बीजाणु अंकुरित होकर नए जीवधारी का विकास करते हैं। उदाहरण – म्यूकर (Mucor), राइजोपस (Rhizopus) आदि । है
प्रश्न 5. क्या आप कुछ कारण सोच सकते हैं जिससे पता चलता हो कि जटिल संरचना वाले जीव पुनरुद्भवन द्वारा नई सन्तति उत्पन्न नहीं कर सकते?
उत्तर : जटिल संरचना वाले जीवधारियों में पुनरुद्भवन (regeneration) द्वारा जनन सम्भव नहीं होता । इन जीवधारियों में लिंगी जनन (sexual reproduction) नर तथा मादा युग्नकों द्वारा होता है जटिल संरचना वाले जीवधारियों की कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों के लिए विशिष्टीकृत होती हैं। ये परस्पर मिलकर क्रमश: ऊतक, ऊतक तन्त्र, अंग, अंगतन्त्र का निर्माण करती हैं। सरल बहुकोशिकीय प्राणियों; जैसे स्पंज, हाइड्रा आदि में सरलतम अविशेषित (unspecialised) कोशिकाएँ पाई जाती हैं। इनके विभाजन एवं रूपान्तरण से अन्य सभी प्रकार की कोशिकाएँ बन जाती हैं; अत: इनमें पुनरुद्भवन की क्षमता होती है । जटिल संरचना वाले जीवधारियों में यह क्षमता केवल घाव भरने तक ही सीमित रह जाती है। ।।
प्रश्न 6. कुछ पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर : अनेक पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन (vegetative propagation) विधि का उपयोग किया जाता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं-
(i) अनेक प्रजातियों में बीज बहुत कम संख्या में बनते हैं।
(ii) अनेक प्रजातियों में बनने वाले बीज जीवन योग्य (viable) नहीं होते।
(iii) कायिक प्रवर्धन द्वारा प्रजाति के पैतृक लक्षणों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित किया जा सकता है।
(iv) कायिक प्रवर्धन द्वारा कम समय में ही एक पौधे से अनेक पौधे तैयार हो जाते हैं।
प्रश्न 7. डी०एन०ए० की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक क्यों है?
उत्तर : जनन प्रक्रिया में डी०एन०ए० प्रतिकृतिकरण (copying or duplication) एक आवश्यक प्रक्रम है, इसके फलस्वरूप जीवधारी की संरचना निश्चित बनी रहती है, जिसके कारण जीवधारी अपने सूक्ष्मावास के अनुरूप बना रहता है।
प्रश्न 8. परागण क्रिया निषेचन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर : परागण तथा निषेचन में अन्तर
क्र०सं० परागण निषेचन
1. परागकोष से पराग कणों के वर्तिकाग्र (stigma) पर पहुँचने की क्रिया परागण (pollination) कहलाती है। नर तथा मादा युग्मकों के मिलने की प्रक्रिया को निषेचन (fertilization) कहते हैं।
2. परागण प्राय: कीट, वायु, जल, पक्षी आदि के माध्यम से होता है। नर युग्मकों को मादा युग्मक तक ले जाने का कार्य परागनलिका करती है।
3. यह क्रिया निषेचन से पहले है। यह क्रिया परागण के बाद होती होती है।
प्रश्न 9. शुक्राशय एवं प्रोस्टेट ग्रन्थि की क्या भूमिका है?
उत्तर: शुक्राशय (Seminal vesicle ) — इससे एक पोषक तरल पदार्थ स्त्रावित होता है जो शुक्राणुओं के साथ मिलकर वीर्य (semen) बनाता है। यह तरल शुक्राणुओं का पोषण करता है, इनकी सुरक्षा भी करता और इन्हें सक्रिय बनाए रखता है। यह तरल स्त्री की योनि के अम्लीय प्रभाव को समाप्त करके अम्लीय माध्यम से शुक्राणुओं की सुरक्षा करता है।
प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate gland) से हल्का अम्लीय तरल स्त्रावित होता है। यह वीर्य का लगभग 25% भाग बनाता है। इसमें पाए जाने वाले विभिन्न रसायन वीर्य के अधिक स्कन्दन को रोकते हैं तथा शुक्राणुओं को सक्रिय रखते हैं।
प्रश्न 10. यौवनारम्भ के समय लड़कियों में कौन-से परिवर्तन दिखाई देते हैं?
उत्तर : बाल्यावस्था में जननांगों के अतिरिक्त अन्य शारीरिक लक्षणों तथा व्यवहार आदि में लड़कों और लड़कियों में विशेष अन्तर नहीं होता है। लगभग 11 से 13 वर्ष की आयु में बाल्यावस्था समाप्त हो जाती है और यौवनारम्भ ( puberty ) अर्थात् किशोरावस्था प्रारम्भ में हो जाती है। यह लिंग हॉर्मोन्स के प्रभाव में होता है। लड़कियों में यौवनारम्भ या किशोरावस्था में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं—
(1) त्वचा तेलीय हो जाती है, चेहरे पर मुहासे (pimples) निकलने लगते हैं।
(2) बगल तथा जांघों के मध्य जनन क्षेत्र में बाल उग आते हैं।
(3) स्तनों की वृद्धि तथा दुग्ध ग्रन्थियों का विकास होने लगता है।
(4) स्तनों के मध्य उभरे भाग पर स्थिति चूचुक ( nipples) के चारों ओर का छोटा-सा रंगायुक्त क्षेत्र भी अधिक गहरा हो जाता है।
(5) श्रोणि भाग चौड़ा और नितम्ब भारी हो जाते हैं।
(6) आवाज महीन एवं सुरीली हो जाती है।
(7) आर्तव चक्र या रजोधर्म या मासिक चक्र (menstrual cycle) प्रारम्भ हो जाता है।
प्रश्न 11. माँ के शरीर में गर्भस्थ भ्रूण को पोषण किस प्रकार प्राप्त होता है?
उत्तर : मनुष्य एक स्तनी प्राणी है। निम्न श्रेणी के स्तनियों को छोड़कर सभी स्तनी जरायुजी (viviparous) होते हैं। भ्रूण का विकास गर्भाशय में होता है और विकासशील भ्रूण का पोषण माता के पोषक पदार्थों से होता है और स्त्री पूर्ण विकसित शिशु को जन्म देती है।
भ्रूणीय विकास के तीसरे सप्ताह में भ्रूण का रोपण प्राथमिक रसांकुरों (primary villi) द्वारा होता है और अन्त में भ्रूण आंवल नाल द्वारा माता के गर्भाशय से जुड़ जाता है। आंवल नाल द्वारा भ्रूण को पोषक पदार्थ तथा ऑक्सीजन मिलती रहती है और उत्सर्जी पदार्थ तथा CO2 माता के रक्त के माध्यम से शरीर से उत्सर्जित किए जाते रहते हैं।
प्रश्न 12. यदि कोई महिला कॉपरे ‘टी’ का प्रयोग कर रही है तो क्या यह उसकी यौन संचरित रोगों से रक्षा करेगा?
उत्तर : नहीं।
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1. अलैंगिक जनन मुकुलन द्वारा होता है-
(a) अमीबा
(b) यीस्ट
(c) प्लाज्मोडियम
(d) लिस्मानिया |
उत्तर : (b ) यीस्ट |
प्रश्न 2. निम्न में से कौन मानव में मादा जनन तन्त्र का भाग नहीं हैं-
(a) अण्डाशय
(b) गर्भाशय
(c) शुक्रवाहिका
(d) डिम्बवाहिनी।
उत्तर : (c) शुक्रवाहिका ।
प्रश्न 3. परागकोष में होते हैं-
(a) बाह्यदल
(b) अण्डाशय
(c) अण्डप
(d) परागकण |
उत्तर : (d) परागकण ।
प्रश्न 4. अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के क्या लाभ हैं? 
उत्तर : अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के निम्नलिखित लाभ हैं—
(1) लैंगिक जनन में आनुवंशिकी विभिन्नताओं के कारण सन्तानों के लक्षणों में भिन्नता उत्पन्न होती है; यह अलैंगिक जनन द्वारा सम्भव नहीं है।
(2) आनुवंशिक विभिन्नताओं के कारण जीवधारियों के योग्य तथा और अधिक योग्य सदस्य विकसित होते हैं जो अपने वातावरण से अधिक अनुकूलित होते हैं। योग्य सदस्यों का प्राकृतिक चयन निरन्तर होता रहता है। योग्यतम की उत्तरजीविता के कारण जैव विकास (organic evolution) होता है। यह अलैंगिक जनन द्वारा सम्भव नहीं होता ।
(3) लैंगिक जनन के फलस्वरूप नई प्रजातियों की उत्पत्ति (origin of species) होती है। यह अलैंगिक जनन द्वारा सम्भव नहीं होता ।
प्रश्न 5. मानव में वृषण के क्या कार्य हैं?
उत्तर : वृषण के कार्य
(1) यौवनारम्भ या किशोरावस्था की आयु में वृषणों में शुक्रजनन द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
(2) वृषण की अन्तराली कोशिकाओं में नर हॉर्मोन (टेस्टोस्टेरोन-testosterone) स्रावित होते हैं। यह शुक्राणुजनन, द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के विकास तथा सहायक नर जनन अंगों को क्रियाशील बनाए रखने का कार्य करते हैं।
प्रश्न 6. ऋतुस्राव क्यों होता है?
