UK Board 10 Class Hindi – (व्याकरण) – स्वतन्त्र पदों से संस्कृत वाक्य रचना
UK Board 10 Class Hindi – (व्याकरण) – स्वतन्त्र पदों से संस्कृत वाक्य रचना
UK Board Solutions for Class 10th Hindi – (संस्कृत व्याकरण और अनुवाद) – स्वतन्त्र पदों से संस्कृत वाक्य-रचना अथवा संस्कृत में अनुवाद
अनुवाद की परिभाषा
“किसी एक भाषा को, दूसरी भाषा में ज्यों-का-त्यों (शब्दशः) या आवश्यकतानुसार भावतः रूपान्तरित करना ‘अनुवाद’ कहलाता है।”
इस प्रकार अन्य भाषाओं के वाक्यों को संस्कृत में रूपान्तरित कर देना ‘संस्कृतानुवाद’ कहलाएगा; यथा – ‘ राम पढ़ता है।’ इस हिन्दी भाषा के वाक्य का संस्कृतानुवाद ‘रामः पठति ।’ होगा।
संस्कृत में वाक्य-रचना अथवा अनुवाद के प्रमुख नियम इस प्रकार हैं-
[1] प्रथमा विभक्ति (कर्त्ता कारक) तथा लट्लकार (वर्तमानकाल) की क्रिया रूपों का प्रयोग
(1) स:, अयं बालकः वा पठति ।
वह, यह या बालक पढ़ता है।
(2) तौ, इमौ, बालकौ वा पठतः ।
वे दोनों, ये दोनों या दो बालक पढ़ते हैं।
(3) ते, इमे बालकाः वा पठन्ति ।
वे सब, ये सब या सब बालक पढ़ते हैं।
(4) त्वं पठसि ।
तू पढ़ता या पढ़ती है।
(5) युवां पठथः ।
तुम दोनों पढ़ते या पढ़ती हो ।
(6) यूयं पठथ ।
तुम सब पढ़ते या पढ़ती हो ।
(7) अहं पठामि ।
मैं पढ़ता या पढ़ती हूँ।
(8) आवां पठावः।
हम दोनों पढ़ते या पढ़ती हैं।
(9) वयं पठामः ।
हम सब पढ़ते या पढ़ती हैं।
(10) सा, इयं बालिका वा पठति ।
वह, यह या बालिका पढ़ती है।
(11) ते, इमे, बालिके वा पठतः ।
वे दोनों, ये दोनों या दो बालिकाएँ पढ़ती हैं।
(12) ता:, ईमाः बालिकाः वा पठन्ति ।
वे सब ये सब या सब बालिकाएँ पढ़ती हैं।
(क) वाक्य में क्रिया करनेवाले को ‘कर्त्ता’ कहा जाता है, ‘कर्त्ता’ के लिए (संस्कृत में ) प्रथमा विभक्ति के रूपों का प्रयोग होता है; यथा – उपर्युक्त सभी वाक्यों में ‘पढ़ना’ क्रिया है और उसके करने वाले सः, अयं, बालकः आदि कर्ता हैं और ये सब ही प्रथमा विभक्ति में (लिङ्ग और वचन के अनुसार) प्रयुक्त हुए हैं।
(ख) संस्कृत में तीन पुरुष – प्रथमं, मध्यम और उत्तम – पुरुष, और तीन लिङ्ग — पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग होते हैं। इसलिए संस्कृत में पुरुष 3 × लिङ्ग 3 = 9 कर्त्ता रूप होते हैं।
(ग) संस्कृत में लिङ्ग के अनुसार क्रिया रूप नहीं बदलते हैं, अपितु वचन के अनुसार क्रिया रूप क्रमश: एकवचन, द्विवचन और बहुवचन के क्रिया रूपों का प्रयोग होता है।
(घ) क्रिया रूप जहाँ वचनानुसार बदलते हैं, वहीं वे पुरुषों के अनुसार भी बदलते रहते हैं।
(ङ) मध्यम पुरुष के कर्त्ता त्वम् (तू), युवाम् (तुम दोनों), यूयम् (तुम सब ) और उत्तम पुरुष के कर्त्ता – अहम् (मैं), आवाम् (हम दोनों) और वयम् (हम सब ), निश्चित हैं और ये तीनों लिङ्गों में समान ही रहते हैं।
(च) मध्यम और उत्तम पुरुष के अतिरिक्त सभी कर्त्ता रूप प्रथम पुरुष के कर्त्ता होते हैं अर्थात् मध्यम और उत्तम पुरुष के कर्त्ताओं को छोड़कर जितने भी कर्त्ता होते हैं, उनके साथ वचनानुसार प्रथम पुरुष के क्रिया रूप प्रयुक्त होते हैं।
विशेष 1. कर्त्ता (प्रथमा विभक्ति) का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है—
(क) अभिधेय मात्रे – किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान आदि का नाम बताने में; यथा— रामः बालकः, प्रयागः, लौहः, पुष्पम् आदि ।
(ख) कर्त्तरि — कर्तृवाच्य के कर्त्ताकारक में कर्त्ता (प्रथमा) कारक का प्रयोग होता है; यथा- – पूर्वोक्त सभी वाक्यों में।
