समाज निर्माण में लैंगिक मुद्दे

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समाज निर्माण में लैंगिक मुद्दे

समाज निर्माण में लैंगिक मुद्दे

                       Gender Issues in Social Construct
पिछले वर्षों में हुई CTET परीक्षा के प्रश्न-पत्रों का विश्लेषण
करने से हमें यह ज्ञात होता है कि इस अध्याय से वर्ष 2012 में
3 प्रश्न, 2013 में 1 प्रश्न 2014 में 2 प्रश्न, 2015 में 2 प्रश्न
तथा वर्ष 2016 में 2 प्रश्न पूछे गए हैं।
9.1 लैंगिक मुद्दे
लैंगिक (Gender) असमानता का आधार स्त्री और पुरुष की जैविक बनावट
ही नहीं, बल्कि इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और स्वीकृत
सामाजिक मान्यताएँ है।
लड़के और लड़कियों के पालन-पोषण के क्रम में यह मान्यता उनके मन में
बैठा दी जाती है कि महिलाओं की मुख्य जिम्मेदारी गृहस्थी चलाने और
बच्चों का पालन-पोषण करने की है। यह तथ्य अधिकतर परिवारों के श्रम
के लैंगिक विभाजन से झलकता है।
महिलाएं घरेलू कार्य करती है; जैसे― भोजन बनाना, सफाई करना, कपड़े
धोना आदि, जबकि पुरुष घर के बाहर का काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि
पुरुष ये सारे काम नहीं कर सकते। दरअसल वे सोचते हैं कि ऐसे कामों
को करना महिलाओं की जिम्मेदारी है।
9.1.1 लिंग के आधार पर श्रम का विभाजन
• यह कार्य के बँटवारे का वह तरीका है, जिसमें घर के अन्दर के सारे
काम परिवार की औरतें करती हैं या अपनी देख-रेख में घरेलू
नौकरों/नौकरानियों से कराती है।
• श्रम के इस तरह के विभाजन का परिणाम यह हुआ है कि औरत तो घर
की चारदीवारी के अन्दर सिमट कर रह गई है और बाहर का सार्वजनिक
जीवन पुरुषों के कब्जे में आ गया है। मनुष्य जाति की आबादी में
महिलाओं का हिस्सा आधा है पर सार्वजनिक जीवन में खासकर राजनीति
में उनकी भूमिका नगण्य ही है।
• पहले महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से सम्बन्धित बहुत-से अधिकार प्राप्त
नहीं थे। दुनिया के अलग-अलग भागों में महिलाओं ने अपने संगठन बनाए
और बराबरी के अधिकार हासिल करने के लिए आन्दोलन किए। विभिन्न
देशो में महिलाओं को मतदान का अधिकार प्रदान करने के लिए आन्दोलन
हुए। इन आन्दोलनों में महिलाओं के राजनीतिक और वैधानिक दर्जे को
ऊंचा उठाने और उनके लिए शिक्षा तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने की माँग
की गई।
• मूल बदलाव की मांग करने वाले महिला आन्दोलनों ने महिलाओं के
व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग उठाई। इन
आन्दोलनों को नारीवादी आन्दोलन कहा जाता है।
• लैगिक विभाजन की राजनीतिक अभिव्यक्ति और इस सवाल पर राजनीतिक
गोलबन्दी ने सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भूमिका को बढ़ाने में मदद
की। आज हम वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबन्धक, कॉलेज और
विश्वविद्यालयी शिक्षक जैसे पेशों में बहुत-सी महिलाओं को पाते हैं, जबकि
पहले इन कामों को महिलाओं के लायक नहीं माना जाता था। दुनिया के
