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MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 4 नीति – धारा

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 4 नीति – धारा

MP Board Class 9th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 4 नीति – धारा

नीति – धारा अभ्यास

बोध प्रश्न

नीति – धारा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सच्चे मित्र की क्या पहचान है?
उत्तर:
सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति में साथ दे।

प्रश्न 2.
अमरबेल का पोषण कैसे होता है?
उत्तर:
अमरबेल एक विशेष प्रकार की पीले रंग की बेल होती है जिसमें न जड़ होती है और न पत्ते। उस बेल को भी ईश्वर सींचता रहता है।

प्रश्न 3.
रहीम ने बुरे दिनों में चुप रहने की बात क्यों कही है?
उत्तर:
रहीम ने बुरे दिनों में चुप रहने की सलाह इसलिए दी है कि बुरे दिनों में यदि आप किसी से अटकोगे तो उससे आपको हार माननी पड़ेगी।

प्रश्न 4.
वृन्द के अनुसार मूर्ख विद्वान् कैसे बन सकता है?
उत्तर:
वृन्द कवि के अनुसार मूर्ख व्यक्ति भी यदि निरन्तर अभ्यास करे तो वह विद्वान् बन सकता है।

नीति – धारा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“रहिमन भंवरी के भये नदी सिरावत मौर” से क्या आशय है?
उत्तर:
रहीम कवि कहते हैं कि काम निकल जाने पर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण बातों और व्यक्तियों का असम्मान करते हैं, जैसे भाँवर पड़ने से पूर्व दूल्हा के मौर की बड़ी इज्जत की जाती है और जब भाँवर पड़ जाती है तब उसका तिरस्कार कर उसे नदी में बहा दिया जाता है।

प्रश्न 2.
“होनहार बिरवान के होत चीकने पात” कवि ने किस सन्दर्भ में कहा है?
उत्तर:
अच्छे वृक्ष के पत्ते प्रारम्भ में बड़े ही चिकने होते हैं। जिस वृक्ष के पत्ते प्रारम्भ में चिकने होते हैं वही वृक्ष कालान्तर में भली-भाँति पल्लवित एवं पुष्पित होता है। उसी प्रकार जो बालक बचपन में अच्छे व्यवहार करता है वह एक दिन महान् व्यक्ति बनता है। कहा भी गया है कि पूत के पाँव पालने में ही दिखाई दे जाते हैं।

प्रश्न 3.
अधिक परिचय बढ़ाने के विषय में कवि वृन्द के क्या विचार हैं?
उत्तर:
अधिक परिचय बढ़ाने को कवि वृन्द अच्छा नहीं मानते हैं। उनका अनुभव है कि अधिक परिचय से एक-दूसरे के प्रति असम्मान का भाव उत्पन्न होता है। जैसे कि मलय पर्वत पर रहने वाली भीलनी चन्दन के पेड़ का महत्त्व न जानकर उसे साधारण लकड़ी के रूप में जला देती है।

नीति – धारा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कौए और कोयल की पहचान कवि के अनुसार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कौआ और कोयल दोनों का वर्ण एवं आकार-प्रकार एक जैसा ही होता है। बसंत ऋतु आने पर दोनों का अन्तर सरलता से ज्ञात हो जाता है। कौआ अपनी कर्कश ध्वनि में काँव-काँव करता है और कोयल अपनी मधुर बोली से सबको आकर्षित कर लेती है। इसी प्रकार बोली एवं व्यवहार से दुष्ट और सज्जन लोगों की पहचान हो जाती है।

प्रश्न 2.
सबल की सब सहायता करते हैं, निर्बल की कोई सहायता नहीं करता है। उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
जिस प्रकार प्रचण्ड आग (सबल) को हवा और बढ़ा देती है, किन्तु वही हवा दीपक की लौ (निर्बल) को क्षण भर में बुझा देती है, अत: यह कहा जा सकता है कि सबल की सब सहायता करते हैं, निर्बल की कोई नहीं करता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित दोहों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(अ) खीरा सिर तें ………… यही सजाय॥
उत्तर:
रहीम कहते हैं कि खीरा का सिर काटकर उस पर नमक लगाकर रगड़ा जाता है ताकि उसके अन्दर का जहर बाहर निकल जाए। उसी तरह कड़वे वचन बोलने वाले व्यक्ति को भी सिर काटकर सजा देनी चाहिए।

