नाजीवाद का प्रभाव

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नाजीवाद का प्रभाव

नाजीवाद का प्रभाव

नाजीवाद ने जर्मनी के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी। जर्मनी की आंतरिक एवं विदेश नीति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। पूरे
विश्व पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। नाजीवाद ने विश्व के अन्य भागों में स्वतंत्रता-विरोधी भावनाओं को बलवती किया।
इससे तानाशाही प्रवृत्ति को समर्थन मिला। नाजियों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए एवं उसे रोकने में अपने को असमर्थ पाकर
अनेक यूरोपीय राष्ट्रों ने जर्मनी के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाई। सैन्यवाद और उग्र राष्ट्रवाद ने विश्वशांति को खतरे में
डाल दिया। शांति और सामूहिक सुरक्षा के प्रयास में राष्ट्रसंघ विफल हो गया। नाजीवाद के विकास के साथ ही साम्यवाद-विरोधी धारा प्रबल हो गई। व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाप्त हो गई। भय और आतंक का वातावरण व्याप्त हो गया। हिटलर और नाजियों के कार्यकलापों ने द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ करवा दिया।

हिटलर के कार्य

गृह नीति

(i) अधिनायकतंत्र की स्थापना-जर्मनी में सत्ता सँभालते ही हिटलर ने सारी शक्तियाँ अपने हाथों में केंद्रित कर ली तथा
तानाशाह बन बैठा। नाजी दल के अतिरिक्त अन्य सभी राजनीतिक दलों और श्रमिक संघों को भंग कर दिया गया। एक
अध्यादेश के द्वारा नाजी पार्टी के अतिरिक्त अन्य दलों का संगठन अवैध घोषित कर दिया गया। नाजी-विरोधी राजनीतिज्ञों
और समाजवादियों की योजनाबद्ध रूप से हत्या करवाई गई। नाजी दर्शन से भिन्न पुस्तकें वृहत स्तर पर जलवा दी गई।
स्वायत्त संस्थाओं पर केंद्रीय नियंत्रण स्थापित किया गया।
(ii) विशेष सुरक्षा दल का गठन-नाजी दर्शन के अनुकूल सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को नियंत्रित करने के उद्देश्य से
विशेष पुलिस एवं सुरक्षा दल का गठन किया गया। इनमें गेस्टापो (Gestapo) अथवा गुप्तचर पुलिस दल सबसे महत्त्वपूर्ण
था। इस गुप्तचर पुलिस का संगठन इतना प्रबल था कि साधारण-से-साधारण और गुप्त-से-गुप्त घटनाओं की सूचना
हिटलर को मिल जाती थी। गेस्टापो भय और आतंक का पर्याय बन गया। गेस्टापो किसी को भी मुकदमा चलाए बिना गिरफ्तार
कर यातना-गृहों में भेज सकता था।
(iii) यहूदियों पर भीषण अत्याचार-अपनी प्रजातीय विभेद की नीति के वशीभूत होकर हिटलर ने ‘अवांछित प्रजातियों’,
विशेषतः यहूदियों पर अवर्णनीय अत्याचार किए। उनके दमन के लिए अनेक दमनकारी कानून पारित किए गए। यहूदी छात्रों एवं शिक्षकों को स्कूलों से निकाल दिया गया। यहूदियों को नौकरियों से वंचित कर दिया गया। जर्मन कचहरियों में यहूदी वकीलों के वकालत करने पर रोक लगा दी गई। यहूदी डॉक्टरों को अस्पतालों से निकाल दिया गया। यहूदियों की संपत्ति जब्त कर ली गई। उन्हें अलग बस्तियों (घेटो) में रहने को विवश किया गया। यहूदियों के सभी राजनीतिक अधिकार समाप्त कर दिए
