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UK Board 9 Class Hindi Chapter 11 – रसखान (काव्य-खण्ड)

UK Board 9 Class Hindi Chapter 11 – रसखान (काव्य-खण्ड)

UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 11 – रसखान (क्षितिज : काव्य-खण्ड)

रसखान (सवैये)

I. कवि-परिचय
प्रश्न- कृष्णभक्त कवि रसखान के जीवन का संक्षिप्त परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं और भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। उनकी किन्हीं दो रचनाओं का नामोल्लेख भी कीजिए ।
उत्तर- रसखान
जीवन-परिचय- कृष्णभक्त कवि रसखान का मूलनाम सैयद इब्राहिम था। उनका जन्म राजवंश से सम्बन्धित एक पठान परिवार में दिल्ली में सन् 1548 ई० में हुआ था। इस्लाम धर्मावलम्बी होते हुए भी रसखान जीवनभर कृष्ण की प्रेमा-भक्ति में रसमग्न रहे। कृष्ण में उनकी अनन्य भक्ति देखकर गोस्वामी विट्ठलनाथजी ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया था। बाल्यावस्था से ही वे बड़े प्रेमी जीव थे। आगे चलकर यही प्रेम परमेश्वर की परमलीला के प्रति प्रेम में विकसित हो गया। ऐसी लोकश्रुति है कि उन्हें श्रीनाथजी के मन्दिर में भगवान् श्रीकृष्ण के साक्षात् दर्शन हुए थे। तब से ही वे ब्रजभूमि में रहने लगे और फिर आजीवन वहीं रहे। सन् 1628 ई० के आस-पास उनका निधन हो गया।
रचनाएँ- रसखान की दो रचनाएँ उपलब्ध है—’सुजान रसखान’ और ‘प्रेमवाटिका’। ‘सुजान रसखान’ में कृष्ण-प्रेम पर आधारित कवित्त और सवैये है तथा ‘प्रेमवाटिका’ में प्रेमविषयक दोहे संगृहीत हैं।
काव्यगत विशेषताएँ- रसखान का सम्पूर्ण साहित्य कृष्ण के प्रेम-रस से भरा हुआ है। उनकी रचनाओं का विषय है— कृष्ण भक्ति । अपने आराध्य देव कृष्ण की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम और भक्ति को वे कृष्ण की ही आराधना और भक्ति मानते हैं। वे श्रीकृष्ण की प्रत्येक वस्तु पर मुग्ध हैं— चाहे वह कृष्ण की रूप-माधुरी हो, बाँसुरी हो, वेशभूषा हो या फिर बाल लीला – सब रसखान के लिए मग्न हो जाने और काव्य करने का विषय हैं। उनकी अभिव्यक्ति का आधार हैं— कृष्ण की जन्मभूमि, ब्रज का यमुनातट, वहाँ के वन – उपवन, पशु-पक्षी, पर्वत, नदियाँ। इन सबसे उन्हें अनन्य प्रेम है। रसखान के साहित्य में कृष्ण-रस इस प्रकार प्रवाहित हो रहा है कि वह पाठक को कृष्ण-भक्ति में लीन किए बिना नहीं रहता। कृष्ण के अतिरिक्त उन्हें संसार में कुछ भी प्रिय, आकर्षक और श्रेष्ठ नहीं लगता। वे उसी व्यक्ति का जीवन सफल मानते हैं, जो कृष्ण की भक्ति में लीन हो । रसखान के काव्य में उनकी कृष्ण-भक्ति; पवित्र, निश्छल, निःस्वार्थ और निवेदन- प्रधान है। उनके सवैयों में उनकी भावुक भक्ति और कृष्ण में तल्लीनता देखने योग्य है।
