UP Board Class 10 Hindi Chapter 10 – झाँसी की रानी की समाधि पर (काव्य-खण्ड)
UP Board Class 10 Hindi Chapter 10 – झाँसी की रानी की समाधि पर (काव्य-खण्ड)
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 झाँसी की रानी की समाधि पर (काव्य-खण्ड)
जीवन-परिचय
स्वतन्त्रता संग्राम की सक्रिय सेनानी, राष्ट्रीय चेतना की अमर गायिका एवं वीर रस की एकमात्र कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म वर्ष 1904 में इलाहाबाद के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। इन्होंने प्रयाग के ‘क्रॉस्थवेट गर्ल्स कॉलेज’ में शिक्षा प्राप्त की। 15 वर्ष अवस्था में इनका विवाह खण्डवा के ठाकुर लक्ष्मणसिंह चौहान के साथ हुआ। विवाह के बाद गाँधी जी की प्रेरणा से ये पढ़ाई-लिखाई छोड़कर देश सेवा में सक्रिय हो गईं तथा राष्ट्रीय कार्यों में भाग लेने लगीं। इन्होंने कई बार जेल – यात्राएँ भी कीं । माखनलाल चतुर्वेदी की प्रेरणा से इनकी देशभक्ति का रंग और भी गहरा हो गया। वर्ष 1948 में एक मोटर दुर्घटना में इनकी असामयिक मृत्यु हो गई।
साहित्यिक परिचय
सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाओं में देशभक्ति एवं राष्ट्रीयता का स्वर मुखरित हुआ है । इनके काव्य की ओजपूर्ण वाणी ने भारतीयों में नवचेतना का संचार किया। इनकी अकेली कविता ‘झाँसी की रानी’ ही इन्हें अमर कर देने के लिए पर्याप्त है। इनकी कविता ‘वीरों का कैसा हो वसन्त’ भी राष्ट्रीय भावनाओं को जगाने वाली ओजपूर्ण कविता है। इन्होंने राष्ट्रीयता के अलावा वात्सल्य भाव से सम्बन्धित कविताओं की भी रचना की।
कृतियाँ (रचनाएँ)
सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपने साहित्यिक जीवन में भले ही कम रचनाएँ लिखीं, लेकिन उनकी रचनाएँ अद्वितीय हैं। देशभक्ति की भावना को काव्यात्मक रूप प्रदान करने वाली इस कवयित्री की रचनाएँ निम्नलिखित हैं।
काव्य संग्रह मुकुल और त्रिधारा ।
कहानी संकलन सीधे-सादे चित्र, बिखरे मोती तथा उन्मादिनी ।
‘मुकुल’ काव्य संग्रह पर इनको ‘सेकसरिया’ पुरस्कार प्रदान किया गया।
भाषा-शैली
सुभद्रा जी की भाषा सरल एवं खड़ी बोली है। इनकी शैली सरल एवं सुबोध है। इनकी रचना – शैली में ओज, प्रसाद और माधुर्य भाव से युक्त गुणों का तथा राष्ट्रीयता पर आधारित इनकी कविताओं में सजीव एवं ओजपूर्ण शैली का प्रयोग हुआ है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
सुभद्रा जी हिन्दी साहित्य में अकेली ऐसी कवयित्री हैं, जिन्होंने राष्ट्र-प्रेम को जगाने ‘वाली कविताएँ लिखीं। इनकी कविताओं ने भारतीयों को स्वतन्त्रता संग्राम में स्वयं को झोंक देने के लिए प्रेरित किया। इन्होंने नारी की जिस निडर छवि को प्रस्तुत किया, वह नारी जगत् के लिए अमूल्य देन है। हिन्दी साहित्य में इनको गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी ।
जल कर जिसने स्वतन्त्रता की, दिव्य आरती फेरी ।।
यह समाधि, यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की।
अन्तिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ।।
शब्दार्थ दिव्य- अलौकिक; फेरी – उतारना; लीलास्थली – कर्मस्थली; मरदानी – पुरुषों के समान ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) . रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
अथवा प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘काव्य खण्ड’ के ‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवयित्री ‘सुभद्रा कुमारी . चौहान’ द्वारा रचित ‘त्रिधारा’ से लिया गया है।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान और उनकी समाधि की गौरव गाथा प्रस्तुत की है।
