UP Board Class 10 Hindi Chapter 5 – क्या लिखें? (गद्य खंड)
UP Board Class 10 Hindi Chapter 5 – क्या लिखें? (गद्य खंड)
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 क्या लिखें? (गद्य खंड)
जीवन-परिचय
द्विवेदी युग के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 1894 ई. में छत्तीसगढ़ राज्य के खैरागढ़ ‘नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम श्री उमराव बख्शी और पितामह का नाम बाबा पुन्नालाल बख्शी था। इन दोनों का साहित्य से विशेष लगाव था। इनकी माता भी साहित्यानुरागिनी थीं। ऐसे ही परिवेश में इनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा हुई। अतः परिवार के साहित्यिक वातावरण का गहरा प्रभाव इनके मन पर भी पड़ा और ये विद्यार्थी जीवन से ही कविता लिखने लगे । इन्होंने बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् साहित्य-सेवा को अपना लक्ष्य बनाया तथा कहानी और कविता लेखन शुरू किया, जो ‘हितकारिणी’ और उत्तरोत्तर अन्य पत्रों में छपने लगा। द्विवेदी जी के सम्पर्क में आने पर इनकी रचनाएँ ‘सरस्वती’ पत्रिका में छपने लगी। इनके लेखन कौशल से द्विवेदी जी इतने प्रभावित थे कि ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन इनके हाथों में सौंपकर निश्चिन्त हो गए। कई वर्षों तक इस पत्रिका का सम्पादन करने के उपरान्त ये खैरागढ़ चले गए और शिक्षण कार्य करने लगे। वर्ष 1971 में, 77 वर्ष की आयु में यह साहित्यकार इस दुनिया को छोड़कर चला गया।
रचनाएँ
बख्शीजी मननशील विद्वान तथा प्रतिभा के धनी थे। इन्होंने साहित्य, कला, नाटक, काव्य और आलोचना आदि से सम्बन्धित विषयों की रचनाएँ कीं। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं
- कहानी संग्रह अंजलि और झलमला।
- आलोचना विश्व साहित्य, हिन्दी साहित्य विमर्श, हिन्दी उपन्यास साहित्य, हिन्दी कहानी साहित्य आदि ।
- निबन्ध संग्रह पंच-पात्र, प्रबन्ध-पारिजात, कुछ यात्री, कुछ बिखरे पन्ने और पद्मवन।
- अनूदित रचनाएँ प्रायश्चित्त, उन्मुक्ति का बंधन और अन्नपूर्णा ।
- आत्मकथा मेरी अपनी कथा |
- काव्य संग्रह शतदल और अश्रुदल
- सम्पादन सरस्वती और छाया।
भाषा-शैली
बख्शी जी की भाषा का अपना एक आदर्श है। इनकी भाषा में जटिलता और रूखापन नहीं है। इनकी रचनाओं में यत्र-तत्र उर्दू के शब्द भी मिलते हैं, तो कहीं-कहीं अंग्रेजी के व्यावहारिक शब्दों का प्रयोग भी किया गया है। इन शब्दों के प्रयोग से भाषा की सरसता एवं प्रवाहमयता में वृद्धि हुई है। इनके निबन्धों में भावात्मक, व्याख्यात्मक और विचारात्मक शैलियों के दर्शन होते हैं।
हिन्दी साहित्य में स्थान
महावीरप्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आने से बख्शी जी की साहित्यिक प्रतिभा में निखार आया। इन्होंने कई प्रभावपूर्ण कृतियों की रचना की, जिससे इन्हें प्रसिद्धि मिली। इनके निबन्ध उच्चकोटि के विचारात्मक, आलोचनात्मक एवं समीक्षात्मक श्रेणी के थे। इनकी कहानियाँ भावना प्रधान एवं मर्मस्पर्शी थीं। बख्शी जी एक कुशल सम्पादक एवं अनुवादक भी थे। इन्होंने अंग्रेजी एवं बांग्ला के कई नाटकों एवं कहानियों का अनुवाद कर हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने में अपना योगदान दिया।
पाठ का सार
परीक्षा में ‘पाट के सारांश’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाएगा। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।
लेखन कला के बारे में
अंग्रेजी के लेखक ए. जी. गार्डिनर के अनुसार लेखन कार्य एक विशेष मानसिक स्थिति में ही किया जा सकता है। उस समय मन में कुछ ऐसी स्फूर्ति, उमंगें व आवेग उत्पन्न होते हैं कि लेखक को लिखना ही पड़ता है। उस समय उसे विषय के बारे में सोचने की चिन्ता भी नहीं होती चाहे कोई भी विषय हो, वह उसी में अपने सारे मनोभावों को भर देता है।
लेखक की मन:स्थिति तथा लेखन सम्बन्धी कठिनाई
लेखक के मन में कभी न तो ऐसे भाव स्वयं उत्पन्न हुए और न ही उन्होंने कभी ऐसी स्थिति का अनुभव किया। उन्हें तो लिखने के लिए परिश्रमपूर्वक चिन्तन और मनन करना पड़ता है। लेखक ने लिखा है कि आज तो उन्हें विशेष परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि उनकी पुत्रियों नमिता और अमिता ने क्रमश: ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ तथा ‘समाज-सुधार’ विषय पर निबन्ध लिखने के लिए कहा है। उन्हें इन दोनों विषयों पर निबन्ध लिखने ही पड़ेंगे।
