UP Board Class 10 Hindi Chapter 1 – पद (काव्य-खण्ड)
UP Board Class 10 Hindi Chapter 1 – पद (काव्य-खण्ड)
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 1 पद (काव्य-खण्ड)
जीवन-परिचय
भक्तिकालीन महाकवि सूरदास का जन्म ‘रुनकता’ नामक ग्राम में 1478 ई. में पण्डित रामदास जी के घर हुआ था। पण्डित • नामक स्थान को सूरदास का जन्म स्थल मानते हैं। सूरदास जन्म से दृष्टिहीन थे या नहीं, इस सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद हैं।
विद्वानों का कहना है कि बाल-मनोवृत्तियों एवं चेष्टाओं का जैसा सूक्ष्म वर्णन सूरदास जी ने किया है, वैसा वर्णन कोई जन्मान्ध व्यक्ति कर ही नहीं सकता, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वे सम्भवतः बाद में दृष्टिहीन हुए होंगे। वे हिन्दी भक्त कवियों में शिरोमणि माने जाते हैं।
सूरदास जी एक बार वल्लभाचार्य जी के दर्शन के लिए मथुरा के गऊघाट आए और उन्हें स्वरचित एक पद गाकर सुनाया, वल्लभाचार्य ने तभी उन्हें अपना शिष्य बना लिया। सूरदास की पद रचना की निपुणता देखकर वल्लभाचार्य ने उन्हें श्रीनाथ मन्दिर का कीर्तन भार सौंप दिया।
वल्लभाचार्य जी के सम्पर्क में आने से पहले सूरदास जी दीनता के पद गाया करते थे तथा बाद में अपने गुरु के कहने पर कृष्णलीला का गान करने लगे। सूरदास जी की मृत्यु 1583 ई. में गोवर्धन के पास ‘पारसौली’ नामक ग्राम में हुई थी।
साहित्यिक परिचय
सूरदास जी में महान काव्य प्रतिभा थी। कृष्णभक्ति को ही आधार मानकर इन्होंने श्रीकृष्ण के सगुण रूप के प्रति सखा भाव की भक्ति का निरूपण किया।
कृतियाँ (रचनाएँ)
सूरदास जी की रचनाएँ निम्नलिखित हैं
1. सूरसागर यह एक गीतिकाव्य है, इसमें कृष्ण की बाल लीलाओं, गोपी-प्रेम, गोपी-विरह, उद्धव-गोपी संवाद का बड़ा सरस वर्णन है।
2. सूरसारावली यह ग्रन्थ ‘सूरसागर’ का सारभाग है। इसमें 1107 पद हैं।
3. साहित्य लहरी इस ग्रन्थ में 118 दृष्टकूट पदों का संग्रह है, इसमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन तथा एक-दो स्थलों पर ‘महाभारत’ की कथा के अंशों की झलक भी दिखाई देती हैं।
भाषा-शैली
सूरदास जी ने अपने पदों में ब्रजभाषा का प्रयोग किया है तथा इनके सभी पद गीतात्मक हैं। इन्होंने मुक्तक और वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
सूरदास जी हिन्दी साहित्य के देदीप्यमान सूर्य हैं। हिन्दी साहित्य में वात्सल्य वर्णन का एकमात्र कवि सूरदास जी को ही माना जाता है, साथ ही इन्होंने विरह-वर्णन का भी अपनी रचनाओं में बड़ा ही मनोरम चित्रण किया है।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. चरन-कमल बंदौं हरि राइ ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे, अंधे को सब कछु दरसाइ ।।
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ ।।
M. Imp [2024, 22, 19, 17, 15, 12]
शब्दार्थ बंदौं-वन्दना करना; हरि राइ – श्रीकृष्ण; पंगु लँगड़ा; लंघै – पार करना; दरसाइ-दिखना; सुनै- सुनना; पुनि- फिर से रंक – गरीब; धराइ-धारण करना; तिहिं-उस।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी किसके चरणों की बार-बार वन्दना करते हैं?
(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा अलंकार है?
