नाजीवादी दर्शन

नाजीवादी दर्शन

नाजीवादी दर्शन

(i) प्रजातीय स्तरीकरण
(ii) भौगोलिक-राजनीतिक दृष्टिकोण
(iii) सर्वाधिकारवाद का प्रसार एवं गणतंत्र की आलोचना
(iv) उग्र राष्ट्रवाद का समर्थक
(v) समाजवाद का विरोध
(vi) महान नेता का गुणगान
(vii) यहूदी-विरोधी नीति
(viii) सैन्यवाद को प्रोत्साहन
नाजी दर्शन हिटलर की विचारधाराओं पर केंद्रित था। विश्व और मानव समुदाय के प्रति उसका एक विशिष्ट दृष्टिकोण था। नाजी
दर्शन की विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-
(i) प्रजातीय स्तरीकरण-हिटलर का मानना था कि सभी प्रजातियाँ समान नहीं थीं। उसके अनुसार, नॉर्डिक जर्मन आर्य
प्रजातीय स्तरीकरण के शीर्ष पर तथा यहूदी सबसे निचले स्तर पर थे। वह यहूदियों को आर्यों का दुश्मन मानता था। अन्य सभी
प्रजातियाँ इन दोनों के बीच थीं। हिटलर का यह दर्शन चार्ल्स डार्विन और हर्बर्ट स्पेन्सर के विचारों से प्रभावित था। डार्विन ने
विकासवादी सिद्धांत तथा स्पेन्सर ने अतिजीविता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। हिटलर ने इसे आदर्श मानकर यह दावा
किया कि सबसे शक्तिशाली प्रजाति ही बच सकती है, कमजोर प्रजातियाँ नष्ट हो जाएँगी। उसका यह भी मानना था कि आर्य
प्रजाति सर्वश्रेष्ठ है। पूरे विश्व पर शासन करने के लिए इसे अपनी शुद्धता बनाए रखनी होगी तथा इसे मजबूत और शक्तिशाली बनना होगा।
(ii) भौगोलिक-राजनीतिक दृष्टिकोण-नाजीवाद का दूसरा दर्शन लेबेन्नाउम (Lebensraum), अर्थात रहने योग्य स्थान की
तलाश से संबद्ध था। हिटलर का मानना था कि अपने लोगों को बसाने के लिए नए क्षेत्रों पर अधिकार करना आवश्यक है। इससे स्वराष्ट्र की सीमा का विस्तार होगा। नए क्षेत्रों में निवास करनेवाले लोग अपनी मूलभूमि से संबंध बनाए रखेंगे। इसके
साथ-साथ नए क्षेत्रों के अधिग्रहण से जर्मन राष्ट्र के भौतिक साधनों एवं शक्ति में वृद्धि होगी। इस उद्देश्य से हिटलर ने पूरब
की ओर प्रसार करने की नीति अपनाई जिससे कि सभी जर्मनों को एक भौगोलिक क्षेत्र-पोलैंड में बसाया जा सके।
(iii) सर्वाधिकारवाद का प्रसार एवं गणतंत्र की आलोचना- नाजी दर्शन सर्वाधिकारवाद का समर्थक था। यह सारी शक्ति एक व्यक्ति अथवा राज्य में केंद्रित करना चाहता था। इसलिए, यह जनतंत्रात्मक व्यवस्था, उदारवाद एवं लोकतंत्र का विरोधी था। नाजी दर्शन में संसदीय संस्थाओं के लिए कोई स्थान नहीं था। नाजी सारी शक्ति एक महान और शक्तिशाली नेता के हाथों में सौंप देने की बात करते थे।
(iv) उग्र राष्ट्रवाद का समर्थक- नाजी उग्र राष्ट्रवाद में विश्वास करते थे। उनके लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि था। जर्मनीवासियों में
अंतर्निहित भावना को उभारकर हिटलर ने उग्र राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा दिया।
(v) समाजवाद का विरोध- नाजीवाद समाजवाद एवं साम्यवाद का कट्टर विरोधी था। इसके विपरीत इसने पूँजीवाद का समर्थन किया। इससे जर्मनी के पूँजीपति उसके साथ हो गए। इंगलैंड और फ्रांस ने भी अप्रत्यक्ष रूप से इस नीति का समर्थन किया।
(vi) महान नेता का गुणगान-नाजीवाद में महान नेता (हिटलर) का गुणगान करना एवं उसके आदर्शों का पालन करना
आवश्यक था। हिटलर की आलोचना प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से नहीं की जा सकती थी। ऐसा करनेवालों के लिए दंड
सुनिश्चित था। हिटलर के अभिवादन के लिए विशिष्ट पद्धति अपनाई गई।
(vii) यहूदी-विरोधी नीति-नाजीवाद की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशिष्टता यह थी कि यह यहूदियों के प्रति असीम घृणा का भाव रखता था। यह हिटलर के प्रजातीय स्तरीकरण के सिद्धांत का प्रतिफल था। यहूदियों को अवांछित तथा ईसा मसीह का हत्यारा और सूदखोर माना गया। उनपर अनेक पाबंदियाँ लगाई गईं। उन्हें घोर यातनाएँ एवं अपमान सहने पड़े। लाखों यहूदियों की हत्या करवा दी गई। यहूदियों के साथ-साथ जिप्सियों और काले लोगों को भी निम्न प्रजाति का मानकर उनपर अत्याचार किए गए। नाजियों ने एक ऐसे राज्य की कल्पना की जिसमें सिर्फ शुद्ध नस्लवाले आर्य (नोर्डिक) ही निवास कर सकें। यहाँ तक कि शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ जर्मनों को भी जर्मनी में रहने योग्य नहीं मान कर उनकी हत्या करवा दी गई। हिटलर वस्तुतः एक जातीय राज्य (racial state) की स्थापना करना चाहता था।
(viii) सैन्यवाद को प्रोत्साहन-जनतांत्रिक व्यवस्था को विफल करने तथा सैनिकों का सहयोग लेने के लिए नाजियों ने सैन्यवाद और युद्ध को बढ़ावा दिया। नाजी अपने लक्ष्य की पूर्ति बल और युद्ध का सहारा लेकर करना चाहते थे। इस प्रकार, नाजीवाद लोकतंत्र-विरोधी, सर्वसत्तावाद, निरंकुश शासन और सैन्यवाद का समर्थक था। इसने उग्र राष्ट्रवाद पर भी बल दिया। नाजियों ने समाजवाद और साम्यवाद का विरोध किया एवं पूँजीवादी व्यवस्था को समर्थन दिया।

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