(आ) कदली सीप …………. फल दीन॥
उत्तर :
कविवर रहीम कहते हैं कि मनुष्य जैसी संगत करेगा उसका फल भी उसको वैसा ही मिलेगा। कवि उदाहरण देते हुए कहता है कि स्वाति नक्षत्र में बादलों से टपकने वाली बूंद तो एक ही होती है पर संगत के प्रभाव से उसका प्रभाव अलग-अलग पड़ता है अर्थात् यदि वह केले के पत्ते पर गिरेगी तो कपूर बन जाएगी, सीप में गिरेगी तो मोती बन जाएगी और सर्प के मुख पर गिरेगी तो मणि बन जाएगी।

(इ) उद्यम कबहुँ न ………… देखि पयोद॥
उत्तर :
कविवर वृन्द कहते हैं कि भविष्य में कुछ अच्छा होने की आशा की खुशी में मनुष्य को अपने परिश्रम (प्रयत्न) को शिथिल महीं कर देना चाहिए। उदाहरण देते हुए कवि कहते हैं कि घुमड़ते हुए बादलों को देखकर उनसे प्राप्त होने वाले पानी की खुशी में अपने घर में रखी हुई पानी की गागर को नहीं फोड़ देना चाहिए।

(इ) करत-करत…………. निसान॥
उत्तर:
कवि वृन्द कहते हैं कि हमें जीवन में सदैव अभ्यास करते रहना चाहिए। निरन्तर अभ्यास करने से जड़मति अर्थात् मूर्ख व्यक्ति भी चतुर हो जाते हैं। कवि उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कुएँ पर रखी शिला (बड़े पत्थर) पर भी जब लोग पानी खींचते है तो उस पत्थर पर रस्सी की बार-बार रगड से बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते हैं। कहने का भाव यह है कि जब पत्थर जैसा कठोर पदार्थ भी बार-बार के अभ्यास से अपना रूप बदल लेता है तो चेतन व्यक्ति तो निरन्तर के अभ्यास से अवश्य ही चतुर बन जाएगा।

नीति – धारा काव्य-सौन्दर्य

प्रश्न 1.
निम्नलिखित अनेकार्थी शब्दों के दो-दो अर्थ बताकर वाक्य में प्रयोग कीजिए
मूल, कुल, फल, रस।
उत्तर:
मूल :

  1. मूलधन,
  2. जड़।

वाक्य प्रयोग :

  1. व्यापारी अपने मूलधन को कभी नहीं छोड़ता है।
  2. इस वृक्ष की मूल पाताल तक गई है।

कुल :

  1. सम्पूर्ण
  2. वंश।

वाक्य प्रयोग :

  1. इस व्यापार में कुल पूँजी 5 अरब रुपये लगी है।
  2. कुल से ही व्यक्ति की पहचान होती है।

फल :

  1. वृक्ष का फल
  2. परिणाम।

वाक्य-प्रयोग :

  1. इस वर्ष आम के पेड़ फलों से लदे हैं।
  2. मोहन का परीक्षाफल अभी नहीं आया है।

रस :

  1. पेय
  2. सार।

वाक्य-प्रयोग :

  1. गन्ने का रस स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।
  2. निर्धनता में मानव जीवन का रस ही सूख जाता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
उत्तर:

शब्द विलोम
दिन रात
मित्र शत्रु
सुख दुःख
अच्छे बुरे
अनादर आदर
सबल निर्बल
अरुचि रुचि
नीच ऊँच

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए-
पवन, पयोद, आग, कंचन, मोर।
उत्तर:
पवन – वायु, वात, हवा।
पयोद – नीरद, जलद, वारिद।
आग – अग्नि, पावक, दहक।
कंचन – स्वर्ण, सोना, कनक।
मोर – मयूर, सारंग, केकी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित सूक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए(अ) बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
उत्तर:
आशय :
कवि कहता है कि यदि कभी कोई बात बिगड़ जाती है तब फिर लाख कोशिश करने पर भी वह बनती नहीं है। जैसे दूध जब फट जाता है तो लाख कोशिश करने पर भी उसमें से मक्खन नहीं निकलता है। अतः मनुष्य को कभी भी ऐसा मौका नहीं देना चाहिए जिससे कि बात बिगड़ जाए।

