बच्चों में अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ

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बच्चों में अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ

बच्चों में अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ

          Alternative Conceptions of Learning in Children
CTET परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न-पत्रों का विश्लेषण करने
से यह ज्ञात होता है कि इस अध्याय से वर्ष 2011 में 3 प्रश्न,
2012 में 1 प्रश्न, 2019 में 3 प्रश्न, 2014 में 1 प्रश्न, तथा 2015
में 2 प्रश्न पूछे गए हैं। इस अध्याय से सर्वाधिक प्रश्न थॉर्नडाइक
के सिद्धान्त से पूछे गए हैं।
19.1 अधिगम का अर्थ
अधिगम (Learning) का अर्थ होता है― सीखना
अधिगम एक प्रक्रिया है, जो जीवन-पर्यन्त चलती रहती है एवं जिसके द्वारा
हम कुछ ज्ञान अर्जित करते हैं या जिसके द्वारा हमारे व्यवहार में परिवर्तन
होता है। जन्म के तुरन्त बाद से ही व्यक्ति सीखना प्रारम्भ कर देता है।
अधिगम व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है। इसके द्वारा
जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
क्रो एवं क्रो के अनुसार, सीखना आदतों, जान एवं अभिवृत्तियों का अर्जन है।
इसमे कार्यों को करने के नवीन तरीके सम्मिलित है और इसकी शुरूआत
व्यक्ति द्वारा किसी भी बाधा को दूर करने अथवा नवीन परिस्थितियों में अपने
समायोजन को लेकर होती है।
इसके माध्यम से व्यवहार में उत्तरोतर परिवर्तन होते रहते हैं तथा यह व्यक्ति
को अपने अभिप्राय अथवा लक्ष्य को पाने में समर्थ बनाती है।
अधिगम की विशेषताएँ
मनोवैज्ञानिको ने अधिगम की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई है
• अधिगम सार्वभौमिक होता है।
• अधिगम जीवनपर्यन्त चलता रहता है।
• अधिगम विकास की प्रक्रिया है।
• अधिगम परिवर्तन का माध्यम है।
• अधिगम अनुकूलन है।
• अधिगम अनुभवों का संगठन है।
19.2 अधिगम के माध्यम
मनोवैज्ञानिकों ने अधिगम माध्यमों (Medium of Learning) को दी गई।
बाँटा है
1. औपचारिक अधिगम (Formal Learning) (कक्षा, क्षेत्र) बालक,
स्कूल में अध्यापक, पाठ्यपुस्तक तथा खेल एवं अन्य विविध कार्यों में
भाग लेकर सीखने की प्रक्रिया से गुजरता ह यह प्रणाला सीखने की
औपचारिक प्रणाली कहलाती है।
2. अनौपचारिक अधिगम (Informal Learning) (परिवार, मित्र तथा
समाज) कोई भी बालक अपने परिवार के सदस्यों, मित्र समूह तथा
समाज से हमेशा कुछ-न-कुछ सीखता रहता है। सीखने की यह प्रक्रिया
बालक को सामाजिक समायोजन (Adjustment) में काफी मदद करती
है। बालक समाज में स्थापित नियम, रूढ़ि तथा पूर्वाग्रह ये सभी
अनौपचारिक माध्यम से सीखता है।
19.3 अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ
अधिगम की आधुनिक वैकल्पिक अवधारणाओं को निम्नलिखित दो मुख्य
श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है
19.3.1 व्यवहारवादी साहचर्य सिद्धान्त
विभिन्न उद्दीपनों (Stimulas) के प्रति सीखने वाले की विशेष अनुक्रियाएँ
होती हैं। इन उद्दीपनों तथा अनुक्रियाओं के साहचर्य से उसके व्यवहार में जो
परिवर्तन आते हैं उनकी व्याख्या करना ही इस सिद्धान्त का उद्देश्य होता है।
इस प्रकार के सिद्धान्तों के अन्तर्गत थॉर्नडाइक, वाटसन और पावलॉव तय
स्किनर के अधिगम सिद्धान्त आते हैं।
थॉर्नडाइक का प्रयास एवं त्रुटि सिद्धान्त
• थॉर्नडाइक के अधिगम के सिद्धान्त को प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त,
उद्दीपन-अनुक्रिया का सिद्धान्त, संयोजनवाद सिद्धान्त तथा अधिगम का
सम्बन्ध सिद्धान्त इत्यादि नामों से जाना जाता है।