(ग) अव्यययोगे – अव्यय या अविकारी शब्दों के योग में कर्त्ता (प्रथमा) कारकं का प्रयोग होता है; यथा – ‘रामः इति प्रसिद्ध:’ आदि।
(घ) उक्तेकर्मणि – कर्मवाच्य में कर्म (द्वितीया) कारक में कर्त्ता (प्रथमा) कारक प्रयोग होता है; यथा – ‘रामेण पाठः पठितः’ (राम द्वारा पाठ पढ़ा गया)।
(ङ) सम्बोधन – दूर से पुकारने में कर्त्ता (प्रथमा) कारक का प्रयोग होता है, किन्तु उसमें कर्त्ता रूपों के पूर्व (हे, रे, अरे, ओ, भो: आदि) सम्बोधन चिह्न लगा दिए जाते हैं; यथा – ‘हे राम !, रे अधम !, अरे बालक !, ओ पाप !, भोः छात्र !’ आदि।
विशेष 2. उक्त सभी नियमों के अन्तर्गत आनेवाली स्थितियों में पूर्वोक्त वाक्यों में कर्त्ता (प्रथमा) और लट्लकार (वर्तमानकाल ) का प्रयोग हुआ है।
[2] द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक ) के शब्द-रूपों तथा लृट्लकार (भविष्यत्काल) की क्रिया-रूपों का प्रयोग
| (1) रामः नगरं गमिष्यति । | राम नगर जाएगा। |
| (2) बालकौ पाठं पठिष्यतः । | दो बालक पाठ पढ़ेंगे। |
| (3) नरा: चित्रं द्रक्ष्यन्ति । | सब नर चित्र देखेंगे। |
| (4) त्वं कार्यं करिष्यसि । | तू कार्य करेगा। |
| (5) युवां पुष्पं घ्रास्यथः । | तुम दोनों पुष्प सूँघोगे। |
| (6) यूयं सत्यं वदिष्यथ । | तुम सब सत्य बोलोगे । |
| (7) अहं विद्यालयं गमिष्यामि । | मैं विद्यालय जाऊँगा । |
| (8) आवां भोजनं पक्ष्यावः । | हम दोनों भोजन पकाएँगे। |
| (9) वयम् दुष्टान् हनिष्यामः । | हम सब दुष्टों को मारेंगे। |
| (10) वानराः फलानि खादिष्यन्ति । | बन्दर फल खाएँगे। |
(क) वाक्य के अन्तर्गत जिस शब्द पर क्रिया का फल पड़ता है या कर्त्ता के लिए जो शब्द अभीप्सित होता है, उसे कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति) में वचनानुसार प्रयुक्त किया जाता है; यथा – उपर्युक्त वाक्यों में काले शब्दों पर क्रिया का फल पड़ता है और कर्त्ताओं द्वारा भी ये अभीप्सित हैं।
(ख) कर्म कारक को संस्कृत में द्वितीया विभक्ति कहा जाता है।
(ग) क्रिया से पहले ‘किसे’, ‘किसको’ या ‘क्या’ लगाने पर उत्तर में जो कुछ प्राप्त होता है, उसे कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति) कहा जाता है।
यथा— ‘छात्रः पाठं पठति’ वाक्य में ‘छात्र क्या या किसे (किसको) पढ़ता है?’ के उत्तर में आता है ‘पाठ को’; अतः ‘पाठ’ को कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति) में रखा गया है।
(घ) कर्म का चिह्न हिन्दी प्रायः ‘को’ होता है, किन्तु वाक्य में कभी-कभी यह चिह्न लुप्त भी होता है। अतः चिह्न के लुप्त होने की स्थिति में भी कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति) रूप का ही प्रयोग होता है; यथा- ‘राम फल खाता है’ यहाँ ‘फल’ के साथ ‘को’ चिह्न न होने पर भी ‘फलम्’ में कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति) का ही प्रयोग हुआ है।
[3] द्विकर्मक धातु-रूपों का प्रयोग
(1) भिक्षुकः दातारं पणकं याचते ।
भिखारी दाता से पैसा माँगता है।
(2) माता तण्डुलान् ओदनं पचति ।
माता चावल से भात पकाती है।
(3) गुरुः छात्रं शतपणकं दण्डयति ।
गुरु छात्र पर सौ पैसों का दण्ड देता है।
(4) जनाः नेतारं प्रश्नं पृच्छन्ति ।
मनुष्य नेता से प्रश्न पूछते हैं।
(5) उपदेशकः जनान् उपदेशं ब्रूते ।
उपदेशक मनुष्यों को उपदेश बताता है।
(6) श्रमिकः स्कन्धं भारं वहति ।
श्रमिक कन्धे से बोझ ढोता है।
(क) उपर्युक्त वाक्यों में जिन धातुओं का प्रयोग हुआ है, वे द्विकर्मक अर्थात् दो कर्म रखनेवाली धातुएँ हैं। इसीलिए इनके साथ वाक्यों में दो-दो कर्मों का प्रयोग हुआ है।