गए। न्यूरेमबर्ग कानून के अनुसार 1935 में उन्हें मताधिकार से वंचित कर उनकी जर्मन नागरिकता छीन ली गई। यहूदियों को
जर्मनी छोड़कर जाने को विवश किया गया। उन्हें यातना-शिविरों में पशुओं की तरह रखा गया एवं गैस चैंबरों में डालकर उनकी हत्या कर दी गई। हिटलर ने यहूदियों को समूल नष्ट करने की नीति अपनाई और मानवता के विरुद्ध अक्षम्य अपराध किया।
(iv) शिक्षा-व्यवस्था में परिवर्तन-हिटलर का मानना था कि एक सशक्त समाज का गठन तभी संभव है जब युवाओं को
उचित शिक्षा दी जाए। इसलिए, स्कूलों में दी जानेवाली शिक्षा को भी नाजी दर्शन के अनुकूल बनाया गया। पाठ्यपुस्तकों को
पुनः लिखवाया गया। इनमें नाजीवाद की प्रशंसा कर इसे अपनाने को कहा गया। प्रजातिविज्ञान को पाठ्यक्रम में सम्मिलित
किया गया। इतिहास की पुस्तकें नाजी दर्शन के अनुरूप लिखाई गई। खेल-कूद पर विशेष ध्यान दिया गया। छात्रों को यहूदियों से घृणा करने, हिटलर के प्रति स्वामिभक्त बने रहने एवं उसकी पूजा करने को कहा गया।
(v) युवाओं के प्रति नीति-हिटलर युवकों एवं छात्रों को मजबूत, शक्तिशाली और सैनिक गुणों से परिपूर्ण बनाना चाहता
था। इसलिए, उनमें युद्धोन्माद उत्पन्न किया गया। छात्रों को कड़े अनुशासन में रखने की व्यवस्था की गई। 10 वर्ष की उम्र के
बच्चों को जुंगवोक (Jungvolk) नामक संस्था में भर्ती होने की कहा गया। 14 वर्ष से ऊपर के सभी युवाओं को हिटलर यूथ
(Hitler Youth) नामक संस्था में भर्ती किया गया। यहाँ उन्हें युद्ध और आक्रमण से प्यार करने तथा प्रजातंत्र से घृणा करने का पाठ पढ़ाया गया। उन्हें कड़ा शारीरिक प्रशिक्षण भी दिया गया। 18 वर्ष की आयु में उन्हें श्रमिक सेवा तथा बाद में सशस्त्र सेना में नियुक्त करने की व्यवस्था की गई। सभी युवाओं के लिए इस प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक था। युवतियों के लिए दि लीग
ऑफ जर्मन मेडेन्स (The League of German Maidens) की सदस्यता ग्रहण करना आवश्यक बना दिया गया जहाँ उन्हें घरेलू उत्तरदायित्वों तथा मातृत्व की शिक्षा दी गई।
(vi) नाजीवाद के प्रसार के लिए प्रचार-माध्यम का सहारा- नाजीवाद के प्रसार के लिए हिटलर ने प्रचार-माध्यम का
कुशलतापूर्वक उपयोग किया। ऐसा करने का मुख्य उद्देश्य जनमत को नाजी दल के पक्ष में करना था। इसके लिए रेडियो,
अखबार, चलचित्र इत्यादि का सहारा लिया गया। यहूदियों के विरुद्ध दि इटर्नल ज्यू (The Eternal Jew) नामक फिल्म बनाई
गई। हिटलर ने गोबेल्स को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया जिसने नाजी दर्शन एवं हिटलर की महानता का प्रचार किया।
गोबेल्स की नीति थी ‘अफवाह को इतना फैला दो कि वह सत्य प्रतीत होने लगे।
(vii) धर्म के प्रति नीति-हिटलर धर्म पर भी राजकीय नियंत्रण स्थापित करना चाहता था। इसलिए, उसने जर्मनी के प्रोटेस्टेंट
