UK Board 9 Class Hindi Chapter 17 – राजेश जोशी (काव्य-खण्ड)
UK Board 9 Class Hindi Chapter 17 – राजेश जोशी (काव्य-खण्ड)
UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 17 – राजेश जोशी (क्षितिज : काव्य-खण्ड)
राजेश जोशी (बच्चे काम पर जा रहे हैं)
I. कवि-परिचय
प्रश्न – कवि राजेश जोशी का जीवन परिचय देते हुए उनकी उपलब्धियों, रचनाओं तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। उनकी भाषा-शैली का भी परिचय दीजिए।
उत्तर— राजेश जोशी
जीवन परिचय – हिन्दी के प्रसिद्ध कवि राजेश जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जिले में सन् 1946 ई० में हुआ। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता की। कुछ वर्षों तब अध्यापन भी किया। साहित्य लेखन साथ-साथ चलता रहा। कविताओं के अतिरिक्त उन्होंने नाटक, कहानी, लेख और टिप्पणियाँ भी लिखीं। नाट्य- रूपान्तर भी किए। लघु-फिल्मों के लिए पटकथा-लेखन भी किया। प्रसिद्ध कवियों की रचनाओं के अनुवाद भी उन्होंने किए । मायकोवस्की की कविता का अनुवाद ‘पतलून पहिना बादल’ के नाम से किया। भर्तृहरि की कविताओं के अनुकरण पर ‘भूमि का कल्पतरु यह भी’ नामक अनु – रचना भी लिखी। उनकी कविताओं के अनुवाद भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी, रूसी, जर्मन आदि भाषाओं में भी हुए हैं।
उपलब्धियाँ – ‘दो पंक्तियों के बीच’ काव्य-संग्रह पर जोशीजी को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके अतिरिक्त उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार तथा मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान भी प्राप्त हुआ है।
रचनाएँ – राजेश जोशी रचित प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं’एक दिन बोलेंगे पेड़’, ‘मिट्टी का चेहरा’, ‘नेपथ्य में हँसी’, ‘दो पंक्तियों के बीच’ ।
काव्यगत विशेषताएँ – राजेश विशेषताएँ- राजेश जोशी गहरे सामाजिक सरोकारोंवाले कवि हैं। उनकी कविताओं में गहरी आस्था झलकती है। वे मानवता पर कहीं संकट देखते हैं तो उन्हें छटपटाहट होती है और उससे संघर्ष करने की आस्था उनमें बलवती होती है। वे कठिनाइयों के आगे हार नहीं मानते। संसार के विनाश के जो भी कारण उन्हें दिखते हैं वे उन्हें मटियामेट करने की प्रबल आस्था के साथ आगे बढ़ते हैं। निरन्तर रचनात्मकता उनकी सोच से जुड़ी है। उन्हें निराशा के बादलों में भी आशा की चमक दिखती रहती है।
भाषा-शैली — जोशीजी की भाषा सरल, सुबोध और बनावट से है । गद्य को पद्य के रूप में प्रस्तुत करने की कला में आप कुशल हैं। वाक्यों की थोड़ी-बहुत हेरा-फेरी करके विशेष प्रभाव उत्पन्न करना उनकी शैली की अन्यतम विशेषता है। उनके काव्य में प्रयुक्त वाक्य और शब्द आत्मीयता से ओत-प्रोत तथा स्वाभाविक लय से युक्त होते हैं। यह उनके काव्य को सौन्दर्य प्रदान करता है। उनके द्वारा काव्य में प्रस्तुत बिम्ब और चित्र अपनी स्वाभाविकता के कारण एक विशेष आकर्षण रखते हैं।
II. अर्थग्रहण एवं सराहना सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न – निम्नलिखित पद्यांशों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—
1. कोहरे से ………………. रहे हैं बच्चे?
शब्दार्थ- कोहरा = धुन्ध । भयानक = डरावनी । विवरण = वर्णन, हाल-चाल ।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(ग) हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति कौन-सी है?
(घ) पंक्ति को विवरण की तरह लिखा जाना भयानक क्यों है?
(ङ) किस पंक्ति को सवाल की तरह लिखा जाना चाहिए और क्यों?
