UK Board 9 Class Hindi Chapter 15 – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (काव्य-खण्ड)
UK Board 9 Class Hindi Chapter 15 – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (काव्य-खण्ड)
UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 15 – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (क्षितिज : काव्य-खण्ड)
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (मेघ आए)
I. कवि-परिचय
प्रश्न – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का परिचय निम्नलिखित शीर्षकों में दीजिए-
जीवन-परिचय, उपलब्धियाँ, रचनाएँ, काव्यगत विशेषताएँ तथा भाषा-शैली ।
उत्तर- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
जीवन परिचय — सक्सेनाजी का जन्म उत्तर प्रदेश के ‘वस्ती जिले में सन् 1927 ई० में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बस्ती में हुई, तत्पश्चात् वे उच्चशिक्षा के लिए प्रयाग आ गए। प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक एवं स्नातकोत्तर की उपाधियाँ प्राप्त कीं। आजीविका के लिए उनको काफी संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने अध्यापन और सम्पादन दोनों कार्य किए। पहले वे अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। उन्होंने आकाशवाणी, प्रयाग में भी नौकरी की। बाद में उन्होंने ‘दिनमान’ पत्रिका के उपसम्पादक का कार्य-भार सँभाला। सक्सेनाजी द्वारा आरम्भ किया गया स्तम्भ ‘चरचे और चरखे’ वड़ा लोकप्रिय हुआ था। बाद में बच्चों की प्रिय पत्रिका ‘पराग’ के भी सम्पादक पद पर उन्होंने कार्य किया। जीवन के अन्त समय तक वे इसे कुशलतापूर्वक सँभालते रहे। सन् 1983 ई० में उनका आकस्मिक निधन हो गया।
उपलब्धियाँ—साहित्यसेवी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
रचनाएँ – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के प्रमुख कविता-संग्रह हैं-
‘काठ की घण्टियाँ’, ‘बाँस का पुल’, ‘एक सुनी नाव’, ‘गर्म हवाएँ’, ‘कुआनो नदी’, ‘जंगल का दर्द’, ‘खूंटियों पर टंगे लोग’।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने गद्य साहित्य के रूप में उपन्यास, साहित्य जगत् में खूब हलचल मचा दी थी। नाटक और कहानियाँ भी लिखीं। उनकी ‘लड़ाई’ नामक कहानी ने तो
काव्यगत विशेषताएँ— सर्वेश्वर रोमानियत, कोमल कल्पना, शृंगार, प्रकृति-प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं। उनके काव्य में कल्पना का उत्कर्ष देखते ही बनता है। प्रकृति के बड़े मनोरम चित्र उन्होंने प्रस्तुत किए हैं, साथ ही उनकी कविताओं से ग्रामीण संवेदना और मध्यमवर्गीय नगरीय जीवन-बोध भी प्रकट हुआ है।
भाषा-शैली-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की काव्य-भाषा की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं— चित्रात्मकता और स्पष्टता। उन्हें काव्य में विषय के वर्णन की अपेक्षा दृश्यचित्र उपस्थित करने में अधिक आनन्द आता है। उनकी कविताओं में प्रकृति के यथार्थपरक सौन्दर्यपूर्ण चित्र उपस्थित हुए हैं। ये दृश्य-चित्र हिन्दी साहित्य में अपने आप में अनूठे हैं। अपनी उर्वर कल्पना के बल पर दृश्य का प्रामाणिक चित्र उपस्थित करने में सर्वेश्वर का कोई सानी नहीं। भाषा की संक्षिप्तता उनकी एक और विशेषता है। उनकी कविता का एक-एक शब्द सधा हुआ और सार्थक होता है। शब्द का तराशा हुआ प्रयोग करने में वे सिद्धहस्त हैं। उपमा, रूपक, मानवीकरण अलंकारों पर उनको महारत हासिल है, हैं वे सब अनायास ही । पन्तजी ने इसीलिए उन्हें ‘अकृत्रिम कवि’ ठीक ही कहा है। पर
II. अर्थग्रहण एवं सराहना सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न- निम्नलिखित पद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
1. मेघ आए ………….. के सँवर के ।
शब्दार्थ – बन-ठन के = साज – सिंगार के साथ, ठसके से। बयार = मन्द मन्द वायु । पाहुन = अतिथि, मेहमान, दामाद ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) पद्यांश के मुख्य विषय पर प्रकाश डालिए ।
(घ) लोगों ने खिड़की-दरवाजे क्यों खोल लिए?