अथवा “बार-बार बन्दौ तिहिं पाइ” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित ‘सूरसागर’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य पुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित ‘पद’ शीर्षक से उद्धृत है।
प्रसंग प्रस्तुत पद में सूरदास जी ने अपने आराध्य श्रीकृष्ण के चरणों की वन्दना करते हुए उनकी महिमा का अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या भक्त शिरोमणि सूरदास जी श्रीकृष्ण के चरण कमलों की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! मैं आपके चरणों की, जो कमल के समान कोमल हैं, वन्दना करता हूँ। इनकी महिमा अपरम्पार है, जिनकी कृपा से लँगड़ा व्यक्ति पर्वतों को लाँघ जाता है, अन्धे व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देने लगता है। बहरे को सुनाई देने लगता है, गूँगा बोलने लगता है और गरीब व्यक्ति राजा बनकर अपने सिर पर छत्र-धारण कर लेता है। सूरदास जी कहते हैं कि हे दयालु प्रभु! मैं आपके चरणों की बार-बार वन्दना करता हूँ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने ईश्वर के चरणों की महिमा भाव को व्यक्त किया है।
भाषा साहित्यिक ब्रज शैली मुक्तक गुण प्रसाद
रस भक्ति छन्द गेयात्मक शब्द-शक्ति लक्षणा
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी भगवान श्री कृष्ण के चरणों की बार-बार वन्दना करते हैं
(v) प्रस्तुत पद्यांश में पुनरुक्तिप्रकाश अनुप्रास व रूपक अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘बार- बार’ में एक शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
अनुप्रास अलंकार ‘सूरदास स्वामी’ में ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
रूपक अलंकार ‘चरण-कमल’ में उपमेय (चरण) और उपमान (कमल) का भेद रहित आरोप होने के कारण रूपक अलंकार है।
2. अबगत गति कछु कहत न आवै ।
ज्यौं गूँगै मीठे फल कौ रस अन्तरगत ही भावै।।
परम स्वाद सबही सु निरन्तर, अमित तोष उपजावै ।
मन-बानी को अगम अगोचर, सो जानै जो पावै ।।
रूप-रेख – गुन-जाति- जुगति-बिनु निरालम्ब कित धावै ।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातैं सूर सगुन-पद गावै।।
M. Imp [2024, 20, 15, 14, 12]
शब्दार्थ अबिगत–अज्ञात और निराकार, दशा; अन्तरगत – हृदय में; परम स्वाद – अलौकिक आनन्द; अमित – अत्यधिक; अगम – जहाँ पहुँचना कठिन हो; धावै -दौड़े; तातैं – इसलिए; सगु – सगुण ब्रह्म ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) निर्गुण ब्रह्म को अगम व अगोचर क्यों कहा गया है?
(iv) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(v) ‘ज्यों गूँगे मीठे फल’ में कौन-सा अलंकार है?
(vi) ‘अगम अगोचर’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास ने श्रीकृष्ण के कमल-रूपी सगुण रूप के प्रति अपनी भक्ति का निरूपण किया है।
(ii) व्याख्या सूरदास जी कहते हैं कि निर्गुण अथवा निराकार ब्रह्म की स्थिति का वर्णन नहीं किया जा सकता। वह अवर्णनीय है, निर्गुण ब्रह्म की उपासना के आनन्द का वर्णन कोई व्यक्ति नहीं कर सकता। जिस प्रकार गूँगा व्यक्ति मीठे फल का स्वाद अपने हृदय में ही अनुभव करता है, वह उसका शाब्दिक वर्णन नहीं कर सकता। उसी प्रकार निर्गुण ब्रह्म की भक्ति के आनन्द का केवल अनुभव किया जा सकता है, उसे मौखिक रूप से (बोलकर) प्रकट नहीं किया जा सकता। मन और वाणी द्वारा उस ईश्वर तक पहुँचा नहीं जा सकता, जो इन्द्रियों से परे है, इसलिए उसे अगम एवं अगोचर कहा गया है। उसे जो प्राप्त कर लेता है, वही उसे जानता है। उस निर्गुण ईश्वर का न कोई रूप है न आकृति, न ही हमें उसके गुणों का ज्ञान है, जिससे हम उसे प्राप्त कर सकें। बिना किसी आधार के न जाने उसे कैसे पाया जा सकता है? इसी कारण सभी प्रकार से विचार करके ही सूरदास जी ने सगुण श्रीकृष्ण की लीला के पद का गान अधिक उचित समझा है।
