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UP Board Class 10 Hindi Chapter 7 – हिमालय से एवं वर्षा सुन्दरी के प्रति (काव्य-खण्ड)

UP Board Class 10 Hindi Chapter 7 – हिमालय से एवं वर्षा सुन्दरी के प्रति (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7 हिमालय से एवं वर्षा सुन्दरी के प्रति (काव्य-खण्ड)

जीवन-परिचय
कवयित्री एवं लेखिका महादेवी वर्मा का जन्म वर्ष 1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद शहर में हुआ था। इनके पिता गोविन्दसहाय वर्मा भागलपुर के एक कॉलेज में प्रधानाचार्य थे। माता हेमरानी साधारण कवयित्री थीं एवं श्रीकृष्ण में अटूट श्रद्धा रखती थीं। माता के गुणों का महादेवी पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में और उच्च शिक्षा प्रयाग में हुई थी। नौ वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह स्वरूपनारायण वर्मा से हुआ, किन्तु इन्हीं दिनों इनकी माता का स्वर्गवास हो गया, लेकिन इन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा।
इन्होंने मैट्रिक से लेकर एम. ए. तक की परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में ही उत्तीर्ण कीं । वर्ष 1933 में इन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्या पद को सुशोभित किया। ये लड़कियों की शिक्षा और नारी की स्वतन्त्रता के लिए सदैव संघर्ष करती रहीं। इनके जीवन पर महात्मा गाँधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर का प्रभाव पड़ा।
साहित्यिक परिचय
महादेवी जी साहित्य चित्रकला में भी रुचि रखती थीं। सर्वप्रथम इनकी रचनाएँ चाँद नामक पत्रिका में प्रकाशित हुईं। ये ‘चाँद’ पत्रिका की सम्पादिका भी रहीं। इनकी साहित्य साधना के लिए भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया। इन्हें ‘सेकसरिया’ तथा ‘मंगलाप्रसाद’ पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 1983 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा इन्हें एक लाख रुपये का भारत-भारती पुरस्कार तथा इसी वर्ष काव्य-ग्रन्थ यामा पर इन्हें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ पुरस्कार दिया गया। इनके काव्य में उपस्थित विरह-वेदना अमूल्य मानी जाती है। इसी कारण इन्हें ‘आधुनिक युग की मीरा’ भी कहा जाता है। 11 सितम्बर, 1987 को यह महान कवयित्री पंचतत्त्व में विलीन हो गईं।
कृतियाँ (रचनाएँ)
महादेवी जी ने पद्य एवं गद्य दोनों ही विधाओं पर समान अधिकार से अपनी लेखनी चलाई।
इनकी कृतियाँ निम्नलिखित हैं
  • नीहार यह महादेवी जी का प्रथम काव्य संग्रह है। उनके इस काव्य में 47 भावात्मक गीत संकलित हैं और वेदना का स्वर मुखर हुआ है।
  • रश्मि इस काव्य संग्रह में आत्मा-परमात्मा के मधुर सम्बन्धों पर आधारित 35 कविताएँ संकलित हैं।
  • नीरजा इस संकलन में 58 गीत संकलित हैं, जिनमें से अधिकांश विरह-वेदना से परिपूर्ण हैं। कुछ गीतों में प्रकृति का मनोरम चित्र अंकित किया गया है।
  • सान्ध्य गीत 58 गीतों के इस संग्रह में परमात्मा से मिलन का चित्रण किया गया है।
  • दीपशिखा इसमें रहस्य – भावना प्रधान 51 गीतों को संग्रहीत किया गया है।
  • अन्य रचनाएँ अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, श्रृंखला की कड़ियाँ, पथ के साथी, क्षणदा, साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबन्ध, संकल्पिता, मेरा परिवार, चिन्तन केक्षण आदि प्रसिद्ध गद्य-रचनाएँ हैं, इनके अतिरिक्त – सप्तवर्णा, यामा, सन्धिनी आदि गीतों के समूह प्रकाशित हो चुके हैं।