कुछ हिस्सों; जैसे- स्वीडन, नावें और फिनलैण्ड जैसे स्कैडिनेवियाई देशों
सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का स्तर काफी ऊँचा है।
• हमारे देश में आजादी के बाद से महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ
है पर वे अभी भी पुरुषों से काफी पीछे हैं। हमारा समाज अभी भी
पितृ-प्रधान है। महिलाओं के साथ अभी भी कई तरह के भेदभाव एवं उनका
शोषण होता है।
• महिलाओ में साक्षरता की दर अभी भी मात्र 65% है, जबकि पुरुषों में
82%। इसी प्रकार स्कूल पास करने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या
ही उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ा पाती है।
• जब हम स्कूली परीक्षाओं के परिणाम पर गौर करते है तो देखते हैं कि कई
जगह लड़कियों ने बाजी मार ली है और कई जगहों पर उनका प्रदर्शन
लड़को से बेहतर नहीं तो कमतर भी नहीं है, लेकिन आगे की पढ़ाई के
दरवाजे उनके लिए बन्द हो जाते है, क्योकि माता-पिता अपने संसाधनों को
लड़के-लड़की दोनों पर बराबर खर्च करने की जगह लड़को पर ज्यादा
खर्च करना पसन्द करते हैं।
• समान मजदूरी से सम्बन्धित अधिनियम में कहा गया है कि समान काम के
लिए समान मजदूरी दी जाएगी, किन्तु काम के प्रत्येक क्षेत्र में यानी
खेल-कूद की दुनिया से लेकर सिनेमा के संसार तक और कल-कारखानों
से लेकर खेत-खलिहान तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी
मिलती है, भले हो दोनों ने समान काम किया हो।
• भारत के अनेक हिस्सों में आज भी माता-पिता को लड़के की चाह होती है।
लड़की को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देने के तरीके इसी मानसिकता
से पनपते हैं।
9.1.2 पूर्वाग्रह और रूढ़िवाद के कारण लैंगिक भेदभाव
• सामान्यतः पूर्वाग्रह एवं रूदिबद्धता के कारण लैंगिक भेदभाव दिखाई
पड़ता है।
• जब किसी व्यक्ति, जाति, वर्ग या वस्तु के बारे में कोई ऐसी धारणा बन
जाती है, जो वास्तविकता से परे हो, उन्हें रूदिबद्ध धारणाएँ कहते है।
उदाहरणस्वरूप भारत में अधिकतर घरों में लड़कियाँ घरेलू कार्य करती है।
इसी के आधार पर कोई व्यक्ति सभी लड़कियों से यही अपेक्षा करे कि
लड़कियों केवल घर का कार्य करने के लिए ही बनी है, तो इस प्रकार की
धारणा को रूदिबद्ध धारणा कहा जाता है।
• यदि कोई शिक्षक विद्यालय में आए अतिथि की खान-पान सम्बन्धी सेवा के
लिए विद्यालय की लड़कियों को ही नियुक्त करना चाहता है, तो यह उस
शिक्षक की रूढ़िवद्ध धारणा को दर्शाता है।
• पूर्वाग्रह का सम्बन्ध पक्षपात से है। इसमें पूर्व के विचारों के आधार पर
किसी से भेदभाव किया जाता है। सामान्यत: हमारे समाज में लैगिक भेदभाव
का कारण पूर्वाग्रह भी है। उदाहरण के लिए ‘लड़के, लड़कियों से अधिक
बुद्धिमान होते हैं, यह लैंगिक पूर्वाग्रह का उदाहरण है। लैंगिक पूर्वाग्रह के
कारण ही समाज में यह मान्यता प्रचलित है कि लड़के ही वृद्धावस्था में
माँ-बाप का सहारा होते हैं।
• विद्यालय की गायन एवं नृत्य प्रतियोगिता के लिए विद्यार्थियों को तैयार
