UK 9th Social Science

UK Board 9th Class Social Science – (अर्थशास्त्र) – Chapter 4 भारत में खाद्य सुरक्षा

UK Board 9th Class Social Science – (अर्थशास्त्र) – Chapter 4 भारत में खाद्य सुरक्षा

UK Board Solutions for Class 9th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (अर्थशास्त्र) – Chapter 4 भारत में खाद्य सुरक्षा

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – भारत में खाद्य सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है?
उत्तर— भारत में खाद्य सुरक्षा निम्नलिखित रूपों में सुनिश्चित की जाती है-
(i) सभी लोगों के लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री उपलब्ध कराकर,
(ii) सभी लोगों के पास स्वीकार्य गुणवत्ता के खाद्य पदार्थ खरीदने की क्षमता द्वारा तथा
(iii) खाद्य की उपलब्धता में उत्पन्न बाधाओं को हटाकर ।
प्रश्न 2 – कौन लोग खाद्य असुरक्षा से अधिक ग्रस्त हो सकते हैं?
उत्तर – निम्नलिखित लोग खाद्य असुरक्षा से अधिक ग्रस्त हो सकते हैं-
भूमिहीन अथवा नगण्य भूमि पर निर्भर लोग, पारम्परिक दस्तकार, पारम्परिक सेवा प्रदाता, अपना छोटा-मोटा काम करने वाले कामगार, निराश्रित एवं भिखारी, कम वेतन वाले व्यवसायों और अनियमित श्रम बाजार में लगे लोग, मौसमी कार्यों में लगे लोग आदि ।
प्रश्न 3- भारत में कौन-से राज्य खाद्य असुरक्षा से अधिक ग्रस्त हैं?
उत्तर— भारत में खाद्य असुरक्षा से अधिक ग्रस्त राज्य निम्नलिखित हैं-
उत्तर प्रदेश (पूर्वी और दक्षिण – पूर्वी हिस्से), बिहार, झारखण्ड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ भाग।
प्रश्न 4– क्या आप मानते हैं कि हरित क्रान्ति ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना दिया है? कैसे?
उत्तर – हरित क्रान्ति ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना दिया है। उन्नत बीज (H. Y.V.), सिंचाई के साधन, उर्वरक आदि के अधिकाधिक प्रयोग के कारण पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु व आन्ध्र प्रदेश में गेहूं व चावल के उत्पादन में कई गुणा वृद्धि हुई है। इसके कारण हम खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर हो गए हैं।
प्रश्न 5 – ‘ भारत में लोगों का एक वर्ग अब भी खाद्य से वंचित है।’ व्याख्या कीजिए ।
उत्तर- भारत में लोगों का एक वर्ग अब भी खाद्य से वंचित है। इस वर्ग में आते हैं—गर्भवती तथा दूध पिलाने वाली महिलाएँ, पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे। इनके अतिरिक्त, अनेक क्षेत्र भी खाद्य से वंचित हैं।
ये हैं – आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य, आदिवासी क्षेत्र, सुदूर क्षेत्र तथा प्राकृतिक आपदाओं से बार-बार प्रभावित होने वाले क्षेत्र आदि ।
प्रश्न 6 – जब कोई आपदा आती है, तो खाद्य पूर्ति पर क्या प्रभाव होता है?
