UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 11
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 11 Psychology in Industry (उद्योग में मनोविज्ञान)
दीर्घ उतरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) से आप क्या समझते हैं? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान के महत्त्व एवं उपयोगिता को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भूमिका
(Introduction)
आधुनिक विश्व तेजी से औद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में मनुष्यों के व्यवहार की जटिलताओं ने मनोविज्ञान का अध्ययन अपनी ओर आकर्षित किया। उद्योग-धन्धों से। सम्बन्धित तथा इन क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्तियों का व्यवहार समाज के अन्य क्षेत्रों के निवासियों के व्यवहार से कुछ भिन्न पाया जाता है तथा उनकी समस्याएँ भी कुछ अलग प्रकार की हो जाती हैं। उद्योग से जुड़े लोगों की समस्याओं का अध्ययन करने एवं उनका उचित समाधान ढूंढ़ने के प्रयास ने ‘औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) को जन्म दिया। कालान्तर में मनोविज्ञान ने उद्योग के क्षेत्र में एक विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है।
औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Industrial Psychology)
‘औद्योगिक मनोविज्ञान’ एक संयुक्त शब्द है जो दो शब्दों से मिलकर बना है : ‘उद्योग + मनोविज्ञान’ अर्थात् उद्योग जगत से सम्बन्धित मनोविज्ञान। दूसरे शब्दों में, औद्योगिक मनोविज्ञान, व्यावहारिक मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें उद्योग सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए मनोविज्ञान की सहायता ली जाती है। श्रमिकों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना, उनके आवास, स्वास्थ्य व उनके बच्चों की शिक्षा का समुचित प्रबन्ध करना आदि बातों को लेकर मनोविज्ञान ने उद्योग में कदम रखा। मनोविज्ञान में विभिन्न श्रमिक समस्याओं; यथा-कार्य विश्लेषण, कार्य और विश्राम का समय निर्धारण, थकान का प्रभाव, कुशल कार्य और गति तथा मालिक-मजदूर सम्बन्ध आदि से सम्बन्धित अनुसन्धान कार्य भी हुए। स्पष्टत: उद्योग, उसके कर्मचारियों तथा मालिकों के मानवीय व्यवहार व सम्बन्धों को लेकर जो भी समस्याएँ और तनावपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं, उनका निदान तथा समाधान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में असम्भव था। मनोवैज्ञानिकों के सत्प्रयासों से लघु और बड़े सभी उद्योगों में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हुआ। यह सम्पूर्ण विवेचन औद्योगिक मनोविज्ञान के अर्थ को अभिप्रकाशित एवं स्पष्ट करता है।
औद्योगिक मनोविज्ञान की परिभाषा
(Definition of Industrial Psychology)
विभिन्न विद्वानों ने औद्योगिक मनोविज्ञान की अनेक परिभाषाएँ दी हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –
(1) हैरल के अनसार, “औद्योगिक मनोविज्ञान उद्योग और व्यवसाय में लगे लोगों का अध्ययन हैं,
(2) ब्लम के मतानुसार, “मानवीय औद्योगिक समस्याओं से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक तथ्यों और सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान है।’
(3) स्मिथ के शब्दों में, “व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए औद्योगिक मनोविज्ञान को उन लोगों के व्यवहार का अध्ययन केहकर परिभाषित किया जा सकता है जो अपने मस्तिष्क तथा हाथ के कार्य को जीविका कमाने के लिए अनिवार्य वस्तुओं में बदल लेते हैं।”
उपर्युक्त विवरण के आधार पर औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ‘औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है।” औद्योगिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से औद्योगिक एवं व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। औद्योगिक मनोविज्ञान सम्बन्धित क्षेत्र की समस्याओं के लक्षणों, कारणों एवं समाधान के उपायों का भी अध्ययन करता है।
औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व
(Need and Importance of Psychology in the Field of Industry)
मानव-व्यवहार और स्वभाव से प्रभावित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता महसूस की गयी है और इसके महत्त्व में वृद्धि हुई है। औद्योगिक जगत की समस्याएँ न्यूनाधिक रूप से मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ हैं, जिसे मनोविज्ञान के अन्तर्गत मानवीय अध्ययन द्वारा ही सुलझाया जा सकता है। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व एवं प्रकार वर्णित है –
(1) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता – आधुनिक समय में नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के फलस्वरूप उद्योग-धन्धों का अत्यधिक विकास हुआ है। बड़ी-बड़ी मिलों, कारखानों तथा फैक्ट्रियों में, जहाँ सैकड़ों-हजारों कर्मचारी श्रम में जुटे हों, नाना प्रकार की समस्याओं का प्रादुर्भाव निश्चित है। इन समस्याओं में भौतिक दशाओं से सम्बन्धित समस्याओं के अतिरिक्त बहुत सारी मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ भी होती हैं। ये समस्याएँ मानवीय अध्ययन द्वारा ही हल की जा सकती है; अत: उद्योग के क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने के लिए मनोविज्ञान की आवश्यकवा अनुभव की जाती है।
(2) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व – वर्तमान औद्योगिक युग ने घरेलू उद्योगों को गौण बना दिया है। बड़ी मात्रा में मशीनों तथा मजदूरों ने मिलकर राष्ट्रीय एवं व्यापक स्तर पर उत्पादन कार्य शुरू किया तथा दूर-दूर से भारी मात्रा में कच्चा सामान’ मँगाया जाने लगा। कर्मचारियों पर वरयता क्रम में अधिकारी नियुक्त हुए। उनके निरीक्षण में श्रमिकों की कार्यशक्ति और उत्पादन शक्ति बढ़ाकर उत्पादित वस्तुओं को दूर-दूर भेजने का प्रयास किया गया। श्रमिकों की कार्यशक्ति एवं उत्पादन शक्ति बढ़ाने की नयी-नयी युक्तियों की खोज होने के अतिरिक्त मिल-मालिकों तथा श्रमिकों के सम्बन्धों की ओर भी ध्यान दिया गया। इस प्रकार उद्योग का क्षेत्र जटिल से जटिलतम हुआ, समस्याएँ उलझती गईं, जिनके विश्लेषण एवं निराकरण हेतु मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा प्रविधियों का उपयोग किया गया। कालान्तर में उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व स्थायी रूप से अंकित हो गया। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व निम्नांकित कारणों से है –
(1) कर्मचारियों के चयन की समस्या (Problem of the Personnel Selection)-उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान ने जो सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण कार्य किया, वह कर्मचारियों के चुनाव में सहायता पहुँचाना है। वर्तमान समय में उद्योग के क्षेत्र में विशेषीकरण (Specialization) का बोलबाला है। कार्य का विभाजन और कार्य की हर शाखा में विशेषीकरण आधुनिक उद्योगों का प्रमुख लक्षण है। प्रत्येक कार्य के लिए विशिष्ट निपुणता तथा योग्यता की आवश्यकता है। इस आवश्यकता ने हमारे सामने उपयुक्त कर्मचारियों के चयन की समस्या खड़ी कर दी है। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से यह ज्ञात हो जाता है कि किस व्यक्ति में कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में है? उसी के अनुसार कर्मचारियों का चयन किया जाता है और तद्नुसार ही उन्हें कार्य भी प्रदान किया जाता है।
(2) कार्य की परिस्थितियों की समस्या (Problem of working Condition)–वर्तमान समय में उद्योग सम्बन्धी कार्य की परिस्थितियों के निर्धारण में मनोविज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कर्मचारियों की कार्य करने की दशाओं का उत्पादन और कार्यक्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोविज्ञान कार्य की परिस्थितियों को समझने में सहायता प्रदान करता है। उत्पादन की वृद्धि हेतु इस बात का अनुभव किया गया कि कार्य करने की विभिन्न परिस्थितियों; जैसे—प्रकाश, तापमान, वायु संचार, विश्राम आदि को अनुकूल बनाया जाए। मनोविज्ञान की सहायता से श्रमिकों के कार्य की परिस्थितियों में उचित सुधार लाने का प्रयास किया जाता है।
(3) पदोन्नति की समस्या (Problem of the Promotion)-उद्योगों में कार्य की विभिन्न श्रेणियों के अनुसार कर्मचारियों व अधिकारियों के पद निर्धारित हैं। कुछ समय तक कार्यानुभव प्राप्त करने के उपरान्त व्यक्ति को उच्च पद पर भेजने की आवश्यकता महसूस की जाती है। किसी विशेष पद के लिए कर्मचारी की बुद्धि, मानसिक योग्यता, कार्य के प्रति रुचि, कार्य को सीखने की क्षमता आदि की जाँच मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा विधियों की सहायता से की जाती है। जाँच के परिणामों व निष्कर्षों के आधार पर ही किसी कर्मचारी की उपयुक्तता निश्चित की जा सकती है। स्पष्टत: पदोन्नति की समस्या का उचित समाधान मनोविज्ञान पर ही आधारित है।
(4) मानवीय सम्बन्धों की समस्या (Problem of Human Relations)-औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् उद्योगों में मानवीय सम्बन्धों को महत्त्व प्रदान किया जाने लगा। इससे पूर्व पिछली शताब्दी में श्रमिकों के साथ पशुओं जैसा अमानवीय व्यवहार किया जाता था। उनसे प्रति दिवस बारह घण्टे से ऊपर कार्य कराया जाता था। इन दशाओं ने उद्योग में मनोविज्ञान का प्रवेश करा दिया जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों के कल्याण पर ध्यान दिया गया। श्रमिकों के आवास, चिकित्सा, प्रशिक्षण, स्त्रियों के लिए कल्याण-केन्द्र तथा उनके बच्चों के लिए समुचित शिक्षा की व्यवस्था को आवश्यक समझा गया। मनोविज्ञान ने लोगों को परस्पर मानवीय दृष्टि से देखने में सहायता दी, मजदूरी यूनियनों ने भी श्रमिक हितों के लिए अथक संघर्ष किया और शनैः-शनैः उद्योगपति श्रमिकों के प्रति उदारता दिखाने लगे। उद्योग में मानवीय सम्बन्धों की समस्या के निराकरण एवं श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को करने में मनोविज्ञान ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
(5) औद्योगिक संघर्ष की समस्या (Problem of Industrial Conflicts)-कभी-कभी स्वहितों की रक्षार्थ श्रमिकों और मिल-मालिकों के मध्य तनाव एवं संषर्घ की,दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। या तो श्रमिक अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं अथवा मालिकों पर अनुचित दबाव डालकर अधिक लाभ प्राप्त करने चाहते हैं-दोनों ही स्थितियों में औद्योगिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप हड़ताल और तालाबन्दी की स्थितियाँ जन्म लेती हैं तथा समूचे औद्योगिक क्षेत्र में अशान्ति पैदा हो जाती है। मनोविज्ञान ही श्रमिक वर्ग एवं मिल मालिकों दोनों की मानसिक स्थिति को ठीक-ठीक समझ सकता है। मनुष्यों के दो वर्गों के बीच उत्पन्न इस तनाव की स्थिति को समझकर हल करने का प्रयास मनोविज्ञान की विधियों द्वारा सम्भव है। इस प्रकार औद्योगिक संघर्ष से बचने का उपाय भी मनोविज्ञान के ही पास है।
प्रश्न 2.
कर्मचारी चयन (Personnel Selection) से क्या आशय है? कर्मचारी-चयन की सम्पूर्ण प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
कर्मचारी चयन के उद्देश्य से कार्य-विश्लेषण तथा कर्मचारी-विश्लेषण की प्रक्रियाओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
कर्मचारियों के चयन की समस्या
(Problem of Personnel Selection)
आधुनिक काल के मिल, कारखानों या फैक्ट्रियों में कार्य-विशेषीकरण के आधार पर कार्य का विभाजन हुआ। इस श्रम-विभाजन के कारण उत्पादन कार्य को पूरी गति मिली; अत: हर विभाग के विशेष कार्य हेतु निपुणतम व्यक्ति की खोज हुई। विज्ञापन छापे गये, सैकड़ों अभ्यर्थियों ने नियोक्ताओं (मालिकों) के पास अपने प्रार्थना-पत्र भेजे। अब नियोक्ता अथवा मालिकों के सामने उनमें से सर्वाधिक योग्य व्यक्ति के चुनाव की समस्या उत्पन्न हुई।
विभिन्न प्रकार के व्यवसायों अथवा कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं की आवश्यकता होती है। अनुभव द्वारा पता चलता है कि एक व्यक्ति विभिन्न प्रकार के व्यवसायों या कार्यों को एक समान कुशलता से नहीं कर सकता; इसी प्रकार से अनेक व्यक्ति एक व्यवसाय या कार्य के लिए एक समान कुशलता भी नहीं अपना सकते। यहाँ यह समस्या उठ खड़ी होती है कि किस भाँति व्यक्ति को उपयुक्त व्यवसाय तथा व्यवसाय को उपयुक्त व्यक्ति उपलब्ध हो? व्यक्ति के लाभ और सुख की दृष्टि से आवश्यक है कि उसे अपनी सर्वोत्तम योग्यता के अनुकूल कार्य मिले। स्पष्ट रूप से कर्मचारियों के चयन की समस्या के दो पहलू हैं-एक, व्यक्ति को उसकी सर्वोत्तम योग्यताओं के अनुसार उद्योग में कार्य मिलना, तथा दो, उद्योगों के विभिन्न कार्यों हेतु अभ्यर्थियों में से सर्वोत्तम व्यक्ति का चयन करना। कर्मचारी चयन के नकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों को छाँटकर अलग कर देते हैं तथा ‘स्वीकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों का चयन कर लेते हैं।
कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया
(Process of the Personnel Selection)
कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं – (1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण तथा (2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण। व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण के अन्तर्गत यह ज्ञात किया जाता है कि किसी व्यवसाय के लिए किस तरह के कार्य, किस तरह की कार्य की परिस्थितियों, किस स्तर की शिक्षा, बौद्धिक स्तर तथा मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता है। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत यह पता लगाया जाता है कि कर्मचारी में किस स्तर की बुद्धि है, उसकी कौन-कौन सी मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ हैं। अब हम इन दोनों पक्षों का अलग-अलग विवेचन प्रस्तुत करेंगे।
(1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण (Job-Analysis)
व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण का अर्थ है कि किसी व्यवसाय से सम्बन्धित पूरी जानकारी प्राप्त करना। उद्योग-धन्धों तथा विभिन्न व्यवसायों के सन्दर्भ में व्यवसाय-विश्लेषण का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। वस्तुतः इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कार्य के विभिन्न तत्त्वों को फैलाकर उनका सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। कर्मचारी के कर्तव्य तथा कार्य की दशा, के साथ-साथ कर्मचारी की व्यक्तिगत विशेषताओं का अध्ययन भी किया जाता है। व्यवसाय-विश्लेषण के माध्यम से कार्य के आधारभूत या मूल तत्त्वों का निर्धारण एवं स्पष्टीकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त कर्मचारी में अपेक्षित गुण और विशेषताओं का ज्ञान भी हो जाता है।
ब्लम ने व्यवसाय-विश्लेषण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण किसी व्यवसाय के विभिन्न तत्त्वों का सूक्ष्म अध्ययन है। इसका सम्बन्ध न केवल कार्य से सम्बन्धित कर्तव्य और दशाओं से है, वरन् कार्य के लिए अपेक्षित वैयक्तिक योग्यताओं से भी है।”
इस भाँति, व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण का तात्पर्य किसी व्यवसाय या कार्य के अन्तर्गत सम्मिलित समस्त बातों के सूक्ष्म एवं व्यापक अध्ययन से है जिससे कार्य से सम्बन्धित बातों का सही-सही ज्ञान हो सके।
व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित प्राप्त की जाने वाली सूचनाएँ – व्यवसाय-विश्लेषण करते समय किसी कार्य से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं। वाइटलीज (Viteles) ने व्यवसाय-विश्लेषण के अन्तर्गत एकत्र की जाने वाली सूचनाओं की एक सूची जारी की है, जिसे प्रस्तुत किया जा रहा है –
- कार्य का नाम
- कर्मचारियों की संख्या
- कर्तव्यों का विवरण
- कार्य में प्रयुक्त होने वाले यन्त्र
- क्रियाओं का विश्लेषण
- कार्य की दशाएँ या परिस्थितियाँ
- वेतन एवं अन्य सुविधाएँ (जैसे- मुफ्त आवास एवं चिकित्सा सुविधाएँ)
- अन्य समान व्यवसायों से सम्बन्ध
- स्थानान्तरण तथा पदोन्नति के अवसर
- प्रशिक्षण-काल तथा उसकी प्रकृति
- व्यक्तिगत
योग्यताएँ –
- अवस्था, लिंग, राष्ट्रीयता तथा वैवाहिक स्तर
- शारीरिक योग्यताएँ
- मानसिक योग्यताएँ
- शैक्षिक योग्यताएँ
- पूर्व अनुभव
- सामान्य एवं विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ तथा
- स्वभाव एवं चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ।
कार्य से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्रित करने की विधियाँ-किसी भी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित विभिन्न सूचनाएँ एकत्र करने में अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –
(1) प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method) – इस विधि में किसी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित, व्यक्तित्व की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर, कुछ प्रश्नों की एक तालिका बना ली जाती है। इस तालिका को सम्बन्धित कर्मचारियों व अधिकारियों में बाँट दिया जाता है। उनसे जो उत्तर प्राप्त होते हैं, उनसे कार्य सम्बन्धी सूचनाएँ एकत्र कर ली जाती हैं और कर्मचारियों का चयन कर लिया जाता है।
(2) निरीक्षण विधि (Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत सूचना एकत्र करने वाला व्यक्ति स्वयं कार्य-स्थल पर जाकर कर्मचारियों को काम करते हुए देखता है। वह उनके कार्यों को भली प्रकार निरीक्षण करता है तथा तत्सम्बन्धी निष्कर्ष निकालता है।
(3) परीक्षण विधि (Test Method) – इस विधि में किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित आवश्यक योग्यताओं को लेकर कुछ विश्वसनीय व प्रामाणिक परीक्षाएँ तैयार की जाती हैं। उस आधार पर यह ज्ञात किया जाता है कि उस कार्य की सफलता हेतु कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में होनी चाहिए।
(4) वैयक्तिक मनोरेखा विधि (Individual Psychographic Method) – इस विधि द्वारा किसी विशेष व्यवसाय या कार्य में सफल किसी कर्मचारी की मानसिक एवं अन्य विशेषताओं का पता लगाया जाता है। उन्हें ज्ञात करने के बाद एक ग्राफ पर प्रदर्शित किया जाता है तथा ग्राफों के प्रदर्शनों के आधार पर कर्मचारियों की मानसिक विशेषताओं से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।