करते समय लड़कियों को वरीयता देना भी लैंगिक पूर्वाग्रह का उदाहरण
है।
• लड़कियों को खेलने से वंचित करना भी लैगिक पूर्वाग्रह का उदाहरण है।
इसके पीछे यह धारणा है कि लड़कियों का शरीर खेल-कूद के लिए
उपयुक्त नहीं होता, जो पूर्णत: गलत है।
• यह कहना कि लड़कियों को घरेलू कार्य के ज्ञान पर अधिक जोर देना
चाहिए, क्योंकि अन्तत: उन्हें गृहस्थी ही संभालनी है। इस प्रकार की धारणा
रूढ़िवद्धता को प्रदर्शित करती है।
• सामान्यत: यह माना जाता है कि स्त्रियों में स्मृति कौशल अपेक्षाकृत अधिक
होता है, जबकि पुरुषो में गत्यात्मक योग्यता अधिक होती है, किन्तु यह प्रत्येक
स्थिति के लिए सत्य नहीं है।
• स्त्रियाँ भी गत्यात्मक योग्यता में पुरुषों के समान अथवा अधिक एवं पुरुष
भी स्मृति कौशल के मामले में स्त्रियों के समान या अधिक हो सकते हैं,
जैसा कि हम सामान्यत: देखते हैं।
• इसलिए शिक्षकों को इस प्रकार की जानकारी होनी चाहिए ताकि किसी के
व्यक्तित्व के बारे में उसकी धारणा लैगिक पूर्वाग्रह या रूढ़िवद्धता से
प्रभावित न हो।
9.1.3 विद्यालय में लैंगिक भेदभाव
विद्यालय में भी लैंगिक भेदभाव (Gender Differentiation in School)
दिखाई पड़ता है, जोकि शिक्षकों के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण को दर्शाता है।
इस प्रकार का पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण संविधान के मानवीय एवं नैतिक
दृष्टिकोण से भी पूर्णत: गलत है।
• विद्यालय में लैगिक भेदभाव न हो इसके लिए यह आवश्यक है कि शिक्षको
को लिंग-पक्षपातपूर्ण व्यवहारों का अधिसंज्ञान हो अर्थात् उन्हे लिंग-भेद से
सम्बन्धित विभिन्न पूर्वाग्रहों एवं रूढ़िवद्धता का ज्ञान हो, तभी वे इस प्रकार
के व्यवहार को हतोत्साहित कर सकते है। शिक्षकों को रूढ़िबद्ध धारणाओं
से बचना चाहिए एवं लड़कों व लड़कियों से समान व्यवहार करना चाहिए।
• शिक्षकों को लैंगिक पूर्वाग्रह एवं रूढ़िबद्धता से ऊपर उठकर सभी छात्र एवं
छात्राओं को पढ़ाई, खेल-कूद, विद्यालय समारोह आदि में समान अवसर
उपलब्ध कराना चाहिए।
• समाज से लैंगिक पूर्वाग्रह एवं रूढिबद्धता को समाप्त करने के लिए शिक्षकों
का यह दायित्व है कि वह उदाहरण देकर छात्र-छात्राओं को यह समझाएँ
कि लड़कियाँ भी घर के बाहर का कार्य करती हैं, जैसे कि आजकल
लड़कियाँ सेना, खेल-कूद, जैसे क्षेत्रों में भी अच्छे प्रदर्शन कर रही है। इसी
प्रकार घरेलू कार्य में लड़कों को भी सहयोग करना चाहिए। इस प्रकार के
विचारों के प्रसार में शुरुआत में थोड़ी कठिनाई अवश्य हो सकती है, किन्तु
इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
• समाज से लैगिक पूर्वाग्रह एवं रूढ़िवद्धता को समाप्त करने के लिए
विद्यालय परिसर में लगे बुलेटिन-बोर्डों में पुरुषों को घर का काम करते
हुए एवं बच्चों की देखभाल करते हुए चित्र तथा स्त्रियों को घर के, बाहर
के काम जैसे- मोटरसाइकिल एवं ट्रेन चलाते हुए तथा ऑफिस के कार्य
सँभालते हुए चित्र दर्शाना चाहिए।
• कई बार यह देखने को मिलता है कि कोई लड़का नृत्य-संगीत अथवा