(आ) एकै साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।
उत्तर:
आशय-इस सूक्ति का आशय यह है कि हमें पूरी निष्ठा के साथ एक का ही सहारा लेना चाहिए। इधर-उधर भागने से अथवा दस आदमियों से अपनी परेशानी कहने से कोई बात नहीं बनती है। हमें एक पर ही भरोसा रखना चाहिए, इससे हमारा काम अवश्य ही बनेगा।

(इ) रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।
उत्तर:
आशय-इस सूक्ति का आशय यह है कि अभ्यास से मूर्ख व्यक्ति भी ज्ञानी हो जाता है जैसे कि कुएँ के ऊपर की बड़ी चट्टान भी रस्सी जैसे कोमल वस्तु से घिस जाया करती है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित लोकोक्तियों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए
(i) होनहार बिरवान के होत चीकने पात।
उत्तर:
अच्छे वृक्ष के पौधे में चिकने पत्ते होते हैं। कहने का भाव यह है कि महान् मनुष्य की पहचान उसके बचपन के क्रियाकलापों से ही हो जाती है। कहा भी है कि पूत के पाँव पालने में दिखाई दे जाते हैं।

(ii) तेते पाँव पसारिये जेती लाँबी सौर।
उत्तर:
मनुष्य को अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही कार्य करना चाहिए। रमेश के पास पचास रुपये की पूँजी थी लेकिन वह लाखों के बजट बना रहा था। इस पर उसके पिताजी ने उसे समझाया कि बेटा उतने ही पैर पसारो जितनी लम्बी तुम्हारी रजाई है।

(iii) ज्यौं-ज्यौं भीजै कामरी, त्यौं-त्यौं भारी होय।
उत्तर :
हठ या जिद करने से कोई काम बनता नहीं है अपितु बिगड़ जाता है। कहा भी है कि जैसे-जैसे कम्बल भीगता जाएगा वैसे ही वैसे वह भारी होता जाएगा।

प्रश्न 6.
इन पंक्तियों की मात्राएँ गिनकर, छन्द की पहचान कीजिए।
उत्तर:


प्रश्न 7.
हिन्दी में कई कवियों ने मुक्तक काव्य लिखे हैं। आप कुछ मुक्तक काव्यों के नाम उनके रचनाकारों के नाम के साथ लिखिए।
उत्तर:

रहीम के दोहे संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

अमर बेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि।।
रहिमन ऐसे प्रभुहि तजि, खोजत फिरिये काहि ॥ 1 ॥

कठिन शब्दार्थ :
बिनु = बिना; प्रतिपालत = पालता है; ताहि = उसी को; काहि = किसको; तजि = छोड़कर।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत दोहा ‘नीति-धारा’ के ‘रहीम के दोहे’ शीर्षक से लिया गया है। इसके कवि रहीम हैं।

प्रसंग :
इस दोहे में ईश्वर की कृपा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
कविवर रहीम कहते हैं कि ईश्वर कितना महान् और दयालु है। वह बिना जड़ वाली अमरबेल को भी पालता रहा है। अतः हे मनुष्य! ऐसे उदार भगवान को छोड़कर और किसको खोजता फिर रहा है? अर्थात् तेरा किसी और को खोजना व्यर्थ है। तू तो केवल ईश्वर का ही ध्यान कर।

विशेष :

  1. ईश्वर की कृपा का वर्णन है।
  2. दोहा छन्द है।
  3. ब्रजभाषा है।

रहिमन चुप है बैठिये, देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागिहै देर ॥ 2 ॥

कठिन शब्दार्थ :
चुप लै = चुप होकर; दिनन को फेर = बुरे दिन आने पर; नीके = अच्छे; बनत = काम बनने में।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
इस दोहे में कवि ने उपदेश दिया है कि बुरे दिन आने पर मनुष्य को चुप होकर बैठ जाना चाहिए।