भाषा-शैली-रसखान की काव्य भाषा सरस, सरल एवं सुमधुर है। आडम्बरहीन सहज स्वाभाविक भाषा और सहज रूप से आए अलंकार उनकी भाषा को सहज सौन्दर्य प्रदान करते हैं। उनके शब्दों का क्रम झरने के अविरल प्रवाह की याद दिलाता है। उनके काव्य की भाषा उनके आराध्य कृष्ण की ब्रजभाषा है। काव्य में मुहावरों के स्वाभाविक प्रयोग ने रसखान के काव्य को और भी लोकप्रियता प्रदान की है। उनका काव्य लोकसाहित्य और शास्त्र दोनों की चुनौतियों का सुन्दर उत्तर है। उनकी-सी स्पष्टता अन्यत्र असम्भव ही लगती है।
अपने काव्य में उन्होंने दोहा, कवित्त और सवैया तीनों छन्दों का पूरे अधिकार से प्रयोग किया है। सवैया छन्द के प्रयोग के तो वह पर्याय ही बन चुके हैं। उनके जैसा साधिकार रसमय सवैया की खान हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। छन्द-लेखन शायद ही कहीं पढ़ने को मिले। रसखान वास्तव में ‘रस
II. अर्थग्रहण तथा सराहना सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न – निम्नलिखित सवैयों से सम्बन्धित प्रश्नों के यथोचित उत्तर दीजिए-
1. मानुष हौं ……………. की डारन ॥
शब्दार्थ – मानुष = मनुष्य, मानव। बसौं = रहूँ, बसूँ, निवास करूँ। ग्वारन = ग्वालों के। जौ = यदि। पसु = पशु। कहा बस = क्या वश है, दूसरा अर्थ है – मेरा बस इतना कहना है। चरौं = चरूँ। नित = सदा । धेनु = गाय । मँझारन = मध्य में, बीच में। पाहन = पत्थर । गिरि = पर्वत । छत्र = छत, छतरी। पुरन्दर = इन्द्र। धारन = धारण। खग = पक्षी । बसेरो = निवास | कालिन्दी = यमुना। कूल = किनारा। डारन = डालियाँ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) सवैया का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) कवि अगले जन्म में कहाँ रहना चाहता है और क्यों?
(घ) रसखान मनुष्य के रूप में अगले जन्म में क्या बनना चाहते हैं और क्यों?
(ङ) कवि अगले जन्म में कौन-सा पशु बनना चाहता है और क्यों?
(च) रसखान पत्थर क्यों बनना चाहते हैं?
(छ) रसखान पक्षी के रूप में जन्म क्यों लेना चाहते हैं?
(ज) सवैये का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(झ) सवैये का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि-रसखान ( सैयद इब्राहिम) । कविता – सवैये ।
(ख) आशय – कवि रसखान ब्रजभूमि के प्रति अपना अनुराग प्रकट करते हुए कहते हैं— यदि मैं अगले जन्म में मनुष्य बनूँ तो गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहूँ। यदि मैं पशु के रूप में संसार जन्म लूँ (जिस पर मेरा कोई वश नहीं) तो मेरा तो बस यही कहना है कि मैं गाय के रूप में जन्म लेकर प्रतिदिन नन्द की गायों के बीच ब्रजभूमि पर विचरण करूं। यदि ईश्वर मुझे अगले जन्म में तो फिर उस गोवर्धन पर्वत का अंग बनाए, जिसे गोकुलवासियों को इन्द्र के कोप से बचाने के लिए कृष्ण ने छत्र (छत या छतरी) के रूप में अपनी उँगली पर धारण कर लिया था । यदि ईश्वर मुझे पक्षी बनाए तो मैं यमुना के तट पर स्थित कदम्ब की डालों के बीच अपना बसेरा बनाऊँगा । इस प्रकार मैं ब्रजभूमि से सदैव अपना सम्बन्ध बनाए रखना चाहता हूँ।
