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UP Board Class 10 Hindi Chapter 2 – धनुष-भंग, वन-पथ पर (काव्य-खण्ड)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 2 – धनुष-भंग, वन-पथ पर (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 2 धनुष-भंग, वन-पथ पर (काव्य-खण्ड)

जीवन-परिचय
लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास भारत के ही नहीं, सम्पूर्ण मानवता तथा संसार के कवि हैं। उनके जन्म से सम्बन्धित प्रामाणिक सामग्री अभी तक प्राप्त नहीं हो सकी है। इनका जन्म सन् 1532 ई. में बाँदा जिले के ‘राजापुर’ गाँव में माना जाता है। कुछ विद्वान् इनका जन्म स्थल एटा जिले के ‘सोरो’ नामक स्थान को मानते हैं। इनके जन्म के सम्बन्ध में एक दोहा प्रचलित है
“पन्द्रह सौ चौवन बिसै, कालिन्दी के तीर ।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी धर्यो सरीर ॥”
तुलसीदास जी सरयूपारीण ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे एवं माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि अभुक्तमूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण इनके माता-पिता ने इन्हें बाल्यकाल में ही त्याग दिया था। इनका पालन-पोषण प्रसिद्ध सन्त नरहरिदास ने किया और इन्हें ज्ञान एवं भक्ति की शिक्षा प्रदान की। इनका विवाह पण्डित दीनबन्धु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। इन्हें अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम था और उनके सौन्दर्य रूप के प्रति वे अत्यन्त आसक्त थे।
पत्नी की इस फटकार ने तुलसीदास जी को सांसारिक मोह-माया से विरक्त कर दिया और उनके हृदय में श्रीराम के प्रति भक्ति भाव जाग्रत हो उठा। तुलसीदास जी ने अनेक तीर्थों का भ्रमण किया और ये राम के अनन्य भक्त बन गए। इनकी भक्ति दास्य-भाव की थी। 1574 ई. में इन्होंने अपने सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ की रचना की तथा मानव जीवन के सभी उच्चादर्शों का समावेश करके इन्होंने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बना दिया। सन् 1623 ई. में काशी में इनका निधन हो गया।
साहित्यिक परिचय
तुलसीदास जी महान लोकनायक और श्रीराम के महान भक्त थे। इनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ सम्पूर्ण विश्व साहित्य के अद्भुत ग्रन्थों में से एक है। यह एक अद्वितीय ग्रन्थ है। इसमें तुलसीदास जी ने सगुण-निर्गुण, ज्ञान-भक्ति, शैव-वैष्णव और विभिन्न सम्प्रदायों में समन्वय के उद्देश्य से अत्यन्त प्रभावपूर्ण भावों की अभिव्यक्ति की है।
तुलसीदास जी ने अपने काव्य में दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया, पद आदि काव्य शैलियों में काव्य रचना की है। तुलसीदास जी ने सभी अलंकारों का प्रयोग करके अपनी रचनाओं को अत्यन्त प्रभावोत्पादक बना दिया है।
कृतियाँ (रचनाएँ)
महाकवि तुलसीदास जी ने बारह ग्रन्थों की रचना की, जो निम्नलिखित हैं
  1. रामलला नहछू गोस्वामी तुलसीदास ने लोकगीत की ‘सोहर’ शैली में इस ग्रन्थ की रचना की थी। यह इनकी प्रारम्भिक रचना है।
  2. वैराग्य – सन्दीपनी इसके तीन भाग हैं, पहले भाग में छ: छन्दों में ‘मंगलाचरण’ है, दूसरे भाग में ‘सन्त- महिमा वर्णन ‘ एवं तीसरे भाग में ‘शान्ति-भाव वर्णन’ है।
  3. रामाज्ञा प्रश्न इस ग्रन्थ में सात सर्गों हैं, जिसमें शुभ-अशुभ शकुनों का वर्णन है।
  4. जानकी- मंगल इसमें कवि ने श्रीराम और जानकी के मंगलमय विवाह उत्सव का मधुर वर्णन किया है।
  5. रामचरितमानस इस विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के सम्पूर्ण जीवन के चरित्र का वर्णन किया गया है।
  6. पार्वती- मंगल इसमें ‘शिव-पार्वती के विवाह’ का वर्णन किया गया है। गेय पद होने के कारण इसमें संगीतात्मकता का गुण भी विद्यमान है।
  7. गीतावली इसमें 230 पद हैं, जिनमें श्रीराम के चरित्र का वर्णन है। ये पद सात काण्डों में विभाजित हैं।
  8. विनयपत्रिका इसका विषय भगवान श्रीराम को कलियुग के विरुद्ध प्रार्थना-पत्र देना है। इसमें तुलसी भक्त और दार्शनिक कवि के रूप में प्रतीत होते हैं।
  9. गीतावली इसमें 61 पदों में श्रीकृष्ण के मनोहारी रूप का वर्णन है।
  10. बरवै-रामायण यह तुलसीदास की स्फुट रचना है, जिसमें श्रीराम कथा संक्षेप में है। बरवै छन्दों में वर्णित इस लघु काव्य में अवधि भाषा का प्रयोग किया गया है।
  11. दोहावली इस संग्रह ग्रन्थ में दोहा शैली में नीति, भक्ति और राम महिमा का वर्णन है।
  12. कवितावली इस कृति में कवित्त और सवैया शैली में रामकथा का वर्णन किया गया है। यह ब्रजभाषा में रचित श्रेष्ठ मुक्तक काव्य है।
भाषा-शैली
तुलसीदास जी ने अवधी तथा ब्रज दोनों भाषाओं में अपनी काव्यगत रचनाएँ लिखीं। रामचरितमानस अवधी भाषा में है, जबकि कवितावली, गीतावली, विनयपत्रिका आदि ब्रजभाषा में है। रामचरितमानस में प्रबन्ध शैली, विनयपत्रिका में मुक्तक शैली और दोहावली में साखी शैली का प्रयोग किया गया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, इन्हें समाज का पथ-प्रदर्शक कवि कहा जाता है। मानव प्रकृति के जितने रूपों का सजीव वर्णन तुलसीदास जी ने किया है, उतना अन्य किसी कवि ने नहीं किया।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
धनुष – भंग
1. उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।
बिक सन्त सरोज सब हरषे लोचन भृंग |
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवली न प्रकासी ।।
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने ।।
भए बिसोक कोक मुनि देवा । बरसहिं सुमन जनावहिं सेवा ।।
गुरुपद बंदि सहित अनुरागा । राम मुनिन्ह सन आयसु मागा।
सहजहिं चले सकल जग स्वामी । मत्त मंजु बर कुंजर गामी । ।
चलत राम सब पुर नर नारी । पुलक पूरी तन भए सुखारी ।।
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कुछ पुन्य प्रभाउ हमारे । ।
तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं । ।
V. Imp [2022, 19, 17]
शब्दार्थ रघुबर – श्रीराम; बालपतंग – बालसूर्य, प्रातः काल का सूर्य; बिकसे-खिल उठे; सकुचाने – संकोच; जनावहिं – प्रकट कर रहे; सहजहिं – स्वाभाविक ही; जग स्वामी – श्रीराम |
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।.
