UP Board Class 10 Hindi Chapter 3 – भारतीय संस्कृति (गद्य खंड)
UP Board Class 10 Hindi Chapter 3 – भारतीय संस्कृति (गद्य खंड)
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 3 भारतीय संस्कृति (गद्य खंड)
जीवन-परिचय
सफल राजनीतिज्ञ और प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार भारत रत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर, 1884 ई. में बिहार राज्य के छपरा जिले के जीरादेई नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम महादेव सहाय था। इनका परिवार गाँव के सम्पन्न और प्रतिष्ठित कृषक परिवारों में से था। ये अत्यन्त मेधावी छात्र थे। इन्होंने कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) विश्वविद्यालय से एम. ए. और कानून की डिग्री एल. एल. बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सदैव प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले राजेन्द्र प्रसाद ने मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में अध्यापन कार्य किया । इन्होंने वर्ष 1911 में वकालत शुरू की और वर्ष 1920 तक कोलकाता और पटना में वकालत का कार्य किया। उसके पश्चात् वकालत छोड़कर देश सेवा में लग गए। इनका झुकाव प्रारम्भ से ही राष्ट्रसेवा की ओर था। वर्ष 1917 में गाँधी जी के आदर्शों और सिद्धान्तों से प्रभावित होकर इन्होंने चम्पारण के आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया और वकालत छोड़कर पूर्णरूप से राष्ट्रीय स्वतन्त्रता-संग्राम में कूद पड़े। अनेक बार जेल की यातनाएँ भी भोगीं। इन्होंने विदेश जाकर भारत के पक्ष को विश्व के सम्मुख रखा । डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तीन बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सभापति और वर्ष 1962 तक भारत के राष्ट्रपति रहे। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ इनके जीवन का मूल मन्त्र था। वर्ष 1962 में इन्हें भारत रत्न से अलंकृत किया गया। जीवनपर्यन्त हिन्दी और हिन्दुस्तान की सेवा करने वाले डॉ. प्रसाद जी का देहावसान पटना के ‘सदाकत आश्रम’ में 28 फरवरी, 1963 को हो गया।
रचनाएँ
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं
भारतीय शिक्षा, गाँधीजी की देन, शिक्षा और संस्कृत साहित्य, मेरी आत्मकथा, बापूजी के कदमों में, मेरी यूरोप यात्रा, संस्कृत का अध्ययन, सत्याग्रह एट चम्पारण, चम्पारण में महात्मा गाँधी और खादी का अर्थशास्त्र, इण्डिया डिवाइडेड आदि।
भाषा-शैली
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की भाषा सरल, सुबोध और व्यावहारिक है। इनके निबन्धों में संस्कृत, उर्दू, अंग्रेज़ी, बिहारी शब्दों का प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त जगह-जगह ग्रामीण कहावतों और शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। इन्होंने भावानुरूप छोटे-बड़े वाक्यों का प्रयोग किया है। इनकी भाषा में बनावटीपन नहीं है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की शैली भी उनकी भाषा की तरह ही आडम्बर रहित है।
इसमें इन्होंने आवश्यकतानुसार ही छोटे-बड़े वाक्यों का प्रयोग किया है। इनकी शैली के मुख्यतः दो रूप प्राप्त होते हैं- साहित्यिक शैली और भाषण शैली।
हिन्दी साहित्य में स्थान
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ‘सरल-सहज भाषा और गहन विचारक’ के रूप में सदैव याद किए जाएँगे। यही सादगी इनके साहित्य में भी दृष्टिगोचर होती है। हिन्दी साहित्य में उनकी सुप्रसिद्ध पुस्तक ’मेरी आत्मकथा’ का विशेष स्थान है। ये हिन्दी के अनन्य सेवक और उत्साही प्रचारक थे, जिन्होंने हिन्दी की जीवनपर्यन्त सेवा की। इनकी सेवाओं का हिन्दी जगत सदैव ऋणी रहेगा। ये बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा उत्तर प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति भी रहे।
पाठ का सार