व्याख्या :
कविवर रहीम कहते हैं कि जब भी मनुष्य के बुरे दिन आयें तो उसे चुप होकर बैठ जाना चाहिए। जब अच्छे दिन आयेंगे तो फिर किसी काम के बनने में जरा-सी देर नहीं लगेगी।

विशेष :

  1. अच्छे दिनों की मनुष्य को प्रतीक्षा करनी चाहिए।
  2. दोहा छन्द।
  3. भाषा-ब्रज।

खीरा सिर तै काटिये, मलियत लोन लगाय।
रहिमन कडुवेमुखन को, चहिअत यही सजाय ॥ 3 ॥

कठिन शब्दार्थ :
मलियत = मलना चाहिए; लोन = नमक; कडुवे मुखन = कड़वी बातें बोलने वाले को; सजाय = सजा देनी चाहिए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि कड़वा वचन बोलने वालों को कठोर दण्ड देना चाहिए।

व्याख्या :
रहीम कहते हैं कि खीरा का सिर काटकर उस पर नमक लगाकर रगड़ा जाता है ताकि उसके अन्दर का जहर बाहर निकल जाए। उसी तरह कड़वे वचन बोलने वाले व्यक्ति को भी सिर काटकर सजा देनी चाहिए।

विशेष :

  1. कड़वे वचन बोलने वाले को सावधान किया
  2. दोहा छन्द।
  3. भाषा-ब्रज।

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय ॥ 4 ॥

कठिन शब्दार्थ :
बिगरी = बिगड़ी हुई; लाख करौ किन कोय = कोई लाखों प्रयत्न कर ले; फाटे = फटे हुए।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि बिगड़ा कार्य आसानी से नहीं बनता है।

व्याख्या :
कविवर रहीम कहते हैं कि बिगड़ी हुई बात फिर बनती नहीं है चाहे कोई लाखों प्रयत्न क्यों न कर ले। उदाहरण द्वारा कवि समझाता है कि जिस प्रकार फटे हुए दूध से कोई लाखों बार मथने पर भी मक्खन नहीं निकाल पाता है।

विशेष :

  1. कवि का उपदेश है कि हमें कोई काम बिगाड़ना नहीं चाहिए।
  2. दृष्टान्त अलंकार।
  3. भाषा-ब्रज।
  4. छन्द-दोहा।

काज परै कछु और है, काज सरै कछु और।
रहिमन भंवरी के. भये, नदी सिरावत मौर ॥ 5 ॥

कठिन शब्दार्थ :
काज परै = काम पड़ने पर; काज सरै = काम निकल जाने पर; भंवरी = हिन्दुओं में विवाह के समय दूल्हा-दुल्हन के द्वारा किये जाने वाले सात फेरे, भाँवर; सिरावत = नदी में बहा देते हैं; मौर = बरात के समय लड़की के दरवाजे पर जाते समय दूल्हा अपने सिर पर मौर पहनता है।’

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहते हैं कि जब किसी का कोई काम अटक जाता है तब उसका व्यवहार बड़ा शालीन हो जाता है और काम निकल जाने पर वही व्यक्ति अशिष्ट हो जाता है।

व्याख्या :
कविवर रहीम कहते हैं कि काम पड़ने पर व्यक्ति का व्यवहार बड़ा ही शालीन हो जाता है और काम निकल जाने पर उसका व्यवहार बदल जाता है। उदाहरण देकर वे बताते हैं कि जब दूल्हा बरात लेकर जाता है तो अपने सिर पर मौर को बड़े ही सम्मान के साथ धारण करता है और जब दुल्हन के साथ भाँवरें पड़ जाती हैं तब उसी मौर को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।

विशेष :

  1. कवि ने समय का महत्त्व बताया है।
  2. दृष्टान्त अलंकार।
  3. भाषा-ब्रज।

एक साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय ॥ 6 ॥

कठिन शब्दार्थ :
एक = एक को; साथै = साधने पर; मूलहिं = जड़ को; अघाय = तृप्त होना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहते हैं कि हमें पूरी तरह से एक की ही साधना करनी चाहिए। इधर-उधर नहीं भटकना चाहिए।