(ग) कवि अपने अगले जन्म में ब्रजभूमि में निवास करना चाहता है। उसे क्योंकि अपने आराध्य कृष्ण तथा उनकी लीला – भूमि से असीम प्रेम है, इसलिए वह ब्रजभूमि का सान्निध्य पाकर श्रीकृष्ण के समीप बना रहेगा, उसे कृष्ण के दर्शन होते रहेंगे।
(घ) रसखान अगले जन्म में मनुष्य के रूप में ग्वाला बनना चाहते हैं और कृष्ण के बाल सखा के रूप में ग्वाल-बालों के संग ब्रजभूमि में निवास करना चाहते हैं। ऐसा करके वह श्रीकृष्ण के साथ अपने निकट सम्बन्ध बनाए रखना चाहते हैं।
(ङ) कवि अगले जन्म में पशु के रूप में गाय का जन्म लेना चाहते हैं, जिससे कि वे नन्द की गायों के बीच रह सकें। वे इस प्रकार कृष्ण के समीप रहने का सुख उठा सकेंगे।
(च) रसखान गोवर्धन पर्वत का पत्थर इसलिए बनना चाहते हैं; क्योंकि गोवर्धन ही वह पर्वत है, जिसे कृष्ण ने अपनी उँगली पर धारण करके ब्रज की इन्द्र के कोप से रक्षा की थी। इस पर्वत का पत्थर बनने से कवि को उनका सामीप्य और महत्ता दोनों प्राप्त हो जाएँगे ।
(छ) रसखान अगले जन्म में पक्षी का रूप लेकर भी ब्रजभूमि में ही रहने के लिए व्याकुल हैं। पक्षी के रूप में जन्म लेकर वह यमुना तट पर खड़े कदम्ब के पेड़ों की डाल पर बसेरा बनाकर रहना चाहते हैं, जिससे कि कृष्ण के द्वारा वहाँ की जा रही लीलाओं का रस लूट सकें।
(ज) भाव – सौन्दर्य – रसखान का ब्रजभूमि के प्रति प्रेम अतुलनीय है। अपने आराध्य की लीलास्थली से ऐसा प्रेम अन्यत्र दुर्लभ है। रसखान के इस प्रेम में जैसे भावमयता जीवन्त हो उठी है। उनका ब्रजभूमि के प्रति प्रेम पाठक को भी रस-विभोर कर देता है।
(झ) शिल्प-सौन्दर्य-
● ब्रजभाषा का माधुर्य, सरसता एवं कोमलता इस सवैये में साकार हो उठी है।
● संगीत, लय, छन्द, प्रवाह की दृष्टि से यह अत्यन्त सफल सवैया है।
● कवि की कल्पना-शक्ति अनुपम है।
● अनुप्रास की छटा दर्शनीय है— बसौं ब्रज, गोकुल गाँव के ग्वारन, नित नन्द की धेनु मँझारन, बसेरो करौं, मिलि कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन ।
2. या लकुटी ……………… ऊपर वारौं ॥
शब्दार्थ- या = इस। लकुटी = लाठी। अरु = और। कामरिया = कम्बली, पतला कम्बल। तिहूँ = तीनों । पुर = लोक, नगर । तजि = त्याग। डारौ = दूँ, डाल दूँ। आठहुँ सिद्धि = आठों सिद्धियाँ (अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व)। नवौ निधि = नौ निधियाँ (महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकन्द, कुन्द, नील, खर्व — कुबेर की निधियाँ) । बिसारौं = भूलूँ, भूल जाऊँ। तड़ाग = तालाब। निहारौं = देखूँ। कोटिक = करोड़ों। कलधौत = सोना, सुवर्ण। धाम = घर। कुंजन = लताओं के मण्डप। वारौं = न्योछावर कर दूँ ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) सवैया का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) आठों सिद्धियों के नाम बताइए।
(घ) नौ निधियों के नाम बताइए ।
(ङ) कवि किसकी लाठी और कम्बल पर तीनों लोकों का राज न्योछावर करने को तत्पर है और क्यों?
(च) नन्द की गाय चराने का कवि क्या मूल्य देना चाहता है और क्यों?
(छ) करील की कुंजों पर कवि क्या न्योछावर करना चाहता है और क्यों?