परीक्षा में ‘पाठ के सारांश’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाएगा। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।
भारत : विविधताओं का देश
कोई विदेशी, जो भारत से अपरिचित हो, वह भारत को देखकर इसे एक देश नहीं, बल्कि कई देशों का समूह कहेगा। यहाँ प्राकृतिक विभिन्नताएँ इतनी अधिक समृद्ध हैं कि उतनी किसी देश में नहीं। उत्तर में हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों से दक्षिण की ओर बढ़ने पर गंगा-यमुना व ब्रह्मपुत्र के समतल मैदान मिलते हैं। इनसे आगे. बढ़ते ही विन्ध्य, अरावली, सतपुड़ा, सह्याद्रि, नीलगिरि की पहाड़ियों के बीच समतल रंग-बिरंगे भाग दिखाई देते हैं।
अनेकता में एकता
हमारे देश को ऊपर से देखने पर भाषा, धर्म व जाति के आधार पर विभिन्नता ही नजर आएगी, परन्तु इसके नीचे फैली एकता और समता की भावना इन विभिन्नताओं को उसी प्रकार समेटे हुए है, जैसे रेशमी धागे में गुँथी मोतियों की ऐसी माला, जो अपनी सुन्दरता से दूसरों को आकर्षित करती है और दूसरों की सुन्दरता से स्वयं भी सुशोभित होती है। यह एक ऐतिहासिक सत्य है, यहाँ भिन्न-भिन्न जाति एवं सम्प्रदाय के लोग अलग-अलग नामों से भारत के महासमुद्र में रह रहे हैं। इसे ही भारतीय संस्कृति नाम दिया गया है।
भारतीय संस्कृति का मूलाधार – सत्य और अहिंसा
सत्य और अहिंसा का अमरत्व अनन्त काल से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारे देश में बह रहा है। यह हमारी हड्डियों में नई मज्जा डालकर मृतप्राय शरीर में जान डाल रहा है। यह पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक बन गया है। हमारे देश में व्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता, सामूहिक और सामाजिक विकास के लिए लोकतन्त्र की स्थापना की गई है। किसी व्यक्ति की उन्नति और विकास जब दूसरे की उन्नति और विकास में बाधक बनते हैं, तो संघर्ष उत्पन्न होता है। इससे बचने का सबसे अच्छा उपाय अहिंसा है, जिसका दूसरा नाम ‘त्याग’ है।
सांस्कृतिक स्थिरता की भावना
वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के भयानक परिणामों के पश्चात् भी हम स्वयं को सुरक्षित कैसे रख पाए, इसके दो कारण हैं- पहला यह कि विभिन्न प्राकृतिक और मानवीय विपदाओं के पड़ने पर भी हम विचलित नहीं हुए, हमारी सृजनात्मक शक्ति कम नहीं हुई। देश में साम्राज्य बने और मिटे, सम्प्रदायों का उत्थान – पतन हुआ, विदेशियों द्वारा हराए गए, किन्तु फिर भी हमने अपना धैर्य नहीं छोड़ा। हमारे बुरे समय में भी हमारे देश में समय-समय पर ऐसे मनीषी व कर्मयोगी पैदा होते रहे, जिन्होंने देश के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक व बौद्धिक गौरव को समाप्त नहीं होने दिया ।
सामाजिक कल्याण की भावना को प्रमुखता
यदि हम अपने देश में उन सब अन्यायों व अत्याचारों को दोहराना नहीं चाहते, तो हमें अपनी अर्थव्यवस्था, ऐतिहासिक, नैतिक चेतना तथा अपनी संस्कृति को ध्यान में रखकर बनानी होगी। इसमें हमें व्यक्तिगत लाभ, भोग व स्वार्थों को छोड़कर सामाजिक कल्याण की भावना जाग्रत करनी होगी।
भारतीय संस्कृति में समन्वय की भावना
भारतीय संस्कृति को बनाए रखने के लिए प्रत्येक प्रादेशिक भाषा की रचनाओं को देवनागरी लिपि में छपवाया जाए, जिससे उनका आनन्द सभी भारतीय ले सकें। इसके अतिरिक्त ऐसी साहित्यिक संस्थाओं की भी स्थापना की जाए, जो इन भाषाओं का आदान-प्रदान अनुवाद के द्वारा करें। इससे अच्छे साहित्य का निर्माण होगा तथा सम्पूर्ण धरती पर भारतीय संस्कृति का प्रचार व प्रसार होगा।
गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. आज हम इसी निर्मल, शुद्ध, शीतल और स्वस्थ अमृत की तलाश में हैं और हमारी इच्छा, अभिलाषा और प्रयत्न यह है कि वह इन सभी अलग-अलग बहती हुई नदियों में अभी भी उसी तरह बहता रहे और इनको वह अमर-तत्त्व देता रहे, जो जमाने के हजारों थपेड़ों को बरदाश्त करता हुआ भी आज हमारे अस्तित्व को कायम रखे हुए है और रखेगा। Imp [2023, 16] .