(ii) व्याख्या लक्ष्मीबाई की समाधि की ओर संकेत करते हुए कवयित्री कहती हैं कि उस समाधि में उस वीरांगना की राख छिपी हुई है, जिसने स्वयं जलकर स्वतन्त्रता देवी की आरती उतारी थी अर्थात् जिस प्रकार आरती उतारने के लिए दीपक या कपूर आदि जलाया जाता है, उसी प्रकार रानी लक्ष्मीबाई ने आरती के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर दिया था। कवयित्री कहती हैं कि यह समाधि स्थल भले ही छोटा-सा है, किन्तु यह रानी लक्ष्मीबाई के साहस एवं वीरतापूर्ण बड़े-बड़े कारनामों की यादों को अपने अन्दर समेटे हुए है। यह स्थली झाँसी की रानी की अन्तिम लीला स्थली है। उस वीर महिला ने वीरता एवं साहस से युद्ध करते हुए अंग्रेजों के विरुद्ध अपना आखिरी युद्ध लड़ा था और इस महान् महिला को यहीं वीरगति प्राप्त हुई थी।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
भाषा सरल, सुबोध खड़ी बोली
शैली ओजपूर्ण आख्यानक गीति
गुण प्रसाद एवं ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द – शक्ति अभिधा
2. यहीं कहीं पर बिखर गई वह,
भग्न विजयमाला – सी ।
उसके फूल यहाँ संचित हैं,
है यह स्मृतिशाला-सी । ।
सहे वार पर वार अंत तक,
लड़ी वीर बाला-सी ।
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर,
चमक उठी ज्वाला-सी । ।
शब्दार्थ बिखर गई – फैल गई; भग्न – खण्डित; फूल – अस्थियाँ; संचित – एकत्रित; स्मृतिशाला – स्मारक, स्मृति भवन; सहे सहन करना; वार – आघात ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में रानी लक्ष्मीबाई ने किसके साथ युद्ध किया?
(v) रानी लक्ष्मीबाई की अस्थियाँ संचित क्यों हैं?
(vi) उपर्युक्त पद्यांश में किसकी वीरता का वर्णन किया गया है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग इन पंक्तियों में रानी लक्ष्मीबाई की वीरता एवं अत्यन्त साहस का वर्णन है, जिसमें उन्हें वीरगति प्राप्त हुई।
(ii) व्याख्या कवयित्री रानी लक्ष्मीबाई को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करती हुई कहती हैं कि इसी समाधि के आस-पास वह वीर महिला टूटी हुई विजयमाला के समान बिखर गई थीं अर्थात् उनकी विजयरूपी माला टूट कर यहीं बिखर गई थी। वे इस विजयमाला को और आगे न ले जा सकीं, क्योंकि वे अंग्रेजों से युद्ध करते-करते शहीद हो गई थीं।
रानी की अस्थियाँ इसी समाधि में संचित हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को उनकी वीरता के स्मृति चिह्न के रूप में याद दिलाएँगी तथा देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देंगी।
रानी लक्ष्मीबाई अपने जीवन के अन्तिम क्षणों तक अंग्रेज सैनिकों की तलवारों के वार पर वार सहती रहीं। जिस तरह यज्ञ में हवन सामग्री की आहुति पड़ते ही ज्वाला प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार रानी के इस बलिदान ने स्वतन्त्रता की वेदी पर आहुति का काम किया। लोगों में इससे स्वतन्त्रता पाने की लालसा भड़क उठी और वे क्रान्ति के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो गए। रानी के युद्धभूमि में इस प्रकार वीरगति पाने से उनका यश चारों ओर फैल गया।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने रानी द्वारा किए गए वीरता एवं साहसपूर्ण युद्ध का वर्णन किया है, जिसमें रानी शहीद हो गईं।
भाषा सरल, सुबोध खड़ी-बोली
शैली ओजपूर्ण आख्यानक गीति
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति अभिधा
अलंकार
रूपक अलंकार रानी की अस्थियों को फूल रूपी अस्थियाँ कहा गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है।