(5) व्यवसाय मनोरेखांकित विधि (Job Psychographic Method) – इस विधि के द्वारा भी रेखाचित्रों के माध्यम से कार्य में लगे हुए लोगों की विशेषताओं को ग्राफ पर प्रदर्शित करके व्यवसाय का मनोरेखांकन किया जाता है। वाइटलीज द्वारा वर्णित इस विधि में तीन आवश्यक बातें इस प्रकार हैं – (अ) मानसिक गुणों का सुगम वर्गीकरण, (ब) प्रशिक्षित निरीक्षकों द्वारा प्रत्यक्ष पर्यावलोकन एवं (स) प्रामाणिक मूल्यांकन विधि। यहाँ कुछ विशेषज्ञों द्वारा व्यवसाय या कार्य का विश्लेषण करके एक ऐसी तालिका निर्मित की जाती है जिसमें कार्य के लिए आवश्यक समस्त गुणों का सुगम वर्गीकरण सम्भव हो सके। इन समस्त गुणों के आधार पर एक ग्राफ तैयार करके भविष्य में उससे सहायता ली जाती है।
(6) गति अध्ययन विधि (Motion Study Method) – इस विधि के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय में लगे कर्मचारी के काम की गति तथा काम में लगा हुआ समय ज्ञात किया जाता है। इस भाँति, भिन्न-भिन्न कर्मचारियों की गति नोट कर ली जाती है तथा उसकी आपस में तुलना कर ली जाती है जिसे भविष्य में गति अध्ययन (Time and Motion Study) है जिसके अन्तर्गत आजकल सम्पूर्ण कार्य का विस्तृत चित्रांकन मूवी कैमरे द्वारा कर लिया जाता है। इसके बाद, फिल्म को धीमी गति से चलाकर पूरी प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाता है।
उपर्युक्त वर्णित विधियों में से किसी भी एक विधि का आवश्यकता व परिस्थिति के अनुसार चयन करके कार्य के विषय में सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।
(2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण
(Individual Analysis)
कर्मचारियों के चयन में जहाँ एक ओर कार्य की विशेषताओं की विस्तृत जानकारी आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर अभ्यर्थी (काम पाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति) के विषय में भी पूरी जानकारी प्राप्त होनी चाहिए। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण, व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्तिगत गुणों का होता है जिसके माध्यम से यह निश्चित किया जाता है कि अमुक व्यक्ति किस प्रकार के कार्य के योग्य या अयोग्य है। इसके द्वारा व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण के विषय में ज्ञान मिलता है तथा कर्मचारी की योग्यतानुसार वेतन निर्धारित करने में सहायता प्राप्त होती है। कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत व्यक्ति के घिषय में निम्नलिखित जानकारियाँ हासिल करनी होती हैं –
- नाम
- आयु
- लिंग
- जाति
- धर्म
- राष्ट्रीयता
- शारीरिक स्वास्थ्य एवं विशेषताएँ; जैसे – भार ऊँचाई, दृष्टि, सीने की माप, दाँतों की अवस्था, हृदय एवं फेफड़ों की दशा, नाक-कान की दशा, कोई कमी (यदि हो तो) इत्यादि
- मानसिक सूचनाएँ; जैसे – बुद्धि का स्तर, मानसिक योग्यताएँ व उनका स्तर, रुचियाँ-अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व की विशेषताएँ
- शैक्षिक योग्यताएँ
- कार्य का अनुभव
- प्रशिक्षण का विवरण तथा
- चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ।
कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण की विधियाँ – कर्मचारी विश्लेषण की प्रक्रिया में कर्मचारी से सम्बन्धित उपर्युक्त सूचनाएँ एकत्र करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ काम में लायी जाती हैं –
(1) आवेदन-पत्र (Application Form) – उद्योग के कार्यालय में कार्य पाने के इच्छुक अभ्यर्थियों को सादे छपे हुए आवेदन-पत्र प्रदान किये जाते हैं। इन आवेदन-पत्रों में कुछ शीर्षकों के अन्तर्गत सूचनाएँ माँगी जाती हैं। अभ्यर्थी द्वारा भरकर दिये गये आवेदन-पत्र के माध्यम से उस व्यक्ति के सम्बन्ध में शिक्षा, अनुभव, प्रशिक्षण तथा व्यक्तिगत इतिहास का पता चल जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी शक्तियों, महत्त्वाकांक्षाओं तथा पाठान्तर क्रियाओं का भी ज्ञान हो जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से उपयोगी सूचनाएँ मँगाने के लिए उन्हें विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाना आवश्यक समझा जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से वे समस्त सूचनाएँ उपलब्ध हो जाती हैं जिनका उत्तर अभ्यर्थी से मिल सकता है। आजकल कुछ विशिष्ट कम्पनियाँ विज्ञापनों में ही आवेदन-पत्र का नमूना भी छाप देती हैं और आशा करती हैं कि आवेदक उसी नमूने के अनुसार आवेदन करें।
(2) संस्तुति-पत्र (Letters of Recommendation) – प्रत्येक अभ्यर्थी के पास उसके शिक्षाकाल में मिले कुछ संस्तुति-पत्र और प्रमाण-पत्र होते हैं जो उसकी विशेषताओं पर पर्याप्त रूप से प्रकाश डालते हैं। बहुत-से व्यावसायिक संस्थान आवेदन-पत्रों के साथ कम-से-कम दो महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के संस्तुति-पत्र भी मँगवाते हैं। इससे अभ्यर्थियों के बारे में आवश्यक व महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलने की सम्भावनाएँ रहती हैं। इससे उसकी कमियों व दोषों की जानकारी तो, नहीं, किन्तु विशिष्टताएँ अवश्य प्रकाश में आ जाती हैं। संस्तुति-पत्रों का सबसे बड़ा दोष यह है कि इनमें व्यक्ति के विषय में अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण कर दिया जाता है। इससे इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है, किन्तु, व्यावसायिक संस्थान संस्तुति (सिफारिश) करने वाले व्यक्तियों से संम्पर्क स्थापित करके प्रश्नावलियों (Questionnaire) व निर्धारण-मान (Rating-scale) की सहायता से अभ्यर्थी के विषय में आवश्यक एवं वास्तविक सूचनाएँ प्राप्त कर लेते हैं।
(3) शैक्षिक आलेख (Academic Records) – शैक्षिक आलेख के माध्यम से अभ्यर्थी की शिक्षा सम्बन्धी योग्यता का पता चल जाता है। विभिन्न व्यावसायिक संस्थान अभ्यर्थियों से आवेदन-पत्रों के साथ उनका शैक्षिक आलेख प्रमाणित प्रतिलिपियों के रूप में मॅगा लेते हैं। इनके साथ ही उन संस्थानों के नाम भी पूछे जाते हैं जहाँ से अभ्यर्थी ने शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त शिक्षा संस्थाओं में अभ्यर्थी से सम्बन्धित सामूहिक अभिलेख (Cumulative Records) होते हैं जिनके अवलोकनों से अभ्यर्थी के विषय में काफी जानकारी प्राप्त हो जाती है।
(4) समूह निरीक्षण विधि (Group Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत किसी पद के लिए उपस्थित हुए अभ्यर्थियों के समूह में विभिन्न व्यक्तियों के व्यवहार का निरीक्षण किया जाता है। निरीक्षण के दौरान ध्यान दिया जाता है कि कोई व्यक्ति समूह में किस प्रकार का व्यवहार कर रहा है। इस विधि द्वारा अभ्यर्थियों के नेतृत्व, सामाजिकता, कर्तव्यपरायणता, हास्यप्रियता, ईमानदारी तथा तात्कालिक बुद्धि आदि गुणों का पता करने हेतु सामूहिक निरीक्षण किया जाता है।
(5) शारीरिक परीक्षण (Physical Tests) – अनेक व्यवसायों में कुछ विशेष प्रकार की शारीरिक विशेषताओं व योग्यताओं की जरूरत पड़ती है। जिसके लिए शारीरिक परीक्षण अनिवार्य है। इसके लिए भार ज्ञात करने की मशीन, स्टेथोस्कोप, फीता तथा अन्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। पुलिस विभाग के कर्मचारियों के लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर व रेलवे गार्ड के लिए उत्तम नेत्र-शक्ति आवश्यक है। खदान उद्योग में काम करने वालों की भी शारीरिक जाँच विस्तार से की जाती है, क्योंकि उन्हें अस्वास्थ्यप्रद दर्शाओं में रहकर काम करना होता है।
(6) प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ (Try-out) – इसके अन्तर्गत, यदि अधिकारीगण आवश्यकता महसूस करे तो, अभ्यर्थियों को उस पद या उन मशीनों के साथ काम करने का अवसर दिया जाता है जिन पर उन्हें काम करना है। उनसे आवश्यक पूछताछ व कार्य कराकर भी देखा जा सकता है। इस प्रकार की प्रयोगात्मक वे अन्वेषणात्मक क्रियाओं से अभ्यर्थियों की योग्यता का वास्तविक बोध हो जाता है।
(7) मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Tests) – कर्मचारी की योग्यताओं का मूल्यांकन करने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण हैं। अभ्यर्थियों का बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं को जानने के लिए तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
(8) साक्षात्कार (Interview) – कार्य-विश्लेषण की प्रक्रिया में अभ्यर्थियों से सम्बन्धित सूचनाएँ प्राप्त करने के उपरान्त साक्षात्कार द्वारा उनके व्यक्तित्व का पता लगाना चाहिए। अभ्यर्थी को सामने बैठाकर उससे बातचीत करना या प्रश्न पूछना साक्षात्कार कहलाता है। साक्षात्कार के माध्यम से अन्य सूचनाओं के साथ-साथ अभ्यर्थियों का आत्म-विश्वास, तत्परता, आचार-विचार, अनुशासनप्रियता, आत्म-नियन्त्रण, महत्त्वाकांक्षाएँ तथा वेशभूषा आदि का सम्यक् ज्ञान होता है। विद्वानों के मतानुसार साक्षात्कार विधि जितनी ही अधिक विश्वसनीय, वैध तथा वस्तुनिष्ठ होगी, कर्मचारियों का चयन उतना ही अधिक उपयुक्त व प्रामाणिक होगा।
निष्कर्षत: कर्मचारियों के चयन सम्बन्धी प्रक्रिया में व्यवसाय-विश्लेषण तथा कर्मचारी विश्लेषण के माध्यम से जो सूचनाएँ प्राप्त होती हैं उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। जो अभ्यर्थी रिक्त पद के लिए वांछित योग्यताएँ देखते हैं उनका चयन कर लिया जाता है। कर्मचारियों का उपयुक्त चयन किसी भी उद्योग या व्यावसायिक संस्थान की सफलता हेतु एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण कार्य है।
प्रश्न 3.
‘कार्य की दशाओं से क्या आशय है? कार्य की दशाओं के महत्व को स्पष्ट करते हुए औद्योगिक क्षेत्र की भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
या
उद्योग में कार्य की परिस्थितियों का कर्मचारी की कुशलता पर क्या प्रभाव पड़ता है? मनोवैज्ञानिक अध्ययनों की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कार्य की दशाओं या परिस्थितियों को अर्थ
(Meaning of Working Conditions)
प्रत्येक व्यवसाय या कार्य में एक विशेष प्रकार का वातावरण होता है जिसे कार्य का वातावरण या ‘औद्योगिक वातावरण कहकर पुकारते हैं। वस्तुत: किसी भी स्थान पर कार्य करते समय व्यक्ति या कर्मचारी के अतिरिक्त वहाँ जो कुछ भी स्थूले या सूक्ष्म रूप में होता है उसे ‘कार्य की दशाओं (working conditions) के अन्तर्गत सम्मिलित किया जा सकता है और यही दूसरे शब्दों में कार्य का वातावरण है। कार्य की दशाओं या वातावरण में भवन, स्वच्छता, प्रकाश, तापमान, वायु संचार, मशीनें, ध्वनियाँ तथा कर्मचारियों की मानसिक स्थितियाँ निहित हैं। कार्य की दशाओं को मूल रूप से निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है – (अ) भौतिक दशाएँ तथा (ब) मनोवैज्ञानिक दशाएँ।
कार्य की दशाओं का महत्त्व
(Importance of Working Conditions)
औद्योगिक श्रमिक उन परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित होते हैं जिनमें वे कार्य करते हैं। कार्य की दशाएँ यदि कर्मचारियों या श्रमिकों के अनुकूल होती हैं तो इससे न केवल कर्मचारी अपितु अन्ततोगत्वा उद्योगपतियों का भी हित होता है। कार्य करने की अनुकूल परिस्थितियों में श्रमिक अपेक्षाकृत अधिक एकाग्र भाव से परिश्रम करते पाये जाते हैं। इसके विपरीत असन्तोषजनक परिस्थितियाँ उनकी मनोदशाओं, कार्यक्षमताओं एवं स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। श्रमिक को कार्य करते समय उत्साहपूर्ण एवं स्वस्थ वातावरण होना चाहिए। इससे वह अधिक कार्यकुशलता से कार्य करता है। गन्दा एवं क्षुब्ध कर देने वाला वातावरण उत्पादन में तो कमी करता है, इससे श्रमिकों की प्रवासी प्रवृत्ति, श्रम अनुपस्थिता तथा श्रम-परिवर्तन को भी बढ़ावा मिलता है। इन सबका अन्ततोगत्वा उद्योग के उत्पादने पर भी बुरा असर पड़ता है और इससे सेवायोजक लाभ भी घटता चला जाता है। उद्योगों में तालाबन्दी की सम्भावनाएँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं, जिससे श्रमिक बेरोजगार होने लगते हैं। यह सम्पूर्ण दुश्चक्र समाज को बहुत बुरी तरह से प्रभावित करता है।
अतः यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि श्रमिक की कार्य करने की प्रतिकूल दशाओं में सुधार लाया जाये। इससे न केवल श्रमिकों की मनोवृत्ति, स्वास्थ्य तथा कार्य क्षमताओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा अपितु उत्पादन में आशातीत वृद्धि सम्भव हो पायेगी और श्रमिक-नियोजन सम्बन्धों में सुन्दर समन्वय स्थापित हो सकेगा।
(1) भौतिक दशाएँ एवं उनका प्रभाव (Physical Conditions and their Effect)
उद्योग से सम्बन्धित भौतिक दशाओं के अन्तर्गत बाहरी स्थूल परिस्थितियाँ; जैसे—स्वच्छता, ऊष्मा एवं ताप, प्रकाश, वायु का प्रबन्ध, धूल से रक्षा, कार्य के घण्टे तथा विश्राम आदि की व्यवस्था सम्मिलित किये जाते हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित हैं” –
(1) स्वच्छता (Sanitation) – साधारणतः मनुष्य स्वच्छता पसन्द करते हैं। गन्दगी के बीच रहकर श्रमिक जन कार्य नहीं कर पाते हैं, न ही कार्य करने में उनका मन लग पाता है। अस्वच्छता विभिन्न रोगों की जननी है; अत: कारखाने की नित्य प्रति सफाई अनिवार्य है। कार्य करने की अनुकूल दशाओं में स्वच्छता सबसे मुख्य वस्तु है। वर्ष में कम-से-कम दो बार सफेदी अवश्य हो जानी चाहिए। मशीनों, छतों एवं दीवारों की धूल को प्रतिदिन हटाया जाना चाहिए। फर्श पक्का हो, पानी के निकलने । की उत्तम व्यवस्था हो तथा शौचालय आदि का उचित प्रबन्ध हो। कारखाने के अन्दर का कूड़ा-करकट कूड़ादान में इकट्ठा किया जाता रहे तथा कारखाने के बाहर चारों ओर सफाई रहना भी अति आवश्यक है। स्वच्छ वातावरण श्रमिकों को उत्साहपूर्वक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।
(2) ऊष्मा एवं ताप (Heat and Temperature) – तापमान का शरीर की शक्ति और क्रियाशीलता पर सीधा असर पड़ता है। श्रमिक अधिक ताप और अधिक ठण्डक में क्षमतापूर्वक कार्य नहीं कर सकते हैं। जिन कारखानों में वातावरण का तापमान सामान्य से कहीं अधिक होता है वहाँ श्रमिकों का स्वास्थ्य एवं मानसिक सन्तोष विकृत हो जाती है। तापमान अधिक रहने से जल्दी थकान आती है, कर्मचारियों का ध्यान विचलित हो जाता है तथा दुर्घटनाएँ बढ़ जाती हैं। स्टील, काँच तथा आयरन के उद्योगों में अत्यधिक ऊष्मा एवं ताप पाया जाता है। ऐसी दशाओं में कार्य करने वाले श्रमिकों को असहनीय पीड़ा होती है एवं इन परिस्थितियों में दुर्घटनाओं के घटित होने की सम्भावनाएँ भी तीव्र हो जाती हैं। खनन-उद्योगों में भी यही तथ्य सामने आते हैं। कुछ खानों का तापमान काफी अधिक पाया जाता है। मैसूर की 11,000 फुट गहरी खानों को तापक्रम 150°F तक मिलता है। ये खाने विश्व में दूसरा स्थान रखती हैं। इतने ऊँचे तापक्रम पर इतनी गहराई में काम करने वाले श्रमिकों को विशेष साहस का परिचय देना पड़ता है। ऐसी दशाओं में स्वास्थ्य की रक्षा, कार्यक्षमता को बनाये रखना एवं दुर्घटनाओं को नगण्य कर देना अत्यन्त कठिन है।
(3) प्रकाश (Lighting) – प्रकाश की दशा से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण बातें हैं; जैसे—स्थिति, वितरण, तीव्रता और रंग। स्थिति से तात्पर्य है—प्रकाश का स्रोत कहाँ स्थित है। प्रकाश-स्रोत की स्थिति ऐसी हो कि प्रकाश सीधे आँखों पर न पड़े, यन्त्रों या लिखने की मेज आदि पर पड़े। प्रकाश का वितरण काम करने के स्थान पर एक समान होना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रकाश न अधिक तीव्रता के साथ हो और न बहुत कम। गहन काम में तीव्र प्रकाश चाहिए। इसी प्रकार प्रकाश का रंग भी महत्त्वपूर्ण है। दिन के उजाले जैसा प्रकाश का रंग होना अच्छा है। यदि रंगीन प्रकाश की आवश्यकता हो तो हल्का रंग प्रयोग करना उपयुक्त है। यदि कारखाने में प्रकाश की समुचित व्यवस्था नहीं होगी तो दुर्घटनाओं में वृद्धि होगी तथा उत्पादन स्तर गिर जाएगा।
प्रकाश श्रमिकों की कार्य करने की दशाओं में एक सर्वप्रमुख घटक है। इसकी उपस्थिति रोग के अनेकानेक कीटाणु का विनाश करती है एवं इससे प्राकृतिक रूप से विसंक्रमण (Disinfection) होता रहता है। रोशनदान एवं खिड़कियों की सहायता से प्राकृतिक प्रकाश की व्यवस्था की जा सकती है। प्राकृतिक प्रकाश के अभाव में कृत्रिम प्रकाश; जैसे – विद्युत, गैसीय लैम्प आदि का प्रबन्ध किया जा सकता है। प्रकाश की व्यवस्था करते। समय श्रमिकों की नेत्रदृष्टि को ध्यान में रखना अनिवार्य होता है। अप्राकृतिक प्रकाश उनकी नेत्र-ज्योति को लम्बी समयावधि में बुरे रूप से प्रभावित कर सकता है।
(4) वायु का प्रबन्ध (Ventilation) – वायु संचार से कर्मचारियों की क्रियाशीलता बनी रहती है और वे स्वस्थ रहते हैं; अतः उद्योग अथवा कारखाने में स्वच्छ एवं ताजी हवा के आरपार जाने की व्यवस्था (Cross Ventilation) होनी चाहिए। इससे कारखाने की गर्म एवं गन्दी हवा का विसर्जन होता रहता है तथा बाहर की शुद्ध एवं ताजा हवा अन्दर आती रहती है। भारत के विभिन्न उद्योगों में अभी तक इस विषय पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। सूती वस्त्र उद्योग में जहाँ पर कि धूल और नम वायु की प्रधानता पायी जाती है तथा साथ-ही-साथ उन उद्योगों में जहाँ पर कि विषैली गैसें उत्पन्न होती रहती हैं, इस व्यवस्था का होना सबसे पहली आवश्यकता है। पोफनबर्जन (Pofenbergen) के अनुसार वायु में 14% ऑक्सीजन की मात्रा होने पर काम करने वालों पर बुरा प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है। इसके अतिरिक्त वायु में वांछित रूप से नमी की मात्रा भी होनी चाहिए।
(5) धूल (bust) – भारत जैसे देश की जलवायु कुछ ऐसी है कि गर्मी की ऋतु में यहाँ धूल बड़ी मात्रा में उत्पन्न हो जाती है। सामान्य परिस्थितियों में भी उद्योगों के अन्दर धूल तथा बुरादा दूर करने की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। धूल से भरे वातावरण में श्रमिकों को साँस लेने में कठिनाई होती है तथा उनकी आँखों पर भी धूल का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। भारत के अनेक उद्योगों में धूल विशाल मात्रा में उत्पन्न होती है। इसका तुरन्त समाधान किया जाना चाहिए तथा उचित उपायों द्वारा धूल को दूर करने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
(6) कार्य के घण्टे (working Hours) – प्रायः ऐसा समझा जाता है कि कर्मचारियों से अधिक-से-अधिक कार्य लेने पर उत्पादन में वृद्धि होगी, किन्तु अनुभव बताते हैं कि कार्य के घण्टे आवश्यकता से अधिक बढ़ा देने पर उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति के काम करने की क्षमता सीमित है, इससे अधिक कार्य उसे थका देता है और बीमार बना देता है; अतः उद्योगों में कार्य करने के अधिक घण्टे नहीं होने चाहिए। किसी भी श्रमिक से एक निश्चित अवधि के बाद कार्य नहीं लिया जाना चाहिए। इसके लिए पुरुष, महिला, किशोर एवं बालक वर्ग के लिए कार्य करने के घण्टे तय कर दिये जाएँ। इससे श्रमिकों की कार्यक्षमता तथा कार्य-कुशलता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है तथा औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि होती है।
