UK Board 9 Class Hindi Chapter 10 – ललद्यद (काव्य-खण्ड)
UK Board 9 Class Hindi Chapter 10 – ललद्यद (काव्य-खण्ड)
UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 10 – ललद्यद (क्षितिज : काव्य-खण्ड)
ललद्यद (वाख)
I. कवयित्री – परिचय
प्रश्न – कश्मीरी भाषा की प्रसिद्ध कवयित्री ललद्यद का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं, काव्यगत विशेषताओं और भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर- ललद्यद
ललद्यद कश्मीरी भाषा की प्रसिद्ध कवयित्री रही हैं। उनका नाम आधुनिक कश्मीरी भाषा के उन्नायकों में अग्रणी माना जाता है।
जीवन-परिचय — लोकप्रिय सन्त- कवयित्री ललद्यद का जन्म सन् 1320 ई० के लगभग कश्मीर स्थित पाम्पोर के सिमपुरा गाँव में हुआ था। उन्हें लला, लल्लेश्वरी, ललयोगेश्वरी, ललारिफा आदि नामों से भी जाना जाता है। वे जाति और धर्म के भेदभाव पर विश्वास नहीं करती थीं। वे धार्मिक आडम्बरों का विरोध करती थीं और प्रेम को सबसे बड़ा जीवन-मूल्य मानती थीं। उनकी मृत्यु सन् 1391 ई० के आस-पास मानी जाती है।
रचनाएँ— वाख।
काव्यगत विशेषताएँ- – ललद्यद का अधिकांश साहित्य काव्य रूप में है। अपने काव्य में उन्होंने हिन्दी के भक्तिकालीन कवियों के ही समान जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के भेदों से ऊपर उठकर ईश्वर की भक्ति पर जोर दिया है। उनके काव्य में धार्मिक आडम्बरों के विरोध और मानव- प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उन्होंने अपनी वाणी में जीवन की नश्वरता और ईश्वर की अमरता का गायन करते हुए प्रभु भक्ति पर विशेष बल दिया है। उन्होंने जीवन में समभाव अपनाने की प्रेरणा सभी मानवों को दी है। वे अपने एक वाख में कहती हैं-
खा खाकर कुछ पाएगा नहीं,
न खाकर बनेगा अहंकारी।
सम खा तभी होगा समभावी,
खुलेगी साँकल बन्द द्वार की ।
ललद्यद के वाखों में उनकी विचारधारा की स्पष्ट अभिव्यक्ति सुनाई पड़ती है।
भाषा-शैली- ललद्यद अपने ‘वाखों’ के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी काव्य – शैली को ‘वाख’ कहा जाता है। उनकी भाषा लोक-जीवन से प्रेरित है; अतः न उसमें पण्डिताऊ संस्कृत भाषा का दबाव है और न दरबारी फारसी का, बल्कि उनके ‘वाखों’ में जनता की सरल भाषा का प्रयोग हुआ है। आधुनिक कश्मीरी भाषा का वे स्तम्भ मानी जाती हैं। वे अपनी भाषा और शैली की स्वाभाविक प्रकृति के कारण आज भी कश्मीरी जनता की स्मृति और वाणी में जीवित हैं।
II. अर्थग्रहण तथा सराहना सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न— निम्नलिखित ‘वाख’ से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
1. रस्सी कच्चे …………. है घेरे ॥
शब्दार्थ – भवसागर = संसाररूपी समुद्र। कच्चे सकोरे = स्वाभाविक रूप से कमजोर । व्यर्थ = बेकार, निष्फल । हूक = तड़प, वेदना ।
प्रश्न –
(क) कवयित्री तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) वाख का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) कवयित्री ने ‘कच्चे धागे की रस्सी’ किसे कहा है?
(घ) ‘नाव’ का प्रतीकार्थ बताइए ।
(ङ) ‘पानी टपकने’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(च) कवयित्री का कौन-सा प्रयास व्यर्थ हो रहा है?
(छ) कवयित्री के जी में हूक क्यों उठ रही है?
(ज) वह कहाँ, किस घर में जाना चाहती है?
