UK Board 9 Class Hindi Chapter 1 – दो बैलों की कथा (गद्य-खण्ड)
UK Board 9 Class Hindi Chapter 1 – दो बैलों की कथा (गद्य-खण्ड)
UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 1 – दो बैलों की कथा (क्षितिज : गद्य-खण्ड)
I. लेखक परिचय
प्रश्न – कहानीकार प्रेमचन्द का परिचय निम्नलिखित शीर्षकों में दीजिए-
जीवन-परिचय, रचनाएँ, साहित्यिक विशेषताएँ, भाषा-शैली ।
उत्तर- प्रेमचन्द
जीवन-परिचय – उपन्यास – सम्राट् प्रेमचन्द का जन्म वाराणसी के लमही ग्राम में, सन् 1880 ई० में हुआ था। आरम्भिक शिक्षा उन्हें गाँव में ही प्राप्त हुई। बाल्यावस्था में ही उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के पालन-पोषण का भार अब उन्हीं के ऊपर आ पड़ा। दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक प्राथमिक स्कूल में शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए। नौकरी करते हुए उन्होंने बी०ए० पास किया। इसके उपरान्त उन्होंने शिक्षा विभाग में सब-डिप्टी -इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल्स के रूप में कार्य किया।
सन् 1920 ई० में गांधीजी के आह्वान पर प्रेमचन्दजी ने देशसेवा का प्रण लिया। उन्होंने साहित्य-लेखन के द्वारा देशसेवा का मार्ग अपनाया। उनका वास्तविक नाम तो धनपतराय था, लेकिन शुरू में वे ‘नवाबराय’ नाम से उर्दू में रचनाएँ लिखते थे। अंग्रेजी शासन ने जब उनकी पुस्तक ‘सोजे-वतन’ को जब्त कर लिया, तब वे ‘प्रेमचन्द’ नाम से हिन्दी में लिखने लगे। उन्होंने अपना छापाखाना खोला और ‘हंस’ नामक पत्रिका का सम्पादन भी किया। सन् 1936 ई० में उनका बीमारी के उपरान्त निधन हो गया।
रचनाएँ – मुन्शी प्रेमचन्द ने 350 कहानियाँ और 11 उपन्यासों की रचना की। उनकी कहानियाँ ‘मानसरोवर’ नाम से आठ भागों में संकलित हैं। उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं— ‘सेवासदन’, ‘प्रेमाश्रम’, ‘रंगभूमि’, ‘निर्मला’, ‘गबन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’। उनके दो नाटक- ‘कर्बला’ और ‘प्रेम की वेदी’ हैं। उनके निबन्ध – ‘कुछ विचार’ तथा ‘विविध प्रसंग’ नामक संकलनों में संकलित हैं।
साहित्यिक विशेषताएँ – प्रेमचन्दजी का साहित्य अपने समय को अत्यन्त जीवन्तता के साथ प्रस्तुत करता है। उनके साहित्य का प्रमुख विषय है— राष्ट्रीय जागरण तथा समाज-सुधार। उनका पहला कहानी-संग्रह ‘सोजे – वतन’, देशभक्ति के इसी ओजस्वी स्वर के कारण अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था।
प्रेमचन्दजी की रचनाओं में भारत के किसानों की आर्थिक दुरवस्था तथा दलितों एवं पीड़ितों की परेशानियों का बड़ा ही मार्मिक एवं हृदय विदारक वर्णन किया गया है। उनकी ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘सद्गति’ आदि कहानियों में शोषण के विरुद्ध विद्रोह का स्वर अन्तर्धारा के रूप में प्रवाहित हो रहा है। प्रेमचन्द मानव मनोविज्ञान के चितेरे कथाकार हैं। गांधीजी के विचारों से प्रभावित उनकी रचनाओं में, समाज में व्याप्त बुराइयों का उद्घाटन बड़े प्रभावी एवं प्रेरक ढंग से किया गया है। उनकी कहानियों, उपन्यास आदि के मुख्य विषय रहे हैं— दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, नशाखोरी, शोषण, बहु-विवाह, अस्पृश्यता तथा जातिवाद । प्रेमचन्द का साहित्य उनके युग का दर्पण है।
भाषा-शैली – प्रेमचन्दजी की भाषा आम आदमी की भाषा है, जो अत्यन्त सरल – सरस और मुहावरेदार है। उन्होंने आम जन की भाषा को साहित्यिक स्वरूप प्रदान किया। उनकी भाषा में शब्दों का बेझिझक प्रयोग पात्रों की मनोदशा तथा वातावरण के सर्वथा अनुकूल है। उनके विभिन्न पात्र हमें इसीलिए जीवन्त प्रतीत होते हैं; क्योंकि प्रेमचन्दजी ने उनके संवादों में आश्चर्यजनक रूप से उनके पद, स्थान और सामाजिक स्तर आदि के साथ भाषा का सामंजस्य स्थापित किया है। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि लोकजीवन के वास्तविक पात्र ही उनके साहित्य में उपस्थित हो गए हैं।
वास्तव में हमें प्रेमचन्द की भाषा के दो रूप दृष्टिगत होते हैं- एक रूप तो वह है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता हैं और दूसरा रूप वह है, जिसमें उर्दू, संस्कृत और हिन्दी व्यावहारिक शब्दों का प्रयोग किया गया है। यही प्रेमचन्द की प्रतिनिधि भाषा है। उनकी अधिकांश कृतियों में इसी भाषा का प्रयोग हुआ है।
प्रेमचन्दजी ने अपने साहित्य की रचना जनसाधारण के लिए की। इसी कारण उन्होंने अधिकांशतः सरल, सरस एवं सजीव शैली में ही अपनी रचनाओं का सृजन किया है। ये विषय एवं भावों के अनुरूप शैली को परिवर्तित करने में दक्ष थे। इनकी शैलियों पर इनके व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप परिलक्षित होती है। प्रेमचन्दजी ने अपने साहित्य में निम्नलिखित शैलियों का प्रयोग किया—
(1) वर्णनात्मक शैली, (2) विवेचनात्मक शैली, (3) मनोवैज्ञानिक शैली, (4) हास्य-व्यंग्यात्मक शैली, (5) भावात्मक शैली आदि ।
स्पष्ट है कि मुंशी प्रेमचन्द भारतीय समाज के सजग प्रहरी और सच्चे प्रतिनिधि साहित्यकार थे। इनके साहित्य में सामाजिक बन्धनों में छटपटाती हुई नारी की वेदना, वर्ण-व्यवस्था की कठोरता, किसानों की दीन-हीन दशा और हरिजनों की पीड़ा के मर्मस्पर्शी चित्र उपस्थित किए गए हैं। प्रेमचन्दजी ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में यथार्थ एवं आदर्श का अद्भुत समन्वय किया है। ये कथा – साहित्य के क्षेत्र में युगान्तकारी परिवर्तन करनेवाले कथाकार सिद्ध हुए। एक श्रेष्ठ कथाकार और उपन्यास सम्राट् के रूप में हिन्दी-साहित्याकाश में उदित इस ‘चन्द्र’ को सदैव नमन किया जाता रहेगा।
II. अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न- निम्नलिखित गद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
1. जानवरों में गधा ……….. दिखाई देगी।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) हम किसी मनुष्य को ‘गधा’ क्यों कहते हैं?
(घ) गधे को गधा कहने के क्या कारण हैं?
(ङ) कौन-सी विशेषता गधे को अन्य पशुओं से भिन्न करती है?
(च) ‘परले दरजे का बेवकूफ’ से क्या तात्पर्य है?