उपमा अलंकार ‘विजयमाला-सी’, ‘स्मृतिशाला-सी’, ‘वीर बाला सी’, ‘ आहुति – सी’ और ‘ज्वाला-सी’ में समानता दिखाने के कारण यहाँ उपमा अलंकार है।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में रानी लक्ष्मीबाई ने वीरता एवं साहस के साथ अंग्रेजों से युद्ध किया।
(v) रानी लक्ष्मीबाई की अस्थियाँ समाधि में इसलिए संचित हैं, क्योंकि ये आने वाली पीढ़ियों को उनकी वीरता के स्मृति चिह्न के रूप में याद दिलाएँगी तथा देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देंगी।
(vi) उपर्युक्त पद्यांश में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का वर्णन किया गया है।
3. बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से ।
मूल्यवती होती सोने की, भस्म यथा सोने से।।
रानी से भी अधिक हमें अब, यह समाधि है प्यारी ।
यहाँ निहित है स्वतन्त्रता की, आशा की चिनगारी । ।
शब्दार्थ मान-सम्मान, रण-युद्ध; मूल्यवती-मूल्यवान; निहित रखी हुई ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
अथवा प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा अलंकार है?
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कायरों तथा वीरों की निशानी क्या बताई गई है?
(v) झाँसी की रानी की समाधि हमें बहुत प्रिय क्यों है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने बताया है कि रानी लक्ष्मीबाई ने देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया, जिससे रानी का गौरव और भी बढ़ गया है।
(ii) व्याख्या कवयित्री कहती है कि युद्धभूमि से पलायन करना कायरों की निशानी है तथा युद्ध करते हुए वीरगति पाना वीरों की निशानी है। स्वतन्त्रता की रक्षा करते हुए वीरगति पाने से वीरों का मान बढ़ जाता है। रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गईं, इसलिए उनका मान भी ऐसे बढ़ गया, जैसे सोने से भी अधिक मूल्यवान उसकी भस्म होती है।
रानी ने भी अपना बलिदान देकर हम भारतीयों में स्वतन्त्रता की ज्योति जलाई है, इसलिए उनकी यह समाधि हमें बहुत प्रिय है। इस समाधि में स्वतन्त्रता रूपी आशा की चिंगारी छिपी हुई है, जो अग्नि के रूप में फैलकर हम भारतीयों को भविष्य में अन्य किसी की दासता से मुक्त होने के लिए प्रेरित करती रहेगी ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने रानी की समाधि को अधिक प्रिय होने तथा देश के लिए बलिदान देने पर उनकी महत्ता बढ़ने का भाव व्यक्त किया है।
भाषा सरल-सुबोध खड़ी-बोली
शैली ओजपूर्ण आख्यानक गीति
गुण ओज एवं प्रसाद
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति अभिधा
अलंकार
रूपक अलंकार ‘आशा की चिनगारी’ में आशा रूपी चिंगारी की बात की गई, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में युद्धभूमि से पलायन करना कायरों की निशानी है तथा युद्ध करते हुए वीरगति पाना वीरों की निशानी है।
(v) झाँसी की रानी की समाधि हमें प्रिय इसलिए है, क्योंकि इस समाधि में लक्ष्मीबाई के बलिदान के रूप में स्वतंत्रता रूपी चिंगारी छिपी हुई है, जो अग्नि के रूप में फैलकर हम भारतीयों को संघर्ष करने की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी।
4. इससे भी सुन्दर समाधियाँ,
हम जग में हैं पाते।
उनकी गाथा पर निशीथ में,
क्षुद्र जन्तु ही गाते ।।
पर कवियों की अमर गिरा में,
इसकी अमिट कहानी।
स्नेह और श्रद्धा से गाती है,
वीरों की बानी ।
शब्दार्थ निशीथ-रात्रि; क्षुद्र जन्तु – झींगुर, छोटे-छोटे प्राणी; गिरा – वाणी; अमिट—कभी न मिटने वाला; स्नेह-प्रेम; बानी – वाणी ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
अथवा प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा अलंकार है ?