उत्तर— किसी प्राकृतिक आपदा जैसे सूखे के कारण खाद्यान्न की कुल उपज में गिरावट आती है। इससे प्रभावित क्षेत्र में खाद्य की कमी हो जाती है और इनकी कीमतें बढ़ने लगती हैं जिसके कारण अनेक लोग खाद्य पदार्थ नहीं खरीद पाते। जब यह आपदा अधिक विस्तृत एवं दीर्घकालिक हो जाती है तो भुखमरी व अकाल की स्थिति बन जाती है। ,
प्रश्न 7 – मौसमी भुखमरी और दीर्घकालिक भुखमरी में भेद कीजिए।
उत्तर – मौसमी भुखमरी फसल उपजाने और काटने के चक्र से सम्बन्धित है। यह ग्रामीण क्षेत्रों की कृषि क्रियाओं की मौसमी प्रकृति के कारण तथा नगरीय क्षेत्रों में अनियमित श्रम के कारण होती है। संक्षेप में यह प्रायः तब होती है जब कोई व्यक्ति पूरे वर्ष काम पाने में असमर्थ रहता है।
इसके विपरीत दीर्घकालिक भुखमरी मात्रा अथवा गुणवत्ता के आधार पर अपर्याप्त आहार ग्रहण करने के कारण होती है। यह निम्न आय एवं जीवित रहने के लिए खाद्य पदार्थ खरीदने में अक्षमता के कारण पनपती है।
प्रश्न 8 – गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने के लिए सरकार ने क्या किया? सरकार की ओर से शुरू की गई किन्हीं दो योजनाओं की चर्चा कीजिए |
उत्तर – गरीबों को सुरक्षा देने के लिए सरकार में अनेक कदम उठाए हैं; जैसे— सार्वजनिक वितरण प्रणाली, एकीकृत बाल विकास सेवाएँ, काम के बदले अनाज कार्यक्रम, रोजगार गारण्टी योजना, सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, ग्रामीण वेतन रोजगार कार्यक्रम, दोपहर का भोजन आदि।
दो महत्त्वपूर्ण योजनाओं का वर्णन निम्नवत् हैं-
  1. लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली — अत्यन्त गरीब परिवारों को न्यूनतम मात्रा में अनाज उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार ने लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरुआत की। इसमें पहली बार निर्धनों और गैर-निर्धनों के लिए विभेदक कीमत नीति अपनाई गई। इसमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को अत्यन्त कम कीमत पर खाद्यान्न उपलब्ध कराए जाते हैं।
  2. अन्त्योदय अन्न योजना – यह योजना दिसम्बर, 2000 को निर्धनों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आरम्भ की गई। इस योजना के अन्तर्गत निर्धनतम परिवारों को प्रति माह अत्यन्त कम मूल्य पर खाद्यान्न उपलब्ध कराए जाते हैं।
प्रश्न 9 – सरकार बफर स्टॉक क्यों बनाती है?
उत्तर— सरकार बफर स्टॉक इसलिए बनाती है ताकि कमी वाले क्षेत्रों में और समाज के गरीब वर्गों में बाजार कीमत से कम कीमत पर अनाज उपलब्ध कराया जा सके। इससे अभाव, अकाल तथा अन्य प्राकृतिक आपदा के समय अनाज की कमी की समस्या हल करने में मदद मिलती है।
प्रश्न 10 – टिप्पणी लिखें-
(क) न्यूनतम समर्थित कीमत
(ख) बफर स्टॉक
(ग) निर्गम कीमत
(घ) उचित दर की दुकान
उत्तर –
(क) न्यूनतम समर्थित कीमत – भारतीय खाद्य निगम अधिशेष उत्पादन वाले राज्यों में किसानों से गेहूँ और चावल खरीदता है। किसानों को उनके उत्पादों के लिए पहले से घोषित कीमतें -दी जाती हैं। इस कीमत को न्यूनतम समर्थित कीमत कहा जाता है।
(ख) बफर स्टॉक – बफर स्टॉक भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से सरकार द्वारा अधिप्राप्त अनाज, गेहूँ और चावल का भण्डार है। इससे भविष्य में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है ।
(ग) निर्गम कीमतं—सरकार द्वारा जब गरीबों को बाजार कीमत से कम कीमत पर अनाज का वितरण किया जाता है तो इस कीमत को निर्गम कीमत कहते हैं।
(घ) उचित दर की दुकान – सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत राशन की उन दुकानों को ‘उचित दर की दुकान’ कहा जाता है जहाँ चीनी, खाद्यान्न और मिट्टी के तेल का भण्डार होता है तथा ये सभी वस्तुएँ बाजार कीमत से कम कीमत पर लोगों को बेची जाती हैं।
प्रश्न 11 – राशन की दुकानों के संचालन में क्या समस्याएँ हैं?