(छ) ‘निरापद सहिष्णुता’ का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा | कहानीकार प्रेमचन्द ।
(ख) आशय – जानवरों में गधा सर्वाधिक मूर्ख माना जाता है; इसीलिए किसी मनुष्य को जब हम महामूर्ख कहना चाहते हैं तो उसे ‘गधा’ कहकर पुकारते हैं। गधा वास्तव में कमअक्ल अथवा मूर्ख होता है या उसके अत्यधिक सीधे और सहनशील होने के कारण उसे महामूर्ख की उपाधि दी गई है, यह निश्चिततौर पर कहना तो कठिन है, परन्तु उसका अत्यधिक सीधापन, अत्यधिक सहनशीलता हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि उसको मूर्ख कहे जाने का कारण उसका यही सीधापन और सहनशीलता ही है। अन्यथा गाय भी बहुत सीधी होती है, किन्तु वह भी कभी-कभी गुस्से में आकर जोरदार सींग भी मार बैठती हैं। बच्चा होने के बाद तो गाय अपने बच्चे की रक्षा में अक्सर शेरनी की तरह हिंसक हो उठती है, सम्भवत: इसीलिए उसे मूर्ख नहीं माना जाता। ठीक ऐसे ही स्वभाव से सरल तो कुत्ता भी होता है, परन्तु उसे भी कभी-कभी क्रोध आ ही जाता है। हैरानी की बात यह कि गधे को कभी भी क्रोध नहीं आता। उसे तो चाहे जितना मारा जाए, चाहे सड़ी घास ही क्यों न खाने को सामने डाल दी जाए, वह कभी क्रोध नहीं करता। उसके चेहरे पर विद्रोह या विरोध की शिकन तक नहीं आती। आशय यही है कि उसकी सहनशीलता जिसे हम प्रायः सीधापन भी कह देते हैं, उसको मूर्ख कहे जाने का मुख्य कारण है।
(ग) जब हम किसी मनुष्य को महामूर्ख कहना चाहते हैं तो उसे ‘गधा’ कह देते हैं।
(घ) गधे को गधा कहने का कारण उसका अत्यधिक सीधा और सहनशील होना है।
(ङ) गधे की अत्यधिक सहनशीलता, सन्तोषी प्रवृत्ति, सुख-दुःख को समान मानने की भावना उसे अन्य पशुओं से भिन्न करती है। अन्य जानवरों में ये गुण भले ही कुछ कम-ज्यादा पाए जाते हो, किन्तु इनके साथ ही उनमें यदा-कदा अपना विरोध अथवा क्रोध प्रकट करने की प्रवृत्ति भी अवश्य पाई जाती है।
(च) ‘परले दरजे का बेवकूफ’ से तात्पर्य बेअक्ल अथवा महामूर्ख होने से है।
(छ) ‘निरापद सहिष्णुता’ से अभिप्राय है – ऐसी सहनशीलता जिसके कारण विरोधी को कोई आपत्ति अनुभव न हो। किसी भी बड़ी-से-बड़ी आपत्तिजनक बात को बिना किसी विरोध अथवा प्रतिकार के सहन करने का गुण ।
2. वैशाख में ……….. उपयुक्त नहीं है।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) गद्यांश में किसका वर्णन किया गया है? वैशाख में कुलेल करने का आशय बताइए।
(घ) गधे और ऋषि-मुनियों में क्या समानता होती है?
(ङ) ‘स्थायी विषाद’ का अर्थ बताइए ।
(च) ‘पराकाष्ठा’ का अर्थ बताइए।
(छ) इस गद्यांश से किस सत्य का बोध होता है?
अथवाइस गद्यांश से क्या सन्देश दिया गया है?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा | कहानीकार — प्रेमचन्द |
(ख) आशय – कहते हैं कि गधा वैशाख के महीने में बहत खुश होता है; सम्भवत: इसीलिए उसे वैशाखनन्दन भी कहा जाता है। प्रेमचन्द का मानना है कि भले ही उसे वैशाखनन्दन कहा जाता हो, मगर उसे वैशाख के महीने में भी प्रसन्न नहीं देखा जा सकता। इस महीने में यदि वह एकाध बार कुछ उछल-कूद कर ले तो भला यह भी कोई प्रसन्न होना है। लेखक कहता है कि सही बात तो यही है कि गधा कभी प्रसन्न ही नहीं होता, वैशाख के महीने में भी नहीं। जब देखो तब उसके चेहरे पर निराशा और दुःख की रेखाएँ ही दिखती हैं। लगता है जैसे दुःख ही उसके चेहरे का स्थायी भाव है। सुख या दुःख, हानि या लाभ – चाहे जो भी परिस्थिति हो, उसके चेहरे पर सदा एक ही भाव दिखाई देता है। दार्शनिक कहते हैं कि ऋषि-मुनि सुख-दुःख में एक समान रहते हैं। न उन्हें सुख उत्साहित करता है और न दुःख व्यथित। वे हर परिस्थिति में शान्त सरल बने रहते हैं, सहनशील बने रहते हैं। देखा जाए तो गधे में भी ये ऋषि-मुनियोंवाले गुण अत्यधिक मात्रा में उपस्थित होते हैं, फिर भी मनुष्य उसे मूर्ख कहता है। यह तो विडम्बना ही है कि इतने गुण होने के बाद भी गधे को मूर्ख कहका उसका अपमान किया जाता है, जबकि इन्हीं गुणों के कारण दूसरे प्राणी ( ऋषि-मुनि) श्रद्धा के साथ पूजे जाते हैं। गधे के अतिरिक्त सदगुणों का इतना अपमान और कहीं देखने को नहीं मिलता। वैसे संसार में बड़ी बाधा है; इसीलिए सीधेपन को संसार के लिए उपयुक्त नहीं माना अधिकार और सम्मानपूर्वक जीवन जीने के मार्ग में सीधापन ही सबसे जाता।
(ग) गद्यांश में गधे का वर्णन किया गया है। वैशाख में कुलेल करने से आशय है कि वैशाख के महीने में वह जीभरकर कल्लोल, उछल-कूद करता है।
(घ) गधे और ऋषि-मुनियों में निम्नलिखित समानताएँ होती है-
- सुख-दुःख दोनों का समान रहना और विचलित न होना।
- स्वभाव की सरलता और सीधापन।
- अत्यधिक सहनशीलता तथा अक्रोधी होना।
- परिस्थिति जैसी भी हो, हर समय सन्तुष्ट रहना ।
- ‘स्थायी विषाद’ का अर्थ है-चेहरे पर सदा छाई रहनेवाली उदासी ।
(च) ‘पराकाष्टा’ का अर्थ है- चरमसीमा, सबसे अधिक ऊँचाई |
(छ) यह गद्यांश हमें जीवन के इस सत्य का परिचय कराता है कि यह संसार सरल, सीधे हृदयवाले, सहनशील, अक्रोधी व्यक्ति को मूर्ख समझता है। संसार में ऐसे व्यक्तियों का जीवन कठिन हो जाता है; अतः हमें अत्यधिक सरल और सहनशील नहीं होना चाहिए। हमें अत्याचारों के विरूद्ध क्रोध और विरोध भी प्रकट करना चाहिए।
3. लेकिन गधे ………. नीचा है।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) अनुच्छेद का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) बैल को गधे का छोटा भाई क्यों कहा गया है?
(घ) जिस अर्थ में गधे का प्रयोग किया जाता है, उस अर्थ में किस और शब्द का प्रयोग किया जाता है? और क्यों?