(ङ) मेघ किस प्रकार आए हैं?
(च) हवा किस प्रकार चली?
(छ) ‘पाहुन’ किसे कहते हैं?
(ज) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(झ) पद्यांश का शिल्प – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ञ) पद्यांश के काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
(क) कवि-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना | कविता – मेघ आए।
(ख) आशय – कवि कहता है— देखो तो मेघ कितनी सज-धज के साथ और सुन्दर वेश धारण करके आए हैं। उनके स्वागत में आगे-आगे नाचती गाती हवा चल पड़ी है। मेघों के सौन्दर्य को निहारने के लिए लोगों ने अपने खिड़कियाँ और दरवाजे खोल लिए हैं। गली-गली का यही नजारा है। मेघ इस प्रकार बड़े बन-सँवरकर आए हैं, मानो शहर के मेहमान अर्थात् दामाद अपनी पूरी सज-धज के साथ गाँव में आए हैं।
कवि का तात्पर्य यह है कि वर्षा ऋतु के आगमन पर बादल आकाश में छा गए हैं। बादलों के आकाश में छा जाने से हवा में भी मस्ती भर गई है। वह भी बादलों के आगे-आगे मस्त होकर बह रही है। घिरे हुए बादलों को देखने और वर्षा की पहली बूँद की प्रतीक्षा में लोगों ने अपने खिड़की-दरवाजे खोल लिए हैं।
(ग) पद्यांश का मुख्य विषय है— मेघों के आकाश में छा जाने पर गाँव के वातावरण में उत्पन्न उल्लास का चित्रण।
(घ) लोगों ने मेघरूपी शहरी मेहमान की सज-धज को देखने के लिए अपने खिड़की-दरवाजे खोल लिए हैं।
(ङ) मेघ पूरे बनाव- शृंगार के साथ आए हैं।
(च) हवा मेघों के आगे-आगे नाचती गाती हुई चली।
(छ) ‘पाहुन’ अतिथि को कहते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार आदि के ग्राम्य अंचल में ‘पाहुन’ शब्द का प्रयोग बेटी के पति अर्थात् ‘दामाद’ के लिए होता है।
(ज) भाव – सौन्दर्य – वर्षा ऋतु का काल्पनिक, किन्तु मनोरम चित्रण हुआ है। कवि ने मेघ को नगर निवासी अतिथि, हवा को आनन्द-विभोर प्रिया तथा सारे गाँव को मेहमान के आगमन पर उसके स्वागत के लिए उल्लास और उत्साह से भरपूर चित्रित किया है। प्राकृतिक उपादानों की यह अभिव्यक्ति कवि की सरस कल्पना का परिणाम है।
(झ) शिल्प-सौन्दर्य –
● प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। मानवीकरण अलंकार है।
● भाषा में चित्रात्मकता एवं प्रवाहमयता है।
● अभिव्यक्ति में नवीनता और ताजगी है।
● ‘आगे-आगे’ और ‘गली-गली’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
● ‘बड़े बन-ठन के’ में अनुप्रास अलंकार है।
● ‘पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
● नाचती गाती बयार चली, खुलने लगीं गली-गली आदि गतिशीलता द्योतक शब्दों से भाव अभिव्यक्ति में गति आ गई है।
(ञ) काव्य-सौन्दर्य : संकेत – उपर्युक्त उत्तर (ज) और (झ) को सम्मिलित रूप में लिखिए।
2. पेड़ झुक ……………. के सैंवर के।
शब्दार्थ – उचकाए = ऊँची किए हुए। घाघरा = लहँगा, गाँ की स्त्रियों द्वारा पहना जानेवाला लम्बा, घेरदार, स्कर्टनुमा भारी वस्त्र । बाँकी = तिरछी । चितवन = दृष्टि, नजर। ठिठकी = आश्चर्य में ठहरी । घूँघट = साड़ी या ओढ़नी का पल्लू सिर से नीचे करके मुख को ढकना ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का मुख्य विषय लिखिए।
(ग) पेड़ क्यों झुक रहे थे?
