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UP Board Class 10 Hindi Chapter 5 – स्वदेश प्रेम (काव्य-खण्ड)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 5 – स्वदेश प्रेम (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 स्वदेश प्रेम (काव्य-खण्ड)

जीवन-परिचय
राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत काव्य का सृजन करने वाले कवि रामनरेश त्रिपाठी का जन्म 1889 ई. (कुछ विद्वानों के अनुसार, 1881 ई.) में जिला जौनपुर के अन्तर्गत कोइरीपुर ग्राम के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता पं. रामदत्त त्रिपाठी, ईश्वर में आस्था रखने वाले ब्राह्मण थे। केवल नवीं कक्षा तक पढ़ने के पश्चात् इनकी पढ़ाई छूट गई। बाद में इन्होंने स्वतन्त्र रूप से हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, बांग्ला तथा गुजराती का गहन अध्ययन किया तथा साहित्य सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। ये हिन्दी साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग के प्रचार मन्त्री भी रहे। इन्होंने दक्षिणी राज्यों में हिन्दी के प्रचार हेतु सराहनीय कार्य किया। साहित्य की विविध विधाओं पर इनका पूर्ण अधिकार था। वर्ष 1962 में कविता के आदर्श और सूक्ष्म सौन्दर्य को चित्रित करने वाला यह कवि पंचतत्त्व में विलीन हो गया।
साहित्यिक परिचय
त्रिपाठी जी मननशील, विद्वान् और परिश्रमी थे। हिन्दी के प्रचार-प्रसार और साहित्य – सेवा की भावना से प्रेरित होकर इन्होंने ‘हिन्दी मन्दिर’ की स्थापना की । इन्होंने अपनी कृतियों का प्रकाशन भी स्वयं ही किया। ये द्विवेदी युग के उन साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने द्विवेदी – मण्डल के प्रभाव से पृथक् रहकर अपनी मौलिक प्रतिभा से साहित्य के क्षेत्र मैं कई कार्य किए। इन्होंने भावप्रधान काव्य की रचना की। राष्ट्रीयता, देश-प्रेम, सेवा, त्याग आदि भावना प्रधान विषयों पर इन्होंने उत्कृष्ट साहित्य की रचना की।
कृतियाँ (रचनाएँ)
त्रिपाठी जी ने हिन्दी साहित्य की अनन्य सेवा की। हिन्दी की विविध विधाओं पर इन्होंने अपनी लेखनी चलाई। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं
मानसी (स्फुट कविता संग्रह), पथिक, मिलन और स्वप्न (खण्डकाव्य); वीरांगना और लक्ष्मी (उपन्यास), सुभद्रा, जयन्त और प्रेमलोक (नाटक), ग्राम्य गीत, कविता कौमुदी और शिवाबावनी ( सम्पादित रचनाएँ); आकाश की बातें, बालकथा कहानी, गुपचुप कहानी, फूलरानी और बुद्धिविनोद (बाल साहित्य); महात्मा बुद्ध तथा अशोक ( जीवन चरित) ‘श्रीरामचरितमानस’ की टीका आदि । –
‘कविता कौमुदी’ में इनकी स्वरचित कविताओं का संग्रहण है तथा ‘ग्राम्य गीत’ में लोकगीतों का संग्रह है।
भाषा-शैली
त्रिपाठी जी की भाषा भावानुकूल, प्रवाहपूर्ण, सरल खड़ी बोली है। संस्कृत के तत्सम शब्दों एवं सामासिक पदों की भाषा में अधिकता है। मुख्य रूप से इन्होंने वर्णनात्मक और उपदेशात्मक शैली का प्रयोग किया है। इनका प्रकृति चित्रण वर्णनात्मक शैली पर आधारित है। इन्होंने शृंगार, शान्त और करुण रस का प्रयोग किया है। अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
त्रिपाठी जी एक समर्थ कवि, सम्पादक एवं कुशल पत्रकार थे। राष्ट्रीय भावनाओं पर आधारित इनका काव्य अत्यन्त हृदयस्पर्शी है। इनके निबन्ध हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इस प्रकार ये कवि, निबन्धकार, सम्पादक आदि के रूप में हिन्दी में सदैव जाने जाएँगे।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. अतुलनीय जिनके प्रताप का,
साक्षी है प्रत्यक्ष दिवाकर ।
घूम-घूम कर देख चुका है,
जिनकी निर्मल कीर्ति निशाकर।
देख चुके हैं जिनका वैभव,
ये नभ के अनन्त तारागण ।
अगणित बार सुन चुका है नभ,
जिनका विजय घोष रण-गर्जन ।
शब्दार्थ अतुलनीय – बेजोड़ प्रताप- शौर्य, पराक्रम; दिवाकर-सूर्य; निशाकर – चन्द्रमा; तारागण – तारों का समूह; अगणित – अनगिनत रण-गर्जन- युद्ध की गर्जना ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
अथवा उपर्युक्त पंक्तियों में कौन-सा रस है?