उत्तर— राशन की दुकानों के संचालन में आनेवाली मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं-
  1. राशन की दुकानों के विक्रेता अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से अनाज को खुले बाजार में बेच देते हैं। इससे इन दुकानों पर अनाज की कमी हो जाती है और सभी लोगों को अनाज समय पर नहीं मिल पाता ।
  2. राशन की दुकानों में उपलब्ध अनाज की किस्म घटिया होती है। यह माल बिक नहीं पाता और दुकानों में पड़ा रहता है।
  3. समय पर उठान न होने से, खाद्य निगम के गोदमों में अनाज का स्टॉक पड़ा रहता है यह धीरे-धीरे सड़कर खराब हो जाता है।
  4. अब तीन भिन्न राशन कार्डों की व्यवस्था है। कीमतों की भी अनेक श्रृंखलाएँ हैं। इससे कार्य अव्यवस्थित हो जाता है।
  5. राशन विक्रेता उचित व्यावसायिक व्यवहार नहीं अपनाते हैं जैसे घटिया स्तर का माल बेचना, माल कम तोलना / मापना, दुकानें समय पर न खोलना, मिलावट करना आदि।
प्रश्न 12– खाद्य और सम्बन्धित वस्तुओं को उपलब्ध कराने में सहकारी समितियों की भूमिका पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर— भारत में खाद्य और सम्बन्धित वस्तुओं को उपलब्ध कराने में सहकारी समितियाँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैंनिम्नलिखित बिन्दुओं पर इनकी भूमिकाओं को स्पष्ट किया जा सकता है—
  1. ये निर्धन लोगों को खाद्यान्न की बिक्री के लिए कम कीमत वाली दुकानें खोलती हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में लगभग 94 प्रतिशत राशन की दुकानें सहकारी समितियों के माध्यम से चलाई जा रही हैं। दिल्ली में मदर डेयरी उपभोक्ताओं को सरकार द्वारा निर्धारित नियन्त्रित दरों पर दूध और सब्जियाँ उपलब्ध कराती है। गुजरात में ‘अमूल’ दुग्ध और दुग्ध उत्पाद उपलब्ध कराती है। महाराष्ट्र में ए०डी०एस० (Academic of Development Science) ने अनाज बैंकों की स्थापना की है।
  2. सहकारी समितियों ने देश के विभिन्न भागों में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कराई है।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
• विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – खाद्य सुरक्षा से क्या आशय है? खाद्य असुरक्षा के दुष्प्रभावों का आकलन कीजिए।
उत्तर- खाद्य सुरक्षा की अवधारणा
खाद्य सुरक्षा से आशय सभी लोगों के लिए भोजन की सदैव उपलब्धता, पहुँच और उसे प्राप्त करने की सामर्थ्य से है।
विश्व विकास रिपोर्ट (1986) के अनुसार, खाद्य सुरक्षा का अर्थ है- “सभी व्यक्तियों के लिए सही समय पर एक सक्रिय, स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त भोजन की उपलब्धि | “
खाद्य एवं कृषि संस्था (1979) के अनुसार, खाद्य असुरक्षा का अर्थ है – “सभी व्यक्तियों को सभी समय पर उनके लिए आवश्यक बुनियादी भोजन के लिए भौतिक एवं आर्थिक दोनों रूप में उपलब्धि के आश्वासन।”
विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन (1995) में घोषणा की गई कि – वैयक्तिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा का अस्तित्व तभी है जब सक्रिय और स्वस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए आहार सम्बन्धी जरूरतों और खाद्य पदार्थों को पूरा करने के लिए पर्याप्त, सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्य तक सभी लोगों की भौतिक एवं आर्थिक पहुँच सदैव हो ।
इन परिभाषाओं से निम्नलिखित बातें उभरती हैं—
  1. किसी देश की सम्पूर्ण जनसंख्या को खाद्य की भौतिक उपलब्धि होनी चाहिए।
  2. लोगों के पास पर्याप्त क्रय-शक्ति होनी चाहिए ताकि वे अपनी जरूरत के लिए खाद्य पदार्थ हासिल कर सकें।