(च) कोहरे से ढकी सड़क पर बच्चों का काम पर जाना कवि को क्यों व्यथित करता है?
(छ) कवि लोगों से क्या विचार करने की अपेक्षा करता है?
(ज) पद्यांश का भाव- सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(झ) पद्यांश का शिल्प सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि – राजेश जोशी | कविता – बच्चे काम पर जा रहे हैं।
(ख) आशय – कवि कहता है— सुबह का समय है। शीत ऋतु है। सड़कों पर घना कोहरा छाया हुआ है। ऐसी विकट परिस्थिति में भी बच्चे काम करने जाने को विवश हैं; क्योंकि उन्हें पेट भरने लिए रोटी कमानी है । होना यह चाहिए कि ठण्ड से बचने के लिए वे . घर में रहते, घर के भीतर ही खेलते-कूदते ।
कवि कहता है – हमारे युग की यह कितनी भयानक विडम्बना है कि हमारे बच्चों को खेलने-कूदने के समय में काम करना पड़ रहा है और इससे भी भयानक बात यह है कि उनकी इस भयंकर विवशता को भी एक सामान्य विवरण की तरह ही समाज में देखा – समझा जा रहा है। इसे देख-सुनकर न किसी को क्रोध आता है और न लाज, न दुःख होता है और न पछतावा । इसे एक भयावह समस्या के रूप में लेना चाहिए, एक गम्भीर प्रश्न की तरह लिखा जाना चाहिए; जैसे कि- बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं? लोगों को यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि बच्चे, जिनका बचपन खेलकूद और मौज-मस्ती में बीतना चाहिए; काम करने, पेट पालने या रोटी कमाने को विवश क्यों हैं?
(ग) हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है- ” बच्चे काम पर जा रहे हैं।” बाल-श्रम की विवशता, यह आज का सबसे बड़ा और भयानक सत्य है।
(घ) पंक्ति को विवरण की तरह लिखे जानें का अर्थ है- बात को सामान्य स्तर की स्वीकार कर लेना, रोजमर्रा के जीवन की बात मान लेना। कवि को लगता है कि लोग कितने संवेदनहीन हो चुके हैं! उन्हें बालकों का मजदूरी करना जरा भी चिन्तित नहीं करता। वे इस समस्या को इतने हल्के से कैसे ले सकते हैं?
(ङ) “बच्चे काम पर जा रहे हैं” इस पंक्ति को “काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे” इस तरह लिखा जाना चाहिए; क्योंकि बच्चों को तो बचपन में खेलने कूदने, मौज-मस्ती करने का अवसर मिलना चाहिए, जबकि वे काम पर जा रहे हैं। यह देखकर हमें अपने से ही यह प्रश्न पूछना चाहिए कि बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं? कवि सोचता है कि हमारे मन में यह प्रश्न उठना ही चाहिए।
(च) कोहरे से ढकी सड़क पर बच्चों को काम के लिए जाता देख कवि व्यथित हो जाता है। वह सोचता है कि यही तो उनके पढ़ने-लिखने, खेलने-खाने के दिन हैं और इस छोटी अवस्था में ही उन्हें पेट पालने की चिन्ता में काम के लिए निकलना पड़ रहा है। यही बात संवेदनशील कवि को दुःखी कर देती है।
(छ) कवि लोगों से अपेक्षा करता है कि वे बच्चों के काम पर जाने की भयावहता को समझें। बच्चों के भविष्य को सँवारने का प्रयास करें। बच्चों को असमय चिन्ताग्रस्त होकर जीने की विवशता से बचाएँ ।
(ज) भाव – सौन्दर्य – कवि ने बाल-श्रम की समस्या की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। पाठक इसे पढ़कर सोचने के लिए एक बार विवश अवश्य होगा।
(झ) शिल्प-सौन्दर्य-
● काव्य-भाषा सरल-सुबोध, सादगीपूर्ण एवं आडम्बरहीन है।
● प्रथम पंक्ति में सशक्त दृश्य बिम्ब उपस्थित हुआ है।
● ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ की आवृत्ति चिन्ता का वातावरण रचती है।
● ‘विवरण की तरह’, ‘सवाल की तरह’ नई उपमाएँ हैं।
● ‘बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं’ पूछकर कवि ने अपनी सामाजिक जागरूकता का परिचय दिया है।
● सुबह – सुबह में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
● वार्त्तालाप जैसी शैली का प्रयोग, संवाद स्थापित करने में सफल रहा है।
● अनुप्रासात्मकता — कोहरे से ढँकी सड़क, हमारे समय की सबसे ।
2. क्या अंतरिक्ष …………….. हैं एकाएक
शब्दार्थ – अन्तरिक्ष = आकाश । भूकम्प = भूचाल । दीमक = एक कीड़ा जो लकड़ी और कागजों आदि को क्षति पहुँचाता है। मदरसों = विद्यालयों । इमारतें = भवन। एकाएक = अचानक।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) गेंदों के खत्म होने से क्या आशय है ?