(iv) उपर्युक्त पद्यांश में किसकी महिमा का वर्णन किया गया है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड ‘स्वदेश प्रेम’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित ‘स्वप्न’ से लिया गया है।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने भारत के गौरवपूर्ण अतीत की झाँकी प्रस्तुत की है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि तुम अपने उन पूर्वजों को स्मरण करो, जिनके यश की तुलना कोई नहीं कर सकता और सूर्य जिनके बल और प्रताप का स्वयं साक्षी है। हमारे पूर्वज तो ऐसे थे, जिनकी निर्मल और स्वच्छ कीर्ति को चन्द्रमा भी पूरे विश्व में घूम-घूम कर देख चुका है।
आकाश के अनन्त तारों का समूह भी जिनके ऐश्वर्य को बहुत देख चुका है। यह आकाश भी हमारे पूर्वजों के विजय घोषों और युद्ध की गर्जनाओं को अनेक बार सुन चुका है अर्थात् हमारे पूर्वजों के प्रताप, वैभव, यश, युद्ध कौशल, सबकुछ अद्भुत और अभूतपूर्व हैं। इनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपने पूर्वजों का गुणगान किया है।
भाषा संस्कृत शब्दों से युक्त साहित्यिक खड़ी बोली
शैली भावात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द मात्रिक
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘अतुलनीय जिनके’, ‘कीर्ति निशाकर’ और ‘जिनका विजय’ में क्रमश: ‘न’, ‘क’ और ‘ज’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘घूम-घूम’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) उपर्युक्त पद्यांश में कवि ने अपने पूर्वजों की महिमा का वर्णन किया है। अपने पूर्वजों की तुलना इस संसार में किसी भी अन्य व्यक्ति से नहीं की जा सकती।
2. शोभित है सर्वोच्च मुकुट से,
जिनके दिव्य देश का मस्तक ।
गूँज रही हैं सकल दिशाएँ
जिनके जय – गीतों से अब तक । ।
जिनकी महिमा का है अविरल,
साक्षी सत्य-रूपं हिम- गिरि-वर ।
उतरा करते थे विमान दल,
जिसके विस्तृत वक्षःस्थल पर ।
शब्दार्थ दिव्यं – अलौकिक: सकल- समस्त हिम-गिरि-वर- सत्य स्वरूपवाला श्रेष्ठ हिमालय; वक्षःस्थल- सीना। अविरल – निरन्तर; सत्य-रूप विमान-दल- विमानों का समूह;
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग इन पंक्तियों में कवि ने हमारे देश के दिव्य स्वरूप, प्राचीन महिमा और अतीत के गौरव का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि भारत एक महान् एवं प्राचीन दिव्यं देश है, जिसके मस्तक पर हिमालयरूपी सर्वोच्च मुकुट सुशोभित है। हमारे पूर्वज इतने ज्ञानी, गुणी, वीर और परोपकारी थे कि उनके विजय के यशगान से आज भी सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज रही हैं। वे हमारे ही पूर्वज थे, जिनकी महिमा के साक्षी हिमालय पर्वत और वन प्रान्त के पेड़-पौधे हैं। हिमालय और वन आज भी उनके सत्य रूप का बोध कराते हैं। यह हमारे देश की विस्तृत भारत भूमि ही है, जिसके वक्षस्थल पर अन्य देशों के विमान भी उतरा करते थे अर्थात् भारत की कीर्ति को सुनकर दूर-दूर से विदेशी यहाँ आया करते थे। इस प्रकार भारत की कीर्ति सम्पूर्ण विश्व में फैली थी।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पंक्तियों में हिमालय पर्वत को भारत के मुकुट के रूप में चित्रित किया गया है।
भाषा साहित्यिक खड़ी बोली
शैली भावात्मक और वर्णनात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द मात्रिक
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘जिनके जय’, ‘साक्षी सत्य’ और ‘विस्तृत वक्ष:स्थल’ में क्रमशः ‘ज’, ‘स’ और ‘व’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
रूपक अलंकार ‘सर्वोच्च मुकुट’ और ‘सत्य-रूप हिम- गिरि-वर’ में उपमेय में उपमान का भेद रहित आरोप है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।
