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लेनिन और रूस का नवनिर्माण

लेनिन और रूस का नवनिर्माण

आंतरिक व्यवस्था
⊗ युद्ध की समाप्ति
⊗ प्रतिक्रांति का दमन
⊗ आर्थिक व्यवस्था
⊗ सामाजिक सुधार
⊗ प्रशासनिक सुधार
⊗ नए संविधान का निर्माण
⊗ नई आर्थिक नीति
विदेश नीति
⊗ गुप्त संधियों की समाप्ति
⊗ राष्ट्रीयता का सिद्धांत
⊗ साम्राज्यवाद-विरोधी नीति
कौमिन्टर्न की स्थापना
लेनिन का जीवनवृत्त-बोल्शेविक क्रांति का प्रणेता लेनिन था। उसका पूरा नाम व्लादिमीर इलिच उलियानोव था, परंतु आमतौर पर वह व्लादिमीर इवानोविच लेनिन (VILenin) के नाम से विख्यात है। उसका जन्म 22 अप्रैल 1870 को वोल्गा नदी के किनारे स्थित सिमब्रस्क नामक गाँव में हुआ था। वह आरंभ से ही विद्रोही प्रवृत्ति का था। उसके बड़े भाई को जार एलेक्जेंडर की हत्या के आरोप में गोली मार दी गई थी। इसलिए, लेनिन जारशाही का कट्टर दुश्मन बन गया। विद्यार्थी जीवन में ही वह मार्क्सवाद से प्रभावित होकर इसका समर्थक बन गया। उसने स्वयं भी मार्क्सवादी विचारधारा का प्रचार किया। वह रूस की तत्कालीन स्थिति क्षुब्ध था और प्रचलित व्यवस्था की समाप्ति चाहता था। इसलिए, उसने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। बाद में वह बोल्शेविक दल का नेता बन गया। 1905 की रूसी क्रांति में उसने सक्रियता से भाग लिया, परंतु क्रांति के विफल हो जाने के पश्चात वह स्विट्जरलैंड में निर्वासित जीवन व्यतीत करता रहा। 1917 की फरवरी क्रांति के बाद वह रूस वापस पहुँचा। उसने बोल्शेविक दल का नेतृत्व ग्रहण किया। ट्रॉटस्की के सहयोग से उसने केरेन्सकी की सरकार का तख्ता पलट दिया। लेनिन नई बोल्शेविक सरकार का अध्यक्ष बन गया। ट्रॉटस्की को युद्ध मंत्री बनाया गया। शासन सँभालते ही लेनिन ने अपने उद्देश्य और कार्यक्रम निश्चित किए। उसका उद्देश्य रूस का नवनिर्माण करना था। 21 जनवरी 1924 को अपनी मृत्यु तक वह इसी प्रयास में लगा रहा।

लेनिन के कार्य

लेनिन को विकट परिस्थिति में सत्ता सँभालनी पड़ी थी। उसके समक्ष अनेक समस्याएँ थीं जिनका निराकरण करना उसकी
प्राथमिकता थी। प्रथम विश्वयुद्ध का प्रतिकूल प्रभाव देश पर पड़ रहा था। क्रांति और युद्ध के दौरान प्रशासनिक, आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति बिगड़ चुकी थी। लेनिन ने सत्ता सँभालते ही इन समस्याओं पर ध्यान दिया।

