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UP Board Class 10 Hindi Chapter 6 – ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 6 – ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6 ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड)

जीवन-परिचय

हिन्दी के समर्थ राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म वर्ष 1908 में बिहार के मुंगेर जिले के अन्तर्गत सिमरिया घाट नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम रवि सिंह तथा माता का नाम श्रीमती मनरूप देवी था। इन्होंने मोकामा घाट से मैट्रिक तथा पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. (ऑनर्स) किया। इनकी काव्य-प्रतिभा का परिचय बाल्यावस्था में ही उस समय हो गया था, जब इन्होंने मिडिल कक्षा में पढ़ते हुए ‘वीरबाला’ नामक काव्य की रचना कर ली थी। मैट्रिक में पढ़ते समय इनका ‘प्राणभंग’ नामक काव्य प्रकाशित हो गया था। वर्ष 1928-29 में इन्होंने काव्य सृजन के क्षेत्र में विधिवत् कदम रखा। बी. ए. (ऑनर्स) करने के पश्चात् दिनकर जी मोकामा घाट हाईस्कूल में एक वर्ष तक प्राचार्य रहे। वर्ष 1934 में ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रचार विभाग में उपनिदेशक रहे। कुछ समय पश्चात् मुजफ्फरपुर कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए। वर्ष 1952 में इन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया, जहाँ ये वर्ष 1962 तक रहे। वर्ष 1963 में ये भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त किए गए। दिनकर जी ने भारत सरकार की हिन्दी- समिति के सलाहकार और आकाशवाणी के निदेशक के रूप में भी कार्य किया, इन्हें वर्ष 1959 में ‘पद्म विभूषण’ पुरस्कार की उपाधि से अलंकृत किया गया। इन्हें इनकी रचना ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ और ‘उर्वशी’ के लिए ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। यह महान साहित्यकार वर्ष 1974 में इस संसार से विदा हो गया।
रचनाएँ
दिनकर जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे, इन्होंने गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ निम्नलिखित हैं
निबन्ध संग्रह मिट्टी की ओर, अर्द्धनारीश्वर, रेती के फूल, उजली आग।
संस्कृति ग्रन्थ संस्कृति के चार अध्याय, भारतीय संस्कृति की एकता ।
आलोचना ग्रन्थ शुद्ध कविता की खोज, काव्य की भूमिका ।
काव्य ग्रन्थ रेणुका, हुँकार, सामधेनी, रसवन्ती, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा |
भाषा-शैली
दिनकर जी की भाषा में तत्सम शब्दों की बहुलता होती है, फिर भी स्पष्टता सर्वत्र विद्यमान रहती है। इनकी भाषा में उर्दू, फारसी और सुबोधता और अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग मिलता है। इसमें तद्भव, देशज शब्दों तथा मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग भी सहज – स्वाभाविक रूप में हुआ है, इन्होंने अपने निबन्धों में विवेचनात्मक, समीक्षात्मक और भावात्मक शैली का प्रयोग किया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
दिनकर जी उत्कृष्ट कोटि के कवि ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के गद्यकार भी थे। इन्होंने अपने काव्य में देश के प्रति असीम राष्ट्रीय भावना का परिचय दिया है। राष्ट्रीय भावनाओं पर आधारित इनका साहित्य भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर है। इनकी गणना विश्व के महान साहित्यकारों में की जाती है। इन्हें हिन्दी साहित्य में ‘राष्ट्रकवि’ की संज्ञा भी दी गई है।
पाठ का सार
परीक्षा में ‘पाठ के सारांश’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाएगा। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।
वकील का ईर्ष्यालु स्वभाव
लेखक के घर के दाहिनी ओर एक वकील साहब रहते हैं, जो धनी हैं। उनका समृद्ध परिवार है, जिसमें पत्नी, बच्चे एवं नौकर-चाकर भी हैं, परन्तु उसके पश्चात् भी वे सुखी नहीं हैं। उनके बगल रहने वाले बीमा एजेण्ट की धन-सम्पदा से वे सदा ईर्ष्या करते रहते हैं। उन्हें लगता है कि एजेण्ट की कार, आय, शानो-शौकत, उनकी क्यों नहीं हुई?