(ख) उपर्युक्त वाक्यों में द्विकर्मक धातुओं के साथ जिन दो-दो कर्म रूपों का प्रयोग हुआ है, उनमें से एक प्रधान कर्म है और दूसरा • अप्रधान या गौण कर्म है।
द्विकर्मक धातुओं का परिचय इस प्रकार है-
दुह् (दुहना), याच् (माँगना), पच् (पकाना), दण्ड् (दण्ड देना), रुघ् (रोकना), पृच्छ् (पूछना ), चि (चुनना, एकत्र करना), बू (बोलना), शास् (उपदेश देना), जी (जीतना ), मथ् (मथना), मुष् (चुराना), नी ( ले जाना), हृ ( हरण करना, छीनना, चुराना), कृष् (खींचना, खोदकर निकालना) और वह (ढोना ) ।
उपर्युक्त धातु-रूपों का वाक्यों में प्रयोग होने पर सदैव दो-दो कर्म प्रयुक्त होते हैं।
[4] तृतीया विभक्ति (करण कारक) के शब्द रूपों तथा लङ्लकार (भूतकाल ) के क्रिया रूपों का प्रयोग
(1) स: नेत्राभ्याम् अपश्यत् ।
उसने नेत्रों से देखा ।
(2) तौ लेखिन्या अलिखताम् ।
उन दोनों ने कलम से लिखा।
(3) ते कन्दुकैः अक्रीडन् ।
वे गेंदों से खेले।
(4) त्वं पादाभ्याम् अगच्छः ।
तू पैरों से गया ।
(5) युवां गन्य अभ्रमतम् ।
तुम दोनों गाड़ी से घूमे।
(6) यूयं जिह्वाभिः आस्वादयत ।
तुम सबने जीभों से चखा।
(7) अहं जनकेन सह अगच्छम् ।
मैं पिता के साथ गया ।
(8) आवां कर्णै: आकर्णयावः ।
हम दोनों ने कानों से सुना ।
(9) वयं धनेन पूर्णा अभवाम।
हम धन से पूर्ण हो गए।
(10) सरला पथा अचलत्।
सरला मार्ग से चली।
(क) वाक्य के अन्तर्गत कर्त्ता जिसकी सहायता से या जिसके साथ रहते हुए कार्य करता है, उसे तृतीया विभक्ति (करण कारक) में रखा जाता है; यथा— उपर्युक्त वाक्यों में मोटे छापे के शब्दों को तृतीया विभक्ति (करण कारक) में रखा गया है।
विशेष – करण कारक का सूत्र है-साधकतमं करणम् । करण कारक (तृतीया विभक्ति) के प्रयोग के नियम इस प्रकार हैं-
(ख) कर्तृकरणयोस्तृतीया ।
कर्मवाच्य और भाववाच्य में कर्त्ता और करण कारक में तृतीया विभक्ति (करण कारक) का प्रयोग होता है; यथा-
कर्मवाच्य – ‘रामेण रावणो हतः’ (राम द्वारा रावण मारा गया ) । भाववाच्य – ‘तेन भुज्यते’ (उससे या उसके द्वारा खाया जाता है ) ।
(ग) प्रकृत्यादिभ्यः उपसङ्ख्यानम् ।
प्रकृति और स्वभाव आदि या किसी कार्य के करने की विधि में तृतीया विभक्ति (करण कारक) का प्रयोग होता है; यथा-
‘सः प्रकृत्या स्वभावेन वा धीर : ( वह प्रकृति या स्वभाव से धीर है)।
‘रामः युद्धेन रावणं जितवान्’ (राम ने युद्ध द्वारा रावण को जीता ) ।
(घ) सहयुक्तेऽप्रधाने ।
वाक्य में साथ का अर्थ प्रकट करनेवाले (सह, समं, साकं, सार्धम् आदि) शब्दों के योग में अप्रधान में तृतीया विभक्ति (करण कारक) का प्रयोग होता है; यथा— ,
‘अहं जनकेन सह नगरं गच्छामि’ [ मैं जनक (पिता) के साथ नगर जाता हूँ ]।
(ङ) येनाङ्गविकारः ।
व्यक्ति जिस अंग से विकृत होता है, उस अंग का तृतीया विभक्ति (करण कारक) में प्रयोग होता है; यथा—
‘स: पादेन खञ्जः अक्ष्णा च काणः अस्ति’ ( वह पैर से लँगड़ा और आँख से काना है)।
(च) पृथग्विनानानाभिस्तृतीया ।
पृथक्, विना और नाना शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति (करण कारक) का प्रयोग होता है; यथा- ‘रामः लक्ष्मणेन विना पृथक् वा न. अवसत्’ (राम लक्ष्मण के बिना या लक्ष्मण से अलग नहीं रहता था)।
(छ) तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीया ।
तुल्य या उसके पर्यायवाची शब्दों के योग में भी तृतीया विभक्ति (करण कारक) का प्रयोग होता है; यथा-
‘रामेण तुल्यः (समः ) न कोऽपि वीरः आसीत्’ (राम के समान कोई भी वीर न था ) ।