भाषा-शैली
महादेवी जी ने अपने गीतों में स्निग्ध और सरल, तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग किया है। इनकी रचनाओं में उपमा, रूपक, श्लेष, मानवीकरण आदि अलंकारों की छटा देखने को मिलती है। इन्होंने भावात्मक शैली का प्रयोग किया, जो सांकेतिक एवं लाक्षणिक है। इनकी शैली में लाक्षणिक प्रयोग एवं व्यंजना के प्रयोग के कारण अस्पष्टता व दुरूहता दिखाई देती है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
महादेवी जी की कविताओं में नारी-हृदय की कोमलता और सरलता का बड़ा ही मार्मिक चित्रण हुआ है। हिन्दी साहित्य में पद्य लेखन के साथ-साथ अपने गद्य लेखन द्वारा हिन्दी भाषा को सजाने-सँवारने तथा अर्थ- गाम्भीर्य प्रदान करने का जो प्रयत्न इन्होंने किया है, वह प्रशंसा के योग्य है। हिन्दी के रहस्यवादी कवियों में इनका स्थान सर्वोपरि है।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
हिमालय से
1. हे चिर महान् ! यह स्वर्णरश्मि छू श्वेत भाल,
बरसा जाती रंगीन हास: सेली बनता है, इन्द्रधनुष,
परिमल मल-मल जाता बतास ! पर रागहीन तू हिमनिधान !
शब्दार्थ चिर-सदैव हमेशा स्वर्णरश्मि – सुनहरी किरणें; भाल – मस्तक; हास-हँसी; सेली – पगड़ी; परिमल-सुगन्ध; मल-मल – अंग-अंग बतास – वायु ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए |
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘काव्य खण्ड’ के ‘हिमालय से’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवयित्री ‘महादेवी वर्मा’ द्वारा रचित ‘सान्ध्य गीत’ से लिया गया है।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री महादेवी जी ने हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवयित्री हिमालय की महानता का वर्णन करते हुए कहती हैं कि हे हिमालय ! तुम तो हमेशा से ही महान हो । जब सूर्य की सुनहरी किरणें सफेद बर्फ से ढके तुम्हारे मस्तक को छूती हैं, तब तुम्हारे चारों ओर रंगीन हँसी-सी फैल जाती है। बर्फ पर जब सूर्य की सुनहरी किरणें पड़ती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है; जैसे- हिमालय ने अपने सिर पर इन्द्रधनुषी पगड़ी बाँध रखी हो। चारों ओर खुशी की लहर फैल गई हो । सतरंगी इन्द्रधनुष तुम्हारी पगड़ी बन जाती है तथा ठण्डी हवा तुम्हारे शरीर के प्रत्येक अंग को सुगन्ध से भर देती है, परन्तु तुम तो वैरागी की भाँति उदासीन ही रहते हो। तुम्हें इन वस्तुओं से किसी प्रकार का अनुराग अर्थात् प्रेम नहीं है, इसलिए तुम महान हो ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी बोली हिन्दी
शैली चित्रात्मक एवं भावात्मक
गुण माधुर्य
रस शान्त
छन्द अतुकान्त-मुक्त
शब्द- शक्ति लक्षणा
अलंकार
मानवीकरण अलंकार यहाँ हिमालय का मानवीकरण किया गया है, जिस कारण यहाँ मानवीकरण अलंकार है ।
रूपक अलंकार यहाँ स्वर्ण रूपी सूर्य की किरणों की बात की गई है, जिस कारण रूपक अलंकार है।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘मल-मल’ में एक शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
2. नभ में गर्वित झुकता न शीश,
पर अंक लिए है दीन क्षार,
मन गल जाता नत विश्व देख,
तन सह लेता है कुलिश भार,
कितने मृदु कितने कठिन प्राण !
शब्दार्थ गर्वित-गर्व से भरा हुआ; अंक- गोद; क्षार-मिट्टी; कुलिश-कठोर।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने हिमालय की किस स्थिति का वर्णन किया है?