उत्तर : ऋतुस्राव या आर्तव होने के कारण अग्रलिखित हैं-
(1) जन्म के समय ही लड़की के अण्डाशय में हजारों-लाखों अविकसित अण्ड होते हैं। किशोरावस्था या यौवनारम्भ अवस्था में मादा लिंग हॉर्मोन्स (female sex hormones) के स्त्रावित होने पर अण्डाशय के कुछ अण्ड (ova) परिपक्व होने लगते हैं।
(2) प्रत्येक अण्डाशय से प्रत्येक माह ( 28वें दिन ) एक परिपक्व tube) में आ जाता है। इस प्रक्रिया को अण्डोत्सर्ग (ovulation) अण्ड (mature ovum) मुक्त होकर फैलोपियन नलिका (fallopian कहते हैं।
(3) अण्डोत्सर्ग से पूर्व ही गर्भाशय की भीतरी सतह मोटी तथा स्पंजी हो जाती है। इसमें प्राथमिक रसांकुर विकसित हो जाते हैं। इनमें रक्त केशिकाओं का जाल स्थापित हो जाता है। इसके फलस्वरूप गर्भाशय निषेचित अण्ड को ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाता है।
(4) परिपक्व अण्ड का निषेचन फैलोपियन नलिका में होता है।
(5) अण्ड के निषेचित न होने की स्थिति में गर्भाशय में विकसित स्पंजी ऊतक का क्षय हो जाता है। गर्भाशय की नष्ट कोशिकाएँ; मृत अण्ड के साथ योनि से रक्तस्राव के साथ बाहर आ जाती हैं। गर्भाशय ऊतक के. क्षय होते समय रक्त केशिकाएँ भी नष्ट होती हैं, जिसके कारण रक्तस्त्राव होता है। इस प्रक्रिया को ऋतुस्राव या आर्तव (menstruation) कहते हैं।
प्रश्न 7. पुष्प की अनुदैर्घ्य काट का नामांकित चित्र बनाइए ।
उत्तर : पुष्प की अनुदैर्घ्य काट
प्रश्न 8. गर्भनिरोधन की विभिन्न विधियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर : गर्भनिरोधन विधियों का उपयोग करके परिवार का नियोजन या जनसंख्या नियन्त्रण किया जा सकता है। इन निरोधन विधियों को दो समूहों में बाँट सकते हैं।
(क) अस्थायी विधियाँ, (ख) स्थायी विधियाँ ।
(A) अस्थायी विधियाँ
(1) निरोध (Condom ) — जब तक बच्चा न चाहें तब तक लैंगिक सम्पर्क के समय पुरुषों को निरोध का प्रयोग करना चाहिए। निरोध के प्रयोग से गर्भधारण की सम्भावना नहीं रहती है।
(2) अवरोधक उपाय ( Barrier methods ) — इस विधि में योनि के भीतर डायफ्राम का प्रयोग किया जाता है। यह ग्रीवा (cervix) के मुख पर लगा दिया जाता है, स्पर्मीसाइडल क्रीम (spermicidal cream) का प्रयोग भी किया जाता है, जिससे शुक्राणु गर्भाशय में नहीं पहुँच पाते।
(3) अन्तः गर्भाशय युक्ति (Intrauterine device) – इस विधि में गर्भाशय में कॉपर T या अन्य इसी प्रकार की अन्य युक्ति या डिवाइस रोप दी जाती है। जितने समय तक यह डिवाइस गर्भाशय में रहती है, भ्रूण का रोपण गर्भाशय में नहीं हो पाता है।
(4) गर्भनिरोधक गोलियाँ (Contraceptive pills) – ये विभिन्न प्रकार की गोलियाँ हैं, जो प्रतिदिन खाई जाती हैं। इन गोलियों में एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन की निश्चित मात्रा होती है। रुधिर में एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन का निश्चित स्तर बना रहने से पीयूष ग्रन्थि द्वारा FSH तथा LH का स्त्रावण नहीं होता और ग्राफियन पुटिका परिपक्व नहीं होती। बाजार में सहेली, माला-डी आदि नामों से ऐसी गोलियाँ उपलब्ध हैं।
(5) गर्भ समापन (Abortion ) – सावधानी रखने के बावजूद भी यदि गर्भ ठहर जाता है तो ऐसे अनचाहे गर्भ का अस्पताल जाकर महिला चिकित्सक की सलाह से गर्भपात कराया जा सकता है।
(B) स्थायी विधियाँ
(1) पुरुष का ऑपरेशन (Vasectomy ) – यह शुक्र नलिका (vas deferens) का बहुत ही साधारण ऑपरेशन है। इसके उपरान्त गर्भधारण का भय नहीं रहता है, क्योंकि शुक्राणु शरीर से बाहर नहीं आते। इसे वैसेक्टोमी (vasectomy) कहते हैं।
(2) महिला का ऑपरेशन ( Tubectomy ) – यह महिलाओं के लिए परिवार नियोजन का स्थायी उपाय है। इसमें ऑपरेशन करके फैलोपियन नलिकाओं (fallopian tubes) को काटकर बाँध दिया जाता है। इस प्रकार अण्डाणुओं का निर्माण होता रहता है तथा मासिक चक्र भी सामान्य रूप से चलता रहता है किन्तु अण्डाणु फैलोपियन नलिका से आगे नहीं पहुँच पाते हैं। इसे ट्यूबेक्टोमी ( tubectomy) कहते हैं ।
प्रश्न 9. एककोशिक तथा बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति मेंक्या अन्तर है?
उत्तर : एककोशिक तथा बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में भिन्नता
क्र०सं० एककोशिक जीवधारी बहुकोशिक जीवधारी
1. इसमें प्राय: अलैंगिक विधि से जनन होता है। इसमें प्रायः लैंगिक विधि से जनन होता है।
2. जनन के लिए एक ही जीवधारी की आवश्यकता होती है। जनन के लिए नर तथा मादा जीवधारियों की आवश्यकता होती है।
3. इनमें जनन के लिए विशिष्टीकृत कोशिकाएँ जनन कोशिकाएँ नहीं होतीं । इनमें जनन के लिए विशिष्टीकृत जनन कोशिकाएँ पाई जाती हैं।
4. जनन के लिए कोई विशेष अंग नहीं होता। जनन हेतु शरीर में विशेष अंग पाए जाते हैं, जो परस्पर मिलकर जनन तन्त्र बनाते हैं।
5. यह सामान्यतया सूत्री विभाजन द्वारा होता है। इसमें अर्द्धसूत्री विभाजन तथा सूत्री विभाजन दोनों पाए जाते हैं।
प्रश्न 10. जनन किसी स्पीशीज की समष्टि के स्थायित्व में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर : जनन के द्वारा पैतृक पीढ़ी से संतति पीढ़ी का निर्माण होता इस प्रकार प्रजाति की संततियाँ सृष्टि में बनी रहती हैं और प्रजाति को स्थिरता प्राप्त होती है।
प्रश्न 11. गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर : गर्भनिरोधक युक्तियों को अपनाने (adopting ) के निम्नलिखित कारण हैं-
(1) इसके द्वारा संतति नियन्त्रण ( birth control) किया जाता है।
(2) इनके द्वारा जल्दी-जल्दी गर्भधारण को रोका जा सकता है, क्योंकि जल्दी-जल्दी गर्भधारण करने से स्त्री के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(3) इसकी सहायता से देश की जनसंख्या को नियन्त्रित किया जा सकता है।
(4) अनेक गर्भनिरोधक युक्तियों के प्रयोग से लैंगिक संचारित रोगों से बचा जा सकता है।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर
  • विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. जीवधारियों में लैंगिक प्रजनन प्रक्रिया का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर : जीवधारियों में लैंगिक जनन
जीवधारियों (प्राणी एवं पादप) में नर तथा मादा युग्मकों (शुक्राणु तथा अण्डाणु) के संलयन (fusion) के फलस्वरूप युग्मनज (zygote) बनता है। इसे निषेचन कहते हैं। युग्मनज से नए जीवधारी का विकास होता है। निषेचन एक ही जाति के सदस्यों के मध्य होता है। प्राणी सामान्यतया एकलिंगी और पौधे द्विलिंगी होते हैं।
(क) पौधों में लैंगिक जनन
पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन हेतु विशेष संरचनाएँ बनती हैं, इसे पुष्प कहते है। पुष्पों में नर तथा मादा जनन अंग क्रमश: पुंकेसर (stamen) तथा अण्डप (carpel) होते हैं। इसके अतिरिक्त पुष्प में सहायक जनन अंग के रूप में बाह्यदल (sepal) तथा दल (petal) होते हैं। पुष्पीय भाग पुष्पासन (receptacle) पर लगे होते हैं।
पुष्पीय भाग (Floral parts ) – पुष्प के निम्नलिखित भाग होते हैं-
(1) बाह्यदल (Sepals) – यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र बाह्यदलपुंज (calyx) बनाते हैं। ये पुष्प की कलिका अवस्था में रक्षा करते हैं। हरे होने के कारण प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं।
(2) दल (Petals) – ये पुष्प का रंगीन भाग बनाते हैं। दल, बाह्यदल के भीतर की ओर स्थित होते हैं। रंगीन दल कीटों को आकर्षित करने तथा पुष्प के नर व मादा जनन अंगों की सुरक्षा करने का कार्य करते हैं।
(3) पुंकेसर (Stamen ) – ये दलपुंज से घिरे रहते हैं। पुंकेसर पुष्प (पौधे) का नर जनन अंग होते हैं। पुंकेसर के तीन भाग होते हैं— पुंतन्तु, योजि तथा परागकोश । परागकोश (anther) में लघुबीजाणुजनन द्वारा परागकणों (pollen grains) का निर्माण होता है। परागकण में दो नर युग्मक (male gametes) बनते हैं।
(4) अण्डप (Carpel ) – ये पुष्प का केन्द्रीय भाग बनाते हैं। अण्डप पुष्प का मादा जनन अंग होते हैं। प्रत्येक अण्डप के तीन भाग होते | हैं- अण्डाशय, वर्तिका तथा वर्तिका (ovary, style and stigma)।
अण्डाशय में बीजाण्ड (ovule) बनता है। बीजाण्ड में मादा युग्मक बनता है।
परागण (Pollination) – परागकणों की परागकोश से वर्तिकाम पर पहुँचने की क्रिया को परागण कहते हैं। परागण कीट, वायु, जल, पक्षी, जन्तु द्वारा होता है। परागण दो प्रकार का होता है—