(घ) आँधी किसकी प्रतीक है? वह कैसे दौड़ी?
(ङ) मेघ किस प्रकार आए?
(च) ‘घाघरा’ से क्या आशय है?
(छ) ‘घूँघट’ से क्या अभिप्राय है?
(ज) पद्यांश का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
(झ) पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ञ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना | कविता – मेघ आए।
(ख) पद्यांश का मुख्य विषय है- वर्षा से पूर्व धूल भरी आँधी के चलने तथा नदी के जल के उमड़ने तथा उनके माध्यम से ग्राम्य संस्कृति का चित्रण करना।
(ग) पेड़ वर्षा से पूर्व आई आँधी के कारण झुक रहे थे, मानो वे मेघों के स्वागत में झुककर अपना हर्ष- उल्लास व्यक्त कर रहे थे।
(घ) आँधी स्वागत करनेवाली किशोरी कन्या की प्रतीक है। वह मेघरूपी पाहुने को आता देखकर उत्साह के कारण अपने घाघरे को उठाकर घर की ओर दौड़ी। यह इसलिए कि बह पाहुने के पहुँचने से पहले घर पहुँचना चाहती है और दौड़ते समय घाघरा कहीं उसके पैरों में उलझकर उसे गिरा न दे।
(ङ) मेघु बन-ठनकर, सज-सँवरकर आए।
(च) ‘घाघरा ‘ ग्रामीण स्त्रियों का लम्बा स्कर्टनुमा एक भारी पहनावा है, जिसे कमर से पहना जाता है।
(छ) ‘घूँघट’ से अभिप्राय है – साड़ी या ओढ़नी का पल्लू सि से नीचे करके मुख को ढकना; परदा करना ।
(ज) अर्थ – इस पद्यांश में कवि कहता है- बादल आकाश में सज-धज के साथ आ गए हैं। आँधी चलने लगी है। तेज हवा के झोंकों से पेड़ ऐसे झुक गए हैं मानो वे गरदन उचकाकर मेघों की ओर झाँकने लगे हों। धूल के बगूले इस तरह उड़ रहे हैं, मानो कोई गाँव की कन्या मेघों के आने के उत्साह में अपना घाघरा उठाए घर की ओर भागी चली जा रही हो। मानो वह मेघरूपी पाहुने के पहुँचने से पहले घर पहुँचना चाहती हो। नदी मेघों को तिरछी नजरों से देखकर ठिठक – सी गई है। स्त्रियों ने अपने घूँघट खोल दिए हैं।
आशय यही है कि आकाश में मेघों के आने और तेज हवा के चलने से गाँववासी उल्लास में भर गए हैं। नदी का मोड़ बड़ा आकर्षक लग रहा है।
(झ) भाव – सौन्दर्य – वर्षा से पूर्व चलनेवाली धूलभरी आँधी और मेघों के उमड़ने-घुमड़ने का यथार्थपरक, कल्पना- प्रेरित, सुन्दर, मनोहर वर्णन किया गया है। मेघों के आगमन के बिम्ब द्वारा ग्राम्य संस्कृति का भी मनोरम चित्र प्रस्तुत किया गया है।
(ञ) शिल्प – सौन्दर्य –
● प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पेड़ों का झाँकना, धूल का घाघरा उठाकर भागना, नदी का ठिठकना, मेघों का बन-ठनकर आना सरस और काल्पनिक प्रयोग हैं। इनसे कविता में नाटकीयता आ गई है।
● भाषा में चित्रात्मकता एवं प्रवाहमयता है।
● अनुप्रासात्मकता – झुक झाँकने लगे गरदन, उठा, नदी ठिठकी, बड़े बन-ठन के सँवर के आदि में।
● झाँकने लगे, चली, भागी आदि क्रिया रूपों से गति एवं प्रवाह में वृद्धि हुई है।
3. बूढ़े पीपल ………………. सँवर के ।
शब्दार्थ – जुहार की = आदरपूर्वक नमस्कार किया । सुधि = याद, स्मृति। अकुलाई = प्यासी, व्याकुल। ओट होना = छिपना। किवार = दरवाजा। हरसाया = हर्षित हुआ, प्रसन्न हुआ। ताल = सरोवर | परात = थाल जैसा बर्तन |
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का मुख्य प्रतिपाद्य क्या है?