  3. उपलब्ध खाद्य गुणवत्ता एवं मात्रा दोनों रूप में पर्याप्त होनी चाहिए।
  4. प्रत्येक समय, विश्वसनीय और पोषण की दृष्टि से खाद्य की पर्याप्त आपूर्ति दीर्घकालीन आधार पर उपलब्ध होनी चाहिए।
खाद्य असुरक्षा के दुष्प्रभाव
अति निर्धनता व प्राकृतिक आपदाओं- भूकम्प, सूखा, बाढ़, सुनामी, अकाल- आदि के कारण लोग खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त हो जाते हैं। इन आपदाओं के फलस्वरूप कुल उत्पादन घटने-बढ़ने लगता है। इससे प्रभावित क्षेत्र में खाद्य की कमी हो जाती है। खाद्य की कमी से कीमतें बढ़ जाती हैं। निर्धन लोग ऊँची कीमतों पर खाद्य पदार्थ नहीं खरीद पाते। यदि ये आपदाएँ अधिक विस्तृत क्षेत्र में आती हैं अथवा अधिक लम्बे समय तक बनी रहती हैं तो भुखमरी अथवा अकाल की स्थिति बन सकती है। अकाल के दौरान बड़े पैमाने पर मौतें होती हैं। भुखमरी और विवश होकर दूषित जल या सड़े भोजन के प्रयोग से फैलने वाली महामारियों का प्रकोप हो जाता है। भुखमरी से उत्पन्न कमजोरी से रोगों के प्रति शरीर की प्रतिरोधी क्षमता कम हो जाती है।
भारत में खाद्य असुरक्षा से सर्वाधिक प्रभावित वर्गों में निम्नलिखित शामिल हैं – (i) भूमिहीन, (ii) पारम्परिक दस्तकार, (iii) पारम्परिक सेवाएँ प्रदान करने वाले लोग, (iv) अपना छोटा-मोटा काम करने वाले कामगार, (v) निराश्रित एवं भिखारी, (vi) कम वेतन व्यवसायों और अनियत श्रम बाजार में काम करने वाले लोग।
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों में जिनका या तो भूमि का आधार कमजोर होती है या जिनकी भूमि की उत्पादकता बहुत कम होती है, खाद्य की दृष्टि से शीघ्र असुरक्षित हो जाते हैं, महिलाएं व बच्चे कुपोषित हो जाते हैं और खाद्य असुरक्षा का सर्वाधिक दुष्प्रभाव आदिवासी और सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले गरीब लोगों पर पड़ता है। भुखमरी का खतरा बढ़ जाता है।
प्रश्न 2 – सार्वजनिक वितरण प्रणाली क्या है? भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालिए । 
उत्तर- सार्वजनिक वितरण प्रणाली का अर्थ
सार्वजनिक वितरण प्रणाली से आशय उस प्रणाली से है जिसमें आवश्यक एवं उपभोक्ता वस्तुओं को सार्वजनिक रूप से इस प्रकार वितरित किया जाता है कि ये वस्तुएँ सभी उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर और उचित मात्रा में प्राप्त हो सकें। इस प्रणाली में वितरण व्यवस्था पर सरकारी नियमन एवं नियन्त्रण रहता है।
इसमें भारतीय खाद्य निगम द्वारा खाद्यान्नों को क्रय किया जाता है और सरकार द्वारा विनियमित राशन दुकानों के माध्यम से इसे वितरित किया जाता है। ये मध्यस्थ कहलाते हैं। इसमें मध्यस्थों के लाभ की मात्रा और वस्तुओं के विक्रय मूल्य सरकार द्वारा निश्चित किए जाते हैं। इससे कम या अधिक मूल्य पर वस्तुओं की बिक्री नहीं की जा सकती। इस व्यवस्था के अन्तर्गत उपभोक्ताओं को राशन कार्ड वितरित किए जाते हैं और इन राशन कार्डों के आधार पर गेहूँ, चावल, कपड़े, चीनी व तेल का निश्चित आधार पर वितरण किया जाता है। यह वितरण निम्नलिखित माध्यमों द्वारा होता है-
  1. उचित मूल्य पर राशन की दुकानें – इन दुकानों से गेहूँ, गेहूँ से बनी वस्तुएँ (आटा, सूजी, मैदा) चावल, चीनी, वनस्पति घी व तेल सरकार द्वारा निर्धारित मूल्यों पर राशन कार्डों के आधार पर बेचा जाता है।
  2. सहकारी उपभोक्ता भण्डार – इन भण्डारों में उपभोक्ताओं की आवश्यकता की वस्तुओं के साथ-साथ नियन्त्रित वस्तुओं की बिक्री का भी प्रबन्ध होता है।
  3. सुपर बाजार – देश के बड़े-बड़े नगरों में सुपर बाजार खोले गए हैं जिनमें साधारण उपयोग की सभी वस्तुएँ उपलब्ध रहती हैं।