(घ) कवि की हताशा और निराशा का क्या कारण है?
(ङ) मदरसों का क्या अर्थ है?
(च) काला पहाड़ किसका प्रतीक है?
(छ) कवि रंगीन किताबें, गेंद, खिलौने, मदरसों, मैदान, बगीचे, आँगन क्यों चाहता है?
(ज) पद्यांश का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(झ) पद्यांश का शिल्प सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि – राजेश जोशी | कविता – बच्चे काम पर जा रहे हैं।
(ख) आशय – कवि बाल मजदूरों को गहरी धुन्ध में, विपरीत मौसम में काम करने जाता देखकर प्रश्न पूछता है – ये बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं? क्या इनके खेलने के लिए गेंदें अब नहीं बची। क्या सारी गेंदें उछलकर आकाश में समा गई हैं? इनके लिए क्या रंगीन किताबें भी नष्ट हो गई हैं? क्या इनकी पुस्तकों को दीमकें खा गई हैं? काले पहाड़ के नीचे दबकर नष्ट हो गए हैं? क्या इनके पढ़ने-लिखने क्या इनके लिए खिलौने समाप्त हो गए हैं? इनके खिलौने क्या किसी के लिए विद्यालय भी नहीं बचे हैं? क्या ये विद्यालय किसी भूचाल की चपेट में आकर नष्ट हो गए है? यदि ये सब चीजें मौजूद हैं तो फिर ये बच्चे इस समय विद्यालय में पढ़ते होने चाहिए थे। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है, जो हम इन बच्चों को इनके खिलौनों, किताबों और विद्यालयों से वंचित कर रहे हैं। इन बच्चों के लिए भी तो खेलने को खुले मैदान होने चाहिए, बाग-बगीचे होने चाहिए, घरों में खुले आँगन होने चाहिए, पर ये सबकुछ भी नहीं है। कहाँ नष्ट हो गए हैं ये सब ? आखिर कौन उत्तरदायी है इस सबके लिए।
(ग) गेंदों के खत्म होने से आशय है कि बच्चों को उनके वालपन, उनके बचपन से दूर करना, उनका स्वाभाविक विकास रोकना। कवि चाहता है कि बच्चों को उनके बचपन के साथ विकसित होने का अवसर दिया जाए।
(घ) कवि की हताशा और निराशा का कारण है—बच्चों का मन मारकर काम करना, बाल-मजूदरी की विवशता । वह जब अन्य बच्चों को गेंदों, रंगीन पुस्तकों, खिलौनों, मदरसों, मैदानों, बगीचों आदि के साथ देखता है तो उसे हताशा घेर लेती है। वह निराशा में झल्लाता है कि यह सब सुविधाएँ काम पर जाते इन बच्चों को उपलब्ध क्यों नहीं हैं।
(ङ) मदरसों का अर्थ है – विद्यालय । प्राय: इस शब्द का प्रयोग ‘मुस्लिम पद्धति की पाठशाला’ के लिए होता है।
(च) ‘काला पहाड़’ शोषण और अज्ञानता का प्रतीक है।
(छ) कवि रंगीन किताबें, गेंदें, खिलौने, मदरसे, मैदान, बगीचे, आँगन आदि इसलिए चाहता है कि मजदूरी करनेवाले ये बच्चे खेल-कूद सकें, निश्चिन्त जीवन जी सकें, पढ़ने-लिखने में दिन बिताएँ, – भविष्य के सुन्दर सपने देख सकें।
(ज) भाव – सौन्दर्य – पद्यांश में कवि की झल्लाहट से, बाल-मजदूरों को लेकर उसकी गम्भीर चिन्ता व्यक्त हुई है। यहाँ ऐसे समाज के प्रति उसका क्षोभ सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुआ है, जो बाल-मजदूरों को हल्के से लेता है।
(झ) शिल्प-सौन्दर्य-
● ‘भाषा प्रवाहपूर्ण, गतिशील तथा सरल-सुबोध है।