(ग) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(घ) ‘नववधू’ का प्रतीक कौन है?
(ङ) बूढ़ा पीपल किसका प्रतीक है?
(च) ‘बरस बाद सुधि लीन्हीं’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
(छ) ताल के हरसाने का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ज) मेघ कैसे आए?
(झ) पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(ञ) पद्यांश का शिल्प सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना | कविता – मेघ आए।
(ख) पद्यांश का मुख्य प्रतिपाद्य वर्षाकालीन मेघों के आकाश में छा जाने पर दिखनेवाले प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन करना तथा ग्राम्य संस्कृति के आतिथ्य-सत्कार का चाक्षुष बिम्ब प्रस्तुत करना है।
(ग) आशय – कवि आकाश में बादलों को देखकर कल्पना में खो जाता है और कहता है- आकाश में बादल सज-सँवरकर आ गए हैं। पीपल के बूढ़े पेड़ ने अपने पत्तों की खड़खड़ाहट के द्वारा उसे नमस्कार किया। गरमी से व्याकुल लता, किवाड़ के पीछे छिपकर ‘उलाहनाभरे स्वर में बोली – रे मेघ! तुझे तो पूरे एक बरस बाद हमारी याद आई है। मेघों के आगमन से हर्षित हुआ गाँव का तालाब परात में पानी भरकर लाया है, ताकि वह मेघरूपी मेहमान के पैर धोकर उसका स्वागत कर सके। आशय यह है कि वर्षा ऋतु के मेघ आकाश में छा गए हैं। पीपल का पुराना पेड़ ठण्डी हवा के झोंकों से झुका जा रहा है। गरमी से सूखती लताएँ पानी बरसने की सम्भावना से उत्कण्ठित हैं। तालाब का जल, वायु के वेग से लहरें मार रहा है। संक्षेप में चारों ओर प्रकृति प्रसन्न है।
(घ) अकुलाई लता ‘नववधू’ का प्रतीक है।
(ङ) बूढ़ा पीपल परिवार के बड़े बुजुर्ग का प्रतीक है।
(च) इस पंक्ति का अर्थ है – बहुत दिनों बाद ( पूरे एक साल बाद) याद किया।
(छ) ताल के हरसाने से आशय है— जल में प्रसन्नता की लहरें उठ रही हैं, जिससे उसका जल चंचल हो उठा है।
(ज) मेघ बड़े बन-ठनकर साज-सज्जा के साथ आए हैं।
(झ) भाव – सौन्दर्य – वर्षाकालीन मेघों के आकाश में छा जाने से प्राकृतिक बदलावों का चित्रण मनोरम, भावपूर्ण कल्पना के आधार पर किया गया है। पारिवारिक सम्बन्धों के प्रतीकों से कवि ने इन प्राकृतिक उपादानों में जीवन्तता ला दी है।
(ञ) शिल्प-सौन्दर्य-
● पद्यांश में कवि ने मानवीकरण अलंकार का उत्कर्ष प्रस्तुत कर दिया है- सम्पूर्ण प्रकृति का ही मानवीकरण कर दिया गया है। पूरा दृश्य मनोरम एवं कल्पनापूर्ण है। मेघ सजा – सँवरा मेहमान है। बूढ़ा पीपल परिवार के बुजुर्ग, वृद्ध पिता की तरह मेहमान के स्वागत में झुका अभिवादन कर रहा है। उसकी कन्या लता, मेघ की प्रेमिका दरवाजे के पीछे से झाँकती उलाहना देती खड़ी है। स्वागत के लिए जलभरे बर्तन के रूप में तालाब है। ये सब सौन्दर्य से भरे दृश्य कवि की मौलिक कल्पनाएँ हैं, जो नवीनता लिए हुए और अद्भुत हैं।
● भाषा अनुप्रासमयी, सरस और प्रवाहपूर्ण है।
● भाषा में अवधी के स्पर्श से और भी कोमलता आ गई है।
4. क्षितिज अटारी …………… सँवर के।
शब्दार्थ – क्षितिज = जहाँ धरती और आकाश मिलते प्रतीत होते हैं। अटारी = पक्की इमारत, महल। गहराई = छा गई, भर गई। दामिनी = बिजली । गाँठ खुल गई = प्रकट होना, समस्या समाप्त होना । बाँध = सेतु, पुल। अश्रु = आँसू। ढरके = लुढ़के, टपके।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का मुख्य विषय क्या है?