(i) स्वपरागण (Self pollination ) – जब एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिका पर या उसी पौधे के अन्य पुष्पों के वर्तिकान पर या कायिक जनन द्वारा तैयार अन्य पौधों के पुष्पों के वर्तिकाप्र पर स्थानान्तरित होते हैं तो इसे स्वपरागण कहते हैं; क्योंकि इनकी जीन संरचना समान होती है।
(ii) परपरागण (Cross pollination ) – जब एक पुष्प के परागकण किसी अन्य पुष्प, जिसकी जीन संरचना भिन्न होती है: के वर्तिका पर पहुँचते हैं तो इसे परपरागण कहते हैं। लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न सन्तानों की जीन संरचना भिन्न होती है।
निषेचन एवं भ्रूणीय विकास (Fertilization_and Development of Embryo ) – परागण के फलस्वरूप परागकण वर्तिकाम पर पहुँचकर अंकुरित होते हैं। परागकण से परागनलिका (pollen tube) निकलती है जो नर युग्मकों को बीजाण्ड (ovule) में स्थित भ्रूणकोष (embryo sac ) में पहुँचाती है। भ्रूणकोष में पहुँचकर परागनलिका फट जाती है और नर युग्मक मुक्त हो जाते हैं। एक नर युग्मक ts कोशिका में मिलकर युग्मनज (zygote) बनाता है। इस प्रक्रिया को वास्तविक निषेचन या युग्मक संलयन (syngamy) कहते हैं। युग्मनज वृद्धि तथा विभाजन द्वारा भ्रूण ( embryo) का निर्माण करता है।
अन्य नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक (secondary nucleus) अथवा दो ध्रुवीय केन्द्रकों से मिलकर त्रिगुणित भ्रूणपोष केन्द्रक (endospermic nucleus) बनाता है। इस प्रक्रिया को त्रिसंलयन कहते हैं। इससे त्रिगुणित भ्रूणपोष (endosperm ) का विकास होता है। भ्रूणपोष विकासशील भ्रूण के लिए भोजन प्रदान करता है।
बीजाण्ड में युग्मक संलयन ( syngamy) तथा त्रिसंलयन (triple fusion) को दोहरा निषेचन ( double fertilization) कहते हैं। निषेचन के पश्चात् बीजाण्ड से बीज तथा सम्पूर्ण अण्डाशय से फल बनता है।
(ख) प्राणियों में लैंगिक जनन
अधिकांश प्राणी एकलिंगी (unisexual) होते हैं। नर प्राणियों में मुख्य जनन अंग वृषण ( testis) तथा मादा प्राणियों में अण्डाशय (ovary) होते हैं। वृषण में शुक्राणुओं (sperms) या नर युग्मकों का और अण्डाशय में अण्ड (अण्डाणु – ovum) या मादा युग्मक का विकास होता है। लैंगिक जनन निम्नलिखित चरणों में पूर्ण होता हैं-
(i) युग्मकजनन ( Gametogenesis ) – वृषण में के शुक्रजनन फलस्वरूप शुक्राणुओं का निर्माण होता है। अण्डाशय में अण्डजनन के फलस्वरूप अण्डाणुओं (ova) का निर्माण होता है। शुक्राणु गतिशील (motile) नर युग्मक हैं और अण्डाणु स्थिर मादा युग्मक होते हैं। युग्मकजनन प्रक्रिया में सूत्री तथा अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। युग्मकों में सूत्रों की संख्या घटकर आधी रह जाती है, इसलिए युग्मक अगुणित कहलाते हैं।
(ii) निषेचन (Fertilization ) – नर युग्मक (शुक्राणु) तथा मादा युग्मक (अण्डाणु) के संलयन से युग्मनज (zygote) का निर्माण होता है। युग्मनज को निषेचित अण्ड (fertilized egg) भी कहते हैं। निषेचित अण्ड से वृद्धि तथा कोशिका विभाजन के फलस्वरूप नवजात शिशु का विकास होता है। निषेचित अण्ड तथा नवजात शिशु के मध्य की अवस्था को भ्रूण ( embryo) कहते हैं।
प्राणियों में निषेचन दो प्रकार से होता है-
(i) बाह्य निषेचन (External fertilization ) – यह मादा के शरीर से बाहर जल में होता है। इसमें नर तथा मादा प्राणी अपने शुक्राणु तथा अण्डाणुओं को शरीर से बाहर जल में छोड़ देते हैं। शुक्राणु जल में sa को निषेचित करके युग्मनज बनाते हैं। बाह्य निषेचन मछलियों तथा उभयचरों में पाया जाता है।
(ii) आन्तरिक निषेचन (Internal, fertilization)— अधिकांश प्राणियों में नर अपने शुक्राणुओं को मादा के शरीर में बाह्य जनन अंग की सहायता से पहुँचा देता है। शुक्राणुओं का स्थानान्तरण मैथुन (copulation) के समय होता है। शुक्राणु मूत्रजनन मार्ग से होते हुए अण्डवाहिनी में अण्डों को निषेचित करते हैं। स्तनी प्राणियों को छोड़कर अन्य सभी प्राणी अण्डज ( oviparous) होते है। अण्डज प्राणी निषेचित अण्डों को सुरक्षित स्थान पर रख देते हैं । भ्रूणीय विकास की निश्चित अवधि के पश्चात् अण्डों से नवजात शिशु मुक्त हो जाते हैं। पक्षी अण्डों को सेते हैं; जैसे—मुर्गी अपने निषेचित अण्डों पर बैठकर उन्हें गर्मी प्रदान करती है। इसके फलस्वरूप अण्डे से चूजा मुक्त होता है। स्तनियों में विकास के फलस्वरूप नवजात शिशु का विकास होता है । स्तनी प्राणी निषेचित अण्डे गर्भाशय में स्थापित हो जाते हैं। निषेचित अण्डे के भ्रूणीय जरायुज (viviparous) कहलाते हैं। मानव भी स्तनी प्राणी है।
प्रश्न 2. किसी पुष्प के जननांगों का वर्णन कीजिए।
अथवा एक पुष्प का चित्र बनाकर उसमें इसके नर तथा मादा जनन भागों को दिखाइए । चित्र में निम्नलिखित को नामांकित कीजिए—
(i) अण्डाशय, (ii) परागकोश, (iii) तन्तु, (iv) वर्तिकाग्र ।
उत्तर : पुष्प के जननांग (Reproductive organs of flowers)—पुष्प पौधों की मुख्य संरचना है। यह जनन में भाग लेता है। पुष्प के विभिन्न भाग बाह्य दल (sepals), दल (petals), पुंकेसर (stamen) तथा अण्डप (carpel) होते हैं। बाह्य दल तथा दल सहायक अंग और पुंकेसर तथा अण्डप जनन अंग कहलाते हैं।
(1) बाह्य दल (Sepals) – ये परस्पर मिलकर बाह्य दलपुंज (calyx) बनाते हैं। ये प्रायः हरे होते हैं। पुष्प की कलिका अवस्था में रक्षा करते हैं। प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
(2) दल (Petals) – ये परस्पर मिलकर दलपुंज (corolla) बनाते हैं। ये कीटों को आकर्षित करके परागण में सहायता करते हैं।
(3) पुंकेसर (Stamens) – यह पुष्प का नर जनन अंग है। ये परस्पर मिलकर पुमंग (androecium) कहलाते हैं। इसके तीन भाग होते हैं—
(i) पुंतन्तु (filament), (ii) योजी ( connective) तथा (iii) परागकोश (anther)।
परागकोश की पालियों में परागधानी (pollen sac) होती है। इनमें परागकण (pollen grains) बनते हैं।
(4) अण्डप (Carpels) – यह पुष्प का मादा जनन अंग है। ये परस्पर मिलकर जायांग (gynoecium) बनाते हैं। प्रत्येक अण्डप के तीन भाग होते हैं-
(i) अण्डाशय (ovary), (ii) वर्तिका (style) तथा (iii) वर्तिकाग्र (stigma)।
अण्डाशय में बीजाण्ड बनते हैं। निषेचन के पश्चात् बीजाण्ड से बीज (seed) तथा अण्डाशय से फल बनता है।
प्रश्न 3. परागण क्या है? परपरागण का वर्णन कीजिए।
उत्तर : परागण (Pollination)— एक पुष्प के परागकण जब उसी जाति के अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं तो इस क्रिया को परागण (pollination) कहते हैं। परागण दो प्रकार से होता है—
(1) स्वपरागण (self pollination) तथा (2) परपरागण (cross pollination)।
परपरागण (Cross pollination ) — जब किसी पुष्प परागकण उसी प्रजाति के अन्य पुष्प, जिसकी जीन संरचना भिन्न होती है, के वर्तिकाग्र पर पहुँचकर उसे परागित करते हैं तो इसे परपरागण (cross pollination) कहते हैं। पौधों में परपरागण कीटों द्वारा, वायु द्वारा, जल द्वारा एवं जन्तुओं द्वारा होता है।
(i) कीटों द्वारा परागण ( Entomophily) — इसके लिए विशेष युक्तियाँ; जैसे— पुष्पों में रंग, सुगन्ध, मकरन्द आदि की उपस्थिति कीटों को आकर्षित करने के लिए अपनायी जाती हैं। कीट परागित पुष्प बड़े ही आकर्षक व भड़कीले होते हैं। इन पुष्पों के वर्तिकाग्र प्रायः चिपचिपे होते हैं। उदाहरण – अंजीर, गूलर, पीपल, आर्क (Calotropis ), सैल्विया आदि में।
(ii) वायु द्वारा परागण (Anemophily) — अनेक पौधों में वायु द्वारा परागण होता है। इसके लिए अनेक युक्तियाँ पाई जाती हैं; जैसे – पुष्प प्राय: छोटे और समूह में लगे होते हैं। पुष्पों में सुगन्ध, मकरन्द और रंग का अभाव होता है। वर्तिकाग्र खुरदरे होते हैं, परागकण हल्के और शुष्क होते हैं। उदाहरण – गेहूँ, मक्का, ज्वार, चीड़ आदि में।
(iii) जल द्वारा परागण ( Hydrophily)— जल में उगने वाले पौधों में जिनके पुष्प जल के ऊपर खिलते हैं; जैसे— कमल, जल- लिली आदि में कीट परागण होता है। जल-निमग्न पौधों में जल परागण होता है। जल परागण के लिए पुष्पों, परागकणों, वर्तिका, वर्तिकाग्र आदि में अनेक अनुकूलन पाए जाते हैं। परागकण हल्के होते हैं, इनका घनत्व इतना होता है कि ये जल में उसी स्तर पर तैर सकें, जिस स्तर पर ये मादा पुष्प के सम्पर्क में आ सकें। अनेक पुष्पों के वृन्त सीधे होकर परागकणों को ग्रहण कर लेते हैं। उदाहरण– वैलिसनेरिया (Vallisneria), इलोडिया (Elodea), हाइड्रिला (Hydrilla), सिरेटोफिलम (Ceratophyllum) आदि में।