• थॉर्नडाइक ने अपने अधिगम सिद्धान्त से सम्बन्धित प्रयोग एक बिल्ली पर
किया। उसने एक भूखी बिल्ली को एक विशेष प्रकार के सन्दूक में बन्द
कर दिया। इस सन्दूक का दरवाजा एक खटके अथवा चटकनी के दबने से
खुलता था। सन्दूक के बाहर मछली का एक टुकड़ा इस प्रकार रखा कि
अन्दर से बिल्ली को वह स्पष्ट दिखाई पड़ता रहे। भूखी बिल्ली के लिए
मछली का टुकड़ा एक उद्दीपन (Stimulus) का कार्य करता था। उस
टुकड़े को देखकर सन्दूक में बन्द बिल्ली ने अनुक्रिया प्रारम्भ कर दी।
बिल्ली ने बाहर निकलने के कई प्रयत्न किए। काफी देर तक बिल्ली
सन्दूक के अन्दर ही उछलती-कूदती रही तथा उसके अनेक अनुक्रियाएँ
प्रयत्न तथा भूल के आधार पर की। एक बार संयोगवश बिल्ली का पंजा
सन्दूक के दरवाजे पर पड़ा और वह खुल गया। बिल्ली ने बाहर रखा
हुआ मछली का टुकड़ा खा लिया।
• चॉर्नडाइक ने उपरोक्त प्रयोग को दोहराया। उसने उसी बिल्ली को भूखा
रखकर उसी सन्दूक में बन्द कर दिया। बिल्ली ने फिर पहले जैसे
अनुक्रिया प्रारम्भ की तथा संयोगवश उसका पंजा फिर सन्दूक के दरवाजे
पर पड़ा और वह बाहर निकलकर मछली का टुकड़ा पाने में कामयाब हो
गई। इसी प्रकार थार्नडाइक ने इस प्रयोग को कई बार दोहराया। जैसे-जैसे
प्रयोग की संख्या बढ़ती गई वैसे-वैसे ही बिल्ली कम प्रयास तथा कम भूल
करती हुई बाहर निकलती रही एवं बिल्ली की गलत अनुक्रियाओं में कमी
होती रही। अन्त में एक समय ऐसा आया कि बिल्ली बिना कोई भूल किए।
सन्दूक का दरवाजा खोलना सीख गई।
उपरोक्त प्रयोगों के आधार पर थॉर्नडाइक ने अधिगम के प्रयास एवं त्रुटि के
सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति
लतियां कर सकता है, किन्तु बार-बार किए गए प्रयासों के बाद वह सीखने
में सफल हो जाता है। इस प्रक्रिया में उद्दीपक की भी प्रमुख भूमिका होती है,
उद्दीपक व्यक्ति को सीखने के लिए प्रेरित करता है।
हर्नडाइक ने अपने सिद्धान्त में वर्णन किया कि सही अनुक्रिया यह अनुक्रिया है।
जिसके करने के बाद पुनर्बलन विद्यार्थी को मिलता है। यॉर्नडाइक के उद्दीपन
अनुक्रिया पुनर्बलन के सिद्धान्त के तीन महत्त्वपूर्ण नियम तथा पाँच सहायक
नियम दिए हैं, जो निम्न प्रकार है
(i) पुनर्बलन के सिद्धान्त के तीन महत्त्वपूर्ण (प्राथमिक) नियम
तत्परता का नियम                        अभ्यास का नियम
प्रभाव का नियम
(ii) पुनर्बलन के सिद्धान्त के पाँच सहायक नियम
बहुक्रिया का नियम                      रुचि या मनोवृत्ति का नियम
तत्त्व प्रबलता का नियम                सादृश्य अनुक्रिया का नियम
साहचर्यात्मक स्थानान्तरण
प्रयास एवं त्रुटि (Trial and Error) के सिद्धान्त का शैक्षिक महत्त्व
• शिक्षक इस सिद्धान्त के द्वारा ही समझते हैं कि चालक विभिन्न कौशलों को
सीखने की प्रक्रिया में गलतियों कर सकते हैं।
•शिक्षा सिद्धान्त के आधार पर बालकों को सीखने के लिए अभिप्रेरित करने पर
जोर दिया जाता है।
• इस सिद्धान्त के आधार पर बार-बार के अभ्यास से बालक की आदतों में
सुधार किया जा सकता है एवं उसकी गलतियों को कम किया जा सकता है।
• यह सिद्धान्त बताता है कि सीखने हेतु कार्य को दोहराना आवश्यक है।
19.3.2 वाटसन एवं पावलॉव का शास्त्रीय अनुबन्ध का सिद्धान्त
वाटसन का प्रयोग
• वाटसन नामक मनोवैज्ञानिक ने स्वयं अपने 11 माह के पुत्र अलबर्ट के साथ
एक प्रयोग किया। उसे खेलने के लिए एक खरगोश दिया। बच्चे को उस
खरगोश के नरम-नरम बालों पर हाथ फेरना अच्छा लगता था। वाटसन ने
बच्चे को कछ दिनों तक ऐसा करने दिया।
• कुछ समय पश्चात् वाटसन ने ऐसा किया कि जब बच्चा खरगोश को छूता
यावह (वाटसन) एक तरह की डरावनी आवाज पैदा करने लगता था। ऐसा
वाटसन ने कुछ दिनों तक किया। परिणाम यह हुआ कि डरावनी आवाज के