लेखक के सामने कठिनाई यह है कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ पर पाँच पेज कैसे लिखे जाएँ ? और यही स्थिति ‘समाज-सुधार’ पर लिखने वाले निबन्ध की है।
आदर्श निबन्ध की कसौटियाँ / पहचान
लेखक ने देखा कि एक विद्वान का कथन है कि छोटा निबन्ध बड़े निबन्ध की अपेक्षा अच्छा रहता है, क्योंकि बड़े निबन्ध में रचना की सुन्दरता नहीं रहती। लेखक को भी अपना हित छोटा निबन्ध लिखने में दिखाई दे रहा है। अब वह निबन्ध की अगली कसौटी – सामग्री और शैली के बारे में चिन्तन करता है।
निबन्ध की रूपरेखा और शैली
विद्वानों का कहना है कि निबन्ध लिखने से पूर्व उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए, पर लेखक यह नहीं सोच पा रहा है कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ की रूपरेखा कैसी हो ? वह निबन्ध लिखने के बाद उसका संक्षिप्त सारांश तो लिख सकता है, लेकिन निबन्ध का सार पहले कैसे लिखे ? लेखक ने यह सुना था कि ए. जी. गार्डिनर को अपने लेखों का शीर्षक लिखने में कठिनाई होती थी। यही स्थिति प्रसिद्ध नाटककार शेक्सपीयर की थी, एक बार उन्होंने एक नाटक का नाम ‘जैसा तुम चाहो’ ही रख दिया था । लेखक कहता है कि अब मैं यह रूपरेखा तैयार नहीं कर सकता, इसलिए मुझे अब पहले निबन्ध की शैली निश्चित करनी है।
अंग्रेजी निबन्धकारों की पद्धति
अंग्रेजी निबन्धकारों ने स्वयं जो कुछ देखा, सुना व अनुभव किया, उसी को अपने निबन्धों में लिख दिया। इन निबन्धों में न तो कवि की उदात्त कल्पना है और न ही सूक्ष्म दृष्टि न तर्क-वितर्क की बातें। वे तो मन की स्वच्छन्द रचनाएँ हैं। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति और सच्चे भावों की अभिव्यक्ति व उल्लास है। इन निबन्धों को लिखने में न ज्ञान की गरिमा होती है न कल्पना का महत्त्व ।
दूर के ढोल सुहावने होने का कारण
दूर के ढोल इसलिए सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँच पाती है। एक ओर ढोल के पास बैठे व्यक्ति के कान का पर्दा फटता है, तो दूसरी ओर वही शब्द नदी किनारे बैठे व्यक्ति के मन में मधुरता का संचार करते हैं।
युवा वर्ग तथा वृद्ध वर्ग का संसार के प्रति दृष्टिकोण
जो युवा लोग हैं, उन्हें अपना भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल प्रतीत होता है। वे हमेशा भविष्य की कल्पनाओं में ही खोए रहते हैं, साथ ही वे क्रान्ति के समर्थक होते हैं। इस कारण वे भविष्य को वर्तमान में ही लाना चाहते हैं। दूसरी ओर वृद्ध जो वर्तमान से कभी सन्तुष्ट नहीं होते, उन्हें अपना अतीत ही सुन्दर लगता है। वे अपने अतीत को ही वर्तमान में लाना चाहते हैं। इस प्रकार वे दोनों ही अपने वर्तमान से असन्तुष्ट रहते हैं, इसलिए समय-समय पर सुधार आन्दोलन चलाए जाते हैं और वर्तमान सदैव सुधारों का काल बना रहता है।
गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. आज मुझे लिखना ही पड़ेगा। अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबन्ध लेखक ए. जी. गार्डिनर का कथन है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ आवेग – सा उत्पन्न होता है कि लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिन्ता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु हैट है, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु है, विषय नहीं । [2017]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ग) प्रस्तुत गद्यांश में ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उदाहरण क्यों दिया गया है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘गद्य खण्ड’ में संकलित पाठ ‘ क्या लिखूँ ?’ नामक ललित निबन्ध से उद्धृत है। इसके लेखक ‘श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी’ हैं।