(ग) पद्यांश का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
(घ) ‘भ्रम की गाँठ खुलने’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ङ) किस-किसका मिलन हुआ, जिसमें दोनों ओर से आँसू ढरके?
(च) ‘क्षितिज अटारी गहराई’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(छ) ‘बाँध टूटा’ का क्या अर्थ है?
(ज) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(झ) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना | कविता – मेघ आए।
(ख) जल के बरसने का कल्पनापूर्ण तथा यथार्थ चित्रण करना तथा ग्राम्य संस्कृति में प्रेम सम्बन्धों की कोमल अभिव्यक्ति का चित्रण करना पद्यांश का मुख्य विषय है।
(ग) अर्थ – कवि कहता है- आकाश में बादल इस तरह सघन होकर छाए हुए हैं जैसे अतिथि (पाहुने) के प्रथम आगमन पर उसको देखने के लिए अटारी पर महिलाओं का जमघट लग जाता है। बिजली चमक उठी है। ओ बादलो! क्षमा करो। हमारा भ्रम टूट गया। हमारी शंका समाप्त हो गई। हमें सन्देह था कि तुम नहीं बरसोगे, परन्तु हमसे मिलकर तो तुम्हारे धैर्य का बाँध ही टूट गया और तुम्हारी आँखों से मिलन की खुशी के आँसू झरने लगे अर्थात् मूसलाधार वर्षा होने लगी । वर्षा के बादल सज-सँवरकर आकाश में छा गए हैं।
आशय यही है कि आकाश में चारों दिशाओं में बादलों का जमघट दिखाई दे रहा है और बिजली की चमक के साथ अब उनसे धारासार वर्षा होने लगी है।
(घ) ‘भ्रम की गाँठ खुलने से आशय है— लोगों को यह शंका थी कि बादल केवल घिरे हैं, बरसेंगे नहीं, परन्तु उनकी यह शंका गलत साबित हुई। बादल न केवल बरसे, वरन् जोर से बरसे; अतः लोगों का भ्रम टूट गया। पृथ्वी नायिका को यह भी भ्रम था कि अब बादलरूपी उसका प्रियतम अब मिलने नहीं आएगा, किन्तु उसने आकर उसका यह भ्रम दूर कर दिया।
(ङ) क्षितिज पर प्यासी धरती और बादलों का मिलन हुआ । दोनों मिलन की इस बेला में इतने भावुक हुए कि आँखों से आँसूओं का बाँध टूट गया। अर्थात् मूसलाधार वर्षा होने लगी ।
(च) इससे आशय है कि क्या क्षितिज और क्या अट्टालिका, जिधर देखो उधर ही बादलों के घिरे होने का दृश्य है।
(छ) यहाँ ‘बाँध टूटा’ का अर्थ भावुक होकर धैर्य खो देना है। भावना में धैर्य खो देने पर व्यक्ति की आँखों से आँसू झरने लगते हैं। इसी के मुहावरे के रूप में (आँसुओं / धैर्य का) बाँध टूटना कहा जाता है।