(iv) प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने हिमालय को क्यों बताया ? कृपालु
(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस है? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत ।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने अपनी भावनात्मक अनुभूति और हिमालय की कठोरता और कोमलता दोनों का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या महादेवी जी कहती हैं कि हे हिमालय ! तुम स्वाभिमान से नभ में अपना सिर गर्व से ऊँचा उठाकर खड़े हो अर्थात् तुम्हारा सिर किसी के भी सामने नहीं झुकता ।
तुम इतने कृपालु हो कि तुम इस दीनरूपी तुच्छ मिट्टी की धूल को अपनी गोद में लिए खड़े हो । संसार का मस्तक अपने सामने झुका देखकर तुम्हारा मन दया से पिघल जाता है और सरिताओं के रूप में प्रवाहित होने लगता है। तुम्हारा शरीर इतना कठोर है कि तुम इस वज्र के आघात को भी सरलता से सह लेते हो, तुम अन्दर से कितने कोमल हो और बाहर से कितने कठोर दिखाई देते हो ।
काव्य सौन्दर्य
भाषा खड़ी बोली हिन्दी
शैली चित्रात्मक और भावात्मक
गुण माधुर्य
रस शान्त
छन्द अतुकान्त-मुक्त
शब्द – शक्ति लक्षणा
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘कितने कठिन’ में ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
विरोधाभास अलंकार ‘कितने मृदु कितने कठिन प्राण’ में कोमलता व कठोरता का विरोध न होने पर भी विरोध का आभास होने के कारण विरोधाभास अलंकार है ।
मानवीकरण अलंकार हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य का मानवीकरण किया गया है, जिस कारण यहाँ मानवीकरण अलंकार है ।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने हिमालय की दृढ़ता एवं उसके प्रति अपनी भावनात्मक अनुभूति का वर्णन किया है।
(iv) प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने हिमालय को कृपालु इसलिए कहा है, क्योंकि वह तुच्छ मिट्टी की धूल को अपनी गोद में लिए खड़ा है।
(v) इस पद्यांश में शान्त रस है । जब तत्त्व ज्ञान की प्राप्ति अथवा संसार से वैराग्य होने पर परमात्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान होने पर मन को जो शान्ति मिलती है, तब शान्त रस पुष्ट होता है।
3. टूटी है तेरी कब समाधि,
झंझा लौटे शत हार-हार;
चला दृगों से किन्तु नीर !
सुनकर जलते कण की पुकार !
सुख से विरक्त दुःख में समान!
मेरे जीवन का आज मूक,
तेरी छाया से हो मिलापः
तन तेरी साधकता छू ले,
मन ले करुणा की थाह नाप !
उर में पावस दृग में विहान् !
शब्दार्थ समाधि-तपस्वी; झंझा- आँधी; जलते कण की पुकार – धूप से तप्त धूल कणों की व्यथा; विरक्त – वैरागी; मूक- चुप्पी साधकता – साधना; थाह – गहराई; पावस- वर्षा; विहान – प्रातः काल का सौन्दर्य ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए |
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
(iv) पद्यांश में कवयित्री क्या कामना करती है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने हिमालय की दृढ़ता एवं उसके प्रति अपनी भावात्मक अनुभूति का भी वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवयित्री कहती है कि हे हिमालय! तुम तो एक तपस्वी की भाँति समाधि लगाकर बैठे हो। तुम्हारी यह समाधि कब टूटी है ? आँधी के सैकड़ों झटके तुम्हें लगे, पर वे तुम्हारा कुछ न बिगाड़ सके। तुम विचलित नहीं हुए। वे स्वयं ही हार मान कर चले गए।
एक ओर तो तुम्हारे अन्दर इतनी दृढ़ता एवं कठोरता है कि कोई भी बाधा तुम्हारे मार्ग की रुकावट नहीं बन सकती और दूसरी ओर तुम इतने सहृदय और भावुक हो कि धूप में जलते हुए कण की पुकार सुनकर तुम्हारे नेत्रों से आँसुओं की धारा फूट पड़ती है। तुम किसी का दुःख नहीं देख सकते । तुम तो एक योगी हो, जो सुख से विरक्त रहते हो। तुम तो सुख और दुःख में समान भाव से स्थित रहते हो और यही भावना तुम्हारी उच्चता की प्रतीक है।