(ख) अंग्रेजी के विख्यात निबन्धकार ए. जी. गार्डिनर के अनुसार, लेखन कार्य करने के लिए एक विशेष प्रकार की मानसिक स्थिति या मनोदशा का होना आवश्यक होता है। इसके लिए जब मन उल्लास, उत्साह एवं आनन्द से भर उठता है, हृदय में एक विशेष प्रकार की ताजगी के भाव की अनुभूति होने लगती है तथा मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार की आवेगपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तब बिना किसी कारण तथा विषय की चिन्ता किए बिना लेखक स्वत: ही लिखने के लिए बाध्य हो जाता है। मनोभावों के अतिरेक की इस स्थिति में लेखक स्वतः ही लेखन के लिए तत्पर हो जाता है और उसकी लेखनी मन के भावों की अभिव्यक्ति करने लगती है। इस प्रकार मनोदशा में लेखक के लिए न तो किसी विषय का और न ही किसी शैली का कोई महत्त्व होता है। लेखक का एकमात्र उद्देश्य अपने भावों व विचारों की अभिव्यक्ति करना रह जाता है।
(ग) प्रस्तुत गद्यांश में ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उदाहरण क्रमशः मन के भावों और विषय के लिए दिया गया है। गार्डिनर महोदय, हैट (मनोभावों) को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं, खूँटी अर्थात् विषय को नहीं, जैसे हैट किसी भी खूँटी पर टाँगा जा सकता है, उसी प्रकार यदि मनोभाव हों, तो किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है।
2. उन्होंने स्वयं जो कुछ भी देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबन्धों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबन्धों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छन्द रचनाएँ हैं। उनमें न कविता की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गम्भीर तर्कपूर्ण विवेचना । उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती हैं। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ये निबन्ध तो उस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं। [2017]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) निबन्ध लेखन के लिए आवश्यक मानसिक स्थिति को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक कहता है कि निबन्धों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे हृदय की बन्धनमुक्त रचनाएँ होती हैं। इसमें कविता के समान श्रेष्ठ कल्पना की अपेक्षा यथार्थ प्रधान होता है। इसमें कहानी लेखन के समान सूक्ष्म दृष्टि और विद्वानों के समान गम्भीर एवं तर्कपूर्ण वर्णन की आवश्यकता भी नहीं होती । निबन्ध लेखन में लेखक अपने मन की सच्ची भावनाओं को स्वतन्त्रता और स्वानुभूति के साथ अभिव्यक्त करता है। निबन्ध लिखते समय लेखक अपने भावों को जिस रूप में चाहता है, उसी रूप में व्यक्त करता है। स्वच्छन्दतावादी निबन्ध में लेखक को विवेचनात्मक शैली अपनाने की आवश्यकता कभी नहीं होती । निबन्ध लेखन में सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है। इसमें किसी काव्य-रचना की भाँति कोरी कल्पना का सहारा नहीं लिया जाता है।
निबन्ध लेखन में जब लेखक के हृदय में उल्लास भरा होता है, तब वह स्वतः ही अपने अनुभवों को लिखता चलता स्वच्छन्दतावादी निबन्ध लेखक अपने निबन्धों के माध्यम से हृदय की सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति करते हैं। ये निबन्ध उनकी उस मनोदशा में लिखे जाते हैं, जिसमें उन्हें न तो शान की गरिमा होती है और न ही काव्य-रचना की भाँति कल्पना की आवश्यकता की, बल्कि और अपने आस-पास देखकर जो अनुभव लेखक करते हैं तथा जो भाव उनके मन में आते हैं, उन्हीं अनुभवों और भावों को ग्रहण कर वे रचना के रूप में अभिव्यक्त करने का प्रयास करते हैं।
(ग) निबंध लेखन के लिए किसी विशेष मानसिक स्थिति की आवश्यकता नहीं होती। अंग्रेजी निबन्धकारों द्वारा निबन्ध ऐसी स्थिति में लिखे जाते हैं, जिनमें न तो ज्ञान की गरिमा होती है और न ही कल्पना की ऊँची उड़ान । इनमें केवल लेखक के मनोभावों की स्वच्छन्द उड़ान होती है।
3. जो तरुण संसार के जीवन संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है, जो वृद्ध हो गए हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल . होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत। वर्तमान से दोनों को असन्तोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत के गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमानकाल सदैव सुधारों का काल बना रहता है। M. Imp [2024, 20, 18, 17, 15, 12]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए |
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) वर्तमान समय सुधारों का समय क्यों बना रहता है?