(iv) श्री राम धनुष भंग के लिए उठे, तो उनकी शोभा कैसी प्रतीत हो रही थी?
(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा अलंकार है?
(vi) कवि ने उल्लू को किसके तुल्य बताया है?
(vii) कवि ने कुमुद को किसके समान बताया है?
उत्तर
(i) संदर्भ सभी प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के ‘धनुष- भंग’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड से लिया गया है।
प्रसंग इस पद्यांश में उस समय का वर्णन किया गया है, जब श्रीराम अपने गुरु को आज्ञा प्राप्त कर धनुष भंग के लिए उठाते हैं।
(ii) व्याख्या तुलसीदास कहते हैं कि जब श्रीराम जी स्वयंवर सभा में गुरु विश्वामित्र की आज्ञा प्राप्त करके धनुष भंग के लिए मंच से उठे, तो उनकी शोभा ऐसी प्रतीत हो रही थी, जैसे मंचरूपी उदयाचल पर्वत पर श्रीराम रूपी बाल सूर्य का उदय हो गया हो, जिसे देखकर सन्तरूपी कमल पुष्प खिल उठे हों और उनके नेत्ररूपी भौर प्रसन्न हो गए हों अर्थात् जब श्रीराम मंच से खड़े हुए, तो उस समय स्वयंवर सभा में उपस्थित सभी जन हर्षित हो उठे।
जब श्रीराम धनुष – भंग के लिए मंच से उठे, तो स्वयंवर सभा में उपस्थित राजाओं की सीता को प्राप्त करने की मनोकामना नष्ट हो गई तथा उनके वचनरूपी तारों का समूह चमकना बन्द हो गया अर्थात् वे सभी मौन हो गए। वहाँ जो अभिमानी कुमुदरूपी राजा थे, वे सकुचाने लगे तथा श्रीराम रूपी सूर्य को देखकर मुरझा गए और कपटरूपी उल्लू की तरह छिप गए। जिस प्रकार रात होने पर चकवा – चकवी अपने बिछोह के कारण शोक में डूब जाते हैं, उसी प्रकार सभा में उपस्थित मुनि व देवता रूपी चकवे भी जो शोक में डूबे हुए थे, उनका दुःख समाप्त हो गया। वे फूलों की वर्षा करके अपनी खुशी और सेवा का अनुग्रह प्रकट करने लगे इसके बाद समस्त चर-अचर संसार के स्वामी श्रीराम प्रेमपूर्वक अपने गुरु विश्वामित्र जी के चरणों की वन्दना कर तथा अन्य मुनियों की आज्ञा प्राप्त करके सुन्दर मतवाले हाथी की भाँति मस्त चाल से धनुष की ओर स्वाभाविक रूप से बढ़े।
श्रीराम के धनुष की ओर बढ़ते ही जनकपुरी के सभी नर-नारी सुख का अनुभव करते हुए आनन्दित हो उठे, जिससे उनका शरीर रोमांच से भर गया । जनकपुरी के नर-नारियों ने अपने पूर्वजों तथा देवताओं की वन्दना कर अपने पुण्यों का स्मरण किया कि यदि हमारे द्वारा किए पुण्यों का तनिक भी प्रभाव हो, तो हे गणेश गोसाईं ! श्रीराम इस शिव धनुष को कमल की नाल के समान सहज ही तोड़ डालें।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने उस समय का मनोहारी चित्रण किया है, जब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्रीराम धनुष-भंग के लिए मंच से उठते हैं।
भाषा अवधी
शैली प्रबन्ध और विवेचनात्मक/चित्रात्मक
गुण माधुर्य
रस भक्ति / शृंगार
छन्द दोहा-चौपाई
शब्द-शक्ति अभिधा और व्यंजना
अलंकार अनुप्रास, उपमा तथा रूपक अलंकार
(iv) जब श्री राम स्वयंवर सभा में धनुष भंग करने के लिए मंच से उठे, उनकी शोभा ऐसी प्रतीत हो रही थी, जैसे मंचरूपी उदयांचल पर्वत पर श्री रामरूपी लाल सूर्य का उदय हो गया हो, जिसे देखकर सन्तरूपी कमल पुष्प खिल उठे हों और उनके नेत्ररूपी भौरें प्रसन्न हो गए हों।
(v) प्रस्तुत पद्यांश में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार हैं।
अनुप्रास अलंकार ‘उदित उदयगिरि’, और ‘सन्त सरोज सब’, ‘निसि नासी’, मानी महिप, बरसहि सुमन, पद बंदि में अनुप्रास अलंकार है ।
उपमा अलंकार ‘मत्त मंजु बर कुंजर गामी’ यहाँ उपमेय में उपमान की समानता प्रकट की गई है, इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है ।
रूपक अलंकार ‘रघुबर बालपतंग’ में मंचरूपी उदयांचल का वर्णन किया गया है, ‘कपटी भूप उलूक लुकाने’ कपटरूपी उल्लू समान राजा का वर्णन किया गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है ।
(vi) कवि ने उल्लू को कपटी राजाओं के तुल्य बताया है।
(vii) कवि ने कुमुद को अभिमानी राजाओं के समान बताया है।
2. रामहि प्रेम समेत लखि, सखिन्ह समीप बोलाइ।
सीता मातु सनेह बस वचन कहइ बिलखाई ||
सखि सब कौतुक देखनिहारे । जेउ कहावत हितू हमारे ।।
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं । ए बालक असि हठ भलि नाहीं । ।
रावन बान हुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा ।।
सोधनु राजकुअर कर देहीं । बाल मराल कि मन्दर लेहीं । । [2015]
शब्दार्थ बोलाइ–बुलाया: कौतुकु-आश्चर्य से देखनिहारे-देखने वाले हैं; असि हठ—ऐसी हठ; बान – बाणासुर; चापा – धनुष; देहीं – देना; बाल मराल-हंस का बच्चा; मन्दर-मन्दराचल ( पहाड़ ) ।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी की माता श्रीराम की कोमलता को देखकर चिन्तित है कि जब शक्तिशाली राजा इस धनुष को हिला तक नहीं सके, तब यह बालक इस धनुष को कैसे तोड़ेगा?