चर्च को अपने पक्ष में लाने का प्रयास किया, लेकिन वह इसमें पूरी तरह सफल नहीं हो सका। हिटलर ने रोमन कैथोलिक चर्च के प्रधान पोप से समझौता किया। इसके अनुसार, कैथोलिकों को भी वे सारी सुविधाएँ दी गईं जो प्रोटेस्टेंट मतावलंबियों को प्राप्त थीं। पोप ने हिटलर को आश्वासन दिया कि कैथोलिक जर्मन राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। यह व्यवस्था भी स्थायी नहीं हुई। नाजियों ने कैथोलिकों पर अत्याचार किए और कैथोलिक नाजी-विरोधी बन गए।
(viii) जनसंख्या बढ़ाने का प्रयास-यद्यपि नाजियों ने पुरुषों और स्त्रियों में विभेद किया एवं उन्हें समानता की नजर से नहीं
देखा तथापि एक शक्तिशाली जर्मन राष्ट्र के उद्देश्य को ध्यान में रखकर जर्मनी की जनसंख्या बढ़ाने के लिए युवतियों को अच्छी
माता बनने एवं शुद्ध नस्ल की आर्य संतानों का पालन करने को कहा गया। उनपर आर्य नस्ल की शुद्धता बनाए रखते हुए
अधिक-से-अधिक बच्चे पैदा करने को कहा गया। ऐसा करनेवाली महिलाओं को अस्पतालों, दुकानों तथा थियेटरों में विशेष
रियायतें दी गई। महिलाओं को अधिक संतान पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया तथा उन्हें ऑनर क्रॉस (Honour Cross) दिया गया। यहूदियों एवं अन्य अवांछित पुरुषों से संबंध रखनेवाली महिलाओं को सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित कर दंडित किया गया। अविवाहित व्यक्तियों पर टैक्स लगाया गया। इन उपायों से जर्मनी की जनसंख्या तेजी से बढ़ी।
(ix) आर्थिक सुधार-हिटलर के समक्ष राष्ट्र की अर्थव्यवस्था सुधारने की भी समस्या थी। उसने ह्यालमार शाख्त (Hjalmar
Schacht) नामक अर्थशास्त्री को अपना अर्थमंत्री बनाया। उसने अधिकतम उत्पादन और अधिक-से-अधिक लोगों को रोजगार
उपलब्ध कराने की नीति अपनाई। हिटलर ने कृषि में सुधार लाने एवं योजनाबद्ध रूप से जर्मनी का आर्थिक विकास करने का
निश्चय किया। सभी आर्थिक सुधार राजकीय नियंत्रण में किए गए। कृषि के विकास के लिए विशेष कार्यक्रम बनाया गया
जिससे जर्मनी खाद्यान्न-उत्पादन में शीघ्र ही आत्मनिर्भर हो गया। इससे अनाज की कमी की समस्या दूर हो गई। उद्योगों के विकास के लिए चतुर्वर्षीय योजना 1936 में लागू की गई। इसका उद्देश्य अपने देश में ही सभी वस्तुओं का निर्माण करना था जिससे विदेशी आयात समाप्त किया जा सके। इससे स्वदेशी वस्तुओं का निर्माण और उपयोग बढ़ा। सेना की आवश्यकता की
वस्तुओं, अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण एवं उनके संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया, क्योंकि हिटलर जानता था कि उसे शीघ्र ही
एक लंबा युद्ध लड़ना है। हजारों मील लंबी सड़कें बनवाई गईं। आम जनता के लिए वॉक्सवैगन (Volkswagen) मोटरगाड़ी
बनाई गई।
व्यापार-संबंधी नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। विदेशी व्यापार पर सरकारी नियंत्रण स्थापित हुआ। आयात को नियंत्रित
किया गया तथा निर्यात को बढ़ावा दिया गया। कारखानों में तालाबंदी, हड़ताल आदि प्रतिबंधित कर दिए गए। मजदूरों के
कार्य करने की अवधि निश्चित कर दी गई। उन्हें अन्य सुविधाएँ भी दी गईं। उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति से बेरोजगारी कम हुई। हिटलर के इन कार्यों से जर्मनी में पुनः आर्थिक प्रगति हुई।