फैशन में अधिक रुचि लेता है, किन्तु उसके शिक्षक एवं अभिभावक उसे
ऐसे करियर से दूर रहकर अभियान्त्रिकी (Engineering) पढ़ने की
सलाह देते हैं, क्योंकि उनका मानना होता है कि नृत्य-संगीत अथवा
फैशन जैसे क्षेत्र लड़कियों के लिए उचित है।
• यदि रुचि एवं उत्साह को नजरअन्दाज कर किसी बालक को अन्य
करियर अपनाने की सलाह दी जाती है तो इसका प्रतिकूल प्रभाव उसकी
सफलता पर पड़ता है एवं उसके असफल होने की सम्भावना अधिक
होती है।
• कई बार यह भी देखने को मिलता है कि लड़कियों को जीवविज्ञान या
गृहविज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाने की सलाह दी जाती है, भले ही
उसकी रुचि भौतिकशास्त्र एवं गणित में क्यों न हो। इस प्रकार का
निर्देशन एवं परामर्श पूर्णत: गलत है। कल्पना चावला एवं सुनीता
विलियम्स ने इस बात का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है कि गणित,
भौतिकशास्त्र एवं अभियान्त्रिकी में लड़कियाँ भी बेहतर प्रदर्शन कर
सकती है।
• अध्यापकों को एक ऐसा वातावरण स्थापित करना चाहिए, जिससे कि
कक्षा (class) में दोनों वर्गों को समान रखा जाए।
• लिंग के आधार पर प्रोत्साहित करने के लिए बालिकाओं के लिए भारत
सरकार एवं राज्य सरकारों ने कई योजनाएं चला रखी है उदाहरण
स्वरूप-बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, लाड़ली योजना, सुकन्या समृद्धि
योजना, मुख्यमन्त्री बालिका साइकिल योजना, बालिका पोशाक योजना
इत्यादि।
9.1.4 लैंगिक भेदभाव उत्पन्न करने वाले कारक
लैंगिक आधार पर भेदभाव की समस्या प्राचीन काल से ही चली आ रही है,
जोकि आधुनिक काल में भी विद्यमान है। मनोवैज्ञानिकों ने लैंगिक भेदभाव
के निम्नलिखित कारक बताए हैं
1. धार्मिक कारक (Deligious Factor) समाज धर्म द्वारा स्थापित
प्राचीन मानदण्ड पर आधारित होता है। कुछ धर्मों में ऐसी मान्यता है
कि लड़कियों को घर से बाहर नहीं जाना चाहिए, इस कारण वे
शिक्षा से वंचित हो जाती है। संकीर्ण पारिवारिक एवं सामाजिक सोच
भी लड़कियों को शिक्षा से मीलों दूर रखती है।
2. आर्थिक कारक (Economic Factor) आर्थिक रूप से कमजोर
समाज/परिवार में लड़कों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है,
क्योकि वे आय के स्रोत होते हैं। ऐसे परिवेश में लड़कियों का
सर्वांगीण विकास अवरुद्ध हो जाता है।
3. स्त्रियों का निम्न स्तर (Low Level of Women) समाज में स्त्रियों
को निम्न दर्जा दिया जाता था तथा लैंगिक भेदभाव के कारण
परिवार एवं समाज द्वारा उनकी शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया
जाता था, परिणामस्वरूप स्त्रियों का मानसिक विकास अवरुद्ध हो
जाता था। इससे महिलाएं स्वयं को उपेक्षित महसूस करती थी तथा
विकास की मुख्य धारा में नहीं जुड पाती थी।
4. लड़कियों का कम आयु में विवाह (Marringe of Girls at Minor Ace) पहले लड़कियों का विवाह बहुत कम आयु में हो जाता था तथा उन्हें पढ़ाया नहीं जाता था, जबकि लड़कों को पढ़ाया जाता था, इससे लड़कियों का मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता था।
