लेनिन के बाद सोवियत संघ

लेनिन के बाद सोवियत संघ

लेनिन के बाद सोवियत संघ

जॉसेफ स्टालिन के अधीन सोवियत संघ-लेनिन की मृत्यु के बाद भी सोवियत संघ प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता रहा। आर्थिक विकास के लिए सतत प्रयास किए गए। लेनिन के बाद सत्ता स्टालिन (1879-1953) के हाथों में आई। स्टालिन का अर्थ है स्टील का आदमी (man of steel)यानी फौलादी पुरुष। स्टालिन के समय अनेक आर्थिक एवं अन्य समस्याएँ विद्यमान थीं। अत:, सुनियोजित आर्थिक विकास के लिए 1928 में प्रथम पंचवर्षीय योजना लागू की गई। तीन पंचवर्षीय योजनाओं से औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई और अर्थव्यवस्था में सुधार आया। तेल, कोयला और स्टील उद्योग में बढ़ोतरी हुई। अनेक औद्योगिक नगर अस्तित्व में आए। कृषि का आधुनिकीकरण हुआ। साथ ही, वैज्ञानिक प्रगति भी हुई। सरकार ने श्रमिकों की स्थिति में सुधार लाने के लिए भी कुछ प्रयास किए। श्रमिकों और किसानों की शिक्षा के लिए स्कूलों की व्यवस्था की गई।
यह व्यवस्था भी की गई कि वे विश्वविद्यालयों में प्रवेश पा सकें। कामकाजी महिला श्रमिकों के बच्चों की देखभाल की व्यवस्था की गई। श्रमिकों के लिए आवास एवं चिकित्सा की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई।
सामूहिक कृषि की विफलता-इसके बावजूद नियोजित अर्थव्यवस्था के आरंभिक चरण में सामूहिक कृषि का प्रयोग सफल
नहीं हो सका। अतः, स्टालिन ने राज्य-नियंत्रित कृषि फार्म स्थापित करने की योजना बनाई। इनका आधुनिक रूप से विकास किया जाना था। 1929 से किसानों को सामूहिक कृषि फार्म (कोलखोज) में खेती करने को बाध्य किया गया। इससे होनेवाली आय को किसानों में वितरण करने की व्यवस्था की गई। अनेक किसानों ने इस नई व्यवस्था का विरोध किया, परंतु स्टालिन की सरकार ने ऐसे लोगों के विरुद्ध कड़ी नीति अपनाई। अनेकों को देश से निर्वासित कर दिया गया। स्टालिन की नियोजित अर्थव्यवस्था और सामूहिक कृषि की नीति की आलोचना पार्टी के अंदर कुछ लोगों ने की। इन्हें समाजवाद के विरुद्ध षड्यंत्रकारी मानकर कठोर दंड दिया गया। स्टालिन के विरोधी नेताओं को समाप्त कर दिया गया। ट्रॉटस्की को सोवियत
संघ छोड़ना पड़ा। लोकतंत्र, भाषण और प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कला और साहित्य के विकास पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
स्टालिन ने सर्वाधिकारवाद की जो नीति अपनाई उसमें मार्क्सवाद और क्रांति के आदर्शों की घोर उपेक्षा की गई। स्टालिन वस्तुत: एक तानाशाह बन गया यद्यपि उसने सोवियत संघ को एक महान शक्ति बना दिया। सोवियत संघ साम्यवादी गुट का अगुआ बन गया। स्टालिन के प्रयासों से सोवियत संघ एक शक्तिशाली देश के रूप में विश्व मानचित्र पर सामने आया। कृषि, उद्योग एवं विज्ञान का विकास हुआ। सोवियत संघ की गणना ब्रिटेन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों में होने लगी। युद्ध सम्मेलनों में अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल के साथ स्टालिन भी भाग लेने लगा। इससे सोवियत संघ की शक्ति और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। इस प्रकार, स्टालिन ने कठोर नीति का अनुसरण कर सोवियत संघ में सर्वाधिकारवाद की
स्थापना की।
साम्यवादी व्यवस्था का प्रभाव-बोल्शेविकों द्वारा जिस प्रकार सत्ता ग्रहण की गई और इसे बनाए रखा गया उसे यूरोप के अनेक समाजवादियों ने स्वीकार नहीं किया, तथापि पहली बार श्रमिक राज्य की स्थापना का प्रभाव विश्व के अनेक भागों पर पड़ा। अनेक देशों में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की गई। ताशकंद में 1920 में हिंदुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। इसके सदस्य सोवियत संघ से संपर्क बनाए हुए थे। जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर और अन्य अनेक भारतीयों ने सोवियत समाजवाद पर लेख और पुस्तकें लिखीं। औपनिवेशिक राज्यों पर रूसी क्रांति का गहरा प्रभाव पड़ा। द्वितीय विश्वयुद्ध तक सोवियत संघ ने समाजवाद को विश्वव्यापी आदर्श बना दिया। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से सोवियत साम्यवाद की आलोचना होने लगी। यद्यपि साम्यवादी व्यवस्था में सोवियत संघ ने अप्रत्याशित प्रगति की, परंतु इसने नागरिक अधिकारों का
हनन किया और सत्ता में बने रहने के लिए दमनात्मक नीति अपनाई। फलस्वरूप, सोवियत संघ का ही विघटन हो गया।
सोवियत संघ का विघटन-स्टालिन का सर्वाधिकारवाद मार्च 1953 तक बना रहा। इसी वर्ष उसकी मृत्यु हुई। इसके बाद निकिता खुश्चेव 1964 तक सत्ता में बने रहे। उन्होंने स्टालिनीकरण की नीति को त्यागकर उदारवादी नीति बनाई। उनके उत्तराधिकारी लिओनिड ब्रेझनेव ने पुन: स्टालिन की नीतियों का अनुसरण किया जिसकी प्रतिक्रिया होनी आरंभ हो गई। 1985 में मिखाइल गोर्बाचेव पार्टी के महासचिव चुने गए। खुश्चेव के समान वे भी उदारवादी थे। उन्होंने ग्लासनोस्त (खुलापन) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्रचना) की नीतियाँ अपनाईं। उनकी इन नीतियों ने सोवियत संघ के लिए अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर दीं। सोवियत संघ में सत्ता- संघर्ष आरंभ हो गया, गणराज्यों में स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो गए। वे एक-एक कर स्वतंत्र होने लगे। गोर्बाचेव को पार्टी के महासचिव के पद से हटाकर बोरिस येल्तसिन ने सत्ता पर अधिकार कर लिया और रूस की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। फलतः, दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया।