(iii) निर्गुण ब्रह्म तक मन व वाणी द्वारा नहीं पहुँचा जा सकता, इसलिए इसे अगम वं अगोचर कहा गया है।
(iv) काव्य सौन्दर्य
कवि ने निर्गुण ब्रह्म की अपेक्षा सगुण ब्रह्म की उपासना को सरल बताया है।
भाषा साहित्यिक ब्रज शैली मुक्तक गुण प्रसाद
रस भक्ति और शान्त छन्द गीतात्मक शब्द-शक्ति लक्षणा
अलंकार प्रस्तुत पद्यांश में अनुप्रास और दृष्टान्त अलंकार हैं।
अनुप्रास अलंकार अबिगत-गति से ‘ग’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है ।
दृष्टान्त अलंकार उदाहरण के माध्यम से समझने के कारण दृष्टान्त अलंकार है।
(v) ‘ज्यौं गूँगै मीठे फल’ में दृष्टान्त अलंकार है ।
(vi) जिस तक इन्द्रियों के माध्यम से पहुँचा नहीं जा सकता तथा जिसको आँखों द्वारा देखा नहीं जा सकता अर्थात् जो इन्द्रियों से परे है, उसे ‘अगम- अगोचर’ कहते हैं।
3. किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।
मनिमय कनक नन्द कै आँगन, बिम्ब पकरिबै धावत ।।
कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौ, कर सौंपकरन चाहत।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत ।।
कनक- भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति ।
करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति । ।
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नन्द बुलावति ।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति । ।
[2023]
शब्दार्थ मनिमय-मणि से युक्त; बिम्ब – परछाईं; पकरिबै- पकड़ना; किलकि-खिलखिलाना; अवगाहत – दिखलाना; तर – नीचे ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य लिखिए ।
(iv) उपर्युक्त पद्यांश में कवि ने किसकी बाल क्रीडाओं का वर्णन किया है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ने मणियुक्त आँगन में घुटनों के बल चलते हुए बालक श्रीकृष्ण की शोभा का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि सूरदास जी श्रीकृष्ण की बाल-मनोवृत्तियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि बालक कृष्ण किलकारी मारते हुए घुटनों के बल चल रहे हैं। नन्द द्वारा बनाए मणियों से युक्त आँगन में श्रीकृष्ण अपनी परछाईं देख उसे पकड़ने के लिए दौड़ने लगते हैं। कभी तो अपनी परछाईं देखकर हँसने लगते हैं और कभी उसे पकड़ना चाहते हैं, जब श्रीकृष्ण किलकारी मारते हुए हँसते हैं, तो उनके आगे के दो दाँत बार-बार दिखाई देने लगते हैं, जो अत्यन्त सुशोभित लग रहे हैं।
श्रीकृष्ण के हाथ-पैरों की छाया उस पृथ्वी रूपी सोने के फर्श पर ऐसी प्रतीत हो रही हैं, मानो प्रत्येक मणि में उनके बैठने के लिए पृथ्वी ने कमल का आसन सजा दिया हो अथवा प्रत्येक मणि पर उनके कमल जैसे हाथ-पैरों का प्रतिबिम्ब पड़ने से ऐसा लगता है कि पृथ्वी पर कमल के फूलों का आसन बिछ रहा हो।
श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को देखकर माता यशोदा जी बहुत आनन्दित होती हैं और बाबा नन्द को बार-बार वहाँ बुलाती हैं। उसके पश्चात् माता यशोदा सूरदास के प्रभु बालक श्रीकृष्ण को अपने आँचल से ढककर दूध पिलाने लगती हैं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने श्रीकृष्ण की बाल क्रीड़ाओं का अत्यन्त मनोहारी चित्रण किया है।
भाषा ब्रज शैली मुक्तक
गुण प्रसाद और माधुर्य रस वात्सल्य
छन्द गीतात्मक शब्द-शक्ति लक्षणा
अलंकार किलकल कान्ह में ‘क’ वर्ण की पुनरावत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।
(iv) उपर्युक्त पद्यांश में कवि ने श्रीकृष्ण की बाल-क्रीड़ाओं का वर्णन किया है।
4. मैं अपनी सब गाइ चरैहौं ।
प्रात होत बल कै संग जैहौं, तेरे कहैं न रैहौं । ।
ग्वाल बाल गाइनि के भीतर, नैंकहुँ डर नहिं लागत।
आजुन सोव नन्द-दुहाई, रैनि रहौंग जागत ।।
और ग्वाल सब गाइ चरैहैं, मैं घर बैठो रैहौं ?
सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब, प्रात जान मैं दैहौं । ।
शब्दार्थ चरैहौं-चराना; बल-बलराम; नैंकहुँ – तनिक भी ; दुहाई – शपथ; दैहौं—दूँगी।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ बताइए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ने बालहठ का चित्रण किया है।
(ii) व्याख्या बालक कृष्ण अपनी माता यशोदा से हठ करते हुए कहते हैं कि हे माता ! मैं भी अपनी गायों को चराने वन में जाऊँगा । प्रातःकाल होते ही मैं भैया बलराम के साथ वन में जाऊँगा और तुम्हारे कहने पर भी घर न रुकूँगा, क्योंकि वन में ग्वाल सखाओं और गायों के बीच • रहते हुए मुझे तनिक भी डर नहीं लगता। आज मैं नन्द बाबा की कसम खाकर कहता हूँ कि मैं रातभर नहीं सोऊँगा, जागता रहूँगा । हे माता! अब ऐसा नहीं होगा कि सब ग्वाल बाल गाय चराने जाएँ और मैं घर में बैठा रहूँ। यह सुनकर माता यशोदा ने कृष्ण को विश्वास दिलाया, हे पुत्र ! अब तुम सो जाओ, सुबह होने पर मैं तुम्हें गायें चराने के लिए अवश्य भेज दूँगी।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने श्रीकृष्ण के बालहठ का चित्रण किया है।
भाषा ब्रज शैली मुक्तक
गुण माधुर्य रस वात्सल्य
छन्द गेय पद शब्द शक्ति अभिधा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘रैनि रहँगो’, ‘ग्वाल बाल’ और ‘सूर ‘स्याम’
में क्रमशः ‘र’, ‘ल’ और ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
5. मैया हौं न चरैहौं गाइ ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसो, मेरे पाइँ पिराइ |
जौं न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौंहँ दिवा |
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ ।
मैं पठवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ ।
सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ । ।
[2024]
शब्दार्थ हौं – मैं; सिंगरे – सभी ; पिराइ दुखते हैं; पत्याहि – विश्वास हो; सौंहँ— सौगन्ध; पठवति-भेजती हूँ; लरिका – पुत्र, बेटा; ताहि-उसे; रिंगाइ- घुमाकर ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(iv) बालकृष्ण गाय चराने क्यों नहीं जाना चाहते हैं?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में वन में ग्वालों द्वारा परेशान किए जाने के कारण श्रीकृष्ण माता यशोदा से उनकी शिकायत करते हैं।
(ii) व्याख्या श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं कि हे माता! अब मैं गाय चराने नहीं जाऊँगा। सभी ग्वाले मुझसे ही अपनी गायों को घेरने के लिए कहते हैं, इधर से उधर दौड़ते-दौड़ते मेरे पैरों में दर्द होने लगता है।
हे माता! यदि आपको मेरी बात पर विश्वास न हो, तो अपनी सौगन्ध दिलाकर बलराम भैया से पूछ लो । यह सुनकर माता यशोदा क्रोधित होकर ग्वालों को गाली देने लगती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा कहती हैं कि मैं अपने पुत्र को वन में इसलिए भेजती हूँ कि उसका मन बहल जाए। मेरा कृष्ण अभी बहुत छोटा है, ये ग्वाले उसे इधर-उधर दौड़ाकर मार डालेंगे।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि सूरदास ने श्रीकृष्ण व माता यशोदा का स्थितिवश व्यवहार का यथार्थपरक चित्रण किया है।
भाषा ब्रज शैली मुक्तक
गुण माधुर्य रस वात्सल्य
छन्द गेय पद शब्द – शक्ति अभिधा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘मोसो मेरे’, ‘पाइँ पिराई’, ‘ग्वालनि गारी’
और ‘सूर स्याम’ में क्रमशः ‘म’, ‘प’ तथा ‘इ’, ‘ग’ और ‘स’
वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) बालकृष्ण गाय चराने इसलिए नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि सभी ग्वाले अपनी गायें कृष्ण से चरवाते हैं, जिसके कारण गायों को घेरने के कारण उनके पीछे दौड़ते-दौड़ते कृष्ण के पैरों में दर्द होने लगता है।
6. सखी री, मुरली लीजै चोरि |
जिनि गुपाल कीन्हे अपनैं बस, प्रीति सबनि की तोरि ।।
छिन इक घर-भीतर, निसि बासर, धरत न कबहूँ छोरि ।
कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि, कटि कबहूँ खोंसत जोरि । ।
ना जानौं कछु मेलि मोहिनी, राखे अँग-अँग भोरि ।
सूरदास प्रभु को मन सजनी, बँध्यौ राग की डोर । ।
[2005]