(ङ) बैल की स्वभावगत विशेषताएँ बताइए ।
(च) ‘गधे’ का सांकेतिक अर्थ बताइए।
(छ) ‘बैल’ को लेखक ने मूर्खों में सर्वश्रेष्ठ क्यों नहीं माना है?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा कहानीकार प्रेमचन्द ।
(ख) आशय-संसार में गधे को सबसे मूर्ख और सीधा जानवर माना जाता है, परन्तु मूर्खता और सीधेपन में उससे कुछ ही कम एक और जानवर भी है, वह है- बैल। मूर्खता और सीधेपन की दृष्टि से वह गधे के मुकाबले में कुछ ही कम ठहरता है, इसलिए उसे गधे का छोटा भाई कह सकते हैं। ‘गधे’ शब्द का प्रयोग मूर्खता और सहनशीलता की अभिव्यक्ति के लिए करते हैं, मिलते-जुलते अर्थ में हम ‘बछिया के ताऊ’ मुहावरे का भी प्रयोग हैं। बछिया का ताऊ बैल को ही कहा जाता है। बैल की सरलता और सीधेपन की सटीक अभिव्यक्ति इस मुहावरे से हो जाती है।
कुछ लोग बैल को मूर्खों में सबसे बड़ा मूर्ख मानते हैं, परन्तु लेखक ऐसा नहीं मानता। कथाकार का तर्क है कि बैल कभी-कभी मारता भी है। कोई-कोई बैल अड़ियल भी होता है। वह कई अन्य तरीकों से भी समय-समय पर अपना विरोध और क्रोध प्रदर्शित कर देता है। इसलिए कथाकार के अनुसार वह गधे की तुलना में कम मूर्ख होता है।
(ग) बैल को गधे का छोटा भाई इसलिए कहा गया है; क्योंकि जिस मूर्खता, सरलता तथा सहनशीलता के कारण गधे को ‘गधा’ कहा जाता है, वे गुण बैल में, थोड़ी कम मात्रा में ही सही, होते अवश्य हैं। गुणों के मामले में गधे की तुलना में कुछ कम गुण होने के कारण बैल गधे का छोटा भाई हुआ।
(घ) जिस अर्थ में गधे का प्रयोग किया जाता है उसी अर्थ में ‘बछिया के ताऊ’ अर्थात् बैल शब्द का प्रयोग किया जाता है। बछिया क्योंकि बैल की अपेक्षा बहुत चंचल होती है, किन्तु सीधेपन और सहिष्णुता में वह बैल के जैसी ही है। इसीलिए बैल को बछिया का ताऊ कहा जाता है। अर्थ के लिए ‘बछिया के ताऊ’ शब्द का प्रयोग किया गया है। अत्यधिक सरलता, निश्छल हृदय, कर्मठता आदि गुणों के कारण बैल ‘बछिया के ताऊ’ कहलाते हैं।
(ङ) बैल की स्वभावगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
- वह सीधा-सरल होता है।
- वह परिश्रम से जी नहीं चुराता । परिश्रम करके भी वह प्रसन्न और सन्तुष्ट रहता है।
- वह सहनशील होता है।
- आमतौर पर वह अन्याय सह लेता है, परन्तु कभीकभी अत्याचार होने पर या फिर असन्तुष्ट होने पर वह वार करने से भी नहीं चूकता।
- विरोध-प्रदर्शन के लिए भी वह कभी-कभी अड़ भी जाता है।
(च) ‘गधे’ का सांकेतिक अर्थ है – मूर्ख और सहनशील ।
(छ) बैल कभी-कभी अन्याय-अत्याचार के विरोध में अड़ जाता है तो कभी सींग भी चला देता है। उसमें गधे की अपेक्षा सहनशीलता का अभाव है, इसलिए कहानीकार ने उसे मूर्खों में सर्वश्रेष्ठ नहीं माना है।
4. झूरी काछी ………… जा सकता।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) हीरा-मोती बैलों की विशेषताएँ बताइए ।
(ग) दोनों बैलों में ऐसी कौन-सी गुप्त शक्ति थी, जो मनुष्यों में नहीं होती?
(घ) हीरा – मोती मित्रता कैसे प्रकट करते थे?
(ङ) हीरा – मोती आपस में बातचीत कैसे करते थे?
(च) सच्ची मित्रता के कौन-से लक्षण इस गद्यांश में बताए गए हैं?
(छ) ‘विचार-विनिमय’ का अर्थ बताइए।
(ज) ‘विग्रह’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कहानी – दो बैलों की कथा। कहानीकार – प्रेमचन्द।
(ख) हीरा और मोती पछाई जाति के सुन्दर, ऊँचे डीलडौलवाले बलिष्ठ बैल थे। लम्बे समय से साथ रहनेवाले इन दोनों बैलों में गहरी भ्रातृभावना उत्पन्न हो गई थी। मौनभाषा में ही वे अपने मन की बात एक- दूसरे तक पहुँचाने में समर्थ थे। वे आपस में सींग भिड़ाकर, एक-दूसरे को चाटकर या सूँघकर या फिर मस्तीभरी उछल-कूद करके एक-दूसरे प्रति प्रेम प्रदर्शित करते थे।
(ग) हीरा और मोती में एक-दूसरे के मन की बात समझने की गुप्त शक्ति थी— ऐसी शक्ति जो मनुष्यों में भी नहीं होती। मनुष्य को गर्व है कि वह अपनी बात कहने के लिए विशेष भाषा का प्रयोग करता है, परन्तु हीरा – मोती तो बिना कुछ कहे, आँखों आँखों में, एक-दूसरे की मुखमुद्रा से ही मन की बात समझ जाते थे। मनुष्यों में यह गुप्त शक्ति नहीं होती ।
(घ) हीरा-मोती इस प्रकार से अपनी मित्रता प्रकट करते थे-
- एक-दूसरे को चाटकर या सूँघकर ।
- विनोद के लिए आपस में सींग भिड़ाकर ।
- मस्ती में एक-दूसरे की ठेलकर।
(ङ) हीरा और मोती आपस में बातचीत मौनभाया में करते थे।
(च) कहानीकार के अनुसार सच्ची मित्रता के दर्शन आत्मीयता भरी छेड़-छाड़, प्रेम के साथ एक-दूसरे से धौल-धप्पा, शरारत, क्रीडा तथा मित्र के साथ मौज-मस्ती करने में होते हैं। ऐसी हलभरी मित्रता में ही मित्रों की परस्पर विश्वसनीयता के दर्शन होते हैं।
(छ) ‘विचार-विनिमय’ का अर्थ है-विचारों का आदान-प्रदान, मन की बातें एक-दूसरे से कहना-सुनना ।
(ज) ‘विग्रह’ से आशय है- अलगाव, झगड़ा।
5. अपना यों …………. बेच दिया?
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) बैलों को गया के साथ जाना क्यों अच्छा नहीं लग रहा था?
(ग) बैलों को ले जाते समय गया की क्या दशा हुई?
(घ) गया के साथ जाते समय बैलों के मन में क्या विचार आ रहे थे? वर्णन कीजिए।
(ङ) बैलों ने अपनी स्वामिभक्ति किन शब्दों में प्रकट की है?
(च) ‘दाँतों पसीना आना’ मुहावरे का अर्थ बताइए।
(छ) बैलों ने गया को जालिम क्यों मान लिया?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा कहानीकार— प्रेमचन्द |
(ख) बैलों को गया के साथ जाना इसलिए अच्छा नहीं लग रहा था; क्योंकि वह सोच रहे थे कि उनके मालिक ने उन्हें गया के हाथों ही आज बेच दिया है। उन्हें गलतफहमी हो गई कि गया ही आज से उनका मालिक हो गया है। यह बात उन्हें किसी भी तरह सहन नहीं हो रही थी। वे अपने मालिक झूरी के लिए भूखे-प्यासे रहकर प्राणोत्सर्ग करने के लिए भी तैयार थे, परन्तु गया के साथ जाना उनको स्वीकार न था ।
(ग) बैलों को हाँककर ले जाते समय गया को दाँतों पसीना आ गया। हीरा और मोती ने उसे खूब छकाया। वे उसके साथ जाना ही नहीं चाहते थे, इसलिए वे मार्ग में अड़कर खड़े हो गए। गया उन्हें पीछे से हाँकता तो वे दाएँ-बाएँ भागते । यदि गया उनका पगहा पकड़कर आगे से खींचता तो वे पीछे की तरफ जोर लगाने लगते। गया जब गुस्सा खाकर उन्हें मारता तो वे सींगों को नीचे करके जोर से हुँकारने लगते। इस प्रकार बैलों ने गया को खूब तंग किया।
(घ) गया के साथ जाते समय हीरा और मोती सोच रहे थे कि आखिर उनकी सेवा में क्या कमी रह गई थी, जो मालिक ने उन्हें अपने से अलग कर दिया। उन्हें निराशा ने घेर लिया। झूरी के साथ वे बहुत दिनों से थे; अतः वे उसे ही अपना स्वामी मानते थे। वे सोचने लगे कि यदि ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती तो वे झूरी से पूछते कि वह उन गरीबों को क्यों निकाल रहा है? अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था तो और काम ले लेते। हमने कभी दाने चारे की शिकायत नहीं की। जैसा भी रूखा-सूखा दिया, प्यार से खा लिया, फिर भी इस जालिम के हाथों बेच दिया। मालिक ने हमारे साथ यह अच्छा नहीं किया। इस प्रकार उनके मन में पूर्व-स्वामी के कार्य के प्रति रोष था तो नए मालिक के प्रति विद्रोह का भाव ।
(ङ) बैलों ने अपनी स्वामिभक्ति इन शब्दों में प्रकट की— हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था तो और काम ले लेते। हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने तो तुमसे कभी दाने चारे की भी शिकायत नहीं की। तुमने जो खिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथ क्यों बेच दिया?
(च) ‘दाँतों पसीना आ जाना’ का अर्थ है – बहुत परिश्रम करना।
(छ) बैलों ने गया को जालिम इसलिए माना; क्योंकि वह उन्हें उनके स्वामी से अलग कर रहा था। ले लाते समय मार्ग में जिस प्रकार से गया ने उनको मारा-पीटा, खींचा- धकेला, उससे वह उन दोनों को कसाई जैसा ही प्रतीत हुआ। बैलों ने उसके निर्दय व्यवहार के कारण ही उसे ‘जालिम’ माना।
6. झूरी प्रातः काल ………….. कोई भूसी ।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) दोनों बैलों को प्रातः काल चरनी पर खड़ा देख झूरी की क्या दशा हुई?