(ii) व्याख्या सीता जी की माता श्रीराम के सुन्दर व कोमल रूप पर अत्यन्त मुग्ध हो गईं। वह अपनी सखियों को अपने पास बुलाकर स्नेहपूर्ण विलाप करती हुई कहने लगीं कि उनकी मनोकामना भी यही है कि सीता जी का विवाह राम के साथ हो जाए ।
सीता जी की माता अपनी सखियों से कहती हैं कि हे सखि ! जो लोग हमारे हितैषी कहलाते हैं, वे सभी तमाशा देखने वाले हैं। क्या इनमें से कोई भी राम के गुरु विश्वामित्र को समझाने के लिए जाएगा कि ये (राम) अभी बालक हैं। इस धनुष को तोड़ने के लिए हठ (जिद) करना अच्छा नहीं अर्थात् इस धनुष को बड़े-बड़े योद्धा हिला तक नहीं पाए।
इस धनुष की कठोरता के कारण रावण और बाणासुर जैसे वीर योद्धाओं ने इसे छुआ तक नहीं। कोई इन्हें समझाता क्यों नहीं कि क्या हंस का बच्चा कभी मन्दराचल पहाड़ उठा सकता है अर्थात् शिवजी के जिस धनुष को शक्तिशाली योद्धा छू तक नहीं सके, उसे तोड़ने के लिए विश्वामित्र का श्रीराम को आज्ञा देना अनुचित है। श्रीराम का भी उसे तोड़ने के लिए आगे बढ़ना बालहठ ही है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा अवधी
शैली प्रबन्ध और विवेचनात्मक
गुण प्रसाद
रस वात्सल्य
छन्द चौपाई
शब्द शक्ति अभिधा व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘सखि सब’, ‘हितू हमारे’, ‘बुझाइ कहइ’ और ‘बाल मराल’ में क्रमश: ‘स’, ‘ह’, ‘इ’ और ‘ल’ वर्ण की पुनरावृत्ति हीने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
दृष्टान्त अलंकार ‘रावन बान छुआ नहिं चापा’ में रावण का उदाहरण दिया गया है, इसलिए यहाँ दृष्टान्त अलंकार है।
रूपक अलंकार ‘बाल मराल कि मन्दर लेहीं यहाँ धनुष की तुलना पहाड़ से की गई है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है ।
3. भूप सयानप सकल सिरानी । सखि बिधि गति कछु जाति न जानी ।। 
बोली चतुर सखी मृदु बानी । तेजवन्त लघु गनिअ न रानी ।।
कहँ कुम्भज कहँ सिन्धु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा।।
रबि मण्डल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा । ।
दोहा-ओउम् मन्त्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब ।
महामत्त गजराज कहुँ, बस कर अंकुस खर्ब ।। Imp [2016, 15]
शब्दार्थ मृदु बानी – मधुर वाणी; तेजवन्त – तेजवान; कुम्भज घड़े से उत्पन्न होने वाला; अपारा – अपार; सोषेउ- सोख लिया; लागा-लगता है।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी की माता श्रीराम की कोमलता को देख विचलित हो उठती हैं, तब उनकी सखियाँ उनकी शंका को दूर करती हैं।
(ii) व्याख्या एक सखी सीता जी की माता की शंका का निवारण करते हुए मधुर वाणी में कहती है कि हे रानी! तेजवान व्यक्ति चाहे उम्र में छोटा ही क्यों न हो, उसे छोटा नहीं मानना चाहिए। कहाँ घड़े से उत्पन्न होने वाले मुनि अगस्त्य और कहाँ विस्तृत और अपार समुद्र । दोनों में यद्यपि कोई समानता नहीं है, पर मुनि ने अपने पराक्रम से उस अपार समुद्र को सोख लिया था। इस कारण उनका यश सम्पूर्ण संसार में विद्यमान है। इसी प्रकार सूर्य का घेरा छोटा-सा दिखाई देता है, किन्तु सूर्य के उदित होते ही तीनों लोकों का अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार तुम श्रीराम को छोटा मत समझो।
दोहे का अर्थ ‘ओ३म्’ का मन्त्र अत्यन्त छोटा है, पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव और समस्त देवगण उसके वश में हैं। इसी प्रकार महान मदमस्त हाथी को वश में करने वाला अंकुश भी बहुत छोटा-सा होता है । अत: तुम भी श्रीराम को छोटा मत समझो। वह उम्र में छोटे क्यों न हों, तुम उनकी कोमलता पर मत जाओ, वे अवश्य ही धनुष को तोड़ेंगे।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पंक्तियों में सीता जी की माता की सखी द्वारा दिए गए तर्क श्रीराम के महत्त्व को दर्शाते हैं।
भाषा अवधी
शैली प्रबन्ध और विवेचनात्मक
गुण प्रसाद
रस वीर
छन्द चौपाई
अलंकार
अनुप्रास अलंकार हरि हर, ‘कहँ कुम्भज कहँ’ और ‘तासु तिभुवन’ में क्रमशः ‘है’, ‘क’ और ‘त’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
4. काम कुसुम धनु सायक लीन्हे।
सकलभुवन अपने बस कीन्हे ।।
देबि तजिय संसउ अस जानी।
जब धनुषु राम सुनु रानी । ।
सखी बचन सुनि भै परतीती।
मिटा बिषाद बढ़ी अति प्रीती । ।
तब रामहि बिलोकि बैदेही ।
सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही ।। [2016]
शब्दार्थ काम-कामदेव, कुसुम – पुष्प, सायक – बाण; तजिय-त्याग; संसउ–संशय, सन्देह; भंजब-तोड़ेंगे; बिषादु – दुःख, उदासी, बैदेही- सीता ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) सम्पूर्ण संसार को किसने वश में कर रखा है और कैसे ?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत चौपाई में सीता जी की माता की सखी श्रीराम की तेजस्विता का वर्णन करती हैं।
(ii) व्याख्या सीता जी की माता को उनकी सखी श्रीराम की वीरता का वर्णन करते हुए कहती हैं कि कामदेव ने फूलों का ही धनुष-बाण लेकर सम्पूर्ण संसार को अपने वश में कर रखा है। अतः हे देवी! आप अपने मन की शंका का परित्याग कर दीजिए। श्रीराम इस शिव धनुष को अवश्य ही तोड़ देंगे। आप मेरी बात का विश्वास कीजिए। अपनी सखी के ऐसे वचन सुनकर रानी को श्रीराम की क्षमता पर विश्वास हो गया और उनका दुःख (उदासी) समाप्त हो गया और श्रीराम के प्रति स्नेह के रूप में परिवर्तित हो गया। तभी श्रीराम को देखकर सीता जी विचलित हो उठीं। वे सभी देवताओं से विनती करने लगीं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा अवधी
शैली प्रबन्ध, उद्धरण और वर्णनात्मक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द चौपाई
शब्द-शक्ति अभिधा और लक्षणा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘काम कुसुम’, ‘संसउ अस’, ‘सुनु रानी’ और ‘बिषादु बढ़ी’ में क्रमश: ‘क’, ‘स’, ‘न’ और ‘ब’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) सम्पूर्ण संसार को कामदेव ने अपने फूलों के धनुष-बाण द्वारा अपने वश में कर रखा है। कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण संसार ही कामदेव के वश में है।
5. देखि देखि रघुबीर तन, सुर मानव धरि धीर ।
भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली सरीर ।।
नीके निरखि नयन भरि सोभा । पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा । ।
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी ।।