उकिए जाने पर भी बच्चे को खरगोश को देखने से ही डर लगने लगा।
• इस तरह भय की अनुक्रिया खरगोश (कृत्रिम उद्दीपन) के साथ अनुबन्धित
हो गई और इस अनुबन्धन के फलस्वरूप उसने खरगोश से डरना
सीख लिया।
• प्रयोग को आगे बढ़ाने पर देखा गया कि बच्चा खरगोश से ही नहीं बल्कि
ऐसी सभी चीजों से डरने लगा, जिसमें खरगोश के बाल जैसी-नरमी और
कोमलता हो।
पावलॉव का प्रयोग
• पावलाँव ने अपने प्रयोग में एक कुत्ते को भूखा रख कर उसे प्रयोग करने
वाली मेज के साथ बाँध दिया। उसने उस कुत्ते की लार ग्रन्थियों का
ऑपरेशन कर दिया था, जिससे कि उसकी लार (Saliva) की बूँदों को
परखनली में एकत्रित कर लार की मात्रा मापी जा सके।
• उसने स्वत:चालित यान्त्रिक उपकरणों की सहायता से कुत्ते को भोजन देने
की व्यवस्था की। घण्टी बजने के साथ ही कुत्ते के सामने भोजन प्रस्तुत
हो जाता था। भोजन को देखकर कुत्ते के मुँह में लार आना स्वाभाविक
था। इस लार को पाइप से जुड़े एक परखनली में एकत्रित कर लिया
जाता था। इस प्रयोग को कई बार दोहराया गया और एकत्रित लार की
मात्रा का माप लिया जाता रहा।
• प्रयोग के आखिरी चरण में भोजन न देकर केवल घण्टी की व्यवस्था में
भी कुत्ते के मुंह से लार टपकी, जिसकी मात्रा का माप किया गया। इस
प्रयोग के द्वारा यह देखने को मिला कि भोजन सामग्री जैसे प्राकृतिक
उद्दीपन के अभाव में भी घण्टी बजने जैसी कृत्रिम उद्दीपन के प्रभाव
से कुत्ते ने लार टपकाने जैसी स्वाभाविक अनुक्रिया व्यक्त की। कुत्ते ने
यह सीखा था कि जब घण्टी बजती है तब खाना मिलता है। सीखने के
इसी प्रभाव के कारण घण्टी बजने पर उसके मुंह से लार निकलना
प्रारम्भ हो जाता था।
उपरोक्त प्रयोगों के आधार पर मनोवैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि
जब किसी क्रिया को बार-बार दोहराया जाता है, तो अस्वाभाविक उद्दीपक
भी वही प्रतिक्रिया देने लगता है, जो स्वाभाविक उद्दीपक देता है।
इसे पावलॉव का अनुबन्ध अनुक्रिया सिद्धान्त या शास्त्रीय अनुबन्ध के
सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है।
शास्त्रीय अनुबन्ध के सिद्धान्त का शैक्षिक महत्त्व
• स्वभाव निर्माण (Nature Builder) उपरोक्त सिद्धान्त के आधार पर
बालक में भय, प्रेम एवं घृणा के भाव आसानी से उत्पन्न किए जा
सकते है।
• अभिवृत्ति का विकास (Development of Attitude) बालक में विशेष
प्रकार की अभिवृत्ति के विकास में उपरोक्त सिद्धान्त शिक्षकों की सहायता
करता है।
• मानसिक एवं संवेगात्मक अस्थिरता का उपचार मानसिक एवं
संवेगात्मक रूप से अस्थिर बालकों के उपचार में भी उपरोक्त सिद्धान्त
प्रभावकारी साबित होता है।
स्किनर का सक्रिय अनुबन्ध का सिद्धान्त
स्किनर ने अधिगम के जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया उसे सक्रिय अनुबन्धन
का सिद्धान्त कहा जाता है। सक्रिय अनुबन्धन से अभिप्राय एक ऐसी अधिगम
प्रक्रिया से है, जिसके द्वारा सक्रिय व्यवहार को सुनियोजित पुनर्बलन
(Reinforcement) द्वारा पर्याप्त बल मिल जाने के कारण वांछित रूप में
जल्दी-जल्दी पुनरावृत्ति होती रहती है और सीखने वाला अन्त में सिखाने वाले
की इच्छा के अनुरूप व्यवहार करने में समर्थ हो जाता है।
इस सिद्धान्त क साधनात्मक अनुबन्ध या क्रिया प्रसूत अनुबन्ध का सिद्धान्त
भी कहा जाता है।
स्किनर ने अपने अधिगम के सिद्धान्त के प्रतिपादन हेतु सन् 1930 में सफेद
चूहों पर एक प्रयोग किया तथा इसके लिए उसने एक विशेष प्रकार का
बॉक्स लिया, जिसे स्किनर बक्सा कहते है।
इस बक्से में एक छोटा-सा मार्ग था जिसमें एक लीवर लगा हुआ था जिसका
सम्बन्ध एक प्याली से था। इस लीवर को दबाने से खट की आवाज होती थी
तथा उस प्याली में खाने का एक टुकड़ा आ जाता था।