(झ) वाख का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ञ) वाख का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवयित्री – ललद्यद । कविता – वाख।
(ख) आशय – कवयित्री ललद्यद कहती हैं कि जीवनयापन के जितने भी साधन हैं, वे कच्चे धागे की रस्सी के समान अत्यन्त कमजोर और क्षणभंगुर हैं। इन्हीं के सहारे मैं अपनी जीवनरूपी भक्ति नौका को खेकर भवसागर के पार जाना चाहती हूँ। पता नहीं मेरी यह नौका भवसागर के पार जा भी पाएगी अथवा नहीं। मैं तो अब भगवान् भरोसे हूँ, न जाने कब मेरे देव मेरी पुकार सुनेंगे और मुझे इस संसार सागर पार ले जाएँगे।
ललद्यद आगे कहती हैं कि मेरा यह जीवन मिट्टी के कच्चे सकोरे के समान है, जिस पर समयरूपी जल की बूँदें निरन्तर गिर रही हैं और उसे गलाकर क्षीण कर रही हैं। अर्थात् यह शरीर समयरूपी जल के प्रभाव से क्षीण (बूढ़ा ) होता हुआ मृत्यु की ओर अग्रसर है। मेरे प्रभु – मिलन के सारे प्रयास व्यर्थ प्रतीत हो रहे हैं। मेरा हृदय रह-रहकर तड़प उठता है । मेरी व्याकुलता बढ़ती जा रही है कि मैं कब प्रभु से मिलूँगी। अब मैं अपने घर अर्थात् परमधाम (परमात्मा के निवास स्थान ) को जाना चाहती हूँ।
(ग) कवयित्री ने जीवन जीने के साधनों को ‘कच्चे धागे की रस्सी’ कहा है।
(घ) ‘नाव’ जीवन और प्रभु भक्ति का प्रतीक है।
(ङ) ‘पानी टपकने से आशय है— काल या समय जो धीरे-धीरे जीवनरूपी कच्चे सकोरे को गला रहा है।
(च) कवयित्री का ईश्वर प्राप्ति का प्रयासं व्यर्थ हो रहा है। वह ईश्वर – भक्ति और साधना के लिए निरन्तर प्रयास कर रही है, परन्तु उसे किसी भी प्रयास से सफलता नहीं मिल रही है।
(छ) कवयित्री के हृदय ईश्वर से मिलने की तड़प है। वह बार-बार चाहकर भी उसका सान्निध्य नहीं प्राप्त कर पा रही है। उसकी प्रभु से मिलने की तड़प, व्याकुलता और वेदना शान्त नहीं हो पा रही है, इसलिए उसके जी में उस देव से मिलने की हूक बार-बार उठती है।
(ज) कवयित्री परमात्मा के घर जाना चाहती है अर्थात् मोक्ष चाहती है।
(झ) भाव – सौन्दर्य – इस वाख में प्रभु – मिलन की उत्कट व्याकुलता प्रकट हुई है। उसके स्वर में वेदना है, तड़प है और ईश्वर के दर्शन पाने की पुकार है।
(ञ) शिल्प-सौन्दर्य-
● भाषा अत्यन्त सरल – मधुर है। अभिव्यक्ति में सादगी है।
● ‘घर’ परमात्म- लोक ( परमधाम ) का प्रतीक है।
● ‘ रह रह ‘ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
● ‘नाव’ का प्रतीकार्थ है— जीवन और प्रभु भक्ति । रूपक अलंकार है।
● जीवन के साधनों की तुलना कच्चे धागे की रस्सी से की गई है। नश्वरता के लिए यह उपमान सुन्दर बन पड़ा है। रूपकातिशयोक्ति अलंकार है।
2. खा-खाकर कुछ …………… द्वार की।
शब्दार्थ – अहंकारी = घमण्डी । सम = अन्त:करण और बाह्य इन्द्रियों पर संयम। समभावी = समानता की भावना रखनेवाला। सांकल = कुण्डी ।
प्रश्न –
(क) कवयित्री तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) वाख का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) खा-खाकर कुछ क्यों नहीं प्राप्त होता?
(घ) न खाने से मनुष्य अहंकारी क्यों बनता है?
