UP Board Class 10 Hindi Chapter 5 – आरुणि-श्वेतकेतु-संवाद: (संस्कृत-खण्ड)
UP Board Class 10 Hindi Chapter 5 – आरुणि-श्वेतकेतु-संवाद: (संस्कृत-खण्ड)
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 आरुणि-श्वेतकेतु-संवाद: (संस्कृत-खण्ड)
गद्यांशों का सन्दर्भ – सहित अनुवाद
1. श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तूं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम् । न वै सौम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति।
[2024]
सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित “छांदोग्य उपनिषद् षष्ठोध्यायः’ से ” आरुणि श्वेतकेतु संवाद” नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद श्वेतकेतु आरुणि का पुत्र था। श्वेतकेतु से उसके पिता ने कहा कि है श्वेतकेवु ! किसी गुरु के आश्रम में जाकर तुम ब्रह्मचर्य की साधना करो। क्योंकि हमारे वंश में कोई भी केवल ‘ब्रह्म बन्धु’ (अर्थात् केवल ब्राह्मणों का सम्बन्धी अथवा स्वयं वेदों को न जानने वाला) नहीं रहा, अर्थात् तुम्हारे सभी पूर्वज ब्रह्म ज्ञानी हुए हैं।
2. सह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशति वर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय । तँ ह हपितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद वह श्वेतकेतुं बारह वर्ष तक गुरु के समीप रहते हुए 24 वर्ष की आयु तक सभी वेदों का अध्ययन करके बड़े ही गर्वित भाव से अपने घर वापस आया। तब उसके पिता आरुणि ने कहा हे पुत्र श्वेतकेतु ! अपने गुरु से जो कुछ सीखा गया है वह मुझे बताओ, तब महान मन वाला पुत्र श्वेतकेतु पिता के द्वारा यह पूछने पर स्तब्ध रह गया। तुम जो इतने बड़े मन वाले, अपने आपको पूरा विद्वान समझते हो, वह उपदेश भी कभी पूछा है।
3. येनाश्रुत श्रुतम् भवत्मयमतं । मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः से आदेशो भवतीति।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद आरुणि ने पुत्र श्वेतकेतु से पूछा हे वत्स! क्या तुम्हारे गुरु जी ने वह उपदेश तुम्हें समझाया है, जिससे सारा अज्ञात ज्ञात हो जाता है।
4. यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञात् स्माद्वाचारम्भणं विकारी नाम धेयम्मृत्तिकेत्येव सत्यम्।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद हे सोम्य ! जैसे एक मिट्टी के पिण्ड से सम्पूर्ण मृन्मय (मिट्टी से बने ) पदार्थों का ज्ञान हो जाता है, क्योंकि विकार केवल वाणी के आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मिट्टी ही है।
5. यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञात्, स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद हे सोम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणि (सोने का टुकड़ा) का ज्ञान होने पर सम्पूर्ण लोहमय (सोने से युक्त) पदार्थ जान लिए जाते हैं, क्योंकि विकार वाणी पर अवलम्बित नाममात्र हैं, सत्य तो केवल लोह (सोना) है।
6. यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञात् स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवँ सोम्य स आदेशो भवतीति।।.
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद और जैसे हे सोम्य! एक नाखून काटने वाले से लोहे की संपूर्ण वस्तु का ज्ञान हो जाता है, क्योंकि विकार वाणी पर अवलंबित नाममात्र हैं, सत्य तो केवल लोहा है। इस प्रकार हे सोम्य! वह उपदेश (आदेश) होता है।
7. न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्धयेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवां स्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच।
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद निश्चय ही वह भगवन् (मेरे गुरुदेव) इसे नहीं जानते थे। यदि वे जानते, तो मुझसे क्यों न कहते अर्थात् मुझे अवश्य बताते । (अतः) अब आप ही मुझे इसके बारे में बतलाइए। तब पिता ने कहा, “अच्छा सोम्य! बतलाता हूँ।”
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. श्वेतकेतु : कस्य पुत्रः आसीत्?
अथवा श्वेतकेतु: कः आसीत्?
उत्तर- श्वेतकेतुः आरुणेः पुत्रः असीत्।
प्रश्न 2. श्वेतकेतुः कति वर्षाणि उपेत्य विद्याध्ययनम् अकरोत् ?
उत्तर- श्वेतकेतुः द्वादश वर्षाणि उपेत्य विद्याध्ययनम् अकरोत् ।
प्रश्न 3. कः वेदान् अधीत्य स्तब्ध एयाय?
उत्तर- श्वेतकेतुः सर्वान् वेदान् अधीत्य स्तब्ध एयाय ।
प्रश्न 4. ब्रह्मबन्धुरिव कस्य कुले न अभवत्?
उत्तर- ब्रह्मबन्धुरिव श्वेतकेतोः कुले न अभवत्।
प्रश्न 5. “आरुणिः श्वेतकेतुः संवादः” कस्मात्, ग्रन्थात् उद्धृतः अस्ति ?
उत्तर- “आरुणिः श्वेतकेतुः संवादः” छान्दोग्योपनिषदस्य षष्ठोध्यायात् उद्घृतः अस्ति।
प्रश्न 6. आरुणिः श्वेतकेतुं किम् अकथयत् ?
उत्तर- आरुणिः श्वेतकेतुः अकथयत् यत् श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम् न वै सौम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ।
प्रश्न 7. आरुणिः कः आसीत्? [2024]
उत्तर- आरुणिः श्वेतकेतोः पिता आसीत् ।
प्रश्न 8. कः ब्रह्मचर्यवासम् अकरोत् ?
उत्तर- श्वेतकेतुः ब्रह्मचर्यवासम् अकरोत्।