(iv) जन्तु परागण (Zoophily) — कुछ पौधों में परागण घोंघो, पक्षियों, चमगादड़ आदि की सहायता से होता है; जैसे—- सेमल, बिगोनिया, कदम्ब आदि में।
परपरागण से लाभ – परपरागण के फलस्वरूप नई प्रजातियाँ | उत्पन्न होती हैं। बीज स्वस्थ तथा अधिक संख्या में उत्पन्न होते हैं।
परपरागण से हानि-पौधों को रंग, मकरन्द, सुगन्ध आदि उत्पादन में काफी भोज्य पदार्थ व्यय करने पड़ते हैं। परपरागण अनिश्चित होता है। प्रजाति की शुद्धता नहीं रह पाती ।
प्रश्न 4. निषेचन की परिभाषा देते हुए पौधों में इसकी क्रियाविधि का सचित्र वर्णन कीजिए।
अथवा नामांकित चित्र की सहायता से पादपों में द्विनिषेचन का वर्णन कीजिए।
अथवा पुष्प की जनन प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर : निषेचन (Fertilization ) — नर तथा मादा युग्मकों के | संलयन को निषेचन कहते हैं। युग्मक अगुणित (n) होते हैं। निषेचन के फलस्वरूप बने युग्मनज (zygote) में गुणसूत्रों की संख्या द्विगुणित (2n) हो जाती है। युग्मनज से भ्रूण ( embryo) का विकास होता है। युग्मक निर्माण तथा निषेचन के फलस्वरूप जीवधारियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या निश्चित बनी रहती है।
परागण (pollination) के फलस्वरूप परागकण (pollen grains) अपनी ही जाति के वर्तिकाम पर पहुँचकर अंकुरित होते हैं। वर्तिका से स्रावित तरल को अवशोषित करके परागकण फूलने लगते हैं। अन्तः चोल (intine ) जनन छिद्र ( germ pore) तथा बाह्य चोल को फाड़कर पराग नलिका के रूप में बाहर निकल आती है। पराग नलिका में जनन केन्द्रक तथा वर्धी केन्द्रक होते हैं। पराग नलिका में जनन केन्द्रक विभाजित होकर दो नर युग्मक (male gametes) बनाता है।
एक पराग नलिका किसी एक बीजाण्ड में प्राय: बीजाण्डद्वार (micropyle) से प्रवेश करती है। पराग नलिका के शीर्ष से कुछ एन्जाइम निकलते हैं, जो इसे आगे बढ़ने तथा आवश्यकता पड़ने पर किसी ऊतक को भेदने में सहायता करते हैं।
बीजाण्ड के अन्दर उपस्थित तथा परिपक्व भ्रूणकोष ( embryo sac) में प्रवेश पाने के बाद पराग नलिका का शीर्ष गल जाता है; दोनों नर | युग्मक भ्रूणकोष के जीवद्रव्य में मुक्त हो जाते हैं और इनमें से एक अण्ड कोशिका के साथ संलयित (fuse) होकर युग्मनज (zygote) का निर्माण करता है। युग्मनज भ्रूण (embryo) का निर्माण करता है।
दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक के साथ संयुग्मित होता है और प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक (endospermic nucleus) का निर्माण करता है। युग्मनज द्विगुणित ( diploid) या 2n (नर n + मादा n ) तथा भ्रूणपोष (endosperm) केन्द्रक त्रिगुणित (triploid) या 3n (नर n + द्वितीयक केन्द्रक n + n) होता है। दो निषेचन होने के कारण ही, आवृतबीजियों में यह क्रिया द्विनिषेचन (double fertilization) कहलाती है।
प्रश्न 5. पुरुष के जनन अंगों का सचित्र वर्णन कीजिए।
अथवा मानव के नर जनन तन्त्र का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर : पुरुष के जनन अंग
मनुष्य में नर और मादा अलग-अलग होते हैं। इनमें लैंगिक भिन्नता पाई जाती है। नर जननांग के अन्तर्गत निम्नलिखित अंग आते हैं—
(1) वृषण (Testes) – पुरुष में एक जोड़ा वृषण (testes) उदरगुहा से बाहर, थैले जैसी रचनाओं, वृषण कोष (scrotal sac) में सुरक्षित रहते हैं। प्रत्येक वृषण के अन्दर अनेक अत्यन्त महीन तथा कुण्डलित नलिकाएँ, शुक्र नलिकाएँ (seminiferous tubules) होती हैं। इनमें जनन कोशिकाएँ ( germ cells) शुक्राणुजनन की क्रिया के द्वारा शुक्राणु (sperms) का निर्माण करती हैं।
(2) अधिवृषण या एपिडिडाइमिस (Epididymis) – ये शुक्राणु अन्य अनेक नलिकाओं में होते हुए वृषण के बाहर स्थित एक अति कुण्डलित नलिका, से बने एपिडिडाइमिस (epididymis) में आते हैं। यह संरचना वृषण कोष में ही स्थित होती है।
(3) शुक्रवाहिनी (Vas deferens) — इसकी अन्तिम नली अपेक्षाकृत मोटी शुक्रवाहिनी (vas deferens) होती है। शुक्राणु शुक्रवाहिनी के द्वारा उदरगुहा में स्थित एक शुक्राशय में पहुँचते हैं।
(4) शुक्राशय (Seminal vesicle ) — यह थैलीनुमा रचना होती है। शुक्रवाहिनी उदरगुहा में पहुँचने पर मूत्रनली (ureter) के साथ फन्दा (loop) बनाती है। शुक्राणु शुक्राशय में एकत्रित रहते हैं। शुक्राशय से पोषक तरल स्रावित होता है। शुक्राणुओं सहित इस तरल पदार्थ को वीर्य (semen) कहा जाता है।
(5) मूत्र मार्ग (Urethra) – शुक्राशय एक सँकरी नली के द्वारा, जिसे स्खलन नलिका ( ejaculatory duct) कहते हैं, मूत्राशय (urinary bladder) के सँकरे भाग मूत्र मार्ग (urethra) में खुलता है। पुरुष में मैथुन की क्रिया के लिए मूत्र मार्ग एक मांसल अंग शिश्न (penis) में स्थित होता है। बाद में यह एक छिद्र द्वारा बाहर खुलता है। इस छिद्र को मूत्र – जनन छिद्र कहते हैं। मैथुन के समय शिश्न भग (vulva) के द्वारा मादा की योनि (vagina) में प्रवेश करके वीर्य को शरीर के अन्दर भेजने का कार्य करता है। शिश्न साधारण अवस्थाओं में मुलायम होता है। किन्तु उत्तेजना की अवस्था में इसके रुधिर कोटरों (blood sinuses) में रुधिर भर जाने से यह कड़ा हो जाता है।
(6) प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate gland) – इन अंगों के अतिरिक्त कई प्रकार की सहायक ग्रन्थियाँ; जैसे— प्रोस्टेट (prostate), काउपर्स (Cowper’s), पेरीनिअल (perineal) आदि; होती हैं जो वीर्य बनाने, शुक्राणुओं के पोषण और उनको जीवित रखने में सहायता करती हैं।
प्रश्न 6. स्त्री के जनन अंगों का सचित्र वर्णन कीजिए।
अथवा स्त्री के जनन तन्त्र का नामांकित चित्र प्रस्तुत कीजिए ।
उत्तर : स्त्री (मादा) के जननांग
मादा जनन तन्त्र में निम्नलिखित अंग होते हैं-
(1) अण्डाशय (Ovary) – स्त्री में एक जोड़ा अण्डाशय (ovaries) होते हैं। ये अण्डाकार भूरे रंग की रचनाएँ हैं तथा उदरगुहा में स्थित होती हैं। अण्डाशय के अन्दर जनन कोशिकाओं से अण्डजनन की क्रिया के द्वारा अण्डे (ova) बनते हैं।
(2) अण्डवाहिनी (Oviduct ) – प्रत्येक अण्डाशय के पास ही एक कीप की तरह की रचना, मुखिका (oviducal funnel) होती है, जो एक कुण्डलित तथा सँकरी अण्डवाहिनी (oviduct) या फैलोपियन नलिका (fallopian tube) में खुलती है। अण्डाशय से अण्ड (ovum) इसी मुखिका के द्वारा नलिका में आता है, जहाँ परिपक्व ( matured) अवस्था में होने पर नर द्वारा मैथुन से प्राप्त शुक्राणु (sperms) इसे मिलते हैं। इनमें से एक शुक्राणु इसके साथ संयोजित होकर निषेचन की क्रिया.. करता है।
(3) गर्भाशय (Uterus ) — फैलोपिअन नलिका का दूसरा सिरा चौड़ा होकर गर्भाशय (uterus) का निर्माण करता है। निषेचित धीरे-धीरे खिसककर इसी गर्भाशय में स्थापित हो जाता है और गर्भाशय की दीवार पर एक विशेष ऊतक जरायु (placenta ) से जुड़कर माता के शरीर से पोषण प्राप्त करके धीरे-धीरे क्रमश: भ्रूण (embryo) और फिर शिशु के रूप में विकसित होता है।
(4) योनि (Vagina ) — दोनों ओर के गर्भाशय मिलकर एक सम्मिलित चौड़ा भाग बनाते हैं। इसे योनि (vagina) कहते हैं। मैथुन के समय शुक्राणुयुक्त वीर्य नर द्वारा योनि में ही विसर्जित किया जाता है। (5) भग (Vulva ) – यह भाग योनि छिद्र या भग (vulva) के द्वारा बाहर खुलता है। योनि छिद्र को सुरक्षित रखने के लिए विशेष मांसल ओष्ठ – बाह्य तथा अन्तः ओष्ठ आदि होते हैं। इसी स्थान पर एक छोटा-सा मांसल उभार भी होता है। यह भगशेफ या क्लांइटोरिस (clitoris) कहलाता है तथा मादा में शिश्न का अवशेष समझा जाता है।
कुछ सहायक ग्रन्थियाँ; जैसे- बार्थोलिन ( Bartholin’s) आदि होती हैं जो विशेष प्रकार के तरल और चिकने पदार्थ बनाती हैं। ये पदार्थ योनि व योनि मार्ग को जीवाणुरोधक व चिकना बनाए रखते हैं।
प्रश्न 7. एड्स रोग के कारक, कारक की संरचना तथा बचाव के उपायों का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर : एड्स
कारक (Agent ) — यह रोग HIV के कारण होता है। HIV का पूरा नाम ‘मानव प्रतिरक्षा न्यूनता विषाणु’ (Human Immunodeficiency Virus) है। यह विषाणु मानव शरीर में पहुँचकर प्रतिरक्षा तन्त्र (immunity system) की प्रमुख कोशिकाओं लिम्फोसाइट्स T4 तथा TH को नष्ट करते हैं। शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसके फलस्वरूप रोगी संक्रामक रोगों से पीड़ित होकर मर जाता है। एड्स (AIDS) का पूरा नाम उपार्जित प्रतिरक्षा न्यूनता सिण्ड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome) है। इस रोग का ज्ञान 1981 में हुआ तथा इसके विषाणु की खोज 1983 में हुई।