(ज) भाव – सौन्दर्य – कवि ने कल्पना के आधार पर धारासार जलवृष्टि का मनोहर और श्रृंगारपरक चित्रण प्रस्तुत किया है। बाँध टूटना, गाँठ खुलना आदि मुहावरे बड़े सांकेतिक बन पड़े हैं। अतिथि मेघ की प्रतीक्षा में आतुर ग्रामवासियों और फिर वर्षा के रूप में प्रेमाश्रुओं के बहने का चित्रण बड़ी मौलिक कल्पना है।
(झ) शिल्प – सौन्दर्य-
● मनोरम कल्पना का उत्कर्ष प्रकट हुआ है। मेघरूपी अतिथि और प्रतीक्षारत ग्रामवासियों का प्रेम दिखाया गया है। वर्षा का जल प्रेमाश्रु के रूप में धरती पर आना भी सुन्दर कल्पना है। मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया गया है।
● ‘क्षितिज अटारी गहराई दामिनि दमकी’ स्वरमैत्री द्रष्टव्य है।
● ‘दामिनि दमकी’ में अनुप्रास अलंकार है ।
● ‘झर-झर’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
● लय और तुक का निर्वाह हुआ है; यथा – दमकी, भरम की; ढरके, सँवर के ।
● वर्षा ऋतु का जीवन्त चित्रात्मक वर्णन हुआ है।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – बादलों के आने पर प्रकृति में जिन गतिशील क्रियाओं को कवि ने चित्रित किया है, उन्हें लिखिए ।
उत्तर— बादलों के आने पर प्रकृति में निम्नलिखित गतिशील क्रियाएँ हुईं–
1. बयार नाचती गाती चलने लगी।
2. पेड़ झुकने लगे, झूमने लगे, मानो गरदन उचकाकर बादलों को निहार रहे हों।
3. आँधी चलने लगी; धूल उठने लगी।
4. नदी मानो टेढ़ी नजर करके ठिठक गई।
5. पीपल का पेड़ पत्तों की खड़खड़ाहट के द्वारा मानो नमस्कार करने लगा।
6. लताएँ पेड़रूपी किवाड़ के पीछे छिप गईं।
7. तालाब के जल में तेज हवा चलने से लहरें उठने लगीं।
8. क्षितिज पर बिजली चमकने लगी।
9. धैर्य का बाँध टूटने से वर्षारूपी आँसू बहने लगे ।
प्रश्न 2 – निम्नलिखित किसके प्रतीक हैं?
● धूल
● पेड़
● नदी
● लता
● ताल।
उत्तर : धूल – अतिथि के आगमन से अति उत्साहित चंचल युवती का प्रतीक है।
पेड़— आम ग्रामीण व्यक्ति का प्रतीक है, जो शहरी दामाद के घर आने पर उसे उचक-उचक कर देखने का प्रयास करता है।
नदी — गाँव की उस युवती का प्रतीक है, जो शहरी दामाद को आया देख, प्रेमपूर्ण तिरछी दृष्टि से उसे निहारते हुए ठिठक जाती है। लता – विरह वेदना में तड़पती मानिनी नायिका की प्रतीक है, जो मेघ के देर से आने पर मान प्रकट करती है।
ताल – परिवार के अन्तरंग सदस्य का प्रतीक है, जो मेहमानों के स्वागत हेतु परात में पानी भरकर ले आया है।
प्रश्न 3 – लता ने बादलरूपी मेहमान को किस तरह देखा और क्यों?