(ज) ‘रसखान का ब्रजभूमि से प्रेम अनुपम है।’ सिद्ध कीजिए।
(झ) ‘रसखान का ब्रज- प्रदेश से गहरा लगाव है।’ सिद्ध कीजिए।
(ञ) सवैये का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ट) सवैये का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि-रसखान ( सैयद इब्राहिम) | कविता – सवैयें।
(ख) आशय – रसखान कहते हैं— कृष्ण की लाठी और कम्बली के बदले मैं तीनों लोकों का राज भी खुशी से त्याग दूँ। नन्द की गायों को चराने के बदले संसार की आठों सिद्धियों और कुबेर की नौ निधियों के सुखों को भी छोड़ दूँ। कब मैं अपनी आँखों से ब्रज प्रदेश के वनों, उपवनों और सरोवरों को देख सकूँगा? करील के घने लता – मण्डपों को देखकर तो मन होता है कि इनमें निवास करने के लिए करोड़ों सोने के महलों (भवनों) को भी इन पर न्योछावर कर दूँ।
(ग) आठ सिद्धियों के नाम इस प्रकार हैं— अणिमा, गरिमा, लघिमा प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा ईशित्व, वशित्व ।
(घ) नौ निधियों नाम इस प्रकार हैं— महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, खर्व ।
(ङ) कवि कृष्ण की लाठी और कम्बली के बदले में तीनों लोकों का राज़ न्योछावर करने के लिए तत्पर है। उसे कृष्ण की हर वस्तु से लगाव है । इसलिए वह यह त्याग करने के लिए तैयार है।
(च) नन्द की गायों को चराने के बदले कवि आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख को भी त्याग सकता है। कारण यह है कि नन्द की गाय चराने में उसे कृष्ण के सान्निध्य का अवसर मिलेगा, जो कि उसके लिए अमूल्य है।
(छ) कवि रसखान करील के कुंजों पर सोने के करोड़ों भवन न्योछावर कर सकते हैं। इसका कारण यह है कि करील के वन-उपवन कृष्ण की लीला – भूमि रहे हैं। कृष्ण की प्रत्येक वस्तु पर भक्त – कवि रसखान अपना सबकुछ न्योछावर कर सकते हैं। कवि को उनमें कृष्ण की निकटता का अनुभव जो होता है।
(ज) कवि को ब्रजभूमि से अद्भुत प्रेम है। वे वहाँ के वन – उपवन, सरोवरों, करील के कुंजों को निहारते रहना चाहते हैं। उनके सामने संसार के अन्य सभी सौन्दर्य और सुखं उन्हें व्यर्थ जान पड़ते हैं। वह उन पर सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर हैं।
(झ) रसखान का ब्रज- प्रदेश से गहरा लगाव है, यह सत्य है; यदि ऐसा न होता तो वे ब्रज के कण-कण में बस जाने की बात न करते और न ही वहाँ की कृष्ण से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु पर सर्वस्व न्योछावर करने की बात करते ।
(ञ) भाव – सौन्दर्य – इस सवैये में रसखान का कृष्ण- प्रेम तथा कृष्ण की लीला – भूमि ब्रज- प्रदेश गहरा प्रेम प्रदर्शित हुआ है। कवि की समर्पण भावना और भावुकता भक्त हृदय को सीधे प्रभावित करती है।
(ट) शिल्प-सौन्दर्य-
● यह सवैया संगीत, लय और छन्द की दृष्टि से अत्यन्त मनोरम है।
● छन्द की भाषा सरस, सुमधुर और प्रवाहपूर्ण ब्रजभाषा है।
● अनुप्रास अलंकार की छटा देखते ही बनती है। उदाहरणार्थ- नवौ निधि, गाइ चराइ, ब्रज के बन बाग तड़ाग, कोटिक एकल धौत के धाम, करील के कुंजन |
3. मोरपखा सिर …………. न धरौंगी ॥
शब्दार्थ – मोरपखा = मोर का पंख, मोर के पंखों से बना मुकुट | गुंज = घुँघची, एक पौधे पर उगनेवाला विशेष प्रकार का लाल रंग का दाना । गरे = गले में। पितम्बर = पीला वस्त्र । लकुटी = लाठी | गोधन = गायरूपी धन, गायें। ग्वारनि = ग्वालों । भावतो = अच्छा लगता है। स्वाँग = रूप धारण करना, भेष बनाना। मुरलीधर = कृष्ण। अधरान = अधरों पर, होंठों पर। धरौंगी = रखूँगी ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) सवैया का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) कृष्ण के सभी स्वाँग करने को कौन तैयार है और क्यों?
(घ) होंठों पर मुरली कौन, क्यों नहीं रखना चाहता ?
(ङ) ‘मुरलीधर’ किसे कहा गया है और क्यों?
(च) ‘मोरपखा’ क्या चीज है?
(छ) सवैये में किसने किसे सम्बोधित किया है?