मैं तो यह कामना करती हूँ कि मैं अपने जीवन के मौन को तुम्हारी छाया में मिला दूँ अर्थात् कवयित्री हिमालय के गुणों को अपने आचरण में उतारना चाहती हैं। मेरा शरीर भी तुम्हारी तरह कठोर साधना शक्ति से परिपूर्ण हो और मेरा मन इतनी करुणा से भर जाए, जितनी करुणा तुम्हारे हृदय में भरी हुई है। मेरे हृदय में भी वर्षा का निवास है तथा नेत्रों में प्रातः कालीन सौन्दर्य भरा हुआ है अर्थात् मेरे हृदय में करुणा के कारण सरसता बनी रहे। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार हिमालय सारे कष्टों को सहन करता है, वैसे ही मैं भी संकटों से विचलित न होऊँ ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पंक्तियों में हिमालय का मानवीकरण किया गया है। उसे सुख और दुःख में समान रहने वाले योगी के समान बताया है।
भाषा खड़ी बोली हिन्दी
शैली गीति
गुण माधुर्य
रस शान्त
छन्द अतुकान्त-मुक्त
शब्द – शक्ति लक्षणा
अलंकार
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘हार-हार’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।
मानवीकरण अलंकार इस पद्यांश में ‘समाधि’ शब्द में मानवरूपी प्रस्तुति की गई है। अतः यहाँ मानवीकरण अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री हिमालय को देखकर उसके गुणों को अपने मन में सहेजने की कामना करती है। वह कहती है कि मेरा शरीर भी तुम्हारी तरह कठोर साधना शक्ति से परिपूर्ण हो और मेरा मन इतनी करुणा से भर जाए, , जितनी करुणा तुम्हारे हृदय में भरी हुई है। मेरे हृदय में करुणा के कारण सरसता बनी रहे। जिस प्रकार हिमालय सारे कष्टों को सहन करता है, वैसे ही मैं भी संकटों से विचलित न होऊँ ।
वर्षा सुन्दरी के प्रति
4. रूपसि तेरा घन-केश-पाश! श्यामल-श्यामल कोमल-कोमल,
लहराता सुरभित केश-पाश! नभ-गंगा की रजतधार में
धो आई क्या इन्हें रात ? कम्पित हैं तेरे सजल अंग,
सिहरा सा तन हे सद्यस्नात! भीगी अलकों के छोरों से
बूँदें कर विविध लास ! रूपसि तेरा घन-केश-पाश !
शब्दार्थ रूपसि – सुन्दरी; केश-पाश- बालों का समूह धारा; कम्पित-काँपना; सद्यस्नात- तुरन्त स्नान की हुई रजतधार – चाँदी की अलकों – बाल।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) कवयित्री ने वर्षा का सुन्दरी के रूप में वर्णन किया है। स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के ‘काव्य खण्ड’ के ‘वर्षा सुन्दरी के प्रति’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवयित्री ‘महादेवी वर्मा’ द्वारा रचित ‘नीरजा’ से लिया गया है।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में वर्षा का सुन्दरी के रूप में वर्णन किया गया है। इसमें वर्षा का मानवीकरण किया गया है।
(ii) व्याख्या महादेवी जी कहती हैं कि हे वर्षा रूपी सुन्दरी ! तेरे घने केश रूपी जाल बादलों के समान श्यामल हैं और अत्यन्त कोमल हैं। ये सुगन्ध से भरकर लहरा रहे हैं। क्या तू इन केशों को आकाशगंगा की चाँदी के समान श्वेत धारा में धोकर आई है? तेरे अंग भीगे हुए हैं और ठण्ड से काँप रहे हैं। तेरा शरीर ऐसे सिहर रहा है, जैसे कोई महिला अभी-अभी स्नान करके आई हो। तेरे भीगे हुए बालों की लटों से जल की बूँदें टपक रही हैं, जो नृत्य करती हुई-सी प्रतीत होती हैं। हे सुन्दरी ! तेरा यह बादलरूपी बालों का समूह अत्यन्त सुन्दर लग रहा है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में वर्षा का सुन्दरी के रूप में चित्रण किया गया है।
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली चित्रात्मक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द मुक्त
अलंकार
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘श्यामल – श्यामल’ और ‘कोमल-कोमल’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। रूपक अलंकार ‘रूपसि तेरा घन – केश – पाश!’ में बादलरूपी घने बालों के समूह का वर्णन किया गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है।
मानवीकरण अलंकार पूरे पद्यांश में वर्षा का सुन्दरी के रूप में चित्रण कर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है, जिस कारण यहाँ मानवीकरण अलंकार है।
(iv) प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने वर्षा का सुन्दरी के रूप में वर्णन किया है। कवयित्री वर्षा से कहती है कि हे वर्षा रूपी सुन्दरी! तेरे घने केश रूपी जाल बादलों के समान श्यामल हैं और अत्यन्त कोमल हैं। ये सुगन्ध से भरकर लहरा रहे हैं। तेरे अंग भीगे हुए हैं और ठण्ड से कॉप रहे हैं। तेरा शरीर ऐसे सिहर रहा है, जैसे कोई महिला अभी-अभी स्नान करके आई हो। वर्षा का यह बादलरूपी बालों का समूह अत्यन्त सुन्दर लगता है!