चूहा जब इस बक्से में उस मार्ग से छोड़ा जाता था, तो लीवर पर उसका पैर
पड़ने से खट की आवाज होती थी तथा वह आवाज को सुनकर उसकी ओर
बढ़ता था, जिससे अन्दर रखी प्याली में उसे खाने का टुकड़ा मिल जाता था।
वह खाना उस चूहे के लिए पुनर्बलन का कार्य करता था तथा इस बक्से में
इस प्रकार की व्यवस्था थी कि उसमें अन्य किसी प्रकार का शोर नहीं होता
था तथा इस क्रिया को बार-बार दोहराया गया।
खाना चूहे की लीवर दबाने की क्रिया को बल प्रदान करता था। इस क्रिया में
चूहा भूखा होने के कारण अधिक सक्रिय रहता था।
स्किनर के सक्रिय अनुबन्ध का शैक्षणिक महत्त्व
• स्किनर के सिद्धान्त के आधार पर पाठ्य-वस्तु को छोटे-छोटे पदों में
बाँटने पर बल दिया जाता है, जिससे अधिगम शीघ्र एवं प्रभावकारी हो
जाता है।
• छात्रों के व्यवहार को वांछित स्वरूप तथा दिशा प्रदान करने में यह
सिद्धान्त शिक्षकों की सहायता करता है। यह सिद्धान्त बताता है कि यदि
छात्रों को उनके प्रयासों के परिणाम का ज्ञान करा दिया जाए तो विद्यार्थी
अपने कार्य में अधिक उन्नति कर सकते हैं।
• इस सिद्धान्त का प्रयोग अभिक्रमित अधिगम के लिए किया गया है।
• सक्रिय अनुबन्धन में पुनर्बलन का अत्यधिक महत्त्व है। पुनर्बलन के अनेक
रूप हो सकते हैं, जैसे―दण्ड, पुरस्कार, परिणाम का ज्ञान इत्यादि।
19.3.2 ज्ञानात्मक व क्षेत्र संगठनात्मक सिद्धान्त
अधिगम का यह सिद्धान्त सीखने की प्रक्रिया में उद्देश्य, अन्तर्दृष्टि और
सूझ-बूझ के महत्त्व को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार के सिद्धान्तों के अन्तर्गत
वर्देमीअर, कोह्लर एवं लेविन के अधिगम सिद्धान्त आते हैं।
कोह्लर का अन्तर्दृष्टि का सिद्धान्त
• अन्तर्दृष्टि अर्थात् सूझ-बूझ के द्वारा सीखने का सिद्धान्त गेस्टाल्टवादी
मनोवैज्ञानिकों की देन है। इन मनोवैज्ञानिकों में वर्देमीअर, कोह्लर, कोफ्फका
और लेविन के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। गेस्टाल्ट एक जर्मन
शब्द है, जिसका अर्थ होता है एक आकृति को पूर्णता या समग्रता के रूप
में लेना। गेस्टाल्टवादी सिद्धान्त को प्रतिपादित करने के लिए कोह्लर ने एक
प्रयोग किया।
• कोह्लर ने एक कमरे में सुल्तान नामक एक भूखे चिम्पैंजी को बंद कर
दिया तथा उसने कमरे की छत में कुछ केले टाँग दिए, जो उस भूखे
चिम्पैजी की पहुंच के बाहर थे। कोह्लर ने कमरे में तीन-चार खाली बक्से
भी डाल दिए। बार-बार प्रयास करने के बावजूद भी चिम्पैजी केलो को
प्राप्त करने में असफल रहा, तभी उसकी नजर बक्सों पर गई तथा उसने
बक्सों को एक के ऊपर एक रखते हुए केलों को प्राप्त कर लिया।
• एक अन्य प्रयोग में उसने कमरे में बक्से की जगह तीन-चार छड़ियाँ रखी।
चिम्पैजी इस बार भी छड़ियों को आपस में जोड़कर केलों को प्राप्त करने
में सफल रहा। अत: बार-बार प्रयोगों को दुहराने के क्रम में उसने पाया
कि प्रत्येक बार चिम्पैजी अपनी कोशिशों में सफल रहा।
उपरोक्त प्रयोगों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि चिम्पैंजियों ने
परिस्थितियों का अपने समग्र रूप में प्रत्यक्षीकरण किया। परिस्थितियों में
उपलब्ध सामग्री तथा समस्या के हर पहलू का गम्भीरतापूर्वक विश्लेषण
कर उचित सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा की। अन्त में समस्याओं और
उनसे सम्बन्धित पहलुओं को तुरन्त ही समझ कर उनका हल उनके
मस्तिष्क में अचानक ही कौंध गया।
अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त (Insight Theory) की शैक्षिक उपयोगिता
• जब कुछ पदाया जाए अथवा कुछ सीखने के लिए कहा जाए, तो उसे
अपने समग्र रूप में ही बच्चों के सामने प्रस्तुत किया जाए। बालकों के
बौद्धिक विकास हेतु उनकी अन्तर्दृष्टि अथवा सूझ-बूझ बहुत सहायक होती
