UP Board Class 10 Hindi Chapter 8 – चींटी एवं चन्द्रलोक में प्रथम बार (काव्य-खण्ड)
UP Board Class 10 Hindi Chapter 8 – चींटी एवं चन्द्रलोक में प्रथम बार (काव्य-खण्ड)
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 8 चींटी एवं चन्द्रलोक में प्रथम बार (काव्य-खण्ड)
जीवन-परिचय
कविवर सुमित्रानन्दन पन्त जी का जन्म 20 मई, 1900 को अल्मोड़ा के निकट कौसानी ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पण्डित गंगादत्त पंत था। जन्म के छः घण्टे पश्चात् ही इनकी माता स्वर्ग सिधार गईं। अतः इनका लालन-पालन पिता तथा दादी ने किया।
इनकी प्रारम्भिक शिक्षा कौसानी गाँव में तथा उच्च शिक्षा का पहला चरण अल्मोड़ा में और बाद में बनारस के ‘क्वींस’ कॉलेज में हुआ । इनका काव्यगत सृजन यहीं से प्रारम्भ हुआ । इन्होंने स्वयं ही अपना नाम ‘गुसाईं दत्त’ से बदलकर सुमित्रानन्दन पन्त रख लिया ।’ सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित इनकी रचनाओं ने काव्य-मर्मज्ञों के हृदय में अपनी धाक जमा ली। ये छायावाद के प्रमुख स्तम्भों में से एक थे। इन्होंने वर्ष 1916-1977 तक साहित्य सेवा की। 28 दिसम्बर, 1977 को प्रकृति का यह सुकुमार कवि पंचतत्त्व में विलीन हो गया।
साहित्यिक परिचय
सुमित्रानन्दन पन्त छायावादी युग के महान कवियों में से एक माने जाते हैं। सात वर्ष की अल्पायु से ही इन्होंने कविताएँ लिखना प्रारम्भ कर दिया था।
वर्ष 1916 में इन्होंने ‘गिरजे का घण्टा’ नामक सर्वप्रथम रचना लिखी। इलाहाबाद के ‘म्योर कॉलेज’ में प्रवेश लेने के उपरान्त इनकी साहित्यिक रुचि और भी अधिक विकसित हो गई। इन्हें ‘कला और बूढ़ा चाँद’ पर ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, लोकायतन पर ‘सोवियत भूमि पुरस्कार’ और ‘चिदम्बरा’ पर भारतीय ‘ज्ञानपीठ’ पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने पन्त जी को ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया।
कृतियाँ (रचनाएँ)
पन्त जी की कृतियाँ निम्नलिखित हैं
- काव्य वीणा, ग्रन्थि, पल्लव, गुंजन, स्वर्ण किरण, युगान्त, युगवाणी, लोकायतन, चिदम्बरा |
- नाटक रजतरश्मि, शिल्पी, ज्योत्स्ना ।
- उपन्यास पन्त जी की अन्य रचनाएँ हैं- पल्लविनी, अतिमा, युगपथ, ऋता, स्वर्ण किरण, उत्तरा, कला और बूढ़ा चाँद, शिल्पी, स्वर्ण धूलि आदि ।
भाषा-शैली
पन्त जी ने गीतात्मक शैली अपनाई। सरलता, मधुरता, चित्रात्मकता, कोमलता और संगीतात्मकता इनकी शैली की मुख्य विशेषताएँ हैं। पन्त जी ने खड़ी बोली को ब्रज भाषा जैसा माधुर्य एवं सरसता प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
पन्त जी सौन्दर्य के उपासक थे। प्रकृति, नारी और कलात्मक सौन्दर्य इनकी सौन्दर्यानुभूति के तीन मुख्य केन्द्र रहे। इसी कारण इन्हें प्रकृति का सुकुमार एवं कोमल भावनाओं से युक्त कवि कहा जाता है। पन्त जी का सम्पूर्ण काव्य आधुनिक साहित्य चेतना का प्रतीक है, जिसमें धर्म, दर्शन, नैतिकता, सामाजिकता, भौतिकता, आध्यात्मिकता सभी का समावेश है।
पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर
चींटी
1. चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल
वह है पिपीलिका पाँति !
देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत् !
कन-कन कनके चुनती अविरत !
शब्दार्थ सरल-सीधी; विरल-पतली, जो घनी न हो; तम – अन्धकार; लघुपद-छोटे-छोटे कदम; पिपीलिका – चींटियाँ; सतत – निरन्तर; अविरत – बिना रुके।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) कवि चींटी की किस विशेषता का वर्णन करता है?
(v) कवि ‘वह है पिपीलिका पाँति !’ के द्वारा किस आदर्श के प्रति संकेत करता है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रकृति के सुकुमार कवि ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित ‘युगवाणी’ काव्य संग्रह में शामिल तथा हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी के ‘काव्य खण्ड’ में शामिल शीर्षक ‘चींटी’ से उद्धृत हैं।
प्रसंग इन पंक्तियों में कवि ने चींटी जैसे तुच्छ प्राणी की निरन्तर गतिशीलता का निर्भय होकर विचरण करने का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि क्या तुमने कभी चींटी को देखा है ? वह अत्यन्त सरल और सीधी है। वह पतली और काली रेखा की भाँति, काले धागे की भाँति हिलती-डुलती हुई, अपने छोटे-छोटे पैरों से प्रत्येक क्षण चलती है। वे सब एक पंक्ति में आगे-पीछे चलती हैं तथा देखने में काले धागे की रेखा-सी दिखती हैं। वह चींटियों की पंक्ति है, तुम ध्यान से देखों, वह लगातार चलती रहती है, लगातार कार्य करती रहती है। वह अपने और अपने परिवार के लिए छोटे ओर उपयोगी कणों को चुनती रहती है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने चींटी के माध्यम से निरन्तर गतिशील रहने की प्रेरणा दी है।
भाषा साहित्यिक खड़ीबोली
शैली वर्णनात्मक
गुण ओज
रस वीर
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘हिल-डुल’, ‘पिपीलिका पाँति’ और ‘कन – कन कनके’ में क्रमश: ‘ल’, ‘प’, ‘क’ और ‘न’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
उपमा अलंकार ‘तम के तागे सी’ और ‘काली रेखा’ यहाँ उपमेय में उपमान की समानता को व्यक्त किया गया है, इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘पल-पल’ और ‘कन – कन’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) कवि चींटी की गतिशीलता और निरन्तर परिश्रम करते रहने की विशेषता का वर्णन करता है।
(v) कवि ‘वह है पिपीलिका पाँति !’ के माध्यम से एकता और पंक्तिबद्ध होकर चलने के आदर्श की ओर संकेत करता है।
2. गाय चराती, धूप खिलाती, बच्चों की निगरानी करती,
लड़ती, अरि से तनिक न डरती, दल के दल सेना सँवारती,
घर आँगन, जनपथ बुहारती ।
चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक ।
देखा चींटी को ?
उसके जी को ?