ईर्ष्या का अनोखा वरदान
ईर्ष्या का यह अनोखा वरदान है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने पास मौजूद चीजों से लाभ नहीं उठाता है, बल्कि दूसरों के पास की उपलब्ध वस्तुओं को देखकर दुःखी होता रहता है। अपने पक्ष के अभाव उसे दुःखी करते हैं, पर ईर्ष्यालु व्यक्ति यह दुःख भोगने के लिए विवश होता है। ईर्ष्या की आग में जल रहे व्यक्ति का चरित्र भी भयंकर हो उठता है। वह अपनी उन्नति के लिए परिश्रम करना छोड़कर दूसरों को हानि पहुँचाना अपना कर्त्तव्य समझने लगता है।
ईर्ष्या के विभिन्न रूप व कार्य
निन्दा करना भी ईर्ष्या का ही एक रूप है। लेखक ने तो इसे ईर्ष्या की बेटी का नाम दे डाला, क्योंकि जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वह दूसरों की निन्दा करके स्वयं उसका सम्मानित स्थान प्राप्त कर लेना चाहता है। दूसरों को गिराकर कोई व्यक्ति स्वयं ऊँचा नहीं उठ सकता। संसार में कोई मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता। उसके पतन का कारण उसके सद्गुणों में कमी होना है।
ईर्ष्या मानवीय गुणों के नष्ट होने का कारण
चिन्ता को लोग चिता भी कहते हैं। जिसे किसी बात की कोई चिन्ता लग जाती है, उसका तो जीवन ही नष्ट हो जाता है, किन्तु ईर्ष्या तो चिन्ता से बढ़कर है, वह मनुष्य के मौलिक गुणों को भी नष्ट कर देती है। लेखक के अनुसार, ईर्ष्यालु व्यक्ति जहर की उस गठरी के समान है, हर जगह वायु को दूषित करती फिरती है। चिन्तायुक्त व्यक्ति दया का पात्र है।
लेखक ने ईर्ष्या व चिन्ता से मृत्यु को ही श्रेष्ठ बताया है। जिसके हृदय में ईर्ष्या का उदय हो जाता है, उसे सामने के सुख व आनन्द धूमिल दिखने लगते हैं। प्रकृति उसे आनन्द नहीं देती। फूलों का खिलना, पक्षियों का चहचहाना ने सब उसे निरर्थक लगने लगते हैं।
ईर्ष्या व प्रतिद्वन्द्विता का सम्बन्ध
ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वियों को कटु शब्द बोलकर तथा उन्हें पीड़ित करके बहुत आनन्दित होता है, बहुत हँसता है, किन्तु यह हँसी मनुष्य की नहीं राक्षसी प्रवृत्ति की होती है। ईर्ष्या का सम्बन्ध बराबर वालों से होता है। व्यक्ति अपने आस-पास वालों से या लगभग समान पद, कार्य व सम्पत्ति वालों से ही ईर्ष्या करता है, क्योंकि एक भिखारी एक करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता। प्रतिद्वन्द्वी से ईर्ष्या करना लाभदायक भी हो जाता है, क्योंकि उससे आप उन्नति भी कर सकते हैं और यह आपके लिए लाभदायक सिद्ध होगा।
ईर्ष्यालु व ईर्ष्या से बचने के उपाय
ईर्ष्यालुओं से बचने के बारे में नीत्से का कहना है कि ” बाजार की इन मक्खियों को छोड़कर एकान्त में भागो । अमर और महान मूल्यों की रचना बाजार से दूर रहकर ही की जा सकती है। नए मूल्यों के रचनाकार बाजार में नहीं बसते हैं। ”
ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। ईर्ष्यालु स्वभाव वाले लोगों को व्यर्थ की बातों के बारे में सोचना छोड़ देना चाहिए। उन्हें अपने अभाव का पता लगाकर उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका ढूँढने का प्रयास करना चाहिए। जब व्यक्ति में अपनी कमियों को देखने की भावना उत्पन्न हो जाएगी, तो उस दिन से वह ईर्ष्या करना भी छोड़ देगा।
गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
1. ईर्ष्या का यही अनोखा वरदान है, जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनन्द नहीं उठाता, जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं। वह अपनी तुलना दूसरों के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके हृदय पर दंश मारते रहते हैं। दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है। मगर ईर्ष्यालु मनुष्य करे भी तो क्या ? आदत से लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी पड़ती है।
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
(ग) ईर्ष्या का अनोखा वरदान क्या है?