HIV का संक्रमण ( Infection of HIV) – HIV का संक्रमण संक्रमित व्यक्तियों के साथ सम्भोग, समलैंगिक सम्भोग, सन्दूषित (infected) रक्त, मादक पदार्थों के आदी व्यक्तियों द्वारा साझा इंजेक्शन की सुई के प्रयोग से फैलता है।
HIV की संरचना (Structure of HIV) – यह लगभग 90-120 nm व्यास का गोलाकार विषाणु होता है। इसमें एकसूत्री RNA के दो समान टुकड़े होते हैं। यह चारों ओर से ग्लाइकोप्रोटीन्स के दोहरे, आवरण से घिरा रहता है। इसकी सतह पर अनेक सवृन्त खूँटी सदृश घुडियाँ (knobs) निकली रहती हैं।
संक्रमित व्यक्तियों में थकावट, ज्वर, सिरदर्द, खाँसी, कमजोरी, अतिसार आदि प्रारम्भिक लक्षण प्रदर्शित होते हैं। बाद में त्वचा पर सफेद चकत्ते दिखाई देने लगते हैं। अन्त में व्यक्ति संक्रमित रोगों से प्रभावित होकर मर जाता है।
एड्स से बचाव (Protection from AIDS) – HIV से बचाव के लिए एड्स रोग की जानकारी आवश्यक है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं—
(1) रक्त आधान के समय यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि रक्त HIV मुक्त हो।
(2) इंजेक्शन की सुई का प्रयोग एक बार ही करना चाहिए।
(3) लैंगिक सम्बन्ध स्थापित करने में सावधानी बरतनी चाहिए। सम्भोग के समय कॉण्डोम का प्रयोग करना चाहिए। एक से अधिक व्यक्तियों के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करने से बचना चाहिए।
(4) जीनी प्रौद्योगिकी (gene technology) द्वारा रोग की रोकथाम के प्रयास किए जा रहे हैं। इसका टीका (vaccine) अभी तैयार नहीं हो सका है।
(5) जनसाधारण का ध्यान आकर्षित करने के लिए हर वर्ष एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस (World AIDS Day) मनाया जाता है। ।
  • लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. अलैंगिक जनन के विभिन्न प्रकारों को लिखिए।
अथवा जनन के सम्बन्ध में प्रयुक्त विखण्डन तथा पुनर्जनन पदों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : अलैंगिक जनन के प्रकार (Types of Asexual reproduction ) – यह निम्न विधियों द्वारा होता है—
(1) विखण्डन (Fission ) – यह द्विविखण्डन या बहुविखण्डन विधि से हो सकता है। इसके फलस्वरूप क्रमश: एक जीव से दो जीव और एक जीव से अनेक जीव बन जाते हैं।
(2) मुकुलन (Budding) — इसमें कायिक शरीर पर एक साथ एक या अनेक मुकुल (buds) बनकर शरीर से पृथक् हो जाती हैं।
(3) बीजाणुजनन ( Spore formation ) — कवक प्रायः बीजाणुओं द्वारा अलैंगिक जनन करते हैं।
(4) पुनरुद्भवन या पुनर्जनन (Regeneration ) —शरीर के क्षतिग्रस्त भागों के पुन: निर्माण को पुनर्जनन या पुनरुद्भवन कहते हैं।
(5) कायिक प्रवर्धन (Vegetative propagation ) — पौधों के भूमिगत तने, परिपक्व शाखाओं के टुकड़ों (कलम) द्वारा, गूटी बाँधकर दाब लगाकर, ग्राफ्टिंग द्वारा नए पौधे तैयार किए जा सकते हैं।
(6) अनिषेकजनन (Parthenogenesis) – अनिषेचित अण्ड से नए जीव का विकास हो जाता है।
प्रश्न 2. कायिक प्रवर्धन के लाभ बताइए ।
उत्तर : कायिक प्रवर्धन (Vegetative propagation) के निम्नलिखित लाभ हैं-
(1) यह तकनीक उन पौधों में प्रयुक्त की जाती है जिनमें जीवनक्षम बीजों का उत्पादन नहीं होता या बहुत कम बीज उत्पन्न होते हैं।
(2) इस तकनीक द्वारा पौधों की शुद्धता बनी रहती है।
(3) इस तकनीक द्वारा तैयार पौधे कम समय में फल देने लगते हैं।
(4) इस विधि से इच्छानुसार फूल एवं फलों को उत्पन्न किया जा सकता है और एक ही पौधे से विभिन्न स्वाद के फल एवं विभिन्न रंगों के पुष्प उत्पन्न किए जा सकते हैं।
प्रश्न 3. लैंगिक प्रजनन को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर : लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction ) — जीवधारियों (प्राणी एवं पादप) में नर तथा मादा युग्मकों के संलयन (fusion) के फलस्वरूप द्विगुणित युग्मनज (zygote) का निर्माण होता है। इसे निषेचन (fertilization) कहते हैं। प्राणियों में शुक्राणु (sperm) नर युग्मक तथा | अण्डाणु मादा युग्मक होते हैं। युग्मनज (zygote) से नए जीव का विकास होता है। निषेचन एक ही जाति के नर तथा मादा जीवों के मध्य होता है। अधिकांश प्राणी एकलिंगी (unisexual) होते हैं। कुछ प्राणी द्विलिंगी भी होते हैं; जैसे—केंचुआ, फीताकृमि आदि। पौधे सामान्यतया द्विलिंगी होते हैं।
लैंगिक प्रजनन की क्रिया निम्नलिखित चरणों में पूर्ण होती है—
(i) युग्मकजनन ( Gametogenesis ) — इसके फलस्वरूप नर तथा मादा युग्मक बनते हैं।
(ii) निषेचन (Fertilization ) — नर तथा मादा युग्मकों का संलयन निषेचन कहलाता है। निषेचन बाह्य या आन्तरिक होता है।
(iii) भ्रूणीय विकास (Embryonic development ) द्विगुणित युग्मनज से वृद्धि तथा विभाजन द्वारा भ्रूण विकसित होता है।
प्रश्न 4. मानव अण्डाशय के किन्हीं दो कार्यों को लिखिए। 
उत्तर : मानव अण्डाशय के कार्य
(1) अण्डाशय से एस्ट्रोजन (estrogens), प्रोजेस्टेरोन (progesterone) तथा रिलैक्सिन ( relaxin) हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं।
(i) एस्ट्रोजन्स (Estrogens ) – इसके कारण लैंगिक परिपक्वता तथा द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास होता है।
(ii) प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) – यह कॉर्पस ल्यूटियम से स्त्रावित होता है। यह गर्भधारण की दशाओं को स्थापित करता है।
(iii) रिलैक्सिन (Relaxin) – यह शिशु जन्म में सहायक होता है ।
(2) अण्डाशय की ग्राफियन पुटिकाओं (graffian follicles ) से अण्ड (ovum) या मादा युग्मक अण्डोत्सर्ग (ovulation) द्वारा मुक्त होता है। निषेचन के पश्चात् अण्ड (युग्मनज) से भ्रूण का विकास होता है।
प्रश्न 5. पौधों में द्विनिषेचन का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : पौधों में द्विनिषेचन
पराग नलिका नर युग्मकों को भ्रूणकोष (embryo sac) में मुक्त कर देती है। एक नर युग्मक अण्ड कोशिका से संलयन करके युग्मनज (zygote) का निर्माण करता है। यह द्विगुणित ( diploid) होता है। इसे वास्तविक निषेचन या संलयन (syngamy) कहते हैं। युग्मनज वृद्धि तथा विभाजन द्वारा भ्रूण ( embryo) का निर्माण करता है ।
दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक (2x) या दो अगुणित ध्रुव केन्द्रकों (polar nuclei ) से मिलकर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक (primary endospermic nucleus ) बनाता है। इससे भ्रूणपोष (endosperm ) का विकास होता है, इसे त्रिसंलयन (triple fusion) कहते हैं । भ्रूणपोष विकासशील भ्रूण को भोजन प्रदान करता है।
संयुग्मन (syngamy) तथा त्रिसंलयन को संयुक्त रूप से द्विनिषेचन (double fertilization) कहते हैं।
प्रश्न 6. मानव में नर जनद ( gonads) क्या हैं? इनके कार्य इंगित कीजिए ।
उत्तर : मानव के जनद (Gonads of Man) – मानव एकलिंगी (unisexual) होता है। नर तथा मादा जनन अंग (gonads) क्रमश: पुरुष और स्त्री में पाए जाते हैं। पुरुष और स्त्री को द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है।
नर जनन अंग या जनद
पुरुष में निम्नलिखित जनन अंग होते हैं—
(i) वृषण (Testes) – इनमें शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
(ii) शुक्रवाहिनी (Vas deferens ) — यह शुक्राणुओं को शुक्राशय तक पहुँचाती हैं।
(iii) शुक्राशय (Seminal vesicles) – इससे स्रावित क्षारीय तरल शुक्राणुओं के साथ मिलकर वीर्य (semen) बनाता है।
(iv) मूत्र मार्ग (Urethra) – मूत्र मार्ग से मूत्र तथा वीर्य शिश्न पर स्थित मूत्र – जनन छिद्र द्वारा शरीर से बाहर निकलता है।
(v) शिश्न ( Penis) – यह मैथुन में सहायता करता है। शुक्राणुओं को मादा की योनि में पहुँचाता है।
(vi) सहायक जनन ग्रन्थियाँ (Accessory genital glands) – मैथुन में सहायता करती हैं।
प्रश्न 7. मानव के मादा जनद क्या हैं? इनके कार्य इंगित कीजिए।
उत्तर : मादा जनन तन्त्र
स्त्री में निम्नलिखित जनन अंग पाए जाते हैं-
(i) अण्डाशय (Ovary) – इनमें अण्डाणुओं तथा जनन हॉर्मोन का निर्माण होता है।
(ii) अण्डवाहिनी (Oviduct ) — इसका प्रारम्भिक कीपनुमा भाग अण्डाशय से अण्डाणु को ग्रहण करता है। अण्डवाहिनी के प्रारम्भिक भाग फैलोपियन नलिका (fallopian tube) में अण्डाणु का निषेचन होता है। इसके पश्च भाग गर्भाशय में भ्रूण (embryo) का विकास होता है।