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) हमारे अस्तित्व को कौन कायम रखे हुए है ?
अथवा लेखक के अनुसार हमारा अस्तित्व किस कारण से आज भी कायम है?
(घ) भारतीय संस्कृति रूपी विशाल सागर का जल किसके द्वारा मलिन हो गया है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘गद्य खण्ड’ में संकलित पाठ ‘भारतीय संस्कृति’ से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और साहित्यकार ‘डॉ. राजेन्द्र प्रसाद’ हैं।
(ख) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कहते हैं कि भारतीय संस्कृति रूपी विशाल सागर में आकर गिरने वाली जाति, धर्म, भाषा आदि नदियों में एकता का जल अमृत की भाँति बह रहा है, परन्तु आज यह जल राजनैतिक स्वार्थ, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता आदि के कारणवश मैला होता जा रहा है। हमें आज भी उस अमृत-तत्त्व की तलाश है, जो सदियों पूर्व प्रवाहित होता था, जिसने भारतीय संस्कृति को स्थिरता प्रदान की । हमारी यह इच्छा है कि सभी लोगों में प्रेम एवं राष्ट्रीयता की भावना का संचार हो, यह तभी सम्भव है, जब विभिन्न विचारधाराओं के रूप में इन नदियों में सदैव यह जल अमृत के समान प्रवाहित होता रहे। भारतीय संस्कृति में विभिन्नता में एकता एक ऐसा अमृत-तत्त्व है, जो आज भी विद्यमान है। उसी अमृत-तत्त्व के आधार पर ही भारतीय संस्कृति का भविष्य भी उज्ज्वल होगा तथा भारतीय संस्कृति का अस्तित्व सदैव विद्यमान रहेगा।
(ग) हमारे अस्तित्व को कायम रखने वाला अमृत – तत्त्व ‘भारतीय संस्कृति की एकता’ है।
(घ) भारतीय संस्कृति रूपी विशाल सागर का जल साम्प्रदायिकता, स्वार्थपरता आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता आदि के कारण मलिन हो गया है।
2. यह एक नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत है, जो अनन्तकाल से प्रत्यक्ष या 2 अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण देश में बहता रहा है और कभी-कभी मूर्त रूप होकर हमारे सामने आता रहा है। यह हमारा सौभाग्य रहा है कि हमने ऐसे ही मूर्त रूप को अपने बीच चलते-फिरते, हँसते-रोते भी देखा है और जिसने अमरत्व की याद दिलाकर हमारी सूखी हड्डियों में नई मज्जा डालं हमारे मृतप्राय शरीर में नए प्राण फूँके और मुरझाए हुए दिलों को फिर खिला दिया। वह अमरत्व सत्य और अहिंसा का है, जो केवल इसी देश के लिए नहीं, आज मानवमात्र जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक हो गया है। हम इस देश में प्रजातन्त्र की स्थापना कर चुके हैं, जिसका अर्थ है, व्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता, जिसमें वह अपना पूरा विकास कर सके और साथ ही सामूहिक और सामाजिक एकता भी। M. Imp · [2024, 22, 20, 15, 13]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) लेखक ने अमरत्व का स्रोत किसे बताया है?
(घ) मानव मात्र के लिए वर्तमान में क्या आवश्यक हो गया है?