(ग) वापस आए बैलों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह क्यों था?
(घ) चरनी पर खड़े बैलों की हालत कैसी थी और क्यों?
(ङ) गाँव में हीरा और मोती का स्वागत कैसे किया गया?
(च) ‘पशु – वीरों को अभिनन्दन पत्र’ देने से क्या आशय है?
उत्तर :
(क) कहानी – दो बैलों की कथा। कहानीकार – प्रेमचन्द ।
(ख) दोनों बैलों को प्रातः काल चरनी पर खड़ा देखकर झूरी स्नेह से गद्गद हो उठा। वह खुशी से उन्हें चूमने लगा, गले लगाने लगा। झूरी ने कुछ दिनों के लिए बैलों को गया के पास भेजा था, परन्तु बैल वहाँ रुके नहीं और भागकर जैसे-तैसे अपने मालिक के पास वापस आ गए। बैलों का अपने प्रति इतना लगाव देखकर झूरी स्नेह से अभिभूत हो उठा।
(ग) बैलों ने समझा था कि झूरी ने उन्हें गया के हाथों बेच दिया है इसलिए उनमें झूरी के प्रति क्रोध और विद्रोह था। वे अपने मालिक के साथ इतने दिनों से रह रहे थे कि उसके प्रति उनमें स्वाभाविक स्नेह और स्वामिभक्ति थी। वे उससे अलग रहने की सोच भी नहीं सकते थे तो फिर मालिक ने उन्हें अपने से अलग करने की बात कैसे सोची- उनका विद्रोह इस बात पर ही था। इसीलिए मालिक ने उन्हें जहाँ भेजा था, वे वहाँ रुके ही नहीं। उन्हें अपने मालिक झूरी से प्यार था। रातोरात वहाँ से भागकर अपने पुराने स्थान पर आकर उन्होंने अपने विद्रोह को व्यक्त कर दिया। उनकी आँखों में अपने मालिक के प्रति स्नेह उमड़ रहा था, जिससे वे यह कहना चाह रहे थे कि हम तुमसे अलग नहीं हो सकते। यदि तुमने हमें फिर अपने से अलग किया तो हम फिर इसी प्रकार वहाँ से भाग खड़े होंगे। यह सब वे अपनी आँखों की मौनभाषा से व्यक्त कर रहे थे।
(घ) चरनी पर खड़े बैलों की हालत अच्छी न थी। वे नए मालिक से विद्रोह करके भागे थे। विद्रोह की अस्त-व्यस्तता उनके चेहरे और शरीर से स्पष्ट झलक रही थी। हीरा और मोती दोनों बैलों की गरदनों में लटका आधा-आधा गराँव और घुटनों तक कीचड़ से सने पाँव उनके विद्रोह की साक्षी दे रहे थे। प्रश्नात्मक दृष्टि से झूरी को देखते हुए दोनों की आँखों में अपने मालिक के लिए विद्रोहमय स्नेह साफ झलक रहा था।
(ङ) हीरा और मोती का स्वागत गाँव के बच्चों ने खूब जमकर किया। वे पगहा तुड़ाकर गया के घर से भाग आए थे। बच्चों को बैलों का यह कार्य शूरवीरता से कम नहीं लगा। उन्होंने सोचा कि बैलों को उनकी इस बहादुरी के लिए अवश्य सम्मान मिलना चाहिए। स्वागत-सत्कार के लिए बच्चों ने बैलों को प्रसन्न करनेवाली वस्तुओं — रोटी, गुड़, चोकर, भूसी आदि की व्यवस्था कर डाली। बैलों के लिए. वस्तुएँ निश्चय ही उनके स्वागत से पढ़े गए अभिनन्दन पत्र के समान थीं।
(च) बैलों को ‘पशु-वीर’ कहने का तात्पर्य है— वीरता का कार्य करनेवाला पशु। मनुष्य समाज में अच्छा कार्य करनेवाले को सम्मानित करने के लिए अभिनन्दन पत्र आदि देने की प्रथा है; परन्तु पशुओं के लिए तो अभिनन्दन पत्र उनका प्रिय दाना- चारा आदि ही हो सकता है; अत: गाँव के बच्चों ने ऐसी ही वस्तुएँ देकर उन्हें सम्मानित किया। हीरा और मोती के लिए उनकी वीरता के सम्मान में लाई गई ये वस्तुएँ वस्तुतः अभिनन्दन पत्र के ही समान थीं।
7. दोनों बैलों …………. न आते।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) बैलों का अपमान क्यों और कैसे हुआ?
(ग) दोनों बैल कौन-सी भाषा समझते थे?
(घ) बैलों ने गया के प्रति अपना विरोध कैसे प्रकट किया?
(ङ) मोती को गुस्सा क्यों आया? उसने अपना विरोध कैसे जताया?
(च) ‘फूल की छड़ी से भी न छूता था’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा। कहानीकार – प्रेमचन्द।
(ख) गया बैलों को मोटी, मजबूत रस्सियों से बाँध दिया, मारा सो अलग। बैलों की पिछली उद्दण्डता को देखकर उसने उन्हें सजा देने के लिए उनके सामने सूखा भूसा डाला और अपने बैलों के सामने खली और चूनी डलवाई। गया के इस भेदभाव भरे व्यवहार से हीरा और मोती को अपना अपमान महसूस हुआ।
(ग) बैल प्रेम-प्यार की भाषा समझते थे। झूरी की टिटकार सुनकर तो वह उड़ने ही लगते थे। उसकी आवाज सुनकर उनके पाँवों में चुस्ती-फुर्ती आ जाती थी। वह गया की मारपीटवाली भाषा से एक दिन में ही उकता गए ।
(घ) बैलों ने अपमान का बदला अपने तरीके से लेने की ठानी। भूसे में उन्होंने मुँह ही नहीं डाला। यहाँ तक कि हल में जुतने से भी इनकार कर दिया। और जब उन्हें मारा-पीटा गया तो दोनों विद्रोह करके हल लेकर भाग खड़े हुए। हल, रस्सी जुआ, जोत सब टूट गए ।
(ङ) गया ने जब हीरा की नाक पर लगातार डण्डे बरसाए तो मोती से अपने मित्र पर हुआ यह अत्याचार नहीं सहा गया। उसे क्रोध आ गया।
अपना क्रोध और विरोध प्रकट करने के लिए वह गया का हल, रस्सी, जुआ, जोत; सब लेकर बेतहाशा भागा। इस कारण सब टूट-टाट कर बिखर गया।
(च) ‘फूल की छड़ी से भी न छूता था’ से अभिप्राय है – बहुत प्यार से रखना, कभी भी दुःख या कष्ट न देना। प्यार में भी झूरी कभी अपने बैलों पर हाथ न उठाता था, डण्डा तो बहुत दूर की बात थी, उसने कभी अपने बैलों को फूलों की डाली तक से न छुआ था ।
8. मोती दिल ……………. मसलहत है।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) मोती क्यों ऐंठकर चुप कर गया?
(ग) गया और उसके साथियों ने मोती को पीटा क्यों नहीं?
(घ) ऐंठकर रह जाने का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ङ) ‘पलट पड़ने’ से क्या अभिप्राय है?
(च) ‘तेवर’ का अर्थ बताइए ।
(छ) मोती के तेवर गया और साथियों के प्रति कैसे थे?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा। कहानीकार – प्रेमचन्द ।
(ख) मोती ऐंठकर चुप इसलिए रह गया; क्योंकि उसके मित्र हीरा ने उसे रोक दिया था। मोती हल लेकर भागा था, परन्तु लम्बी-लम्बी रस्सियों के कारण फिर गया की पकड़ में आ गया था। वह उसे सींग मारकर मजा चखाना चाहता था, परन्तु हीरा ने उसे आँखों आँखों में इसके लिए भी रोक दिया। उसने अपने क्रोध को किसी तरह दबा लिया।
(ग) गया और उसके साथियों ने मोती को इसलिए नहीं पीटा; क्योंकि उन्होंने देखा कि मोती की आँखों में भयंकर क्रोध है और वह उन पर पलटवार भी कर सकता है। उन्होंने सोचा कि अपनी सुरक्षा और कुशलता इसी में है कि इस समय मोती को न पीटा जाए।
(घ) ‘ऐंठकर रहने’ का अर्थ है— विरोध प्रकट करने की बात मन ही में रह जाना, विरोध में तनकर भी चुप हो जाना ।
(ङ) ‘पलट पड़ने’ से अभिप्राय है— शत्रु पर उलटकर वार करना।
(च) ‘तेवर’ का अर्थ है – क्रोधपूर्ण भाव-मुद्रा, हाव-भाव ।
(छ) मोती के तेवर गया और उसके साथियों के प्रति क्रोध और बदले की भावना से भरे हुए थे, जो उसकी आँखों से अभिव्यक्त हो रहे थे।
9. सहसा घर ………….. चलते क्यों नहीं?