अथवा लेखक ने ईर्ष्या को अनोखा वरदान क्यों कहा है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘गद्य खण्ड’ में संकलित पाठ ‘ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से’ से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।
(ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते हैं कि जो व्यक्ति ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के होते हैं, ईर्ष्या उन्हें एक अद्भुत एवं अनोखा वरदान देती है। यह वरदान है बिना दुःख के दुःख भोगने का। ईर्ष्या जब व्यक्ति की साथी बन जाती है या उसके हृदय में बस जाती है, तब वह व्यक्ति सदैव दुःख का अनुभव करता है। उसके दुःखी अनुभव करने के पीछे कोई कारण नहीं होता है, बल्कि वह अकारण ही कष्ट भोगता है। वह स्वयं के समीप विद्यमान असंख्य सुख-साधनों के भोग के पश्चात् भी आनन्दित महसूस नहीं कर पाता है, जिसके पीछे का कारण यह है कि वह दूसरों की वस्तुओं को देखकर ज्वलनशील प्रवृत्ति का बन जाता है।
लेखक ईर्ष्या और उसके स्वभाव के विषय में कहता है कि इस डंक से उत्पन्न कष्ट और पीड़ा को सहना उचित नहीं हैं। ईर्ष्या की आग में जलना बुरा होता है। ईर्ष्या करने वाला अपनी इस आदत को आसानी से छोड़ नहीं पाता। दूसरे की वस्तुएँ देखकर ईर्ष्या करना उसकी आदत बन जाती है। ईर्ष्या से व्यक्ति को सुख तो मिलता नहीं, अपितु उसे पीड़ा ही सहनी पड़ती है, व्यक्ति अपनी ईर्ष्या करने की आदत से यह पीड़ा झेलने को विवश होता है तथा व्यक्ति अपने पास सब कुछ होते हुए भी कष्ट को सहने तथा वेदना (दुःख) को भोगने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता।
(ग) ईर्ष्या का अनोखा वरदान है – दुःख न होते हुए भी दुःख की पीड़ा भोगना । इसे अनोखा वरदान इसलिए कहा गया है, क्योंकि व्यक्ति के पास जो भी वस्तुएँ हैं, उनका आनन्द उठाने के बजाय वह उन वस्तुओं से दुःखी होता है, जो उसके पास नहीं है। वह दूसरों की वस्तुएँ देखकर ईर्ष्या करता है और दुःखी होता है।
2. ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है, जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वही बुरे किस्म का निन्दक भी होता है। दूसरों की निन्दा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आँखों से गिर जाएँगे और जो स्थान रिक्त होगा, उस पर मैं अनायास ही बैठा दिया जाऊँगा । V.Imp [2024, 16, 12]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा क्यों करता है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक कहता है कि ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है अर्थात् जिस व्यक्ति में ईर्ष्या करने का भाव उत्पन्न हो जाता है, उस व्यक्ति में निन्दा करने की आदत अपने आप पड़ जाती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की बहुत निन्दा करता है। इस निन्दा में भी उसे एक आनन्दानुभूति होती है। वह जिस व्यक्ति की निन्दा करता है, उसके बारे में चाहता है कि सभी उसकी निन्दा करें। वह दूसरों की निन्दा करके समाज की दृष्टि में उस व्यक्ति को गिराना चाहता है, जिसकी वह निन्दा कर रहा है। वह सोचता है कि ऐसा करने से मित्रों और परिचितों की आँखों से वह गिर जाएगा और इस प्रकार उसके रिक्त हुए स्थान पर वह स्वयं को स्थापित कर लेगा अर्थात् दूसरों की दृष्टि में प्रशंसा का पात्र बन जाएगा। इस प्रकार वह अपनी उन्नति के चक्कर में दूसरों को गिराने का सतत प्रयास करता रहता है।