(ङ) सम खाने का आशय स्पष्ट कीजिए।
(च) वाख में कवयित्री क्या प्रेरणा देना चाहती है?
(छ) ‘बन्द द्वार’ से क्या अभिप्राय है?
(ज) ‘समभावी’ कौन कहा जा सकता है?
(झ) वाख का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ञ) वाख का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवयित्री – ललद्यद । कविता – वाख।
(ख) आशय – कवयित्री कहती है- हे मनुष्य! तू सांसारिक भोगों में स्वयं को भुला मत। भोगों से कुछ प्राप्त नहीं होगा और न ही भोग के ठीक विपरीत त्याग और तपस्या का जीवन बिताने से तुझे कुछ प्राप्त होगा। हाँ, त्याग तपस्या का जीवन जीने से एक बात अवश्य होगी कि इससे मन में अहंकार उत्पन्न हो जाएगा। यदि तुझे अपने जीवन का उद्धार करना है तो तू भोग और त्याग के बीच का मध्यम मार्ग अपना ले। इन्द्रियों पर उचित संयम रखना ही मध्यम मार्ग है। इसके द्वारा तू सुख-दुःख और भोग-त्याग के बीच समान भाव से रहना सीख। इसी सम मनोदशा से तुझे प्रभु प्राप्ति के बन्द द्वार खोलने में सहायता मिलेगी और प्रभु से तेरा मिलन होगा।
(ग) खाने का अर्थ यहाँ उपभोग से है। भोगों का जितना अधिक उपभोग किया जाता है, मन उतना ही प्रभु से दूर हटता जाता है और ईश्वर की साधना में मन नहीं रमता। इसलिए अधिक भोग से व्यक्ति को कुछ शाश्वत प्राप्त नहीं होता।
(घ) न खाने से अर्थात् इन्द्रियों पर संयम रखने से और त्याग-तपस्या का जीवन जीने से मनुष्य स्वयं को बड़ा भारी त्यागी, महात्मा और सन्त मानने लगता है। इस प्रकार मनुष्यं न खाने से अहंकारी बन जाता है।
(ङ) सम खाने से आशय है- भोगों पर उचित नियन्त्रण रखना। न तो भोगों से दूर रहना और न ही भोगों में लिप्त रहना अर्थात् सम्यक् उपभोग करना, उचित मात्रा में भोग करना ।
भोगों को भोगकर न सुख (आनन्द) का अनुभव करना और भोगों के अभाव न दुःख ‘अथवा पीड़ा का अनुभव करना अर्थात् दोनों ही स्थितियों एकसमान रहना ही सम खाने का आशय है।
(च) वाख में कवयित्री मनुष्य को जीवन में सहजता और समभाव को अपनाने का सन्देश देकर प्रभु से मिलने की प्रेरणा देना चाहती है।
(छ) ‘बन्द द्वार’ से अभिप्राय है— प्रभु – मिलन के मार्ग की बाधा।
(ज) ‘समभावी’ उसे कहा जा सकता है जो भोग और त्याग के बीच का मध्यम मार्ग अपनाता है। अर्थात् जो न भोग में सुख का अनुभव करता है और न त्याग में कष्ट का, बल्कि दोनों ही स्थितियों में एकसमान रहता है, वही समभावी है।
(झ) भाव – सौन्दर्य – सहज जीवन-शैली अपनाते हुए सरल भाव से ईश्वर की भक्ति में रत रहने और प्रभु -प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयास करने की प्रेरणा कवयित्री ने बड़ी सादगी से प्रकट की है। सम्बोधन शैली से कथन में सजीवता आ गई है।
(ञ) शिल्प-सौन्दर्य-
● भाषा अत्यन्त सरल, सुबोध एवं उपेदशात्मक है।
● खा-खाकर में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
● ‘बन्द द्वार की सांकल’ में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है।
● सम्बोधन शैली का प्रयोग हुआ है।
3. आई सीधी ……………….. क्या उतराई ?