शब्दार्थ तोरि – तोड़कर; छिन इक क्षण भर; निसिं-बासर – रात-दिन; छोरि-छोड़ते हैं; अधरनि – होंठ; मोहिनी – जादू, भोरि – भुलावा, बँध्यौ – बाँधना।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य लिखिए।
(iv) गोपियाँ कृष्ण की मुरली को चोरी करने की बात क्यों करती हैं?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रीकृष्ण का मुरली के प्रति प्रेम तथा उससे ईर्ष्या करती गोपियों की मनोदशा का चित्रण किया गया है।
(ii) व्याख्या गोपियाँ एक-दूसरे से कहती हैं कि हे सखी! कृष्ण की मुरली को हमें चुरा लेना चाहिए। इस मुरली ने श्रीकृष्ण को अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण ने भी मुरली के वशीभूत होकर हम सभी गोपियों को भुला दिया है। वे घर के भीतर हों या बाहर, रात-दिन कभी एक पल के लिए भी मुरली को नहीं छोड़ते। कभी हाथ में रखते हैं, तो कभी होठों पर और कभी कमर से बाँध लेते हैं, हमारी समझ में यह नहीं आ रहा कि मुरली ने कौन-सा मोहिनी मन्त्र श्रीकृष्ण पर चला दिया है, जिससे श्रीकृष्ण पूरी तरह से उसके वश में हो गए हैं। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ कह रही हैं कि हे सजनी ! इस वंशी ने श्रीकृष्ण का मन प्रेम की डोरी से बाँधा हुआ है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा ब्रज शैली मुक्तक और गीतात्मक
गुण माधुर्य रस श्रृंगार
छन्द गेय पद शब्द-शक्ति लक्षणा
अलंकार
‘मुरली लीजै, ‘घर-भीतर’, ‘कबहुँ कर’ में ‘ल’, ‘र’, ‘क’ की पुनरावृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) गोपियाँ श्रीकृष्ण की मुरली को चोरी करने की बात इसलिए करती हैं, क्योंकि गोपियों के अनुसार मुरली के कारण श्रीकृष्ण गोपियों की ओर ध्यान नहीं देते। वे सदैव मुरली की ओर ही आकर्षित होकर उसके वश में रहते हैं। मुरली के प्रेम में श्रीकृष्ण ने सभी गोपियों को भुला दिया है।
7. ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं ।
बृन्दाबन गोकुल बन उपवन, सवन कुंज की छाँही।
प्रात समयं मात जसुमति अरु नन्द देखि सुख पावत।
माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत ।।
गोपी ग्वाल बाल संग खेलत, सब दिन हँसत सिरात ।
सूरदास धनि धनि ब्रजवासी, जिनसौं हित जदुनाथ ।
M. Imp [2023, 22, 20, 17, 13, 11, 10]
शब्दार्थ मोहिं—मुझे; बिसरत – विस्मृत; सघन – गहन; कुंज – छोटे वृक्षों का समूह; सिरात—बीत जाना; जिनसौं – जिन पर जदुनाथ – श्रीकृष्ण ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
अथवा प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा अलंकार है?
(iv) प्रस्तुत पद्यांश का मूल भाव बताइए ।
(v) प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास किसकी सराहना करते हैं और क्यों?
(vi) उपर्युक्त पंक्तियों में किस समय का वर्णन है ?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में उद्धव ने मथुरा पहुँचकर श्रीकृष्ण को वहाँ की सारी स्थिति बताई, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण भाव-विभोर हो गए ।
(ii) व्याख्या श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे उद्धव ! मैं ब्रज को भूल नहीं पाता हूँ। मैं सबको भुलाने का बहुत प्रयत्न करता हूँ, पर ऐसा करना मेरे लिए सम्भव नहीं हो पाता। वृन्दावन, गोकुल, वन और उपवन सभी मुझे बहुत याद आते हैं। वहाँ के कुंजों की घनी छाँव भी मुझसे भुलाए नहीं भूलती। प्रात:काल माता यशोदा और नन्द बाबा मुझे देखकर हर्षित होते तथा अत्यन्त सुख का अनुभव करते थे। माता यशोदा मक्खन, रोटी और दही मुझे बड़े प्रेम से खिलाती थीं। गोपियाँ और ग्वाल-बालों के साथ अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ करते थे और सारा दिन हँसते-खेलते हुए व्यतीत होता था। ये सभी बातें मुझे बहुत याद आती हैं।
सूरदास जी ब्रजवासियों की सराहना करते हुए कहते हैं कि ब्रजवासी धन्य हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण स्वयं उनके हित की चिन्ता करते हैं और इनका प्रतिक्षण ध्यान करते हैं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में श्रीकृष्ण को ब्रज की स्मृतियाँ व्याकुल कर देती हैं।
भाषा ब्रज गुण माधुर्य
रस श्रृंगार छन्द गेयात्मक