व्याख्या :
कवि रहीम कहते हैं कि एक के साधन पर सब सध जाते हैं और जो व्यक्ति सभी को साधना चाहता है उसका काम बिगड़ जाता है। आगे वे कहते हैं कि यदि तुम जड़ को सींचोगे तो पेड़-पत्ते एवं फल सभी प्राप्त हो जायेंगे और तुम सन्तुष्ट हो पाओगे।

विशेष :

  1. मन से एक को ही साधने की बात कही गई है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. छन्द-दोहा।

कदली, सीप, भुजंग-मुख,स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिये, तैसोई फल दीन ॥ 7 ॥

कठिन शब्दार्थ :
कदली = केला; भुजंग = सर्प; स्वाति = स्वाति नक्षत्र में गिरने वाली बूंद; संगति = सौबत, साथ उठना-बैठना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-इस दोहे में कवि ने संगत का प्रभाव बताया है।

व्याख्या :
कविवर रहीम कहते हैं कि मनुष्य जैसी संगत करेगा उसका फल भी उसको वैसा ही मिलेगा। कवि उदाहरण देते हुए कहता है कि स्वाति नक्षत्र में बादलों से टपकने वाली बूंद तो एक ही होती है पर संगत के प्रभाव से उसका प्रभाव अलग-अलग पड़ता है अर्थात् यदि वह केले के पत्ते पर गिरेगी तो कपूर बन जाएगी, सीप में गिरेगी तो मोती बन जाएगी और सर्प के मुख पर गिरेगी तो मणि बन जाएगी।

विशेष :

  1. कवि ने संगत का महत्त्व बताया है।
  2. उपमा अलंकार।
  3. भाषा-ब्रज।
  4. छन्द-दोहा।

कहि रहीम सम्पत्ति सगैं, बनत बहुत यह रीति।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत ॥ 8 ॥

कठिन शब्दार्थ :
सम्पत्ति = धन के कारण; सगैं = खास, विशेष; बहुत रीति = अनेक प्रकार से; विपति = मुसीबत, संकट; ते = वे; साँचे = सच्चे; मीत = मित्र।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि अच्छे दिनों में तो सब सगे बन जाते हैं पर विपत्ति में जो संग देते हैं, वे ही सच्चे मित्र हैं।

व्याख्या :
कवि रहीम कहते हैं कि सम्पत्ति अर्थात् खुशहाली में तो सभी लोग सम्पत्ति वाले के सगे हो जाते हैं पर विपत्ति रूपी कसौटी पर जो कसे जाते हैं, वे ही सच्चे मित्र होते हैं। कहने का भाव यह है कि विपत्ति में जो साथ देते हैं, वे ही सच्चे मित्र होते हैं।

विशेष :

  1. सच्चे मित्र के लक्षण बताये हैं।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. छन्द-दोहा।

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ पड़ जाय ॥ 9 ॥

कठिन शब्दार्थ :
धागा = सूत का डोरा; चटकाय = चटकाकर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्। प्रसंग-कवि सच्चे प्रेम को न तोड़ने की सलाह दे रहे हैं।

व्याख्या :
रहीम कवि कहते हैं कि यह प्रेम का धागा अर्थात् डोरी है, इसे चटका कर मत तोड़ो। यदि यह टूट जाएगा तो फिर इसे जोड़ने पर इसमें गाँठ पड़ जाएगी। कहने का भाव यह है कि सच्चे प्रेम में कोई विघ्न मत डालो।

विशेष :

  1. सच्चा प्रेम निश्छल होता है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. छन्द-दोहा।

धनि रहीम जल पंक को, लघुजिय पिअत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय॥ 10 ॥

कठिन शब्दार्थ :
धनि = धन्य; पंक = कीचड़; लघु जिय = छोटे-छोटे प्राणी; अघाय = तृप्त होते हैं; उदधि = समुद्र; जगत् = संसार।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि कहता है कि जो परोपकार के काम आता है, वास्तव में वही धन्य है।