(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा इसलिए करता है, क्योंकि वह ( ईर्ष्यालु) यह मानने की भूल कर बैठता है कि निन्दा करने से वह व्यक्ति अपने मित्रों और परिचितों की दृष्टि में गिर जाएगा, जिसकी वह निन्दा कर रहा है। इस प्रकार उस व्यक्ति के स्थान को वह स्वयं ले लेगा और वह सम्मानित बन जाएगा। M. Imp [2020, 18, 15, 13, 11]
3. मगर ऐसा न आज तक हुआ है और न आगे होगा। दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता । उसके पतन का कारण सद्गुणों का ह्रास होता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दूसरों की निन्दा करने से अपनी उन्नति नहीं कर सकता। उन्नति तो उसकी तभी होगी, जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाए तथा अपने गुणों का विकास करे। M. Imp * [ 2019, 17, 15, 12]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) ऐसी कौन-सी बात है, जो न आज तक हुई है और न होगी?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक कहता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति हमेशा दूसरे व्यक्तियों की निन्दा करके उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करता है और स्वयं को उसके स्थान पर स्थापित करना चाहता है, परन्तु आज तक ऐसा न हुआ है और न भविष्य में ऐसा होगा। ऐसा न होने के पीछे के कारण को बताते हुए लेखक कहता है कि जो व्यक्ति संसार में ऊँचा उठना चाहता है, वह अपने सुकर्मों से ही ऊँचा उठ सकता है। दूसरों की निन्दा करके या दूसरों के प्रति ईर्ष्या भाव रखकर कभी कोई श्रेष्ठ व्यक्ति नहीं बन सकता। यदि किसी व्यक्ति का पतन भी होता है, तो उसके पीछे निन्दा को दोष दिया जाना भी उचित नहीं है, जबकि उसके पतन के पीछे का कारण उस व्यक्ति के अच्छे गुणों का नष्ट हो जाना है। किसी भी व्यक्ति की उन्नति के लिए आवश्यक बात यह है कि मनुष्य निन्दा करना छोड़कर अपने चरित्र को स्वच्छ एवं साफ बनाए तथा अपने अतिरिक्त गुणों का विकास करे ।
(ग) दूसरों को नीचा दिखाकर अपने को ऊँचा बनाने और समाज में सम्मानित स्थान पाने की बात न आज तक हुई है और न ही भविष्य में होगी। अपनी उन्नति के लिए सद्गुणों का विकास आवश्यक है।
4. ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है, जिसके हृदय उसका जन्म होता है। आप भी ऐसे बहुत से लोगों को जानते होंगे, जो ईर्ष्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं और जो बराबर इस फिक्र में लगे रहते हैं कि कहाँ सुननेवाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले। श्रोता मिलते ही उनका ग्रामोफोन बजने लगता है और वे बड़ी ही होशियारी के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते हैं, मानो विश्व कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो । अगर जरा उनके अपने इतिहास को देखिए और समझने की कोशिश कीजिए कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है, तब से वे अपने क्षेत्र में आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि वे निन्दा करने में समय व शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज इनका स्थान कहाँ होता? V. Imp  [2020, 16, 12]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ग) उपरोक्त गद्यांश में ईर्ष्यालु व्यक्ति की मनोदशा कैसी बताई गई है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) ईर्ष्यालु व्यक्ति के स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए लेखक कहता है कि जिस व्यक्ति के मन में ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है, सबसे पहले ईर्ष्या उसी को जलाती है। ईर्ष्या से उत्पन्न दुःख सबसे पहले उसी को भुगतना पड़ता है। यह ईर्ष्या का काम है। ऐसे लोग अपने दुःख को सुनाने के लिए दूसरों को खोजते रहते हैं। ईर्ष्यालु व्यक्ति हर जगह सरलता से मिल जाते हैं। वे ईर्ष्या की जीती-जागती मूर्ति होते हैं।
(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति इस मनोदशा में रहता है कि कब उसके दुःखों को सुनने वाला कोई मिले और वह अपना दुःख-पुराण सुनाना शुरू कर दे। सुनने वाला मिलते ही ईर्ष्यालु बड़ी होशियारी से दूसरों की निन्दा की एक-एक बात बढ़ा-चढ़ाकर इस प्रकार बताता है मानो संसार के कल्याण का सर्वश्रेष्ठ कार्य वही है।
5. चिन्ता को लोग चिता कहते हैं, जिसे किसी प्रचण्ड चिन्ता ने पकड़ लिया है, उस बेचारे की जिन्दगी ही खराब हो जाती है, किन्तु ईर्ष्या शायद चिन्ता से भी बदतर चीज़ है, क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुण्ठित बना डाली है। मृत्यु शायद फिर भी श्रेष्ठ है, बनिस्बत इसके कि हमें अपने गुणों को कुण्ठित बनाकर जीना पड़े । चिन्ता – दग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र है, किन्तु ईर्ष्या से जला-भुना आदमी जहर की एक चलती-फिरती गठरी के समान है, जो हर जगह वायु को दूषित करती फिरती है। V. Imp [ 2018, 17, 11]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए |
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
(ग) चिन्ता को लोग चिता क्यों कहते हैं?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक चिन्ता की तुलना चिता से करते हुए कहता है कि चिन्ता व्यक्ति को उसी प्रकार जलाती है; जैसे- चिता । चिता मृत शरीर को जलाती है, परन्तु चिन्ता जीवित व्यक्ति को धीरे-धीरे जलाती है। जिस व्यक्ति को चिन्ता ने जकड़ लिया, उसका जीवन कष्टदायक जाता है। उसका जीवन दुःखमय बन जाता है, क्योंकि वह हर समय चिन्ता में घुलता रहता है। लेखक कहता है कि मृत्यु को फिर भी श्रेष्ठ कहा जा सकता है। ईर्ष्या व्यक्ति के सद्गुणों का नाश कर देती है, जिस व्यक्ति के सद्गुण नष्ट हो गए हों, उसके जीने से अच्छा है मर जाना। सद्गुणों के बिना मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं रह जाता है। व्यक्ति के पास सारे सुख-साधन हों और वह ईर्ष्या के कारण उनसे लाभान्वित न हो सके, ऐसे व्यक्ति पर समाज दया नहीं करता है। हाँ, चिन्ता से ग्रस्त व्यक्ति पर समाज जरूर दया करता है, क्योंकि वह समाज का अहित नहीं करता है। उसके विचार और कार्य से दूसरों का अहित नहीं होता है। इसके विपरीत ईर्ष्यालु व्यक्ति जहर की पोटली के समान होता है, जिसके विचारों और कार्यों से समाज का वातावरण दूषित होता जाता है।