● प्रश्नालंकार का प्रयोग हुआ है।
● व्यंजना शब्दशक्ति का प्रयोग हुआ है।
● अभिव्यक्ति में चित्रात्मकता है, सारी गेंदों का आकाश में गिर जाना, रंगीन पुस्तकों को दीमकों द्वारा खाया जाना, खिलौनों का काले पहाड़ के नीचे दब जाना तथा मदरसों का भूचाल में ढह जाना सभी सुन्दर चित्र हैं।
3. तो फिर ………………….. पर जा रहे हैं।
शब्दार्थ— भयानक = डर पैदा करनेवाला । हस्बमामूल = यथावत्, वैसी ही हैं जैसी कि उन्हें होना चाहिए।
प्रश्न –
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
(घ) ‘भयानक होता अगर ऐसा होता’ पंक्ति का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
(ङ) सबसे अधिक भयानक स्थिति क्या है ?
(च) बच्चों के काम पर जाने से कवि क्यों चिन्तित है?
(छ) पद्यांश का भाव – सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(ज) पद्यांश का शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
(क) कवि – राजेश जोशी | कविता – बच्चे काम पर जा रहे हैं।
(ख) आशय — कवि कहता है— यदि इस संसार में बच्चों के खेलने के लिए गेंदें, रंगीन पुस्तकें, खिलौने, विद्यालय, मैदान, बाग-बगीचे, घर-आँगन ही न हों तो इस संसार में रखा ही क्या है? जीने का लाभ ही क्या? ऐसी दुनिया क्या इनसानों की कही जाएगी, जिसमें इनसानों के बच्चे ही बचपने से वंचित हों ? अफसोस की बात तो यह है कि ये सारी चीजें संसार में तो हैं, परन्तु इन बच्चों को उपलब्ध नहीं हैं। हमारे देश के लाखों बच्चे इनसे वंचित हैं। बच्चे खाने खेलने, पढ़ने-लिखने की बजाय इस नन्हीं सी उम्र में काम-धन्धा करने जा रहे हैं। बाल-श्रम धड़ल्ले से हो रहा है। दुःख की सबसे बड़ी बात तो यही है कि किसी को इनकी फिक्र तक नहीं, जबकि यह भयानक दृश्य चिन्ता करने का विषय है।
(ग) इस पंक्ति से आशय है— यदि हम नन्हें बच्चों को उनके उपयुक्त विकास की सुविधाएँ ही न दे पाएँ तो हमारा जीवन ही निरर्थक है। हम इन छोटे बच्चों का जीवन बरबाद कर रहे हैं, जबकि ऐसे जीवन न बच्चों को आनन्द मिल सकता है और न ही हमें ।
(घ) इस पंक्ति से आशय है कि यदि वास्तव में बच्चों के लिए आवश्यक ये सारी सुविधाएँ नष्ट हो गई होतीं तो यह कितना भयानक सच होता। बच्चों के जीवन में महत्त्वपूर्ण गेंदें, रंगीन पुस्तकें, खिलौने, विद्यालय, मैदान, आँगन, बाग-बगीचे आदि का नष्ट होना वास्तव में बच्चों के संसार का नष्ट होना है। यदि ऐसा हो गया होता तो यह सारी दुनिया ही बदरंग और बेनूर हो जाती ( पर ऐसा नहीं हुआ है)।
(ङ) कवि की दृष्टि में सबसे अधिक भयानक स्थिति यह है कि यद्यपि बच्चों के कल्पना लोक और उनके विकास के लिए है, किन्तु वे बच्चे अभागे हैं, जिन्हें यह वस्तुएँ उपलब्ध नहीं हैं। गरीबी आवश्यक गेंदें, पुस्तकें, विद्यालय आदि की संसार में कोई कमी नहीं के कारण उन्हें काम-धन्धे के वश में अपना बचपन गँवाना पड़ता है। ये बच्चे बचपन से ही वंचित रहकर जीने को विवश होते हैं।