5. सौरभ भीना झीना गीला
लिपटा मृदु अंजन-सा दुकूल;
चल अंचल से झर झर झरते
पथ में जुगनू के स्वर्ण फूल;
दीपक से देता बार-बार
तेरा उज्ज्वल चितवन-विलास!
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
शब्दार्थ सौरभ-सुगन्ध; भीना-भरा हुआ; झीना-बारीक; पतला मृदु-कोमल; अंजन- सुरमा, काजल; दुकूल- रेशमी वस्त्र; चल-हिलते हुए, चलायमान|
प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए |
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
अथवा उपर्युक्त पद्यांश में प्रयुक्त रस और अलंकार का नाम लिखिए।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में वर्षा का सुन्दरी के रूप में सजीव चित्रण किया गया है।
(ii) व्याख्या कवयित्री वर्षा को सम्बोधित करती हुई कहती है कि है वर्षारूपी सुन्दरी! तेरे शरीर पर सुगन्ध से भरा महीन, गीला, कोमल और श्याम वर्ण का रेशमी वस्त्र लिपटा हुआ है, जो आँखों के काजल के समान प्रतीत हो रहा है अर्थात् ये काले बादल इस तरह प्रतीत हो रहे हैं जैसे किसी सुन्दरी के सुगन्धित, कोमल और काले रंग के वस्त्र हों। तेरे चंचल आँचल से रास्ते में जुगनू रूपी स्वर्ण निर्मित फूल झड़ रहे हैं। बादलों में चमकती बिजली तुम्हारी उज्ज्वल दृष्टि है। जब तुम अपनी ऐसी सुन्दर दृष्टि किसी पर डालती हो, तो उसके मन में प्रेम के दीपक जगमगाने लगते हैं। हे रूपवती वर्षा सुन्दरी! तेरे ये बादलरूपी घने केश अत्यधिक सुन्दर हैं।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में वर्षा का मानवीकरण किया गया है।
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली चित्रात्मक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द मुक्त
अलंकार
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘झर-झर’ और ‘बार बार’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
उपमा अलंकार ‘मृदु अंजन-सा दुकूल’ में रेशमी वस्त्र को काजल सा बताया गया है अर्थात् उपमेय में उपमान की समानता है, जिस कारण यहाँ उपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार ‘जुगनू के स्वर्ण फूल’ में जुगनू का वर्णन स्वर्ण रूपी फूल के समान किया गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है।
6. उच्छ्वसित वक्ष पर चंचल है
बक-पाँतों का अरविन्द हार;
तेरी निश्वासें छू भू को
बन बन जातीं मलयज बयार;
केकी-रव की नुपूर-ध्वनि सुन
जगती जगती की मूक प्यास!