व्याख्या :
रहीम कवि कहते हैं कि उस कीचड़ के पानी को धन्य है जिसको पीकर छोटे-छोटे प्राणी तृप्त हो जाते हैं। उस महान समुद्र की क्या बड़ाई है अर्थात् कोई बड़ाई (प्रशंसा) नहीं है क्योंकि उसके खारे पानी से सारा संसार प्यासा ही रह जाता है अर्थात् उसे कोई पीता ही नहीं है।

विशेष :

  1. परोपकारी व्यक्ति ही महान् है।
  2. उपमा अलंकार।
  3. भाषा-ब्रज।
  4. छन्द-दोहा।

वृन्द के दोहे संदर्भ-प्रसंगसहित व्याख्या

उद्यम कबहुँ न छाँड़िये पर आसा के मोद।
गागरि कैसे फोरिये, उनयो देखि पयोद ॥ 1 ॥

कठिन शब्दार्थ :
उद्यम = परिश्रम; कबहुँ = कभी भी; आसा = आशा; मोद = प्रसन्नता में; उनयो = आकाश में चमकते हुए; पयोद = बादल।

सन्दर्भ :
प्रस्तुत दोहा ‘वृन्द के दोहे’ शीर्षक से लिया गया है। इसके कवि वृन्द हैं।

प्रसंग :
इसमें कवि ने कहा है कि भविष्य में कुछ होगा इस आशा में अपने प्रयास नहीं रोक देने चाहिए।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि भविष्य में कुछ अच्छा होने की आशा की खुशी में मनुष्य को अपने परिश्रम (प्रयत्न) को शिथिल महीं कर देना चाहिए। उदाहरण देते हुए कवि कहते हैं कि घुमड़ते हुए बादलों को देखकर उनसे प्राप्त होने वाले पानी की खुशी में अपने घर में रखी हुई पानी की गागर को नहीं फोड़ देना चाहिए।

विशेष :

  1. भविष्य में अच्छे होने की आशा में हमें प्रयत्न करना नहीं छोड़ देना चाहिए।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. छन्द-दोहा।

कुल सपूत जान्यो परै, लखि सुभ लच्छन गात।
होनहार बिरवान के, होत चीकने पात ॥ 2 ॥

कठिन शब्दार्थ :
सपूत = सुपुत्र; जान्यौ परै = जान पड़ता है; लखि = देखकर; सुभ = शुभ; लच्छन = गुण; गात = शरीर में; बिरवान = वृक्ष; पात = पत्ते।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि सुपुत्र के लक्षण उसके शरीर से ही प्रकट होने लगते हैं।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि कुल में सपत्र की पहचान उसके शरीर में पाये जाने वाले लक्षणों से हो जाती है। जो पौधा कालान्तर में अच्छा वृक्ष बन जाएगा उसकी पहचान उसके चिकने पत्तों को देखकर हो जाती है।

विशेष :

  1. कवि ने ‘पूत के पाँव पालने में दिखाई दे जाते हैं’ इस कहावत को स्पष्ट किया है।
  2. दूसरी पंक्ति में होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ वाली कहावत को स्पष्ट किया है।
  3. भाषा-ब्रज।
  4. छन्द-दोहा।

अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिये दौर।
तेते पाँव पसारिये, जेती लांबी सौर ॥ 3 ॥

कठिन शब्दार्थ :
विचारि कै = सोचकर; अपनी पहुँच = अपनी सामर्थ्य या शक्ति; करतब = कर्त्तव्य; दौर = दौड़कर; तेते = उतने; पसारिये = फैलाइये; जेती = जितनी; सौर = रजाई, लिहाफ।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहे में कवि ने यह उपदेश दिया है कि हमें अपनी शक्ति के अनुसार ही कार्य करना चाहिए।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि हमें अपनी शक्ति और सामर्थ्य के हिसाब से ही किसी कार्य को दौड़कर करना चाहिए। कहावत भी है कि हमें सोते समय उतने ही पैर फैलाने चाहिए जितनी कि रजाई लम्बी हो।

विशेष :