भूरे बालों की-सी कतरन,
छिपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भय
विचरण करती, श्रम में तन्मय,
वह जीवन की चिनगी अक्षय ।
वह भी क्या देही है तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी ।
दिन भर में वह मीलों चलती,
अथक, कार्य से कभी न टलती ।।
शब्दार्थ श्रमजीवी-श्रम करके जीने वाली; विचरण – घूमना; श्रम में तन्मय – मेहनत में लीन; चिनगी – अंगार, चिंगारी; अक्षय-कभी नष्ट न होने वाली ।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) पद्यांश का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में चींटियों की कर्मठता के स्वरूप का चित्रण किया गया है।
(ii) व्याख्या कवि पन्त जी कहते हैं कि चींटियों के पास भी अपनी गायें होती हैं। वे अपनी गायों को चराती हैं और उन्हें यथासमय धूप दिलाती हैं। ये अपने बच्चों की देखभाल करती हैं तथा शत्रुओं से लड़कर अपनी सुरक्षा करती हैं, चींटियाँ भी अपना सामूहिक दल बनाती हैं और बहुत सुन्दर सेना का निर्माण करती हैं। ये चींटियाँ बहुत सारी गन्दी वस्तुओं को उठाकर ले जाती हैं और घर-आँगन व रास्ते को झाड़-पोंछकर साफ कर जाती हैं।
चींटी हमारे समाज की एक सामाजिक तथा मेहनती प्राणी है, वह एक सभ्य नागरिक है, जिस प्रकार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह समाज के नियमों व कर्त्तव्यों का पालन करता है, उसी प्रकार चींटी भी अपने समाज के नियमों व कर्त्तव्यों का पालन करती है अर्थात् चींटी भी परिश्रमी और अच्छी नागरिक है। क्या तुमने कभी चींटी को देखा है? उसके मन को कभी जाना है? उसका शरीर भूरे बालों की सी कतरन लगता है और उसका छोटा व पतला रूप किसी से नहीं छिपा है। वह नितान्त छोटी होते हुए भी सम्पूर्ण पृथ्वी पर निडरता से जीवन व्यतीत करती है तथा निरन्तर श्रम करते हुए अपने कार्य में तल्लीन होकर जुटी रहती है। वह क्रियाशीलता व इच्छा शक्ति का प्रामाणिक रूप है तथा जीवन की कभी न खत्म होने वाली चिंगारी के समान है। चींटी का शरीर तिल के समान लघु कण है। वह प्राणों की चमक और झिलमिलाहट के समान है । वह दिनभर मीलों चलती है, परन्तु परिश्रम से कभी नहीं डरती और निरन्तर बिना थके सदा काम करती रहती है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली वर्णनात्मक
गुण ओज, प्रसाद
रस वीर
अलंकार
उपमा अलंकार ‘भूरे बालों की-सी’ और ‘तिल-सी’ में उपमेय में उपमान की समानता को प्रकट किया गया है, इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है ।
चन्द्रलोक में प्रथम बार
3. चन्द्रलोक में प्रथम बार,
मानव ने किया पदार्पण,
छिन्न हुए लो, देश काल के,
दुर्जय बाधा बन्धन!
दिग्-विजयी मनु-सुत,
निश्चय, यह महत् ऐतिहासिक क्षण,
भू-विरोध हो शान्त।
निकट आएँ सब देशों के जन ।
शब्दार्थ पदार्पण-कदम रखना; दुर्जय-जो जीते नहीं जा सकते; बाधा- रुकावट, अड़चन; दिग्-विजयी-दिशाओं को जीतने वाला; मनु- सुत-मनुष्य पुत्र।
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में मानव के चन्द्रमा पर पहुँचने के ऐतिहासिक महत्त्व को व्यक्त कीजिए ।
(v) निम्नलिखित शब्दों के अर्थ लिखिए
(क) पदार्पण (ख) मनु-सुत (ग) दुर्जय
उत्तर
(i) सन्दर्भ प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी के ‘काव्य खण्ड’ के ‘चन्द्रलोक में प्रथम बार’ शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित ‘ऋता’ काव्य संग्रह से लिया गया है। प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने मानव के चन्द्रमा पर पहुँचने की ऐतिहासिक घटना का वर्णन किया है।