(ज) सवैये का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(झ) सवैये का शिल्प सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि-रसखान (सैयद इब्राहिम) | कविता – सवैये ।
(ख) आशय – कृष्ण से अनुराग रखनेवाली एक गोपी अपनी दूसरी अन्तरंग सखी से कहती है— है सखी! मैं कृष्ण के प्रेम में अपने सिर पर मोरपंखों का बना मुकुट पहन लूँगी। अपने गले में गुंजा की माला डाल लूँगी। कृष्ण का सा रूप धारण करने के लिए मैं कृष्ण के ही जैसे पीले वस्त्र भी धारण कर लूंगी। और क्या कहूँ; मैं तो कन्हैया की तरह अपने हाथों में लाठी लेकर गायों और ग्वालों के संग वन-वन उन्हें चराती घूमती रहूँगी। वह कृष्ण मेरे मन को बहुत लुभाता है। उससे मुझे बहुत ही प्रेम है, इसलिए तेरे कहने पर मैं यह सारा स्वाँग रच लूँगी, परन्तु ऐ सखी! कृष्ण ने जिस मुरली को अपने होंठों पर रखा था, उस मुरली को मैं किसी भी स्थिति में अपने अधरों पर स्थान नहीं दे सकती। यही वह मुरली है जिसके कारण कृष्ण ने हमें विस्मृत कर रखा है।
(ग) कृष्ण के अनुराग में पगी एक गोपी कृष्ण के सभी स्वाँग करने को तैयार है; क्योंकि वह कृष्ण से असीम प्रेम करती है। कृष्ण का स्वांग रचकर वह कृष्णमय हो जाना चाहती है, कृष्ण के रूप में रम जाना चाहती है।
(घ) गोपी अपने होंठों पर मुरली नहीं रखना चाहती। वह मुरली कें प्रति सौतिया डाह रखती है। उसे मुरली से ईर्ष्या इसलिए है कि कृष्ण सदा मुरली बजाने में व्यस्त रहते हैं और वंशी-वादन में लीन होकर वह गोपी की ओर ध्यान ही नहीं देते। गोपी कृष्ण से प्रेम करती है, वह उन पर क्रोध नहीं कर सकती। अपना गुस्सा वह उस वंशी पर उतारती है, जिसके कारण कृष्ण ने गोपी को भुला दिया है।
(ङ) ‘मुरलीधर’ कृष्ण को कहा गया है। श्रीकृष्ण यमुना तट पर कदम्ब की छाया में मुरली बजाया करते थे। गोपियों ने कृष्ण के इस रूप पर मोहित होकर उन्हें ‘मुरलीधर’ नाम दे दिया।
(च) ‘मोरपखा’ मोर के पंखों से बने मुकुट को कहा गया है।
(छ) सवैये में एक कृष्णानुरागी गोपी ने अपनी एक सखी को सम्बोधित किया है।
(ज) भाव- सौन्दर्य – इस सवैये में गोपी की निश्छल प्रेम-भावना अभिव्यक्त हुई है। गोपी कृष्ण पर इस सीमा तक मोहित है कि वह उनका सा ही रूप धारण कर लेना चाहती है। कृष्ण के प्रेम में वह कृष्ण के जैसा ही रूप और आचरण अपना लेना चाहती है, एक मुरली को छोड़कर। गोपी अपनी निजता को भुलाकर कृष्ण में लीन हो जाना चाहती है, किन्तु वह मुरली से ईर्ष्या रखती है; क्योंकि वही उसके और कृष्ण के बीच बाधा बनकर खड़ी है। यह ईर्ष्या और कवि की अभिव्यक्ति बड़ी स्वाभाविक बन पड़ी है। वंशी के प्रति ईर्ष्या-भाव भी कृष्ण से समीपता की उत्कट कामना को दर्शाता है।
(झ) शिल्प-सौन्दर्य-
● अत्यन्त कोमल, मधुर, रसमय ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।
● संगीतात्मकता, लय और छन्द का प्रवाह अद्भुत है।
● अनुप्रासात्मकता सम्पूर्ण सवैये में द्रष्टव्य है।
● अन्तिम पंक्ति में यमक अलंकार दर्शनीय है-
(i) ‘मुरली मुरलीधर’ में सभंगपद यमक अलंकार है।
(ii) ‘अधरान धरी अधरा न धरौंगी’ में भी सभंगपद यमक है।
● सम्बोधन शैली पाठक के साथ एकात्मकता में साधक रही है।
4. काननि दै ……………… न जैहै ॥ 
शब्दार्थ- काननि = कानों में। दै = देकर। अंगुरी = उँगली। रहियो = रहूँगी। जबहीं = जिस समय। धुनि = ध्वनि, तान। वर्जहै = बजाएगा। मोहनी = मोहित करनेवाली। तानन = तानों से ऊँचे स्वर से। अटा = अट्टालिका, महल। गोधन = गायों से सम्बन्धित एक लोकगीत का प्रकार। गैहै = गाए। टेरि= पुकारकर बुलाना । सिगरे = सारे। काल्हि = कल। कोऊ = कितना ही। माइ री = हे मेरी माँ। सम्हारी न जैहै = नहीं संभाली जा सकेगी।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) सवैया का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) गोपी कानों में उँगली क्यों देना चाहती है?