(ङ) ‘प्रजातन्त्र’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक कहता है कि भारतीय संस्कृति में विद्यमान अमृत-तत्त्व का स्रोत नैतिक और आध्यात्मिक है, जो अनन्तकाल से ही प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से समस्त देश में प्रवाहित होता चला आ रहा है। यह कभी-कभी प्रत्यक्ष रूप में किसी-न-किसी महान पुरुष के रूप में भी जन्म लेता रहा है। यह हम भारतीयों का सौभाग्य है कि हमने अपने बीच चलते-फिरते, हँसते-रोते हुए महात्मा गाँधी के रूप को प्रत्यक्ष रूप में देखा है। महात्मा गाँधी ने इस संस्कृति को अमरता प्रदान की है। इनके माध्यम से ही भारत को उसकी अमरता का पाठ पुनः पढ़ाया गया है। इन्हीं के मूर्त रूप ने परतन्त्रता के परिणामस्वरूप निराशा से मुरझाए हुए मन में आशा रूपी ऊर्जा का संचार किया। हमारी सूख चुकी हड्डियों को अमृत-तत्त्व की स्मृति दिलाकर उसमें नई मज्जा प्रदान की। सत्य और अहिंसा के तत्त्वों ने ही भारत को नव-जीवन और ताजगी प्रदान की है।
(ग) लेखक ने अमरत्व का स्रोत भारतीय संस्कृति को बताया है।
(घ) मानव मात्र के लिए वर्तमान में सत्य और अहिंसा का अमरत्व आवश्यक हो गया है।
(ङ) प्रजातन्त्र से आशय है – व्यक्ति की वह पूर्ण स्वतन्त्रता, जिसमें वह स्वयं का सम्पूर्ण विकास कर सके और साथ ही सामूहिक तथा सामाजिक एकता को भी विकसित कर सके ।
3. हमारी सारी संस्कृति का मूलाधार इसी अहिंसा-तत्त्व पर स्थापित रहा है। जहाँ-जहाँ हमारे नैतिक सिद्धान्तों का वर्णन आया है, अहिंसा को ही उनमें मुख्य स्थान दिया गया है। अहिंसा का दूसरा नाम या दूसरा रूप त्याग है और हिंसा का दूसरा रूप या दूसरा नाम स्वार्थ है, जो प्रायः भोग के रूप में हमारे सामने आता है। पर हमारी सभ्यता ने तो भोग भी त्याग ही से निकाला है और भोग भी त्याग में ही पाया है। श्रुति कहती है- ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः । इसी के द्वारा हम व्यक्ति और व्यक्ति के बीच का विरोध, व्यक्ति और समाज के बीच का विरोध, समाज और समाज के बीच का विरोध, देश और देश के बीच के विरोध को मिटाना चाहते हैं। हमारी सारी नैतिक चेतना इसी तत्त्व से ओत-प्रोत है। Imp [2023, 19, 17, 16]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(ग) हमारी सभ्यता की विशेषता क्या रही है?
(घ) हमारे नैतिक सिद्धान्तों में किस चीज को प्रमुख स्थान दिया गया है? इसका दूसरा रूप क्या है?
(ङ) लेखक के अनुसार, संघर्ष कैसे दूर हो सकता है?
(च) पारस्परिक विरोध को कैसे मिटाया जा सकता है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत्।
(ख) लेखक कहता है कि अहिंसा तत्त्व हमारी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का मूल तत्त्व है। जहाँ कहीं भी हमारे ग्रन्थों में नैतिक सिद्धान्तों की चर्चा की गई है, वहाँ मन, वचन और कर्म से अहिंसा का उल्लेख अवश्य किया गया है। लेखक के अनुसार, अहिंसा ही त्याग है और त्याग ही अहिंसा है। अहिंसा ” और त्याग एक-दूसरे के पूरक हैं। ठीक इसी प्रकार हिंसा का अन्य नाम व रूप स्वार्थ है। यह स्वार्थ ही प्रायः भोग बनकर हमारे सामने आता है। हिंसा ही स्वार्थ है और स्वार्थ का पर्याय हिंसा है। जब मनुष्य स्वार्थ के कारण किसी अन्य को हानि पहुँचाता है, तब हिंसा का जन्म होता है। उपनिषद् में भी कहा गया है— ‘संसार का भोग त्याग की भावना से करो । ‘ एक समाज का दूसरे समाज से तथा एक देश का दूसरे देश से संघर्ष होने के पीछे का कारण भी भोग ही है। यदि हम त्याग की भावना रखते हैं, तो इस संघर्ष को समाप्त कर सकते हैं। आशय यह है कि यदि हमें समाज से सभी विरोध और संघर्षों का समापन करना है, तो हमें अपनी भावनाओं में नैतिक चेतना को इसी तत्त्व से सम्पन्न करना होगा।