है। इसलिए इस विधि के द्वारा अधिक से अधिक कार्यों को करने के लिए
बालकों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
• पाठ्यक्रम के निर्माण में सूझ-बूझ अथवा अन्तर्दृष्टि प्रक्रिया को ध्यान में
रखकर पाठ्यक्रम के विभिन्न अंगों को एकीकृत किया जाता है। यदि सीखने
से होने वाले लाभों का पहले से पता चल जाए, तो बालक अपनी बुद्धि तथा
सूझ-बूझ का भरपूर प्रयोग करेगा।
कर्ट लेविन का क्षेत्र सिद्धान्त
लेविन के अधिगम सम्बन्धी क्षेत्र सिद्धान्त का आधार वातावरण में व्यक्ति की
स्थिति है। इस सिद्धान्त के अनुसार सीखना अथवा अधिगम एक सापेक्षिक
प्रक्रिया है जिसके द्वारा सीखने वाले में नवीन अन्तर्दृष्टि का विकास होता है
अथवा पुरानी में परिवर्तन होता है। व्यक्ति के व्यवहार को समझने हेतु व्यक्ति
की स्थिति को उद्देश्यों से सम्बन्धित मानचित्र में निर्धारित करने तथा प्रयत्नों
की जानकारी आवश्यक है।
इस सिद्धान्त के चार मुख्य तत्त्व है शक्ति, अभिप्रेरणा, जीवन विस्तार ग
अवरोधा
शक्ति (Strength) व्यक्ति अपने जीवन में सदैव उद्देश्यों से प्रेरणा ग्रहण
करता है। उद्देश्य कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक होता है।
सकारात्मक उद्देश्य वे होते हैं, जिनसे प्रेरित होकर व्यक्ति उस ओर बढ़ता
है। नकारात्मक उद्देश्य से व्यक्ति पीछे हटने की कोशिश करता है। अधिगम
के इस सिद्धान्त के अनुसार बालक के सम्मुख सकारात्मक तथा नकारात्मक
शक्तियाँ उपस्थित रहती हैं, जो अधिगम की प्रेरणा देती हैं।
अभिप्रेरणा (Motivation) अभिप्रेरणा वह प्रक्रिया है, जिसमें प्रेरक विशिष्ट
उद्देश्यों के साथ सम्बन्धित होते हैं और इस प्रेरक की सन्तुष्टि इन उद्देश्यों
को प्राप्त करके होती है।
जीवन-विस्तार (Life-space) व्यक्ति की कुछ आवश्यकताएँ तथा योग्यताएँ
होती है, जोकि व्यक्ति में निहित होती हैं। फिर लेविन ने व्यक्ति की सीमा की
अवधारणा की है। इसके पश्चात् वातावरण आता है, जोकि जीवन विस्तार की
सीमा से घिरा होता है।
अवरोध (Barrier) वातावरण में कुछ ऐसी शक्तियाँ होती है, जो व्यक्ति को
उसके उद्देश्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करती है तथा व्यक्ति को
अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का विरोध करती है। यदि व्यक्ति को उदेश्य की
ओर जाने के लिए अभिप्रेरणा मिलती रहती है, तो वह अपने लक्ष्य को प्राप्त
कर लेता है तथा यदि व्यक्ति को बीच में बाधा उत्पन्न होने पर अभिप्रेरणा
नहीं मिलती, तो वह अपना मार्ग छोड़ देता है अथवा बदल देता है। यदि वह
निराश होकर बैठ जाता है, तो वह कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर
पाता है।
सिद्धान्त की शैक्षिक उपयोगिता
• क्षेत्र सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक अधिगमकर्ता को मात्र एक जैविक प्राणी न
समझा जाकर एक ऐसा मनोविज्ञानात्मक व्यक्ति माना जाता है जो किसी
एक शिक्षण अधिगम परिस्थिति में अपने विशिष्ट जीवन दायरे में रह रहा
होता है।
• क्षेत्र सिद्धान्त यह बताता है कि सीखना सभी तरह से एक उद्देश्यपूर्ण और
लक्ष्योन्मुख प्रक्रिया है। क्षेत्र सिद्धान्त की सहायता से शिक्षकों को
शिक्षण-अधिगम व्यवस्था के उचित नियोजन, व्यवस्था तथा प्रबन्धीकरण में
सहायता मिलती है।
कार्ल रोजर्स का अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त
• कार्ल रेन्सम रोजर्स नामक अमेरिकन मनोवैज्ञानिक ने प्रौढ़ व्यक्तियों की
अधिगम प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त का
प्रतिपादन किया। उन्होंने अधिगम को दो मुख्य प्रकारों, संज्ञानात्मक अधिगम
तथा अनुभवजन्य अधिगम में विभक्त किया। उन्होंने बताया कि संज्ञानात्मक