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) घर से निकली लड़की का परिचय क्या है?
(ग) हीरा – मोती उसका हाथ क्यों चाटने लगे?
(घ) लड़की ने बैलों को क्यों खोल दिया?
(ङ) घर में बैलों के लिए क्या सलाह हो रही थी?
(च) लड़की ने बैलों से भाग जाने के लिए क्यों कहा?
(छ) गराँव खोल देने पर भी बैल भागे क्यों नहीं?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा | कहानीकार — प्रेमचन्द।
(ख) घर से निकलकर आनेवाली लड़की घर के स्वामी भैरो की बेटी थी। उसकी माँ मर चुकी थी और उसकी सौतली माँ उसे प्रायः मारती – पीटती रहती थी।
(ग) हीरा – मोती को वह लड़की चुपचाप रोटियाँ लाकर तब खिला जाया करती थी, जब घर के सब लोग भोजन करने में व्यस्त हो जाते थे। लड़की द्वारा दी जानेवाली उन दो रोटियों के बल पर ही वे जीवित थे। वे रोटियाँ उनका पेट तो नहीं भरती थीं, परन्तु लड़की की सज्जनता और सहानुभूति से वह अत्यन्त प्रभावित थे। इसीलिए इस समय रात के वक्त लड़की के वहाँ आने पर वे उसका हाथ चाटकर अपना प्रेम प्रदर्शित करने लगे, उसके प्रति अपनी कृतज्ञता दिखाने लगे।
(घ) लड़की सौतली माँ के व्यवहार की सताई हुई थी। उसने बैलों के साथ होनेवाले भेदभाव को देखकर उनकी दशा का अनुमान लगा लिया था। वह उन मूक जानवरों के प्रति दया से भर गई। उसने उन्हें मुक्त करने के लिए उनके गाँव चुपचाप खोल दिए ।
(ङ) घर में बैलों की उद्दण्डता को देखकर, यह सलाह हो रही थी कि इनकी नाकों में नाथ डाल जाए।
(च) लड़की ने घर में होनेवाली सलाह सुन ली थी। बैलों को होनेवाले कष्ट की कल्पना करके, उससे उन्हें बचाने के लिए लड़की ने बैलों की गराँव खोल दी और उनसे जान बचाकर भाग जाने को कहा।
(छ) गराँव खोल देने पर भी बैल तुरन्त भागे नहीं। इसका कारण यह था कि वे घरवालों के व्यवहार को खूब परख गए थे। वे सोचने लगे कि घरवालों को यदि पता चल गया कि उनके भागने में लड़की का हाथ है तो उन्हें रोजाना रोटी खिलानेवाली यह लड़की व्यर्थ ही मारी-पीटी जाएगी।
10. दोनों मित्रों …………… तृप्ति होती?
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) कांजीहौस में बन्द पशुओं की दुर्दशा का वर्णन कीजिए ।
(ग) आप कैसे कह सकते हैं कि यह चित्रण अंग्रेजों की जेलों की ओर संकेत करता है?
(घ) कांजीहौस में आने से पूर्व हीरा मोती किन-किन मालिकों के आश्रय में रहे थे? उनके साथ वहाँ किस प्रकार का व्यवहार हुआ था?
(ङ) ‘टकटकी लगाने’ का क्या अर्थ है ?
(च) दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए देखते रहे; आखिर क्यों?
(छ) मिट्टी किस-किसने चाटनी शुरू कर दी और क्यों?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा | कहानीकार— प्रेमचन्द।
(ख) कांजीहौस में बन्द पशुओं की दशा चिन्ताजनक और हृदय विदारक थी। सब-के-सब पशु मृतावस्था में पहुँचे हुए-से निर्जीव जान पड़ते थे। सब भूखे-प्यासे थे। ऐसा लगता था कि उन्हें कई दिनों से कुछ खाने को नहीं मिला था। वे इतने कमजोर हो चुके थे कि उनसे खड़ा तक नहीं हुआ जा रहा था।
(ग) यह कहानी परतन्त्र भारत की जनता के दुःखों को व्यक्त करने के उद्देश्य से कथाकार ने लिखी है। कांजीहौस में आवारा पशु रखे जाते हैं। इसके मालिक पशुओं के साथ क्रूरता का व्यवहार करते हैं। कांजीहौस के मालिकों की क्रूरता दिखाकर प्रेमचन्दजी ने अंग्रेज ‘शासकों की क्रूरता की ओर संकेत किया है। अपने ही देश में भारतीयों को घूमने-फिरने, खेलने-खाने के लिए क्रूर अंग्रेज शासकों के इशारों पर चलना पड़ता था। विरोध करने पर उन्हें जेलों में बन्द कर दिया जाता था, भूखा-प्यासा रखा जाता था। भारतीय विद्रोही कांजीहौस के पशुओं की तरह भूखे-प्यासे रहकर भी आजादी का सपना देखते थे। जैसे हीरा मोती कांजीहौस से निकल भागने का मार्ग खोज रहे थे। इस प्रकार घटनाओं और स्थितियों की समानता से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यह चित्रण अंग्रेजों की जेलों की ओर संकेत करता है।
(घ) कांजीहौस में आने से पूर्व हीरा और मोती; झूरी काछी और गया के आश्रय में रहे थे। झूरी के घर में उन्हें पूरा मान-सम्मान मिला था। गया के घर में उन्हें पेट भरने को चारा तो मिला, परन्तु आदर – प्यार, अपनापन नहीं मिला। वहाँ भैरो की लड़की की सहानुभूति उन्हें अवश्य प्राप्त थी। दोनों आश्रयदाता कांजीहौस के मालिक से तो अच्छे ही थे, जिसने कि सारे दिन उन दोनों को भूखा रखा।
(ङ) ‘टकटकी लगाने’ का अर्थ है – किसी आशा में लगातार एक ही दिशा में देखते रहना।
(च) दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए देखते रहे; क्योंकि उन्हें इस बात पर विश्वास था कि सारा दिन बीता जा रहा है; अतः खाने के लिए कुछ-न-कुछ तो अब अवश्य ही दिया जाएगा।
(छ) हीरा और मोती ने भूख से व्याकुल होकर मिट्टी चाटनी शुरू कर दी।
11. एक दिन ……………… झुका लिया।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) बाड़े के सामने डुग्गी क्यों बजने लगी?
(ग) हीरा-मोती को देखकर खरीदार मुँह क्यों बिचका लेते थे?
(घ) कथाकार ने हीरा और मोती को ‘मृतक बैल’ क्यों कहा है?
(ङ) ‘दढ़ियल आदमी’ कौन था? हीरा-मोती उसके किस व्यवहार से भयभीत हो गए थे?
(च) ‘सन फीका करने’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा। कहानीकार – प्रेमचन्द।
(ख) बाड़े के सामने डुग्गी इसलिए बजने लगी; क्योंकि कांजीहौस का मालिक बैलों की नीलामी करके उन्हें वहाँ से निकालना चाह रहा था; अतः नीलामी में बोली लगाकर पशुओं को खरीदने की सूचना देने के लिए डुग्गी बज रही थी। डुग्गी की आवाज सुनकर खरीदार वहाँ एकत्र होने लगे।
(ग) हीरा और मोती को देखकर खरीदार मुँह इसलिए बिचका लेते थे; क्योंकि कई दिनों से भूखे रहने के कारण हीरा और मोती हड्डियों का ढाँचाभर रह गए थे। उनके जर्जर शरीर को देखकर वे घृणा से मुँह फेरकर चल देते थे कि इन मुर्दे बैलों को खरीदकर क्या करेंगे।
(घ) हीरा और मोती कई दिनों तक भूखे-प्यासे रहे। कांजीहौस के मालिक ने उन्हें केवल पानी दिखाया था, खाने को कुछ नहीं दिया था। इस कारण वे मरियल से दिखने लगे थे। और उनके ठठरियाँ निकल आई थीं। उनकी इसी दशा को दर्शाने के लिए कथाकार ने उन्हें ‘मृतक बैल’ कहा है।
(ङ) ‘दढ़ियल आदमी’ एक पेशेवर कसाई था। पशुओं को काटकर उनका मांस बेचना उसका धन्धा था, उसकी आजीविका का साधन था।
हीरा और मोती के कूल्हों में उसने उँगली गड़ा-गड़ाकर जब उनके शरीर से प्राप्त हो सकनेवाले मांस की मात्रा का अन्दाजा लगाया तो वे समझ गए कि यह व्यक्ति कसाई ही हो सकता है। उसके इस व्यवहार से उन्होंने अन्दाजा लगा लिया कि अब तो उनकी मौत निश्चित है; अतः वे भयभीत हो उठे।
(च) ‘मन फीका करने’ का अर्थ है – निराश होना, उदास होना।
12. राह में ……………. कैसे दुःखी हैं।
प्रश्न –
(क) कहानी तथा कहानीकार का नाम लिखिए।
(ख) हीरा और मोती को प्रसन्न पशुओं का रेवड़ स्वार्थी क्यों लगा?