(7) पीने का पानी (Drinking water) – कारखाने में श्रमिकों के लिए पीने के पानी की उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए। पीने का पानी स्वच्छ हो तथा ग्रीष्म ऋतु में शीतल जल का प्रबन्ध किया जाये।
(8) विश्रामालय (Rest Houses) – मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि लगातार काम करने से कर्मचारी थकान अनुभव करते हैं और ऊब जाते हैं; अतः श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि करने के लिए उन्हें शारीरिक रूप से आराम प्रदान करने की व्यवस्था विशेष रूप से की जानी चाहिए। एक लम्बे मध्यान्तर के अतिरिक्त बीच-बीच में 5-10 मिनट का विश्राम भी मिलता रहना चाहिए। उनके लिए कारखाने के भीतर ही उचित स्थान पर आराम-घरों की समुचित व्यवस्था की जाये जहाँ कि वे अवकाश के समय आराम कर सकें। इस व्यवस्था का सीधा प्रभाव उत्पादन की वृद्धि में पाया जाता
(9) शौचालय एवं मूत्रालय (Laterines and Urinals) – श्रमिकों के लिए कारखाने के . भीतर ही शौचालय एवं मूत्रालय की आवश्यक रूप से व्यवस्था होनी चाहिए। इन स्थानों की पर्याप्त सफाई बहुत अनिवार्य है तथा महिला कर्मचारियों के लिए इसका अलग से प्रबन्ध किया जाना चाहिए।
(10) भीड़ (Over Crowding) – भारतीय उद्योगों में श्रमिकों के लिए खुले स्थान का प्रबन्ध नहीं मिलता है। एक श्रमिक के लिए न्यूनतम 50 वर्ग फुट स्थान स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त माना जाता है। इसके अभाव में उद्योग के भीतर भीड़ के कारण दुर्घटनाएँ घटित होने की आशंका रहती है।
(11) यन्त्रों से सुरक्षा (Safety Provision of Machines) – कारखाने के यन्त्रों से श्रमिकों की पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था अनिवार्य है अन्यथा अवांछनीय दुर्घटनाओं की सम्भावना अधिक होती है। मशीनों के बीच में काफी स्थान दिया जाना चाहिए तथा मशीनों के ऊपर आवश्यक मात्रा में आवरण रहने चाहिए। केवल उन्हीं भागों को खुला रखा जा सकता है जिन्हें ढकना कदापि सम्भव नहीं। प्रायः कारखानों में शाफ्ट, पैली, पट्टे तथा ऐसी अन्य बहुत-सी चीजें खुली अवस्था में रहती हैं जिनकी चपेट में कार्यशील श्रमिक आ सकते हैं। इसके लिए उचित प्रबन्ध किया जाना चाहिए।
(12) संगीत (Music) – काम के समय में हल्का लयात्मक संगीत कार्य को रोचक बना देता है। इससे कार्य अधिक होता है तथा उत्पादन बढ़ता है। संगीत से कार्य में उत्साह बना रहता है। स्मिथ ने 1000 कर्मचारियों के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि 98% कर्मचारियों ने 8 घण्टे तक काम के समय संगीत का आनन्द अनुभव किया और उनमें ऊब व थकान काफी कम हुई।
(2) मनोवैज्ञानिक दशाएँ एवं उनका प्रभाव
(Psychological Conditions and their Effect)
उद्योग के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक दशाएँ मुख्य रूप से मानव-मन और उसके व्यवहार से सम्बन्धित होती हैं। प्रमुख मनोवैज्ञानिक दशाएँ और उनके प्रभाव निम्नलिखित हैं
(1) सुरक्षा (Security) – सुरक्षा जीवन की एक महान् आवश्यकता है जिसका उद्योग और व्यवसाय में समान महत्त्व है। जिन उद्योगों और व्यवसायों में कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा होती है। उनमें लोग बहुत ही प्रसन्नता से कार्य करते हैं तथा उत्पादन में वृद्धि करके निरन्तर प्रशंसा पाने को प्रयास करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कम-से-कम एक निश्चित समयावधि के बाद तो नौकरी पक्की हो जानी चाहिए। असुरक्षित नौकरी वाले व्यक्ति को कार्य-विशेष से कोई लगाव नहीं रहता। नौकरी की सुरक्षा के अतिरिक्त कर्मचारी को बुढ़ापे, बेकारी, बीमारी तथा दुर्घटनाओं आदि अवस्थाओं में भी सुरक्षा की गारण्टी मिलनी चाहिए। जीवन बीमा, ग्रेच्युइटी, प्रॉविडेण्ट फण्ड तथा पेन्शन इत्यादि सुविधाएँ भी व्यक्ति को अधिकाधिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। वस्तुतः सुरक्षा एक ऐसी मनोवैज्ञानिक दशा और आवश्यकता है जो कर्मचारियों को अधिक-से-अधिक कार्य हेतु प्रेरित करती है।
(2) अधिकारियों का व्यवहार (Behaviour of Authorities) – अधिकारियों का अच्छा व्यवहार भी एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक दशा है। अधिकारी अपने अच्छे व्यवहार से उद्योग के कर्मचारियों में स्फूर्ति, उत्साह तथा सौहार्द उत्पन्न कर सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार, कर्मचारी प्रेम, सहानुभूति एवं सहयोग के वातावरण में अधिक लगन से कार्य करते हैं। वस्तुतः अधिकारियों का कर्मचारियों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है; अतः उनका कर्मचारियों के प्रति अच्छा व्यवहार अति आवश्यक समझा जाता है। इसके विपरीत बुरा व्यवहार तनाव, क्षोभ एवं विद्रोह को जन्म देता है। कर्मचारियों को अपने अधिकारियों से मधुर सम्बन्ध होना, उनके प्रति सम्मान भावना तथा उचित सामंजस्य के कारण तनाव की प्रत्येक स्थिति दूर होती है जिससे उत्पादन में वांछित उन्नति होती है। क्रोधी, चिड़चिड़े तथा अभिमानी अधिकारियों का व्यवहार कर्मचारियों तथा श्रमिकों को भड़का देता है, वे रुचि के साथ ध्यानपूर्वक काम करना बन्द कर देते हैं जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
(3) कर्मचारियों के आपसी सम्बन्ध (Mutual Relations among Employees) – कर्मचारियों में परस्पर प्रेम, मैत्री और भाईचारे का सम्बन्ध भी कार्य करने की एक महत्त्वपूर्ण दशा है। जिस उद्योग में कर्मचारियों में पारस्परिक सद्व्यवहार बना रहता है, वहाँ कर्मचारी सन्तुष्ट रहते हैं तथा उत्पादन में वृद्धि होती रहती है। किन्हीं कारणों से कर्मचारियों में फूट, प्रतिस्पर्धा और तनाव की दशाएँ उत्पन्न होने से उत्पादन कार्य हतोत्साहित होता है। वस्तुतः सामूहिक कार्य मिल-जुलकर सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से किये जाने चाहिए।
(4) आवश्यकताओं की पूर्ति (Satisfaction of Needs) – उद्योग में कार्य करने वाले प्रत्येक कर्मचारी की अनेक शारीरिक, पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, चिकित्सा सम्बन्धी तथा सांवेगिक आवश्यकताएँ होती हैं। यदि कर्मचारी अपनी और परिवार की इन आधारभूत आवश्यकताओं के प्रति चिन्तित रहेगा तो वह तनाव महसूस करेगा; अतः वह अस्थिर चित्त से ठीक प्रकार कार्य नहीं कर पाएगा। सेवायोजकों या मालिकों को चाहिए कि वे कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायित्व एवं सद्भावना प्रदर्शित करते हुए इन आवश्यकताओं की पूर्ति में उन्हें सहायता दें। जिन उद्योगों के सेवायोजक या मालिक इन कल्याणकारी कार्यों के लिए प्रयास करते हैं, वहाँ के कर्मचारी अधिक मेहनत से काम करते हैं, उत्पादन वृद्धि में सहयोग देते हैं तथा उद्योगों के हित में पूरी शक्ति लगा देते हैं।
(5) प्रलोभन (Incentives) – व्यवसायों में कर्मचारियों या श्रमिकों को प्रेरणा प्रदान करने की आवश्यकता होती है। जिस उद्योग में कर्मचारियों को सुविधाओं का प्रलोभन रहता है, वहाँ लोग लगन से कार्य करते हैं। इन प्रलोभनों में वेतन वृद्धि, बोनस, प्रशंसा, गुड एन्ट्री, पुरस्कार तथा पदोन्नति आदि प्रमुख हैं। इनसे प्रेरित होकर कर्मचारीगण निरन्तर श्रमपूर्वक कार्य करते हैं।
(6) पदोन्नति के अवसर (Opportunities of Promotion) – प्रत्येक व्यवसाय या उद्योग में कार्य की विभिन्न श्रेणियाँ होती हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ दिन तक किसी कार्य को कर लेता है तो उसे उस कार्य का अनुभव हो जाता है। सन्तोषजनक और अच्छे कार्य के लिए व्यक्ति को उच्च पद प्रदान कर दिया जाता है, यह क्रिया ही पदोन्नति कहलाती है। वस्तुत: पदोन्नति उद्योग की एक मनोवैज्ञानिक दशा है जो कर्मचारियों को अच्छा काम करने के लिए प्रेरित करती है तथा उद्योग को उनके अनुभव से लाभ उठाने में सहायता प्रदान करती है। न्यायोचित पदोन्नति से कर्मचारियों, मिल-मालिकों तथा उस औद्योगिक इकाई को कई लाभ मिलते हैं जिससे अन्ततः उत्पादन वृद्धि को बल मिलता है।
उद्योग को अपनी ही इकाई से अनुभवी कर्मचारी मिल जाते हैं जो प्रेरित होकर उद्योग के विकास हेतु और अधिक कार्य करते हैं। पदोन्नति से कर्मचारियों में लगातार उत्साह तथा कार्य करने की प्रेरणा बनी रहती है। इससे कर्मचारियों में अधिक सुरक्षा एवं आत्म-विश्वास की भावना उत्पन्न होती है। वे पदोन्नति का लक्ष्य लेकर अच्छे-से-अच्छा काम करने को तत्पर रहते हैं। रुचिपूर्वक मन लगाकर काम करने से अधिकारीगण सन्तुष्ट रहते हैं जिससे आपसी सम्बन्धों में मधुरता का संचार होता है और उद्योग में शान्तिपूर्ण वातावरण बना रहता है। औद्योगिक तनाव और संघर्ष जन्म नहीं लेते तथा उत्पादन कार्य सामान्य गति से चलता है। इस प्रकार पदोन्नति के अवसर एक ओर, कर्मचारियों की दक्षता बनाये रखने में सहायक सिद्ध होते हैं; तो दूसरी ओर उनकी उत्पादन क्षमताओं पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है।
निष्कर्षतः कहा जा सकती है कि उद्योग पर प्रभाव डालने वाली विभिन्न भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाएँ अनुकूल परिस्थितियों में ऐसे वातावरण का सृजन करती हैं जिसके माध्यम से औद्योगिक उत्पादक में आशातीत वृद्धि होती है। इसके विपरीत, प्रतिकूल परिस्थितियों में उत्पादन में कमी आती है।
प्रश्न 4.
कर्मचारियों की पदोन्नति से क्या आशय है? पदोन्नति करते समय ध्यान में रखने योग्य बातों का उल्लेख कीजिए।
या
उद्योगों में कर्मचारियों की पदोन्नति के क्या आधार होने चाहिए? उदाहरणों द्वारा अपना मत स्पष्ट कीजिए।
या
उद्योग में पदोन्नति के अवसर के बारे में लिखिए।
उत्तर :
विभिन्न औद्योगिक संस्थानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कार्य की विविध श्रेणियों के अन्तर्गत कर्मचारियों एवं अधिकारियों के पद सुनिश्चित होते हैं और किसी विशेष पद के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता भी\ किन्हीं मानदण्डों के आधार पर निर्धारित की जाती है। आवश्यक रूप से ये मानदण्ड कर्मचारी की योग्यता, उसकी कार्य की क्षमता, निपुणता, रुचि, वरिष्ठता तथा अपने उच्च अधिकारियों के साथ उसके सम्बन्धों पर आधारित हो सकते हैं। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि कोई भी कर्मचारी अपने वर्तमान पद पर लम्बे समय तक सन्तुष्ट नहीं रह सकता। वह एक के बाद एक उच्च पद पर उन्नत होने की लालसा व महत्त्वाकांक्षा रखता है। पदोन्नति की कामना ही उसे अपने कर्म-पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करती है। कर्मचारियों की पदोन्नति से सम्बन्धित विभिन्न बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित करने से पूर्व आवश्यक है कि यह समझा जाए कि ‘पदोन्नति’ से क्या अभिप्राय है।
पदोन्नति का अर्थ
(Meaning of Promotion)
किसी भी उद्योग अथवा व्यवसाय के प्रबन्ध-तन्त्र की कार्यकुशलता इस बात पर निर्भर करती है। कि वह अपने कर्मचारियों को ऊँचा उठाने के पर्याप्त एवं यथेष्ट अवसर ‘किस सीमा तक’ प्रदान करता है। विभिन्न पदों के लिए अधिक-से-अधिक सक्षम कर्मचारी प्राप्त करने की दृष्टि से किसी भी प्रबन्ध-तन्त्र को अपने कर्मचारियों को निरन्तर प्रेरित एवं उत्साहित करते रहना चाहिए। एक पद से उच्च पद पर अग्रसरित एवं उन्नत करने से बढ़कर किसी भी कर्मचारी को कोई दूसरी प्रेरणा क्या मिलेगी? इस भाँति स्पष्ट रूप से कर्मचारियों की पदोन्नति एक वांछित, अनिवार्य एवं अभीष्ट माँग है।
अर्थ – पदोन्नति से अभिप्राय उच्च पद की प्राप्ति से होता है जिसमें कर्मचारियों की प्रतिष्ठा, उत्तरदायित्वों, पद तथा आय में वृद्धि होती है। आवश्यक नहीं कि पदोन्नति के साथ आय में भी वृद्धि हो, बिना आय में वृद्धि हुए भी पदोन्नति सम्भव है। इसके साथ ही, वार्षिक वेतन वृद्धि को भी पदोन्नति नहीं कहा जा सकता। कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों में परिवर्तन होना पदोन्नति की प्रक्रिया का अनिवार्य लक्षण है।
विलियम जी० टोरपी के अनुसार, “पदोन्नति पदाधिकारी के एक पद से ऐसे दूसरे पद पर पहुँचने की ओर संकेत करती है जो उच्चतर श्रेणी या उच्चतर न्यूनतम वेतन वाला होता है। पदोन्नति का अभिप्राय है-कर्मचारी के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों में वृद्धि कर देना।”
एल० डी० ह्वाइट के शब्दों में, “पदोन्नति का अर्थ है एक पद से किसी उच्चतर श्रेणी के अन्य पद पर नियुक्ति जिसमें कठिनतर प्रकृति एवं गहनतर उत्तरदायित्वों का कार्य करना पड़ता है। इसमें पद का नाम बदल जाता है और प्रायः वेतन में भी वृद्धि होती है।”
इस प्रकार पदोन्नति के अन्तर्गत किसी उद्योग अथवा व्यवसाय में कार्य करने वाला कर्मचारी किसी दूसरे ऐसे कार्य (पद) पर स्थानान्तरित कर दिया जाता है जिससे उसे अधिक उत्तरदायित्व, आय, सुविधाएँ तथा प्रतिष्ठा प्राप्त होते हैं।
पदोन्नति के समय ध्यान रखने योग्य बातें।
(Factors Determining Eligibility of Promotion)
पदोन्नति के लिए कर्मचारियों की पात्रता का क्षेत्र क्या हो या कर्मचारियों की पदोन्नति करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाये, यह एक प्रमुख समस्या समझी जाती है। पदोन्नति करते समय निम्नलिखित बातों (तत्त्वों) पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना आवश्यक है –
(1) ज्येष्ठता या वरिष्ठता – अधिकतर कर्मचारीगण पदोन्नति के लिए ज्येष्ठता या वरिष्ठता के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं। इसके अन्तर्गत उच्चतर पद पर किसी भी कर्मचारी की पदोन्नति इसलिए की जानी चाहिए, क्योंकि उसका सेवा काल (Length of Service) दूसरे कर्मचारियों की तुलना में अधिक है। इसका अभिप्राय यह है कि सेवा में पहले भर्ती होने वाले व्यक्ति की पदोन्नति पहले तथा बाद में भर्ती होने वाले व्यक्ति की पदोन्नति बाद में की जानी चाहिए। ज्येष्ठ कर्मचारी का कार्य अनुभव अपेक्षाकृत अधिक होता है और अधिक अनुभव पदोन्नति के लिए एक बड़ी योग्यता है; अतः कहा जाता है कि पदोन्नति के लिए “ज्येष्ठता ही योग्यता है। यह आधार पदोन्नति को निश्चितता प्रदान करता है और इससे पुराने कर्मचारियों की प्रतिष्ठा की रक्षा हो पाती है। ज्येष्ठता का तत्त्व स्वयंचालित पदोन्नति का नेतृत्व करता है। इस प्रकार इसे उचित, न्यायपूर्ण एवं निष्पक्ष आधार रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
कुछ विचारकों की दृष्टि से ज्येष्ठता या वरिष्ठता के आधार पर कर्मचारियों की पदोन्नति नहीं की जानी चाहिए। इससे कर्मचारियों में प्रतिस्पर्धा की भावना पर रोक लगती है और वे अधिक मेहनत, बुद्धिमत्ता एवं उत्साह से कार्य नहीं कर पाते। आलोचकों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को सौभाग्य से नियति ने पहले जन्म देकर ज्येष्ठता प्रदान कर दी है तो इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि वह उस पद के लिए पूरी तरह सक्षम, कुशल एवं योग्य है। इसके साथ-ही-साथ ज्येष्ठता या वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति मिलने की नीति उन प्रतिभा सम्पन्न नौजवान कर्मचारियों का भी अहित करती है जिन्होंने स्वतन्त्र प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त आगे बढ़ने की उम्मीद से व्यवसाय/संस्थान में प्रवेश किया है।
वास्तव में, पदोन्नति का आशय है-उच्चतर कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों के लिए व्यक्ति की नियुक्ति और इसके लिए एकमात्र ज्येष्ठता को ही आधार नहीं बनाया जा सकता, किन्तु व्यवहार में ज्येष्ठता या वरिष्ठता या सेवा-काल की किसी भी भाँति उपेक्षा नहीं की जा सकती। ‘टॉमलिन आयोग (Tbmlin Commission) ने ठीक ही कहा है, “सेवा के सम्बन्ध में सामान्यतः ज्येष्ठता (वरिष्ठता) के तत्त्व के कम मूल्यांकन की सम्भावना नहीं है।”
(2) योग्यता – आधुनिक युग में पदोन्नति का आधार कर्मचारी की योग्यता’ को बनाने पर विशेष बल दिया जाता है। किन्तु योग्यता की जाँच किस तरह की जाये और इसके लिए क्या मानदण्ड होना चाहिए, यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा जटिल प्रश्न है। निश्चय ही पदोन्नति के लिए योग्यता की जाँच का मानदण्ड नितान्त रूप से वस्तुनिष्ठ अर्थात् व्यक्ति निरपेक्ष होना चाहिए।
(3) कार्य में दक्षता या निपुणता – कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए कार्य में दक्षता या निपुणता का आधार अत्यन्त सामान्य तथा लोकप्रिय सिद्धान्त है। किसी भी उद्योग या व्यापारिक संस्थान में नियोक्ता (मालिक) की यही इच्छा रहती है कि उसका कर्मचारी कार्य में दक्ष या निपुण हो और वह अच्छे-से-अच्छा कार्य करे। नौकरी के मामले में प्राय: देखा जाता है कि जो कर्मचारी अच्छा कार्य करते हैं, मालिक या अधिकारियों की दृष्टि में उनका एक विशेष स्थान बन जाता है। उनकी दक्षता, क्षमता तथा विश्वसनीयता के आधार पर उन्हें ऊँचे पद पर प्रोन्नत कर दिया जाता है। उत्तम कार्य प्रदर्शित कर पदोन्नति पाने का यह सिद्धान्त दूसरे कर्मचारियों में अच्छा कार्य करने का प्रलोभन पैदा करता है। इससे अन्य लोगों के उत्साह एवं रुचि में वृद्धि होती है। दक्षता या निपुणता के आधार पर उच्च पद, अधिक आय, सुविधाएँ तथा प्रतिष्ठा पाने वाले कर्मचारियों का अनुकरण कर अन्य कर्मचारी भी उन्हीं की तरह कार्य में दक्ष एवं निपुण होने के लिए प्रयास करते हैं।
(4) सिफारिश या कृपा – आजकल पदोन्नति पाने के लिए उच्च अधिकारी की सिफारिश या कृपा सबसे बड़ा एवं प्रभावशाली अस्त्र समझा जाता है। इस अस्त्र के सामने कर्मचारी की ज्येष्ठता, योग्यता, निपुणता या विश्वसनीयता सभी गुण व्यर्थ हो जाते हैं। प्रायः अधिकारियों की दावतें करने वाले, उन्हें तरह-तरह के लाभ पहुँचाने वाले, किसी-न-किसी बहाने भेट अर्पित करने वाले चाटुकार कर्मचारी सबसे पहले पदोन्नति पाते हैं। चाटुकारिता के माध्यम से अपने अधिकारियों की कृपा द्वारा पदोन्नति हासिल करने वाले कर्मचारियों के सामने लम्बी अवधि तक सेवा करने वाले अनुभवी, कार्यकुशल, ईमानदार तथा सुयोग्य कर्मचारी वर्षों तक निम्न स्तर पर ही पड़े रहते हैं। स्पष्टतः सिफारिश या कृपा के आधार पर पदोन्नति पाने की यह बुरी रीति किसी भी प्रकार से अनुकरणीय नहीं है, यह सर्वथा त्याज्य है।
उपर्युक्त बिन्दुओं के अन्तर्गत हमने उन सभी बातों का विवेचन किया है जिन्हें कर्मचारियों की पदोन्नति के अवसर पर पूरी तरह से ध्यान में रखा जाना चाहिए। स्पष्टतः पदोन्नति के लिए व्यक्तिगत भेदभाव से दूर; व्यक्ति को निरपेक्ष एवं वस्तुनिष्ठ नीति अपनायी जानी चाहिए। पक्षपातपूर्ण, मनचाहे तरीके से तथा सिफारिशों के माध्यम से होने वाली पदोन्नतियाँ संस्थानों के वातावरण को दूषित कर सकती हैं।
प्रश्न 5.