(ग) चिन्ता को लोग चिता इसलिए कहते हैं, क्योंकि चिता व्यक्ति के मृत शरीर को जलाती है और चिन्ता भी व्यक्ति को जलाने का ही कार्य करती है। वह व्यक्ति के जीवित शरीर को धीरे-धीरे जलाती है। अतः चिन्ता, चिता से भयंकर है।
6. ईर्ष्या मनुष्य का चारित्रिक दोष ही नहीं है, प्रत्युत इससे मनुष्य के आनन्द में भी बाधा पड़ती है। जब भी मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या का उदय होता है, सामने का सुख उसे मद्धिम सा दिखने लगता है। पक्षियों के गीत में जादू नहीं रह जाता और फूल तो ऐसे हो जाते हैं, मानो वह देखने के योग्य ही न हों। आप कहेंगे कि निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्वियों को बेधकर हँसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है। मगर यह हँसी मनुष्य की नहीं राक्षस की होती है और यह आनन्द भी दैत्यों का आनन्द होता है। [2015]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) ईर्ष्यालु की मनोदशा कैसी होती है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि ईर्ष्या मनुष्य के चरित्र का दोष ही नहीं है, बल्कि यह भाव व्यक्ति के आनन्दमय क्षणों में भी बाधा उत्पन्न करता है । जिस व्यक्ति के हृदय में ईर्ष्या का भाव जाग्रत हो जाता है, उसे अपना सुख भी दुःख – सा प्रतीत होने लगता है । वह सुखद स्थिति में होते हुए भी सुख से वंचित रहता है। सुख के साधनों से सम्पन्न होने के बाद भी उसे सुख की अनुभूति नहीं होती। पक्षियों के कलरव अथवा उनके मधुर स्वर में उसे कोई आकर्षण नहीं दिखता। उसे सुन्दर और खिले हुए फूलों से भी ईर्ष्या होने लगती है और उसमें कोई सुन्दरता का अनुभव नहीं होता अर्थात् प्राकृतिक सौन्दर्य भी उसे सुख व आनन्द प्रदान नहीं करता ।
लेखक आगे कहता है कि निन्दा करने वाला प्रायः अपने वचनों के बाणों से अपने प्रतिद्वन्द्वी को घायल करके आनन्द और सुख का अनुभव करता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति समझता है कि उसने निन्दा करके अपने प्रतिद्वन्द्वी को नीचा दिखा दिया है और अपना स्थान दूसरों की दृष्टि में ऊँचा बना लिया है, इसलिए वह खुश होता है और इसी खुशी को प्राप्त करना उसका सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।
(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों के सुख के साधनों का रोना रोता रहता है कि उसके ये साधन अपने क्यों न हुए। वह ईर्ष्या की आग में जलता रहता है और उसे अपने सामने के सुख में कोई आनन्द नहीं मिल पाता है। वह ऐसी मनोदशा में जीता है कि उसे पक्षियों के गीत और फूल भी आकर्षित नहीं कर पाते हैं।
7. ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वन्द्विता से होता है, क्योंकि भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता। यह एक ऐसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है, क्योंकि प्रतिद्वन्द्विता से मनुष्य का विकास होता है, किन्तु अगर आप संसारव्यापी सुयश चाहते हैं, तो आप रसेल के मतानुसार शायद नेपोलियन से स्पर्द्धा करेंगे, मगर याद रखिए कि नेपोलियन भी सीजर से स्पर्द्धा करता था और सीजर सिकन्दर से तथा सिकन्दर हरक्युलिस से । Imp [2024,17]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ग) विश्वव्यापी प्रसिद्धि के इच्छुक लोगों को किस से स्पर्द्धा करनी चाहिए और उन्हें क्या याद रखना चाहिए?