[5] चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक ) के शब्द-रूपों तथा पूर्व प्रयुक्त तीनों लकारों के क्रिया-रूपों का प्रयोग
(1) छात्र: गुरवे नमस्करोति ।
छात्र गुरु को नमस्कार करता है।
(2) भक्त: भगवते पुष्पाणि अर्पयति ।
भक्त भगवान् को पुष्प अर्पित करता है।
(3) वृक्षा: परोपकाराय फलन्ति ।
वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं।
(4) परोपकाराय सतां विभूतयः ।
सज्जनों की विभूतियाँ परोपकार के लिए होती हैं।
(5) गुरुः शिष्येभ्यः शिक्षां ददाति ।
गुरु शिष्यों को शिक्षा देता है।
(6) बालकाय मिष्टान्नं प्रायच्छत् ।
बालकों को मिष्टान्न दिया।
(7) अहं पितृभ्यां नमामि ।
मैं माता-पिता को नमन करता हूँ।
(8) आवां स्नानाय नदीं गमिष्यावः ।
हम दोनों स्नान के लिए नदी पर जाएँगे ।
(9) त्वं यज्ञाय समिधम् अनयः ।
तू यज्ञ के लिए लकड़ी लाया था।
(10) यूयं रुग्णाय औषधिम् आनयथ ।
तुम रोगी के लिए औषधि लाते हो ।
(क) वाक्य में कर्म को जो वस्तु अभीष्ट होती है, या जिसके लिए कोई वस्तु दी जाती है या जिससे कोई कार्य किया जाता है, उसे चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक) कहा जाता है। जैसा कि उपर्युक्त वाक्यों में मोटे छापे के पदों में देखा जा सकता है।
सूत्र – कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् ।
सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है।
सूत्र – चतुर्थी सम्प्रदाने ।
विशेष – जिसे कोई वस्तु सदैव के लिए दी जाती है, उसे ही सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति) में रखा जाता है। इसके विपरीत जिसे कोई वस्तु कुछ देर के लिए अस्थायी तौर पर दी जाती है, उसे षष्ठी विभक्ति या सम्बन्ध कारक में रखा जाता है; यथा – ‘सः रजकस्य वस्त्राणि ददाति’ ( वह धोबी को वस्त्र देता है); इस वाक्य में कर्त्ता धोबी को वस्त्र कुछ समय (धोने के समय तक) के लिए देता है; अतः यहाँ ‘धोबी’ (रजक) को षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक ) में रखा गया है।
(ख) सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति) के प्रयोग सम्बन्धी नियम –
(i) रुच्यर्थानां प्रीयमाणः ।
रुचि (अच्छा लगना) का अर्थ देनेवाली ‘रुच्’ धातु के योग में, जिसे वस्तु अच्छी लगती है, उसे चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक ) में रखा जाता है; यथा— ‘कृष्णाय दुग्धं रोचते’ (कृष्ण को दूध अच्छा लगता है)।
(ii) क्रुधदुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः ।
क्रुध् (क्रोध करना), दुह (शत्रुता करना), ईर्ष्या (ईर्ष्या या डाह करना), असूय् ( दोष लगाना, निन्दा करना) धातुओं या इन्हीं अर्थों को प्रकट करनेवाली अन्य धातुओं के योग में, जिसके प्रति उक्त भाव प्रकट किया जाता है, उसे चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक) में रखा जाता है; यथा—’कृष्णः कंसाय क्रुध्यति, दुह्यति, ईर्ष्यति, असूयति वा’ (कृष्ण कंस के प्रति क्रोध, द्रोह, ईर्ष्या या निन्दा का भाव रखता है।)
(iii) नमः स्वस्ति स्वाहा स्वधालं वषट् योगाच्च ।
नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा (देवों के लिए आहुति), स्वधा ( पितरों के लिए जलदान), अलम् (समर्थ) और वषट् ( मन्त्र विनियोग में प्रयुक्त शब्द) के योग में सदैव चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक) का प्रयोग होता है; यथा – ‘नमः भगवते वासुदेवाय’ ( भगवान् वासुदेव को नमस्कार ), ‘बालकाय स्वस्ति’ (बालक का कल्याण हो), ‘इन्द्राय स्वाहा’ (इन्द्र के लिए बलि या आहुति), ‘पितृभ्यः स्वधा’ (पितरों के लिए जलाञ्जलि), ‘कृष्णः कंसाय अलम्’ (कृष्ण कंस के लिए समर्थ या पर्याप्त है ) ।