उद्योग में मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने से क्या लाभ होता है? उद्योग में मानवीय सम्बन्ध बनाये रखने के लिए क्या उपाय किये जा सकते हैं?
या
उद्योग में मानवीय सम्बन्ध से क्या समझते हैं? उद्योग में मानवीय सम्बन्धों के महत्व को विस्तार से समझाइये।
या
श्रम-कल्याण कार्यों से आप क्या समझते हैं? औद्योगिक क्षेत्र में किये जाने वाले श्रम-कल्याण कार्यों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
श्रम-कल्याण से आप क्या समझते हैं? उद्योग के श्रम-कल्याण कार्यों का महत्त्व बताइए।
या
उभेग में कर्मचारी-कल्याण से सम्बन्धित योजनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति से पहले उद्योगपतियों के अपने कर्मचारियों या श्रमिकों के साथ भावनाहीन और अमानवीय सम्बन्ध थे। उद्योगपतियों का मात्र एक लक्ष्य था-अधिकतम आर्थिक लाभ अर्जित करना, जिसकी पूर्ति के लिए वे श्रमिकों से मशीनों के कलपुर्जा की तरह काम लेते थे। जिस प्रकार मशीन का कलपुर्जा टूट जाने या व्यर्थ हो जाने पर फेंक दिया जाता है वही स्थिति श्रमिकों की भी थी; अयोग्य होने पर उन्हें निकाल बाहर कर दिया जाता था। उनसे पशुवत् व्यवहार रखते हुए दस-बारह घण्टे तक लगातार काम लिया जाता था। उन्हें कठिनाई से पेट भरने के लिए थोड़ा-सा धन दिया जाता था। उनके खून-पसीने की गाढ़ी कमाई उद्योगपतियों तथा सेवायोजकों की विलासिता में खर्च होती थी। बीमार श्रमिकों, गर्भवती स्त्रियों तथा बच्चों से भी गुलामों की तरह काम लिया जाता था। यह उत्पीड़न आर्थिक शोषण तथा अमानवीय कृत्यों की चरम परिणति थी।
ऐसी विषम परिस्थितियों में श्रमिक वर्ग के दु:खों, निराशाओं तथा असन्तोष की कोई सीमा न थी। शनैः-शनैः श्रमिकों में जागृति आयी, वे अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए तथा संघर्षों की महान् त्रासदियों के बाद अमानवीयता के काले बादलों से उद्योग में मानवीय सम्बन्धों की रोशनी झलकी। औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् श्रम-कल्याण जैसे नवीन मूल्यों को मान्यता प्राप्त हुई। इसी के परिणामस्वरूप आज स्वयं उद्योगपति और सेवायोजक श्रमिकों की भलाई के कार्यों में गहरी दिलचस्पी लेते हैं।
उद्योग में मानवीय सम्बन्ध
(Human Relation in Industry)
उद्योग में मानवीय सम्बन्धों का अर्थ – वर्तमान समय में औद्योगिक प्रगति के लिए मानवीय सम्बन्धों को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया जाने लगा है। मानवीय सम्बन्धों का आधार है-प्रेम, दया, सहानुभूति, सहयोग, सौहार्द तथा बन्धुत्व की भावनाएँ। इन्हें मानवीय भावनाओं का नाम दिया जाता है, क्योंकि इनके माध्यम से ही विश्व के मनुष्य एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं तथा अटूट सम्बन्धों में बँध जाते हैं। जब औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत मनुष्यों को आपसी व्यवहार इस प्रकार की भावनाओं से युक्त होता है तो ऐसे सम्बन्धों को उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहकर परिभाषित किया जा सकता है।
इस भाँति श्रमिकों अथवा कर्मचारियों के साथ सद्व्यवहार करते हुए उनकी शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक जरूरतों को पूरा करने की दृष्टि से विभिन्न कल्याणकारी कार्यों को लेकर श्रमिकों तथा उद्योगपतियों के मध्य प्रेम एवं श्रद्धा का सम्बन्ध स्थापित होना ही उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहलाता है। ये मानवीय सम्बन्ध उत्तम कार्य, अधिक उत्पादन तथा औद्योगिक शान्ति के प्रणेता होते हैं। उद्योगों में मानवीय सम्बन्ध अच्छे स्तर पर रखने से सरकार, उद्योगपति तथा कर्मचारी सभी का हित होता है। आजकल औद्योगिक प्रगति के लिए प्रत्येक सभ्य देश में मानवीय सम्बन्धों को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया जाने लगा है।
उद्योगों में मानवीय सम्बन्धों के रूप
उद्योगों में मानवीय सम्बन्ध दो रूपों में दृष्टिगोचर होते हैं –
(i) औद्योगिक प्रशासन एवं प्रबन्धन में मानवीय सम्बन्ध
(Human Relations in Industrial Administration and Management)
आधुनिक समय में औद्योगिक प्रशासन और प्रबन्धन में एक बुनियादी परिवर्तन आया है। आजकल औद्योगिक इकाइयों में मानवीय तत्त्व को प्रमुखता प्रदान कर एक मौलिक आवश्यकता की पूर्ति की गयी है। सेवायोजकों और उद्योगपतियों ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि श्रमिक और कर्मचारी लोग मनुष्य हैं, मशीनें नहीं हैं। उन्हें तेल या बिजली से नहीं चलाया जा सकता, उनकी प्यास और जरूरत प्रेरणाएँ, प्रशंसाएँ, सम्मान, प्रेम और सहानुभूति हैं। प्रोत्साहन और प्रलोभन के वशीभूत होकर श्रमिक अधिक-से-अधिक कार्य करने हेतु प्रवृत्त होता है। पशु या गुलाम जैसे व्यवहार और कठोरतम प्रशासन उसे विद्रोह की ओर बढ़ाता है।
‘सामूहिके उत्साहशीलता द्वारा मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन – औद्योगिक प्रगति एवं मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु कर्मचारियों तथा श्रमिकों में सामूहिक उत्साहशीलता (Group Morale का होना अत्यन्त आवश्यक है। सामूहिक उत्साहशीलता एक सामूहिक भावना को नाम है जो उन लोगों में उत्पन्न हो जाती है जो एक लक्ष्य से प्रेरित होकर एक साथ ही एक ही प्रकार का कार्य करते हैं। एक साथ काम करने से उनमें जो उत्साह पैदा होता है उसे सामूहिक उत्साहशीलता कहा जाता है। प्रत्येक उद्योग में सामूहिक उत्साहशीलता एक महान् आवश्यकता है। वस्तुतः यही मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन प्रदान करने की कुंजी भी है। इसके माध्यम से मानवीय सम्बन्धों को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –
(1) सामान्य लक्ष्य के प्रति जागरूकता – उद्योगपति, अधिकारियों, कर्मचारियों तथा श्रमिकों सभी का यही लक्ष्य होना चाहिए कि उद्योग में अधिक-से-अधिक प्रगति हो। इसके लिए आवश्यक है। कि सभी श्रमिक अपने उद्योग के प्रति सम्मान एवं सर्वहित की भावना उत्पन्न कर प्रयत्नशील बनें।
(2) लक्ष्य पूर्ति में प्रगति – सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्योग के समस्त कर्मचारी सतत प्रयास करें। इसके लिए अति आवश्यक है कि उद्योग का लाभांश उसके अंशों में विवेकपूर्ण दृष्टि से विभाजित हो। यह प्रलोभन ही सबको लक्ष्य की ओर ले जाएगा।
(3) लाभांश वितरण – मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन देने हेतु कम्पनी के लाभ का सभी कर्मचारियों तथा श्रमिकों को उपयुक्त एवं न्यायपूर्वक अंश मिलना चाहिए। इससे उद्योग से सम्बन्धित उत्पादन के सभी अंग अधिकाधिक कार्य करेंगे और अधिक लाभ पाने की प्रेरणा से मिलजुलकर कठोर श्रम करेंगे।
(4) निश्चित सार्थक कार्य – कर्मचारियों और श्रमिकों में यह विचार उत्पन्न होने पर कि उनका कार्य उद्योग का अभिन्न अंग है, एक समान भावधारा का प्रवाह होगा। इसके फलस्वरूप वे सभी प्रेम, भाईचारे व सहयोग के साथ काम करेंगे।
(5) सामूहिक सहयोग एवं परामर्श – उद्योग से सम्बन्धित सभी समस्याओं के निराकरण हेतु सभी श्रमिकों व कर्मचारियों का सहयोग एवं परामर्श वांछित है। इसके लिए श्रमिकों के प्रतिनिधियों को वार्ताओं में आमन्त्रित किया जाये। ये वार्ताएँ उत्पादन वृद्धि और उद्योग व कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान तलाशने के लिए आयोजित की जाती हैं।
(6) पुरस्कार – अधिक कार्य करने तथा अच्छे कार्यों के लिए प्रोत्साहित करने की दृष्टि से कर्मचारियों को समय-समय पर पुरस्कार दिये जाने चाहिए।
इस प्रकार, उपर्युक्त उपायों के माध्यम से मिल-मालिकों एवं श्रमिकों के बीच प्रेम, सहयोग एवं मैत्री की भावना उत्पन्न कर सहयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे मानवीय सम्बन्ध प्रोत्साहित होते हैं जो प्रत्येक उद्योग की एक अपरिहार्य मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है।
(ii) श्रम-कल्याण कार्य (Labour welfare Activities)
विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने मानवीय सम्बन्धों को स्थापित करने तथा उन्हें अधिक-से-अधिक दृढ़ बनाने के लिए ‘श्रम-कल्याण (Labour welfare) का विचार दिया है।
श्रम-कल्याण का अर्थ (Meaning of Labour welfare)-श्रम-कल्याण के अन्तर्गत व्यावसायिक संस्थानों तथा उद्योग समूह के कर्मचारियों को मानवीय आधार पर अधिक-से-अधिक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा शैक्षिक सुविधाएँ प्रदान करने पर जोर दिया। जाता है। ‘श्रम-कल्याण’ का विचार अत्यन्त विस्तृत और अनेकार्थबोधक है जोकि देश-काल व परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होते है। किसी विशिष्ट स्थान के श्रमिकों या कर्मचारियों के लिए एक समय-विशेष पर जो कार्य कल्याणकारी समझा जा रहा है, आवश्यक नहीं है कि वह अन्य स्थान के श्रमिकों या कर्मचारियों के लिए भी समय-विशेष पर कल्याणकारी कहा जाये। हमारे देश में किसी उद्योग के श्रमिकों के लिए सन्तुलित आहार तथा वर्दी का प्रबन्ध करना श्रम-कल्याण कार्य के अन्तर्गत गिना जा सकता है लेकिन जापान, जर्मनी या अमेरिका के लिए इसे आवश्यक रूप से श्रम-कल्याण कार्य के अन्तर्गत सम्मिलित नहीं कर सकते।
इस विषय में ‘श्रम पर रॉयल कमीशन की रिपोर्ट (Report of Royalcommission on Labour) में ठीक ही कहा गया है, “कल्याण शब्द, जैसा कि औद्योगिक श्रमिकों के लिए लागू होता है, आवश्यक रूप से लचीला, एक-दूसरे देश से भिन्न अर्थ वाला, विभिन्न सामाज्ञिक प्रथाओं, औद्योगीकरण के स्तर और श्रमिकों के शैक्षणिक विकास के अनुरूप होता है। सच तो यह है कि श्रम-कल्याण एक बहुत ही व्यापक शब्द है जो श्रमिकों तथा कर्मचारियों के लिए भाँति-भाँति की आवश्यक सुविधाओं को प्रदान करने से सम्बन्धित है। प्रारम्भ में श्रम-कल्याण का अर्थ उद्योगपति या मालिकों द्वारा अपने श्रमिकों को वेतन के अतिरिक्त प्रदान की जाने वाली उन सुविधाओं से समझा जाता था जो उनकी उन्नति में सहायक सिद्ध होती थीं, किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में श्रम-कल्याण का अर्थ अधिक व्यापक हो गया है। अपने व्यापक अर्थ में श्रम-कल्याण से अभिप्राय कर्मचारियों या श्रमिकों की शारीरिक, शासन तथा श्रम संगठनों द्वारा किये जाने वाले समस्त प्रयासों अथवा कार्यों से है।”
भ्रम-कल्याण की परिभाषा (Definition of Labour welfare)–श्रम-कल्याण के अर्थ को और स्पष्ट करने के लिए हम निम्नलिखित परिभाषाओं का उल्लेख करेंगे –
(1) एनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइन्सेज के अनुसार, “श्रम-कल्याण के अन्तर्गत किसी मिल के मालिकों के वे ऐच्छिक प्रयास सम्मिलित हैं जिनके द्वारा, वर्तमान औद्योगिक व्यवस्था में, कर्मचारियों के लिए कार्य के आवश्यक तथा यदा-कदा जीवन के लिए आवश्यक उन दशाओं की स्थापना की जाती है जो कानून, उद्योग की प्रथा एवं बाजार की दशा के ऊपर होती है।”
(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, “श्रमिकों के कल्याण का अर्थ ऐसी सेवाओं, सुविधाओं तथा आरामों से है जोकि उद्योगों में या उनके निकट स्थापित किये जायें ताकि काम करने वाले लोग अपना काम स्वस्थ और अनुकूल वातावरण में कर सकें तथा उन्हें अच्छे स्वास्थ्य एवं उच्च सामूहिक उत्साहशीलता के वर्द्धन में सहायक सुविधाएँ प्राप्त हो सकें।
श्रम-कल्याण के कार्य (Labour-welfare Activities)-श्रम-कल्याण के कार्यों को सामान्य रूप से तीन प्रमुख वर्गों के अन्तर्गत रखा जाता है
(अ) श्रम-कल्याण के कार्यों का सामान्य वर्गीकरण – साधारणतया श्रम-कल्याण के कार्य तीन भागों में विभाजित किये जा सकते हैं –
(1) श्रम-कल्याण के वैधानिक कार्य – श्रम-कल्याण के वैधानिक कार्यों के श्रमिकों के हित में कानून द्वारा सुनिश्चित ऐसे कल्याण कार्य सम्मिलित हैं जिन्हें करने के लिए उद्योगपति कानून से बाध्य होते हैं। उदाहरण के लिए कार्य के घण्टे, सुरक्षा की व्यवस्था तथा कार्य करने की आवश्यक अनुकूल दशाओं को बनाये रखना आदि वैधानिक कार्यों में सम्मिलित हैं।
(2) श्रम-कल्याण के ऐच्छिक कार्य – ये श्रमिकों के हितार्थ किये जाने वाले वे सभी कार्य हैं। जिन्हें उद्योगपति अपनी इच्छा से सम्पादित करते हैं। इन कार्यों को करने के लिए मालिकों को बाध्य नहीं किया जा सकता है।
(3) पारस्परिक कार्य – पारस्परिक कार्यों में ऐसी सुविधाएँ सम्मिलित हैं जो श्रम संगठनों तथा उद्योगपतियों के मध्य समझौता होकर सुनिश्चित की जाती हैं तथा श्रमिकों को मिलती हैं।
(ब) डॉ० ब्राउटन के अनुसार श्रम-कल्याण कार्यों का वर्गीकरण-डॉ० ब्राउटन (Dr. Broughton) ने श्रम-कल्याण कार्यों को मुख्य रूप से दो वर्गों में रखा है –
- उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित कार्य तथा
- उद्योग के बाहर श्रम-कल्याण के कार्य।
इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –
(1) उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित कार्य-ये कार्य निम्नलिखित हैं –
(i) वैज्ञानिक भर्ती – औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों की भर्ती पक्षपातविहीन तथा वैज्ञानिक ढंग से की जानी चाहिए। इस भर्ती का आधार पूर्व अनुभव, साक्षात्कार, क्षमताओं एवं अभिवृत्तियों का परीक्षण होना चाहिए। वैज्ञानिक भर्ती उस भर्ती को कहा जाता है जिसे सभी लोग न्याययुक्त एवं निष्पक्ष स्वीकार करते हों और उससे किसी को असन्तोष नहीं होता।
(ii) औद्योगिक प्रशिक्षण – नये-नये कार्यों को सिखाने के लिए उद्योग के कर्मचारियों को आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
(iii) दुर्घटनाओं की रोकथाम – उद्योग में घटित होने वाली दुर्घटनाओं से श्रमिकों को बचाने के लिए अनिवार्य एवं व्यापक प्रबन्ध किये जाने चाहिए। खतरनाक यन्त्रों से हानि, अत्यधिक ताप तथा आग लगने से हानि की उचित रोकथाम हो। सावधानी के तौर पर आकस्मिक खतरों की पूर्व-सूचना के यन्त्र उपयोग में लाये जा सकते हैं।
(iv) स्वच्छता, प्रकाश तथा वायु का प्रबन्ध – कर्मचारियों के व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए उद्योग के अन्दर कुछ सुविधाओं का दिया जाना आवश्यक है। उद्योग में सफाई, पुताई, रोशनदान, पीने का पानी, प्रकाश, स्नानगृह, मूत्रालय, शौचालय, गन्दी वायु बाहर निकालने के पंखे, ताजी हवा प्रदान करने के पंखे एवं वातानुकूलन इत्यादि की व्यवस्था की जानी चाहिए।
(v) अन्य सुविधाएँ – उद्योग के भीतर रेडियो, टेलीविजन, मनोरंजन कक्ष, जलपानगृह तथा विश्राम गृह का भी प्रबन्ध किया जाए जहाँ बीच-बीच में जाकर श्रमिक और कर्मचारीगण आराम व राहत पा सकें।
(2) उद्योग के बाहर श्रम – कल्याण के कार्य – उद्योग के बाहर श्रम-कल्याण के प्रमुख कार्य इस प्रकार हो सकते हैं –
(i) सस्ते एवं पौष्टिक भोजन की व्यवस्था – श्रमिकों को सस्ता, अच्छा एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की दृष्टि से उद्योग की तरफ से भोजनालय शुरू किये जा सकते हैं। बहुत-से श्रमिक और कर्मचारी ऐसे होते हैं जो किन्हीं परिस्थितियोंवश अपने साथ परिवार नहीं रखते या वे परिवारविहीन होते हैं। उनका काफी समय एवं शक्ति भोजन की व्यवस्था में खर्च हो जाती है। भोजनालय की व्यवस्था से ऐसे श्रमिकों या कर्मचारियों को भोजन के कष्ट से मुक्ति मिल सकती है। इसके अतिरिक्त श्रमिक बस्तियों के निकट सरकारी सस्ते गल्ले, घी-तेल, मिट्टी का तेल तथा अन्य घरेलू आवश्यक सामान की बिक्री की व्यवस्था हो।
(ii) उत्तम आवास की व्यवस्था – कुछ महानगरों में आवास की विकट समस्या रहती है। उद्योग के श्रमिकों या कर्मचारियों को उनकी हैसियत के मुताबिक उचित आवास नहीं मिल पाता अथवा उन्हें उद्योग से काफी दूर जाकर आवास उपलब्ध होता है जिससे आने-जाने की समस्या उत्पन्न होती है। यदि उद्योगों के निकट श्रमिकों को आवास की सुविधा दी जाये तो वे राहत महसूस करेंगे जिसका उत्पादन पर अच्छा प्रभाव होगा। इसके लिए उद्योगपति, कारखाने में या उसके समीप सस्ते हवादार मकाने बनवा सकते हैं।
(iii) चिकित्सा की व्यवस्था – कोई भी व्यक्ति बीमार पड़ सकता है, श्रमिक भी बीमार होते हैं। कुछ उद्योगों की प्रतिकूल दशाएँ श्रमिकों या कर्मचारियों को रोगी बना देती हैं। आजकल की महँगाई में श्रमिक अपना अच्छा इलाज नहीं करवा पाते, इसलिए उनका रोग बढ़ता रहता है। पौष्टिक आहार के अभाव में कमजोर और कृशकाय श्रमिकों को रोग जल्दी घेरते हैं। रोगों से उत्पादन क्षमता पर उल्टा असर होता है। मिल-मालिकों को उद्योग या उसके बाहर चिकित्सा की सस्ती, सुलभ एवं अच्छी व्यवस्था प्रदान करनी चाहिए।
(iv) शिक्षा की व्यवस्था – मालिकों द्वारा श्रमिकों या कर्मचारियों के बच्चों हेतु अच्छी प्राथमिक एवं विद्यालयी शिक्षा का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। उनकी पत्नियों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोले जाने चाहिए। इसके अलावा सामाजिक शिक्षा भी श्रम-कल्याण का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। शिक्षा की यह व्यवस्था नि:शुल्क होनी चाहिए।