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि को श्रेष्ठ क्यों बताया गया है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने रानी की समाधि की अन्य समाधियों तुलना करते हुए, उनकी समाधि को श्रेष्ठ बताया है।
(ii) व्याख्या कवयित्री कहती हैं कि हमारे देश में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि से सुन्दर अनेक समाधियाँ देखने को मिलती हैं, परन्तु उन समाधियों का महत्त्व इस समाधि की तरह नहीं है। उन समाधियों पर क्षुद्र जन्तु; जैसे – कीड़े-मकोड़े, छोटे-छोटे जीव-जन्तु; जैसे – झींगुर और छिपकलियाँ आदि ही रात में गाते हैं। तात्पर्य यह है कि वे समाधियाँ गौरव-गान करने के लायक नहीं हैं, वे उपेक्षित हैं, तभी तो उन पर छोटे-छोटे जीव-जन्तु निवास करते हैं। रानी लक्ष्मीबाई की गौरव से परिपूर्ण एक ऐसी समाधि है, जिसकी अमिट कहानी कवियों की अमर वाणी से सदा गाई जाती रहेगी। इस देश के लोग स्नेह और श्रद्धा से वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की अमर कथा का गुणगान करते हैं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि को अन्य समाधियों से श्रेष्ठ बताया गया है।
भाषा सरल, साहित्यिक खड़ी बोली
शैली ओजपूर्ण आख्यानक गीति
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘सुन्दर समाधियाँ’ और ‘अमर गिरा’ में ‘स’ और ” वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि को श्रेष्ठ इसलिए बताया गया है, क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई की समाधि गौरव से परिपूर्ण एक ऐसी समाधि है, जिसकी अमिट कहानी कवियों की अमर वाणी से सदा गाई जाती रहेगी। देश के लोग स्नेह और श्रद्धा से वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की अमर कथा का गुणगान करते हैं, जबकि अन्य सुन्दर समाधि पर क्षुद्र जन्तुः जैसे- कीड़े-मकोड़े, छोटे-छोटे जीव जन्तु आदि रात में गाते हैं। इसलिए रानी की समाधि श्रेष्ठ है।
5. बुंदेले हरबोलों के मुख, हमने सुनी कहानी ।
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी।।
यह समाधि, यह चिर समाधि है, झाँसी की रानी की।
अन्तिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की।।
शब्दार्थ चिर- जो बहुत दिनों तक बना रहे; मुख-मुँह, मरदानी-वीरांगना; लीलास्थली- क्रीडास्थल |
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने रानी के बलिदान और उनके जीवन – काल की अन्तिम कर्मस्थली के रूप में समाधि का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या रानी की वीरता और बलिदान की अमर कथा हम भारतीयों ने बुंदेले और हरबोले जातियों के मुख से सुनी है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई एक ऐसी वीरांगना थीं, जिन्होंने पुरुषों के समान देश की स्वतन्त्रता के लिए शत्रुओं से भयंकर युद्ध किया। समाधि के विषय में कवयित्री का कहना है कि यह समाधि दीर्घव्यापी है। यह पुरुषों के समान युद्ध करने वाली रानी लक्ष्मीबाई की अन्तिम कर्मस्थली है। इस समाधि का महत्त्व हम भारतीयों के हृदय में सदा अंकित रहेगा।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा सरल साहित्यिक खड़ी बोली
शैली ओजपूर्ण आख्यानक गीति
गुण ओज एवं प्रसाद
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘बुंदेले हरबोलो’, ‘लक्ष्मी मरदानी’ में क्रमश: ‘ल’ और ‘म’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