5. सांस्कृतिक कारक (Cultural Factor) प्राचीनकालीन समाज से प्रभावित व्यक्ति लड़कियों को पढ़ाने के पक्ष में नहीं होते है। यह आज भी भारत की कुछ जनजातियों एवं समाजों में देखने को मिलता है।
6. व्यक्तित्व कारक (Personality Factor) लड़के एवं लड़कियों का व्यक्तित्व अलग-अलग होता है। लड़कियों में संवेगात्मक विकास लड़कों की अपेक्षा अधिक होता है अर्थात् उनमें कोमलता, सहनशीलता का भाव पाया जाता है। दोनों का व्यक्तित्व अलग होने के कारण उनमें भेदभाव उत्पन्न होता है।
7. मनोवैज्ञानिक कारक (Psychology Factor) शिक्षा के प्रति कभी-कभी लड़कियों की मनोवैज्ञानिक धारणा संकीर्ण होती है। उनके मन में यह भाव होता है कि पढ़-लिख कर क्या करना है, आखिर तो घर का ही काम करना है।
                                          अभ्यास प्रश्न
1. छात्र एवं छात्राओं के बीच लैगिक प्रभावों
को कम करने के लिए उपयुक्त उपाय है
A. छात्राओं को छात्रों के समान अधिकार
देना।
B. छात्राओं को छात्रों के समान कार्य के
समान अवसर उपलब्ध कराना।
C. छात्राओं को छात्रों के समान शैक्षिक
योग्यता की समानता उपलब्ध कराना।
(1) केवल A
(2) केवल B
(3) केवल C
(4) ये सभी
2. विज्ञान के प्रयोगों में, सामान्यत: लड़के
उपकरणों का नियन्त्रण अपने हाथों में लेते
हैं और लड़कियों से आँकड़ों को रिकॉर्ड
करने अथवा बर्तनों को धोने के लिए कहते
हैं। यह प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि
(1) लड़कियों नाजुक होने के कारण ऐसे काम
करना पसन्द करती हैं जिनमें ऊर्जा की खपत
कम होती है।
(2) लड़कियाँ बेहतरीन अवलोकनकर्ता होती हैं और
बिना किसी गलती के आँकड़ों का रिकॉर्ड
रखती है।
(3) पुरुष और स्त्री की रूढिबद्ध भूमिकाएँ
विद्यालय में भी होती हैं।
(4) लड़के उपकरणों को ज्यादा कुशलता से
सैंभाल सकते हैं, क्योंकि वे इस प्रकार के
कार्यों को करने में प्राकृतिक रूप से सक्षम
होते हैं।
3. एक अच्छी पाठ्य-पुस्तक …….. से
बचाती है।
(1) लैंगिक समानता
(2) सामाजिक उत्तरदायित्व
(3) लैंगिक पूर्वाग्रह
(4) लैंगिक संदेनशीलता
4. “पुरुष, स्त्रियों की अपेक्षा ज्यादा बुद्धिमान
होते हैं।” यह कथन
(1) सही हो सकता है।
(2) लैंगिक पूर्वाग्रह को प्रदर्शित करता है।
(3) बुद्धि के भिन्न पक्षों के लिए सही है।
(4) सही है।
5. “स्त्रियों का हस्तलेख पुरुषों की अपेक्षा
अधिक अच्छा रहता है, जबकि पुरुष गणित
एवं तर्क योग्यता में अधिक योग्य होते हैं।”
यह कथन
(1) पूर्णतः सत्य है।
(2) लैंगिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है।
(3) प्रगतिशील चिन्तन को दर्शाता है।
(4) बौद्धिक योग्यता के सन्दर्भ में सत्य है।
6. “लड़कियों को घर के काम-काज में
अधिक ध्यान देने के लिए कहना’
को दर्शाता है।
(1) रूदिबद्धता
(2) प्रगतिशील चिन्तन
(3) मनोवैज्ञानिक चिन्तन
(4) मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति
7. छात्राओं से लैंगिक भेदभाव का प्रतिकूल
प्रभाव निम्नलिखित में से किस पर
पड़ता है?