(ii) व्याख्या कवि कहता है कि जब चन्द्रमा पर प्रथम बार मानव ने अपने कदम रखे, तो ऐसा करके उसने देश-काल के उन सारे बन्धनों, जिन पर विजय पाना कठिन माना जाता था, उन्हें छिन्न-भिन्न कर दिया। मनुष्य को यह विश्वास हो गया कि इस ब्रह्माण्ड में कोई भी देश और ग्रह-नक्षत्र अब दूर नहीं है । आज निश्चय ही मानव ने समस्त दिशाओं पर विजय प्राप्त कर ली है। यह एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण है कि अब सभी देशों के निवासियों को परस्पर विरोध समाप्त कर एक-दूसरे के निकट आना चाहिए और प्रेम से रहना चाहिए। सम्पूर्ण विश्व ही एक देश में परिवर्तित हो जाए तथा सभी देशों के मनुष्य एक-दूसरे के निकट आएँ, यही कवि की मंगलकामना है।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक वैज्ञानिक समय सम्पूर्ण विश्व को एकता के सूत्र में बाँध दिया है।
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली प्रतीकात्मक
छन्द तुकान्त-मुक्त
गुण ओज
रस वीर
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘बाधा बंधन’ में ‘ब’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
(iv) जब चन्द्रमा पर प्रथम बार मानव ने अपने कदम रखे, तो ऐसा करके उसने देश – काल के उन सभी बन्धनों, जिन पर विजय पाना कठिन था, उन्हें छिन्न-भिन्न कर दिया। मनुष्य को यह विश्वास हो गया कि इस ब्रह्माण्ड में कोई भी देश और ग्रह-नक्षत्र अब दूर नहीं है। यह एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण है। अतः सभी देशों के मानवों को परस्पर विरोध समाप्त कर एक-दूसरे के निकट आकर प्रेम के साथ रहना चाहिए।
(v) शब्द अर्थ
(क) पदार्पण – कदम रखना
(ख) मनु-सुत – मनु का पुत्र
(ग) दुर्जय – जो जीता नहीं जा सकता।
4. युग-युग का पौराणिक स्वप्न हुआ मानव का सम्भव,
समारम्भ शुभ नए चन्द्र-युग का भू को दे गौरव !
फहराए ग्रह उपग्रह में धरती का श्यामल अंचल,
सुख संपद् सम्पन्न जगत् में बरसे जीवन-मंगल ।
अमरीका सोवियत बनें
नव दिक् रचना के वाहन
जीवन पद्धतियों के भेद
समन्वित हों, विस्तृत मन !
शब्दार्थ पौराणिक – पुराना; समारम्भ – प्रारम्भ; श्यामल-हरा-भरा; नव दिक्-नई दिशाएँ; पद्धति – रास्ता; समन्वित हो – इकट्ठा हो; विस्तृत – विशाल |
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
अथवा ‘चन्द्र-युग का भू को दे गौरव!’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने मनुष्य के चन्द्रमा पर पहुँचने से मानव-कल्याण की मनोकामना का चित्रण किया है।
(ii) व्याख्या सम्पूर्ण संसार पुराने समय से चन्द्रमा पर पहुँचने का स्वप्न देख रहा था, जो आज मनुष्य की मेहनत से सम्भव (पूरा ) हुआ है। कवि का कथन है कि मैं अब यह चाहता हूँ कि ब्रह्माण्ड के ग्रहों-उपग्रहों में इस पृथ्वी का अंचल फहराने लगे। तात्पर्य यह है कि मनुष्य अन्य ग्रहों पर भी पहुँचकर वहाँ पृथ्वी जैसी हरियाली और जीवन का संचार कर दे। सुख और वैभव से युक्त इस संसार में मानव-जीवन के कल्याण की वर्षा हो । सम्पूर्ण संसार में कहीं भी दुःख व्याप्त न रहे।
अतः चारों ओर जीवन में मंगल ही मंगल हो, कवि की यही मनोकामना है। चन्द्रलोक पर प्रथम बार मनुष्य के पहुँचने के पश्चात् कवि की प्रार्थना है कि अमेरिका और रूस (सोवियत ) में आपसी सुख समृद्धि की प्रचुरता वृद्धि हो और विशाल शक्ति सम्पन्न देश के समस्त जीवन-मार्गों में समन्वय स्थापित हो और सभी का मनरूपी हृदय बड़ा व उदार बने ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली प्रतीकात्मक
गुण ओज
रस वीर
छन्द तुकान्त-मुक्त
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘श्यामल अंचल’ और ‘सुख संपद् संपन्न’ में ‘ल’ और ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘युग-युग’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
रूपक अलंकार ‘चन्द्र- युग’ में उपमेय में उपमान का भेद रहित आरोप है। इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।
5. अणु-युग बने धरा जीवन हित
स्वर्ग-सृजन का साधन,
मानवता ही विश्व सत्य
भू-राष्ट्र करें आत्मार्पण!