3. सागर निज छाती पर जिनके,
अगणित अर्णव- पोत उठाकर ।
पहुँचाया करता था प्रमुदित,
भूमण्डल के सकल तटों पर ।।
नदियाँ जिसकी यश-धारा-सी,
बहती हैं अब भी निशि-वासर ।
ढूँढो, उनके चरण-चिह्न भी,
पाओगे तुम इनके तट पर । ।
शब्दार्थ अगणित—अनगिनत ; अर्णव – पोत – समुद्री जहाज; प्रमुदित–प्रसन्न हो; भूमण्डल – पृथ्वी मण्डल; सकल – समस्त; निशि-वासर – रात-दिन ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपने पूर्वजों की गरिमा व समर्पण भाव का चित्रण किया है, स्पष्ट कीजिए ।
(v) निम्नलिखित शब्दों के अर्थ बताइए
(क) अगणित
(ख) अर्णव-पोत
(ग) निशि-वासर
(घ) प्रमुदित
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपने पूर्वजों की गरिमा तथा समर्पण भाव का चित्रण किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि हमारे पूर्वजों (हमारे देश) का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। समुद्र स्वयं उनकी सेवा में लीन रहता था। वह अपने वक्ष पर उनके अनगिनत जहाजों को उठाकर प्रसन्नता से पृथ्वी के समस्त तटों तक पहुँचाया करता था। हमारे देश में रात-दिन बहने वाली नदियों को देखकर ऐसा लगता है, मानो वे हमारे पूर्वजों का यशोगान गा रही हों। धन्य थे हमारे पूर्वज, जिन्होंने अपने समय में देश का गौरवान्वित रूप देखा। आज भी माना जाता है कि उनके चरण-चिह्न नदियों और समुद्रों के तट पर मिल जाएँगे ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा साहित्यिक खड़ी बोली
शैली भावात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द मात्रिक
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘अगणित अर्णव’ और ‘चरण- चिह्न’ में ‘अ’, ‘ण’ और ‘च’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
उपमा अलंकार ‘यश-धारा-सी’ में उपमेय में उपमान की समानता को व्यक्त किया गया है, इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार इस पद्यांश में मनुष्य के यश की वृद्धि का परिचय नदी रूपी धारा से दिया गया है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपने पूर्वजों की गरिमा तथा समर्पण भाव का चित्रण किया है। कवि कहता है कि हमारे पूर्वजों का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। समुद्र स्वयं उनकी सेवा में लीन रहता था। वह अपने वक्ष पर उनके अनगिनत जहाजों को उठाकर प्रसन्नता से पृथ्वी के समस्त तटों तक पहुँचाया करता था। हमारे देश में रात-दिन बहने वाली नदियों को देखकर ऐसा लगता है, मानो वे हमारे पूर्वजों का यशोगान गा रही हों। धन्य थे हमारे पूर्वज, जिन्होंने अपने समय में देश का गौरवान्वित रूप देखा ।
(v) शब्द                अर्थ
(क) अगणित      – अनगिनत
(ख) अर्णव-पोत  – समुद्री जहाज
(ग) निशि-वासर  – रात-दिन
(घ) प्रमुदित         – प्रसन्न
4. विषुवत् रेखा का वासी जो,
जीता है नित हाँफ हाँफ कर।
रखता है अनुराग अलौकिक,
वह भी अपनी मातृ-भूमि पर । ।
ध्रुव-वासी, जो हिम में तम में,
जी लेता है काँप-काँप कर ।
वह भी अपनी मातृ-भूमि पर,
कर देता है प्राण निछावर । ।
शब्दार्थ विषुवत् रेखा-भूमध्य रेखा; अनुराग – प्रेम; अलौकिक-दिव्य लोक से परे; ध्रुव-वासी – शीतल या ध्रुव प्रदेश में रहने वाला; हिम-बर्फ; तम – अन्धकार |
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) विषुवत रेखा का वासी कैसा जीवन व्यतीत करता है? उपर्युक्त पद्यांश के आधार पर लिखिए।
(v) ध्रुवीय प्रदेशों के लोगों में मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम को स्पष्ट कीजिए |