  4. नियन्त्रित कपड़े की दुकानें- इन दुकानों पर निर्मित कपड़ा राशन कार्डों के आधार पर उपभोक्ताओं को बेचा जाता है।
  5. सोफ्ट कोक डिपो – इन दुकानों पर उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर सोफ्ट कोक बेचा जाता है।
  6. मिट्टी के तेल के विक्रेता – ये विक्रेता सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य पर विक्रेताओं को तेल उपलब्ध कराते हैं।
भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थिति
भारत सरकार ने खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रारम्भ किया। शुरू में इस कार्यक्रम का लक्ष्य सभी वर्गों को लाभ प्रदान करना था। लेकिन बाद के वर्षों में इन कार्यक्रमों को और लक्ष्यपरक बनाने के लिए संशोधन किया गया। सन् 1992 में देश के वितरण ब्लॉकों में संशोधित 1100 प्रणाली (आर० पी०डी०एस० ) शुरू की गई। इस कार्यक्रम का नया लक्ष्य दूर-दराज और पिछड़े क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभ को पहुँचाना था। जून 1997 से सभी क्षेत्रों में गरीबों को लक्षित करने के सिद्धान्त को अपनाने के लिए लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टी०पी०डी०एस०) प्रारम्भ की गई। यह इस प्रकार का पहला प्रयास था। अब निर्धनों और गैर-निर्धनों के लिए विभेदक कीमत नीति अपनाई गई। इसके अतिरिक्त वर्ष 2000 में दो विशेष योजनाएँ अन्त्योदय अन्न योजना और अन्नपूर्णा योजना प्रारम्भ की गई। ये योजनाएँ क्रमशः ‘गरीबों में भी सार्वधिक गरीब’ और ‘दीन वरिष्ठ नागरिक’ समूहों पर लक्षित हैं। इन दोनों योजनाओं का संचालन सार्वजनिक वितरण प्रणाली के वर्तमान नेटवर्क से जोड़ दिया गया है।
खाद्यान्न मूल्यों को स्थिर बनाने एवं सामर्थ्य अनुसार कीमतों पर उपभोक्ताओं को खाद्यान्न उपलब्ध कराने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली अत्यन्त प्रभावी सिद्ध हुई है। इस कार्यक्रम की सहायता अकाल एवं भुखमरी को रोकने में सफलता मिली है। साथ ही गरीब परिवारों को खाद्य सुरक्षा एवं किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य भी मिलता है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली की अनेक आधारों पर आलोचना भी की गई है। पर्याप्त अन्य भण्डार के बाद भी देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में भुखमरी की घटनाएँ रही हैं। अनाज का भण्डारण उचित तरीके से नहीं किया जा रहा है जिससे बड़े पैमाने पर अनाज नष्ट हो रहा है।
भारतीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013
भारतीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के अन्तर्गत खाद्य एवं पोषण सम्बन्धी सुरक्षा सस्ती कीमतों पर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है ताकि मानव गरिमामय जीवन निर्वाह कर सके। इस अधिनियम के अन्तर्गत 75 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या और 50 प्रतिशत शहरी जनसंख्या को पात्र परिवार में वर्गीकृत किया गया।
अन्त्योदय अन्न योजना
अन्त्योदय अन्न योजना दिसम्बर 2000 से शुरू की गई थी। इस योजना के अन्तर्गत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आने वाले निर्धनता रेखा से नीचे के परिवारों में से एक करोड़ लोगों की पहचान की गई । सम्बन्धित राज्य के ग्रामीण विकास विभागों ने गरीबी रेखा से नीचे के गरीब परिवारों को सर्वेक्षण के द्वारा ‘चुना। 2 रुपये प्रति किलोग्राम गेहूँ और 3 रुपये प्रति किलोग्राम की अत्यधिक कम आर्थिक सहायता प्राप्त दर पर प्रत्येक पात्र परिवार को 25 किलोग्राम अनाज उपलब्ध कराया गया। अनाज की यह मात्रा अप्रैल 2002 में 25 किलोग्राम से बढ़ाकर 35 किलोग्राम कर दी गई। जून 2003 और अगस्त 2004 में इसमें 50-50 लाख अतिरिक्त बी०पी०एल० परिवार दो बार जोड़े गए। इससे इस योजना में आने वाले परिवारों की संख्या 2 करोड़ हो गई।