(च) बच्चों को काम पर जाते देख कवि चिन्तित हो उठता है। उसे लगता है कि बच्चों को खेल-कूद और पढ़ने-लिखने में मस्त रहना चाहिए। इस उम्र में रोटी-दाल की चिन्ता उन्हें नहीं होनी चाहिए । बचपन का निश्चिन्त रहकर विकास होना चाहिए। बच्चों पर काम का बोझ डालना किसी प्रकार भी उचित नहीं है।
(छ) भाव – सौन्दर्य — पद्यांश में कवि ने बाल श्रम की समस्या की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करने पूरी सफलता पाई है। उसने लोगों की बाल श्रम के प्रति उपेक्षा तथा संवेदनशून्यता के प्रति चिन्ता भी व्यक्त की है। पद्यांश कामकाजी बच्चों के प्रति करुणा जगाने में सक्षम है।
(ज) शिल्प-सौन्दर्य-
● भाषा सरल सहज, किन्तु गम्भीर अर्थ की वाहक हैं। सरल शब्दों में खरी बात कहने में कवि ने सफलता पाई है।
● वाक्यों का प्रत्येक शब्द सधा हुआ और उपयुक्त है।
● तुक के स्थान पर विचार और अर्थ की लयबद्धता दर्शनीय है।
● अन्तिम पंक्तियों में दृश्यबिम्ब है। चित्रात्मकता स्पष्ट है।
● ‘छोटे-छोटे’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
● उर्दू और संस्कृत के शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है, किन्तु ‘हस्बमामूल’ जैसा अप्रचलित उर्दू शब्द खटकता है।
● ‘तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में पंक्ति से कामकाजी बच्चों के लिए चिन्ता और वस्तुस्थिति से निराशा और हताशा की व्यंजना होती है।
III. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – कविता की पहली दो पंक्तियों को पढ़ने तथा विचार करने से आपके मन-मस्तिष्क में जो चित्र उभरता है, उसे लिखकर व्यक्त कीजिए ।
उत्तर – कविता की पहली दो पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह-सुबह
इन पंक्तियों को पढ़कर हमारे मन विचार आता है कि जो बच्चे जाड़ों की कुहरेभरी सुबह में काम पर जाने के लिए विवश हैं तो निश्चय ही उनका जीवन अत्यधिक अभावग्रस्त होगा, अन्यथा ये भी अपने घरों में गर्म कपड़ों में दुबके होते। उनके अभावग्रस्त होने की मस्तिष्क में आते ही उनका यह शब्दचित्र उभरता है कि बालक ठण्ड से ठिठुरते हुए कोहरे को चीरते अपने गन्तव्य की ओर बढ़े जा रहे हैं। उनके पास पर्याप्त गर्म कपड़े भी नहीं हैं। अधिकांश बच्चे एक अकेली कमीज और पैण्ट में ही जाड़े की जंग लड़ रहे हैं। जब तन पर पूरे कपड़े नहीं तो फिर जूते-चप्पलों का तो प्रश्न ही नहीं उठता। सबके पास एक थैला है, जो किसी के हाथ में है तो किसी के कन्धे पर लटका है। इन थैलों में इनके दोपहर का भोजन । भोजन क्या, दो सूखी रोटियाँ शायद प्याज और नमक के साथ। इतने पर भी ये बच्चे निराश नहीं हैं, बल्कि पूरे जोश से लबरेज हैं, मानो अपने अभावों को पीछे ठेलकर वे आगे बढ़ जाना चाहते हैं, अपने स्वर्णिम कल की ओर।
प्रश्न 2 – कवि का मानना है कि बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछा जाना चाहिए कि ‘काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?’ कवि की दृष्टि में उसे प्रश्न के रूप में क्यों पूछा जाना चाहिए?