(घ) कृष्ण अपनी किन-किन विशेषताओं से प्रभावित करते हैं?
(ङ) गोपी स्वयं को क्यों नहीं सँभाल पाती?
(च) ‘गोधन’ से क्या अभिप्राय है?
(छ) सवैये का भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ज) सवैये का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(क) कवि-रसखान (सैयद इब्राहिम) | कविता – सवैये ।
(ख) आशय – कृष्ण की सम्मोहक मुरली धुन से व्याकुल होकर एक गोपी कहती है— हे सखी! जब कृष्ण धीरे-धीरे मधुर स्वर में मुरली बजाएँगे, तब मैं तो अपने कानों में उँगली दे लूँगी, जिससे कि वंशी का मोहक स्वर मुझ पर जादू न डाल सके। फिर वह मनमोहन कृष्ण चाहे अट्टालिकाओं पर, ऊँचाई पर चढ़-चढ़कर भी अपनी मोहिनी तान छेड़ता रहे तो छेड़े, गोधन गाता रहे तो गाए, मुझ पर उसका कोई प्रभाव न पड़ेगा, परन्तु यदि किसी प्रकार उस कृष्ण की मधुर वंशी-धुन मेरे कानों में पड़ गई तो फिर क्या होगा मैं नहीं कह सकती। हे ब्रज के लोगो ! मैं तुम्हें पुकार पुकारकर कह रही हूँ, सब सुन लो। चाहे तब फिर मुझे कोई कितना ही समझाए, मेरी मस्ती कम नहीं होगी। हे मेरी माँ! कृष्ण के मुख की मुसकान ऐसी सम्मोहक है कि उसके जादू से किसी प्रकार बचा नहीं जा सकता। उसका सुख तो मैं चाहकर भी सँभाल नहीं सकूँगी; अर्थात् कृष्ण की मोहक मुसकान के वशीभूत होकर जब मोहिनी में मैं बौराई-सी फिरूंगी, तब मुझे कोई न टोकना।
(ग) गोपी कृष्ण की मुरली की मधुर तान से भयभीत है। उसे डर है कि वह मुरली की धुन सुनकर अपने वश में नहीं रह सकेगी; अतः वह अपने कानों में उँगली देना चाहती है।
(घ) कृष्ण की तीन विशेषताएँ गोपी को प्रभावित करती हैं—
1. मुरली की मधुर ध्वनि ।
2. लोकगीत का सुमधुर गान ।
3. मोहक मुसकान।
(ङ) गोपी कृष्ण की मुरली की मधुर तान सुनकर, उनका गोधन का गान सुनकर तथा मोहक मुसकान को देखकर अपने आपको नहीं सँभाल पाती।
(च) ‘गोधन’ से अभिप्राय उस लोकगीत से है, जिसे कृष्ण गायें चराते समय प्रायः गाया करते थे।
(छ) भाव – सौन्दर्य – सवैये में कवि ने श्रीकृष्ण की मोहक मुसकान के प्रभाव का मनोरम चित्रण किया है। कृष्ण का सुमधुर वंशी – वादन एवं मोहक मुसकान किसी को भी वश में करने में समर्थ है। उसमें मुग्धकारी प्रभाव है। गोपी की तन्मय अवस्था और कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह सर्वस्व हार चुकी मन:स्थिति का बहुत ही मनोहारी वर्णन किया गया है।
(ज) शिल्प – सौन्दर्य-
● ब्रजभाषा की मधुरता, सरसता और मोहकता दर्शनीय है।
● सवैया की भाषा अत्यन्त सरल, सरस, प्रवाहमय है।
● छन्द की गति, संगीतात्मकता और लय प्रभावकारी है।
● सम्बोधन – शैली तादात्म्य स्थापित करने में सहायक है।
● अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है— मोहनी तानन सों रसखानि, गोधन गैहै तो गैहै, काल्हि कोऊ कितनो, माइ री वा मुख की मुसकानि ।
● ‘न जैहै’ की आवृत्ति गोपी की उन्माद अवस्था को अभिव्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम है।
● ‘काननि दै अँगुरी रहिबो’ और ‘अटा चढ़ि गोधन गैहै’ के बिम्ब अच्छे बन पड़े हैं।
● ‘टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि काल्हि कोऊ कितनो समुझे है ‘ में गोपी की ओर से कल उसके कृष्ण के प्रेम में दीवानी हो जाने की पूर्व-सूचनाभरी चेतावनी अत्यन्त नवीन और प्रभावशाली बन पड़ी है।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है?