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई ।।
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा ।। [2018]
शब्दार्थ रघुबीर-श्रीराम; धरि-धारण करना; पनु – प्रण, प्रतिज्ञा; छोभा – क्षुब्ध; बहुरि – भर उठना ; दारुनि – कठोर; बुध – पण्डित, बुद्धिमानी, ज्ञानी; कुलसहु-वज्र से।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्यगत सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी को सन्देह है कि कोमल शरीर वाले राम इस भारी धनुष को कैसे तोड़ेंगे। इसी मनोदशा का वर्णन यहाँ किया गया है।
(ii) व्याख्या तुलसीदास जी कहते हैं कि जब श्रीराम धनुष तोड़ने के लिए मंच पर खड़े हुए तो सीता जी उनकी शोभा को भली-भाँति देख रही हैं और धैर्य धारण कर देवताओं को मनोकामना पूरी करने के लिए मना रही हैं। उनकी आँखें प्रेम अश्रुओं से सराबोर हैं और शरीर के रोंगटे खड़े हो गए हैं। सीता जी श्री राम की सुन्दरता को अच्छी तरह से निहार रही हैं। इसी बीच उन्हें अपने पिता के धनुष भंग करने का कठोर प्रण याद आया, तो उनका मन अत्यधिक दुखी हो गया। सीता जी मन में सोचती हैं कि पिता जी ने ऐसा कठोर प्रण क्यों किया? उन्होंने अपने इस प्रण से होने वाले लाभ-हानि का विचार नहीं किया।
मन्त्री जी भी भय के कारण उन्हें कुछ नहीं समझा पा रहे हैं। इस सभा में बड़े-बड़े ज्ञानी (बुद्धिमानी ) बैठे हैं, तब भी यहाँ इतना बड़ा अनुचित हो रहा है, कोई भी इस अनर्थ को नहीं रोक पा रहा है।
कहाँ वज्र से भी कठोर यह धनुष और कहाँ यह कोमल शरीर वाले साँवले किशोर श्रीराम अर्थात् सीता जी के मन में यह भय बैठ गया है कि श्रीराम इस वज्र के समान धनुष को तोड़ पाएँगे या नहीं।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
भाषा अवधी
शैली प्रबन्ध
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार और भक्ति
छन्द दोहा-चौपाई
शब्द शक्ति  अभिधा और लक्षणा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘नीके निरखि नयन’, ‘पितु पनु’, ‘हठ ठानी’ और ‘सचिव सभय सिख’ में क्रमश: ‘न’, ‘प’, ‘ठ’ और ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
6. बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ।।
सकल सभा कै मति भै भोरी । अब मोहि संभुचाप गति तोरी ।।
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी । होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी ।।
अति परिताप सीय मन माहीं । लव निमेष जुग सय सम जाहीं । ।
शब्दार्थ बिधि-विधाता; कन-कण; बेधिअ-बँधा जाता, छेदा जाता; हरुअ-हल्के; परिताप–सन्ताप, दुःखी; लव – अत्यन्त सूक्ष्म अंश; सय-सौ|
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्यगत सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी के क्रोध और सभा में उपस्थित सभी ज्ञानी लोगों पर उनके द्वारा आक्षेप किए जाने का वर्णन किया गया है।
(ii) व्याख्या सीता जी कहती हैं कि हे विधाता ! अब मैं किस तरह अपने हृदय को धैर्य बँधाऊँ, क्या कभी शिरीष के फूल के कण से हीरे को काटा जा सकता है। यहाँ तो विद्वत सभा के सभी लोगों की बुद्धि भोली अर्थात् बावली हो गई है। हे शिव धनुष ! अब तो मुझे तुम्हारा • आसरा है, तुम्हीं कोमल होकर मेरी मनोकामना को पूरा करो।
अपनी जड़ता त्यागने के बाद रघुनाथ जी के कोमल शरीर पर दृष्टि Asial तथा उसी के समरूप हल्के हो जाओ। अतः सीता जी के मन में अत्यधिक सन्ताप (दुःख ) हो रहा है। इसी कारण उन्हें पलक झपकने में लगा एक क्षण भी सौ युगों के समान लग रहा है। वे श्रीराम जी की कोमलता का स्मरण करके ईश्वर से उन पर कृपा करने की प्रार्थना करती हैं।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
भाषा अवधी
शैली प्रबन्ध
गुण माधुर्य
रस शृंगार और भक्ति
छन्द चौपाई
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘सिरस सुमन’, ‘उर धीरा’, ‘होहि हरुअ’ और ‘सय सम’ में क्रमश: ‘स’, ‘र’, ‘ह’ और ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
दृष्टान्त अलंकार ‘सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा’ में सिरस के फूल का उदाहरण दिया गया है। इसलिए यहाँ दृष्टान्त अलंकार है ।
7. “गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी । प्रगट न लाज निसा अवलोकी ।।
लोचन जलु रह लोचन कोना । जैसें परम कृपन कर सोना ।।
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी । धरि धीरजु प्रतीति उर आनी । ।
तन मन बचन मोर पनु साचा । रघुपति पद सरोज चितु राचा ।।
तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी।।
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ।।
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना ।।
सियहि बिलोकितके धनु कैसें । चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें ।। [2015]
शब्दार्थ गिरा – वाणी; अलिनि-भ्रमरी; अवलोकी-देखकर; प्रतीति–विश्वास; बासी -निवासी; सियहि- सीता जी, ब्यालहि – साँप को ।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पद्यांश का काव्यगत सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) ‘चितव गरुरु लघु ब्यालह जैसें’ में कौन-सा अलंकार हैं?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी का श्रीराम के प्रति अनुराग तथा सात्विक प्रेम का सुन्दर चित्रण किया गया है।
(ii) व्याख्या यहाँ कवि सीता जी की वाणी की असमर्थता को प्रकट करते हुए कहते हैं कि सीता जी के प्रेम भाव की वाणी रूपी भ्रमरी को उनके मुखरूपी कमल ने रोक रखा है अर्थात् वह कुछ बोल नहीं पा रही हैं। जब वह भ्रमरी लज्जारूपी रात देखती हैं, तो वह अत्यन्त मौन होकर कमल में बैठी रहती है और स्वयं को प्रकट नहीं करती, क्योंकि वह तो रात्रि के बीत जाने पर ही प्रातः काल में प्रकट होकर गुनगुनाती है अर्थात् सीता जी लज्जा के कारण कुछ नहीं कह पातीं और उनके मन की बात मन में ही रह जाती है।
उनका मन अत्यन्त भावुक है, जिसके कारण उनकी आँखों में आँसू छलछला आते हैं, परन्तु वह उन आँसुओं को बाहर नहीं निकलने देतीं।
सीता जी के आँसू आँखों के कोनों में ऐसे समाए हुए हैं जैसे महाकंजूस का सोना घर के कोनों में ही गड़ा रहता है। सीता जी अत्यन्त विचलित हो रही थीं, जब उन्हें अपनी इस व्याकुलता का बोध हुआ, तो वह सकुचा गईं और अपने हृदय में धैर्य रखकर अपने मन में यह विश्वासलाईं कि यदि मेरे तन, मन, वचन से श्रीराम का वरण सच्चा है, रघुनाथ जी के चरणकमलों में मेरा चित्त वास्तव में अनुरक्त है तो ईश्वर मुझे उनकी दासी अवश्य बनाएँगे।
तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता जी ने श्रीराम जी की ओर देखकर इस बात का निश्चय कर लिया कि सबके हृदय में निवास करने वाले भगवान् श्रीराम मुझे अपनी दासी अवश्य बनाएँगे, क्योंकि जिसका जिस पर सच्चा स्नेह या प्रेम होता है, वह उसे अवश्य ही मिलता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं होता है । प्रभु श्रीराम को देखकर सीता जी ने अपने चितवन में उनके प्रति प्रेम ठान लिया है अर्थात् यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि यह हृदय केवल श्रीराम का वरण करेगा। उनकी इस मनोकामना को कृपानिधान भगवान राम ने भली-भाँति जान लिया है, इसलिए श्रीराम ने धनुष को बिल्कुल ऐसे देखा जैसे गरुड़ एक छोटे साँप को देखता है।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
भाषा अवधी
शैली प्रबन्ध और चित्रात्मक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द चौपाई
शब्द-शक्ति अभिधा एवं लक्षणा
अलंकार अनुप्रास, दृष्टान्त अलंकार
(iv) ‘चितव रुरु लघु ब्यालहि जैसे’ में दृष्टान्त अलंकार है। जहाँ उपमेय और उपमान के साधारण धर्म में प्रतिबिम्ब भाव दिखाया जाए, वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है।
8. लखन लखेउ रघुबंसमनि, ताकेउ हर कोदंडु ।
पुलकि गात बोले बचन, चरन चापि ब्रह्मांडु ।।
दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला । धरहु धरनि धरि धीर न डोला । ।
राम चहहिं संकर धनु तोरा । होहु सजग सुनि आयसु मोरा ।।
चाप समीप रामु जब आए । नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए । ।
सब कर संसउ अरु अग्यानू । मन्द महीपन्ह कर अभिमानू ।।
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई । ।
सियं कर सोचु जनक पछितावा । रानिह कर दारुन दुख दावा ।।
चापड़ बोहि पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई ।।
राम बाहुबल सिंधु अपारू । चहत पारु नहि कोउ कड़हारु ।।
शब्दार्थ हर कोदंडु – शिव का धनुष; चापि – दबाकर; दिसिकुंजरहु-दिग्गज; कोला- वराह; मन्द महीपन्ह – नीच राजा; भृगुपति – परशुराम; कदराई – कातरता (भय)।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए |
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्यगत सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) लक्ष्मण जी ने अपने चरणों से ब्रह्माण्ड को क्यों दबा लिया?
(v) ‘मंद महीपन्ह कर अभिमानू पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में लक्ष्मण द्वारा कच्छप, शेषनाग आदि को चेताना तथा राजाओं द्वारा शंका करना आदि का वर्णन किया गया है।
(ii) व्याख्या तुलसीदास जी कहते हैं कि जब लक्ष्मण जी ने देखा कि रघुकुलमणि श्रीराम, शिवजी के धनुष को खण्डित करने की दृष्टि से देख रहे हैं, तो उनका शरीर आनन्दित हो उठा। शिव धनुष के खण्डन से ब्रह्माण्ड में उथल-पुथल न हो जाए, इसलिए लक्ष्मण जी ने अपने चरणों से ब्रह्माण्ड को दबा लिया।
लक्ष्मण जी कहते हैं कि हे दिग्गजों! हे कच्छप ! हे शेषनाग ! हे वराह ! आप सभी धैर्य धारण करें तथा पृथ्वी को सँभालकर रखें, क्योंकि श्रीराम इस शिव – धनुष को तोड़ने जा रहे हैं, इसलिए आप सब मेरी इस आज्ञा को सुनकर सतर्क हो जाइए। जब श्रीराम धनुष के पास गए, तब वहाँ उपस्थित नर-नारी अपने पुण्यों को मनाने लगे, क्योंकि सभी को श्रीराम के धनुष तोड़ने पर शंका तथा अज्ञान है कि श्रीराम इस धनुष को तोड़ पाएँगे या नहीं। सभा में उपस्थित नीच अहंकारी राजाओं को भी यही लग रहा है कि श्रीराम धनुष नहीं तोड़ पाएँगे, क्योंकि जब हमसे यह धनुष नहीं टूटा तो राम से कैसे टूटेगा ?
कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि परशुराम के गर्व की गुरुता, सभी देवता तथा श्रेष्ठ मुनियों का भय, सीता जी की चिन्ता, राजा जनक का पछतावा और उनकी रानियों के दारुण दुःख का दावानल, ये सभी शिवजी के धनुषरूपी बड़े जहाज पाकर उसमें सब एक साथ चढ़ गए हैं। ये सभी श्रीराम के बाहुबलरूपी अपार समुद्र को पार करना चाहते हैं, परन्तु उनके पाए कोई नाविक नहीं है।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि द्वारा लक्ष्मण के कच्छप, शेषनाग आदि को चेताने का वर्णन किया गया है।
भाषा अवधी
शैली प्रबन्ध
गुण ओज
रस वीर
छन्द दोहा – चौपाई
शब्द-शक्ति अभिधा और लक्षणा
अलंकार ‘लखन लखेउ’, ‘बोले बचन’, ‘चरन चापि’, ‘धरहु धरनि धरि धीर’, नर नारिन्ह, ‘अरु अग्यानू’, ‘मन्द महीपन्ह’, ‘दारुन दुख दावा’ आदि में अनुप्रास अलंकार तथा ‘रघुबंसमनि’ में रूपक अलंकार है ।
(iv) जब लक्ष्मण जी ने देखा कि रघुकुलमणि श्री राम, शिवजी के धनुष को खण्डित करने की दृष्टि से देख रहे हैं, तो उनका शरीर आनन्दित हो उठा ! शिव – धनुष के खण्डन से ब्रह्माण्ड में उथल-पुथल न हो जाए, इसलिए लक्ष्मण जी ने अपने चरणों से ब्रह्माण्ड को दबा लिया।
(v) प्रस्तुत पंक्ति का आशय है कि जब श्री राम धनुष खण्डन के लिए खड़े हुए तो सभा में उपस्थित नीच अहंकारी राजाओं को यही लग रहा था कि श्री राम धनुष नहीं तोड़ पाएँगे, क्योंकि जब हमसे यह धनुष नहीं टूटा तो राम से कैसे टूटेगा।
9. राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि ।
चितई सीय कृपायन जानी बिकल बिसेषि ।।
देखी बिपुल बिकल बैदेही । निमिष बिहात कलप सम तेही ।।
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा । ।
का बरषा जब कृषी सुखाने । समय चुकें पुनि का पछितानें । ।
अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।।
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा । ।
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मण्डल सम भयऊ।।
लेत चढ़ावत खैचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढें ।।
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा । भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले ।।
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं ।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं । ।
शब्दार्थ बिलोके – देखना; चितई – देखा ; कृपायन – कृपा के धाम; निमिष-क्षण; कृषि – खेत, फसल; लखि – देखकर ; दामिनी – बिजली; धुनि-ध्वनि; रव-ध्वनि ।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) ‘नभ धनु मण्डल सम भयऊ’ में कौन-सा अलंकार है?