(iii) योनि (Vagina ) – यह मादा जनन छिद्र या भग (vulva) द्वारा शरीर से बाहर खुलती है।
(iv) क्लाइटोरिस (Clitoris) – यह अविकसित शिश्न के रूप में होता है।
(v) सहायक जनन ग्रन्थियाँ (Accessory genital glands) – ये मैथुन में सहायता करती हैं।
प्रश्न 8. पुरुष तथा स्त्री के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : पुरुष के द्वितीयक लैंगिक लक्षण (Secondary sexual characters of male) – वृषण में उत्पन्न टेस्टोस्टेरोन (testosterone) हॉर्मोन्स के कारण द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास होता है। ये परिवर्तन 15 से 18 वर्ष की आयु में होते हैं—
(i) शरीर का सुडौल एवं शक्तिशाली होना,
(ii) कन्धों का चौड़ा होना,
(iii) दाढ़ी-मूँछ का निकलना,
(iv) आवाज का भारी होना आदि ।
स्त्रियों के द्वितीयक लैंगिक लक्षण (Secondary sexual characters of female) – अण्डाशय से स्रावित एस्ट्रोजन (estrogen) हॉर्मोन्स के कारण यौवनारम्भ (puberty) अवस्था प्रारम्भ होती है। द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के कारण निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं—
(i) स्तनों की वृद्धि तथा विकास।
(ii) श्रोणि मेखला तथा नितम्बों का चौड़ा होना ।
(iii) आर्तव चक्र या रजोधर्म या ऋतुस्राव या मासिक धर्म (menstrual cycle) का प्रारम्भ होना ।
(iv) बाह्य जनन अंगों का विकसित होना ।
उपर्युक्त परिवर्तन लड़कियों में 11 से 14 वर्ष की आयु में प्रारम्भ हो जाते हैं।
प्रश्न 9. आर्तव चक्र का वर्णन कीजिए।
अथवा एक सामान्य स्वस्थ स्त्री के आर्तव चक्र में अण्डोत्सर्ग कब होता है?
अथवा रजोनिवृत्ति क्या होती है?
उत्तर : स्त्री में मासिक धर्म या आर्तव चक्र
मासिक धर्म अथवा आर्तव चक्र स्त्रियों की एक प्राकृतिक शारीरिक क्रिया है। इसे मासिक स्त्राव, रजोधर्म या ऋतुस्त्राव भी कहा तरल स्रावित होता है जो सामान्य रूप से 3-6 दिन तक चलता है। यह जाता है। मासिक स्राव में योनि मार्ग से कुछ गाढ़े लाल रंग का रक्त मिला प्रतिमाह 28 दिन उपरान्त प्रारम्भ होता है। रजोधर्म के प्रारम्भ होने के 12 से 14 दिन उपरान्त अण्डाशय से अण्ड निकलता है अर्थात् अण्डोत्सर्ग (ovulation) होता है।
सामान्य रूप से 12-15 वर्ष की आयु में आकर कन्याओं को मासिक धर्म प्रारम्भ होता है । यौवनारम्भ के समय रजोधर्म प्रारम्भ होने को रजोदर्शन (menarche ) कहते हैं। स्वास्थ्य एवं जलवायु के भिन्न होने पर मासिक धर्म के प्रारम्भ होने की आयु कम या अधिक भी हो सकती है। ठण्डी जलवायु की अपेक्षा गर्म जलवायु में यह स्राव कम आयु में ही प्रारम्भ हो जाता है। सामान्यतः 45-50 वर्ष की आयु तक स्त्रियों को मासिक स्त्राव होता रहता है। इसके बाद यह स्थायी रूप से बन्द हो जाता है। इस प्रक्रिया को रजोनिवृत्ति (menopause) कहते हैं। केवल गर्भधारण काल में मासिक धर्म नहीं होता। प्रसव के उपरान्त कुछ समय के पश्चात् पुनः स्वाभाविक रूप से यह होने लगता है। मासिक स्त्राव का प्रारम्भ होना युवा अवस्था के आगमन का प्रतीक होता है। मासिक स्त्राव वास्तव में, गर्भाशय में स्थित श्लेष्मक झिल्ली के फट जाने के परिणामस्वरूप होता है। मासिक स्त्राव के उपरान्त यह झिल्ली पुनः विकसित हो जाती है। नियमित रूप से मासिक स्राव का होते रहना अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है।
प्रश्न 10. लैंगिक संचारित रोगों को परिभाषित कीजिए और इनके दो उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर : लैंगिक संचारित रोग (Sexually transmitted disease) – लैंगिक संचारित रोग (STD) लैंगिक सम्बन्धों के कारण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संचारित होते हैं; जैसे— एड्स, सुजाक, सिफलिस आदि। ये रोग सामान्यतया एक से अधिक व्यक्तियों के साथ यौन सम्बन्धों के कारण फैलते हैं। इसलिए रोगों से बचाव के लिए अवैध यौन सम्बन्धों से बचना चाहिए।
(1) आतशक या सिफलिस (Syphilis) – यह लैंगिक सम्बन्धों द्वारा फैलने वाला रोग है। इसे वेनेरल रोग या लैंगिक रोग (venereal disease) भी कहते हैं। आतशक का कारक ट्रीपोनीमा पैलिडम (Treponema pallidum) नामक जीवाणु है। इस रोग में धीमा ज्वर रहता है तथा जनन अंगों में घाव हो जाते हैं। रोग के पुराना होने पर यकृत, अस्थियाँ, मस्तिष्क तथा हृदय भी प्रभावित हो जाता है। मस्तिष्क के संक्रमित ‘होने से लकवा (paralysis) हो सकता है।
उपचार- पेनिसिलिन नामक एण्टीबायोटिक्स से लाभ होता है।
(2) सुजाक या गोनोरिया (Gonorrhoea) – यह भी लैंगिक सम्बन्धों द्वारा फैलने वाला लैंगिक रोग (venereal disease) है। सुजाक का कारक नीसेरिया गोनोरी ( Neiseria gonorroeae) नामक जीवाणु है। इस संक्रमण में जनन तन्त्र की श्लेष्मा प्रभावित होती है तथा उसमें घाव हो जाते हैं। संक्रमण शरीर के दूसरे अंगों में भी फैल जाता है। स्त्री में बंध्यता हो जाती है। मूत्र की अम्लीयता के कारण अत्यधिक जलन होती है। बाद में संक्रमण के कारण प्रोस्टेट ग्रन्थि तथा मूत्राशय भी प्रभावित हो जाता है। स्त्रियों में संक्रमण का कोई प्रभाव नहीं होता, लेकिन स्त्रियाँ इस रोग के वाहक का कार्य करती हैं।
उपचार – एण्टीबायोटिक्स के प्रयोग से लाभ होता है।
प्रश्न 11. अलैंगिक जनन तथा लैंगिक जनन में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : अलैंगिक तथा लैंगिक जनन में अन्तर
क्र०सं० अलैंगिक जनन लैंगिक जनन
1. एक ही जनक द्वारा सन्तान की उत्पत्ति होती है। सन्तान की उत्पत्ति के लिए दो जनकों का होना आवश्यक है।
2. समसूत्री कोशिका विभाजन होता है। अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन द्वारा युग्मक बनते हैं।
3. निषेचन नहीं होता है। निषेचन होता है।
4. सन्तान पूर्णतया जनक के समान गुणों वाली होती है। सन्तान में दोनों जनकों के गुण पाए जाते हैं।
प्रश्न 12. शुक्रजनन तथा अण्डजनन में अन्तर लिखिए ।
उत्तर : शुक्रजनन तथा अण्डजनन में अन्तर
क्र०सं० शुक्राणुजनन अण्डाणुजनन
1. शुक्राणुजनन की प्रक्रिया वृषणों में होती है। अण्डाणुजनन की प्रक्रिया अण्डाशयों में होती है।
2. वृद्धि प्रावस्था छोटी होती है। वृद्धि प्रावस्था बहुत लम्बी होती है।
3. एक प्राथमिक शुक्राणु कोशिका से चार शुक्राणुओं का निर्माण होता है। एक प्राथमिक अण्डाणु कोशिका से एक अण्डाणु तथा तीन लोपिकाओं (polar bodies) का निर्माण होता है।
4. स्पर्मेटिड्स के कायान्तरण से शुक्राणुओं का निर्माण होता है। अण्डाणु में कोई कायान्तरण नहीं होता है।
5. शुक्राणु निर्माण से पूर्व ही दोनों अर्द्धसूत्री विभाजन पूर्ण हो जाते हैं। दूसरा अर्द्धसूत्री विभाजन अण्डाणु में शुक्राणु के प्रवेश के पश्चात् पूर्ण होता है।
प्रश्न 13. जनसंख्या वृद्धि के चार कारण लिखिए।
उत्तर : जनसंख्या वृद्धि के कारण
जनसंख्या वृद्धि के निम्नलिखित कारण हैं—
(1) रहन-सहन का स्तर – हमारे देश की जनता का रहन-सहन का स्तर निम्न है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली अधिकांश जनता निर्धन है। वह इस बात में विश्वास करती है कि जितने अधिक बच्चे होंगे, वे काम करके अधिक धनोपार्जन करेंगे। अतः निर्धन परिवार के लोग जनसंख्या नियन्त्रण पर ध्यान नहीं देते हैं।
(2) निरक्षरता – भारत की अधिकांश जनता निरक्षर है। अतः वह छोटे परिवार के महत्त्व को नहीं जानती है, इस कारण से अज्ञानतावश अनवरत् सन्तानोत्पत्ति होती रहती है।
(3) सामाजिक रीति-रिवाज – हमारे देश में बच्चों को ईश्वर की देन माना जाता है। किसी भी प्रकार के परिवार नियोजन के उपायों को अपनाना ईश्वर की अवहेलना माना जाता है। पुत्र/पुत्री का विवाह एक आवश्यक धार्मिक कर्त्तव्य माना जाता है। परिवार में पुत्र का जन्म भी आवश्यक माना जाता है। यह कहा जाता है कि वंश का नाम पुत्र से ही चलता है। पितरों का ऋण भी तभी उतरता है, जब पुत्र उत्पन्न हो जाए। अतः पुत्र प्राप्ति की कामना में लोग कई सन्तानों को पैदा कर देते हैं।
(4) कम आयु में विवाह – ग्रामीण तथा अशिक्षित परिवारों में आज भी बाल-विवाह की प्रथा का प्रचलन है। कानूनी प्रतिबन्धों के बावजूद कम आयु में ही अनेक विवाह सम्पन्न हो जाते हैं जिसके कारण कम आयु में ही ये दम्पति सन्तानें उत्पन्न करने लगते हैं।
प्रश्न 14. स्वपरागण की अपेक्षा परपरागण अधिक उपयोगी है, क्यों? 