उत्तर – ब्रजभूमि के प्रति कवि रसखान का गहरा लगाव है। वह इस जन्म के बाद अगले जन्म में भी ब्रजभूमि में ही अपना जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। उनकी कामना है कि ईश्वर उनको अंगले जन्म में चाहे ग्वाला बनाए, चाहे गाय; चाहे पक्षी बनाए, चाहे पत्थर; वह उन्हें हर हाल में ब्रजभूमि ही भेजे। उन्हें ब्रजभूमि के वन – उपवन, सरोवर, करील के कुंज इतने प्यारे हैं कि वे उन पर सर्वस्व भी न्योछावर कर सकते हैं, सोने के महलों की तो बात ही क्या है।
प्रश्न 2 – कवि का ब्रज के वन, बाग और तालाब निहारने के पीछे क्या कारण है?
उत्तर— कवि ब्रज के वन, बाग और तालाब इसलिए निहारते रहना चाहता है; क्योंकि इन सभी से कृष्ण की यादें जुड़ी हुई हैं। कृष्ण ने कभी इनमें ही विहार किया था, इसलिए कवि इनको देखकर स्वयं को धन्य हुआ मानता है।
प्रश्न 3 – एक लकुटी और कामरिया पर कवि सबकुछ न्योछावर करने को क्यों तैयार है?
उत्तर – कवि के लिए जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘कृष्ण’ हैं, इसीलिए कृष्ण के जीवन से सम्बन्धित एक – एक वस्तु भी उन्हें उतनी ही प्रिय है, जितने कि श्रीकृष्ण । यही कारण है कि कवि कृष्ण की एक लाठी और कम्बली के लिए सर्वस्व लुटाने को तैयार हैं।
प्रश्न 4 – सखी ने गोपी से कृष्ण का कैसा रूप धारण करने का आग्रह किया था? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर – सखी ने गोपी से आग्रह किया था कि यदि उसे श्रीकृष्ण से प्रेम है तो वह श्रीकृष्ण के समान अपने सिर पर मोरपंखों का मुकुट धारण करे। गले में गुंजा की माला पहने। शरीर पर पीले वस्त्र धारण करे। हाथों में कृष्ण के समान ही लाठी पकड़े और कृष्ण की तरह ही पशुओं के संग विचरण करे ।
प्रश्न 5 – आपके विचार से कवि पशु, पक्षी और पहाड़ के रूप में भी कृष्ण का सान्निध्य क्यों प्राप्त करना चाहता है?
उत्तर— कवि रसखान कृष्ण के अनन्य भक्त हैं। उनके सवैयों में उनकी यह भावना ही पुनः पुनः अभिव्यक्त हुई है। हमारे विचार से कवि की अपने आराध्य से तन्मयता उन्हें कृष्ण के प्रतिपल साथ के लिए प्रेरित करती है। वे किसी भी रूप में कृष्ण का साथ चाहते हैं। इससे उनकी भक्ति भावना सन्तुष्ट होती है। इसीलिए वे पशु, पक्षी, पहाड़ कुछ भी बनकर कृष्ण के साथ ही रहना चाहते हैं।
प्रश्न 6 – चौथे सवैये के अनुसार गोपियाँ अपने आपको क्यों विवश पाती हैं?