शब्द-शक्ति अभिधा और व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘ब्रज बिसरत’, ‘गोपी ग्वाल’ और ‘अति हित’ में क्रमशः ‘ब’, ‘ग’ और ‘त’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘धनि धनि’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ने श्रीकृष्ण की मनोदशा का चित्रण किया है। उद्धव ने मथुरा पहुँचकर श्रीकृष्ण को वहाँ की सारी स्थिति बताई, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण भाव-विभोर हो गए। वे साधारण मनुष्य की भाँति अपने प्रियजनों को याद कर द्रवित हो रहे थे तथा ब्रज की स्मृतियाँ उन्हें व्याकुल कर रही थीं।
(v) प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ब्रजवासियों की सराहना करते हैं क्योंकि श्री कृष्ण स्वयं उनके हित की चिन्ता करते हैं और उनका प्रतिक्षण ध्यान करते हैं, उन्हें श्रीकृष्ण जैसा हितैषी और दूसरा नहीं मिल सकता।
(vi) उपर्युक्त पंक्तियों में उस समय का वर्णन है, जब उद्धव गोपियों को निर्गुण ब्रह्म की उपासना कराने में विफल हो जाते हैं और वापस मथुरा लौटकर वहाँ की सारी स्थिति बताते हैं। वे श्रीकृष्ण को माता यशोदा व गोपियों का सन्देश देते हैं।
8. ऊधौ मन न भए दस बीस।
एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग को अवराधै ईस । ।
इन्द्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस ।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस । ।
तुम तौ सखा स्याम सुन्दर के, सकल जोग के ईस ।
सूर हमारैं नँद – नन्दन बिनु, और नहीं जगदीस । ।
M. Imp [2023, 18, 17, 13, 11]
शब्दार्थ हुतौ-हुआ करता था; गयौ – चला गया; सिथिल – कमजोर; देही – शरीर; आसा – आशा; लागि लगी रहना; जीवहिं – जीवन; कोटि-करोड़; बरीस – वर्ष ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) ‘इन्द्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।’ इस पंक्ति में प्रयुक्त अलंकार का नाम लिखिए।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश ‘भ्रमरगीत’ का अंश है। श्रीकृष्ण मथुरा जाने पर उद्धव के द्वारा गोपियों के पास ज्ञान और योग का सन्देश ब्रज में भेजते हैं।
(ii) व्याख्या गोपियाँ, उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव ! हमारे दस-बीस मन नहीं हैं। हमारे पास तो एक ही मन था, वह भी श्रीकृष्ण के साथ “चला गया। अब हम किस मन से तुम्हारे द्वारा बताए गए निर्गुण ब्रह्म की आराधना करें? अर्थात् जब मन ही नहीं है तो किस प्रकार हम तुम्हारे द्वारा बताए गए धर्म का पालन करें। श्रीकृष्ण के बिना हमारी सारी इन्द्रियाँ उसी प्रकार शिथिल (कमजोर) हो गई हैं, जिस प्रकार शरीर के बिना सिर बेकार हो जाता है अर्थात् शक्तिहीन और निर्बल हो गई हैं। हमें हमेशा उनके आने की आशा बनी रहती है। इसी कारण हमारे शरीर में श्वास चल रही है। इसी आशा में हम करोड़ों वर्षों तक जीवित रह सकती हैं।
गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव ! आप तो श्रीकृष्ण के मित्र हैं और सभी प्रकार के योग विद्या के स्वामी हैं, सम्पूर्ण योग विद्या तथा मिलन के उपायों को जानने वाले हैं। आप ही श्रीकृष्ण से हमारा मिलन करा सकते हैं। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों ने स्पष्ट रूप से उद्धव को बता दिया कि नन्द जी के पुत्र श्रीकृष्ण के बिना उनका कोई और आराध्य नहीं है। उनके अतिरिक्त वे और किसी की आराधना नहीं कर सकतीं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने श्रीकृष्ण के विरह में विचलित गोपियों की शारीरिक व मानसिक स्थिति का चित्रण किया है।
भाषा ब्रज शैली मुक्तक गुण माधुर्य
रस श्रृंगार (वियोग ) छन्द गेय पद शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार अनुप्रास, उपमा तथा श्लेष अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘दस बीस’ सो गयो स्याम संग में ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।
श्लेष अलंकार ‘जोग’ का अर्थ योग्य और जोड़े अतः यहाँ श्लेष अलंकार है एक ही शब्द के दो अर्थ जहाँ होते है। वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
(iv) इन्द्री सिथिल भई. केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस’ पंक्तियों में उपमा व श्लेष अलंकार है ।
9. ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने।
स्याम तुमहिं ह्याँ कौं नहिं पठयौ, तुम हौ बीच भुलाने । ।
ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौ, बात कहत न लजाने ।