(ग) हमारी सभ्यता की विशेषता है ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ अर्थात् ‘भोग त्याग से ‘ही निकलता है और भोग त्याग में ही पाया जाता है । ‘
(घ) हमारे नैतिक सिद्धान्तों में अहिंसा को प्रमुख स्थान दिया गया है। गद्यांश के अनुसार, इसका दूसरा रूप त्याग है।
(ङ) लेखक के अनुसार, सबके विकास के पथ यदि अहिंसा के हों, तो संघर्ष दूर हो सकता है।
(च) पारस्परिक विरोध को ‘तेन त्यक्तेन भुज्जीथा:’ की भावना से मिटाया जा सकता है, जिसका अर्थ होता है- ‘जो त्याग करते हैं, वे ही भोग पाते हैं।’
4. ‘हमने भिन्न-भिन्न विचारधाराओं को स्वच्छन्दतापूर्वक अपने-अपने रास्ते बहने दिया। भिन्न-भिन्न धर्मों और सम्प्रदायों को स्वतन्त्रतापूर्वक पनपने और भिन्न-भिन्न भाषाओं को विकसित और प्रस्फुटित होने दिया। भिन्न-भिन्न देशों की संस्कृतियों को अपने में मिलाया और अपने को उनमें मिलने दिया और देश तथा विदेश में एकसूत्रता तलवार के जोर से नहीं, बल्कि प्रेम और सौहार्द से स्थापित की। दूसरों के हाथों और पैरों पर, घर और सम्पत्ति पर ज़बरदस्ती कब्जा नहीं किया, उनके हृदयों को जीता और इसी वजह से प्रभुत्व, जो चरित्र और चेतना का प्रभुत्व है, आज भी बहुत अंशों में कायम है, अब हम स्वयं उस चेतना को बहुत अंशों में भूल गए हैं और भूलते जा रहे हैं। [2023]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ग) हमारा चरित्र और प्रभुत्व आज भी क्यों कायम है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता के बारे में लेखक बताता है कि हम भारतीयों ने अन्य देशों के लोगों को सहजता से स्वीकार किया और स्वयं में इस प्रकार घुल-मिल जाने दिया, मानो वे हमारे ही अभिन्न अंग रहे हों। हम भारतीयों ने अपनी शक्ति के बल पर विदेशों में अपनी विचारधारा थोपने का प्रयास नहीं किया। हमने प्रेम – सद्भाव और भाईचारे के बल पर ही अपनी विचारधारा को स्थापित किया। भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रेम और मित्रता की भावना से दो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को एक किया। हम भारतीयों ने कभी दूसरों के शारीरिक अंगों, धन-दौलत, घर, सम्पत्ति आदि पर बलपूर्वक कब्जा नहीं किया, बल्कि उनके दिलों को प्रेम और सौहार्द से जीतने का प्रयास किया। इसका प्रभाव भी स्पष्ट है कि भारतीयों का प्रभाव दूसरे देशों के लोगों पर बना हुआ है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हम अपने उस गुण को भूलते जा रहे हैं, जिसके कारण दूसरों पर हम अपना प्रभाव जमाए हुए थे।
(ग) हमारा ( भारतीयों का) प्रभुत्व और चरित्र आज भी इसलिए कायम है, क्योंकि इसे तलवार की ताकत और मार-काट के सहारे नहीं, बल्कि प्रेम और सौहार्द के बल पर दूसरों के दिलों को जीतकर कायम किया गया है।
5. दूसरी बात, जो इस सम्बन्ध में विचारणीय है, वह यह है कि संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना ही हमारे देश के प्राण हैं। इसी नैतिक चेतना के सूत्र से हमारे नगर और ग्राम, हमारे प्रदेश और सम्प्रदाय, हमारे विभिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में बँधी हुई हैं। जहाँ उनमें सब तरह की विभिन्नताएँ हैं, वहाँ उन सब में यह एकता है। इसी बात को ठीक तरह से पहचान लेने से बापू ने जनसाधारण को बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में क्रान्ति करने और तत्पर रहने के लिए इसी नैतिक चेतना का सहारा लिया था । अहिंसा, सेवा और त्याग की बातों से जनसाधारण का हृदय इसीलिए आन्दोलित हो उठा, क्योंकि उन्हीं से तो वह शताब्दियों से प्रभावित और प्रेरित रहा। M. Imp • [2022, 18, 16, 14, 11]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) लेखक ने भारतीय संस्कृति की एकता और उसके बल का क्या महत्त्व बताया है?
(घ) बापू ने क्रान्ति के लिए किसका सहारा लिया था?