(iv) का बरषा जब कृषि सुखाने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग उपरोक्त पद्यांश में धनुष भंग के पश्चात् सभी लोकों में हुई उथल-पुथल का अलंकारिक वर्णन किया गया है।
(ii) व्याख्या कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को देखा तो उन्हें वे चित्र में लिखे हुए से प्रतीत हुए, उसके बाद जब कृपा के धाम श्रीराम ने सीता जी की ओर देखा, तो वे उन्हें सबसे अधिक व्याकुल लगीं।
सीता जी को अत्यन्त व्याकुल देखकर उन्होंने अनुभव किया कि उनका एक क्षण एक-एक कल्प ( ब्रह्मा द्वारा सृष्टि बनाने में लगा समय) के समान बीत रहा था। तभी श्रीराम ने एक पल का भी विलम्ब किए बिना धनुष- भंग करने का निर्णय किया, क्योंकि यदि कोई प्यासा व्यक्ति पानी न मिलने पर शरीर त्याग दे तो उसकी मृत्यु के पश्चात् अमृत के तालाब का कोई औचित्य नहीं। जिस प्रकार खेती के सूख जाने पर वर्षा का होना व्यर्थ है, उसी प्रकार किसी कार्य के होने का उचित समय बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ? जब श्रीराम ने सीता जी को देखा और अपने प्रति विशेष प्रेम को मन-ही-मन जानकरं प्रभु श्रीराम अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्रीराम ने मन-ही-मन अपने गुरुजी को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को अपने हाथ में उठा लिया। जैसे ही श्रीराम ने धनुष को अपने हाथों में उठाया, तो वह बिजली की भाँति चमका और आकाश में मण्डलाकार हो गया।
श्रीराम ने यह कार्य इतनी फुर्ती व कुशलता से किया कि सभा में उपस्थित लोगों में से किसी ने भी उन्हें हाथ में लेते धनुष हुए, प्रत्यंचा चढ़ाते हुए और खींचते हुए नहीं देखा। सारा कार्य एक क्षण में ही समाप्त हो गया, उसी क्षण उन्होंने धनुष को बीच में से तोड़ दिया। धनुष टूटने की इतनी भयंकर ध्वनि (आवाज) हुई कि वह तीनों लोकों में व्याप्त ( गूँज ) हो गई।
जिससे घबराकर सूर्य के रथ के घोड़े मार्ग को छोड़कर चलने लगे। समस्त दिशाओं के हाथी चिंघाड़ने लगे, पृथ्वी काँपने लगी, शेषनाग, वराह और कच्छप व्याकुल हो उठे।
देवता, राक्षस और मुनि कानों पर हाथ रखकर व्याकुल होकर विचारने लगे । तुलसीदास जी कहते हैं कि जब सभी को यह विश्वास हो गया कि श्रीराम ने यह धनुष तोड़ डाला है, तब सब श्रीरामचन्द्र की जय-जय करने लगे ।
(iii) ‘नभ धनु मण्डल सम भयऊ’ में नभ को मण्डल के आकार का बताया है। इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है ।
(iv) ‘का बरषा जब कृषि सुखाने’ से तात्पर्य है कि जब खेती पूरी तरह से सूख जाए, तब वर्षा होने का कोई लाभ नहीं होता अर्थात् जब कोई कार्य उचित समय पर न किया जाए, तो बाद में उसे करने का कोई लाभ नहीं होता ।
वन-पथ पर
10. पुर तें निकसी रघुबीर – बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै ।
झलकी भरि भालकनी जल की, पुट सूख गए मधुराधर वै । ।
फिरि बूझति हैं- “चलो अब केतिक, पर्णकुटी करिहौ कित है?”
ति की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै ।। V. Imp [2023, 20, 16]
शब्दार्थ पुर – महल भरि-पूरे; कनी – कण, बूँद पुट – कोमल, मधुराधर – होंठ; केतिक – कितना; पर्णकुटी – पत्तों की झोंपड़ी; तिय- पत्नी; आतुरता – व्याकुलता; च्चै – प्रवाहित होने लगे।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास ने किस विषय का वर्णन किया है?
(iv) फिर बूझति है – ‘चलनो अब केतिक, पर्णकुटी करिहौ कित हैं प्रस्तुत पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए ।
(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा अलंकार है?
(vi) श्रीराम के नेत्रों से आँसू क्यों बहने लगे?