आंतरिक व्यवस्था

युद्ध की समाप्ति-सर्वप्रथम लेनिन ने जर्मनी के साथ युद्ध बंद कर दिया। 1918 में उसने जर्मनी के साथ ब्रेस्ट लिटोस्क की संधि कर ली। यद्यपि यह संधि सोवियत संघ के लिए अपमानजनक थी, उसे अपना एक बड़ा भूभाग खोना पड़ा, तथापि देश में शांति-व्यवस्था बनाने, अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने एवं सेना को राहत देने के लिए यह आवश्यक था।
प्रतिक्रांति का दमन-(i) बोल्शेविक सरकार की नीतियों से वैसे लोग व्यग्र हो गए जिनकी संपत्ति और अधिकारों को नई सरकार ने छीन लिया था। अतः, सामंत, पादरी, पूँजीपति, नौकरशाह सरकार के विरोधी बन गए। वे सरकार का तख्ता पलटने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें विदेशी सहायता भी प्राप्त थी। अगस्त 1918 में लेनिन की हत्या का प्रयास किया गया। अतः, लेनिन ने प्रतिक्रांतिकारियों का कठोरतापूर्वक दमन करने का निश्चय किया। इसके लिए चेका (Cheka) नामक विशेष पुलिस दस्ता का गठन किया गया। इसने निर्ममतापूर्वक हजारों षड्यंत्रकारियों को मौत के घाट उतार दिया। इससे क्रांति-विरोधी पस्त हो गए। चेका के लाल आतंक (Red Terror) ने षड्यंत्रकारियों की कमर तोड़ दी।
(ii) सोवियत संघ की आंतरिक अव्यवस्था एवं षड्यंत्रकारी गतिविधियों को देखकर तथा समाजवाद के बढ़ते प्रभाव से चिंतित
होकर ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और अमेरिका ने प्रतिक्रांतिकारियों की सहायता के लिए रूस में अपने सैनिक भेज दिए। इससे गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। लेनिन ने इसका मुकाबला किया। ट्रॉटस्की ने लाल सेना (Red Army) का गठन कर विदेशी सेना को सोवियत संघ से बाहर खदेड़ दिया। इस प्रकार, लेनिन ने प्रतिक्रांतिकारियों एवं पूँजीवादी देशों के आक्रमण से साम्यवादी सरकार की सुरक्षा की।
आर्थिक व्यवस्था-बोल्शेविक सरकार ने नई आर्थिक व्यवस्था स्थापित की। लेनिन ने साम्यवाद को लागू किया। राष्ट्र की सारी
संपत्ति तथा उत्पादन और वितरण के साधनों पर सरकारी आधिपत्य स्थापित किया गया। जमीन पर से व्यक्तिगत स्वामित्व हटा दिया गया। जमीन किसानों में बाँट दी गई। कल-कारखानों, रेलवे, बैंक, खान, जंगल का राष्ट्रीयकरण किया गया। कारखानों के
तकनीशियनों तथा श्रमिकों के माध्यम से उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित किया गया। हड़तालों पर रोक लगा दी गई। किसानों को भी उत्पादन बढ़ाने को कहा गया। उनसे अनाज की वसूली जबरदस्ती की गई। जार द्वारा विदेशियों से लिए गए कर्ज को चुकाने से सरकार ने इनकार कर दिया। चर्च की संपत्ति का भी सरकार ने अधिग्रहण कर लिया।
लेनिन की आर्थिक व्यवस्था का देश की अर्थव्यवस्था पर अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ा। भूमि एवं उद्योगों के राष्ट्रीयकरण से
उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ा। कृषि और औद्योगिक उत्पादन घट गया। सरकार का विरोध भी होने लगा। किसान जबरदस्ती अनाज- वसूली के विरोध में अपने अनाज जलाने लगे। इससे अनाज की कमी हो गई तथा भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई। लेनिन की नीति की आलोचना होने लगी। बाध्य होकर लेनिन को नई आर्थिक नीति अपनानी पड़ी।
सामाजिक सुधार-(i) रूस के नवनिर्माण के लिए सामाजिक सुधार भी किए गए। नारियों को पुरुषों के समान अधिकार दिए गए। उन्हें सरकारी नौकरी करने का अधिकार दिया गया। (ii) शिक्षा पर चर्च का वर्चस्व समाप्त कर दिया गया। सरकार ने निःशुल्क प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था की। सभी गैर-सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए एवं साम्यवादी शिक्षा का प्रचार किया गया। (iii) सभी लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई। राज्य ने धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाई। (iv) सोवियत संघ में एकदलीय व्यवस्था स्थापित हुई। बोल्शेविक दल का नियंत्रण सभी गतिविधियों पर स्थापित किया गया।
प्रशासनिक सुधार-लेनिन ने आवश्यक प्रशासनिक सुधार भी किए। पुराने नौकरशाहों को बर्खास्त कर दिया गया। राज्य के बड़े पद सिर्फ साम्यवादी दल के सदस्यों को ही दिए गए। इन लोगों ने निष्ठापूर्वक सरकारी नीतियों को कार्यान्वित किया। इसी प्रकार, सेना में भी सुधार हुआ। सेना में बोल्शेविक-समर्थकों की ही भरती की गई। सेना का आधुनिकीकरण भी किया गया।
नए संविधान का निर्माण-लेनिन के नेतृत्व में 1918 में बोल्शेविक सरकार ने एक नए संविधान का निर्माण किया। इसके
अनुसार, रूस को रूसी सोशलिस्ट फेडरल सोवियत रिपब्लिक (Russian Socialist Federal Soviet Republic) घोषित किया गया। बाद में रूस सोवियत संघ अथवा यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स (USSR) के रूप में विख्यात हुआ।
सोवियत संघ में सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद स्थापित हुआ। मास्को सोवियत संघ की नई राजधानी बना। पुराने रूसी झंडा के स्थान पर नया झंडा अपनाया गया। झंडा लाल रंग का था जिसपर हँसुआ और हथौड़ा का चित्र बना हुआ था। बोल्शेविक दल का नाम साम्यवादी दल किया गया। इस प्रकार, विश्व में पहली बार समाजवादी शासन की स्थापना सोवियत संघ में की गई।
नए संविधान में प्रतिनिधि सरकार की स्थापना की गई, परंतु केंद्र को सर्वशक्तिशाली बनाया गया। 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी स्त्री-पुरुष नागरिकों को मताधिकार प्रदान किया गया। नागरिक उन्हें ही माना गया जो उत्पादक श्रम द्वारा अपनी जीविका चलाते थे। इस प्रकार, काम करने के अधिकार को संवैधानिक आधार दिया गया। सैनिकों एवं नाविकों को भी नागरिकता दी गई, परंतु जमींदारों, पादरियों और पूँजीपतियों को नागरिकता से वंचित कर दिया गया। नागरिक बोल्शेविक पार्टी द्वारा मनोनीत सदस्यों के पक्ष में ही मतदान कर सकते थे। स्थानीय स्तर पर सभी जगह सोवियत का गठन किया गया। ये सोवियतें अपना प्रतिनिधि निर्वाचित कर राष्ट्रीय सोवियत की काँग्रेस में भेजती थीं जो विधायिका की सर्वोच्च संस्था थी। सोवियतों
की राष्ट्रीय काँग्रेस को ही केंद्रीय कार्यपालिका के गठन का अधिकार दिया गया। कार्यपालिका के सदस्य पीपुल्स कमीशार का चुनाव करते थे तथा देश का शासन चलाते थे। लेनिन को पीपुल्स कमीशार (मंत्रिमंडल) का प्रधान बनाया गया। इस प्रकार, नए संविधान में सत्ता निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में सौंप दी गई तथा राजतंत्रात्मक व्यवस्था समाप्त कर दी गई।