  1. कवि का सन्देश है कि शक्ति और सामर्थ्य से अधिक कार्य करने पर निराशा ही मिलती है।
  2. भाषा-ब्रज।
  3. छन्द-दोहा।
  4. मुहावरों का प्रयोग।
  5. उपमा अलंकार।

उत्तम विद्या लीजिये, जदपि नीच पै होय।
पर्यो अपावन ठौर में, कंचन तजत न कोय ॥ 4 ॥

कठिन शब्दार्थ :
जदपि = यद्यपि; नीच पै होय = नीच या छोटे व्यक्ति पर होवे; पर्यो = पड़ा हुआ;अपावन = अपवित्र, गन्दी; ठौर = जगह; कंचन = सोना; तजत = छोड़ता है; कोय = कोई भी।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने उत्तम विद्या जहाँ से भी मिले उससे ले लेनी चाहिए, इसका संकेत किया है।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि हमें अपने जीवन में सदैव उत्तम विद्या को ग्रहण करना चाहिए चाहे वह उत्तम विद्या निम्न श्रेणी के व्यक्ति के ही पास क्यों न हो। जिस प्रकार अशुद्ध या गन्दगी में भी पड़े हुए सोने को कोई भी व्यक्ति त्यागता नहीं है अर्थात् उसे उठाकर अपने पास रख लेता है, उसी तरह गुण चाहे किसी भी नीच व्यक्ति के पास क्यों न हों, हमें उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।

विशेष :

  1. उत्तम विद्या को ग्रहण करने का उपदेश है।
  2. मुहावरों का प्रयोग।
  3. उपमा अलंकार।
  4. ब्रजभाषा का प्रयोग।

मनभावन के मिलन के, सुख को नाहिन छोर।
बोल उठि, नचि नचि उठे, मोर सुनत घनघोर ॥ 5 ॥

कठिन शब्दार्थ :
मनभावन = मन को प्रिय लगने वाले; नाहिन = नहीं है; छोर = किनारा; नचि-नचि उठै = नाचने लग जाते हैं; घनघोर = बादलों की गर्जना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि प्रियतम के मिलन में जो सुख प्राप्त होता है, वह असीमित है।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि मन को प्रिय लगने वाले के मिलने से जो सुख प्राप्त होता है, उसका कोई ओर-छोर नहीं है। जिस प्रकार आकाश में मेघों की गर्जना सुनकर मोर कूकने लगते हैं और नाचने लग जाते हैं।

विशेष :

  1. प्रियतम के मिलन सुख को बहुत अच्छा बताया है।
  2. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग।
  3. ब्रजभाषा का प्रयोग।

करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान ॥ 6 ॥

कठिन शब्दार्थ :
करत-करत = करते-करते; अभ्यास = प्रयत्न; रसरी = रस्सी; जड़मति = मूर्ख बुद्धि वाला भी; सुजान = चतुर।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने जीवन में अभ्यास का महत्व बताया है।

व्याख्या :
कवि वृन्द कहते हैं कि हमें जीवन में सदैव अभ्यास करते रहना चाहिए। निरन्तर अभ्यास करने से जड़मति अर्थात् मूर्ख व्यक्ति भी चतुर हो जाते हैं। कवि उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कुएँ पर रखी शिला (बड़े पत्थर) पर भी जब लोग पानी खींचते है तो उस पत्थर पर रस्सी की बार-बार रगड से बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते हैं। कहने का भाव यह है कि जब पत्थर जैसा कठोर पदार्थ भी बार-बार के अभ्यास से अपना रूप बदल लेता है तो चेतन व्यक्ति तो निरन्तर के अभ्यास से अवश्य ही चतुर बन जाएगा।

विशेष :

  1. कवि ने मनुष्यों को अभ्यास करने की सीख दी है।
  2. अनुप्रास एवं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
  3. ब्रजभाषा का प्रयोग है।
  4. कहावत का प्रयोग है।