उत्तर – किसी बात का विवरण देने का अर्थ है- किसी बात को सामान्य मानकर उसकी जानकारी भर दे देना और उसे पाकर सन्तुष्ट हो जाना। विवरण केवल सूचना है। सूचना में कोई भावनात्मक लगाव जैसी चीज नहीं होती, न ही उसे पढ़कर पाठक चिन्तित या व्याकुल होता है। परन्तु यदि प्रश्न पूछा जाता है तो निश्चित रूप से पाठक या श्रोता का ध्यान आकर्षित होता है। प्रश्न से जुड़े भाव की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। लेखक चाहता है कि बाल मजदूरी के सम्बन्ध में लोगों के सरोकार जागें । उनमें इन बच्चों की दुर्दशा के प्रति चिन्ता और तड़प उत्पन्न हो। आज के बच्चे हमारे कल के कर्णधार हैं, यह बात इनके सन्दर्भ में भी सोची जाए। इन्हें उपेक्षा से न देखा जाए। इस बात को एक विवरण मानकर सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, बल्कि प्रश्न का समाधान खोजा जाना चाहिए कि वे कौन-से कारण हैं, जो इन्हें काम पर जाने के लिए विवश करते हैं।
प्रश्न 3 – सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे क्यों वंचित हैं ?
उत्तर— समाज-व्यवस्था और गरीबी ऐसे प्रमुख कारण हैं, जिनके कारण बच्चे सुविधा और मनोरंजन के साधनों से वंचित रह जाते हैं। हमारे देश में करोड़ों लोग पेटभर रोटी के लिए कठोर श्रम करते हैं। इस प्रकार के दरिद्र लोगों के बच्चे भी पेट भरने की गरज से, बचपन से ही काम-काज में लग जाते हैं। यह उनकी जन्मजात विवशता होती है। एक ईंट-गारा ढोनेवाले मजदूर या ऋण के बोझ से दबे गरीब व्यक्ति के लिए यह सम्भव भी कहाँ है कि वह अपने बच्चों को ढंग से पालपोस कर बड़ा करे, खिलौनों और किताबों की बात तो बहुत दूर की है। बच्चों को ईश्वर की देन मानकर परिवारों को नियोजित न करना भी इस समस्या का सर्वप्रमुख कारण है।
सरकार ने बाल-श्रम रोकने के कानून अवश्य बना दिए हैं, परन्तु ऐसे बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए कोई कारगर वैकल्पिक व्यवस्था करने में वह लगभग असफल ही रही है। न समाज में संवेदनशीलता रही है और न प्रबल इच्छा-शक्ति, फिर ऐसे बच्चे वंचित क्यों न रहेंगे।
प्रश्न 4- -दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इस उदासीनता के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर- दिन-प्रतिदिन के जीवन में बाल-श्रम अर्थात् बच्चों को काम पर जाते देखकर भी लोगों में उदासीनता है। इसके कई कारण हो सकते हैं; जैसे—
(1) व्यस्तता—लोग अपने जीवन में इतने व्यस्त हैं कि वे दूसरों की तरफ देखकर भी नहीं देखते अर्थात् अनदेखी करते हैं। उन्हें बाल-श्रम कोई समस्या या बुरी बात लगती ही नहीं। वे इसे समाज-व्यवस्था का अनिवार्य अंग मान बैठे हैं कि यह तो होता ही है।
(2) जागरूकता का अभाव – अधिकतर लोग यही मानते हैं ऐसे बच्चों को वे कहाँ तक सँभाल सकते हैं, इन्हें सुख-सुविधा देना तो सरकार का काम है।
(3) भाग्य और भगवान् का बहाना — लोग ऐसे बच्चों के जीवन को उनके भाग्य का दोष या भगवान् का बहाना बनाकर उनकी उपेक्षा करते हैं। जब भगवान् ने उन्हें गरीब पैदा किया है, तब यह सब तो उन्हें सहना ही पड़ेगा—ऐसी सोच के द्वारा वे अच्छे इनसान या नागरिक के कर्त्तव्य का पालन करने से साफ बच निकलते हैं।
(4) विवशता – महँगाई की मार और घर में बच्चों की बड़ी संख्या के कारण अक्सर इनके माँ-बाप स्वयं इन्हें काम-काज में लगा देते हैं। बाद में ये बच्चे इसी के अभ्यस्त हो जाते हैं। लोग भी यह सोचने लगते हैं कि कुछ भी करो ये लोग ऐसे ही रहेंगे, इसलिए वे भी इनकी चिन्ता करना छोड़ देते हैं। ..