विदेश नीति

हिटलर जर्मनी के साथ मित्र राष्ट्रों द्वारा किए गए अपमानजनक और विद्वेषपूर्ण व्यवहार को भूला नहीं था। अपने नाजी दर्शन के
अनुसार, वह शक्ति के बल पर जर्मन साम्राज्य की सीमा और गौरव को बढ़ाना चाहता था। हिटलर की विदेश नीति के मूलतत्त्व
थे अपमानजनक वर्साय की संधि को समाप्त करना, जर्मनी को एकसूत्र में बाँधना, साम्यवाद के प्रसार को रोकना तथा जर्मन
साम्राज्य का विस्तार करना। वह यूरोप में साम्यवाद के प्रसार को भी रोकना चाहता था। अतः, सत्ता में आते ही वह अपनी नीतियों के कार्यान्वयन में सक्रिय हो गया।
(i) राष्ट्रसंघ से संबंध-विच्छेद-जर्मनी राष्ट्रसंघ (League of Nations) का सदस्य था, परंतु यह उसके हितों की रक्षा नहीं कर
सका। वर्साय की कठोर और अपमानजनक संधि से जर्मन आहत थे। राष्ट्रसंघ का सदस्य बने रहने से जर्मनी को कोई लाभ नहीं था। उसने जेनेवा निरस्त्रीकरण की शर्तों को सभी देशों पर लागू की जाने की माँग की, परंतु ऐसा नहीं हुआ। अतः, 1933 में राष्ट्रसंघ के तत्त्वावधान में हो रहे निरस्त्रीकरण सम्मेलन से हिटलर ने जर्मन प्रतिनिधियों को वापस बुला लिया। उसने राष्ट्रसंघ की सदस्यता त्याग दी।
(ii) वर्साय की संधि को अस्वीकार करना-वर्साय की संधि द्वारा जर्मनी पर क्षतिपूर्ति के रूप में जो हरजाना थोप दिया गया
था उसे हिटलर ने देने से इनकार कर दिया। इसके साथ-साथ उसने जर्मनी की सैनिक शक्ति पर लगाए गए प्रतिबंध को भी
नहीं माना। जर्मनी में सैनिक सेवा अनिवार्य बना दी गई। सेना की संख्या बढ़ाई गई तथा बड़ी मात्रा में अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण
किया गया। 1935 में हिटलर ने वर्साय की संधि को मानने से इनकार कर दिया।
(iii) ऑस्ट्रिया-जर्मनी का एकीकरण-ऑस्ट्रिया में जर्मन प्रजाति की बहुत बड़ी संख्या थी। इसलिए, 1938 में उसने “एक जनता, एक साम्राज्य और एक नेता” का नारा देकर ऑस्ट्रिया को जर्मनी के साथ एकीकृत कर लिया।
(iv) राइनलैंड और चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार-हिटलर ने राइनलैंड पर 1936 में पुनः अधिकार कर लिया चेकोस्लोवाकिया के सुडेटनलैंड में जर्मन लोग बड़ी संख्या में थे। अतः, हिटलर इसपर अधिकार करना चाहता था। 1938 के
म्यूनिख सम्मेलन में सुडेटनलैंड जर्मनी को दे दिया गया, परंतु हिटलर इससे संतुष्ट नहीं हुआ। उसने संपूर्ण चेकोस्लोवाकिया
पर अधिकार करने की योजना बनाई। 1939 में उसने चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार कर लिया, क्योंकि वहाँ भी जर्मन प्रजाति के लोग बड़ी संख्या में थे।
(v) रोम-बर्लिन-टोकियो धुरी का गठन-अबीसीनियाई युद्ध में जर्मनी ने इटली की सहायता की थी। फलतः, रोम (इटली की
राजधानी) और बर्लिन (जर्मनी की राजधानी) ने आपस में एक संधि कर ली। यह रोम-बर्लिन धुरी (Rome-Berlin Axis) के