उत्तर : स्वपरागण की अपेक्षा परपरागण ही उपयुक्त है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-
(1) स्वपरागण से बनने वाले बीज हल्के, छोटे व दुर्बल होते हैं। इस कारण इन बीजों से उत्पन्न पौधे भी दुर्बल होते हैं। इनमें प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। परपरागण बने बीज अपेक्षाकृत बड़े, स्वस्थ तथा संख्या में अधिक होते हैं। इनसे उत्पन्न पौधे भी अधिक मजबूत, अधिक प्रतिरोधक क्षमता वाले होते हैं।
(2) स्वपरागण से पौधों में विभिन्नताएँ नहीं आ पातीं; अतः नवीन जातियों के उत्पन्न होने में बाधा उत्पन्न होती है।
परपरागण से नवीन जातियाँ उत्पन्न करने में बहुत सहायता मिलती है; क्योंकि प्रत्येक सन्तति में कुछ-न-कुछ नवीन विभिन्नताएँ होती ही हैं।
(3) परपरागण के होने पर ही कृत्रिम परागण करके नई तथा आवश्यक गुणयुक्त जातियाँ उत्पन्न की जाती हैं। स्वपरागण से यह सम्भव नहीं है।
प्रश्न 15. वायु परागित पुष्पों की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर : (1) वायु परागित पुष्पों के वर्तिकाग्रं रोमयुक्त अथवा चिपचिपे होते हैं।
(2) सामान्य से अधिक चपटे या टोपी के समान होते हैं।
(3) ये ऐसे स्थान पर निकले रहते हैं जहाँ वायु में आने वाले परागकण इनमें उलझ सकें अथवा चिपक सकें।
प्रश्न 16. पुंकेसर तथा जायांग के भिन्न समय पर परिपक्व होने की दशा को क्या कहते हैं? इससे क्या लाभ हैं?
उत्तर : इस दशा को भिन्नकालपक्वता (dichogamy) कहते हैं। पहले पुंकेसर के परिपक्व होने से पूर्व पुंपक्व (protandrous) तथा अण्डपों के परिपक्व होने पर पूर्व स्त्रीपक्व (protogynous) कहा जाता है। इसके फलस्वरूप पुष्पों में स्वपरागण की क्रिया नहीं हो सकती।
प्रश्न 17. रात्रि में खिलने वाले पुष्प सुगन्धित एवं श्वेत होते हैं, क्यों? 
उत्तर : कीटों को परागण के लिए आकर्षित करने के लिए पौधों में अनेक प्रकार के संसाधन व रूपान्तर होते हैं। रात्रि के समय खिलने वाले पुष्पों में रंग की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। ये गन्ध ( smell) से ही दूर से पहचाने जा सकते हैं। अतः ये पुष्प सफेद तथा सुगन्धित होते हैं।
प्रश्न 18. मक्का के भुट्टे के रेशमी तन्तुओं के शीर्ष भाग को काट देने पर दाने नहीं बनते, क्यों?
उत्तर : मक्का में वायु द्वारा परपरागण होता है। इस क्रिया में नर पुष्पों से जो परागकण वायु के झोंके में आते हैं वे भुट्टे की वर्तिकाओं के अगले भाग वर्तिकाग्रों (stigmas) पर ग्रहण किए जाते हैं। प्रारम्भ में ही यदि इन वर्तिकाओं को काट दिया जाता है तो परागण की क्रिया सफल हो ही नहीं सकती। फलस्वरूप निषेचन की क्रिया नहीं हो सकती । निषेचन न होने से फल और बीजों का निर्माण नहीं हो सकता है। अतः भुट्टे में दाने नहीं बनते हैं।
प्रश्न 19. कीट परागित तथा वायु परागित पुष्पों में क्या भिन्नता होती है?
उत्तर : कीट परागित एवं वायु परागित पुष्पों में भिन्नता
क्र०सं० कीट परागित पुष्प वायु परागित पुष्प
1. पुष्प – आकर्षक, रंगीन, बड़े, सुगन्धित, मकरन्दयुक्त होते हैं। पुष्प – अनाकर्षक रंगहीन, गन्धहीन होते हैं।
2. परागकण – प्रायः चिपचिपे, कंटकयुक्त तथा उलझने योग्य कवच वाले होते हैं। संख्या भी अपेक्षाकृत कम होती है। परागकण – हल्के, शुष्क तथा अत्यधिक संख्या में उत्पन्न होते हैं।
3. वर्तिकाग्र रोमयुक्त अथवा चिपचिपा होता है। अपेक्षाकृत चपटा या टोपी की तरह होता है। वर्तिकाग्र (stigma ) लम्बा प्रायः रोमयुक्त अथवा चिपचिपा होता है। ये वायु में लटके रहते हैं।
4. परागकण कीट के शरीर पर चिपककर या उलझकर पहुँचते हैं। अपेक्षाकृत कम संख्या में नष्ट होते हैं। परागकण वायु में तैरकर वर्तिका पर पहुँचते हैं। अत्यधिक संख्या में व्यर्थ जाते हैं।
प्रश्न 20. परागण तथा निषेचन में अन्तर लिखिए ।
उत्तर : परागण तथा निषेचन में अन्तर
क्र०सं० परागण निषेचन
1. परागकोशों में बने परागकण उसी जाति के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। नर तथा मादा युग्मकों का संयुक्त होना है।
2. परपरागण के लिए अनेक प्रकार के साधनों की आवश्यकता होती है; जैसे – वायु, जल, कीट-पतंगे आदि। पराग नलिका के अण्डाशय तथा अन्त में बीजाण्ड के अन्दर प्रवेश करने के बाद होती है। किसी साधन की आवश्यकता नहीं है।
3. यह क्रिया पहले होनी आवश्यक है। यह क्रिया परागण के बिना नहीं हो सकती है।
प्रश्न 21. प्रारूपिक बीजाण्ड का नामांकित चित्र बनाइए । 
उत्तर : प्रारूपिक बीजाण्ड की संरचना
प्रश्न 22. बीजाण्ड तथा बीज में अन्तर कीजिए ।
उत्तर : बीजाण्ड तथा बीज में अन्तर
बीजाण्ड से ही बीज बनता है। बीजाण्ड में एक भ्रूणकोष उसका युग्मकोद्भिद है जिसमें आठ अगुणित गुणसूत्रों वाली कोशिकाएँ होती हैं। इनमें से अण्डकोशिका के निषेचन से ही बीज में उपस्थित भ्रूण का निर्माण होता है। अत: बीजाण्ड अण्डाशय में बीजाण्डासन से जुड़ा रहता है, जबकि बीज बनने तक अण्डाशय फल में बदल जाता है, बीज इसमें वृन्तक से जुड़ा रहता है।
बीड में बीजाण्डकाय होता है। इसमें भोजन संचित रहता है। इस प्रकार की संरचना बीज में नहीं होती। इसमें भ्रूषपोष में भोजन संचित हो सकता है, अन्यथा भ्रूण के बीजपत्रों में ही भोजन एकत्रित रहता है।
प्रश्न 23. यौन संचारित रोगों के नियन्त्रण में तीन सामान्य सावधानियाँ लिखिए।
उत्तर : (i) असुरक्षित यौन सम्बन्ध स्थापित करने से बचना चाहिए ।
(ii) HIV संक्रमित व्यक्ति से यौन सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहिए।
(iii) कॉण्डोम का प्रयोग करना चाहिए।
(iv) वेश्यागमन तथा समलैंगिकता से बचना चाहिए।
  • अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. निषेचन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर : निषेचन (Fertilization ) — दो अगुणित (haploid) युग्मकों (gametes); जैसे- शुक्राणु तथा अण्डाणु के संलयन (fusion) के फलस्वरूप द्विगुणित युग्मनज (zygote) का निर्माण निषेचन (fertilization) कहलाता है। युग्मनज से वृद्धि तथा विभाजन द्वारा भ्रूण का विकास होता है। कार्य
प्रश्न 2. युग्मक संलयन क्या है?