(ग) पशुओं के दोनों समूहों की स्थितियों में क्या अन्तर था ?
(घ) उद्धृत गद्यांश का प्रसंग लिखिए ।
(ङ) स्वतन्त्रता आन्दोलन से जोड़कर देखने पर आप हीरा-मोती और उनके परिवेश पर क्या कहेंगे?
उत्तर :
(क) कहानी— दो बैलों की कथा । कहानीकार – प्रेमचन्द।
(ख) हीरा और मोती को उन प्रसन्न पशुओं का रेवड़ स्वार्थी जान पड़ा — इसका कारण बड़ा मनोवैज्ञानिक था। सभी थे तो पशु, परन्तु हीरा और मोती नए मालिक के हाथों बिक चुके थे। नए मालिक के हाथों उनका वध निश्चित था। उनके सिर पर मौत मँडरा रही थी। वे कई दिनों से भूखे-प्यासे थे; शरीर से निर्बल और असहाय थे। अपने सजातीय बन्धुओं को प्रसन्न देखकर उन्होंने यह सोचा कि इन्हें हमारे कष्ट का अनुमान क्यों नहीं है। इन लोगों को हमारी दुर्दशा क्यों नहीं दिखाई देती? उन्हें चाहिए कि वे अपनी जाति के लोगों को संकट से उबारें । परन्तु वे सभी पशु स्वतन्त्र थे; अपनी मस्ती में खोए थे। उनका ध्यान इन दोनों की ओर था ही नहीं। उनकी यह उपेक्षा देख उन्हें लगा कि ये लोग स्वार्थी हैं।
(ग) हीरा और मोती तथा उन पशुओं में अन्तर था। ये दोनों नए मालिक के हाथों नीलाम होकर वध के लिए जा रहे थे। ये गुलाम थे। दूसरी ओर वे पशु थे, जो स्वतन्त्रता से उछल-कूद रहे थे। वे प्रसन्नचित्त थे और स्वस्थ थे। वे आराम जुगाली कर रहे थे। वे स्वतन्त्रता का सुख भोग रहे थे।
(घ) हीरा और मोती कांजीहौस द्वारा एक दढ़ियल के हाथों नीलाम हो चुके थे। वे दोनों उसके साथ जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक जगह प्रसन्न और स्वस्थ पशुओं का एक रेवड़ मिला। ये सभी पशु मस्ती में कल्लोल कर रहे थे। गद्यांश में उसी प्रसंग का चित्रण है।
(ङ) स्वतन्त्रता आन्दोलन से जोड़कर देखने पर हीरा और मोती स्वतन्त्रता सेनानी प्रतीत होते हैं जो स्वतन्त्रता के लिए प्राणपण से लड़ रहे हैं। वे हर संकट झेल रहे हैं। दूसरी ओर ऐसे पशुओं का परिवेश है, जो स्वतन्त्रता के लिए जूझ रहे सेनानियों की परवाह किए बिना, स्वतन्त्रता की भावना से शून्य हैं तथा सुख भोग में मस्त हैं। उनके लिए आजादी का मतलब सिर्फ जुगाली करना भर है। वे स्वतन्त्रता के ऊँचे आदर्श-बोध और जीवन-मूल्यों से लगभग अपरिचित हैं।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1- कांजीहीस में कैद पशुओं की हाजिरी क्यों ली जाती होगी?
उत्तर- कांजीहौस में आवारा पशुओं की था। ऐसे पशु, जो दूसरों के खेतों में घुसकर फसल नष्ट करते थे या लावारिस घूमते रहते थे, यहाँ बन्द करके रखे जाते थे। कांजी के मालिक उन पशुओं के वास्तविक मालिकों से उनके खा आनेवाले खर्च के अतिरिक्त कर के रूप में भी कुछ धनराशि उस समय वसूलता था, जब वे उसे कांजीहौस से लेने जाते थे। जिस पशु का मालिक उसे लेने नहीं आता था तो कांजीहोसवाले कुछ दिन प्रती करने के बाद उसकी नीलामी करके बेच देते थे। इस प्रकार से पशु की उनकी आमदनी का साधन थे। यदि कोई पशु वहां से निकल भागेगा अथवा कांजीहौस का कोई कर्मचारी उन्हें वहाँ से चुरा लेगा तो इससे कांजीहौज के मालिक को हानि होगी। इसी हानि से बचाने और पशुओं की निगरानी के लिए कांजीहोज में कैद पशुओं की हाजिरी ली जाती होगी।
प्रश्न 2 – छोटी बच्ची को बैलों के प्रति प्रेम क्यों उमड़ आया?
उत्तर- छोटी बच्ची की माँ मर चुकी थी। उसकी सौतेली माँ उस पर अत्यधिक अत्याचार करती थी। वह अपनों से बिछुड़ने और अत्याचारों का दर्द जानती थी, इसलिए जब उसने हीरा और मोती को अपने मालिक से बिछुड़ने और अत्याचारों के दर्द से छटपटाते देखा तो उनकी व्यथा को जानकर उनके प्रति उसके मन में प्रेम उमड़ आया। वह सोचने लगी कि वह भी उसी की तरह अभाग हैं, प्रेम से वंचित हैं। इसलिए उसमें उनके लिए सहानुभूति जाग गई।
प्रश्न 3 – कहानी में बैलों के माध्यम से कौन-कौन-से नीति-विषयक मूल्य उभरकर सामने आए हैं?
उत्तर – कहानी ‘दो बैलों की कथा’ के माध्यम से निम्नलिखित नीति-विषयक मूल्य उभरकर सामने आए हैं-
- सरल-सीधा और अत्यधिक सहनशील होना पाप है। अत्यधिक सीधा व्यक्ति ‘गधा’ (मूर्ख) कहलाता है। मनुष्यों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए।
- स्वतन्त्रता बहुत बड़ा जीवन-मूल्य है। इसे प्राप्त करने और इसकी रक्षा करने के लिए हर सम्भव कष्ट उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए ।
- समाज के सुविधासम्पन्न लोगों को भी आजादी की लड़ाई में अपना योगदान देना चाहिए।
प्रश्न 4- प्रस्तुत कहानी में प्रेमचन्द ने गधे की किन स्वभावगत विशेषताओं के आधार पर उसके प्रति रूढ़ अर्थ ‘मूर्ख’ का प्रयोग न कर किस नए अर्थ की ओर संकेत किया है?
उत्तर – गधे के स्वभाव की दो विशेषताएँ जग प्रसिद्ध हैं-
(i) मूर्खता तथा (ii) सरलता और अतिसहनशीलता ।
कहानी ‘दो बैलों की कथा’ में प्रेमचन्द ने गधे की सरलता और सहनशीलता की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित किया है। वह लिखते हैं- “सद्गुणों का इतना अनादर कहीं नहीं देखा। कदाचित् सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है।” इससे स्पष्ट होता है कि वे मूर्खता पर नहीं, वरन् सीधेपन – सरलता, सीधेपन की दुर्दशा पर विशेष प्रकाश डालना चाहते हैं। वह कहते भी हैं कि अफ्रीका, अमेरिका आदि देशों में भी भारतीयों की दुर्दशा इसीलिए है; क्योंकि वे ईंट का जवाब पत्थर से नहीं देते, बस गम खाकर रह जाते हैं; अतः यहाँ लेखक ने सरलता और सीधेपन के कारण होनेवाले व्यक्ति के तिरस्कार पर प्रकाश डाला है।
प्रश्न 5 – किन घटनाओं से पता चलता है कि हीरा और मोती में गहरी दोस्ती थी?