(iv) धारेरुत्तमर्णः ।
धारि (धृ) धातु (ऋण लेना) के साथ ऋणदाता को चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक ) में रखा जाता है; यथा— ‘गोपाल: गोविन्दाय शतं धारयति’ (गोपाल गोविन्द का सौ रुपयों का ऋणी है ) ।
(v) स्पृहेरीप्सितः ।
स्पृह् (चाहना) धातु तथा उससे निर्मित शब्दों के साथ इष्ट (ईप्सित ) वस्तु का चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक ) में प्रयोग होता है; यथा—’ धनाय स्पृहयति’ (धन की इच्छा करता है ) ।
(vi) तादर्थ्ये चतुर्थी वाच्या।
जिस प्रयोजन के लिए जो वस्तु या क्रिया होती है, उसे चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक ) में रखा जाता है; यथा- ‘भक्तः मुक्तये ब्रह्मं भजते ‘ ( भक्त मुक्ति के लिए ब्रह्म को भजता है ) ।
विशेष – (1) ‘अर्थम्’ और ‘कृते’ अव्ययों का प्रयोग भी चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक) के लिए होता है; यथा-‘ -‘ धनार्थम्’ (धन के लिए), ‘भोजनस्य कृते’ (भोजन के लिए), ‘काव्यं यशसे’ (काव्य यश के लिए)।
विशेष – (2) ‘हित’ के योग में भी चतुर्थी विभक्ति ( हितयोगे च) का प्रयोग होता है; यथा – ‘ब्राह्मणाय हितम्’ (ब्राह्मण के लिए हितकर है)।
[6] पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक ) के शब्द रूपों तथा लोट्लकार (आज्ञा, आशीर्वाद) के क्रिया-रूपों का प्रयोग
| (1) ते नगरात् आगच्छन्तु। | वे सब नगर से आएँ। |
| (2) रामः विद्यालयात् निर्गच्छतु । | राम विद्यालय से निकल जाए। |
| (3) वृक्षात् फलानि पतन्तु । | वृक्ष से फल गिरें। |
| (4) अश्ववार: अश्वात् न पततु । | घुड़सवार घोड़े से न गिरे। |
| (5) त्वं वनात् आगच्छ । | तू वन से आ । |
| (6) यूयं पुस्तकात् पाठं स्मरथ । | तुम सब पुस्तक से पाठ याद करो। |
| (7) अहं पापात् मुक्तः भवानि । | मैं पाप से मुक्त हो जाऊँ । |
| (8) वयं सरोवरात् निर्गच्छाम । | हम तालाब से निकल जाएँ। |
| (9) पुस्तकं गुरुहस्तात् नैव पततु । | पुस्तक गुरु के हाथ से न गिरे। |
| (10) सत्यात् न प्रमंद । | सत्य से प्रमाद मत कर। |
(क) वाक्य में जिससे कर्त्ता का अलग होना पाया जाए, उसे पञ्चमी विभक्ति ‘अपादान कारक’ कहा जाता है। देखिए उपर्युक्त सभी वाक्यों में आए हुए मोटे छापे के पद ।
(ख) हिन्दी में अपादान कारक का चिह्न ‘से’ ( पृथक्ता में ) होता है; यथा – उपर्युक्त सभी वाक्यों के मोटे छापे के पदों से व्यक्त है।
सूत्र (1) – ‘ध्रुवमपायेऽपादानम्’ – ध्रुव ( निश्चय, अटल) अर्थात् कर्त्ता का अलग होना अपादान (कारक ) कहलाता है।
सूत्र (2) – ‘अपादाने पञ्चमी’ अपादान कारक में (पञ्चमी विभक्ति) होती है।
(ग) पञ्चमी विभक्ति ( अपादान कारक ) के प्रयोग के नियम—
(i) भीत्रार्थानां भयहेतुः ।
भी (भय) और त्रा (रक्षा करना) अर्थवाली धातुओं के संयोग में भय के कारण में पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक ) होती है; यथा— ‘कायरः वीरात् बिभेति’ (कायर वीर से डरता है), ‘आरक्षा आतङ्कात् त्रायते’ (सिपाही आतंक से रक्षा करता है ) ।
(ii) जनिः कर्तुः प्रकृतिः भुवः प्रभवश्च, वारणार्थानाभीप्सितः, आख्यातोपयोगश्च ।
जब जिससे कोई वस्तु उत्पन्न होती या निकलती या हटाई जाती है, या कर्त्ता को किसी कार्य से रोका जाता है; जिससे नियमित रूप से विद्या पढ़ी जाती है, तब उत्पन्न होने, निकलने, हटाने, रोके जाने तथा पढ़ानेवाले को पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक ) में रखा जाता है; यथा – ‘पापात् दोषाः जायन्ते’ (पाप से दोष उत्पन्न होते हैं), ‘गुरुः कुमार्गात् शिष्यं निवारयति’ (गुरु शिष्य को कुमार्ग से हटाता, रोकता है), ‘शिष्यः गुरोः पाठं पठति’ (शिष्य गुरु से पाठ पढ़ता है) आदि ।