उत्तर : प्राणियों में नर युग्मक ‘शुक्राणु’ तथा मादा युग्मक ‘अण्ड’ के परस्पर मिलने को युग्मक संलयन (syngamy) कहते हैं।
पौधों में एक नर युग्मक के भ्रूणकोष में अण्ड कोशिका के मिलने को युग्मक संलयन (fertilization) कहते हैं। इससे बना युग्मनज भ्रूण बनाता है। दूसरा नर युग्मक दो ध्रुव कोशिकाओं से मिलकर प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्र बनाता है। इसे दोहरा निषेचन तथा त्रिसंलयन कहते हैं। इससे भ्रूणपोष (endosperm ) का विकास होता है।
प्रश्न 3. रजोनिवृत्ति को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर : रजोनिवृत्ति (Menopause ) — स्त्रियों में लगभग 45-50 वर्ष की आयु में अण्डाशय में अण्डाणुओं का बनना बन्द हो जाता है अर्थात् ऋतुस्राव या रजोधर्म की समाप्ति को रजोनिवृत्ति (menopause) कहते हैं।
प्रश्न 4. एकलिंगी तथा उभयलिंगी की परिभाषा एक-एक उदाहरण देते हुए लिखिए ।
उत्तर : एकलिंगी (Unisexual) – जब किसी जीवधारी में नर या मादा जनन अंग पाए जाते हैं अर्थात् नर और मादा पृथक्-पृथक् होते हैं तो इन्हें एकलिंगी कहते हैं; जैसे – मनुष्य ।
उभयलिंगी (Bisexual) – जब नर तथा मादा जनन अंग एक ही जीवधारी में पाए जाते हैं तो इसे उभयलिंगी या द्विलिंगी (bisexual or hermaphrodite) कहते हैं; जैसे – केंचुआ, फीताकृमि आदि। पौधे सामान्यतया उभयलिंगी होते हैं।
प्रश्न 5. पुरुष तथा स्त्री में पाए जाने वाले एक-एक लैंगिक हॉर्मोनों के नाम लिखिए ।
उत्तर : पुरुष के वृषण से टेस्टोस्टेरोन (testosterone) हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं।
स्त्रियों के अण्डाशय से एस्ट्रोजन (estrogen) हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं।
प्रश्न 6. आर्तव चक्र के मध्य यदि मैथुन सम्पन्न हो तभी निषेचन सम्भव है। कारण स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : आर्तव चक्र या मासिक चक्र के प्रारम्भ में योनि मार्ग से गाढ़े लाल रंग का रक्त मिश्रित तरल स्त्रावित होता है। यह स्राव 3 से 6 दिन तक चलता रहता है। रजोधर्म के प्रारम्भ होने के 12 से 14 दिन पश्चात् अण्डाशय से ‘अण्ड’ का अण्डोत्सर्ग (ovulation) होता है। यह अवधि आर्तव चक्र की लगभग आधी होती है। इसी अवधि में मैथुन सम्पन्न होने से अण्ड के निषेचन की सम्भावनाएँ अधिक होती हैं।
प्रश्न 7. IUCD, AIDS, HIV, OC को विस्तारपूर्वक लिखिए।
अथवा HIV का विस्तारित नाम लिखिए।
अथवा AIDS का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर : (i) IUCD —अन्तः गर्भाशयी गर्भनिरोधक युक्तियाँ (Intra Uterine Contraceptive Devices)!
(ii) AIDS—उपार्जित प्रतिरक्षा न्यूनता सिण्ड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome)I
(iii) HIV— मानवीय प्रतिरक्षा हीनता विषाणु (Human Immuno-deficiency Virus) ।
(iv) OC – मुखीय गर्भनिरोधक (Oral Contraceptive ) ।
प्रश्न 8. जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण क्यों आवश्यक है?
उत्तर : अनियन्त्रित जनसंख्या वृद्धि देश के विकास में बाधक होती है तथा आर्थिक विकास योजनाओं की सफलता जनसंख्या विस्फोट कारण परिलक्षित नहीं होती ।
प्रश्न 9. गर्भनिरोधक गोलियाँ किस प्रकार गर्भ निरोधक का करती हैं?
उत्तर : गर्भनिरोधक गोलियाँ हॉर्मोन्स से बनी होती हैं। ये शरीर में कृत्रिम गर्भधारण स्थिति उत्पन्न करके अण्डोत्सर्ग को रोकती हैं।
प्रश्न 10. युग्मक निर्माण तथा निषेचन क्रिया से क्या लाभ है?
उत्तर : युग्मक निर्माण वृषण तथा अण्डाशय की जनन कोशिकाओं से होता है। अर्द्धसूत्री विभाजन के फलस्वरूप युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या घटकर आधी (अगुणित – n ) रह जाती है।
निषेचन के समय अगुणित शुक्राणु और अगुणित अण्डाणु मिलकर द्विगुणित युग्मज (zygote-2n) बनाते हैं। इन क्रियाओं के फलस्वरूप गुणसूत्रों की संख्या जाति विशेष में निश्चित बनी रहती है।
प्रश्न 11. STD तथा AIDS का पूरा नाम लिखिए। AIDS परीक्षण के लिए होने वाले टैस्ट का नाम लिखिए।
उत्तर : STD – यौन संचारित रोग (Sexually Transmitted Diseases) ।
AIDS – उपार्जित प्रतिरक्षा न्यूनता सिण्ड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome)|
AIDS परीक्षण हेतु इलिसा ( ELISA ) या वैस्टर्न ब्लॉट (Western Blot) टैस्ट किया जाता है।
प्रश्न 12. गुलाब और चमेली के पौधे उगाने के लिए आप कौन-सी विधियों का प्रयोग करेंगे?
उत्तर : (i) गुलाब के पौधे उगाने के लिए ‘कलम लगाना’ (cutting method) का प्रयोग करते हैं। उन्नत प्रजाति के पौधे ‘कलिका रोपण’ (bud grafting) द्वारा तैयार किए जाते हैं।
(ii) चमेली के पौधे उगाने के लिए ‘दाब विधि’ का प्रयोग करते हैं।
  • एक शब्द या एक वाक्य वाले प्रश्न
प्रश्न 1. प्राणियों में नर तथा मादा युग्मक का नाम बताइए ।
उत्तर : प्राणियों में नर युग्मकों को शुक्राणु (sperms) तथा मादा युग्मकों को अण्डाणु (ovum) कहते हैं।
प्रश्न 2. स्त्रियों में निषेचन कहाँ होता है?
उत्तर : डिम्बवाहिनी नली (fallopian tube) में।
प्रश्न 3. मनुष्य में वृषण कहाँ स्थित होते हैं?
उत्तर : मनुष्य में वृषण उदरगुहा से बाहर वृषण कोष (scrotal sac) में स्थित होते हैं।
प्रश्न 4. वीर्य (semen) क्या है?
उत्तर : वीर्य शुक्राणुओं, शुक्राशयों के स्रावण तथा प्रोस्टेट ग्रन्थि के स्रावणों का मिश्रण है।
प्रश्न 5. स्त्रियों में कितने अण्डाशय पाए जाते हैं?
उत्तर : स्त्रियों में एक जोड़ी अण्डाशय पाए जाते हैं।
प्रश्न 6. स्तनधारियों में अण्डाशय कहाँ स्थित होते हैं?
उत्तर : स्तनधारियों में अण्डाशय उदरगुहा में वृक्क के पास स्थित होते हैं।
प्रश्न 7. मासिक चक्र में पुटिका प्रावस्था कितने दिन की होती है? रजोधर्म या आर्तव चक्र कितने समय में पूरा होता है? 
उत्तर : पुटिका प्रावस्था 10 से 12 दिन की होती है। आर्तव चक्र 28 दिन में पूरा होता है।
प्रश्न 8. शुक्राणुजनन किस हॉर्मोन के प्रभाव से होता है?
उत्तर: शुक्राणुजनन पुटिका प्रेरक हॉर्मोन तथा टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन के प्रभाव से होता है।
प्रश्न 9. निषेचन किसे कहते हैं?
उत्तर : अण्डाणु एवं शुक्राणु के समेकन (fusion) को निषेचन कहते हैं।
प्रश्न 10. परिवार कल्याण योजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर : स्वस्थ एवं नियोजित परिवार।
प्रश्न 11. परागण किसे कहते हैं?
उत्तर : एक पुष्प के परागकण के उसी जाति के पुष्प के वर्तिकाम पर पहुँचने की क्रिया परागण कहलाती है।
प्रश्न 12. अनुन्मील्य (cleistogamous) परागण किसे कहते हैं? 
उत्तर : जब पुष्प के बन्द रहते हुए स्वपरागण की क्रिया होती है तो इसे अनुन्मील्य परागण कहते हैं।
प्रश्न 13. सैल्विया में परागण किस माध्यम से होता है?
उत्तर: कीट द्वारा।
प्रश्न 14. किन्हीं दो जल परागित पुष्पों के नाम लिखिए।
उत्तर : जल परागित पुष्प हैं- वैलिसनेरिया, हाइड्रिला ।
प्रश्न 15. यदि पुष्प के जायांग से वर्तिकाग्र को हटा दिया जाए अथवा नष्ट कर दिया जाए तो क्या अण्डाशय से फल व बीज बन सकेंगे?
उत्तर : बीज एवं फल नहीं बनेंगे; क्योंकि परागण क्रिया ही नहीं हो सकेगी जो निषेचन के लिए आवश्यक है।
प्रश्न 16. भ्रूणपोष की कोशिकाएँ किस प्रकार के कोशिका विभाजन से बनती हैं?
उत्तर : स्वतन्त्र केन्द्रकीय कोशिका विभाजन द्वारा (free nuclear cell division) द्वारा।
प्रश्न 17. 11 मई, 2000 में भारत की जनसंख्या कितनी थी?
उत्तर : भारत की जनसंख्या 100 करोड़ को पार कर गई थी।
प्रश्न 18. चिकित्सकीय गर्भावस्था समापन (MTP) को वैधता कब प्रदान की गई थी?
उत्तर : 1972 में MTP (Medical Termination of Pregnancy) को कानूनी वैधता प्रदान की गई थी।
प्रश्न 19. दो यौनजनित या लैंगिक संचारित रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर : सिफलिस (syphilis), सुजाक (gonorrhoea) |
प्रश्न 20. गर्भनिरोधक गोलियों में कौन-से हॉर्मोन्स पाए जाते हैं?
उत्तर : गर्भनिरोधक गोलियों में एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन्स निश्चित मात्रा में पाए जाते हैं।

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