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग कवि ने विषम परिस्थितियों में रह रहे लोगों के देश-प्रेम का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने देश से प्रेम करने की सीख दी है।
(ii) व्याख्या कवि अपने देश से असीम प्रेम करने की प्रेरणा देते हुए कहता है कि विषुवत् रेखा का वह भू-भाग जहाँ असहनीय ‘गर्मी पड़ती है और वहाँ के लोग गर्मी के कारण हाँफ हाँफ कर जीवन बिताते हैं, किन्तु इतने कष्टों के होने पर भी वे अपनी मातृभूमि से अत्यधिक लगाव रखते हैं। उनका अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम अतुलनीय होता है । वे गर्मी की मार से परेशान होने पर भी अन्यत्र जाकर बसने की बात नहीं सोचते हैं।
इसी प्रकार ध्रुवीय प्रदेशों में जहाँ साल के अधिकांश महीनों में बर्फ जमी रहती है, भीषण सर्दी के कारण काँपते हुए जीवन बिताना पड़ता है तथा सर्दी, कोहरे और धुन्ध के कारण दिन-रात का अन्तर करना कठिन हो जाता है। वहाँ के लोग असहाय शारीरिक कष्ट सहते हुए भी वहीं रहना पसन्द करते हैं। इसका सीधा-सा कारण अपनी मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम ही तो है । यहाँ के निवासी शत्रुओं से रक्षा करते हुए अपनी मातृभूमि के लिए जान की बाजी तक लगा देते हैं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने स्पष्ट किया है कि विषम जलवायु में कष्टपूर्ण जीवन जी रहे लोग भी अपने देश के प्रति असीम लगाव रखते हैं।
भाषा सरल खड़ी बोली
शैली भावात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द मात्रिक
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘अनुराग अलौकिक’ में ‘अ’ वर्ण की पुनरावृत्ति’ होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार
‘हाँफ – हाँफ’ और ‘काँप-काँप’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
(iv) विषुवत रेखा का वासी अपना जीवन हाँफ हाँफ कर व्यतीत करता है, क्योंकि वहाँ असहनीय गर्मी पड़ती है, किन्तु इतने कष्टों के होने पर भी वह अपनी मातृभूमि से अत्यधिक लगाव रखता है। उसका अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम अतुलनीय होता है। वह गर्मी की मार से परेशान होने पर भी अन्यत्र जाकर बसने की बात नहीं सोचता ।
(v) ध्रुवीय प्रदेशों के लोगों में भी मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम होता है। ध्रुवीय प्रदेशों में अधिकांशतः बर्फ ही जमी रहती है, भीषण सर्दी के कारण वहाँ काँपते हुए जीवन बिताना पड़ता है तथा सर्दी, कोहरे और धुंध के कारण ज्यादातर अँधेरा ही छाया रहता है, लेकिन वहाँ के लोग असहाय शारीरिक कष्ट सहते हुए भी वहीं रहना पसन्द करते हैं। इसका सीधा-सा कारण उनका अपनी मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम ही है।
5. तुम तो, हे प्रिय बन्धु स्वर्ग-सी,
सुखद, सकल विभवों की आकर।
धरा – शिरोमणि मातृ-भूमि में,
धन्य हुए हो जीवन पाकर ।।
तुम जिसका जल अन्न ग्रहण कर,
बड़े हुए लेकर जिसकी रज ।
तन रहते कैसे तज दोगे,
उसको, हे वीरों के वंशज ।।
शब्दार्थ विभवों की आकर – नाना प्रकार के सुखों की खान ; धरा – शिरोमणि – पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ; रज-धूल; तज-त्याग देना।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि देशवासियों को क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने मातृभूमि को स्वर्ग से बढ़कर बताते हुए देशप्रेम की प्रेरणा प्रदान की है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि हे प्रिय बन्धु (भाई)! तुमने जहाँ जीवन पाया है, वह धरा स्वर्ग के समान सुख देनेवाली, सम्पूर्ण सुखों की खान है। पृथ्वी का वह भाग जहाँ तुमने जन्म लिया है, वह सभी धरा-खण्डों से श्रेष्ठ है। तुम्हारी मातृभूमि धरा – शिरोमणि है। ऐसी धरती पर जन्म लेकर तुम धन्य हो । जिस देश के अन्न-जल को ग्रहण करके तथा जिस देश की धूल-मिट्टी में खेलकर तुम बड़े हुए हो । हे वीरों के वंशज उस देश को शरीर रहते हुए कैसे छोड़ दोगे? अपने देश से प्रेम करो तथा उसका त्याग मत करो, क्योंकि इस मातृभूमि की रक्षा करना तुम्हारा पुनीत कर्त्तव्य है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी बोली