उत्तर- ‘दो बैलों की कथा’ नामक कहानी में अनेक ऐसी घटनाएँ हैं, जिनसे यह ज्ञात होता है कि हीरा और मोती दोनों बैलों में गहरी दोस्ती थी; जैसे—.
पहली घटना – जब भी दोनों साथी एक साथ हल या गाड़ी में जोते जाते थे तो दोनों की यह कोशिश रहती थी कि अधिक भारवाला भाग दूसरे साथी के कन्धे पर न आकर उसके अपने कन्धे पर आए।
दूसरी घटना – गया ने जब हीरा की नाक पर डण्डा जमाया तो मोती से उसका कष्ट न देखा गया। उसने गया को मजा चखाने के लिए हल, रस्सी, जुआ, जोत सब लेकर इतने जोरों की दौड़ लगाई कि सब टूट-टाट कर बिखर गया।
तीसरी घटना – मटर के खेत में छककर मटर खाने के बाद दोनों मस्ती में सींग मिलाकर एक-दूसरे को ठेलने लगे। तभी अचानक मोती को लगा कि हीरा को क्रोध आ गया है तो वह पीछे हट गया। उसने सोचा कि दोस्ती में तकरार ठीक नहीं।
चौथी घटना – जब दोनों मित्रों के सामने विशालकाय साँड डौंकता हुआ आ खड़ा हुआ तो दोनों ने उसकी ताकत का अन्दाजा लगा लिया। वह अकेले युद्ध में किसी पर भी भारी पड़ सकता था; अत: दोनों ने योजनाबद्ध तरीके से एक-दूसरे की रक्षा करते हुए साँड पर आक्रमण किए। साँड एक पर चोट करता तो दूसरा उसके पेट में दूसरी ओर से नुकीले सींग घुसेड़ देता। इस प्रकार उन्होंने साँड को अधमरा करके गिरा ही दिया।
पाँचवीं घटना — मोती सींचे हुए मटर के खेत में मटर खाते-खाते, खेत के कीचड़ में फँस गया और फिर रखवालों द्वारा पकड़ा गया। हीरा मोती को मुश्किल में पड़ा देख वापस लौट आया। वह भी मोती के साथ पकड़ा गया।
छठी घटना – कांजीहौस में जानवरों की दुर्दशा देखकर हीरा ने उसकी कुछ दीवार तोड़ डाली। तब मालिक ने उसे रस्सियों से बाँध दिया। इस समय मोती ने अपने मित्र का साथ दिया। उसने उसका अधूरा काम पूरा किया। मोती ने बाड़े की पूरी दीवार तोड़ डाली और फिर अन्य पशुओं को कांजीहौस से भगाकर हीरा को अकेला छोड़कर स्वयं कहीं नहीं भागा और फिर हीरा के साथ ही बँध गया।
प्रश्न 6–’ लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो । ‘ – हीरा के इस कथन के माध्यम से स्त्री के प्रति प्रेमचन्द के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – हीरा के इस कथन से ज्ञात होता है कि तत्कालीन समाज में स्त्रियों को प्रताड़ित करना पाप समझा जाता था; अतः समाज के भद्र और सभ्य पुरुष उनको कोई भी शारीरिक यातना नहीं देते थे। हीरा और मोती ऐसे ही भद्र और सभ्य पुरुषों के प्रतीक हैं। इसीलिए जब मोती भैरो की पत्नी को मारकर छोटी लड़की के दुःखों का अन्त करना चाहता है तो हीरा उसे यही समझता है कि सभ्य समाज में स्त्री जाति का सम्मान होता है, उन्हें प्रताड़ित नहीं किया जाता ।
हीरा और मोती के वार्त्तालाप द्वारा प्रेमचन्द ने स्त्री जाति के प्रति सभ्य समाज के कर्त्तव्यों की याद दिलाई है कि स्त्री जाति को शारीरिक चोट पहुँचाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। वे तो सब प्रकार से रक्षणीय और सम्मान की पात्र हैं। हीरा के कथन का यह आशय वास्तव में प्रेमचन्द का स्त्रियों के प्रति अपना निजी दृष्टिकोण ही है।
प्रश्न 7 – किसान जीवनवाले समाज में पशु और मनुष्य के आपसी सम्बन्धों को कहानी में किस तरह व्यक्त किया गया है?
उत्तर – किसान जीवनवाले समाज में के परस्पर पशु और मनुष्य सम्बन्ध बड़े ही आत्मीय होते हैं; क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है, एक के बिना दूसरे का गुजारा नहीं हो सकता। मनुष्य ने अपने जीवन को सभ्यता के इस स्तर तक लाने में पशुओं को सबसे पहले अपना साथी बनाया। खेती-किसानी में गाय-बैल के बिना वह अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है; इसलिए किसान अपने पशुओं को बड़ा प्यार करते हैं। झूरी ने अपने दोनों बैलों के प्रति अपनी आत्मीयता को व्यक्त करने हेतु ही उनके प्यारे से नाम हीरा और मोती रखे थे। किसान पशु को घर के सदस्य की भाँति प्यार करते हैं तो पशु भी मौन भाषा में उनके प्रति अपना प्यार प्रकट करते हैं, उन पर अपनी जान न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं। झूरी ने हीरा – मोती को गया की मदद के लिए भेजा था, परन्तु वे तमाम कष्ट सहकर भी वापस लौट आए। थान पर उन्हें खड़ा देख झूरी गद्गद हो उठा तो गाँव के सारे बच्चों ने बैलों का रोटी, गुड़, चोकर आदि से स्वागत किया। इन सब घटनाओं से पता चलता है कि किसान के जीवन में पशुओं का स्वजनों जितना ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे अपने स्वजनों को जितना प्रेम करते हैं, उनके दुःख-दर्द का ख्याल रखते हैं, उतना ही प्रेम और ख्याल वे अपने पशुओं का रखते हैं।
प्रश्न 8 – ‘ इतना तो हो ही गया कि नौ दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे’ – मोती के इस कथन के आलोक में उसकी विशेषताएँ बताइए ।
उत्तर – मोती हृदय से दयालु, किन्तु गरम स्वभाव का प्राणी है। अन्याय होता देख उसका खून खौल उठता है । अत्याचारी से भिड़ने को वह जैसे जान हथेली पर लिए फिरता है। कांजीहौस में पहुँचने पर वहाँ . कैद पशुओं की दुर्दशा देख उन्हें मुक्त कराने के लिए उसने बाड़े की दीवार तोड़ डाली। हीरा ने उसे जब यह समझाया कि अब तुझ परं मुसीबतें आएँगी, तुझे मोटी रस्सियों से बाँधा जा सकता है तो इस पर मोती बड़ी शान से जवाब देता है कि ऐसा बन्धन उसे कबूल है। यदि उसके बँधने से दस जानें बचती हैं तो उसे यह भी स्वीकार है। वह मानता है कि जिन पशुओं की जानें उसके कारण बच गईं, वे सब-के-सब उसे आशीर्वाद देंगे। मोती के इस प्रकार के व्यवहार से उसकी दयालुता, बलिदान की भावना तथा न्यायप्रियता का बोध होता है।
प्रश्न 9 – आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करनेवाला मनुष्य वंचित है।
उत्तर : आशय – हीरा और मोती में एक ऐसी छिपी हुई शक्ति थी, जिसके बल पर वे बिना एक भी शब्द बोले, आँखों आँखों में एक-दूसरे के हाव-भाव से एक-दूसरे के हृदय की बात जान लेते थे। वे सदैव आपस में एक-दूसरे के हित की बात सोचते थे। वे मौनभाषा में भी प्यार प्रदर्शन करना जानते थे। मनुष्य अपने को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहता है, परन्तु उसमें भी यह शक्ति नहीं होती ।
(ख) उस एक रोटी से उनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों हृदय को मानो भोजन मिल गया।
उत्तर : आशय – हीरा और मोती गया के घर जब से आए थे, तब से उन्हें पेटभर खाने को नहीं मिला था। अपने बैलों को उसने भूसा, खली, चूनी सब दिया और इनको केवल सूखा भूसा दिया। वे व्यथित थे। तभी एक लड़की ने आकर उन्हें एक-एक रोटी खाने को दी। भयंकर भूख से पीड़ित बैलों की भूख तो इतनी-सी रोटी से नहीं मिट सकती थी, परन्तु बैलों का उस नन्हीं बच्ची की सहानुभूति से हृदय भर गया । उन्हें सन्तोष इस बात का हुआ कि यहाँ भी कोई उनका हितैषी है। वे प्रेम के भूखे थे। उनके प्रेम-पिपासु हृदय को लड़की ने एक ही रोटी से तृप्त कर दिया।
प्रश्न 10 – गया ने हीरा-मोती को दोनों बार सूखा भूसा खाने के लिए दिया; क्योंकि –
(क) गया पराये बैलों पर अधिक खर्च नहीं करना चाहता था।
(ख) गरीबी के कारण खली आदि खरीदना उसके बस की बात न थी ।
(ग) वह हीरा-मोती के व्यवहार से बहुत दुःखी था ।
(घ) उसे खली आदि सामग्री की जानकारी न थी ।
(सही उत्तर के आगे (√) का निशान लगाइए । )
उत्तर – (ग) वह हीरा मोती के व्यवहार से बहुत दुःखी था। (√)
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – ‘दो बैलों की कथा’ में कहानीकार प्रेमचन्द ने दुर्दशा के किन कारणों का चित्रण किया है?