(v) मनोरंजन की व्यवस्था – कठोर श्रम के बाद मनोरंजन विश्राम जैसा लाभ देता है। श्रमिकों के कल्याण की दृष्टि से उद्योगों के बाहर कर्मचारियों तथा श्रमिकों के मनोरंजन की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए उद्योगपति विभिन्न प्रकार के प्रबन्ध कर सकते हैं; जैसे-रेडियो, टेलीविजन, वीडियो पर फिल्में, चलते-फिरते सिनेमा की व्यवस्था, श्रमिक क्लब, पुस्तकालय तथा वाचनालय आदि की व्यवस्था। श्रमिक बस्तियों में समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों, नाटकों, स्वांग-तमाशों, धार्मिक लीलाओं, राग-रागनियों, आल्हा आदि के आयोजनों से भी श्रमिकों का मनोरंजन किया जा सकता है। श्रमिकों एवं कर्मचारियों के आवास क्षेत्र में पार्क, मैदान, खेल-क्लब, तैरने व नहाने के ताल तथा अखाड़े आदि का भी प्रबन्ध किया जा सकता है।
(स) आर्थिक लाभ सम्बन्धी भ्रम-कल्याण कार्य – श्रमिकों एवं कर्मचारियों के आर्थिक लाभ की दृष्टि से निम्नलिखित श्रम-कल्याण के कार्य किये जाने आवश्यक हैं –
(i) ओवरटाइम की सुविधा – कभी-कभी उद्योग में उत्पादन-कार्य जोर-शोर से चलता है। कार्य की अधिकता के कारण श्रमिकों को कार्य के नियत घण्टों के अतिरिक्त कार्य करना पड़ता है। जो श्रमिक निर्धारित समय से अधिक कार्य करते हैं, उनके लिए ओवरटाइम की व्यवस्था की जानी चाहिए।
(ii) नियमों की सुरक्षा – श्रमिकों के हितों को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें उद्योग में लागू नियमों की सुरक्षा की गारण्टी प्रदान की जाये। पदोन्नति, कार्य के घण्टे, कार्य की अनुकूल दशाएँ तथा अन्य सुविधाओं का नियमानुसार एवं न्यायोचित पालन किया जाना चाहिए। सर्वविदित रूप से, नियमानुसार प्रदान की जाने वाली सुविधाओं में अवहेलना तथा अन्याय से अशान्ति, तनाव एवं संघर्ष जन्म लेते हैं।
(iii) प्रॉविडेण्ट फण्ड, बीमा तथा पेन्शन की सुविधा – यदि उद्योग में कार्यरत श्रमिक और कर्मचारी अपने भविष्य के प्रति चिन्तामग्न रहेंगे तो मानसिक अशान्ति एवं तनाव के कारण वे ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पायेंगे। श्रमिकों और कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने की दृष्टि से प्रॉविडेण्ट फण्ड, जीवन बीमा, सामूहिक बीमा, क्षतिपूर्ति बीमा, महँगाई-भत्ते की किस्तें, बोनस तथा पेन्शन आदि की सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए।
(iv) यात्रा-भत्ता – देशाटन से स्थान-स्थान की आबोहवा, सांस्कृतिक विनिमय तथा स्वच्छन्दता पाकर व्यक्ति का मन सुखी होता है। यदि श्रमिक या कर्मचारी को वर्ष में एक बार अपने परिवारजनों के साथ भ्रमण की सुविधा प्रदान की जाये तो उससे उसका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य सुधरेगा। मालिकों के प्रति उसकी श्रद्धा में वृद्धि होगी, उसका उत्साह व कार्यक्षमता बहुगुणित होकर वर्षपर्यन्त बने रहेंगे। इसके लिए समुचित यात्रा-भत्ता प्रदान किया जाना चाहिए।
निष्कर्षतः मनोविज्ञान के उद्योग में मानव-कल्याण के उन्नयन पर अत्यधिक बल दिया है। श्रम-कल्याण के कार्यों के बिना श्रमिकों की कार्य-क्षमता एवं उत्पादन वृद्धि की बात करना व्यर्थ है। मानवीय सम्बन्ध चिर-स्थायी हैं जिन्हें प्रोत्साहित करने के लिए श्रमिकों की भलाई में श्रम-कल्याण कार्यों का नियोजन अपरिहार्य है, किन्तु यह भी समझ लेना चाहिए कि श्रमिकों तथा कर्मचारियों के हिव में श्रम-कल्याण कार्य सुसंयोजित तथा उदारतापूर्वक प्रशासित हों। वस्तुतः बुद्धिमत्तापूर्वक आयोजित एवं उदारतापूर्वक प्रशासित कल्याण कार्य अन्ततः उद्योगपतियों तथा सेवायोजकों के लिए ही उपयोगी व लाभप्रद सिद्ध होते हैं।
प्रश्न 6.
हड़ताल’ एवं ‘तालाबन्दी के अर्थ एवं कारणों का उल्लेख करते हुए इनकी रोकथाम के उपायों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
हड़ताल एवं तालाबन्दी को रोकने में मनोविज्ञान किस प्रकार सहायक है?
उत्तर :
भूमिका
(Introduction)
मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र समस्याओं तथा अशान्ति से परिपूर्ण है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रों की समस्याओं के अनुरूप ही औद्योगिक क्षेत्र भी विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त है। इन समस्याओं में से कुछ उत्पादन सम्बन्धी समस्याएँ होती हैं अथवा तकनीकी बातों को लेकर उत्पन्न होती हैं; और कुछ समस्याएँ मानव व्यवहार से सम्बन्धित होती हैं। अधिकांश उद्योगपति श्रमिकों और कर्मचारियों को-कम-से कम वेतन देकर अधिक-से-अधिक लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। इसके विपरीत श्रमिकों और कर्मचारियों का यह प्रयास रहता है कि वे अपने कड़े परिश्रम के बदले जीने के लिए पर्याप्त वेतन तथा जीवन सम्बन्धी सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—काम करने के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना व बीमारी के लिए उचित चिकित्सा की व्यवस्था तथा भत्ता आदि उद्योगपतियों से प्राप्त करें जब औद्योगिक व व्यावसायिक संस्थानों में कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता और श्रमिक हितों की अनदेखी की जाती है तो उससे दोनों वर्गों-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग के बीच तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के बीच का तनाव प्रायः ‘हड़ताल’ और ‘तालाबन्दी’ के रूप में प्रकट होता है।
हड़ताल
(Strike)
हड़ताल का अर्थ (Meaning of Strike)
हड़ताल औद्योगिक’ अशान्ति का एक प्रमुख एवं प्रचलित रूप है। उद्योगपति एवं श्रमिकों के सम्बन्धों का इतिहास बहुत पुराना है। प्रारम्भिक काल में श्रमिक उद्योगपतियों को ईश्वर या देवता का प्रतिरूप मानते हुए उनकी सभी आज्ञाओं का पालन करते थे और उद्योगपति इस भावना का लाभ उठाते हुए उनका जबरदस्त शोषण करते थे, किन्तु औद्योगिक क्रान्ति के आगमन ने पासा ही पलट दिया, श्रमिकों में जागरूकता आयी और वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गये। आवश्यकताओं, कठिनाईयों तथा समस्याओं में समानता के आधार पर श्रमिकों में एकता तथा सहयोग की भावना विकसित हो जाना स्वाभाविक है। श्रमिक एक हुए और उनके संगठन बने। इस प्रकार सामूहिक एकता ने श्रमिक संघों (Labour Unions) की विचारधारा को व्यवहार में बदल दिया। श्रमिक संघों ने उद्योगपतियों से अपने अधिकारों तथा सुविधाओं की माँगें प्रारम्भ कीं जिन्हें अधिकतम लाभ की लालसा से प्रेरित उद्योगपतियों द्वारा ठुकरा दिया गया। जब उद्योग में श्रमिकों पर काम का दबाव अधिक पड़ता है लेकिन उनकी न्यायोचित माँगों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता तो वे विरोधस्वरूप काम पर जाना बन्द कर देते हैं। वे सभी या अधिकांश लोग, जो काम पर नहीं जाते, उद्योगपति एवं उसकी नीतियों के विरुद्ध तथा अपनी माँगों व समस्याओं के समर्थन में प्रदर्शन करते हैं, नारे लगाते हैं, जुलूस आदि निकालते हैं तथा भूख-हड़ताल पर बैठ जाते हैं। श्रमिकों की इन समस्त क्रियाओं को हड़ताल (Strike) कहा जाता है।
हड़ताल के कारण (Causes of Strike)
हड़ताल के मूल में उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के परस्पर विरोधी लक्ष्यों एवं हितों पर आधारित वर्ग-संघर्ष की एक लम्बी दास्तान निहित है। इस वर्ग-संघर्ष के अनेक कारण हो सकते हैं; यथा-अधिक वेतन व भत्तों की माँग, कम के घण्टे कम करने की माँग, बोनस तथा दूसरी सुविधाओं को लेकर मजदूर-मालिक में संघर्ष आदि। वास्तविकता यह है कि श्रमिक जानता है कि उद्योगपति के भोग-विलास के सभी साधन उसकी खून-पसीने की कमाई से आये हैं, जबकि वह जीवन-पर्यन्त झोंपड़पट्टी में पशुओं की तरहू जीवन जीता है। श्रमिक स्वयं को शोषित तथा उद्योगपति को शोषक समझता है। अपने शोषण को लेकर श्रमिकों के मन में असन्तोष की यह आग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तात्कालिक कारणों से हड़ताल के रूप में भड़क उठती है। हड़ताल के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –
(1) इतिहासजनित अविश्वास की प्रवृत्ति – औद्योगिक क्रान्ति से लेकर वर्तमान क्षणों तक करीब-करीब तीन शताब्दियाँ बीत चुकी हैं। औद्योगिक संघर्षों के इस लम्बे इतिहास में उद्योगपति और श्रमिकों के बीच छत्तीस (36) का आँकड़ा रहा है यानि दोनों एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। विरोध के उग्र होते स्वरों ने दोनों वर्गों के बीच अविश्वास की खाई को इतना चौड़ा कर दिया है कि हर पल विश्व के किसी-न-किसी कोने में हड़ताल देखी जा सकती है।
(2) सामाजिक दूरी – उद्योगपति और श्रमिक समाज की सीमाओं के दो छोर हैं जिनके बीच कोई सामाजिक सम्बन्ध, सम्पर्क, प्रेम एवं सहानुभूति नहीं पायी जाती। इससे भी निकटता समाप्त होती है तथा अविश्वास बढ़ता है। दोनों वर्ग अपने हितों में जरा से भी आघात से तिलमिला उठते हैं। श्रमिक उद्योगपतियों के अन्याय से उत्तेजित होकर हड़ताल का निर्णय ले लेते हैं। सामाजिक दूरी के कारण उनमें आपसी सूझ-बूझ होने का अवसर और समझौते का रास्ता नहीं मिलता।।
(3) दुर्व्यवहार – कभी-कभी किसी उद्योग के अधिकारी श्रमिकों को मार बैठते हैं या उनके साथ दुर्व्यवहार, कर बैठते हैं जिससे सामूहिक असन्तोष पैदा होता है और उस अधिकारी को दण्डित कराने के लिए हड़ताल होती है।
(4) कार्य की दशाएँ – कार्य की प्रतिकूल दशाएँ हड़ताल को जन्म देती हैं। कुछ उद्योगों में श्रमिकों से अमानवीय तरीके से काम लिया जाता है और उन्हें आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। उदाहरणार्थ-श्रमिकों के काम के घण्टे अधिक होते हैं, उन्हें विश्राम नहीं करने दिया जाता, उन्हें अधिक ताप याघातक मशीनों का सामना करना पड़ता है तथा उनसे बचाव का कोई उचित प्रबन्ध भी नहीं किया जाता ईत्यादि। इससे न केवल श्रमिकों की कार्य-क्षमता पर बुरा असर पड़ता है बल्कि उनका स्वास्थ्य भी गिरता जाता है। इन कारणों से कभी-कभी किसी श्रमिक की मृत्यु भी हो सकती है। इन विभिन्न कारणों से श्रमिकों में रोष उत्पन्न हो जाता है और वे हड़ताल के माध्यम से अपनी माँगे मनवाते हैं।
(5) ओवरटाइम – काम के निर्धारित घण्टों के अतिरिक्त काम करने पर जब श्रमिकों को इस अतिरिक्त समय को पारिश्रमिक नहीं दिया जाता तो उन्हें हड़ताल का सहारा लेना पड़ता है।
(6) वेतन-वृद्धि, भत्ता और बोनस – बढ़ती हुई महँगाई के विरुद्ध उद्योगों के श्रमिक अपने मालिकों से वेतन बढ़ाने की माँग करते हैं। महँगाई बढ़ने के साथ-साथ भत्तों का बढ़ना भी आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उद्योगों में लाभ का पूरा अंश मालिकों के पेट में क्ला जाता है। अतः वेतन-वृद्धि, भत्ता तथा बोनस को लेकर जब श्रमिकों की माँगें पूरी नहीं होतीं तो वे हड़ताल करने पर उतारू हो जाते
(7) राजनीतिक कारण – कुछ स्वार्थी नेता लोग अपनी नेतागिरि चमकाने के इरादे से श्रमिकों को बहला-फुसलाकर हड़ताल करवाते हैं और उद्योगपति से साँठ-गाँठ कर पैसा खा जाते हैं। इससे श्रमिकों को भारी हानि होती है।
(8) मजदूर-संगठनों की बहुलता – आजकल दुनिया में इतने सच्चे-झूठे मजदूर-संगठन किसी-न-किसी लक्ष्य को लेकर पैदा हो गये हैं कि उनमें से अधिकांश अपने अस्तित्व या स्वार्थपूर्ति में श्रमिकों को मोहरा बनाकर हड़ताल कराने में सफल हो ही जाते हैं। श्रमिक इनके बहकावे में आकर हड़ताल कर देते हैं।
तालाबन्दी
(Lockout)
तालाबन्दी का अर्थ (Meaning of Lockout)
तालाबन्दी औद्योगिक अशान्ति का एक दूसरा किन्तु प्रमुख पक्ष है। इसके लिए विशेष रूप से उद्योगपतियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। कभी-कभी जब उद्योगपति श्रमिकों की माँग पूरी नहीं कर पाते या पूरी करना नहीं चाहते तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे औद्योगिक इकाई बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। ऐसी अवस्था में श्रमिकों या कर्मचारियों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है। इस भाँति ‘तालाबन्दी’ (Lockout) हड़ताल का एक विरोधी रूप है।
तालाबन्दी के कारण (Causes of Lockout)
तालाबन्दी के बहुत से कारण हो सकते हैं। इनमें से प्रमुख कारणों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है –
(1) प्रथमतः उद्योगपति श्रमिकों की अतिशय, औचित्य की सीमा से बाहर तथा राजनीति से प्रेरित माँगों से परेशान होकर तालाबन्दी का आश्रय लेते हैं। उद्योगपति सोचते हैं कि लम्बे समय तक भूख और जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं से तड़प-तड़पकर श्रमिक सबक सीख जाएँगे और ताला खोलने की खुशामद करेंगे। इस प्रकार, भारी नुकसान सहते हुए भी श्रमिकों पर अंकुश लगाने का उद्योगपतियों की दृष्टि में यह एक उपाय है।
(2) दुसरे, किन्हीं कारणों से कभी-कभी कोई औद्योगिक इकाई लगातार नुकसान उठाती है और इस भाँति घाटे में चलती है। उद्योगपति कुछ समय तक तो घाटा सहते रहते हैं लेकिन फिर वे मिल में ताला लगा देते हैं।
(3) तीसरे, यदा-कदा लम्बे समय तक पावर सप्लाई, ईंधन या कच्चे माल की आपूर्ति न होने के कारण भी उद्योगपति को नुकसान होता है। उत्पादन घटने या समाप्त होने से तैयार माल का उठान नहीं हो पाता; अत: चे विवश होकर तालाबन्दी कर देते हैं।
हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के उपाय
(Measures to Remove Strikes and Lockouts)
‘हड़ताल और तालाबन्दी’ दोनों ही औद्योगिक अशान्ति के परिचायक हैं। हड़ताल में श्रमिक काम बन्द कर देते हैं और तालाबन्दी में उद्योगपति कारखाने का ताला बन्द कर देते हैं। दोनों में ही औद्योगिक संघर्ष का वीभत्स रूप देखने को मिलता है जिससे उत्पादन कार्य ठप हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय स्तर पर हानि उठानी पड़ती है; अतः हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम व निवारण के तत्काल उपाय करने चाहिए। इसके प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं
(1) श्रमिकों का सहयोग (Co-operation of Labourers) – उद्योगपतियों को श्रमिकों का विश्वास अर्जित कर उनसे प्रशासनिक कार्यों में सहयोग प्राप्त करना चाहिए। इससे औद्योगिक अशान्ति एवं संघर्ष स्वतः ही दूर हो जाएगा।
(2) उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस (Sufficient wages, Allowance and Bonus) – श्रमिकों को उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस आदि समय पर तथा नियमानुसार प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वे अपनी आवश्यकताओं की भली प्रकार पूर्ति कर सकें। बढ़ती हुई महँगाई के साथ वेतन-दरों में वृद्धि न्यायोचित तथा मानवीय दृष्टि से वांछित है।
(3) तात्कालिक कारणों का निराकरण (Removing of Immediate Causes) – हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के लिए तात्कालिक असन्तोष के कारणों को जल्दी ही निराकरण कर लिया जाए। ऐसी परिस्थितियों की जाँच-पड़ताल किन्हीं सर्वमान्य एवं उपयुक्त व्यक्तियों के माध्यम से करायी जाए और उनका शीघ्र समाधान प्रस्तुत कर उसे क्रियान्वित किया जाए।
(4) श्रम-कल्याण कार्यों का प्रबन्ध (Managing Labour-welfare Activities) – उद्योग की तरफ से श्रमिकों के लिए कुछ सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। इन सुविधाओं की प्राप्ति से उन्हें सुख और सन्तोष मिलता है जिससे वे अधिक समायोजन के साथ कार्य कर सकते हैं। इन सुविधाओं में चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, आवास, भोजन आदि का प्रबन्ध मुख्य है।
(5) विशिष्ट समिति (Specific Association) – औद्योगिक प्रशासन के लिए एक विशेष समिति का निर्माण किया जाना चाहिए, जिसमें श्रमिकों, कर्मचारियों तथा मालिकों के प्रतिनिधियों को स्थान दिया जाए। यह समिति किसी भी समस्या या अवरोध की परिस्थिति में सभी मामलों में विचार-विमर्श करते हुए पारस्परिक मतभेदों का निवारण करेगी। इससे सहयोगपूर्ण वातावरण की वृद्धि होगी और औद्योगिक तनाव व अशान्ति कम होगी।
निष्कर्षतः हड़ताल और तालाबन्दी इन दोनों में से किसी एक का भी विचार व्यक्तिगत एवं राष्ट्रहित में नहीं है। इनसे उत्पादन में कमी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी तथा अन्ततः भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। ये दोनों ही आन्दोलन, तनाव और संघर्ष के परिचायक हैं जिनके परिणामतः अशान्ति व अव्यवस्था का जन्म होता है। कुल मिलाकर उद्योग की मुख्य जिम्मेदारी उद्योगपति या सेवायोजक की होती है। यदि वे अपने लाभांश की एक छोटी-सी मात्रा का त्याग करना सीखें तथा श्रमिकों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें सहानुभूति का पात्र बनायें तो इससे न केवल उत्पादन-वृद्धि होगी अपितु उद्योग की सम्पूर्ण व्यवस्था अभीष्ट रूप से संचालित भी हो सकेगी।
प्रश्न 7.