स्मरणीय

⊕ समाजवाद का उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक समानता की स्थापना का प्रयास-18वीं-19वीं शताब्दियों में समाजवादी विचारधारा का प्रसार- -महत्त्वपूर्ण समाजवादी चिंतक रॉबर्ट ओवेन, सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिए- कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने साम्यवादी दर्शन दिया-दोनों ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो प्रकाशित किया—मार्क्स ने दास कैपिटल लिखा- उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या की उनके अनुसार इतिहास वर्गसंघर्ष का इतिहास -ऐतिहासिक प्रक्रिया के अंत में वर्गविहीन समाज की स्थापना -राज्य विलुप्त हो जाएगा।
⊕ रूस में दो क्रांतियाँ हुई–(i) 1905 में; इससे जारशाही का अंत नहीं हुआ। (ii) 1917 में दो क्रांतियाँ हुई— (क) फरवरी क्रांति-इसके परिणामस्वरूप जारशाही का अंत हुआ। (ख) अक्टूबर क्रांति अथवा बोल्शेविक क्रांति-इसके परिणामस्वरूप सत्ता बोल्शेविकों के हाथों में आई।
⊕ 1917 की बोल्शेविक क्रांति (अक्टूबर क्रांति) के कारण-राजनीतिक कारण-(i) निरंकुश एवं अत्याचारी शासन (ii) रूसीकरण की नीति (iii) राजनीतिक दलों का उदय (iv) नागरिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव (v) रूस की राजनीतिक प्रतिष्ठा में कमी (vi) 1905 की क्रांति का प्रभाव (vii) प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की पराजय (viii) जार निकोलस द्वितीय और जारीना की भूमिका; सामाजिक कारण-(i) किसानों की स्थिति (ii) किसानों का विद्रोह (iii) मजदूरो की स्थिति (iv) सुधार आदोलन; आर्थिक कारण-(i) दुर्बल आर्थिक स्थिति (ii) औद्योगिकीकरण की समस्या; धार्मिक कारण धार्मिक स्वतंत्रता की कमी, वौद्धिक कारण-रूस में बौद्धिक जागरण
⊕ लेनिन और रूस का नवनिर्माण-लेनिन का जन्म 22 अप्रैल 1870 को-मृत्यु 21 जनवरी 1924 में
⊕ लेनिन के कार्य-आंतरिक व्यवस्था-(i) युद्ध की समाप्ति (ii) प्रतिक्रांति का दमन (iii) आर्थिक व्यवस्था (iv) सामाजिक सुधार (v) प्रशासनिक सुधार (vi) नए संविधान का निर्माण
⊕ नई आर्थिक नीति-सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए 1921 में इसे लागू किया गया। इससे सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ।
⊕ लेनिन की विदेश नीति- (i)गुप्त संधियों की समाप्ति (ii) राष्ट्रीयता का सिद्धांत (iii) साम्राज्यवाद-1 द-विरोधी नीति (iv) कौमिन्टन की स्थापना
⊕ बोल्शेविक क्रांति का महत्त्व-विश्व की प्रथम सर्वहारा वर्ग की क्रांति-प्रथम साम्यवादी सरकार की स्थापना
⊕ क्रांति के परिणाम-सोवियत संघ पर प्रभाव-(i) स्वेच्छाचारी जारशाही का अंत (ii) सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना (iii) नई प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना (iv) नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था (v) धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना (vi) रूसीकरण की नीति का परित्याग
⊕ क्रांति का विश्व पर प्रभाव-(i) पूँजीवादी राष्ट्रों में आर्थिक सुधार के प्रयास (ii) सर्वहारा वर्ग के सम्मान में वृद्धि (iii) साम्यवादी सरकारों की स्थापना (iv) अंतरराष्ट्रवाद को प्रोत्साहन (v) साम्राज्यवाद के पतन की प्रक्रिया तीव्र (vi) नया शक्ति-संतुलन
⊕ लेनिन के बाद सोवियत संघ-स्टालिन ने सोवियत संघ की आर्थिक प्रगति के लिए प्रयास किए, साथ ही उसने सर्वाधिकारवाद की स्थापना भी की।
⊕ खुश्चेव और गोर्वाचव की नीतियाँ-गोर्बाचेव के ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोहका की नीतियों का सोवियत संघ पर प्रतिकूल
प्रभाव- -दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन

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