उत्तर – लता ने बादलरूपी मेहमान को किवाड़ की ओट में छिपकर देखा ; क्योंकि वह मानिनी नायिका है। अपने प्रियतम के बहुत दिनों के बाद उसके पास आने और दर्शन न देने से उस पर मीठा क्रोध जता रही है। न तो वह देखे बिना रह पाती है और न ही अपनी व्याकुलता को प्रकट करना चाहती है।
प्रश्न 4 – भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की
उत्तर : भाव-स्पष्टीकरण — प्रेयसी अपने प्रियतम से क्षमा-याचना करती हुई कहती है कि ऐ मेरे प्रियतम! तुम मुझे क्षमा कर दो। मैं तो सोच बैठी थी कि अब तुम न आओगे। यद्यपि मैंने तुम पर अविश्वास किया, परन्तु अब तो तुम जिस सज-धज के साथ मिलने आए हो, उससे तुम्हारे प्रति मेरे मन के सारे भ्रम दूर हो गए हैं।
प्रतीकार्थ यह है कि ग्रामवासी वर्षा और मेघों से निराश हो चले थे, परन्तु उनका यह भ्रम तब मिट गया, जब उन्होंने आकाश में बादलों का जमघट देखा और फिर बाद में धारासार वर्षा होते देखी।
(ख) बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूँघट सरके ।
उत्तर : भाव- स्पष्टीकरण – बादलों के घुमड़ने से तेज हवा बही, जिससे नदी के जल में प्रवाह के विपरीत दिशा में तरंगें उठने से ऐसा लगा जैसे नदी का प्रवाह एक क्षण के लिए रुक गया है और वह अपनी भौंह को तिरछा करके बादलों को देख रही है। नदीरूपी नायिका के मुख की यह चितवन स्पष्ट दिख रही है, जो कि हवा के चलने से पूर्व नहीं दिख रही थी, इससे लगता है कि अत्यधिक उत्सुकता में नदी – नायिका के मुख से घूँघट सरक गया है, जिस कारण उसकी तिरछी चितवन स्पष्ट दिख रही है।
प्रतीकार्थ यह है कि मेहमान के आने पर अत्यधिक उत्सुकता और हड़बड़ाहट में ग्रामवधुओं के मुख से घूँघट सरक गया है, जिससे उनका मेहमान को कनखियों से देखने का भेद खुल गया है।
प्रश्न 5 – मेघरूपी मेहमान के आने से वातावरण में क्या परिवर्तन हुए?
उत्तर – मेघरूपी मेहमान के आने से बयार बहने लगी। धूलभरी आँधी चलने लगी। पेड़ झुकने लगे। नदी के जल में तेज लहरें उठने लगीं, जिससे वह ठिठकी हुई-सी लगी। पीपल का पुराना पेड़ खड़खड़ाहट के स्वर के साथ झूमने लगा। लताएँ पेड़ की ओट में छिपने- शरमाने लगीं। तालाब तरंगायित हो उठे। आकाश में बिजली चमकने लगी और फिर अन्त में खूब जोरों की बारिश होने लगी ।
प्रश्न 6 – मेघों के लिए ‘बन-ठन के, सँवर के’ आने की बात क्यों कही गई है?
उत्तर – मेघों के लिए ‘बन-ठन के, सँवर के आने की बात इसलिए कही गई है; क्योंकि उमड़ते मेघ आसमान में अपनी पूरी श्यामल छटा के साथ उपस्थित हैं। सूरज के प्रकाश के संयोग से प्रतिपल उनके रंग में परिवर्तन हो रहा है। प्रतिपल उनका आकार परिवर्तित हो रहा है। इससे ऐसा लगता है, मानो मेघ रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करके खूब बन सँवरकर आए हैं।
प्रश्न 7 – कविता में आए मानवीकरण तथा रूपक अलंकार के उदाहरण खोजकर लिखिए।
उत्तर : मानवीकरण और रूपक अलंकार के उदाहरण-
1. मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
2. आगे-आगे नाचती गाती बयार चली।
3. पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए ।
4. धूल भागी घाघरा उठाए ।
5. बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी।
6. बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की।
7. ‘बरस बाद सुधि लीन्हीं’-
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की ।
8. हरसाया ताल लाया पानी परात भर के ।