(ङ) जनसाधारण का हृदय किन बातों से आन्दोलित हो उठा और क्यों?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि विश्व की प्रसिद्ध जातियाँ मिट गईं, लेकिन हम भारतीयों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्वयं को सुरक्षित रखते हुए अपने आध्यात्मिक एवं बौद्धिक गौरव को सुरक्षित बनाए रखा। हम भारतीयों की सामूहिक जागरूकता का नैतिक आधार पहाड़ों भी मजबूत, समुद्र से भी गहरा और आकाश से भी अधिक विस्तृत है। लेखक कहते हैं कि सामूहिक चेतना के विषय में दूसरी बात, जो विचार करने योग्य है, वह यह है कि यही संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना हमारे भारत देश के प्राण हैं। इस देश के समस्त नगर और ग्राम, सभी प्रदेश और सम्प्रदाय, विभिन्न वर्ग और जातियाँ इसी नैतिक चेतना के सहारे आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना ही विभिन्न नगर और ग्राम, प्रदेश और सम्प्रदाय तथा विभिन्न वर्ग एवं जातियों की एकता का आधार है। इस बात को गाँधीजी ने अच्छी तरह समझा था, इसलिए उन्होंने जनसाधारण को बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में क्रान्ति करने के लिए, इसी नैतिक चेतना को अपना सम्बल (सहारा) बनाया था।
(ग) लेखक ने भारतीय संस्कृति की एकता और उसके बल का यह महत्त्व बताया है कि इसी एकता के बल को हथियार बनाकर गाँधी जी, क्रान्ति लाने में सफल हुए, जिससे भारतीयों को गुलामी से मुक्ति मिली थी।
(घ) बापू ने क्रान्ति के लिए नैतिक चेतना का सहारा लिया था ।
(ङ) जनसाधारण का हृदय अहिंसा, सेवा और त्याग की बातों से आन्दोलित. हो उठा, क्योंकि इन्हीं के कारण जनसाधारण शताब्दियों से प्रभावित और प्रेरित रहा।
6. आज विज्ञान मनुष्यों के हाथों में अद्भुत और अतुल शक्ति दे रहा है, उसका उपयोग एक व्यक्ति और समूह के उत्कर्ष और दूसरे व्यक्ति और के गिराने में होता ही रहेगा, इसलिए हमें उस भावना को जाग्रत रखना है और उसे जाग्रत रखने के लिए कुछ ऐसे साधनों को भी हाथ में रखना होगा, जो उस अहिंसात्मक त्याग-भावना को प्रोत्साहित करें और भोग भावना को दबाए रखें। नैतिक अंकुश के बिना शक्ति मानव के लिए हितकर नहीं होती। वह नैतिक अंकुश यह चेतना या भावना ही दे सकती है। वही उस शक्ति को परिमित भी कर सकती है और उसके उपयोग को नियन्त्रित भी। M. Imp * [2022, 18, 16, 14, 11]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ग) उपरोक्त गद्यांश में लेखक ने मानव को क्या सन्देश दिया है?
अथवा लेखक ने गद्यांश में मानव को क्या सन्देश देना चाहा है?
(घ) विज्ञान का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है?
(ङ) विज्ञान की शक्ति के सन्तुलित उपयोग के लिए किस भावना को जागृत रखना आवश्यक है ?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहता है कि आधुनिक युग विज्ञान का युग है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने मनुष्य को अद्भुत एवं अतुलनीय शक्ति प्रदान की है, किन्तु विज्ञान से प्राप्त शक्तियों का प्रयोग मानव द्वारा उचित रूप से नहीं किया जा रहा है। जहाँ एक ओर मनुष्य विज्ञान द्वारा प्रदान की गई शक्ति का प्रयोग अपने तथा अपने समूह के विकास व उत्थान में करता है, वहीं दूसरी ओर दूसरे व्यक्ति एवं दूसरे समूह को गिराने के लिए करता है। मनुष्य की इस प्रवृत्ति को देखते हुए हमें कुछ ऐसे साधनों का निर्माण करना होगा, जिससे समाज एवं राष्ट्र में ऐसी भावना जाग्रत हो, जिससे विज्ञान की शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए अहिंसात्मक त्याग की भावना को प्रोत्साहित किया जा सके। यदि विज्ञान की शक्ति पर नैतिक मूल्यों का नियन्त्रण नहीं लगाया जाएगा, तो यह मानव के लिए हितकारी सिद्ध नहीं हो सकेगा। नैतिक अंकुश (बन्धन) के माध्यम से ही विज्ञान की असीमित शक्ति सीमित हो सकती है और उसका उपयोग विनाश के स्थान पर निर्माण के लिए किया जा सकता है।