अति परिचै ते होत हैं, अरुचि अनादर भाय।
मलयागिरि की भीलनी, चंदन देत जराय ॥ 7 ॥

कठिन शब्दार्थ :
परिचै = परिचय; ते = से; भाय = भाव; मलयागिरि = मलयाचल पर्वत; जराय = जला देना।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि ने बताया है कि अत्यधिक परिचय से कभी-कभी मनुष्यों में एक-दूसरे के प्रति अनादर का भाव पैदा हो जाता है।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि अत्यधिक परिचय से अरुचि और अनादर का भाव जाग जाता है। जैसे कि मलयाचल की रहने वाली भीलनी चन्दन को साधारण लकड़ी के रूप में जला देती है।

विशेष :

  1. अत्यधिक परिचय से कभी-कभी मनुष्य दूसरों का अनादर करने लग जाते हैं।
  2. चन्दन के पेड़ मलयाचल पर्वत पर भी उगते हैं।
  3. अनुप्रास अलंकार।
  4. भाषा-ब्रज।

भले बुरे सब एक से, जौं लौं बोलत नाहिं।
जान परतु है काक पिक, रितु बसंत के माहि ॥ 8 ॥

कठिन शब्दार्थ :
भले = अच्छे; बुरे = दुष्ट; जौं लौं = जब तक; काक = कौआ; पिक = कोयल; माहिं = बीच में।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि रंग और वर्ण से किसी भी अच्छे और बुरे विद्वान और मूर्ख की पहचान नहीं होती है।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि अच्छे और दुष्ट मनुष्यों में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता है, जब तक कि वे बोलते या व्यवहार नहीं करते हैं। कौआ और कोयल वर्ण से एक से ही लगते हैं, दोनों में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता है पर बसंत ऋतु के आते ही दोनों में अन्तर स्पष्ट ज्ञात हो जाता है। कहने का भाव यह है कि कौआ तो वही अपनी कर्कश ध्वनि काँव-काँव निकालेगा और कोयल अपना मधुर गीत छेड़ेगी।

विशेष :

  1. व्यवहार और बातचीत से ही अच्छे-बुरे और विद्वान-मूर्ख की पहचान होती है।
  2. अनुप्रास अलंकार।
  3. ब्रजभाषा का प्रयोग।

सबै सहायक सबल के, कोउन निबल सहाय।
पवन जगावत आग कौं, दीपहिं देत बुझाय ॥ 9 ॥

कठिन शब्दार्थ :
सबल = ताकतवर के निबल = दुर्बल; सहाय = सहायता करने वाला; पवन = हवा।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का कथन है कि इस संसार में सभी ताकतवर का साथ देते हैं निर्बल का कोई साथ नहीं देता है।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि संसार में सभी लोग ताकतवर के सहायक होते हैं और निर्बल का सहायक कोई नहीं होता है। जैसे कि वायु आग को तो अपने वेग से और अधिक जगा देता है पर वही पवन दीपक को बुझा देता है।

विशेष :

  1. ताकतवर के सभी साथी बन जाते हैं परन्तु निर्बल का कोई नहीं होता।
  2. उपमा एवं अनुप्रासं-अलंकार।
  3. भाषा-ब्रज।

अति हठमत कर हठबढ़े, बात न करिहैकोय।
ज्यों-ज्यों भीजे कामरी, त्यों-त्यौं भारी होय ॥ 10 ॥

कठिन शब्दार्थ :
हठ = जिद्द; हठ बढ़े = जिद्द करने से काम बिगड़ जाते हैं; कोय = कोई भी; कामरी = कम्बल।

सन्दर्भ :
पूर्ववत्।

प्रसंग :
कवि का उपदेश है कि मनुष्य को हठ नहीं करनी चाहिए।

व्याख्या :
कविवर वृन्द कहते हैं कि हे मनुष्यो! तुम जीवन में हठ करना छोड़ दो। हठ करना कोई अच्छी बात नहीं है बल्कि इससे तो बात बिगड़ती है, बनती नहीं। उदाहरण देते हुए कवि कहते हैं कि जैसे-जैसे कम्बल भीगता जाएगा वैसे ही वैसे वह भारी होता जायेगा।

विशेष :

  1. कवि ने हठ त्याग करने का उपदेश दिया है।
  2. उपमा अलंकार तथा ज्यों-ज्यौं, त्यों-त्यों में पुनरुक्ति प्रकाश।
  3. भाषा-ब्रज।

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