नाम से विख्यात हुई। रोम और बर्लिन ने स्पेनी शासक जनरल फ्रैंको से भी मित्रता स्थापित की। 1936 में जर्मनी और जापान ने
साम्यवाद के विरुद्ध एक आपसी समझौता (कॉमिंटर्न-विरोधी समझौता) किया। 1937 में इटली भी इसमें सम्मिलित हो गया।
फलतः, यह त्रिदलीय संधि रोम-वर्लिन-टोकियो धुरी (Rome-Berlin-Tokyo Axis) के नाम से विख्यात हुई।
(vi) सोवियत संघ के साथ संधि-1939 में हिटलर ने सोवियत संघ के साथ अनाक्रमण संधि की। इसके अनुसार, दोनों राष्ट्रों ने
एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करने का आश्वासन दिया। यह संधि शीघ्र ही समाप्त हो गई।
(vii) इंगलैंड से समझौता-1935 में हिटलर ने इंगलैंड के साथ एक समझौता किया। इसके अनुसार, इंगलैंड इसके लिए सहमत हो गया कि जर्मनी अपनी स्थल एवं वायुसेना में वृद्धि कर सकता है। यह समझौता इस शर्त पर हुआ कि जर्मनी अपनी नौसेना में 35 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी नहीं करेगा। यह हिटलर की कूटनीतिक विजय थी।
(viii) पोलैंड पर आक्रमण-1934 में हिटलर ने पोलैंड के साथ दस वर्षों के लिए अनाक्रमण संधि की थी, फिर भी हिटलर इससे संतुष्ट नहीं था। वर्साय की संधि द्वारा पोलैंड को जो ‘पोलिश गलियारा’ दिया गया था उसे हिटलर वापस ले लेना चाहता था। उसने पोलैंड से इसे वापस करने की माँग की। हिटलर की माँग को पोलैंड ने ठुकरा दिया। फलतः, 1 सितंबर 1939 को हिटलर ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया। इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया। द्वितीय विश्वयुद्ध प्रथम विश्वयुद्ध से भी अधिक भयंकर एवं विनाशकारी था। इसमें धुरी राष्ट्रों की पराजय हुई। पराजित और हताश हिटलर ने अपने मंत्री गोबेल्स और अपने परिवार के सदस्यों के साथ अप्रैल 1945 में बर्लिन के एक बंकर में आत्महत्या कर ली। मई 1945 में जर्मनी ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके साथ ही हिटलर और द्वितीय विश्वयुद्ध की कहानी समाप्त हुई। हिटलर की क्रूर और दमनकारी नीतियों की पूरे विश्व में तीखी प्रतिक्रिया हुई। जब तक विश्वयुद्ध चलता रहा नाजी अत्याचारों की खबरें छिटपुट रूप से ही बाहर आती रहीं, परंतु विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद यहूदियों और हिटलर के विरोधियों पर किए गए नाजी अत्याचारों की सूचना से पूरा विश्व स्तब्ध रह गया। इसे विध्वंस (Holocaust) की संज्ञा दी गई। नाजियों से बदले की भावना बलवती हो गई। बचे हुए यहूदियों द्वारा नाजियों के अत्याचारों की कहानी सुनकर बदले की माँग की जाने लगी। पराजित और हताश हिटलर ने तो आत्महत्या कर ली, परंतु उसकी सरकार के बचे हुए कुछ प्रमुख नाजी अधिकारियों को युद्ध अपराधी और मानवता-विरोधी घोषित कर मुकदमा चलाकर दंडित किया गया।