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
शब्दार्थ उच्छ्वसित-दीर्घ साँस से भरा हुआ; बक-पाँत – बगुलों की पंक्ति; अरविन्द – कमल; निश्वास बाहर निकलने वाली श्वास; मलयज-मलय (चन्दन) के पर्वत से आने वाली हवा; केकी रव-मोर की ध्वनि; नुपूर – घुँघरू; पाश-बालों का समूह|
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
अथवा ‘जगती जगती की मूक प्यास’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में वर्षा का मानवीकरण कर उसका सुन्दरी के रूप में चित्रण किया गया है।
(ii) व्याख्या कवयित्री कहती है कि हे वर्षा रूपी सुन्दरी! दीर्घ श्वास के कारण तेरा वक्षस्थल कम्पित हो रहा है, जिसके कारण बगुलों की पंक्ति रूपी कमल के फूलों की माला चंचल-सी प्रतीत हो रही है।
जब तुम्हारे मुख से निकली बूँदरूपी साँसें पृथ्वी पर गिरती हैं, तो उसके पृथ्वी से स्पर्श होने से उठने वाली महक मलयगिरि की सुगन्धित वायु प्रतीत होती है। तुम्हारे आने पर चारों ओर नृत्य करते हुए मोरों की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है, जोकि तुम्हारे पैरों में बँधे हुए घुंघरुओं के समान मालूम पड़ती है। जिसको सुनकर लोगों के मन में मधुर प्रेम की प्यास जाग्रत होने लगती है।
हे वर्षा रूपी सुन्दरी ! तेरा केश रूपी पाश काले-काले बादलों के समान है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली चित्रात्मक
गुण माधुर्य
रस श्रृंगार
छन्द मुक्त
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘जगती – जगती’ में ‘ज’, ‘ग’ और ‘त’ वर्ण की पुनरावृत्ति हो रही है, जिस कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
यमक अलंकार यहाँ जगती शब्द का प्रयोग दो अर्थों में हो रहा है जाग्रत होना तथा संसार । इस कारण यहाँ यमक अलंकार है।
7. इन स्निग्ध लटों से छा दे तन
पुलकित अंकों में भर विशाल;
झुक सस्मित शीतल चुम्बन से
अंकित कर इसका मृदुल भाल;
दुलरा देना, बहला दे ना
यह तेरा शिशु जग है उदास !
रूपसि तेरा घन-केश- पाश !
शब्दार्थ स्निग्ध-चिकनी; लटों-लट; पुलकित – रोमांचित; अंक- गोद; सस्मित – मुस्कुराहट के साथ; अंकित – चिह्नित; शिशु जग-संसार रूपी बालक।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) पद्यांश में कवयित्री ने वर्षा और संसार की कल्पना किससे की है? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने वर्षा में मातृत्व की और संसार में उसके शिशु की कल्पना की है।
(ii) व्याख्या कवयित्री वर्षारूपी सुन्दरी से आग्रह करती है कि हे वर्षा रूपी सुन्दरी! तुम अपने कोमल बालों की छाया में इस संसाररूपी अपने शिशु को समेट लो। उसे अपनी रोमांचित और विशाल गोद में रखकर, उसके मस्तक को मुस्कुराहट के साथ चूम लो । हे सुन्दरी ! तुम्हारे बादलरूपी बालों की छाया से, मधुर चुम्बन और दुलार से इस संसाररूपी शिशु का मन बहल जाएगा और उसकी उदासी भी दूर हो जाएगी। हे वर्षारूपी सुन्दरी! तुम्हारी बादलरूपी काली केश राशि बड़ी मोहक प्रतीत हो रही है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली चित्रात्मक और भावात्मक
गुण माधुर्य
रस शृंगार और वात्सल्य
छन्द मुक्त
अलंकार
रूपक अलंकार ‘शिशु जग’ में उपमेय में उपमान का आरोप है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है ।
मानवीकरण अलंकार इस पद्यांश में वर्षा को माता एवं पृथ्वी को पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है। अतः यहाँ मानवीकरण अलंकार है ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने वर्षा में मातृत्व और संसार में उसके शिशु की कल्पना की है। वह वर्षा से कहती है कि तुम अपने कोमल बालों की छाया में इस संसाररूपी अपने शिशु को समेट लो। उसे अपनी रोमांचित और विशाल गोद में रखकर, उसके मस्तक को मुस्कुराहट के साथ चूम लो ।

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