शब्दार्थ – सुषुम – सेतु = सुषुम्ना नाड़ी के मध्य (यह नाड़ी इड़ा और पिंगला नाड़ियों के मध्य स्थित है)। माझी = नाविक, खेवट, पार उतारनेवाला, यहाँ ईश्वर |
प्रश्न –
(क) कवयित्री तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) वाख का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘गई न सीधी राह’ से क्या अभिप्राय है?
(घ) ‘सुषुम-सेतु’ किसे कहा गया है?
(ङ) कवयित्री ने अपना दिन कैसे बिता दिया?
(च) ‘माझी’ कौन है? कवयित्री उसके सामने क्यों परेशान है?
(छ) वाख का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ज) वाख का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवयित्री – ललद्यद । कविता – वाख।
(ख) आशय – कवयित्री कहती है— मैं आई तो थी सीधी राह से, परन्तु चल पड़ी उल्टी राह पर अर्थात् जब मेरा जन्म हुआ था तो मैं सभी प्रकार के छल-छद्म से दूर थी, मेरा मन अत्यन्त स्वच्छ था। अब जब मेरे जाने का समय हो गया है तो विभिन्न प्रकार के पापों और छल छद्म से मेरा मन मलिन हो गया है। इस प्रकार मैं वापसी के लिए टेढ़े मार्ग को अपना रही हूँ। आशय यही है कि मैंने अपने जीवन में छल-छद्म करके पापों का अर्जन ही किया है, सद्कर्म एक भी नहीं किया, जबकि मुझे इसके विपरीत मार्ग अपनाना चाहिए था अर्थात् मुझे सद्कर्मों से पुण्यार्जन करना था, छल-छद्म से एक भी पाप नहीं करना था। कवयित्री परमात्मा की प्राप्ति के पथ पर ठीक ही चल पड़ी थी, परन्तु उसने सहज मार्ग न पकड़कर हठयोग का मार्ग पकड़ लिया। वह जीवनभर सुषुम्ना नाड़ी को साधने का प्रयास करती रही, कुण्डलिनी जागरण की कोशिश करती रही। इसी कोशिश में सारा जीवन बीत गया अर्थात् हठयोग साधना के द्वारा सुषुम्ना नाड़ी को साधने के क्रिया- व्यापार से उसे कुछ भी तो प्राप्त नहीं हुआ है।
इस प्रकार जब मैं जीवन और मृत्यु के दोराहे पर खड़ी अपने जीवन का लेखा-जोखा देखता हूँ तो मुझे पता चलता है कि मेरे पाप-पुण्य की जेब (गठरी) तो बिल्कुल खाली है, उसमें पुण्य अथवा सद्कर्मरूपी एक भी कौड़ी नहीं है। वह तो परमात्मा को जवाब देने योग्य भी नहीं रह गई। अब यदि माझीरूपी परमेश्वर मुख पर दया करके भवसागर से पार उतार भी दे तो उतराई के नाम पर देने के लिए मेरे पास कुछ भी तो नहीं है। ऐसी हालत में माझी (परमेश्वर) से वह क्या आशा करे कि वह उसे पार ले जाएगा ? (शायद नहीं) ।
(ग) ‘गई न सीधी राह से आशय है— कवयित्री सत्य, सद्कर्म और भक्ति के मार्ग को छोड़कर छल – छद्मपूर्ण जीवन-मार्ग पर चलती रही, वह भक्ति के सरल मार्ग पर न चलकर हठयोग के कठिन मार्ग पर चल पड़ी।
(घ) ‘सुषुम-सेतु’ सुषुम्ना नाड़ी की साधना को कहा गया है। हठयोगी सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से कुण्डलिनी जाग्रत करने के लिए विभिन्नं प्रकार की योग साधना करते हैं। सुषुम्ना के इसी माध्यम को सुषुम-सेतु कहा गया है।
(ङ) कवयित्री ने अपना दिन अर्थात् अपनी जाग्रत अवस्था या जीवन व्यर्थ की हठयोग साधना में बिता दिया ।
(च) ‘माझी’ ईश्वर है। वही इस भवसागर को पार कराने की शक्ति रखता है। वही जीवनरूपी नाव का नाविक है। कवयित्री उसके सामने इसलिए परेशान है; क्योंकि उसके पास उसे उतराई के रूप में देने को कुछ भी नहीं है। कवयित्री ने हठयोग साधना में रत होकर कुछ भी प्राप्त नहीं किया।