नई आर्थिक नीति

(New Economic Policy, NEP)

लेनिन ने 1921 में एक नई आर्थिक नीति (New Economic Policy, NEP) लागू की। इसके अनुसार, सीमित रूप से किसानों
और पूँजीपतियों को व्यक्तिगत संपत्ति रखने की अनुमति दी गई। यह नीति कारगर हुई। खेती की पैदावार बढ़ी तथा उद्योग-धंधों में भी उत्पादन बढ़ा। इससे सोवियत संघ समृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ा।
नई आर्थिक नीति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-
(i) किसानों से अनाज की जबरन उगाही बंद कर दी गई। अनाज के बदले उन्हें निश्चित कर देने को कहा गया।
शेष अनाज का उपयोग किसान अपनी इच्छानुसार कर सकते थे।
(ii) सैद्धांतिक रूप से जमीन पर राज्य का अधिकार मानते हुए भी व्यावहारिक रूप से किसानों को जमीन का
स्वामित्व दिया गया।
(iii) जिन उद्योगों में कामगारों की संख्या बीस से अधिक नहीं थी वैसे उद्योगों को व्यक्तिगत स्वामित्व में चलाने का
अधिकार दिया गया।
(iv) उद्योगों का विकेंद्रीकरण कर उन्हें कार्यान्वयन और निर्णय-संबंधी अधिकार प्रदान किए गए।
(v) औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने के लिए सीमित और निश्चित शर्तों पर विदेशी पूँजी निवेश की अनुमति दी गई।
(vi) राज्य ने जीवन एवं व्यक्तिगत संपत्ति की सुरक्षा के लिए राजकीय बीमा एजेंसियाँ स्थापित की।
(vii) विभिन्न स्तरों पर बैंक खोलकर बैंकिंग व्यवस्था का प्रसार किया गया।
(viii) कामगारों के लिए ट्रेड यूनियनों की अनिवार्य सदस्यता समाप्त कर दी गई। यद्यपि लेनिन ने अपनी नई आर्थिक नीति में साम्यवादी आदर्शों और सिद्धांतों से कुछ समझौता किया, जैसे-व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा को स्वीकार करना, किसानों को भू-स्वामित्व देना, परंतु यह तत्कालीन परिस्थितियों की माँग थी।
ऐसा उसने राष्ट्रहित में किया। स्वयं लेनिन ने अपनी नीति के आलोचकों को जवाब देते हुए कहा कि तीन कदम आगे बढ़कर एक कदम पीछे हटना-फिर भी दो कदम आगे रहने के समान है। लेनिन की आर्थिक नीति से सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ।