अथवा लेखक ने वर्तमानकाल को सुधारों का काल क्यों कहा है?
(घ) युवा और वृद्ध व्यक्तियों के वैचारिक अन्तर को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक कहता है कि तरुण अर्थात् जिन नवयुवकों ने जीवन में आने वाली कठिनाइयों, समस्याओं का सामना नहीं किया है और वे केवल सुखों से ही परिचित हैं, उनके लिए यह संसार अत्यन्त आकर्षक और सुन्दर प्रतीत होता है। वे इस सुन्दर संसार में अपने जीवन की मनोरम कल्पनाएँ करते हैं। जीवन-संघर्षो से अपरिचित होने के कारण उन्हें जीवन रूपी दूर के ढोल सुहावने लगते हैं, जबकि जो लोग अपना बचपन, युवावस्था और प्रौढ़ावस्था पार कर वृद्धावस्था में कदम बढ़ा चुके हैं, उन्हें अपने अतीत का गीतं गाना अच्छा लगता है। एक ओर नवयुवकों से भविष्य अभी दूर है, तो दूसरी ओर वृद्धों से उनका बचपन पीछे छूट गया है। यही कारण है कि युवा भविष्य के और वृद्ध बचपन के सपने देखते रहते हैं। लेखक कहता है कि तरुण और वृद्ध दोनों ही अपने वर्तमान से असन्तुष्ट दिखते हैं।
युवा वर्ग अपने उत्साह और साहस से वर्तमान को बदल देना चाहते हैं, जबकि वृद्धजन बीते समय को बेहतर मानते हैं। वे सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना चाहते हैं। इसी संघर्ष में दोनों का जीवन तनाव भरा हो जाता है। युवा अपने भविष्य के सपने वर्तमान में ही पूरा कर लेना चाहते हैं, जबकि वृद्ध अपने बचपन के सुखमय दिनों को वापस वर्तमान में लाना चाहते हैं, जोकि सम्भव नहीं है। इससे नवयुवक अपने वर्तमान को सुधारने में लगे रहते हैं और वृद्धजन अपनी गौरवपूर्ण संस्कृति की रक्षा में प्रयासरत दिखते हैं। वृद्ध और युवा पीढ़ी के बीच यही स्थिति तनाव का कारण बनती है तथा दोनों के बीच मतभेद चलते रहते हैं। यही कारण है कि वर्तमान सदैव दुःखी बने रहने के साथ-साथ सुधार का युग बना रहता है।
(ग) वर्तमान समय सुधारों का समय इसलिए बना रहता है, क्योंकि युवा हो या वृद्ध, सभी अपने वर्तमान से दुःखी रहते हैं। युवा अपने भविष्य के सपनों को वर्तमान में ही पूरा कर लेना चाहते हैं, जबकि वृद्ध अपने बचपन का गुणगान करते रहते हैं। वर्तमान की यथार्थ स्थिति से वे असन्तुष्ट रहते हैं। इसी कारण लेखक ने वर्तमानकाल को सुधारों का काल कहा है।
(घ) युवा और वृद्ध व्यक्तियों में वैचारिक अन्तर यह है कि युवा भविष्य को सुधारने में लगे रहते हैं और वृद्ध अपने अतीत को वर्तमान में देखना चाहते हैं। युवाओं के लिए भविष्य उज्ज्वल होता है। वे भविष्य को वर्तमान में खींच लाना चाहते हैं। वे क्रान्ति के पक्षधर होते हैं। इसके विपरीत वृद्धों को उनका बचपन आकर्षक लगता है। वे अतीत के गौरव का संरक्षण करते रहते हैं।
4. मनुष्य जाति इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गए हैं पर सुधारों का अन्त कब हुआ ? भारत के इतिहास में बुद्ध देव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द और महात्मा गाँधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नए-नए क्षेत्र उत्पन्न होते जाते हैं और नए-नए सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अन्त है और न सुधारों का, जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं और उन सुधारों का फिर नवसुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है। Imp [ 2018, 16]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
(ग) समाज में समाज-सुधारकों की गणना क्यों समाप्त नहीं होती है?