विज्ञापन (Advertisement) से क्या आशय है? विज्ञापन के उद्देश्यों अथवा कार्यों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति के सूत्रपात ने विश्व के सभी देशों की औद्योगिक इकाइयों को आधुनिकतम तथा स्वचालित मशीनों से सजा दिया। इससे उत्पादन में गुणात्मक एवं मात्रात्मक वृद्धि हुई और वाणिज्य एवं आर्थिक क्षेत्रों की काया ही पलट हो गयी, लेकिन जनसंख्या-वृद्धि तथा मानव सम्पर्को की परिधि व्यापक होने के कारण एक नयी समस्या उभरी। यह समस्या औद्योगिक उत्पादनों की प्रमुखता की वजह से एक ही प्रकार के अनेकानेक उत्पादन बाजार में आने के कारण उत्पादकों के सम्मुख उत्पादित वस्तुओं की बिक्री की समस्या थी। वस्तुत: विज्ञान और तकनीकी की विकसित प्रविधियों की सहायता से एक ही वस्तु अनेक स्थानों पर बहुत-सी कम्पनियों द्वारा बनायी जाने लगी जिससे प्रतियोगिता बहुत बढ़ गयी। प्रगतिशील व्यापारियों एवं औद्योगिक संस्थानों ने बिक्री की समस्या के समाधान तथा अतिरिक्त उपभोक्ताओं को अपने उत्पादन के प्रति आकर्षित करने के विचार से ‘विज्ञापन (Advertisement) का सहारा लिया।
विज्ञापन का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Advertisement)
आधुनिक समय विज्ञापन का समय है। विज्ञापन का शाब्दिक अर्थ है-‘वि + ज्ञापन’ अर्थात् विशेष प्रकार से बताना तथा जानकारी प्रदान करना। ‘विज्ञापन’ एक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत उपभोक्ताओं का ध्यान किसी उत्पादन (वस्तु) विशेष की ओर इस भाँति आकृष्ट किया जाता है कि वह व्यक्ति उस वस्तु को खरीदने हेतु प्रेरित हो तथा अन्तत: उसे क्रय कर ही ले। अतः विज्ञापन से तात्पर्य उस पद्धति से है जिसके माध्यम से कुछ विशिष्ट एवं निश्चित वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व एवं विशेषताओं की ओर लोगों का ध्यान खींचा जाता है। कुल मिलाकर विज्ञापन एक तरह का प्रचार है जो किसी वस्तु की आन्तरिक व बाह्य विशेषताओं तथा उपयोगिताओं को लोगों के मस्तिष्क पर इस प्रकार से चित्रित करता है कि वे उसे खरीदने के लिए लालायित हो उठते हैं। इस प्रकार विज्ञापित वह वस्तु पहले की अपेक्षा अधिक बिकने लगती है।
आरडब्ल्यू० हसबैण्ड ने विज्ञापन को इस प्रकार परिभाषित किया है, “विज्ञापन को प्रचार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कुछ वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व व गुणों की ओर ध्यान आकर्षित करता है।”
“Advertisement may be defined as publicity which calls attention to the existence and merits of certain goods and services.”
-R. W. Husband
विज्ञापन के उद्देश्य अथवा कार्य अथवा विज्ञापन के मनोवैज्ञानिक आधार
(Aims or Functions of Advertisement)
विज्ञापन का अर्थ जानने एवं इसकी परिभाषा का अध्ययन करने के उपरान्त ज्ञात होता है कि विज्ञापन के माध्यम से कुछ उपलब्ध उत्पादनों की ओर ध्यान आकर्षित कराने का प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही जो विज्ञापन इस उद्देश्य अथवा कार्य में सफल रहते हैं उनकी उत्पादित वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि हो जाती है। विज्ञापन के प्रमुख उद्देश्य अथवा कार्य निम्नलिखित हैं –
(1) ध्यान आकृष्ट करना (To Attract Attention) – विज्ञापन का सर्वप्रथम उद्देश्य एवं कार्य लोगों का ध्यान वस्तु-विशेष की ओर आकृष्ट करना है। विज्ञापन के माध्यम से वस्तु के प्रति यह आकर्षण इतना अधिक उत्पन्न कर दिया जाता है कि लोगों की वस्तु में रुचि बढ़ जाती है तथा वे प्रेरित होकर उसे खरीद लेते हैं। इसके लिए आकर्षक शीर्षक, रंगबिरंगे चित्र, रेडियो पर रुचिकर मधुर ध्वनि तथा टी० वी० पर तस्वीर और आवाज का मनोहारी संगम प्रस्तुत किया जाता है।
(2) रुचि उत्पन्न करना (To Create Interest) – विज्ञापन का दूसरा उद्देश्य या कार्य वस्तु-विशेष में लोगों की रुचि उत्पन्न करना है। विज्ञापनदाता अपनी वस्तु में रुचि उत्पन्न करने के लिए तरह-तरह के साधन अपनाते हैं। विज्ञापन की अनोखी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। पुरुषों में रुचि पैदा करने की दृष्टि से सुन्दर युवतियों के चित्र प्रदर्शित किये जाते हैं। बच्चों को उस वस्तु को प्रयोग करते दिखाया जाता है।
(3) विश्वास पैदा करना (‘Tb Produce Belief) – विज्ञापन का उद्देश्य यह होता है कि उसके माध्यम से उपभोक्ताओं में वस्तु-विशेष के प्रति यह विश्वास पैदा हो जाए कि सिर्फ वही वस्तु उनके लिए उपयोगी हो सकती है, कोई अन्य वस्तु नहीं। विश्वास उत्पन्न करने की दृष्टि से विज्ञापन के चित्र के अतिरिक्त शीर्षक एवं लिखी गयी सामग्री को प्रभावशाली ढंग से संयोजित किया जाता है। उदाहरण के लिए कोई लोकप्रिय गायिका किसी गोली को चूसते हुए यह विश्वास दिलाती है इसके उसके गले की खराश एकदम ठीक ही गयी है।
(4) स्मृति पर प्रभाव (Tb Influence Memory) – विज्ञापन का एक मुख्य उद्देश्य यह भी है। कि किसी वस्तु-विशेष के विषय में जो बातें उसमें व्यक्त की जाएँ वे लोगों के मस्तिष्क पर लम्बे समय तक अंकित रहें तथा उनका प्रभाव स्थायित्व ग्रहण कर सके। मानव स्मृति पर जितना तीव्र प्रभाव विज्ञापन डालेगा इतना ही वह सफल होगा।
(5) क्रय की प्रेरणा (Intention to Buy) – विज्ञापन का अन्तिम किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य एवं कार्य यह है कि वह व्यक्ति में विज्ञापित वस्तु को खरीदने की इच्छा उत्पन्न कर दे। वस्तुतः वस्तु के क्रय की प्रेरणा एवं बिक्री के विचार से ही अन्य सभी उद्देश्य जुड़े हैं। इस उद्देश्य में सफल विज्ञापन अपने उपयुक्त सभी उद्देश्यों में सफल समझा जाता है।
प्रश्न 8.
वर्तमान युग में विज्ञापन के प्रमुख साधनों का उल्लेख करते हुए उनके सापेक्षिक महत्त्व का विवेचन कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक युग में विज्ञापनों की बढ़ती हुई उपयोगिता के कारण इन्हें मानव-जीवन का एक अपरिहार्य अंग मान लिया गया है। हर रोज सुबह को समाचार-पत्रों में विज्ञापन के साथ दिनारम्भ होता है, समाचार-पत्रों में रखे विज्ञापन के पैम्फलेट, रेडियो या एफ०एम० पर विज्ञापन, सड़क और चौराहों के बोर्ड, टेलीविजन पर विज्ञान आदि-आदि, मनुष्य का जीवन हर तरफ विज्ञापनों से भरा पड़ा है। छोटी-से छोटी वस्तु के क्रय-विक्रय से लेकर आवश्यकताओं से सम्बन्धित तथा वैवाहिक विज्ञापन अपने महत्त्व एवं उपयोगिता को सिद्ध करते हैं। विज्ञापन और तकनीक की प्रगति ने विज्ञापन के क्षेत्र को भी विभिन्न नवीनतम प्रविधियों, यन्त्रों, माध्यमों तथा साधनों से सुसज्जित किया है।
विज्ञापन के प्रमुख साधन अथवा माध्यम
(Advertising Media)
विज्ञापन के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं –
(1) समाचार-पत्र – समाचार-पत्र विज्ञापन का सर्वव्यापी एवं सर्वस्वीकृत साधन है। अधिकांश समाचार-पत्र प्रतिदिवस प्रात: प्रकाशित होते हैं। कुछ सन्ध्याकाल में या सप्ताहवार भी प्रकाशित किये जाते हैं। समाचार-पत्रों की आय का मुख्य साधन विज्ञापन है क्योंकि इन पत्रों के माध्यम से सन्देश को देश-विदेश में पहुँचाया जा सकता है। वस्तुतः दैनिक समाचार-पत्र जन-सम्पर्क के श्रेष्ठ साधन कहे जाते हैं। शिक्षित लोगों का एक बड़ा प्रतिशत तो निस्सन्देह, समाचार-पत्र पढ़ने को आदि है ही, लेकिन अनपढ़ लोग भी इसमें समुचित दिलचस्पी रखते हैं और शिक्षित लोगों से पूछताछ कर विज्ञापन आदि की जानकारी प्राप्त करते हैं। समाचार-पत्रों के कुछ पृष्ठ एवं विशिष्ट स्थान विज्ञापन के लिए ही निश्चित होते हैं। ये विज्ञापन प्रायः भावात्मक अपील के साथ सरल और सीधी भाषा-शैली में होते हैं। विज्ञापनों की निरन्तर पुनरावृत्ति से विज्ञापन की प्रभावकता में वृद्धि भी होती है। नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, दैनिक जागरण, अमर उजाला, पंजाब केसरी, आदि-आदि अनेक समाचार-पत्र विभिन्न स्थानों से प्रकाशित एवं प्रसारित होते हैं। इस प्रकार समाचार-पत्र नाना प्रकार के विज्ञापन का प्रमुख साधन है।
(2) पत्रिकाएँ एवं अन्य प्रकाशन – अनेक मासिक, पाक्षिक तथा साप्ताहिक पत्रिकाएँ भी विज्ञापन की अच्छी माध्यम हैं। कुछ जनप्रिय एवं अच्छी पत्रिकाओं की साज-सज्जा, कागज, छपाई तथा पाठ्य-सामग्री इतनी आकर्षक होती है कि लोग इन्हें खरीदकर पढ़ते हैं और सँभालकर रख लेते हैं। इन पत्रिकाओं का एक विशेष आकर्षण उनमें छपे रंगीन एवं अनूठे विज्ञापन हैं। आजकल पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों के चित्र, सामग्री तथा प्रस्तुतीकरण का समंजन इतने उच्च स्तर का होने लगा है। कि बहुत से लोग तो इन्हें बहुत ही दिलचस्पी लेकर देखते-पढ़ते हैं। मुख्य पत्रिकाओं के अतिरिक्त अन्य प्रकाशन भी हमें प्राय: हर एक बुक स्टॉल पर रखे हुए मिलते हैं। इस भाँति पत्रिकाएँ तथा अन्य कुछ प्रकाशन विझपन के महत्त्वपूर्ण साधन हैं।
(3) पोस्टर एवं बोर्ड – नगरों एवं महानगरों के चौराहों पर, राष्ट्रीय राजमार्गों पर तथा अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों पर विशालकाय बोर्ड लगाकर उन पर विज्ञापन लिखे जाते हैं। ये बोर्ड अपनी स्थिति के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। बहुधा इन बोर्डो पर लिखे विज्ञापनों की सामग्री संक्षिप्त, रोचक व प्रभावशाली होती है तथा चित्रे बड़े, रंगीन और आकर्षक होने के कारण लोगों का ध्यान बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कुछ छोटे-छोटे बोर्ड बस, ट्रक या कारों पर भी लटके हुए देखे जा सकते हैं।
बोर्डों के अतिरिक्त नगरों की दीवारों पर पोस्टर भी चिपके हुए दिखाई पड़ते हैं। ये पोस्टर किसी कम्पनी या व्यापारिक संस्थान के हो सकते हैं तथा फिल्मों के भी-ज्यादातर फिल्म उद्योग से सम्बन्धित पोस्टर ही हमें दीवारों पर चिपके हुए दिखाई पड़ते हैं। पोस्टर चिपकाने से दीवारें खराब हो जाती हैं; अत: मकान मालिक इनके चिपकाने पर आपत्ति करते हैं। यही कारण है कि आमतौर पर रात को ही पोस्टर चिपकाये आते हैं। इस दृष्टि से यह आपत्तिजनक तथा समाज विरोधी कार्य है। ऐसा ही एक अन्य कार्य दीवारों पर रंग-रोगन से लिखवाकर विज्ञापन करना भी है। निजी दीवार पर लिखना या किराया देकर वे स्वीकृति लेकर लिखना एक अलग बात है, अन्यथा इसे भी अच्छा एवं उचित नहीं कहा जा सकता। कुछ भी सही लेकिन बोर्ड के माध्यम से, पोस्टर द्वारा या दीवार पर लिखकर विज्ञापन करना विज्ञापन के प्रमुख माध्यम हैं।
(4) पर्चे छपवाना – आमतौर पर कम्पनियाँ, व्यापारिक संस्थाएँ, प्रतिष्ठित दुकानदार एवं अन्य संस्थान कागज के पर्चे पर विज्ञापन छपवाकर उन्हें समाचार-पत्रों में रखवा देती हैं या बाजार आदि में बँटवाती हैं। विज्ञापन की दुनिया में इसे एक स्वस्थ परम्परा तथा सशक्त माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि इससे किसी को किसी प्रकार की हानि नहीं होती। विज्ञापनकर्ता द्वारा छपवाकर बाँटे गये ऐसे पर्चे जिज्ञासु, इच्छुक तथा सम्बन्धित लोग ही पढ़ पाते हैं, अन्यथा प्रायः लोग इन्हें फाड़कर फेंक देते हैं।
(5) रेडियो पर विज्ञापन – आज की दुनिया में रेडियो/मोबाइल फोन का प्रयोग बहुतायत से होता है। हमारे देश में रेडियो पर विविध भारती, ऑल इण्डिया रेडियो तथा रेडियो सीलोन पर प्रसारित कार्यक्रमों ने काफी लोकप्रियता अर्जित की है। इन प्रसारणों में विज्ञापन प्रसारण सेवा प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण है। विज्ञापन के प्रसारण में संगीत लय की सुमधुर धुनें हृदय पर गहरा प्रभाव डालती हैं। इनकी अनुगूंज श्रोता के मस्तिष्क में लम्बे समय तक बसी रहती है। यही कारण है कि रेडियो के विज्ञापन घर-घर सुने जाते हैं और विज्ञापन के सशक्त माध्यम के रूप में स्वीकृत हैं।
(6) दृश्य-श्रव्य माध्यम – दृश्य-श्रव्य माध्यम में टेलीविजन, वीडियो, मोबाइल तथा सिनेमा प्रमुख एवं प्रभावशाली माध्यम हैं। यह माध्यम मुद्रित माध्यम से कई गुना अधिक प्रभावशाली कहा जा सकता है। टेलीविजन पर अनेक कम्पनियों, उद्योगों तथा व्यापारिक संस्थानों के विज्ञापन तथा प्रायोजित कार्यक्रम दिखाये जाते हैं। वीडियो फिल्में भी टेलीविजन के साथ जुड़ी हैं। वीडियो रील में तो विज्ञापनों की भरमार होती है। सिनेमा में सभी आयु वर्ग के लोग मनोरंजन हेतु जाते हैं पिक्चर शुरू होने से ही पहले तथा इण्टरवल के समय भारी मात्रा में विज्ञापन दिखाये जाते हैं। इस प्रकार दृश्य-श्रव्य माध्यम विज्ञापन का एक अत्यन्त प्रभावशाली व महत्त्वपूर्ण साधन है।
(7) अन्य माध्यम – कुछ समृद्ध औद्योगिक एवं व्यापारिक संस्थान पर वार्षिक कैलेण्डर, डायरी, चाबी के गुच्छे, पेन तथा पेन-होल्डर आदि पर अपना विज्ञापन छपवाते हैं। रेलवे टाइम-टेबिल तथा टेलीफोन निर्देशिका पर भी विज्ञापन दिए जाते हैं। बड़े-बड़े मेलों में विशालकाय उड़ने वाले गुब्बारों पर भी विज्ञापन देखे जाते हैं।
लघुउतरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
- औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की व्यावहारिक शाखा है
- यह औद्योगिक जगत् से सम्बन्धित मनुष्यों के व्यवहारों का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन है
- मनोविज्ञान की यह अध्ययन शाखा उत्पादक व उत्पादक तत्त्वों के मध्य कड़ी का काम करती है
- औद्योगिक मनोविज्ञान जहाँ एक ओर निरीक्षक तथा उसके अधीनस्थ कर्मचारियों के सम्बन्धों के विषय में अध्ययन करता है वहीं दूसरी ओर श्रम एवं प्रबन्ध का भी समुचित ज्ञान कराता है
- इसके अन्तर्गत उद्योग में ‘उपयुक्त कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जाता है
- यह मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों को उद्योगों में लागू करता है जिससे उद्योगों से सम्बन्धित सभी व्यक्तियों का हित एवं कल्याण होता है तथा
- औद्योगिक मनोविज्ञान, औद्योगिक क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान तथा उपलब्धियों से सम्बन्ध रखता है।
प्रश्न 2.
औद्योगिक क्षेत्र में उपयुक्त कर्मचारियों के चयन का क्या महत्त्व है?