(vii) रेखांकित अंश ‘पर्णकुटी करिहौं कित है’ में कौन-सा अलंकार है ?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के ‘वन-पथ पर’ शीर्षक से उद्धृत है। यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘कवितावली’ के अयोध्याकाण्ड से लिया गया है।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रीराम, सीता तथा लक्ष्मण वन में जा रहे हैं। सीता जी चलते-चलते थक गई हैं, उनकी व्याकुलता का वर्णन यहाँ किया गया है।
(ii) व्याख्या कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम, लक्ष्मण तथा अपनी सुकोमल प्रिया (पत्नी) के साथ महल से निकले, तो उन्होंने बहुत धैर्य से मार्ग में दो कदम रखे। सीता जी थोड़ी ही दूर चली थीं कि उनके माथे पर पसीने की बूँदें आ गईं तथा सुकोमल होंठ बुरी तरह से सूख गए। तभी वे श्रीराम से पूछती हैं कि अभी हमें कितनी दूर और चलना है और हम अपनी पर्णकुटी (झीपी) कहाँ बनाएँगे? “पत्नी, (सीता जी) की इस दशा व व्याकुलता को देखकर श्रीराम जी की आँखों से आँसुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। राजमहल का सुख भोगने वाली अपनी पत्नी की ऐसी दशा देखकर वे बेचैन हो गए।
काव्यगत सौन्दर्य
भाषा ब्रज
शैली चित्रात्मक और मुक्तक
गुण प्रसाद और माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द सवैया
शब्द-शक्ति लक्षणा एवं व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘रघुबीर बधू’, ‘भरि भाल’ और ‘अँखिया अति’ में क्रमशः ‘ब’, ‘भ’ और ‘अ’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
स्वभावोक्ति अलंकार ‘झलकी भरी भाल कनी जल की पुट सूख गए मधुराधर वै’ में यथावत स्वाभाविक स्थिति का वर्णन किया गया है, इसलिए यहाँ स्वभावोक्ति अलंकार है ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास जी ने श्री राम, सीता तथा लक्ष्मण के वन मार्ग पर जाते समय सीता जी की थकान भरी स्थिति को देख श्रीराम की व्याकुलता का वर्णन किया है।
(iv) प्रस्तुत पंक्ति का आशय है कि जब सीता जी मार्ग पर चलते-चलते थक जाती हैं, उनके कोमल होंठ बुरी तरह सूख जाते हैं, तब वह श्रीराम जी से पूछती हैं कि अभी हमें कितनी दूर और चलना है और हम अपनी पर्णकुटी (झोंपड़ी) कहाँ बनाएँगे?
(v) प्रस्तुत पद्यांश में अनुप्रास व स्वभावोक्ति अलंकार है ।
(vi) मार्ग में पैदल चलने के कारण सीता जी व्याकुल हो गई थी, उनकी व्याकुलता को देखकर श्रीराम की आँखों से आँसू बहने लगे।
(vii) रेखांकित अंश ‘पर्णकुटी करिहौं कित है’ में अनुप्रास अलंकार है ।
11. ” जल को गए लक्खन हैं लरिका, परिखौ, पिय! छाँह घरीक है ठाढ़े।
पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पायँ पखरिहौं भूभुरि डाढ़े।।”
तुलसी रघुबीर प्रिया स्रम जानि कै बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े।
जानकी नाह को नेह लख्यौ, पुलको तनु बारि बिलोचन बादे ।। [2016]
शब्दार्थ लक्खन-लक्ष्मण; परिखौ – प्रतीक्षा करना; छाँह-छाँव; घरीक -एक घड़ी के लिए; पोंछि–पोंछना; पसेउ – पसीना; पखरिहौं – पंखा ; भूभुरि-धूल; काढ़े -निकाले; नाह – स्वामी; लख्यौ – देखकर ।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्यगत सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) राम जी ने सीता जी को थका हुआ जानकर क्या किया?
(v) प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी क्यों भावुक हो उठीं ?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास जी ने सीता जी की व्याकुलता तथा सीता जी के प्रति राम के प्रेम का सजीव वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि जब सीता जी चलते-चलते थक जाती हैं और उन्हें प्यास लगने लगती है, तो लक्ष्मण उनके लिए जल लेने के लिए जाते हैं। तभी सीता जी, श्रीराम से कहती हैं कि जब तक लक्ष्मण नहीं आते, तब तक हम घड़ी भर (कुछ देर के लिए) कहीं छाँव में खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लेते हैं। सीता जी श्रीराम से कहती हैं, मैं तब तक आपका पसीना पोंछकर हवा कर लेती हूँ तथा बालू से तपे हुए पैर धो लेती हूँ। श्रीराम समझ गए कि सीता जी थक चुकी हैं और वे कुछ समय विश्राम करना चाहती हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जब श्रीराम ने सीता जी को थका हुआ देखा, तो उन्होंने बहुत देर तक बैठकर उनके पैरों में से काँटे निकाले । सीता जी ने अपने स्वामी के प्रेम को देखा, तो उनका शरीर पुलकित हो उठा और आँखों में प्रेमरूपी आँसू “छलक आए।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
भाषा ब्रज
शैली मुक्तक
रस श्रृंगार
गुण माधुर्य
छन्द सवैया
शब्द-शक्ति लक्षणा एवं व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार “पंरिखौ पिय’, ‘बैठि बिलंब’ और ‘कंटक काढ़े में क्रमश: ‘प’, ‘ब’ और ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
(iv) श्रीराम ने सीता जी को थका हुआ जानकर बहुत देर तक बैठकर उनके पैरों से काँटे निकाले ।
(v) जब श्रीराम जी ने सीता जी के पैरों से काँटे निकाले, तो श्रीराम के प्रेम को देखकर उनका शरीर पुलकित हो गया और वे भावुक हो गई अर्थात् उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली।
12. रानी मैं जानी अजानी महा, पबि पाहन हूँ ते कठोर हियो है।
राजकाज अकाज न जान्यो, कह्यो तिय को जिन कान कियो है । ।
ऐसी मनोहर मूरति ये, बिछुरे कैसे प्रीतम लोग जियो है ? |
आँखिन में, सखि ! राखिबे जोग, इन्हें किमि के बनवास दियो है ? ||
M. Imp [ 2024, 19, 15, 14, 12, 10]
शब्दार्थ रानी – कैकेयी; अजानी – अज्ञानी; पबि – वज्र, काज अकाज – उचित और अनुचित; जान्यो – जानती; तिय- पत्नी; जोग–योग; किमि – क्यों।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए । अथवा प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा अलंकार है ?
(iv) पद्यांश में ‘ऐसी मनोहर मूरति ये’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है तथा इसमें कौन-सा अलकार है? [2024]
(v) प्रस्तुत पद्यांश में गाँव की स्त्रियाँ आपस में क्या वार्तालाप कर रही थीं?