सहायिकी (सब्जिडी)
सहायिकी (सब्सिडी) वह भुगतान है जो सरकार द्वारा किसी उत्पादक को बाजार कीमत की अनुपूर्ति अथवा मूल्य चुकाने के लिए किया जाता है। सहायिकी से घरेलू उत्पादकों के लिए ऊँची आय कायम रखते हुए, उपभोक्ता कीमतों को कम किया जा सकता है।
प्रश्न 3 – सार्वजनिक वितरण प्रणाली के गुण व दोष बताइए । इसमें सुधार के लिए उपयुक्त सुझाव भी दी।
उत्तर- सार्वजनिक वितरण प्रणाली के गुण
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के निम्नलिखित गुण हैं-
  1. उपभोक्ताओं को निर्धारित मूल्यों पर उचित मात्रा में वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं।
  2. मध्यस्थ विक्रेताओं की लाभ की मात्रा निश्चित होती है। अतः उपभोक्ताओं का शोषण नहीं होता।
  3. वस्तुओं के विक्रय मूल्य निश्चित होते हैं। अतः मूल्यों में स्वतन्त्र उच्चावचेन नहीं हो पाते।
  4. प्रति इकाई बिक्री की मात्रा निश्चित होने के कारण सभी उपभोक्ताओं को वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती हैं।
  5. वस्तुओं की उचित मूल्य पर नियमित आपूर्ति बनी रहती है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दोष
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सफल क्रियान्वयन में निम्नलिखित दोष सामने आए हैं—
  1. सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार साधारणतया नगरों तक ही सीमित हैं, गाँवों तक ये दुकानें नहीं पहुँच पायी हैं।
  2. अधिकांश गाँवों में वितरण व्यवस्था उचित नहीं है। अधिकांश . दुकानदार जब शहर में नियन्त्रित वस्तुएँ लेने जाते हैं तो उन्हें ऊँचे मूल्य पर बेच देते हैं।
  3. राशन प्रणाली चलाने के लिए सरकार के पास सम्बन्धित वस्तुओं का पर्याप्त स्टॉक नहीं रहता ।
  4. वस्तुओं की पूर्ति होने पर इन दुकानों पर दबाव पड़ता है।
  5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत उपलब्ध वस्तुएँ खुले बाजार में भी उपलब्ध होने पर उपभोक्ता वस्तुओं को खुले बाजार से ही खरीदना अधिक उचित समझते हैं।
  6. यह एक प्रकार से समस्त खुदरा बाजार का सरकारीकरण और इसमें राष्ट्रीयकरण के सभी दोष आ गए हैं।
  7. इस प्रणाली में ‘अफसरशाही’ का बोलबाला रहता है।
  8. इस प्रणाली में भी सरकारी तन्त्र की भ्रष्टता पायी जाती है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारने के लिए सुझाव
सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अधिक उपयोगी बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं-
  1. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वितरित की जाने वाली आवश्यक वस्तुओं की स्पष्ट व्याख्या की जाए।
  2. चुनी हुई वस्तुओं के उत्पादन, प्राप्ति, संग्रहण व वितरण व्यवस्थाओं में उचित समन्वय स्थापित किया जाए।
  3. सम्पूर्ण देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा वितरित जाने वाली वस्तुओं की एक प्रमाणित सूची तैयार की जाए।
  4. वस्तुओं की आपूर्ति को नियमित बनाए रखा जाए।
  5. कुछ वस्तुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में बफर स्टॉक का निर्माण किया जाए।
  6. इस प्रणाली को देश के समस्त भागों में (विशेष रूप से गरीब, पिछड़े व दूरस्थ क्षेत्रों में ) फैलाया जाए।
  7. कार्य-प्रणाली का ठीक प्रकार से परीक्षण व निरीक्षण किया जाए।
  8. वितरण लागत को न्यूनतम करने के लिए सभी सम्भव किए जाएँ ।
  9. उपभोक्ता व विपणन सहकारी समितियों को सुदृढ़ किया जाए श्रम व उनमें समन्वय स्थापित किया जाए।