(घ) लेखक के अनुसार प्रतिद्वन्द्विता का सकारात्मक पक्ष क्या है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक ने ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वन्द्विता से बताया है और उसे मनोवैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत किया है। कोई भिखारी या कंगाल व्यक्ति किसी धनी व्यक्ति से ईर्ष्या नहीं करता है। ईर्ष्या का कारण है- प्रतिद्वन्द्विता और यह प्रतिद्वन्द्विता सदैव अपने बराबर वालों में ही उत्पन्न होती है।
ईर्ष्या मनुष्य का चारित्रिक दोष है, क्योंकि वह व्यक्ति के आनन्दमय जीवन में बाधा उत्पन्न करती है, फिर भी यह एक दृष्टि से लाभप्रद भी हो सकती है, क्योंकि ईर्ष्या के अन्दर ही प्रतिद्वन्द्विता का भाव समाहित होता है। ईर्ष्या के कारण ही मनुष्य किसी अन्य व्यक्ति से स्पर्द्धा ( प्रतियोगिता) करता है और अपने जीवन स्तर को विकासशील बनाता है।
रसेल के अनुसार, जो व्यक्ति संसार में अपने यश की कामना करता है, वह शायद नेपोलियन से स्पर्द्धा करेगा, किन्तु नेपोलियन भी सीजर से स्पर्द्धा करता था और सीजर हरक्युलिस से। आशय यह है- स्पर्द्धा से कोई भी व्यक्ति उन्नति के पथ पर अग्रसर होकर अपने जीवन को विकासशील बना सकता है।
(ग) विश्वव्यापी प्रसिद्धि पाने के इच्छुक लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इसके लिए नेपोलियन जैसे विश्वविख्यात और महत्त्वाकांक्षी शासक से प्रतिस्पर्द्धा करनी होगी। उसे यह बात भी याद रखनी होगी कि नेपोलियन जूलियस सीजर से, सीजर सिकन्दर से और सिकन्दर हरक्युलिस से प्रतिस्पर्द्धा करता था। प्रतिस्पर्द्धा की भावना के कारण ये शासक इतने महान तथा विश्वप्रसिद्ध बन सके।
(घ) लेखक के अनुसार, प्रतिद्वन्द्विता का सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे मनुष्य का विकास होता है और उसके जीवन स्तर में सुधार होता है।
8. ईर्ष्या का एक पक्ष सचमुच ही लाभदायक हो सकता है, जिसके अधीन हर आदमी, हर जाति और हर दल स्वयं को अपने प्रतिद्वन्द्वी का समकक्ष बनाना चाहता है, किन्तु यह तभी सम्भव है, जब कि ईर्ष्या से जो प्रेरणा आती हो, वह रचनात्मक हो। अक्सर तो ऐसा ही होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यह महसूस करता है कि कोई चीज है जो उसके भीतर नहीं है, कोई वस्तु है, जो दूसरों के पास है, किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि इस वस्तु को प्राप्त कैसे करना चाहिए और गुस्से में आकर वह अपने किसी पड़ोसी मित्र या समकालीन व्यक्ति को अपने श्रेष्ठ मानकर उससे जलने लगता है, जबकि वे लोग भी अपने आप से शायद वैसे ही असन्तुष्ट हों । Imp [2016, 15]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति लोगों से ईर्ष्या क्यों करता है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक का कहना है कि ईर्ष्या व्यक्ति को हर प्रकार से हानि पहुँचाती है। ईर्ष्या करने वाला मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता है, परन्तु इसका एक ‘ सकारात्मक पक्ष भी है। ईर्ष्या का यह सकारात्मक पक्ष व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक समाज व प्रत्येक जाति में स्वाभाविक इच्छा उत्पन्न होती है कि वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के समान ही उन्नति करे और इसके लिए सकारात्मक प्रयास करे। ऐसा करना तभी सम्भव है, जब ईर्ष्या से उत्पन्न यह प्रेरणा विनाशात्मक न होकर रचनात्मक हो ।
(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति लोगों से इसलिए ईर्ष्या करने लगता है, क्योंकि दूसरे के पास उन वस्तुओं को देखकर उसे दुःख होता है, जो उसके पास नहीं हैं । वह उन वस्तुओं को कैसे प्राप्त करे, वह यह समझ नहीं पाता और क्रोध में आकर उस व्यक्ति से जलने लगता है ।