(छ) भाव – सौन्दर्य – वाख में हठयोग साधना की विफलता को कवयित्री ने बड़ी भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी है। जीवन में कुछ भी उपलब्धि न होने की निराशा जैसे जीवन्त हो उठी है।
(ज) शिल्प-सौन्दर्य-
● भाषा सरलता, सुबोधता एवं सादगी से परिपूर्ण है।
● ‘सुषुम – सेतु’ में अनुप्रास अलंकार है ।
● ‘सुषुम – सेतु’ विशिष्ट प्रयोग है। यह हठयोग साधना का पारिभाषिक शब्द है। कवयित्री ने इसे सरल बनाकर प्रयोग किया है।
● अन्योक्ति अलंकार का सुन्दर प्रयोग हुआ है। सीधी राह, सुषुम-सेतु, बीत गया दिन, जेब टटोली, कौड़ी, माझी, उतराई — इन सबके प्रतीकार्थ हैं।
4. थल-थल में ………………. से पहचान ॥
शब्दार्थ – थल = धरती, स्थल। शिव = शंकर भगवान्। साहिब = ईश्वर, सबका पिता ।
प्रश्न –
(क) कवयित्री तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) वाख का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) कवयित्री अपने प्रभु को किस नाम से पुकारती है और क्यों?
(घ) कवयित्री ज्ञानी को क्या जानने की प्रेरणा देती है?
(ङ) ईश्वर की पहचान कैसे हो सकती है?
(च) ‘ कवयित्री साम्प्रदायिक भेदभाव से दूर है ‘ कैसे ?
(छ) वाख का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ज) वाख का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवयित्री – ललद्यद । कविता – वाख ।
(ख) आशय – कवयित्री कहती है— परमात्मा सर्वशक्तिमान् है। वह कल्याणकारी और सर्वव्यापी है। इसलिए चाहे कोई हिन्दू हो या मुसलमान, उसे अपनाने में किसी को भी भेदभाव नहीं करना चाहिए। कवयित्री ज्ञानी मनुष्यों को सम्बोधित करती हुई कहती है- हे ज्ञानी! अगर तू सच्चा ज्ञानी है तो पहले स्वयं को जान। अपने आत्म-स्वरूप को पहचान। आत्मा से ही परमात्मा को पहचाना जा सकता है।
(ग) कवयित्री अपने प्रभु को ‘शिव’ नाम से पुकारती है। ‘शिव’ का अर्थ है ‘कल्याणकारी’ और कवयित्री प्रभु को कल्याणकारी मानती है।
(घ) कवयित्री ज्ञानी मनुष्य को प्रेरणा देती है कि वह अपने भीतर स्थित आत्मा को पहचाने, अपने वास्तविक स्वरूप को जाने।
(ङ) ईश्वर की पहचान अपनी आत्मा को जानने के बाद ही हो सकती है; अतः ईश्वर को पहचानने का मार्ग आत्मज्ञान है।
(च) कवयित्री हिन्दू और मुसलमान दोनों को ही ‘शिव-आराधना’ अर्थात् सर्व-कल्याण के लिए प्रेरित करती है। इससे यह स्पष्ट है कि वह दोनों धर्मों के लोगों का कल्याण चाहती है। उसके मन में साम्प्रदायिक भेदभाव बिल्कुल नहीं है।
(छ) भाव – सौन्दर्य – इस वाख में कवयित्री ने साम्प्रदायिक एकता और आत्मज्ञान की प्रेरणा अत्यन्त सरल भाषा में सहजतापूर्वक और रोचक ढंग से दी है। यह उपदेश सुमधुर ढंग से दिया गया है।
(ज) शिल्प – सौन्दर्य-
● भाषा अत्यन्त सरल, सहज, सरस और सुगम है।
● अभिव्यक्ति में सादगी और निश्छलता है।
● सम्बोधन शैली का प्रयोग हुआ है।
● ‘थल – थल’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
● संस्कृत के शब्दों का प्रयोग भी बड़ी सहजता हुआ है।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – ‘रस्सी’ यहाँ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? और वह कैसी है?