(iii) अन्यारादितर्ते दिक् शब्दानां चूत्तरपदाजाहि युक्ते ।
अन्य (सिवाय, अतिरिक्त), आरात् ( दूर या समीप), इतर (दूसरा), ऋते (बिना), दिक् (दिशावाची और समयवाची शब्द) शब्दों के योग में पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक) का प्रयोग होता है। यथा – (अन्य ) ‘ भगवतोऽन्य इतरो वा ममशरणं नास्ति’ (भगवान् के बिना दूसरी मेरी शरण नहीं है), (ऋते )’ ज्ञानात् ऋते सुखं नास्ति’ (ज्ञान के बिना सुख नहीं है); (आरात्) ‘वनमारात् जलमास्ति’ (वन के समीप या दूर जल है), (इतर) ‘रामादितरः अन्यः कोऽस्ति ?’ (राम से दूसरा कौन है? ), ( दिक् ) ‘भारतात् उत्तरदिशि हिमालयः वर्त्तते’ (भारत से उत्तर दिशा में हिमालय है), (काल या समय) ‘आषाढात् पूर्वम् ज्येष्ठः भवति’ (आषाढ़ से पहले ज्येष्ठ होता है) ।
‘आहि’ प्रत्यय के योग में भी पञ्चमी विभक्ति होती है; यथा – दक्षिणाहि ग्रामात् ।
(iv) पञ्चमी विभक्तेः ।
जहाँ दो वस्तुओं, व्यक्तियों आदि में श्रेष्ठता, विनम्रता और भिन्नता बताई जाती है, वहाँ तुलनात्मक शब्द को पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक) में रखा जाता है; यथा – ‘ ध्यानात् ज्ञानं विशिष्यते’ (ध्यान से ज्ञान श्रेष्ठ होता है)।
[7] षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक) के शब्द-रूपों और विधिलिङ (विधि और प्रार्थना) लकार के क्रिया रूपों का प्रयोग
(1) पुत्रः जनकस्य सेवां कुर्यात् ।
पुत्र को पिता की सेवा करनी चाहिए।
(2) बालकः सत्यस्य पालनं कुर्यात् ।
बालक को सत्य का पालन करना चाहिए।
(3) नरा: धर्मस्य आचरणं कुर्युः ।
मनुष्यों को धर्म का आचरण करना चाहिए।
(4) राजा प्रजायाः पालनं कुर्यात् ।
राजा को प्रजा का पालन करना चाहिए।
(5) सज्जनाः दुष्टानां सङ्गतिं न कुर्युः ।
सज्जनों को दुष्टों की संगति नहीं करनी चाहिए ।
(6) पत्नी पत्युः अनुगामिनी भवेत् ।
पत्नी को पति की अनुगामिनी होना चाहिए।
(7) त्वं पाठस्य वाचनं कुर्या: ।
तुझे पाठ का वाचन करना चाहिए।
(8) वयं शरदः शतं जीवेम ।
हम सौ वर्षों तक जिएँ ।
(9) आवां शरदः शतं पश्येव ।
हम दोनों सौ वर्षों तक देखें।
(10) यूयं दलितानां रक्षां कुर्यात।
तुम्हें दलितों की रक्षा करनी चाहिए।
(क) जब छहों कारकों के अतिरिक्त, अर्थात् जब दो संज्ञा या सर्वनाम शब्दों का परस्पर स्वामी, सेवक, पिता-पुत्र, पति – पत्नी, गुरु-शिष्य और कार्य-कारण आदि का सम्बन्ध होता है, तब जिसका सम्बन्ध होता है, उसे षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक ) में रखा जाता है; यथा- – उपर्युक्त वाक्यों के मोटे छापे के पदों से स्पष्ट होता है।
षष्ठी विभक्ति सम्बन्धी सूत्र है – ‘ षष्ठी शेषे ‘ ।
हिन्दी में सम्बन्ध कारक के चिह्न – का, की, के, रा, री, रे, ना, नी, ने होते हैं।
(ख) षष्ठी विभक्ति ( सम्बन्ध कारक ) के प्रयोग सम्बन्धी नियम—
(i) षष्ठी हेतु प्रयोगे ।
हेतु के प्रयोग में षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक ) होती है; यथा—’अल्पस्य हेतोः बहु हातुमिच्छति’ (थोड़े के कारण से बहुत छोड़ना चाहता है), ‘अन्नस्य हेतोर्वसति’ (अन्न के लिए बसता है ) ।
(ii) तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम्।