उत्तर :
उत्पादन में वांछित वृद्धि के अतिरिक्त कर्मचारियों के मानसिक सुख के लिए उपयुक्त कार्य हेतु उपयुक्त व्यक्तियों का चयन आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इस चयन का महत्त्व निम्न प्रकार प्रतिपादित है –
(1) कर्मचारी का सुख एवं सन्तोष – जब कोई कर्मचारी अपनी रुचि, अभिरुचि, योग्यताओं एवं क्षमताओं के अनुकूल कार्य या व्यवसाय प्राप्त करता है तो उसे वह अत्यन्त दक्षता और कुशलतापूर्वक सम्पन्न करता है। यह दक्षता और कुशलता उसे पदोन्नति की ओर अग्रसर करती है। उच्च पद पर आसीन होकर कर्मचारी और अधिक सुख व सन्तोष प्राप्त करता है।
(2) उत्पादन-वृद्धि – योग्यताओं एवं रुचि के अनुसार कार्य पाने पर कर्मचारी खूब मन लगाकर उसमें जुट जाता है, जिससे उत्पादन में गुणात्मक एवं मात्रात्मक अभिवृद्धि होती है। अतः उपयुक्त कर्मचारी का चयन उत्पादन वृद्धि के विचार से सम्बद्ध है।
(3) समय एवं धन की बचत – उपयुक्त कर्मचारियों के चयन से समय एवं धन की बचत होती है। हम जानते हैं कि अनुपयुक्त कार्य या व्यवसाय को व्यक्ति कुछ दिन करके छोड़ देता है। वह नये सिरे से पुनः नया कार्य पकड़ता है जिसके लिए चयन एवं प्रशिक्षण की प्रक्रिया दोहरायी जाती है। इससे समय और धन की हानि होती है।
(4) दुर्घटनाओं का अभाव – मनवांछित तथा उपयुक्त कार्य पाकर कर्मचारी पूरे मन और ध्यान से कार्य करता है। ध्यान उचटने से मशीनों के साथ दुर्घटनाएँ घटती हैं, किन्तु ध्यानपूर्वक कार्य करने से दुर्घटनाओं के होने की बहुत कम सम्भावना रहती है। इससे उद्योग में टूट-फूट भी कम होती है।
(5) परिस्थितियों से उचित समायोजन – उपयुक्त व्यवसाय मिलने पर कर्मचारी का व्यवसाय से उचित एवं स्वस्थ समायोजन स्थापित हो जाती हैं। वह चुने गये कार्य एवं परिस्थितियों के साथ आसानी से तालमेल बना लेता है।
(6) स्थायित्व – मनोनुकूल व्यवसाय या कार्य मिलने पर कर्मचारी अपने कार्य को छोड़कर अन्य स्थान पर नहीं जाते, वरन् वे उसी उद्योग में स्थिर रहना चाहते हैं और उनकी गतिशीलता कम हो जाती है।
(7) औद्योगिक शान्ति – व्यवसाय से सन्तुष्ट, सुखी एवं समायोजित कर्मचारी मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है। वह तनावों से मुक्त रहता है और प्रतिकूल परिस्थितियों से भी मधुर सामंजस्य बनाने में सफल रहता है। इन दशाओं में औद्योगिक शान्ति कायम रहती है, उत्पादन कार्य प्रगति पर रहता है और किसी प्रकार का कोई अवरोध उत्पन्न नहीं होता।
प्रश्न 3.
पदोन्नति के लिए योग्यता की जाँच की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक क्षेत्र में व्यक्ति की पदोन्नति के लिए आवश्यक योग्यता का होना अनिवार्य माना जाता है। व्यक्ति की इस आवश्यक योग्यता के मूल्यांकन या जाँच के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है –
(1) प्रतियोगी परीक्षाएँ – वर्तमान समय में पदोन्नति के लिए कर्मचारी की योग्यता आँकने की यह पहली वस्तुनिष्ठ विधि हो सकती है। कर्मचारी तीन प्रकार परीक्षाओं में अपनी योग्यता प्रदर्शित कर सकते हैं –
(i) खुली प्रतियोगिता परीक्षा – इसके अन्तर्गत सभी कर्मचारियों को परीक्षा में बैठकर पदोन्नति का समान अवसर प्रदान करते हुए उच्च पदों के लिए व्यापक क्षेत्र की व्यवस्था की जाती है। यह आवश्यक नहीं है कि इसमें भाग लेने वाले परीक्षार्थी पहले से ही सेवा में हों।
(ii) सीमित प्रतियोगिता परीक्षा – इसके अन्तर्गत परीक्षा में बैठने का अवसर सिर्फ पहले से ही निम्न पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों को प्रदान किया जाता है। इसे बन्द व्यवस्था भी कहते हैं।
(iii) उत्तीर्णता परीक्षा – न्यूनतम योग्यता सिद्ध करने वाले परीक्षार्थियों को केवल उत्तीर्ण भर होना होता है। उत्तीर्ण व्यक्तियों की एक सूची तैयार कर ली जाती है तथा पद रिक्त होने पर सूची के आधार पर उन्हें पदोन्नत कर दिया जाता है।
(2) सेवा अभिलेख – कर्मचारी की योग्यता मापन के लिए उसकी सेवा का एक अभिलेख (Record) तैयार किया जाता है, जिसमें उसके कार्य सम्पादन का पूरा विवरण होता है। इसे ‘कार्यकुशलता माप’ भी कहते हैं। अनेक व्यवसायों में सेवा अभिलेख के आधार पर पदोन्नति का प्रावधान होता है।
(3) नियुक्ति करने वाले अधिकारी या विशिष्ट पदोन्नति मण्डल का वैयक्तिक निर्णय – कर्मचारी जिस विभाग में कार्यरत हैं, उस विभाग के अध्यक्ष द्वारा कर्मचारियों की कार्यकुशलता का मूल्यांकन किया जाता है, क्योंकि कर्मचारी विभागाध्यक्ष के अधीन लम्बी अवधि तक काम कर चुके होते हैं; अत: वह उनकी अच्छाइयों-बुराइयों को बेहतर पहचान सकता है। विभागाध्यक्ष के व्यक्तिगत निर्णय में पक्षपात का दोष आ सकता है। इस दोष के निवारण हेतु विभागीय पदोन्नति मण्डल’ स्थापित किये जाते हैं। ये मण्डल सभी कर्मचारियों के काम की समीक्षा करते हैं तथा सेवा-अभिलेखों के आधार पर उनकी पदोन्नति के विषय में अपनी संस्तुति प्रस्तुत करते हैं।
प्रश्न 4.
टिप्पणी लिखिए-हड़ताल का स्वरूप।
उत्तर :
हड़ताल का स्वरूप श्रमिकों की माँग के विषय तथा उद्योगपतियों की मनोवृत्ति द्वारा निर्धारित होता है। हड़ताल के विभिन्न स्वरूप हैं; यह शान्त प्रकृति की भी हो सकती है और उग्र प्रवृत्ति की भी। कभी-कभी हड़ताल में कर्मचारी चुपचाप एक ओर खड़े होकर इकट्ठा होते रहते हैं तथा अपनी माँगों के समर्थन में प्रबन्धकों एवं सेवायोजक का शान्तिपूर्वक विरोध करते हैं। ‘कलम-बन्दी’ (Pen-Strike) भी हड़ताल का एक रूप है जिसके अन्तर्गत कर्मचारी काम पर तो जाते हैं, उपस्थिति भी भरते हैं किन्तु काम बिल्कुल नहीं करते। प्रायः लोग अपनी माँगों और समस्याओं को लेकर चिल्लाते हैं, जोर-जोर से नारे लगाते हैं या अपनी माँगों को गीतों के रूप में उच्चारित करते हैं। कहीं-कहीं कर्मचारियों को भूख-हड़ताल के माध्यम से स्वयं को यन्त्रणा देते हुए देखा जाता है, इससे उनके पक्ष में जनसमर्थन जुटता है। कभी-कभी तो भूख-हड़ताल का सुखद परिणाम निकलता है क्योंकि उद्योगपति उनकी न्यूनाधिक माँगों को स्वीकार कर उन्हें जल्दी ही हड़ताल खत्म करने के लिए राजी कर लेते हैं।
किन्तु कभी-कभी भूख-हड़ताल लम्बी खिंच जाने से श्रमिक नेता की मृत्यु तक हो जाती है, ऐसा होने पर हड़ताल अधिक उग्र रूप धारण कर लेती है तथा हिंसात्मक हो जाती है। इन दशाओं में, आन्दोलनकारी श्रमिकों में अराजक तत्त्व मिल जाते हैं जो तोड़-फोड़, आगजनी तथा लूटमार कर उद्योग की करोड़ों की सम्पत्ति को हानि पहुँचाते हैं। धीरे-धीरे हड़ताल अनियन्त्रित होती जाती है और उसका नेतृत्व अकुशल वे अवसरवादी नेताओं के हाथ में पहुँच जाता है। इसके विपरीत, सुलझे हुए तथा कुशल नेता हड़ताल को तब तक शान्तिपूर्वक चलाते हैं जब तक कि श्रमिकों की माँगे नहीं मान ली जातीं। हड़ताल की प्रक्रिया को तीव्र एवं प्रभावी बनाने के लिए सरकार, राजनीतिक दलों तथा समाजसेवी संगठनों की ओर से उद्योगपतियों से श्रमिकों की माँगें स्वीकार कर हड़ताल समाप्त करवाने की अपील की जाती है।
प्रश्न 5.
टिप्पणी लिखिए-औद्योगिक संघर्ष।
उत्तर :
औद्योगिकसंघर्ष’ वर्तमान युग में औद्योगिक जगत् की प्रमुख समस्या है। उद्योग की दुनिया में दो वर्ग हैं-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग। यदा-कदा उत्पादन सम्बन्धी तकनीकी या मानव-व्यवहार से सम्बन्धित किन्हीं समस्याओं को लेकर उद्योगपति (मिल मालिक)तथा श्रमिकों (मजदूरों) के बीच संघर्ष की स्थिति आ जाती है। उद्योगपतियों की मनोवृत्ति अपने मजदूरों तथा कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन प्रदान कर अधिकाधिक लाभ अर्जित करने की होती है। इसके विपरीत मजदूरों तथा कर्मचारियों का प्रयास रहता है कि वे अपने कठोर श्रम के बदले जीवन निर्वाह हेतु पर्याप्त वेतन तथा सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—-कार्य के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना तथा बीमारी के लिए। उचित चिकित्सा की व्यवस्था और भत्ता आदि मिल मालिकों से प्राप्त करें। जब उद्योगों तथा व्यावसायिक संस्थानों में मजदूरों के हितों की अनदेखी होती है और कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता तो उद्योगपति एवं श्रमिक वर्ग आमने-सामने आ जाते हैं, जिसके परिणामतः तनाव और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। यह तनाव अक्सर हड़ताल व तालाबन्दी के रूप में प्रकट होता है तथा औद्योगिक क्षेत्र को भीषण समस्याओं व अशान्ति से भर देता है।
इस भाँति, औद्योगिक क्षेत्र से सम्बन्धित श्रमिक एवं उद्योगपति जब अपने-अपने हितों की पूर्ति हेतु संघर्ष के लिए तत्पर होते हैं तो यह स्थिति औद्योगिक संघर्ष कहलाती है। आजकल श्रमिकों में एकता व सहयोग की भावना जाग्रत होने के फलस्वरूप शक्तिशाली श्रमिक-संघ बन गये हैं। श्रमिक-संर्यों का नेतृत्व उद्योगपतियों से अपने अधिकारों व सुविधाओं की माँग करता है। जब उद्योग में मजदूरों की न्यायोचित माँगों की उपेक्षा हो और उन पर काम का दबाव अधिक हो तो समस्त या अधिकांश मजदूर विरोध प्रकट करते हुए काम पर जाना छोड़ देते हैं। वे मिल-मालिकों की नीतियों के विरोध में तथा अपनी माँगों के समर्थन में प्रदर्शन, नारेबाजी, जूलूस, भूख-हड़ताल व आमरण अनशन का सहारा लेते हैं। मजदूर वर्ग की ये सभी गतिविधियाँ ‘हड़ताल के अन्तर्गत आती हैं।
कभी-कभी मिल-मालिक मजदूरों की माँग पूरी नहीं कर पाते (अथवा पूरी करना नहीं चाहते) तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे मिल बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। यह तालाबन्दी है। तालाबन्दी की दशा में मजदूरों या कर्मचारीगणों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है, जिसका वे विरोध करते हैं। हड़ताल और तालाबन्दी औद्योगिक संघर्ष के परिचायक हैं।
प्रश्न 6.
मानवीय सम्बन्धों पर औद्यौगीकरण के कारण पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए
या
भारतीय समाज पर औद्योगीकरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक गतिविधियों की गति एवं दर के बढ़ने की प्रक्रिया को औद्योगीकरण कहा जाता है। प्रत्यक्ष रूप से औद्योगीकरण एक आर्थिक-व्यावसायिक प्रक्रिया है, परन्तु इसके विभिन्न प्रभाव मानवीय/सामाजिक सम्बन्धों पर भी पड़ते हैं। औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप मानवीय सम्बन्धों एवं समाज पर पड़ने वाले मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं –
- मानवीय सम्बन्ध औपचारिक हो जाते हैं।
- आपसी सम्बन्ध वर्ग-भेद के आधार पर निर्धारित होते हैं।
- उच्च वर्ग के लिए निम्न आर्थिक वर्ग के लोगों से एक प्रकार की सामाजिक दूरी बनाये रखते
- समाज में वर्ग-संघर्षों में वृद्धि होती है तथा मानवीय सम्बन्ध तनावपूर्ण हो जाते हैं।
- पारिवारिक एवं वैवाहिक सम्बन्ध भी परिवर्तित होते हैं। संयुक्त परिवार विघटित होते हैं तथा वैवाहिक सम्बन्धों में स्थायित्व घटता है।
- औद्योगीकरण के प्रभाव से समाज में गतिशीलता में वृद्धि होती है।
- औद्योगीकरण ने सामाजिक स्तरीकरण के नये प्रतिमान निर्धारित किये हैं।
- सामाजिक नियन्त्रण के लिए औपचारिक अभिकरणों को प्राथमिकता दी जाने लगती है।
- धार्मिक एवं शैक्षिक क्षेत्र में परिवर्तन होता है।
- भारतीय समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था के नियमों में शिथिलता आयी है।
प्रश्न 7.
औद्योगिक क्षेत्र में विज्ञापन के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
विज्ञापन तथा उद्योग के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आज के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक युग में विज्ञापन का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। विश्व की विकसित एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ व्यापक स्तर पर विज्ञापन सम्बन्धी प्रविधियाँ तथा तकनीकों को अपनाती हैं। आर्थिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में प्रतियोगिता का बोलबाला है। बाजार में अनेकानेक फर्मे हैं और उनके ढेरों उत्पादन हैं। किसी एक वस्तु की खरीदारी के समय क्रेता बाजार में उस वस्तु के अनेक फर्मों द्वारा निर्मित स्वरूप देखता है। उदाहरण के लिए–साबुन खरीदते समय वह एक ही दुकान पर ढेर सारे साबुन; जैसे–लक्स, हमाम, रेक्सोना, लाइफबॉय, लिरिल, सिन्थॉल, मोती, मारवेल, गोदरेज, सरल तथा निरमा आदि-आदि देखता है।
क्रेता के सामने इनमें से एक साबुन को चुनने की समस्या है और साथ-ही-साथ उसे अपनी जेब का ख्याल भी रखना है। यहाँ विज्ञापन उसे बताता है कि कम दामों में वह कैसे अपनी रुचि का अच्छे-से-अच्छा साबुन खरीद सकता है। इसका दूसरा पक्ष भी है – मान लीजिए, किसी नयी फर्म ने एक नहाने का साबुन बनाया जो गुणवत्ता में इन सबसे आगे है और दाम भी कम हैं; लेकिन खरीदार को यह कैसे पता चले कि इस नाम से एक साबुन उपलब्ध है; फिर उसकी विशेषताओं को भी बताना होगा, अन्य साबुनों की तुलना में उसका वजन और दाम भी खोलना होगा, यह भी बताना होगा कि खरीदार कम-से-कम दाम में बढ़िया-से-बढ़िया चीज खरीदकर ले जा रहा है; यही नहीं, उसे इसका विश्वास कैसे दिलाया जाए और उसकी रुचि के अनुसार उसमें उस साबुन के क्रय की इच्छा कैसे पैदा की जाए? ये सभी बातें विज्ञापन के अन्तर्गत आती हैं और विज्ञापन के माध्यम से सुगम बनायी जाती हैं।
विज्ञापनों के माध्यम से उत्पादक, उत्पादित वस्तु तथा उपभोक्ताओं के मध्य एक अच्छा तालमेल स्थापित हो जाता है। उत्पादक घर बैठे ही उपभोक्ता से सम्पर्क साध लेता है और अपनी वस्तु उसके पास पहुँचा देता है। जो फर्म या व्यापारिक संस्था जितना अच्छे स्तर का विज्ञापन जुटा पाती है, उसकी बिक्री उतनी ही बढ़ जाती है। यही कारण है कि आज के समय में विज्ञापन एक कला, एक विज्ञान, एक उद्योग के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। सभी बड़े-बड़े उद्योग अपने वार्षिक बजट का एक अच्छा प्रतिशत विज्ञापन पर खर्च करते हैं।
बहुत-सी संस्थाएँ विज्ञापन पर करोड़ों तथा अरबों रुपया खर्च करती हैं और उनके माध्यम से उससे ज्यादा कमाती भी हैं। इसके लिए बड़े-बड़े साइनबोर्ड, इलेक्ट्रॉनिक्स के माध्यम से जगमगाते एवं गति करते बोर्ड, भाँति-भाँति के पोस्टर, पैम्फलेट, रेडियो, टी०वी०, सिनेमा तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन देकर प्रचार किया जाता है। आजकल हर एक वस्तु विज्ञापित हो सकती है, इसमें दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, साहित्य, कला, राजनीतिक नेता, अभिनेता, वर-वधू के विज्ञापन, संस्थाओं तथा प्रतिष्ठानों के विज्ञापन तथा विज्ञापन-फर्मों के भी विज्ञापन सम्मिलित किये जाते हैं। निस्सन्देह विज्ञापन मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर छा चुका है और उद्योगों व व्यापारिक संस्थानों के लिए तो यह एक वरदान सिद्ध हो चुका है। यही कारण है कि प्रगतिशील देशों में विज्ञापन के क्षेत्र में हर रोज एक-न-एक नयी खोज की जाती है जो प्रचार की दुनिया में बढ़ता हुआ एक नया कदम होता है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान के क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक मनोविज्ञान का क्षेत्र उद्योग-धन्धों के अतिरिक्त व्यापार एवं व्यवसाय तक विस्तृत है, तथापि यह उनमें निहित मानवीय तत्त्वों का ही अध्ययन करता है। इसका विषय-क्षेत्र इस प्रकार है –
- कर्मचारियों का चयन, प्रशिक्षण एवं दक्षता सम्बन्धी नयी-नयी विधियों की खोज;
- उपयुक्त कार्यों के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का चयन तथा व्यवसाय परामर्श;
- कर्मचारियों के पदोन्नति के अवसर;
- कार्य की दशाएँ;
- उत्पादन व उत्पादन से सम्बन्धित मानवीय समस्याएँ;
- विज्ञापन एवं विक्रय;
- कर्मचारियों को मनोबल तथा प्रेरणा बनाये रखना;
- श्रम कल्याण;
- औद्योगिक असन्तोष, तनाव व संघर्ष के निराकरण के उपायों की खोज तथा
- हड़ताल व तालाबन्दी की समस्याएँ।
प्रश्न 2.
व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण की उपयोगिता या महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण की उपयोगिता या महत्त्व के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –
- व्यवसाय-विलेषणे से व्यवसायों का वर्गीकरण आसानी से किया जा सकता है;
- इसके माध्यम से कर्मचारियों के कार्य-सम्बन्धी कर्तव्यों का निर्धारण हो जाता है;
- कर्मचारियों के उत्तरदायित्व को निश्चित किया जा सकता है;
- पूर्ण व्यवसाय-विश्लेषण से कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है;
- व्यवसाय के लिए आवश्यक क्षमताएँ तथा योग्यताएँ सुनिश्चित होती हैं;
- नयी भर्ती द्वारा आये कर्मचारियों के प्रशिक्षण की अवधि और उसके स्वरूप को निश्चित किया जा सकता है;
- इसके कर्मचारियों में आपसी सद्भावना उत्पन्न होने में मदद मिलती है;
- कर्मचारियों के कार्य के अनुसार उनके वेतन का निर्धारण हो सकता है;
- आवश्यक कच्चे माल के विषय में जानकारी मिलती है;
- कार्य में आने वाले तथा उपयोगी, यन्त्रों, उपकरणों, मशीनों व औजारों के बारे में विस्तृत सूचना मिलती है;
- कार्य में लगने वाले समय का अनुमान हो जाता है तथा
- कार्य के लाभकारी एवं हानिकारक, शारीरिक और मानसिक पहलुओं का सम्यक् बोध हो जाता है।
प्रश्न 3.