(ग) उपरोक्त गद्यांश में लेखक ने यह सन्देश दिया है कि नैतिक अंकुश द्वारा उत्पन्न त्याग और अहिंसा की भावना से ही विज्ञान का दुरुपयोग रोका जा सकता है तथा उसकी शक्ति का सदुपयोग किया जा सकता है।
(घ) विज्ञान का उपयोग एक व्यक्ति या समूह के उत्कर्ष और दूसरे व्यक्ति या समूह को गिराने के लिए किया जा रहा है।
(ङ) विज्ञान की शक्ति के सन्तुलित उपयोग के लिए हमें नैतिकता के अंकुश पर आधारित भावना को जागृत रखना आवश्यक है।
7. वर्तमान युग में भारतीय संस्कृति के समन्वय के प्रश्न के अतिरिक्त यह बात भी विचारणीय है कि भारत की प्रत्येक प्रादेशिक भाषा की सुन्दर और आनन्दप्रद कृतियों का स्वाद भारत के अन्य प्रदेशों के लोगों को कैसे चखाया जाए? मैं समझता हूँ कि इस बारे में दो बातें विचारणीय हैं। क्या इस सम्बन्ध में यह उचित नहीं होगा कि प्रत्येक भाषा की साहित्यिक संस्थाएँ उस भाषा की कृतियों को संघ-लिपि अर्थात् देवनागरी में छपवाने का आयोजन करें। मुझे विश्वास है कि कम से कम जहाँ तक उत्तर की भाषाओं का सम्बन्ध है, यदि वे सब अपनी कृतियों को देवनागरी में छपवाने लगें, तो उनका स्वाद लगभग सारे उत्तर भारत के लोग आसानी से ले सकेंगे, क्योंकि इन सब भाषाओं में इतना साम्य है कि एक भाषा का अच्छा ज्ञाता दूसरी भाषा की कृतियों को स्वल्प परिश्रम से समझ जाएगा। [2009]
प्रश्न
(क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) रेखांकित अंशों में से किसी एक अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) कृतियों को देवनागरी लिपि में छपवाने का सुझाव क्यों दिया गया है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक कहता है कि आज हमें भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए उसके विभिन्न तत्त्वों में समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है। इस समन्वय के सन्दर्भ में लेखक एक उपाय की ओर संकेत करते हुए कहता है कि हमारी साहित्यिक कृतियाँ इस विषय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। प्रत्येक प्रादेशिक भाषा में आनन्द प्रदान करने वाली व्यक्ति की विचारधारा में परिवर्तन करके उसमें नैतिकता और चरित्र का विकास करने वाली साहित्यिक कृतियाँ मौजूद हैं, किन्तु यहाँ सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी प्रादेशिक भाषा में मुद्रित किसी कृति का रसास्वादन अन्य भाषा-भाषी प्रदेश के लोगों को कैसे कराया जाए। इन कृतियों के ज्ञान-विज्ञान को दूसरे प्रदेशों के लोगों तक पहुँचाने के लिए इन कृतियों का दूसरी प्रादेशिक भाषाओं उत्तम अनुवाद किया जाना आवश्यक है । यहाँ लेखक एक और सुझाव देता हैं कि सभी भाषाओं की कृतियों का दूसरे प्रदेशों की सभी भाषाओं में अनुवाद किया जाना सम्भव नहीं है, किन्तु उन सबका भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी की देवनागरी लिपि में अनुवाद करने में कोई समस्या नहीं है। देवनागरी लिपि में अनुवाद करने का सुझाव देने के पीछे लेखक का मन्तव्य सम्भवतः यही है कि भारत के प्रत्येक भाषा-भाषी को राष्ट्रभाषा हिन्दी का इतना ज्ञान अवश्य हो कि वह उसे पढ़ और समझ सके।
(ग) कृतियों को देवनागरी लिपि में मुद्रित कराने का सुझाव देने के पीछे लेखक का मन्तव्य यह है कि प्रत्येक भारतवासी को राष्ट्रभाषा हिन्दी का इतना ज्ञान अवश्य हो कि वह इसे भली-भाँति पढ़ व समझ सके ।