‘ बराबर’ या ‘समान’ वाचक — तुल्य, सदृश, सम, समान आदि-शब्दों के योग में, जिससे तुलना की जाती है, उसमें षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक ) या तृतीया विभक्ति (करण कारक) का प्रयोग होता है; यथा – ‘नासीत् रामस्य (रामेण वा ) समः कोऽपि वीरः ?’ (राम के समान कोई भी वीर नहीं था ) ।
(iii) अधीगर्थदयेशां कर्मणि ।
स्मरण करना, दया करना, स्वामी होना के अर्थ देनेवाले शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक) के स्थान पर षष्ठी विभक्ति ‘ (सम्बन्ध कारक) का प्रयोग होता है; यथा— -‘मातुः स्मरति’ (माता का स्मरण करता है), ‘दलितस्य दयालुः’ (दलित पर दया करनेवाला), गात्राणामीष्टे’ (शरीर या शरीरों का स्वामी)।
(iv) कर्तृकर्मणोः कृतिः ।
कृदन्त प्रत्ययों के योग में प्रथमा विभक्ति ( कर्त्ता कारक ) और द्वितीया विभक्ति ( कर्म कारक ) के स्थान पर षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक) का प्रयोग होता है; यथा—’ कवेः कृति:’ (कवि की कृति) (द्वितीया या कर्म में), ‘हरिः जगतः कर्त्ता’ (हरि जगत् का कर्त्ता है ) (प्रथमा या कर्त्ता में ) ।
विशेष – कृते, मध्ये, समक्ष, दूर और समीप आदि शब्दों के योग में षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक) का प्रयोग होता है; यथा-
(कृते) नेता सर्वेषां कृते कार्यं कुर्यात् ।
(नेता को सबके लिए कार्य करना चाहिए)।
(मध्ये) सर्वेषां देवानां मध्ये शिवः श्रेष्ठः ।
( सब देवों के मध्य शिव श्रेष्ठ हैं ) ।
(समक्ष ) शिष्याः गुरोः समक्षं तिष्ठन्ति ।
(शिष्य गुरु के सामने बैठते हैं ) ।
(दूरम्) वनं ग्रामस्य दूरम् अस्ति ।
(वन गाँव से दूर है)।
(समीपम् ) विद्यालयः ग्रामस्य समीपम् अस्ति।
(विद्यालय ग्राम के समीप है)।
[8] सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) के शब्द-रूपों और पाँचों लकारों के क्रिया-रूपों का प्रयोग
(1) रामः भवने निवसति ।
राम भवन में रहता है।
(2) नेता सभायां भाषणम् अकरोत् ।
नेता ने सभा में भाषण किया।
(3) खगाः वृक्षे कूजन्ति ।
पक्षी वृक्ष पर कूजते हैं।
(4) मालाकार : उपवनेऽवसत् ।
माली बगीचे में रहता था।
(5) नौका नद्यां तरिष्यति ।
नाव नदी में तैरेगी।
(6) रात्रौ दधि न भुञ्जीत ।
रात में दही नहीं खानी चाहिए।
(7) अहं विद्यालये पठानि ।
मैं विद्यालय में पढूँ।
(8) ऋषयः आश्रमे वसन्ति ।
ऋषि लोग आश्रम में रहते हैं।
(9) यूयं मार्गे तिष्ठेत ।
तुम सबको मार्ग पर ठहरना चाहिए।
(10) वयं परीक्षायाम् उत्तीर्णाः अभवाम|
हम सब परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए थे।
(क) वाक्य में जो पद (शब्द) क्रिया का आधार होता है अर्थात् जिस वस्तु या स्थान पर कोई कार्य होता है, उसे अधिकरण कारक कहा जाता है। भाव यह है कि क्रिया या कार्य के आधार को अधिकरण कहा जाता है; यथा—उपर्युक्त वाक्यों में मोट छापे के पदों से व्यक्त है।
सूत्र 1. आधारोऽधिकरणम्।
(आधार को अधिकरण कहा जाता है ) ।
सूत्र 2. सप्तम्यधिकरणे च ।
(अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है)।
(ख) सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक ) के प्रयोग के नियम —
(i) यतश्च निर्धारणम् ।
निर्धारण करने (जाति, गुण, क्रिया, संज्ञा की विशेषता के कारण या किसी वस्तु, मनुष्य आदि को समुदाय से पृथक् करना) में कर्त्ता को जिस समुदाय से पृथक् किया जाता है, उस समुदायवाचक शब्द में विकल्प से सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक ) होती है; क्योंकि इसमें षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक) का भी प्रयोग होता है; यथा – ‘काव्येषु काव्यानां वा माघः श्रेष्ठः ‘ [ काव्यों में माघ (काव्य) श्रेष्ठ है], ‘पुरुषेषु पुरुषाणां वा रामः श्रेष्ठ: ‘ ( पुरुषों में राम श्रेष्ठ है ) ।