A. उनके सामाजिक उत्थान पर
B. उनके सामाजिक दृष्टिकोण पर
C. उनके शैक्षणिक विकास पर
(1) केवल A
(2) केवल C
(3) केवल B
(4) ये सभी
8. आप एक शिक्षक होने के नाते अपनी कक्षा
की छात्राओं का शिक्षण कैसे करेंगे?
(1) कक्षा के छात्रों से अलग कर उन्हें घर के
काम-धन्धों की जानकारी देना
(2) छात्रों को सिलाई-बुनाई के कामों में अधिक
रुचि लेने की सलाह देना
(3) सभी छात्र व छात्राओं की समान रूप से
शिक्षण व्यवस्था करना।
(4) छात्राओं पर अवांछित टिप्पणी करके जिससे
कि वे स्वयं को विशिष्ट न समझें
9. एक अध्यापक को अपनी कक्षा में
को नकारना चाहिए।
(1) छात्र-छात्राओं के पठन सम्बन्धी विकारों को
(2) छात्र-छात्राओं के मध्य लैंगिक भेदभाव को
(3) छात्र-छात्राओं के व्यवहार सम्बन्धी विकारों को
(4) छात्र-छात्राओं के झगड़ों से सम्बन्धित
मुद्दों को
10. लैंगिक भेदभाव को दूर करने के लिए
शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक उपाय है
(1) छात्र-छात्राओं के लिए असमान प्रावधान
(2) छात्र-छात्राओं के लिए समान प्रावधान
(3) छात्र-छात्राओं के लिए विशिष्ट प्रावधान
(4) उपरोक्त में से कोई नहीं
11. छात्राओं के निजी संसार पर निम्नलिखित में
से किसका प्रभाव पड़ता है?
A.लैंगिक भेदभाव का
B. सामाजिक मान्यताओं का
C. परिवार में उनके स्थान का
(1) केवल A
(2) केवल B
(3) Bऔर C
(4) ये सभी
12. विद्यालय में लैंगिक भेदभाव के कारण
छात्राओं की मनोदशा पर पड़ने वाला
प्रभाव है
(1) वे विद्यालय में प्रसन्न रहती हैं।
(2) वे विद्यालय जाने से कतराती हैं।
(3) पढ़ाई से उन्हें विरक्ति होने लगती है।
(4) उनका शैक्षिक विकास बेहतर होता है।
13. “भारत की 2011 की जनगणना में लिंग
अनुपात 2001 की जनगणना के अनुसार
927 से घटकर 914 ही रह गया है।”
इसका सर्वाधिक प्रमुख कारण निम्नलिखित
में से क्या हो सकता है?
(1) लैंगिक भेदभाव
(2) स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देना
(3) स्त्री-शिक्षा में कमी
(4) स्त्रियों का खराब स्वास्थ्य
14. निम्नलिखित में से कौन-सा कारक लैंगिक
भेदभाव उत्पन्न करता है?