स्मरणीय

⊗ नाजीवाद-यह हिटलर द्वारा जर्मनी में प्रतिपादित सिद्धांत था। यह सैनिकवाद, वीरपूजा, राज्य की सर्वोच्चता के सिद्धांत, यहूदी-विरोधी विचारधारा तथा आर्य प्रजाति की श्रेष्ठता का समन्वय था।
⊗ हिटलर के उदय की पृष्ठभूमि-एडोल्फ हिटलर (1889-1945) की जिंदगी की शुरुआत एक सैनिक के रूप में, प्रथम विश्वयुद्ध में मित्रराष्ट्रों के हाथों जर्मनी की पराजय, जर्मनी में वेमर गणतंत्र की स्थापना, वर्साय की अपमानजनक संधि, हिटलर द्वारा वर्साय की संधि का विरोध, नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी अथवा नाजी पार्टी का गठन, 1923 में हिटलर द्वारा सरकार का तख्ता पलटने का विफल प्रयास, जेल में मेरा संघर्ष (Mein Kampf) की रचना, जेल से बाहर आकर नाजी पार्टी का संगठन एवं प्रचार, गणतंत्र-विरोधी भावना को भड़काना, 1932 में राष्ट्रपति के चुनाव में हिटलर की पराजय, 30 जनवरी 1933 को राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग द्वारा हिटलर को अपना चांसलर नियुक्त करना, 1933 में एक कानून द्वारा हिटलर को अध्यादेश द्वारा शासन करने का अधिकार, 1934 में हिंडेनबर्ग की मृत्यु के बाद राष्ट्रपति और चांसलर के दोनों पदों को संयुक्त कर सर्वाधिकारवादी राज्य की स्थापना
हिटलर (नाजीवाद) के उत्कर्ष के कारण-(i) 1919 की वर्साय की अपमानजनक संधि (ii) आर्थिक मंदी (iii) साम्यवाद का बढ़ता प्रभाव (iv) यहूदी-विरोधी भावना (v) जर्मनी में अंतर्निहित सैनिक प्रवृत्ति (vi) जर्मनी में गणतंत्र की विफलता (vii) हिटलर को सभी वर्गों का समर्थन (viii) हिटलर का व्यक्तित्व
नाजीवादी दर्शन की विशेषताएँ-(i) प्रजातीय स्तरीकरण (ii) भौगोलिक-राजनीतिक दृष्टिकोण (iii) सर्वाधिकारवाद का प्रसार एवं गणतंत्र की आलोचना (iv) उग्र राष्ट्रवाद का समर्थक (v) समाजवाद का विरोध (vi) महान नेता का गुणगान (vii) यहूदी-विरोधी नीति (viii) सैन्यवाद को प्रोत्साहन
नाजीवाद का प्रभाव-स्वतंत्रता-विरोधी भावनाओं को बल, सैन्यवाद तथा उग्र राष्ट्रवाद का विकास, विश्वशांति को खतरा, द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ
हिटलर के कार्य-गृह नीति-(i) अधिनायकतंत्र की स्थापना (ii) विशेष सुरक्षा दल का गठन (iii) यहूदियों पर भीषण अत्याचार (iv) शिक्षा-व्यवस्था में परिवर्तन (v) युवाओं के प्रति नीति (vi) नाजीवाद के प्रसार के लिए प्रचार-माध्यम का सहारा (vii) धर्म के प्रति नीति (viii) जनसंख्या बढ़ाने का प्रयास (ix) आर्थिक सुधार
⊗ विदेश नीति-(i) राष्ट्रसंघ से संबंध-विच्छेद (ii) वर्साय की संधि को अस्वीकार करना (iii) ऑस्ट्रिया-जर्मनी का एकीकरण (iv) राइनलैंड और चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार (v) रोम-बर्लिन-टोकियो धुरी का गठन (vi) सोवियत संघ के साथ संधि (vii) इंगलैंड से समझौता (viii) पोलैंड पर आक्रमण (द्वितीय विश्वयुद्ध का आरंभ)
द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की पराजय, 1945 में आत्महत्या, बचे हुए कई प्रमुख नाजी अधिकरियों पर मुकदमा

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