  10. इस कार्य के लिए स्थान-स्थान पर ऐच्छिक उपभोक्ता बनाए जाएँ।
  11. सतर्कता विभाग द्वारा इन दुकानों का अचानक निरीक्षण किया जाए तांकि वितरण में अनियमितताओं को कम किया जा सके।
• लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – खाद्य सुरक्षा क्या है? इसके विभिन्न आयामों को बताइए | 
उत्तर : खाद्य सुरक्षा अर्थ – खाद्य सुरक्षा से आशय सभी लोगों के लिए भोजन की सदैव उपलब्धता, पहुँच और उसे प्राप्त करने की सामर्थ्य से है।
खाद्य सुरक्षा के विभिन्न आयाम – खाद्य सुरक्षा के विभिन्न आयाम निम्नलिखित हैं-
  1. खाद्य उपलब्धता — खाद्य उपलब्धता से आशय देश में खाद्य उत्पादन, खाद्य आयात और सरकारी खाद्यान्न भण्डारों में संचित पिछले वर्षों के स्टॉक से है।
  2. खाद्य पदार्थों तक पहुँच – इससे आशय यह है कि खाद्य पदार्थ प्रत्येक व्यक्ति को मिलता रहे ।
  3. सामर्थ्य – सामर्थ्य से आशय है कि लोगों के पास अपनी | भोजन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए और पौष्टिक भोजन खरीदने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध हो।
प्रश्न 2 – खाद्य सुरक्षा क्यों आवश्यक है? किसी आपदा के समय खाद्य सुरक्षा कैसे प्रभावित होती है?
उत्तर : खाद्य सुरक्षा की आवश्यकता- – समाज का गरीब वर्ग है किसी भी समय खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त हो सकता है। ऐसा सामान्यतः काम न मिलने पर होता है । परन्तु जब देश राष्ट्रीय आपदाओं से गुजर रहा हो; जैसे- भूकम्प, सूखा, बाढ़, सुनामी, अकाल तथा वायरस जनित रोग जिस प्रकार भारत में वर्ष 2020 कोरोना वायरस के प्रभाव से ग्रस्त व आशंकित लोग खाद्य असुरक्षा से ग्रस्तता का अनुभव करने लगे थे। इस दशा में निर्धनता रेखा से ऊपर के लोग भी खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त हो सकते हैं। अत: उनके लिए खाद्य सुरक्षा आवश्यक है।
आपदा का खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव – प्राकृतिक आपदा (जैसे सूखा ) का खाद्य आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के की लिए सूखे के कारण खाद्यान्न की कुल उपज में गिरावट आती है। इससे प्रभावित क्षेत्र में खाद्य की कमी हो जाती है और खाद्य पदार्थों की की कीमतें बढ़ने लगती हैं जिसके कारण अनेक लोग खाद्य पदार्थ नहीं खरीद पाते। जब यह आपदा अधिक विस्तृत और दीर्घकालिक हो जाती है तो भुखमरी व अकाल की स्थिति बन जाती है।
प्रश्न 3 – भारत में कौन-से लोग असुरक्षा से ग्रस्त हैं ?
उत्तर – यद्यपि भारत में लोगों का एक बड़ा वर्ग खाद्य एवं पोषण की दृष्टि से असुरक्षित है किन्तु इससे सर्वाधिक प्रभावित लोगों में निम्नलिखित शामिल हैं— भूमिहीन जो थोड़ी बहुत अथवा नगण्य भूमि पर निर्भर हैं, पारम्परिक दस्तकार, पारम्परिक सेवाएँ प्रदान करने वाले लोग, अपना छोटा-मोटा काम करने वाले कामगार निराश्रित एवं उपाय भिखारी । शहरी क्षेत्रों में खाद्य की दृष्टि से असुरक्षित वे परिवार हैं जिनके कामकाजी सदस्य प्रायः कम वेतन वाले व्यवसायों और अनियत बाजारों में काम करते हैं। ये कामगार अधिकतर मौसमी कार्यों में लगे रहते हैं और उन्हें कठिनाई से जीवन-यापन योग्य मजदूरी ही मिल संगठन पाती है। इनके अतिरिक्त खाद्य से असुरक्षित लोग हैं – अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जातियों के कुछ वर्ग, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोग, कुपोषण की शिकार महिलाएँ एवं पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चे।
• अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – ‘खाद्य सुरक्षा’ से क्या आशय है?