व्यावसायिक निर्देशन और व्यावसायिक चयन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
किसी व्यक्ति को व्यवसाय के चुनाव के लिए आवश्यक जानकारी एवं सहायता प्रदान करना व्यावसायिक निर्देशन है। वास्तव में व्यावसायिक निर्देशने व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने का प्रयास है जिसके द्वारा स्वयं अपने लिए उचित व्यवसाय का चुनाव, उसके लिए तैयारी तथा उसमें प्रवेश करके उन्नति कर सके। इससे भिन्न व्यावसायिक चयन का अर्थ है-किसी कार्य के लिए उपयुक्त कर्मचारी का चुनाव करना। इसके लिए कार्य की प्रकृति तथा सम्बन्धित व्यक्ति की योग्यता एवं क्षमता को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। व्यावसायिक निर्देशन का कार्य निर्देशन द्वारा प्रदान किया जाता है, जबकि व्यावसायिक चयन का कार्य सम्बन्धित कार्यालय या संस्थान के प्रबन्धकों या अधिकारियों द्वारा किया जाता है।
प्रश्न 4.
पदोन्नति के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
पदोन्नति कर्मचारियों में अनवरत प्रेरणा का स्रोत है जो उन्हें हमेशा कार्यकुशल बनाये रखती है। यह कुशल सेवा के लिए पुरस्कार की गारण्टी देती है। पदोन्नति की आशा लेकर कर्मचारी अपने कार्य को रुचिपूर्वक करते हैं। नियोक्ता (मालिक) अपने कर्मचारियों की योग्यता और कार्य अनुभव का पूरा लाभ उठा पाते हैं, क्योंकि पदोन्नत होने वाले कर्मचारीगण पहले से ही सेवा में लगे हुए थे। अतः उन्हें उत्पादन की सभी प्रक्रियाओं तथा कार्य प्रणालियों का पूरा ज्ञान रहता है। इस प्रकार से नियोक्ता की दृष्टि से भी पदोन्नति का विचार महत्त्वपूर्ण है। पदोन्नति की कामना कर्मचारियों को अनुशासित एवं सन्तुष्ट बनाये रखती है जिससे औद्योगिक या व्यापारिक संगठन में सम्भावित विरोधाभास शान्त रहते हैं। पदोन्नति के सुनिश्चित एवं स्पष्ट नियम कर्मचारियों में आत्म-विश्वास तथा सुरक्षा का विचार उत्पन्न करते हैं। निष्कर्षत: पदोन्नति की नीति प्रत्येक व्यवसाय में नियोक्ता तथा कर्मचारी दोनों के लिए लाभप्रद एवं महत्त्वपूर्ण है।
प्रश्न 5.
हड़ताल एवं तालाबन्दी में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
हड़ताल एवं तालाबन्दी दोनों ही औद्योगिक क्षेत्र की मुख्य समस्याएँ हैं। हड़ताल एवं तालाबन्दी दोनों ही दशाओं में कार्य ठप हो जाता है। हड़ताल श्रमिकों एवं कर्मचारियों द्वारा उचित-अनुचित माँगों को मनवाने के लिए की जाती है। यह प्रायः आन्दोलन के रूप में होती है तथा इसके हिंसक रूप धारण करने की भी आशंका रहती है। इससे भिन्न तालाबन्दी मालिकों एवं प्रबन्धकों द्वारा घोषित की जाती है। इस दशा में श्रमिकों को कार्य से वंचित कर दिया जाता है तथा मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया जाता है। यह कार्य प्रायः मजबूरी में या अपनी सत्ता को दर्शाने के लिए किया जाता है। श्रमिक तालाबन्दी का विरोध करते हैं।
प्रश्न 6.
तालाबन्दी के क्या परिणाम होते हैं?
उत्तर :
तालाबन्दी में उद्योगपति उद्योग को बन्द रखता है जिससे श्रमिक व कर्मचारी काम पर नहीं जा पाते हैं। इससे श्रमिकों को वेतन नहीं मिल पाता और वे बेरोजगार हो जाते हैं। उनके पास अपना कोई संचित धन तो होता है नहीं, वे तो शाम तक श्रम करते हैं और प्राप्त पारिश्रमिक से दो जून की रोटी खाते हैं; अतः उनकी दशा खराब होती जाती है और वे भूखों मरने लगते हैं। इसके विरोध-स्वरूप वे प्रदर्शन, जुलूस तथा अनशन आदि का सहारा लेते हैं। कभी-कभी यह विरोध उग रूप धारण कर तोड़फोड़, आगजनी तथा हिंसात्मक घटनाओं में बदल जाता है। इसमें प्रशासन, पुलिस तथा राजनेताओं को भी हस्तक्षेप करमा पड़ता है। इसके अलावा तालाबन्दी के परिणामस्वरूप उत्पादित वस्तुओं की बाजार में कमी हो जाती है जिससे मुनाफाखोरी व जमाखोरी जैसी आर्थिक दुष्प्रवृत्तियों का जन्म होता है। इससे सम्बन्धित अन्य उद्योग, कारखाने या व्यावसायिक संस्थान भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। जिससे अन्ततः राष्ट्र की आर्थिक हानि होती है।
प्रश्न 7.
उद्योग में विज्ञापन के किन्हीं दो कार्यों के बारे में लिखिए।
उत्तर :
(i) उद्योग में विज्ञापन के माध्यम से सम्बन्धित उत्पादनों को बहुपक्षीय जानकारी जनसामान्य तक पहुँचायी जाती है। सम्बन्धित उत्पाद के गुणों, उपयोगों तथा लाभों एवं सुविधाओं आदि की समुचित जानकारी उपलब्ध करायी जाती है।
(ii) विज्ञापन द्वारा किया जाने वाला दूसरा मुख्य कार्य सम्बन्धित उपभोक्ता वर्ग को अपने उत्पादनों को खरीदने या अपनाने के लिए प्रेरित करना होता है। विज्ञापन का यह कार्य अधिक
विश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
निश्चित उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –
- औद्योगिक-व्यावसायिक परिस्थितियों में होने वाले मानवीय-व्यवहार का अध्ययन करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को ……………………. कहते हैं।
- औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के ……………………. पक्ष से सम्बन्धित है।
- आधुनिक युग में औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप औद्योगिक मनोविज्ञान की उपयोगिता ……………………. है।
- कर्मचारी चयन की प्रक्रिया में कार्य-विश्लेषण के साथ-साथ ……………………. भी आवश्यक होता है।
- उद्योग में अनुपयुक्त कार्य-दशाओं के कारण कर्मचारी की ……………………. घट जाती है।
- कार्य की दशाओं में भौतिक दशाओं के अतिरिक्त ……………………. को भी ध्यान में रखा जाता है।
- औद्योगिक स्थल की स्वच्छता, प्रकाश की व्यवस्था, वायु तथा कार्य के घण्टे कार्य की मुख्य ……………………. दशाएँ हैं।
- नौकरी की सुरक्षा, अधिकारियों का व्यवहार तथा पदोन्नति के अवसर कार्य की मुख्य ……………………. दशाएँ हैं।
- तापमान में वृद्धि के कारण कर्मचारी का ……………………. घट जाता है।
- कार्य की भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक दशाओं के अनुकूल होने की स्थिति में उत्पादन की दर एवं गुणवत्ता ……………………. है।
- कार्य के दौरान अल्पकालिक विश्राम से व्यक्ति की कार्य-क्षमता ……………………. है।
- कार्यस्थल पर अधिक शोर या ध्वनि प्रदूषण का श्रमिकों के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
- कार्य के घण्टे बढ़ा देने पर उत्पादन की दर ……………………. है।
- पदोन्नति कर्मचारियों के लिए ……………………. स्रोत है जो उन्हें निरन्तर कार्य-कुशल बनाये रखती है।
- औद्योगिक मालिकों द्वारा श्रमिकों एवं कर्मचारियों तथा उनके परिवारों को दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाओं को ……………………. कहते है।
- औद्योगिक प्रगति के लिए उद्योगपति और कर्मचारियों के बीच अच्छे ……………………. का होना आवश्यक होता है।
- श्रमिकों के बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन की व्यवस्था करना ……………………. कहलाता है।
- हड़ताल एवं ……………………. का उद्योग की उन्नति पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
- श्रमिकों द्वारा विद्रोह स्वरूप कार्य करना बन्द कर देना ……………………. कहलाता है।
- उद्योगपतियों द्वारा उत्पादन कार्य रोक देना तथा श्रमिकों को कार्य से रोक देना ……………………. कहलाता है।
- तीव्र औद्योगिक तनाव के चलते उद्योगों में ……………………. और ……………………. की घटनाएँ होती हैं।
- उद्योग में उत्पाद का प्रचार ……………………. कहलाता है।
- किसी उत्पाद की उपस्थिति एवं विशेषताओं का प्रचार ……………………. कहलाता है।
- प्रलोभन विज्ञापन की प्रभावकता को ……………………. है।
- प्रेरणा और आवश्यकताएँ औद्योगिक विज्ञापन के ……………………. आधार हैं।
- बड़े आकार का उद्दीपक उपभोक्ता के ध्यान को ……………………. करता है।
- वर्तमान समय में औद्योगिक एवं व्यावसायिक सफलता के लिए विज्ञापन ……………………. है।
- किसी उद्योग की सफलता के लिए प्रबन्ध-तन्त्र, संसाधन एवं ……………………. में आपसी समन्वय होना आवश्यक है।
उत्तर :
- औद्योगिक मनोविज्ञान
- व्यावहारिक
- बढ़ गयी
- कर्मचारी-विश्लेषण
- कार्य-क्षमता
- मनोवैज्ञानिक दशाओं
- भौतिक दशाएँ
- मनोवैज्ञानिक
- कार्य के प्रति उत्साह
- बढ़ जाती
- बढ़ जाती
- प्रतिकूल
- घट जाती
- प्रेरणा का
- श्रम-कल्याण कार्य
- सम्बन्धों
- श्रम कल्याण कार्य
- तालाबन्दी, प्रतिकूल
- तालाबन्दी
- तालाबन्दी
- हड़ताल, तालाबन्दी,
- विज्ञापन
- विज्ञापन
- बढ़ाता
- मनोवैज्ञानिक
- आकर्षित
- अनिवार्य
- श्रमिक वर्ग
प्रश्न II
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –
प्रश्न 1.
औद्योगिक मनोविज्ञान से क्या आशय है?
उत्तर :
औद्योगिक परिस्थितियों में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान कहलाता है।
प्रश्न 2.
औद्योगिक मनोविज्ञान की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
ब्लम के अनुसार, “मानवीय औद्योगिक समस्याओं से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक तथ्यों और सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान है।”
प्रश्न 3.
औद्योगिक मनोविज्ञान की दो मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की व्यावहारिक शाखा है।
(ii) यह औद्योगिक जगत से सम्बन्धित मनुष्य के व्यवहार का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन है।
प्रश्न 4.
औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान की भूमिका अथवा महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
- कर्मचारियों के चुनाव में सहायक
- औद्योगिक झगड़ों तथा तनाव को समाप्त करने में सहायक
- कार्य की दशाओं के सुधार में सहायक तथा
- औद्योगिक क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन।
प्रश्न 5.
कर्मचारी-विश्लेषण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
किसी श्रमिक अथर्वा कर्मचारी की व्यक्तिगत योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों को जानने की प्रक्रिया को कर्मचारी-विश्लेषण कहते हैं।
प्रश्न 6.
उपयुक्त कर्मचारी के चुनाव से होने वाले मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
- कर्मचारी सुखी एवं सन्तुष्ट रहते हैं
- उत्पादन वृद्धि
- समय एवं धन की बचत
- दुर्घटनाओं की आशंका घटती है
- स्थायित्व रहता है तथा
- औद्योगिक शान्ति बनी रहती है।
प्रश्न 7.
कर्मचारी-विश्लेषण के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
- आवेदन-पत्र
- संस्तुति-पत्र
- शैक्षिक आलेख
- समूह निरीक्षण विधि
- शारीरिक परीक्षण
- प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ
- मनोवैज्ञानिक परीक्षण तथा
- साक्षात्कार।
प्रश्न 8.
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाएँ हैं-स्वच्छता, ऊष्मा या ताप, प्रकाश व्यवस्था, वायु का प्रबन्ध, पानी, शौचालय आदि की सुविधा, कार्य के घण्टे तथा यन्त्रों से सुरक्षा।
प्रश्न 9.
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाएँ हैं-नौकरी की सुरक्षा, अधिकारियों का व्यवहार, कर्मचारियों के आपसी सम्बन्ध, आवश्यकताओं की पूर्ति, उचित प्रलोभन तथा पदोन्नति के अवसर।
प्रश्न 10.
‘पदोन्नति की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
विलियम जी० टोरपी के अनुसार, “पदोन्नति पदाधिकारी के एक पद से ऐसे दूसरे पद पर पहुँचने की ओर संकेत करती है जो उच्चतर श्रेणी या उच्चतर न्यूनतम वेतन वाला होता । है। पदोन्नति का अभिप्राय है-कर्मचारी के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों में वृद्धि कर देना।”
प्रश्न 11.
पदोन्नति के मुख्य आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख कीजिए। .
उत्तर :
- उच्चतर पद पर स्थानान्तरण
- उत्तरदायित्व की अधिकता तथा
- वेतन में वृद्धि।
प्रश्न 12.
पदोन्नति के मुख्य आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
- ज्येष्ठता या वरिष्ठता
- योग्यता
- कार्य में ‘दक्षता या निपुणता तथा
- सिफारिश या कृपा।
प्रश्न 13.
उद्योग में मानवीय सम्बन्धों से क्या आशय है?
उत्तर :
श्रमिकों अथवा कर्मचारियों के साथ सद्व्यवहार करते हुए उनकी शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आवश्यकताओं को पूरा करने की दृष्टि से विभिन्न कल्याणकारी कार्यों को लेकर श्रमिकों तथा उद्योगपतियों के मध्य प्रेम तथा श्रद्धा का सम्बन्ध स्थापित होना ही उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहलाता है।
प्रश्न 14.
उद्योग में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने से क्या लाभ होते हैं?
उत्तर :
उद्योग में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित होने से कार्य उत्तम होते हैं, उत्पादन की दर में वृद्धि होती है तथा औद्योगिक शान्ति में वृद्धि होती है। इससे कर्मचारियों, उद्योगपतियों तथा राज्य सभी का हित होता है।
प्रश्न 15.
श्रम-कल्याण-कार्यों से क्या आशय है?
उत्तर :
श्रम-कल्याण से अभिप्राय कर्मचारियों या श्रमिकों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए उद्योग के भीतर और बाहर उद्योगपतियों, शासन तथा श्रम-संगठनों द्वारा किये जाने वाले समस्त प्रयासों अथवा कार्यों से है।
प्रश्न 16.
उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित मुख्य श्रम-कल्याण कार्य कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
- वैज्ञानिक भर्ती
- औद्योगिक प्रशिक्षण
- दुर्घटनाओं से रोकथाम
- स्वच्छता, प्रकाश और वायु का प्रबन्ध तथा
- अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
प्रश्न 17.
श्रमिकों के आर्थिक लाभ सम्बन्धी श्रम-कल्याण कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
- ओवरटाइम की सुविधा
- नियमों की सुरक्षा
- प्रॉविडेण्ट फण्ड, बीमा और पेन्शन की सुविधा तथा
- यात्रा-भत्ता।
प्रश्न 18.
विज्ञापन की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
आर० डब्ल्यू० हसबैण्ड के अनुसार, “विज्ञापन को प्रचार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कुछ वस्तुओं अथवा सेवाओं के अस्तित्व व गुणों की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
प्रश्न 19.
विज्ञापन के मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
- ध्यान आकृष्ट करना
- रुचि उत्पन्न करना
- विश्वास पैदा करना
- स्मृति पर प्रभाव डालना तथा
- क्रय के लिए प्रेरणा।
बहुविकल्पीय प्रश्न
निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –
प्रश्न 1.
औद्योगिक परिस्थितियों में मानवीय व्यवहार का अध्ययन करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को कहते हैं –
(क) व्यावहारिक मनोविज्ञान
(ख) सामान्य मनोविज्ञान
(ग) औद्योगिक मनोविज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं।
प्रश्न 2.
व्यावहारिक मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में औद्योगिक मनोविज्ञान का महत्त्व है –
(क) इसके अध्ययन से औद्योगिक समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है।
(ख) कर्मचारियों के उचित चुनाव में सहायता मिलती है।
(ग) औद्योगिक क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन देता है।
(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व
प्रश्न 3.
औद्योगिक मनोविज्ञान सहायक होता है –
(क) उपर्युक्त यन्त्र एवं मशीनें खरीदने में
(ख) आर्थिक नियोजन में
(ग) अधिक लाभ कमाने में
(घ) कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव में
प्रश्न 4.
वर्तमान परिस्थितियों में कर्मचारी-विश्लेषण की सरल एवं उत्तम विधि है –
(क) आवदेन-पत्र विधि
(ख) शैक्षिक प्रमाण-पत्र विधि
(ग) शारीरिक परीक्षण विधि
(घ) सिफारिश का
प्रश्न 5.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर कर्मचारियों के चुनाव से लाभ हैं
(क) औद्योगिक प्रबन्धकों की शान बढ़ती है।
(ख) नियुक्त किये गये कर्मचारियों को अधिक वेतन देना पड़ता है
(ग) नियुक्त किये गये कर्मचारी अधिक लगन, रुचि एवं परिश्रम से कार्य करते हैं।
(घ) कर्मचारी निकम्मे होते हैं तथा उत्पादन घटता है।
प्रश्न 6.
अधिक आयु वाले कर्मचारियों के कार्य-स्थल पर कैसा प्रकाश होना चाहिए?
(क) चकाचौंध युक्त प्रकाश
(ख) मन्द प्रकाश
(ग) तीव्र प्रकाश
(घ) चाहे जैसा प्रकाश
प्रश्न 7.
कार्यस्थल पर संगीत व्यवस्था का उत्पादन एवं कार्यक्षमता पर कैसा प्रभाव पड़ता है?
(क) प्रतिकूल प्रभाव
(ख) अनुकूल प्रभाव
(ग) अनावश्यक प्रतीत होती है।
(घ) बाधक प्रतीत होती है।
प्रश्न 8.
श्रमिकों तथा उनके परिवारों की दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाओं को कहा जाता है –
(क) श्रमिक संघ के कार्य
(ख) आवश्यक कार्य
(ग) श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्य
(घ) पारिवारिक सहायता
प्रश्न 9.
“पदोन्नति का अर्थ है एक पद से किसी उच्चतर श्रेणी के अन्य पद पर नियुक्ति, जिसमें कठिनतर प्रकृति एवं गहनतर उत्तरदायित्वों का कार्य करना पड़ता है। इस पद का नाम बदल जाता है और प्रायः वेतन में भी वृद्धि होती है।” यह कथन किसका है?
(क) ब्लम
(ख) टोरपी
(ग) एल० डी० ह्वाइट
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
प्रश्न 10.
पदोन्नति के स्वीकृत आधार हैं –
(क) ज्येष्ठता या वरिष्ठता
(ख) योग्यता
(ग) कार्य में दक्षता या निपुणता
(घ) ये सभी
प्रश्न 11.
यदि श्रमिक औद्योगिक कार्यों में सहयोग देना बन्द कर दें तो उसे कहा जाता है –
(क) नाराजगी
(ख) हड़ताल
(ग) तालाबन्दी
(घ) अवकाश पर जाना।
प्रश्न 12.
उद्योगपतियों एवं प्रबन्धकों द्वारा अपनी मर्जी से उत्पादन कार्य बन्द कर देना कहलाता है –
(क) हड़ताल
(ख) बँटनी
(ग) तालाबन्दी
(घ) गम्भीर समस्या
उत्तर :
- (ग) औद्योगिक मनोविज्ञान
- (घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व
- (घ) कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव में
- (क) आवेदन-पत्र विधि
- (ग) नियुक्त किये गये कर्मचारी अधिक लगन, रुचि एवं परिश्रम से कार्य करते हैं
- (ग) तीव्र प्रकाश
- (ख) अनुकूल प्रभाव
- (ग) अम-कल्याण सम्बन्धी कार्य
- (ग) एल० डी० ह्वाइट
- (घ) ये सभी
- (ख) हड़ताल
- (ग) तालाबन्दी।