शैली भावात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द मात्रिक
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘सुखद सकल’ में ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
उपमा अलंकार
‘स्वर्ग-सी’ में धरती उपमेय और स्वर्ग उपमान में समानता दिखाई गई है। इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है ।
भाव साम्य राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने भी स्वदेश प्रेम की इसी भावना को व्यक्त करते हुए कहा है।
” जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रस धार नहीं ।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं । । “
(iv) इस पद्यांश के माध्यम से कवि देशवासियों को यह सन्देश देना चाहता है कि अपने देश से प्रेम करो, क्योंकि इसकी रक्षा करना तुम्हारा पुनीत कर्तव्य है। तुम इसी का अन्न, जल और वायु ग्रहण कर तथा इसी की रज में खेलकर बड़े हुए हो । अतः इसके प्रति तुम्हारे असीम कर्त्तव्य हैं।
6. जब तक साथ एक भी दम हो,
अवशिष्ट एक भी धड़कन ।
रखो आत्म गौरव से ऊँची – पलकें,
ऊँचा सिर, ऊँचा मन ।।
एक बूँद भी रक्त शेष हो,
जब तक मन में हे शत्रुंजय
दीन वचन मुख से न उचारो,
मानो नहीं मृत्यु का भी भय । ।
शब्दार्थ दम–साँस; अवशिष्ट – बाकी; रक्त- खून; शत्रुंजय – शत्रुओं को जीतने वाला; दीन-गरीब; उचारो – बोलो।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि लोगों को स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का सन्देश दे रहा है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि हे मातृभूमि से प्रेम रखने वाले भाई! तुम अपनी अन्तिम साँस तक और बची हुई एक भी धड़कन के धड़कने तक अपने आत्म गौरव की रक्षा करो। पलकों को किसी के भय से या दबाव से गिरने मत दो, अपना मस्तक किसी के सामने मत झुकाओ। उसे सदैव ऊँचा रखो। अपने मन को भी ऊँचा रखो।
हे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले ! जब तक तुम्हारे शरीर में रक्त की एक भी बूँद शेष है, तुम्हारे भीतर शक्ति शेष है, तब तक तुम अपने मुख से किसी के भी सामने दीनता प्रदर्शित मत करो ।
मृत्यु का भय सामने उपस्थित होने पर भी अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए डटे रहना, मृत्यु से भयभीत न होना।
(iii) काव्यगत सौन्दर्य
भाषा खड़ी बोली
शैली भावात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द मात्रिक
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘दीन वचन’ में ‘न’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
7. निर्भय स्वागत करो मृत्यु का,
मृत्यु एक है विश्राम स्थल ।
जीव जहाँ से फिर चलता है,
धारण कर नव जीवन-संबल । ।
मृत्यु एक सरिता है, जिसमें,
श्रम से कातर जीव नहाकर ।
फिर नूतन धारण करता है,
काया रूपी वस्त्र बहाकर ।।
शब्दार्थ निर्भय-भयरहित होकर विश्राम स्थल- आराम करने की जगह; संबल – आधार; सरिता नदी; कातर – दुःखी; नूतन – नवीन, नया; काया – शरीर ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बताया है कि देश की रक्षा करते हुए यदि मृत्यु का वरण करना पड़े, तो वह भी श्रेयस्कर है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि हे देशवासियों ! मृत्यु का वरण सहर्ष करो। मृत्यु का स्वागत करो, क्योंकि मृत्यु एक विश्राम स्थल है। मृत्यु के बाद जीव पुनः नए शरीर को धारण करके फिर से अपनी जीवन-यात्रा को शुरू करता है । मृत्यु एक नदी के समान है, जिसमें नहाकर श्रम से कातर प्राणी पुराने शरीर रूपी वस्त्र का त्याग करके नए शरीर रूपी वस्त्र को धारण करता है। अतः मृत्यु का स्वागत उल्लास और उत्साह से करना चाहिए।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी बोली