धरा चन्द्र की प्रीति परस्पर
जगत प्रसिद्ध, पुरातन,
हृदय – सिन्धु में उठता
स्वर्गिक ज्वार देख चन्द्रानन!
शब्दार्थ अणु-परमाणु; स्वर्ग-सृजन – स्वर्गरूपी निर्माण; हृदय- सिन्धु-मन रूपी समुद्र; आत्मार्पण – आत्मसमर्पण; चन्द्रानन-चन्द्रमा का मुख |
प्रश्न
(i) पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(iii) काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
(iv) कवि के अनुसार, अणु-युग का विकास मानव जाति के लिए हो, स्पष्ट कीजिए ।
(v) कवि के अनुसार, पृथ्वी और चन्द्रमा में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर
(i) सन्दर्भ पूर्ववत् ।
प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कविवर ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ ने अणु-युग के प्रति लोककल्याण की भावना को प्रकट किया है।
(ii) व्याख्या कवि कामना करता है कि अणु-युग का विकास मानव जाति के कल्याण के लिए हो, जिससे यह पृथ्वी स्वर्ग के समान सुखी और सम्पन्न हो जाए। आपसी बैर-विरोध समाप्त हो जाए, भाईचारे की भावना उत्पन्न हो जाए और सब मिल-जुलकर रहें। इस संसार में केवल मानवता ही सत्य है। अत: सभी राष्ट्रों को अपनी स्वार्थ भावना का त्याग कर देना चाहिए। पृथ्वी और चन्द्रमा का प्रेम संसार में प्रसिद्ध है और यह अत्यन्त प्राचीन प्रेम-सम्बन्ध है। ऐसी मान्यता है कि चन्द्रमा पहले पृथ्वी का ही एक भाग था, जो बाद में उससे अलग हो गया। आज भी पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा को देखकर समुद्र के हृदय में ज्वार आता है, मानो यह पृथ्वी और चन्द्रमा के प्रेम का परिचायक हो ।
(iii) काव्य सौन्दर्य
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि का मानना है कि विश्व की उन्नति तभी सम्भव होगी, जब हम आपसी भेदभाव भुलाकर परस्पर प्रेम से रहेंगे।
भाषा साहित्यिक खड़ी-बोली
शैली प्रतीकात्मक एवं भावात्मक
गुण प्रसाद
रस शान्त
छन्द तुकान्त-मुक्त
अलंकार
अनुप्रास अलंकार ‘स्वर्ण सृजन’ और ‘प्रीति परस्पर’ में क्रमशः ‘स’ तथा ‘प’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
(iv) कवि के अनुसार, अणु-युग का विकास मानव जाति के कल्याण के लिए हो। जिससे यह पृथ्वी स्वर्ग के समान सुखी और सम्पन्न हो जाए, आपसी बैर-विरोध समाप्त हो जाए, भाई-चारे की भावना उत्पन्न हो जाए और सब मिल-जुलकर रहें। इस संसार में केवल मानवता ही सत्य है। अतः सभी राष्ट्रों को अपनी स्वार्थ भावना का त्याग कर देना चाहिए ।
(v) कवि के अनुसार पृथ्वी और चन्द्रमा का प्रेम संसार में प्रसिद्ध है और यह अत्यन्त प्राचीन प्रेम-सम्बन्ध है। ऐसी मान्यता है कि चन्द्रमा पहले पृथ्वी का ही एक भाग था, जो बाद में उससे अलग हो गया। आज भी पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा को देखकर समुद्र के हृदय में ज्वार आता है, मानो यह पृथ्वी और चन्द्रमा के प्रेम का परिचायक हो ।