प्रश्न 5 – आपने अपने शहर में बच्चों को कब-कब और कहाँ-कहाँ काम करते हुए देखा है ?
उत्तर – मैंने अपने शहर में बच्चों को अनेक स्थानों पर काम करते हुए देखा है। इन्हें चाय की दुकान, ढाबा, होटल, निजी कार्यालय, घर, यहाँ तक कि साइकिल – स्कूटर की रिपेयरिंग की दुकानों पर और कार-सफाई आदि करते मैंने इन्हें अक्सर देखा है। सुबह-सवेरे ये अँगीठी लीपते-पोतते, दुकानों की झाड़पोंछ करते दिख जाते हैं तो रात को देर तक बर्तन व दुकान की सफाई करते। मैंने हर मौसम में हर हाल में इन्हें काम करते देखा है।
प्रश्न 6 – बच्चों का काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान क्यों है?
उत्तर – कवि ने बच्चों के काम पर जाने की घटना को धरती पर एक बड़े हादसे के समान माना है। उसका सोचना है कि यह बच्चों के प्रति घोर अन्याय है। बच्चों के साथ घटी यह एक बड़ी दुर्घटना ही है। बच्चे को जन्म के साथ ही लाड़-प्यार, सुख-सुविधा दी जानी चाहिए। उसे पढ़ने-लिखने खेलने-खाने के पर्याप्त अवसर भी मिलने चाहिए। पर ऐसा होता नहीं। ये बच्चे गरीबी और विवशता के कारण काम पर जाते हैं। यह उनके बचपन के साथ घटी किसी दुर्घटना से कम नहीं। यह उनको बरबादी के कगार पर ले जाता है। शुभ कल्पनाओं से वे दूर होते जाते हैं, अपराध उनके निकट-संगी हो जाते हैं। इस प्रकार बच्चों का काम पर जाना धरती पर किसी बड़े हादसे से कम नहीं।
IV. अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – ‘ बच्चे काम पर जा रहे हैं’ कविता का प्रतिपाद्य क्या है? अथवा ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ कविता का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर— ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता का उद्देश्य या प्रतिपाद्य है – बाल- मजदूरों के प्रति समाज में जागरूकता लाना। बच्चों के बचपन की रक्षा की जाए, उन्हें पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद, खाने-पहनने, मनोरंजन आदि के समान अवसर दिए जाने चाहिए, उनसे कोई भारी काम नहीं करवाना चाहिए, उन्हें रोजी-रोटी की चिन्ता से मुक्त रखा जाना चाहिए। सरकार को कानून के कठोर अनुपालन के द्वारा तथा समाज को सहानुभूतिपूर्वक ऐसे बच्चों के जीवन को सुधारने का प्रयास करना चाहिए। कवि का प्रतिपाद्य यही है कि बाल मजदूरों की दशा पर चिन्तन हो और उनके प्रति यथास्थितिवादी रवैया अपनाया जाना बन्द हो ।
प्रश्न 2 – ‘ बच्चे काम पर जा रहे हैं। यह भयानक प्रश्न कैसे बनता है?
उत्तर- बचपन से ही रोजी-रोटी कमाने के लिए बच्चों का काम पर जाना निश्चित रूप से भयानक बात है। इसी का परिणाम है कि ये बच्चे असमय बूढ़े हो जाते हैं। उनके मन मुरझा जाते हैं। शरीर निस्तेज हो जाते हैं। इसीलिए कवि ने उनके काम पर जाने को भयानक बात कहा है। बच्चे काम पर क्यों जाते हैं? यह प्रश्न दिन-पर-दिन भयानक होता जा रहा है।