उत्तर— ‘रस्सी’ यहाँ जीवन जीने के साधनों और शरीर के लिए प्रयोग हुआ है। यह रस्सी स्वभाव में कच्ची अर्थात् नश्वर है।
प्रश्न 2 – कवयित्री द्वारा मुक्ति के लिए किए जानेवाले प्रयास व्यर्थ क्यों हो रहे हैं?
उत्तर – कवयित्री का जीवन बीता जा रहा है। उसकी उम्र बढ़ती से जा रही है और मृत्यु के क्षण निकट आते जा रहे हैं; किन्तु प्रभु मिलने का कोई संयोग नहीं बन पा रहा है। इसीलिए उसे लगता है कि उसकी सारी साधना व्यर्थ हुई जा रही है अर्थात् साधना असफल हो रही है।
प्रश्न 3 – कवयित्री का’ घर जाने की चाह’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर— ‘घर जाने की चाह से अभिप्राय है— ‘परमात्मा से मिलन।’
प्रश्न 4 – भाव स्पष्ट कीजिए—
(क) जेब टटोली कौड़ी न पाई।
उत्तर : भाव-स्पष्टीकरण — कवयित्री को अनुभव होता है कि वह पहले तो छल-छद्म के मार्ग पर चलती रही और फिर जीवनभर हठयोग साधना करती रही, परन्तु उसे ईश्वर प्राप्ति में कोई सफलता नहीं मिल सकी और न ही कोई पुण्यार्जन कर सकी। उसने जब अपनी जेब टटोली अर्थात् उपलब्धियों पर गौर किया तो कौड़ी भी न मिली अर्थात् उसे कुछ भी उपलब्धि न हो पाई।
(ख) खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,
न खाकर बनेगा अहंकारी।
उत्तर : भाव- स्पष्टीकरण – मनुष्य भोग कर-करके अपना जीवन नष्ट कर डालता है, किन्तु उसे कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं हो पाती है। परमात्मा से वह दिन-पर-दिन दूर होता जाता है। भोग करना एक प्रकार से प्रभु के मार्ग से भटकना है।
भोगों का तिरस्कार करनेवाला अर्थात् त्यागी – तपस्वी; व्रती एवं महात्मा कहलाता अवश्य है, परन्तु इसीलिए वह अहंकारी भी हो जाता है। वह स्वयं को सबसे ऊँचा मानने लगता है, इसी कारण वह परमसत्ता को प्राप्त करने के महान् उद्देश्य से भटक जाता है।
प्रश्न 5 – बंद द्वार की साँकल खोलने के लिए ललद्यद ने क्या उपाय सुझाया है?
उत्तर – बन्द द्वार की साँकल खोलने के लिए ललद्यद ने सुझाव दिया है कि भोग और त्याग के बीच सन्तुलन बनाए रखो । न तो भोगों में पूरी तरह स्वयं को लिप्त करो और न ही त्याग, तप, उपवास में शरीर को कष्ट दो। दोनों ही स्थितियों में प्रभु-मिलन के मार्ग से भटकाव सम्भव है; अत: तुम मध्यम मार्ग अपनाओ। प्रभु – मिलन का द्वार तभी खुलेगा।
प्रश्न 6 – ईश्वर – प्राप्ति के लिए बहुत-से साधक हठयोग जैसी कठिन साधना भी करते हैं, लेकिन उससे भी लक्ष्य-प्राप्ति नहीं होती। यह भाव किन पंक्तियों में व्यक्त हुआ है?
उत्तर- उपर्युक्त भाव निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त हुआ है-
आई सीधी राह से गई न सीधी राह ।
सुषुम – सेतु पर खड़ी थी, बीते गया दिन आह!
जेब टटोली कौड़ी न पाई ।
माझी को क्या दूँ उतराई ?
प्रश्न 7 – ‘ज्ञानी’ से कवयित्री का क्या अभिप्राय है?
उत्तर- ‘ज्ञानी’ से कवयित्री का अभिप्राय है— जिसने परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लिया हो, जिसे आत्मा का बोध हो गया हो।