शैली उद्बोधन
गुण प्रसाद
रस वीर
छन्द मात्रिक
शब्द-शक्ति व्यंजना
अलंकार
रूपक अलंकार ‘मृत्यु एक सरिता है’ में मृत्यु को नदी रूपी बताकर दोनों के मध्य का भेद समाप्त हो गया है, इसलिए यहाँ रूपकं अलंकार है।
8. सच्चा प्रेम वही है जिसकी,
तृप्ति आत्म-बलि पर हो निर्भर ।
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है,
करो प्रेम पर प्राण निछावर ||
देश-प्रेम वह पुण्य-क्षेत्र है,
अमल असीम त्याग से विलसित ।
आत्मा के विकास से जिसमें,
मनुष्यता होती है विकसित । ।
शब्दार्थ तृप्ति – सन्तोष; आत्म-बलि – आत्म समर्पण; निष्प्राण – प्राणरहित; पुण्य – क्षेत्र – पवित्र स्थान; अमल-निर्मल; विलसित – सुशोभित ।
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक एवं कवि का नाम लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में किसके प्रेम पर प्राण न्योछावर करने की बात की गई है?
(iv) कवि के अनुसार, सच्चा प्रेम किसे कहा जाता है?
(v) मनुष्य में मनुष्यता के विकास के लिए क्या आवश्यक है?
(vi) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस है? स्पष्ट कीजिए |
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने सच्चे देश-प्रेम के लिए त्याग और बलिदान जैसे गुणों को आवश्यक माना है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि सच्चा प्रेम उसे कहा जाता है, जिसमें आत्मसमर्पण की भावना कूट-कूटकर भरी होती है अर्थात् आत्मसमर्पण के अभाव में प्रेम को सच्चा नहीं कहा जा सकता। सच्चे प्रेम को पाने के लिए आत्मबलिदान भी देना पड़े, तो संकोच नहीं करना चाहिए । त्याग के बिना प्रेम निर्जीव-सा होता है। देश-प्रेम ऐसा पवित्र क्षेत्र है, जो निर्मलता और सीमारहित त्याग जैसे गुणों से सुशोभित होता है। देश-प्रेम वह पवित्र भावना है, जिससे मनुष्य की आत्मा विकसित होती है, जो मनुष्य में मानवता और मनुष्यता के विकास के लिए आवश्यक होती है। अत: मनुष्य में मानवता का पूर्ण विकास हो, इसके लिए उसमें देश-प्रेम की भावना होना आवश्यक है।
काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी बोली
शैली उद्बोधन
गुण ओज
रस वीर
छन्द मात्रिक
शब्द – शक्ति व्यंजना
अलंकार अनुप्रास अलंकार ‘अमल असीम’ में ‘अ’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में देश के प्रेम पर प्राण न्योछावर करने की बात की गई है, क्योंकि देश प्रेम ऐसा पवित्र क्षेत्र है, जो निर्मल, निष्कलंक और त्याग जैसे गुणों से ही विकसित होता है। उसकी सुन्दरता पवित्र त्याग से ही दिखाई देती है।
(iv) कवि के अनुसार, सच्चा प्रेम उसे कहा जाता है, जिसमें आत्म-त्याग की भावना कूट-कूटकर भरी होती है। सच्चे प्रेम को पाने के लिए यदि आत्मबलिदान भी देना पड़े, तो हमें हिचकना नहीं चाहिए । त्याग के बिना प्रेम. निर्जीव-सा होता है।
(v) कवि के अनुसार, देश प्रेम वह पवित्र भावना होती है, जो मनुष्य की आत्मा और मनुष्यता के विकास के लिए आवश्यक होती है । अतः मनुष्य में मनुष्यता का पूर्ण विकास हो, इसके लिए उसमें देश-प्रेम की भावना का होना आवश्यक है।
(vi) प्रस्तुत पद्यांश में देश के प्रति आत्मबलिदान, पवित्र भावना, त्याग आदि गुणों के साथ देश की रक्षा लिए हमेशा तत्पर रहने के कारण यहाँ वीर रस है।

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