उत्तर- इस सवैये के अनुसार गोपियाँ कृष्ण की मुरली की मोहिनी तान तथा मोहक मुसकान के कारण अपने आपको विवश पाती हैं। इनके प्रभाववश वे अपनी सुध-बुध गँवा बैठती हैं और लोक-लाज का भय त्यागकर कृष्ण के वश में हो जाती हैं।
प्रश्न 7 – भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं। 
उत्तर : भाव स्पष्टीकरण-रसखान को अपने आराध्य की जन्मस्थली ब्रजभूमि से इतना प्रेम है कि वे वहाँ के काँटेदार करील के कुंजों के ऊपर करोड़ों सोने के महलों को भी न्योछावर कर सकते हैं। भाव यह है कि कवि महलों की अपरिमित सुख-सुविधा को छोड़कर उस ब्रजभूमि में रहकर अधिक सुख पाएगा, जिसमें श्रीकृष्ण रहा करते थे, भले ही उसमें करील के काँटेदार वृक्ष ही क्यों न हों।
(ख) माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै । 
उत्तर : भाव स्पष्टीकरण – एक गोपी कहती है कि कृष्ण की मधुर, मोहक मुसकान से वह इस सीमा तक प्रभावित हो सकती है कि उसके सम्मोहन के वशीभूत होकर वह स्वयं को सँभाल ही न पाए। भाव यह है कि कृष्ण की मोहक मुसकान के कारण वह पूर्णतया उनके वश में हो सकती है, उन्हीं पर स्वयं को समर्पित कर सकती है।
प्रश्न 8 – कालिंदी कूल कंदब की डारन’ में कौन-सा अलंकार है ?
उत्तर – ‘क’ वर्ण की आवृत्ति से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
प्रश्न 9 – काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए— 
‘या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी । ‘
उत्तर- (क) इस पंक्ति में दो स्थानों पर सभंगपद यमक अलंकार है—
(i) ‘मुरली मुरलीधर’ में।
(ii) ‘अधरान धरी ‘अधरा न’ में- अधरान – अधरों पर; अधरा न – अधरों पर नहीं।
(ख) इस पद में ‘ध’, ‘र’ वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार भी दर्शनीय है।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – ‘रसखान की भक्ति भावना’ पर दस वाक्य लिखिए ।
उत्तर – रसखान श्रीकृष्ण के परमभक्त हैं। वे आजीवन कृष्ण-भक्ति में लीन रहना चाहते हैं। कृष्ण उनके रोम-रोम में समाए हुए हैं। वे उनसे एक पल भी अलग नहीं हो सकते, इसलिए वे ईश्वर से कामना करते हैं कि अगले जन्म में भी वह उन्हें उनके आराध्य की जन्मस्थली ब्रजभूमि में ही जन्म दे । वह प्रभु चाहे उन्हें मनुष्य का जन्म दे या पशु का, पत्थर का जन्म दे या जल का या वृक्ष का, वे सब रूपों में कृष्ण और उनसे सम्बन्धित वस्तुओं का सान्निध्य चाहते हैं। यहाँ तक कि कृष्ण की लाठी और कम्बली पर वह तीनों लोकों का राज तक न्योछावर करने को तैयार हैं। आठों सिद्धियों और नौ निधियों को वे नन्दजी की गायों को चराने के कार्य से प्राप्त होनेवाले सुख पर न्योछावर कर सकते हैं। करील के काँटेदार कुंजों के ऊपर वह सोने के वैभवशाली महल भी न्योछावर करने को तैयार हैं। कृष्ण की समीपता पाने के लिए वे कृष्ण का स्वाँग रचने को भी तैयार हैं। मधुर मुरली की धुन पर तो वे अपनी सुध-बुध खो देते हैं।
प्रश्न 2 – गोपी को कृष्ण की मुरली अपने होंठों पर रखने में क्यों आपत्ति है?
उत्तर – गोपी कृष्ण की मुरली को अपने होंठों पर इसलिए नहीं रखना चाहती; क्योंकि यही वह वस्तु है, जिसके कारण कृष्ण उसकी ओर ध्यान नहीं देते। गोपी को इसीलिए मुरली पर गुस्सा है। मुरली बजाते समय कृष्ण उसी में खोए रहते हैं; अतः गोपी स्वयं को तिरस्कृत अनुभव करती है। वह अपनी इस उपेक्षा का बदला मुरली से लेना चाहती है। वह उसकी सौत है।
प्रश्न 3 – सखी के कहने पर गोपी क्या-क्या स्वाँग करने को तैयार है?
उत्तर— सखी के कहने पर गोपी कृष्ण का पीताम्बर धारण करने का तैयार है। वह कृष्ण के समान सिर पर मोरपंखों का मुकुट भी धारण करने को तैयार है। गले में गुंजों की माला पहनने में भी वह सुखी है। कृष्ण के समान वह लाठी लेकर गायों और ग्वालों के संग वन-वन घूमने को भी तैयार है।

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