अधिगम को जब तक उपयोग में नहीं लाया जाए, यह अपने आप में पूरी
तरह निरर्थक ही होता है। इस अधिगम का आधार और प्रयोजन मात्र ज्ञान
की प्राप्ति ही होता है। शब्द-ज्ञान, गणितीय ज्ञान, भौगोलिक तथा
ऐतिहासिक तथ्यों एवं घटनाओं की जानकारी आदि इसी प्रकार के अधिगम
के अन्तर्गत आते हैं।
• अनुभवजन्य अधिगम के बारे में कार्ल रोजर्स ने बताया कि यह मात्र ज्ञानार्जन
में ही नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष की सम्पूर्ण प्रगति और उसके कल्याण में
विशेष रूप से सहायक सिद्ध होता है।
• अनुभवजन्य अधिगम में अधिगमकर्ता की अपनी व्यक्तिगत रुचि एवं
तल्लीनता का पूरा-पूरा समावेश पाया जाता है। यह सिद्धान्त बताता है कि
मानव होने के नाते व्यक्ति में सीखने की स्वाभाविक रूप से ही उत्कट
अभिलाषा रहती है और सभी व्यक्ति वृद्धि एवं विकास को प्राप्त करना
चाहते हैं। इसलिए अपनी स्वाभाविक रुचि तथा इच्छा को ध्यान में रखते
हुए प्रगति पथ पर अग्रसर रहने के लिए कुछ-न-कुछ सीखते रहने की
कोशिश करते हैं।
अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त की शैक्षिक उपयोगिता
• यह सिद्धान्त अधिगम हेतु उचित रूप से लाभदायक एवं सकारात्मक अधिगम
परिस्थितियों का आयोजन करने में सहायक होता है।
• इस सिद्धान्त की सहायता से छात्रों के लिए अधिगम स्रोतों एवं संसाधनों
की व्यवस्था करने में सहायता मिलती है।
                                             अभ्यास प्रश्न
1. अधिगम के सन्दर्भ में शिक्षाशास्त्रियों एवं
मनोवैज्ञानिकों ने विविध प्रकार की
परिभाषाएँ दी है। इन परिभाषाओं के
अनुसार अधिगम ………….. चलने वाली एक
निरन्तर प्रक्रिया है।
(1) जीवनपर्यन्त
(2) किशोरावस्था तक
(3) वृद्धावस्था तक
(4) युवावस्था तक
2. “सीखना आदतों, ज्ञान एवं अभित्तियों का
अर्जन है।” यह कथन निम्नलिखित में से
किसका है?
(1) किंबल यंग
(2) को एण्ड को
(3) मॉस्लो
(4) स्किनर
3. बच्चे अनौपचारिक अधिगम के माध्यम से
भी सीखते हैं, निम्न में कौन एक
अनौपचारिक अधिगम का भाग नहीं है?
(1) परिवार
(2) दोस्त
(3) समाज
(4) पाठ्य-पुस्तक
4. निम्नलिखित में से अधिगम की कौन-सी
प्रणाली बालकों को सामाजिक समायोजन में
मदद करती है?
(1) औपचारिक प्रणाली
(2) अनौपचारिक प्रणाली
(3) औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों
(4) उपरोक्त में से कोई नहीं
5. अधिगम के प्रयास एवं त्रुटि सिद्धान्त के
अनुसार, सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति
गलतियाँ कर सकता है, किन्तु बार-बार
किए गए प्रयासों के बाद वह सीखने में
सफल हो जाता है। इस सिद्धान्त का
प्रतिपादन किसने किया?
(1) पावलॉव ने
(2) टोलमैन ने
(3) थार्नडाइक ने
(4) कोह्लर ने
6. सीखने के उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त के
मुख्य प्रतिपादक कौन है?
(1) थार्नडाइक
(2) पावलॉव
(3) कोह्लर
(4) स्किनर
7. निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धान्त छात्रों
के व्यवहार को वांछित स्वरूप तथा दिशा
प्रदान करने में शिक्षकों की सहायता
करता है?
(1) अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त
(2) प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त
(3) अनुकरण सिद्धान्त
(4) अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त
8. अधिगम से सम्बन्धित ‘अभ्यास का नियम’
निम्नलिखित में से किस मनोवैज्ञानिक ने
दिया है?
(1) स्किनर
(2) थॉर्नडाइक
(3) मॉस्लो
(4) पियाजे
9. जब किसी क्रिया को बार-बार दोहराया
जाता है, तो अस्वाभाविक उद्दीपक भी
वही प्रतिक्रिया देने लगता है, जो स्वाभाविक
उद्दीपक देता है। यह अधिगम का
निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धान्त है?