9. तो ईर्ष्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है? नीत्से कहता है कि “बाजार की मक्खियों को छोड़कर एकान्त की ओर भागो, जो कुछ भी अमर तथा महान है, उसकी रचना और निर्माण बाजार तथा सुयश से दूर रहकर किया जाता है, जो लोग नए मूल्यों का निर्माण करने वाले हैं, वे बाजारों में नहीं बसते, वे शोहरत के पास नहीं रहते।” जहाँ बाजार की मक्खियाँ नहीं भिनकतीं, वहाँ एकान्त है। [2012]
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) ईर्ष्यालु लोगों से बचने के क्या उपाय हैं?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) ईर्ष्यालु लोग सामाजिक वातावरण को दूषित करते हैं। ऐसे लोगों से बचने का उपाय बताता हुआ लेखक कहता वह है कि जो लोग समाज की प्रगति के नए-नए मूल्यों और सिद्धान्तों की रचना करते हैं, जो व्यक्ति अपना स्वयं का विकास चाहते हैं, उन्हें ऐसी बाजारू मक्खियों के समान भिनभिनाने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि इन बाजारू मक्खियों के साथ रहकर कोई भी सुकार्य पूर्ण नहीं किया जा सकता। कोई भी रचनात्मक एवं महान कार्य बाजार या भीड़ से दूर रहकर ही किया जाता है। श्रेष्ठ कार्य करने के लिए प्रसिद्धि के लोभ को त्यागना पड़ता है।
(ग) ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपाय यही है कि धन-प्रतिष्ठा आदि को देखकर जलने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए और यश प्राप्ति का लोभ त्यागकर मन में लोगों के कल्याण की कामना रखते हुए एकान्त में रहना चाहिए।
10. ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है, जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है? जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएगी, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा। V. Imp [2024, 20, 11] 
प्रश्न
(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(ग) ईर्ष्या से बचने के लिए क्या उपाय करने चाहिए?
(घ) लेखक ईर्ष्या से बचने के लिए किस आदत को छोड़ने के लिए कहता है?
उत्तर
(क) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
(ख) लेखक ईर्ष्या से बचने के उपाय को उजागर करते हुए कहता है कि हमें अपने मन पर नियन्त्रण करना चाहिए । मन पर नियन्त्रण करना ही मानसिक अनुशासन कहलाता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति यदि अपने मन व मस्तिष्क को नियन्त्रित करेगा, तो वह निरर्थक बातों पर विचार करने की बुरी आदत से छुटकारा पा सकेगा। जो वस्तु हमारे पास नहीं है, उसके विषय में सोचना व्यर्थ है, जिसके मन में ईर्ष्या – भाव जाग्रत हो गया है उसे यह जानना आवश्यक है कि किस साधन के अभाव के कारण उसके मन में ईर्ष्या भाव उत्पन्न हुआ है। इसके पश्चात् उसे उन अभावों को दूर करने का सकारात्मक प्रयत्न करना चाहिए। उस व्यक्ति को ऐसे उपायों की खोज करनी चाहिए, जिससे उन अभावों की पूर्ति रचनात्मक तरीके से हो सके। जिस दिन ईर्ष्यालु व्यक्ति की यह जानने की इच्छा उत्पन्न हो जाएगी कि किस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है और उस अभाव की पूर्ति का सकारात्मक व रचनात्मक उपाय क्या है, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।
(ग) ईर्ष्या से बचने के लिए व्यक्ति को चाहिए कि वह स्वयं को मानसिक रूप से अनुशासित रखे। जिन वस्तुओं का उसे अभाव है, उनके बारे में सोच-विचार नहीं करना चाहिए तथा अभावों की पूर्ति के लिए सकारात्मक प्रयास करने चाहिए।
(घ) लेखक ईर्ष्या से बचने के लिए फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत को छोड़ने के लिए कहता है।

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