(ii) यस्य च भावे भावलक्षणम् ।
जब किसी एक कार्य के पूर्ण होने पर दूसरा कार्य प्रारम्भ होता है, तब पहले कार्य में सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) का प्रयोग होता है; यथा— ‘सूर्यास्ते सति आकाशे नक्षत्राः टिमटिमायन्ते’ (सूर्यास्त हो जाने पर आकाश में नक्षत्र टिमटिमाते हैं ) ।
विशेष – इस नियम से होनेवाली सप्तमी विभक्ति को ‘सति सप्तमी’ या ‘भावे सप्तमी’ कहते हैं।
(iii) सामान्य रूप में सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक ) का प्रयोग निम्नलिखित दशाओं में होता है-
(1) जिस समय कार्य किया जाता है, तब समयवाचक शब्द में सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) का प्रयोग होता है; यथा—’छात्राः प्रभाते पठन्ति’ (छात्र प्रभातकाल में पढ़ते हैं ) ।
(2) ” जिसके प्रति स्नेह, आसक्ति और सम्मान आदि व्यक्त किया जाता है, उसे सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) में रखा जाता है; यथा – ( स्नेह ) ‘ किं नु खलु बालेऽस्मिन् स्निह्यति मे मनः?’ (मेरा मन इस बालक के प्रति क्यों स्नेह करता है? ), ( आसक्ति) ‘भोगिनः भौतिकसुखेषु आसक्तिर्भवति’ (भोगी लोगों की भौतिक सुखों के प्रति आसक्ति होती है), (सम्मान) ‘राजनीतौ नात्यादृतं ते मनः’ (तुम्हारा मन राजनीति के प्रति आदर देनेवाला नहीं है ) ।
(3) जब वाक्य में कारणवाची शब्द का प्रयोग होता है, तब कार्यवाचक शब्द को सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) में रखा जाता है; यथा – ‘दैवेमेव हि नराणां वृद्धौ क्षये च कारणम्’ (भाग्य ही नरों की उन्नति और अवनति का कारण है)।
(4) सोपसर्ग ‘युज्’ धातु से निर्मित शब्दों के योग में सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) का प्रयोग होता है; यथा – ‘पितेव हिते नियुक्ते’ (पिता के समान हित में लगाता है)।
(5) ‘योग्यता’, ‘उपयोगिता’ आदि अर्थों का बोध करानेवाले शब्दों • के योग में, उस व्यक्ति को बतानेवाला शब्द सप्तमी विभक्ति (अधिकरण, कारक) में रखा जाता है, जिसके विषय में ‘योग्यता’ या ‘उपयोगिता’ का कथन होता है; यथा— ‘त्रिभुवनस्यापि प्रभुत्वं त्वयियुज्यते’ (त्रिभुवन का प्रभुत्व तुम्हारे लिए उचित है ) ।
(6) जिसे कोई वस्तु समर्पित की जाती है, उसे सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) में रखा जाता है; यथा – ‘योग्ये पुत्रे न्यस्तः समस्तः राज्यभार:’ (योग्य पुत्र पर सारा राज्य – भार डाल दिया ) ।
(7) विश्वास या भरोसावाचक शब्दों के योग में, जिसके प्रति विश्वास किया जाता है, उसे सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) में रखा जाता है; यथा – ‘यः विश्वस्ते विश्वसिति’ (जो विश्वस्त के प्रति विश्वास करता है)।
(8) ‘साधु’ और ‘असाधु’ शब्दों के योग में, जिसके प्रति ‘साधुता’ या ‘असाधुता’ प्रदर्शित की जाती है, उसे सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) में रखा जाता है; यथा – ‘सः मातरि साधु, शत्रौ असाधुश्च वर्त्तते’ (वह माता के प्रति साधु और शत्रु के प्रति असाधु है)।
(9) चतुर या होशियार अर्थ को प्रकट करनेवाले कुशल, निपुण, शुष्क, पटु, पण्डित, निष्णात आदि तथा धूर्त, या, कि, तब आदि शब्दों के योग में सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) का प्रयोग होता है; यथा – ‘युधिष्ठिरः अक्षद्यूते निपुणः आसीत्’ (युधिष्ठिर जुआ खेलने में निपुण था)।