बड़े लोग न विवेक तुम्हारे, ऐसे भए अयाने ।।
हमसौं कही लई हम सहि कै, जिय गुनि लेहु सयाने ।
कहँ अबला कहँ दसा दिगम्बर, मष्ट करो पहिचाने।।
साँच कहौं तुमकौं अपनी सौं, बूझतिं बात निदाने ।
सूर स्याम जब तुमहिं पठायौ, तब नैंकहुँ मुसकाने । ।
[2024]
शब्दार्थ ह्याँ-यहाँ; पठयौ – भेजा है; अयाने – अज्ञानी; सहि – सहना; दिगम्बर- वस्त्रहीन; मष्ट करौ-चुप करो; निदाने – अन्त में; नैंकहुँ – तनिक |
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) पद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए |
(iv) ‘ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौं, बात कहत न लजाने ।’ से क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट कीजिए |
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में उद्धव तथा गोपियों के बीच हुए तर्क-वितर्क का वर्णन किया गया है।
(ii) व्याख्या गोपियाँ, उद्धव से कहती हैं कि तुम यहाँ से वापस चले जाओ। हम तुम्हें अच्छी प्रकार से जानती हैं। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तुम्हें यहाँ श्रीकृष्ण ने नहीं भेजा है। तुम स्वयं रास्ता भटककर यहाँ आ गए हो। तुम ब्रज की नारियों (गोपियाँ) से योग की बात कह रहे हो, तुम्हें लज्जा नहीं आती। तुम भले ही बुद्धिमान और ज्ञानी होंगे, परन्तु हमें ऐसा लगता है कि तुममें विवेक नहीं है, नहीं तो तुम ऐसी अज्ञानतापूर्ण बातें हमसे क्यों – करते ? ‘तुम ‘ये मन में विचार कर लो, जो हमसे कह दिया ब्रज में किसी और से ऐसी बात न कहना। हमने तो सहन कर लिया, कोई दूसरी गोपी सहन नहीं करेगी। कहाँ योग की दिगम्बर (वस्त्रहीन ) अवस्था और कहाँ हम अबला नारियाँ । अतः अब तुम चुप हो जाओ और जो भी कहना सोच-समझकर कहना । अब तुम सच सच बतलाओ तुम्हें तुम्हारी कसम है अन्त में एक बात पूछनी है कि जब श्रीकृष्ण ने तुम्हें यहाँ भेजा था, वह क्या थोड़ा-सा मुस्कुराए थे। वे अवश्य मुस्कुराए होंगे। तभी तो उन्होंने तुम्हारे साथ उपहास करने के लिए तुम्हें यहाँ भेजा है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा ब्रज शैली मुक्तक
गुण माधुर्य रस शृंगार का वियोग रूप
छन्द गेय पद शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार अनुप्रास अलंकार ‘स्याम तुमहिं’, ‘बात कहत’, ‘बूझति बात’ और ‘नैकहुँ मुसकाने’ में क्रमशः ‘स’, ‘त’, ‘ब’ और ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
(iv) दी गई पंक्ति से तात्पर्य यह है कि जब उद्धव ने गोपियों से योग की बात की, तो ब्रज की नारियों अर्थात् गोपियों ने उद्धव से कहा कि तुम भले ही बुद्धिमान हो, परन्तु तुममें विवेक नहीं है, जो हमसे योग की दिगम्बर (वस्त्रहीन) अवस्था की बात कह रहे हो, तुम्हें लज्जा नहीं आती।
10. निरगुन कौन देस कौ बासी ?
मधुकर कहि समुझाइ सौंह दे, बूझतिं साँच न हाँसी । ।
को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी?
कैसो बरन, भेष है कैसो, किहिं रस मैं अभिलाषी ?
पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जो रे करैगौ गाँसी।
सुनत मौन हवै रह्यौ बाबरौ, सूर सबै मति नासी।।
M. Imp [2023, 19, 17, 14, 12 ]
शब्दार्थ बासी -निवासी; मधुकर – भँवरा समुझाइ – समझाओ; को है-कौन है; किहिं-किसके; पावैगौ- पाओगे; पुनि-फल; गाँसी – छल-कपट ; नासी – समाप्त हो गया।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास ने गोपियों मण्डन किया है? माध्यम से किसका खण्डन व
(iv) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(v) ‘मधुकर’ शब्द का क्या अर्थ है?
(vi) निर्गुण ब्रह्म के वर्णन में क्या कठिनाई व्यक्त की गई है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास ने गोपियों के माध्यम से निर्गुण ब्रह्म की उपासना का खण्डन तथा सगुण कृष्ण की भक्ति का मण्डन किया है।
(ii) व्याख्या गोपियाँ भ्रमर की अन्योक्ति के माध्यम से उद्धव को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि हे उद्धव ! ये निर्गुण ब्रह्म किस देश के निवासी हैं ? हम तुम्हें सौगन्ध देकर पूछती हैं कि तुम हमें सच-सच बताओ, हम कोई हँसी-मजाक नहीं कर रही हैं। तुम यह बताओ कौन उसका पिता है, कौन माता है, कौन स्त्री है और कौन उसकी दासी है? उसका रंग-रूप कैसा है, उसकी वेशभूषा कैसी है? तथा वह किस रस की इच्छा रखने वाला है?