A.सामाजिक कारक
B. सांस्कृतिक कारक
C. आर्थिक कारक
D. मनोवैज्ञानिक कारक
(1) A और B
(2) Bऔर D
(3) C और A
(4) A,B,C और D
15. लैंगिक भेदभाव को करने में एक
शिक्षक की भूमिका हो सकती है
(1) वह लैंगिक मुद्दों से सम्बन्धित रूदिबद्ध
धारणाओं को हतोत्साहित करे
(2) वह लड़कों को कठिन कार्यों एवं लड़कियों को
सरल कार्य में लगाए
(3) वह लड़कों को समझाए कि उन्हें घरेलू कार्यों
में संलग्न नहीं होना चाहिए, क्योंकि घरेलू
कार्य लड़कियों के लिए उपयुक्त होते हैं।
(4) उसे लड़कों को खेल-कूद में रुचि रखने एवं
लड़कियों को सिलाई-बुनाई का काम सीखने के
लिए प्रेरित करना चाहिए।
16. एक विद्यालय में किसी अतिथि का आगमन
होने वाला है। दसवीं कक्षा की एक लड़की
विद्यालय में आए अतिथि का स्वागत करने
की इच्छुक नहीं है, जबकि उसी लड़की की
कक्षा में पढ़ने वाला एक अन्य लड़का
विद्यालय में आने वाले उस अतिथि का
स्वागत करने का इच्छुक है। किन्तु
आयोजक विद्यालय में आने वाले उस
अतिथि को माला पहनाने एवं उनकी
आरती उतारने के लिए उस लड़की का
चयन करता है, क्योंकि वह अत्यन्त सुन्दर
एवं सुशील है। इस चयन में वह लड़के की
रुचि एवं उत्साह की अवहेलना करता है।
इस प्रकार का चयन
(1) सही है, क्योंकि सामान्यतः विद्यालय में आए
अतिथि के स्वागत के लिए सुन्दर लड़कियों के
चयन का प्रचलन है
(2) सही है, क्योंकि लड़कों को सामान्यतः इस
प्रकार के कार्यों में नहीं लगाया जाता
(3) सही नहीं है और यह लैंगिक रुदिबद्धता को
दर्शाता है
(4) सही नहीं है, क्योंकि इससे लड़का एवं लड़की
दोनों नाराज होते हैं
                                 विगत वर्षों में पूछे गए प्रश्न
17. राज्य स्तर की एक एकल-गायन प्रतियोगिता
के लिए विद्यार्थियों को तैयार करते समय
एक विद्यालय लड़कियों को वरीयता देता
है। यह दर्शाता है                [CTET Jan 2012]]
(1) लैंगिक पूर्वाग्रह
(2) वैश्विक प्रवृत्तियों
(3) प्रयोजनात्मक उपागम
(4) प्रगतिशील चिन्तन
18. विद्यालय में लिंग-भेदभाव से बचने का
सर्वोत्तम तरीका हो सकता है.      [CTET Nov 2012]
(1) पुरुष एवं महिला शिक्षकों को समान संख्या में
भर्ती करना
(2) विद्यालय में लिंग-भेदभाव को दूर करने के
लिए नियम बनाना और कड़ाई से उसका
पालन करवाना
(3) संगीत प्रतियोगिता के लिए लड़कियों की अपेक्षा
अधिक लड़कों का चयन करना
(4) शिक्षकों द्वारा उनके लिंग-पक्षपातपूर्ण व्यवहारों
का अधिसंज्ञान
19. मोनिका, जो गणित की शिक्षिका है, राधिका
से एक प्रश्न पूछती है। राधिका से कोई
उत्तर न मिलने पर वह तुरन्त मोहन से
दूसरा प्रश्न पूछती है। जब उसे महसूस
होता है कि मोहन उत्तर बताने में संघर्ष कर
रहा है तो वह अपने प्रश्न के शब्दों को
बदलती है। मोनिका की यह प्रवृत्ति यह
प्रदर्शित करती है कि वह          [CTET Nov 2012]
(1) अपने सवाल के प्रति थोड़ा घबरा गई है
(2) मोहन का पक्ष लेकर लिंग भूमिकाओं में
रूदिबद्धता को बढ़ावा दे रही है
(3) राधिका को किसी उलझनपूर्ण स्थिति में नहीं
डालना चाह रही
(4) इस तथ्य से पूर्णतः परिचित है कि राधिका