उत्तर – कहानीकार प्रेमचन्द ने अपनी चर्चित कहानी ‘दो बैलों की कथा’ के माध्यम से प्राणिमात्र की दुर्दशा का प्रमुख कारण उसका अत्यधिक सीधापन, सरलता और सहनशीलता को माना है। उन्होंने बताया है कि आज के युग में इन गुणों को महत्त्व नहीं दिया जाता। जो व्यक्ति स्वभाव से सीधे – सच्चे, सरल व्यवहारवाले तथा कष्टों को चुपचाप सहन कर जानेवाले होते हैं उनका चतुर लोगों द्वारा लगातार शोषण होता रहता है। आज लोग ऐसे व्यक्तियों को सम्मान देते हैं, जो संघर्ष करना जानते हों, लड़ना-भिड़ना जानते हों। संघर्षशील मनुष्य को ही आज का समाज शक्तिशाली मानता है। शक्तिशाली और सभ्य उसी को माना जाता है, जो संघर्ष करने पर आमादा रहता हो। लेखक तर्क देते हैं कि यदि उनकी बात में सत्यता नहीं है तो फिर अफ्रीका और अमेरिका जैसे देशों में भारतीयों का सम्मान क्यों नहीं होता — इसीलिए क्योंकि भारतीय सीधे-सादे और परिश्रमी तो हैं ही, साथ ही चोट खाकर, अन्याय – शोषण सहकर भी चुपचाप रह जाते हैं। यदि वह भी जापानियों के समान युद्ध करना, विरोध जताना सीख लें तो निश्चय ही उन पर अन्याय-अत्याचार कम हो ।
कहानी के हीरा-मोती बैलों का सटीक उदाहरण सामने है। अपनी सरलता और सहनशीलता के कारण वे शोषण के शिकार होते हैं; परन्तु जैसे ही वे सींग चलाते हैं या विद्रोह करते हैं, उन पर अत्याचार कम हो जाते हैं। ·
प्रश्न 2 – हीरा – मोती को गया के साथ जाना क्यों स्वीकार न था? उन्होंने गया के प्रति अपना विरोध किस प्रकार प्रकट किया?
उत्तर – हीरा और मोती स्वाभिमानी और स्वामिभक्त बैल थे। वे अपने मालिक झूरी के यहाँ हर दशा में प्रसन्न थे। वे खूब मन लगाकर काम भी करते थे। गया के साथ जाना उन्हें बिल्कुल अच्छा इसलिए नहीं लग रहा था; क्योंकि उन्हें लगा कि स्वामी ने उनकी कोई कमी देखकर ही उन्हें गया के हाथों बेच दिया है। उनके मन में रोष था, इसलिए उन्होंने गया के साथ जाना स्वीकार न किया ।
गया के सामने अपना रोष और विरोध जताने के लिए वे मार्ग में अड़कर खड़े हो गए। गया उन्हें जिधर से भी हाँकता, वे दूसरी दिशा को भागते । मारने पर सींग नीचे करके जोर से हुँकारते। गया के लिए उन्हें घर तक हाँककर लाना बड़ी मुसीबत का काम हो गया था।
प्रश्न 3 – झूरी की पत्नी ने हीरा मोती को पहले नमकहराम कहा और फिर बाद में उनका माथा चूमकर प्यार जताया। उसने ऐसा क्यों किया?
उत्तर — झूरी की पत्नी ने अपने भाई गया के घर अपने बैलों की जोड़ी भेजी थी, परन्तु वे वहाँ से रात में ही भाग आए । हीरा और मोती का वहाँ से इस प्रकार भाग आना उसे अच्छा नहीं लगा। उसने इसे अपना अपमान माना। उसने गुस्से में उन्हें ‘नमकहराम’ तक कह डाला; क्योंकि उसे लगा कि हमारे बैलों ने हमारे ही द्वारा भेजे गए स्थान पर न टिककर हमारी ही खिलाफत की है।
दूसरी बार भी बैल गया के घर न टिके और अनेक मुसीबतें सहकर भी वापस झूरी के घर अपने थान पर आ गए। जिस प्रकार वे कीचड़ में सने हुए थे, शरीर से अत्यन्त दुर्बल व धूल-धूसरित थे, उसे देखकर उनकी मालकिन का सोया प्रेम जैसे जाग उठा। वह गया के घर की बात को भुला चुकी थी। हीरा मोती के गया के घर से गुम हो जाने से वह भी बहुत दुःखी थी। हीरा मोती के घर आ जाने से वह समझ गई कि उनके बैल उनके बिना नहीं रह सकते; क्योंकि वे स्वामिभक्त हैं। उनका यह मौन प्रेम देखकर झूरी की पत्नी की भी ममता जाग गई और उसने उनका माथा चूम लिया।
प्रश्न 4 – हीरा और मोती ने दूसरी बार गया के घर भेजे जाने का विरोध किस प्रकार प्रकट किया?
उत्तर – हीरा और मोती अपने स्वामी झूरी का घर छोड़कर गया के साथ नहीं जाना चाहते थे, परन्तु अगले ही दिन झूरी ने फिर से उन्हें उसके साथ भेज दिया। गुस्साए मोती ने गया को रास्ते भर तंग करके रख दिया। मोती ने मार्ग में उसे बैलगाड़ी समेत खाई में गिराना चाहा, परन्तु हीरा ने उसे रोक लिया। घर में जब उनके सामने सूखा चारा डाला गया तो उन्होंने उस भूसे की ओर देखा तक नहीं। उनके हल में न चलने की जिद पर अड़ जाने पर गया ने हीरा की नाक पर डण्डे मारे तो मोती ने उसके हल, जुआ, जोत, रस्सी सबकुछ तोड़-ताड़ डाले। अन्ततः उन दोनों ने वहाँ से चुपचाप निकल भागने की योजना बनाई। इस प्रकार उन्होंने दूसरी बार गया के यहाँ भेजे जाने का जोरदार विरोध किया।
प्रश्न 5- हीरा और मोती द्वारा साँड को बेदम करके गिरा देने की घटना से आपको क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर – हीरा और मोती द्वारा साँड को बेदम करके गिरा देने की घटना से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि शत्रु चाहे कितना भी भयंकर हो यदि समझदारी से, योजनाबद्ध ढंग से संगठित होकर उसका सामना किया जाए तो शत्रु को निश्चय ही परास्त किया जा सकता है। हीरा और मोती ने जब साँड को डौंकता हुआ अपनी ओर आते देखा तो वह एक बार तो भय खा गए। उन्होंने तुरन्त शत्रु को तौला कि यह तो हाथी जैसा भारी-भरकम हैं। लम्बे-चौड़े शरीरवाले इस सॉंड से यदि अकेले भिड़ना पड़ा तो दोनों ही मारे जाएँगे। तब हीरा और मोती ने तुरन्त निर्णय कर लिया कि वे उस पर एक साथ आक्रमण करेंगे। साँड ने जैसे ही उन पर हमला किया, दोनों बारी-बारी से दाएँ-बाएँ से उस पर चोट करने लगे। साँड एक पर चोट करता तो दूसरा उसके पेट में नुकीले सींग घुसेड़ देता। साँड को संगठित शत्रुओं से लड़ने का अनुभव नहीं था। वह थोड़ी ही देर में बेदम होकर गिर पड़ा। वास्तव में हीरा और मोती ने यह सिद्ध कर दिया कि संगठित आक्रमण के बल पर दुर्दान्त शत्रु पर भी विजय पाई जा सकती है।