विदेश नीति

आंतरिक सुधारों के अतिरिक्त लेनिन ने बाह्य समस्याओं की ओर भी ध्यान दिया एवं महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए।
गुप्त संधियों की समाप्ति-लेनिन ने जार अथवा केरेन्सकी सरकार द्वारा विदेशों के साथ की गई सभी संधियों को समाप्त कर दिया।
राष्ट्रीयता का सिद्धांत-लेनिन ने सोवियत संघ में राष्ट्रीयता का सिद्धांत लागू किया। इसके अनुसार, सोवियत संघ में रहनेवाली
सभी पराधीन जातियों को स्वतंत्र कर उन्हें स्वायत्तता दी गई। फलस्वरूप, फिनलैंड, बेटेविया इत्यादि राज्यों ने अपनी स्वतंत्र
सत्ता स्थापित की।
साम्राज्यवाद-विरोधी नीति-लेनिन साम्राज्यवाद का कट्टर विरोधी था। इसलिए, उसने वैसे सभी राष्ट्रों को सहायता का आश्वासन दिया जो विदेशी शासन के विरुद्ध संघा थे। इसके बावजूद उसने अन्य राष्ट्रों के साथ शांति एवं सहयोग की नीति अपनाई। 1921 में उसने इंगलैंड के साथ एक व्यापारिक संधि की। पूर्वी देशों-चीन, अफगानिस्तान के साथ लेनिन ने सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए।
कौमिन्टन (Comintern) की स्थापना-लेनिन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य था 1919 में मास्को में थर्ड इंटरनेशनल (Third
International) की स्थापना करना। मार्क्सवाद का प्रचार करने एवं विश्व के सभी मजदूरों को संगठित करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों के साम्यवादी दलों के प्रतिनिधि मास्को में एकत्रित हुए। सभी देशों की साम्यवादी पार्टियों का एक संघ बनाया गया जो कोमिन्टर्न कहलाया। इसका मुख्य कार्य विश्व में क्रांति का प्रचार करना एवं साम्यवादियों की सहायता करना था। कौमिन्टन का नेतृत्व सोवियत संघ के साम्यवादी दल के पास रहा। लेनिन के इस कार्य से पूँजीवादी देशों में बेचैनी फैल गई। सोवियत संघ से मधुर संबंध बनाने को वे बाध्य हो गए। 1924 तक इटली, जर्मनी, इंगलैंड ने सोवियत संघ की बोल्शेविक सरकार को मान्यता प्रदान कर दी।
इस प्रकार, लेनिन ने सोवियत संघ का कायापलट कर दिया। सोवियत संघ अब प्रगति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ा। द्वितीय
विश्वयुद्ध की समाप्ति तक सोवियत संघ साम्यवादी गुट का नेता और विश्व की महान शक्ति बन गया, तथापि लेनिन की आलोचना इस बात के लिए की जाती है कि उसने अपनी नीतियों के कार्यान्वयन में असहिष्णुता की नीति अपनाई। साम्यवादी विचारधारा का विरोध करनेवालों अथवा पार्टी में गुटबाजी करनेवालों को कठोर दंड दिए गए। अनेकों को मार डाला गया, पार्टी से निकाल दिया गया, पार्टी की विचारधारा का समर्थन करने को विवश किया गया अथवा देश से निष्कासित कर दिया गया। इस प्रकार, उस सर्वाधिकारवादी शासन की प्रक्रिया आरंभ हुई जो उसके उत्तराधिकारी स्टालिन के समय में अधिक बलवती हुई।

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