सवालों के जवाब देने के योग्य नहीं है
20. कक्षा में जेण्डर रूढ़िबद्धता से बचने के
लिए एक शिक्षक को          [CTET July 2013]
(1) लड़कों को जोखिम उठाने और निर्भीक बनने
के लिए प्रोत्साहित करना
(2) लड़के-लड़कियों को एकसाथ अपारम्परिक
भूमिकाओं में रखना चाहिए
(3) ‘अच्छी लड़की’, ‘अच्छा लड़का’ कहकर
शिक्षार्थियों के अच्छे कार्य की सराहना करनी
चाहिए।
(4) कुश्ती में भाग लेने के लिए लड़कियों को
निरुत्साहित करना।
21. कक्षा-कक्ष में जेण्डर (लिंग) विभेद
                                            [CTET Sept 2014]
(1) शिक्षार्थियों के निष्पादन को प्रभावित नहीं
करता है।
(2) शिक्षार्थियों के हासोन्मुख प्रयासों अथवा
निष्पादन का कारण बन सकता है।
(3) पुरुष शिक्षार्थियों के वृद्धि-उन्मुख प्रयासों अथवा
निष्पादन का कारण बन सकता है।
(4) महिला शिक्षकों की अपेक्षा पुरुष शिक्षकों के
द्वारा अधिक किया जाता है।
22. छात्राएँ                      [CTET Sept 2014]
(1) गणित के सवाल अच्छे से सीखती हैं लेकिन
उन्हें तब कठिनाई आती है, जब उनसे उनके
तर्क के बारे में पूछा जाता है।
(2) अपनी आयु के लड़कों की तरह गणित में
अच्छी हैं।
(3) अपनी आयु के लड़कों की तुलना में स्थानिक
अवधारणाओं में कम कुशलतापूर्ण निष्पादन
करती हैं।
(4) भाषिक और संगीत सम्बन्धी अधिक क्षमताएँ
रखती हैं।
23. लड़कों एवं लड़कियों के विषय में कुछ
कथन नीचे दिए गए है। आपके अनुसार
इनमें से कौन-सा सही है?          [CTET Feb 2016]
(1) लड़कों को घर के बाहर के कार्यों में सहायता
करनी चाहिए
(2) लड़कों को घर के कार्यों में सहायता करनी
चाहिए।
(3) सभी लड़कों को विज्ञान तथा लड़कियों को गृह
विज्ञान पढ़ाया जाना चाहिए
(4) लड़कियों को घर के कार्यों में सहायता करनी
चाहिए
24. जब एक शिक्षक यह समझता है कि
स्वाभाविक रूप से लड़के गणित में
लड़कियों से अच्छे हैं, यह दर्शाता है कि
अध्यापक है                  [CTET Sept 2015]
(1) लिंग (जेण्डर) पक्षपाती
(2) शिक्षाप्रद
(3) सही दृष्टिकोण वाला
(4) नीतिपरक
25. एक सहशिक्षा कक्षा में लड़कों से शिक्षक यह
कहता है, “लड़के बनो और लड़कियों जैसा
व्यवहार मत करो।” यह टिप्पणी
                                              [CTET Feb 2016]
(1) जातीय भेद-भाव का परिचायक है
(2) लड़के-लड़कियों के साथ व्यवहार का एक
अच्छा उदाहरण है
(3) लड़के-लड़कियों में भेद-भाव की रूदिबद्ध
धारणो प्रकट करती है।
(4) लड़कियों पर लड़कों की जीव वैज्ञानिक महत्ता को
उजागर करती है
26. ‘लिंग’ है                 [CTET Sept 2016]
(1) शारीरिक संरचना
(2) सहज गुण
(3) सामाजिक संरचना
(4) जैविक सत्ता
                                            उत्तरमाला
1. (4) 2. (3) 3. (3) 4. (2) 5. (2) 6. (1) 7. (4) 8. (3) 9. (2) 10. (2)
11. (4) 12. (2) 13. (1) 14. (4) 15. (1) 16. (3) 17. (0) 18. (4)
19. (2) 20. (2) 21. (2) 22. (2) 23. (2) 24. (1) 25. (3) 26. (1)
                                                  ★★★

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