(1) अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त
(2) शास्त्रीय अनुबन्ध सिद्धान्त
(3) अनुकरण सिद्धान्त
(4) अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त
10. अधिगम के किस सिद्धान्त के आधार पर
बालक में भय, प्रेम एवं घृणा के भाव
आसानी से उत्पन्न किए जा सकते है?
(1) अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त
(2) अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त
(3) शास्त्रीय अनुबन्ध सिद्धान्त
(4) प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त
11. निम्नलिखित में से किसने अनुबन्ध
अनुक्रिया का सिद्धान्त दिया है?
(1) पावलाव
(2) स्किनर
(3) थॉर्नडाइक
(4) कोह्लर
12. निम्नलिखित में से किस शिक्षा मनोवैज्ञानिक
ने अभिप्रेरण एवं अधिगम के बीच सम्बन्ध
स्थापित करते हुए यह कहा कि अभिप्रेरण
से उत्पन्न क्रियाशीलता ही सीखने के लिए
उत्तरदायी है?
(1) कोह्लर
(2) स्किनर
(3) थार्नडाइक
(4) वुडवर्थ
13. निम्नलिखित में से किसने सक्रिय
अनुबन्ध/साधनात्मक अनुबन्ध/क्रिया प्रसूत
अनुबन्ध इत्यादि का सिद्धान्त दिया?
(1) पावलॉव
(2) स्किनर
(3) थॉर्नडाइक
(4) हर्जबर्ग
14. पुनर्बलन सिद्धान्त है
(1) स्किनर का
(2) मॉस्लो का
(3) वुडवर्थ का
(4) थार्नडाइक का
15. निम्नलिखित में से अधिगम में कौन-सा
सिद्धान्त यह बताता है कि जब कुछ
पढ़ाया जाए अथवा कुछ सीखने के
लिए कहा जाए, तो उसे अपने समग्र
रूप में ही बच्चों के सामने प्रस्तुत
किया जाए?
(1) अन्तर्दृष्टि या सूझ का सिद्धान्त
(2) सक्रिय अनुबन्ध सिद्धान्त
(3) अनुकरण सिद्धान्त
(4) प्रयास एवं त्रुटि सिद्धान्त
16. निम्नलिखित में से कौन एक
गेस्टाल्टवादी चिन्तक नहीं है?
(1) स्किनर
(2) कोहर
(3) कोफ्का
(4) वर्देमीयर
17. अधिगम एक सापेक्षिक प्रक्रिया है,
जिसके द्वारा सीखने वालों में नवीन
अन्तर्दृष्टि का विकास होता है, निम्न में
से यह कौन-सा सिद्धान्त है?
(1) लेविनवादी सिद्धान्त
(2) कोहरवादी सिद्धान्त
(3) पावलॉववादी सिद्धान्त
(4) स्कीनरवादी सिद्धान्त
18. अधिगम का कौन-सा सिद्धान्त यह
बताता है कि सीखने हेतु कार्य को
दोहराना आवश्यक है?
(1) प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त
(2) शास्त्रीय अनुबन्ध सिद्धान्त
(3) अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त
(4) अनुकरण सिद्धान्त
19. अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त की
शैक्षिक उपयोगिता निम्नलिखित में से
कौन-सी हो सकती है?
(1) यह सिद्धान्त बताता है कि सीखना सभी
तरह से एक उद्देश्यपूर्ण और
लक्ष्योन्मुख प्रक्रिया है।
(2) यह सिद्धान्त बताता है कि जब कुछ
पढ़ाया जाए अथवा कुछ सीखने के लिए
कहा जाए, तो उसे अपने समग्र रूप में
ही बच्चों के सामने प्रस्तुत किया जाए।
(3) छात्रों के व्यवहार को वांछित स्वरूप
तथा दिशा प्रदान करने में यह सिद्धान्त
शिक्षकों की सहायता करता है।
(4) इस सिद्धान्त की सहायता से छात्रों के
लिए अधिगम स्रोतों एवं संसाधनों की
व्यवस्था करने में सहायता मिलती है।
                 विगत वर्षों में पूछे गए प्रश्न
20. “एक बच्चा अतीत की समान परिस्थिति में की
गई अनुक्रियाओं के आधार पर नई स्थिति के
प्रति अनुक्रिया करता है।” यह किससे सम्बन्धित
है?                              [CTET June 2011]
(1) सीखने का ‘सादृश्यता नियम’
(2) सीखने का प्रभाव-नियम’
(3) सीखने की प्रक्रिया का ‘अभिवृत्ति-नियम’
(4) सीखने का ‘तत्परता-नियम’
21. निम्न में से कौन-से कथन को सीखने की
प्रक्रिया की विशेषता नहीं मानना चाहिए?