(vi) पाहन, जान्यो, अजानी शब्द के तत्सम रूप लिखिए।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा ग्रामीण स्त्रियों के माध्यम से कैकेयी और राजा दशरथ की निष्ठुरता पर प्रतिक्रिया का वर्णन है।
(ii) व्याख्या श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन में जा रहे हैं, उन्हें देखकर गाँव की स्त्रियाँ आपस में वार्तालाप कर रही हैं। एक स्त्री दूसरी से कहती है कि मुझे यह ज्ञात हो गया है कि रानी कैकेयी बड़ी अज्ञानी है। वह पत्थर से भी अधिक कठोर हृदय वाली नारी है, क्योंकि उन्हें इन तीनों को वनवास देते समय तनिक भी दया नहीं आई। दूसरी ओर राजा दशरथ को भी बुद्धिहीन समझकर कहती हैं कि राजा दशरथ ने उचित – अनुचित का भी विचार नहीं किया, उन्होंने भी पत्नी का कहा माना और उन्हें वन भेज दिया। ये तीनों तो इतने सुन्दर और मनोहर हैं कि इनसे बिछुड़कर इनके प्रियजन कैसे जीवित रहेंगे? हे सखी! ये तीनों तो आँखों में बसाने योग्य हैं। इनको अपने से दूर नहीं किया जा सकता। इन्हें किस कारण वनवास दे दिया गया है? ये तो सदैव अपने सामने रखने योग्य हैं।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने ग्रामीण स्त्रियों के माध्यम रानी कैकेयी की कठोरता तथा राजा दशरथ को राज-काज न जानने वाला बताया है।
भाषा ब्रज
शैली मुक्तक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार और करुण
छन्द सवैया
शब्द-शक्ति अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘पबि पाहन’, ‘कान कियो’, ‘मनोहर मूरति’ और ‘सखि राखिबे’ में क्रमशः ‘प’, ‘क’, ‘म’ और ‘ख’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) पद्यांश में ‘ऐसी मनोहर मूरति ए’ तीनों (श्रीराम, सीता और लक्ष्मण) के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसमें अनुप्रास अलंकार है ।
(v) गाँव की स्त्रियाँ श्री राम, सीता और लक्ष्मण को वन में जाते हुए देखकर वार्तालाप कर रही थीं कि ये तीनों कितने सुन्दर हैं? और इनको किसने वनवास दिया है? इनसे बिछुड़कर इनके प्रियजन कैसे जीवित रहेंगे?
(vi) तत्सम रूप- पाहन – पाषाण
जान्यो- जानती
अजानी- अज्ञानी
13. सीस जटा, उर बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी सी भौंहैं।
तून सरासन बान धरे, तुलसी बन मारग में सुठि सोहैं । ।
सादर बारहिं बार सुभाय चितै तुम त्यों हमरो मन मोहैं।
पूछति ग्राम बधू सिय सों कहौ साँवरे से, सखि रावरे को हैं ? ‘ ।।
M. imp [2022, 18, 14, 12]
शब्दार्थ सीस – सर; उर – वक्षस्थल; बिसाल – विशाल; तिरीछी-तिरछी; तून – तरकश; बान- बाण, तीर; सरासन – धनुष; सुठि -अच्छी तरह; सुभाय- सुशोभित।
प्रश्न
(i) दिए गए पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को वन जाते हुए देखकर ग्रामीण स्त्रियाँ उत्सुकतावश सीता जी से प्रश्न पूछती हैं।
(ii) व्याख्या गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ग्रामीण स्त्रियाँ सीता जी से पूछती हैं कि जिनके सिर पर जटाएँ हैं, जिनकी भुजाएँ और हृदय विशाल हैं, लाल नेत्र हैं, तिरछी भौंहें हैं, जिन्होंने तरकश, बाण और धनुष सँभाल रखे हैं, जो वन मार्ग में अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं, जो बार-बार आदर और रुचि या प्रेमपूर्ण चित्त के साथ तुम्हारी ओर देखते हैं, उनका यह सौन्दर्य हमारे मन को मोहित कर रहा है। ग्रामीण स्त्रियाँ सीता जसे प्रश्न पूछती हैं कि हे सखी! बताओ तो सही, ये साँवले से मनमोहक तुम्हारे कौन हैं?
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में ग्रामीण स्त्रियों की उत्सुकता का सहज चित्रण हुआ है।
भाषा ब्रज
शैली मुक्तक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द सवैया
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘बाहु बिसाल’, ‘बिलोचन लाल’, ‘सरासन बान’, ‘सादर बारहिं’ और ‘सावरे से सखि’ में क्रमश: ‘ब’, ‘ल’, ‘न’, ‘र’ और ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
14. सुनि सुन्दर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली ।
तिरछे करि नैन दे सैन तिन्है समुझाइ कछू मुसकाइ चली ।।
तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै अवलोकति लोचन-लाहु अली ।
अनुराग-तड़ाग में भानु उदै बिगसी मनो मंजुल कंज – कली ।।
शब्दार्थ सुनि-सुनकर ; बैन – वचन; सुधारस – अमृतमयी; सयानी – चतुर; तिन्है- उनको; औसर-अवसर ; उदैदै – उदय; कंज-कली- कमल की कलियाँ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) ‘अनुराग-तड़ाग’ तथा ‘मनो मंजुल कंज – कली’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में ग्रामीण स्त्रियों को सीता द्वारा संकेतों के माध्यम श्रीराम के विषय में बताया गया है।
(ii) व्याख्या कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि जब ग्रामीण स्त्रियों ने सीता जसे श्रीराम के विषय में पूछा कि ये साँवले और सुन्दर रूप वाले तुम्हारे क्या लगते हैं तो उनकी यह अमृतरूपी मधुर वाणी सुनकर सीता जी जान गईं कि ये स्त्रियाँ बहुत चतुर हैं, वे उनके मनोभावों को समझ गईं कि ये प्रभु (श्रीराम) के साथ मेरा सम्बन्ध जानना चाहती हैं, तब सीता जी ने उनके प्रश्न का उत्तर अपनी मुस्कुराहट तथा संकेत भरी दृष्टि से ही दे दिया। ये मेरे पति हैं और अपने नेत्रों को तिरछा करके मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गईं।
तुलसीदास जी कहते हैं कि उस समय वे स्त्रियाँ श्रीराम की सुन्दरता को एकटक देखती हुई, अपने नेत्रों को आनन्द प्रदान करने लगीं अर्थात् उनके सौन्दर्य को देखकर अपने जीवन को धन्य मानने लगीं। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रेम के सरोवर में रामरूपी सूर्य उदित हो गया हो और उन ग्रामीण स्त्रियों के नेत्ररूपी कमल की सुन्दर कलियाँ खिल गई हों।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
भाषा ब्रज
शैली चित्रात्मक व मुक्तक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द सवैया
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘सुनि सुन्दर’, ‘जानकी जानी’, ‘तुलसी तेहि’ और ‘लोचन लाहु’ में क्रमशः ‘स’, ‘ज’, ‘त’ और ‘ल’ वर्ण की पुनरावृत्ति से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
रूपक अलंकार ‘सुधारस साने’ में उपमेय और उपमान में कोई भेद नहीं है इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है ।
उत्प्रेक्षा अलंकार ‘मनो मंजुल कंज कली’ में उपमेय में उपमान की सम्भावना को व्यक्त किया गया है। इसलिए यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है ।
(iv) ‘अनुराग तड़ाग’ में अनुराग (उपमेय) व तड़ाग ( उपमान) में भेदरहित आरोप होने के कारण रूपक अलंकार है तथा ‘मनो मंजुल कंज – कली’ में उपमेय में उपमान की सम्भावना को व्यक्त किया गया है, इसलिए यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।

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