गोपियाँ, उद्धव को चेतावनी देते हुए कहती हैं कि हमें सभी बातों का ठीक-ठीक उत्तर देना, यदि तुम हमसे कपट करोगे, तो उसका परिणाम तुम्हें अवश्य भुगतना पड़ेगा। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के इस प्रकार व्यंग्यात्मक तर्कपूर्ण प्रश्नों को सुनकर उद्धव स्तब्ध हो गए। वह उनके प्रश्नों का कुछ उत्तर न दे सके। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो उनका सारा ज्ञान समाप्त हो गया हो ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास ने गोपियों के माध्यम निर्गुण ब्रह्म की उपासना का खण्डन तथा सगुण कृष्ण की भक्ति का मण्डन किया है।
(iv) काव्य सौन्दर्य
भाषा ब्रज शैली मुक्तक
गुण माधुर्य रस वियोग श्रृंगार एवं हास्य
छन्द गेय पद शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘समुझाई सौंह’, ‘कैसो किहिं’, ‘पावैगो पुनि’ और ‘सुनत मौन’ में क्रमश: ‘स’, ‘क’, ‘प’ और ‘न’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
अन्योक्ति अलंकार मधुकर अर्थात् भ्रमर के रूप में उद्धव की तुलना की गई है, जिस कारण अन्योक्ति अलंकार है ।
(v) ‘मधुकर’ शब्द का अर्थ ‘भ्रमर’ अर्थात् ‘भौंरा’ होता है, परन्तु यहाँ ‘मधुकर’ द्वारा ‘उद्धव’ को सम्बोधित किया गया है।
(vi) गोपियों के माध्यम से सूरदास जी ने निर्गुण ब्रह्म के वर्णन में यह कठिनाई व्यक्त की है कि निर्गुण ब्रह्म का देश कहाँ है? उसके माता-पिता कौन हैं? कौन उसकी स्त्री – दासी है? उसका रंग-रूप, वेशभूषा कैसी है तथा उसकी पसन्द-नापसन्द कौन-सी है ? कहने का तात्पर्य यह है कि निर्गुण ब्रह्म का वर्णन करना सम्भव नहीं है।
11. सँदेसौ देवकी सौं कहियौ ।
हौं तो धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ । ।
जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै ।
प्रात होत मेरे लाल लड़ैतैं, माखन रोटी भावै । ।
तेल उबटनौ अरु तातो जल, ताहि देखि भजि जाते ।
जोइ-जोइ माँगत सोइ सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते । ।
सूर पथिक सुन मोहिं रैनि-दिन, बढ्यौ रहत उर सोच ।
मेरौ अलक लड़ैतो मोहन है करत सँकोच ।।
शब्दार्थ कहियौ – कहना; धाइ – धाय ( माँ के समान पालने वाली स्त्री); मया–माता; टेव–आदत; तऊ – फिर भी; भजि–भाग जाना; बढ्यौ—बढ़ना; अलक लड़ैतो-प्यारा-दुलारा।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(iv) श्रीकृष्ण क्या देखकर भाग जाते हैं?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ने श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद माता यशोदा के स्नेह तथा उनकी पीड़ा का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या यशोदा जी देवकी को एक पथिक के हाथ सन्देश भिजवाते हुए कहती हैं कि मैं तो तुम्हारे पुत्र की धाय माँ (माँ समान पालन-पोषण करने वाली सेविका) हूँ, पर वह मुझे मैया कहता रहा है। इसलिए मेरा उसके प्रति वात्सल्य भाव स्वाभाविक है । यद्यपि आप तो उसकी सारी आदतें जानती होंगी, फिर भी मेरा मन आपसे कुछ कहने को उत्कण्ठित हो रहा है।
मेरे लाडले कृष्ण को सुबह होते ही माखन – रोटी खाने की आदत है। उबटन, तेल और गर्म पानी को देखते ही श्रीकृष्ण भाग जाते हैं। उन्हें यह सब पसन्द नहीं है। इस समय वे जो माँगा करते थे, मैं उन्हें वही दिया करती थी। उन्हें धीरे-धीरे स्नान करने की आदत है। सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा को रात-दिन यही चिन्ता सताती रहती है कि उनका लाडला कृष्ण मथुरा में कुछ माँगने में संकोच तो नहीं करता ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा ब्रज शैली मुक्तक गुण माधुर्य
रस वात्सल्य छन्द गेय-पद शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘सँदेसौ देवकी’, ‘मोहिं कहि’, ‘लाल लड़ैतैं’ और ‘रैनि दिन’ में क्रमश: ‘द’, ‘ह’, ‘ल’ और ‘न’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘ जोइ – जोइ’, ‘सोइ सोइ’ और ‘क्रम-क्रम’ में एक ही शब्द की पुनरावत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
(iv) माता यशोदा एक पथिक के माध्यम से माता देवकी को सन्देश भेजते हुए कहती हैं कि श्रीकृष्ण उबटन, तेल और गर्म पानी को देखते ही भाग जाते हैं।