                                    [CTET June 2011]
(1) शैक्षिक संस्थान ही एकमात्र स्थान है जहाँ अधिगम
प्राप्त होता है
(2) सीखना एक व्यापक प्रक्रिया है
(3) सीखना लक्ष्योन्मुखी होता है
(4) अन-अधिगम भी सीखने की प्रक्रिया है
22. ‘सीखने के अन्त:दृष्टि सिद्धान्त’ को किसने
बढ़ावा दिया?                         [CTET June 2011]
(1) ‘गेस्टाल्ट’ सिद्धान्तवादी
(2) पैवलॉव
(3) जीन पियाजे
(4) वाइगोत्स्की
23. एक शिक्षिका अपने-आप से कभी भी प्रश्नों के
उत्तर नहीं देती। वह अपने विद्यार्थियों को उत्तर
देने के लिए, समूह चर्चाएँ और सहयोगात्मक
अधिगम अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।
यह उपागम …………. के सिद्धान्त पर आधारित
है।                                     [CTET Jan 2012]
(1) सक्रिय भागीदारिता
(2) अनुदेशात्मक सामग्री के उचित संगठन
(3) अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करना और भूमिका-प्रतिरूप
बनाना
(4) सीखने की तत्परता
24. एक पी टी (खेल) शिक्षक क्रिकेट के खेल में
अपने शिक्षार्थियों के क्षेत्ररक्षण को सुधारना
चाहता है। निम्न में से कौन-सी युक्ति शिक्षार्थियों
को अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सर्वाधिक
सहायक है?                          [CTET July 2013]
(1) शिक्षार्थियों को क्षेत्ररक्षण का अधिक अभ्यास
करवाना।
(2) शिक्षार्थियों को यह बताना कि क्षेत्ररक्षण सीखना
उनके लिए किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है।
(3) बेहतर क्षेत्ररक्षण और सफलता की दर के पीछे के
तर्क को स्पष्ट करना।
(4) क्षेत्ररक्षण को प्रदर्शित करना और शिक्षार्थी अवलोकन
करेंगे।
25. “सीखने की तत्परता’……….की ओर
संकेत करती है।              [CTET July 2013]
(1) थॉर्नडाइक का तत्परता का नियम
(2) शिक्षार्थियों का सामान्य योग्यता स्तर
(3) सीखने के सातत्यक में शिक्षार्थियों का वर्तमान
संज्ञानात्मक स्तर
(4) सीखने के कार्य की प्रकृति को सन्तुष्ट करने
26……………… के अतिरिक्त निम्नलिखित सभी
के कारण अधिगम अक्षमता उत्पन्न हो
सकती है।                    [CTET July 2013]
(1) सांस्कृतिक कारक
(2) सेरेब्रल डिस्फंकान
(3) संवेगात्मक विघ्न
(4) व्यवहारगत विघ्न
27. निम्नलिखित में से कौन-सा कारक अधिगम
को सकारात्मक प्रकार से प्रभावित करता है?
                                               [CTET Sept 2014]
(1) अनुत्तीर्ण हो जाने का भय
(2) सहपाठियों से प्रतियोगिता
(3) अर्थपूर्ण सम्बन्ध
(4) माता-पिता की ओर से दबाव
28. बच्चों को त्रुटियों के बारे में निम्नलिखित में
से कौन-सा कथन सत्य है?               [CTET Feb 2014]
(1) बच्चों की त्रुटियाँ उनके सीखने की प्रक्रिया का
अंग है
(2) बच्चे तब त्रुटियों करते हैं जब शिक्षक सौम्य
हो और उन्हें त्रुटियों करने पर दण्ड न
देता हो
(3) बच्चों की त्रुटियाँ शिक्षक के लिए महत्त्वहीन है
और उसे चाहिए कि उन्हें काट दें और उन
पर अधिक ध्यान न दें
(4) असावधानी के कारण बच्चे त्रुटियाँ करते है
29. शिक्षार्थियों द्वारा की गई गलतियाँ और
त्रुटियाँ                        [CTET Sept 2015]
(1) बच्चों को ‘कमजोर’ अथवा ‘उत्कृष्ट’ चिन्हित
करने के अच्छे अवसर हैं
(2) शिक्षक और शिक्षार्थियों की असफलता के
सूचक है
(3) उनके चिन्तन को समझने के अदसर के रूप
देखी जानी चाहिए
(4) कठोरता से निपटाई जानी चाहिए
                                          उत्तरमाला
1. (1) 2. (2) 3. (4) 4. (2) 5. (8) 6. (1) 7. (2) 8. (2) 9. (2) 10. (3)
11. (1) 12. (2) 13. (2) 14. (1) 15. (1) 16. (1) 17. (1) 18. (3) 19. (4)
20. (2) 21. (1) 22. (1) 23. (1) 24. (1) 25. (3) 26. (1) 27. (3) 28. (1)
29. (3)
                                                    ★★★

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