(घ) दोषों का अन्त क्यों नहीं होता है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक कहता है कि मानव जाति के इतिहास में कोई ऐसा समय नहीं रहा है, जिसमें बुराइयाँ व्याप्त न रही हों। वह काल चाहे आदिकाल हो, मध्यकाल हो या फिर आधुनिक काल ही क्यों न हो। मानव समाज में जैसे-जैसे प्रगति होती जाती है, वैसे-वैसे मनुष्य प्रगति के पथ पर बढ़ता जाता है और दोषों (बुराइयों) का निराकरण कराता रहता है। इससे दोष धीरे-धीरे समाप्त होते जाते हैं।
समाज में सुधारकों की कमी नहीं है। इनकी गणना करना आसान नहीं है। प्रत्येक नगर और गाँव में सुधारकों के दल मिल जाएँगे। इसी क्रम में नए-नए क्षेत्र उत्पन्न होते जाते हैं, नई बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं और उनमें सुधार खोजे जाते रहते हैं।
इस प्रकार दोष और उनके सुधार की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। जब समय बीतता है, तो भूतकाल में किए गए सुधार वर्तमान काल में पुनः दोष रूप में परिवर्तित हो जाते हैं और उनमें पुनः सुधार किए जाने की आवश्यकता प्रतीत होने लगती है। फिर उनका सुधार और नवसुधार किया जाता है। इन्हीं सुधारों और परिवर्तनशीलता के कारण मानव जीवन को प्रगतिशील माना गया है।
(ग) समाज में नए-नए क्षेत्र उत्पन्न होने से उनमें दोष उत्पन्न होते हैं, जिनमें सुधार किया जाता है। इसके कुछ समय पश्चात् यही सुधार देश, काल और परिस्थिति की माँग के अनुसार दोष बन जाते हैं, जिससे नवसुधार आवश्यकं हो जाता है। समाज में सुधार का यह क्रम अनवरत चलता रहता है। इस कारण समाज में समाज सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती है।
(घ) दोषों का अन्त इसलिए नहीं होता है, क्योंकि दोषों में आज जो सुधार किया जाते हैं, वही सुधार देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार धीरे-धीरे पुनः दोष में बदल जाता है।
5. हिन्दी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है । पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा और आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान पर तरुणों का फिर दूसरा दल आ जाएगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। M. Imp [2024, 20, 18, 16, 14, 11, 10]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
(ग) प्रगतिशील साहित्य निर्माता क्या समझकर साहित्य निर्माण कर रहे हैं?
(घ) प्रस्तुत गद्यांश में प्रगतिशीलता से क्या तात्पर्य है?
(ङ) ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक का मानना है कि वर्तमान में साहित्यकारों द्वारा ऐसे साहित्य की रचना की जा रही है, जिसमें नई विचारधारा के पोषक तत्त्व हैं। इन साहित्यकारों का मानना है कि इनमें भविष्य की असीम सम्भावना छिपी है, जिस पर युवा पीढ़ी गर्व कर सकेगी, परन्तु कुछ समय बाद उनका साहित्य भी अतीत हो जाएगा अर्थात् वह अपनी आधुनिकता को खोकर अतीत का प्रतीक बन जाएगा।
जिस प्रकार, आज का युवा कालान्तर में वृद्धावस्था में पहुँच जाता है और वह अतीत की यादों में खोकर उसे अच्छा समझता है। उसी प्रकार, साहित्य भी सदैव आधुनिक नहीं रहता । युवा साहित्यकारों द्वारा नवीन साहित्य का सृजन किया जाएगा, क्योंकि देश, काल की माँग के अनुसार पुराना साहित्य अपनी प्रासंगिकता खो बैठता है, तब नव साहित्य का सृजन अत्यावश्यक हो जाता है, जो युवा साहित्यकारों द्वारा समय-समय पर किया जाता है।
(ग) प्रगतिशील साहित्य निर्माता यह समझकर साहित्य निर्माण कर रहे हैं कि उनका साहित्य भविष्य का गौरव समेटे हुए है। इस साहित्य पर युवा पीढ़ी गर्व कर सकेगी, क्योंकि इसमें भविष्य की सम्भावनाएँ और आवश्यकताओं को तलाश कर मानव की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास किया गया है।
(घ) प्रस्तुत गद्यांश में प्रगतिशीलता से तात्पर्य निरन्तर होने वाले बदलाव या सुधार से है, जिसमें एक समय बाद पुनः नए सुधार की सम्भावना हो जाती है।
(ङ) ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ से तात्पर्य है कि दूर की चीजों का अच्छा लगना या दूर से सब कुछ अच्छा लगना ।