उत्तर— ‘खाद्य सुरक्षा’ से आशय सभी लोगों के लिए भोजन की सदैव उपलब्धता, पहुँच और उसे प्राप्त करने की सामर्थ्य से है।
प्रश्न 2 – ‘खाद्य उपलब्धता’ से क्या आशय है?
उत्तर— खाद्य उपलब्धता से आशय देश में खाद्य उत्पादन, खाद्य आयात और सरकारी खाद्यान्न भण्डारों में संचित पिछले वर्षों के स्टॉक से है।
प्रश्न 3— खाद्य पदार्थों तक पहुँच’ से क्या आशय है ?
उत्तर— इससे आशय है कि खाद्य पदार्थ प्रत्येक व्यक्ति को मिलता रहे।
प्रश्न 4 – ‘ सामर्थ्य’ से क्या आशय है?
उत्तर— ‘सामर्थ्य’ से आशय है कि लोगों के पास अपनी भोजन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए और पौष्टिक भोजन खरीदने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध हो।
प्रश्न 5. – अकाल के दौरान बड़े पैमाने पर मौतें क्यों होती हैं?
उत्तर — भुखमरी, प्रदूषित जल व भोजन के प्रयोग और रोग प्रतिरोधी क्षमता के कम होने के कारण अकाल के दौरान बड़े पैमाने पर मौतें होती हैं।
प्रश्न 6- भारत का सबसे भयानक अकाल कब और कहाँ पड़ा था?
उत्तर- भारत का सबसे भयानक अकाल 1943 में बंगाल में पड़ा था जिसमें लगभग 30 लाख लोग मारे गए थे।
प्रश्न 7 – कुछ लोगों का कहना है कि बंगाल का अकाल चावल की कमी के कारण हुआ था। क्या आप इससे सहमत हैं?
उत्तर— हाँ, बंगाल का अकाल चावल की कमी के कारण हुआ था। 1942 की तुलना में 1943 में चावल का उत्पादन लगभग 17 लाख टन कम हुआ था। इसके फलस्वरूप बड़ी मात्रा में भुखमरी हुई थी।
प्रश्न 8 – किस वर्ष खाद्य उपलब्धता में भारी कमी हुई?
उत्तर— 1941 व 1943 में खाद्य उपलब्धता में भारी कमी हुई।
प्रश्न 9 – कृषि एक मौसमी क्रिया क्यों है?
उत्तर – कृषि एक मौसमी क्रिया है क्योंकि इसमें वर्ष में केवल कुछ ही महीने काम होता है।
• बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 – खाद्य सुरक्षा के आयाम हैं-
(a) खाद्य उपलब्धता
(b) पहुँच
(c) सामर्थ्य
(d) ये सभी।
उत्तर – (d) ये सभी।
प्रश्न 2 ‘अत्यधिक खाद्य पदार्थों की सदैव पर्याप्त उपलब्धता’। खाद्य सुरक्षा का यह अर्थ किस दशक में था-
(a) 1960
(b) 1970
(c) 1980
(d) 1990.
उत्तर – (b) 1970
प्रश्न 3 – बंगाल का भयानक अकाल पड़ा था-
(a) 1943
(b) 1953
(c) 1963
(d) 1973.
उत्तर – (a) 1943
प्रश्न 4 – खाद्य असुरक्षित हैं-
(a) भूमिहीन
(b) पारम्परिक दस्तकार
(c) निराश्रित एवं भिखारी.
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर – (d) उपर्युक्त सभी।
प्रश्न 5 – कालाहांडी व काशीपुर किस राज्य में स्थित हैं-
(a) झारखण्ड
(b) उत्तराखण्ड
(c) उत्तर प्रदेश
(d) ओडिशा।
उत्तर – (d) ओडिशा।
प्रश्न 6 – भुखमरी का प्रकार है-
(a) मौसमी
(b) दीर्घकालिक
(c) उपर्युक्त (a) व (b) दोनों
(d) दोनों में से कोई नहीं ।
उत्तर – (c) उपर्युक्त (a) व (b) दोनों
प्रश्न 7 – अनाज की उपलब्धता भारत में किस घटक के कारण और भी सुनिश्चित हुई है ?
(a) सार्वजनिक वितरण प्रणाली
(b) बफर स्टॉक
(c) उपर्युक्त (a) व (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर – (d) इनमें से कोई नहीं।

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