प्रश्न 8 – कविता में जिन रीति-रिवाजों का मार्मिक चित्रण हुआ है, उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर – कविता में भारत के एक ग्रामीण परिवार में, उसके शहरी दामाद के आने पर छाए उल्लास का वर्णन है। गाँववालों की शहरी लोगों के प्रति जिज्ञासा, कुतूहल आदि का सुन्दर चित्रण हुआ है। मेहमान के आने पर घर के बुजुर्ग का उसे झुककर अभिवादन करना, ‘घर के सदस्य का उसके पैरों को धोने के लिए परात में पानी भरकर लाना आदि कार्य भारतीय आतिथ्य परम्परा का परिचय देते हैं। इससे ग्रामवासियों के ‘अतिथि देवो भव’ के निर्वाह प्रेम का भी पता चलता है। ग्रामीण युवतियों का घूँघट की ओट से देखना शालीनता और परदा प्रथा का परिचय देता है।
प्रश्न 9 – कविता में कवि ने आकाश में बादल और गाँव में मेहमान (दामाद) के आने का जो रोचक वर्णन किया है, उसे लिखिए।
उत्तर – मेघरूपी शहरी पाहुन (दामाद) के आते ही पूरे गाँव में उल्लास छा जाता है। गाँवों के परिवारों में आत्मीय सम्बन्ध होते हैं। किसी एक परिवार की बेटी, पूरे गाँव की बेटी होती है। इसलिए किसी भी परिवार के दामाद को पूरा गाँव सम्मान देने दौड़ पड़ता है। शीतल बयार नाचती गाती, मानो अपना उत्साह और खुशी प्रकट करती . आगे-आगे चलने लगी। गाँववालों के घरों की स्त्रियाँ अपने-अपने खिड़की-दरवाजे खोल-खोलकर झाँकने लगीं, जिससे वे पाहुन के दर्शन कर सकें। पेड़ भी उचक – उचककर झाँकने लगे। धूलरूपी कोई अल्हड़ किशोरी पाहुन के घर पहुँचने से पहले घर पहुँचने की इच्छा के कारण अपना घाघरा उठाए दौड़ चली। नदी किसी नवोढा की भाँति अपनी बाँकी अदा से ठिठककर पाहुन की सज-धज निहारने लगी। गाँव के पुराने पीपल के पेड़ ने वृद्ध की तरह झुककर अभिवादन किया। लता संकोचवश पेड़ की ओट लेकर मनुहार करने लगी कि आपको (मेघ को) पूरे एक वर्ष बाद हमारी सुधि आई। गाँव का तालाब पाहुन के पैर धोने के लिए परात में पानी लेकर उपस्थित हो गया । क्षितिजरूपी अटारी स्त्रियों से भर गई। बिजली चमकने लगी । धारासार वर्षा होने लगी। सारा गाँव प्रसन्न हो उठा।
प्रश्न 10- काव्य-सौंदर्य लिखिए-
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के ।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के ।
उत्तर – इस पद्यांश का काव्य-सौन्दर्य इस प्रकार है-
1. वर्षाकालीन मेघों का सुन्दर वर्णन किया गया है।
2. बादल के लिए सजे-धजे शहरी मेहमान का उपमान अत्यन्त सुन्दर बन पड़ा है।
3. (i) ‘पाहुन ज्यों शहर के’ (बादल को शहरी मेहमान कहना) – में उत्प्रेक्षा अलंकार है ।
(ii) ‘मेघ आए बड़े बन-ठन के’ में मेघों को मानव मान लिया गया है; अतः यहाँ मानवीकरण अलंकार है।
(iii) ‘बड़े बन-ठन के’ में अनुप्रास अलंकार ।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – कविता में मेघ का आगमन किस रूप में हुआ है?
उत्तर – कविता में मेघ का आगमन शहर में रहनेवाले एक सजे-सँवरे अतिथि (पाहुने) के रूप में हुआ है। शहर में रहनेवाला अतिथि या दामाद जैसे कार्य व्यस्तता के कारण साल में एक-दो ही बार ससुराल जाने का अवसर निकाल पाता है, वैसे ही मेघ भी एक बरस बाद ही गाँव पहुँचा है, उसने सबको लम्बी प्रतीक्षा करवाई है।
प्रश्न 2 – गली-गली में दरवाजे-खिड़कियाँ क्यों खुलने लगे?
उत्तर – मेघों को आकाश में छाया हुआ देखने और वर्षा के खुलने लगे। लोग दरवाजे खोलकर बाहर आने लगे तथा औरतें-बच्चे आगमन का आनन्द लूटने के लिए गली-गली में दरवाजे-खिड़कियाँ खिड़कियों से झाँकने लगे। यह प्रतिक्रिया बड़ी स्वाभाविक है; क्योंकि मेघ बड़ी प्रतीक्षा के बाद आए हैं— पूरे एक साल बाद।
