UK Board 10 Class Hindi Chapter 0 – भारत वन्दना (संस्कृत विनोदिनी)
UK Board 10 Class Hindi Chapter 0 – भारत वन्दना (संस्कृत विनोदिनी)
UK Board Solutions for Class 10th Hindi Chapter 0 – भारत वन्दना (संस्कृत विनोदिनी)
पाठ का सार
निर्मल गंगा के जल से पवित्र की गई भारतमाता के ज्ञानीजन गीत गाते हैं। इसके सिर पर हिमालय का मुकुट और पैरों में हिन्द महासागर है। लहलहाती फसलें और वनसम्पदा इसके वस्त्र हैं। यह ऋषि-मुनियों के मन्त्र से पुलकित है। धीर-वीर राजाओं द्वारा इसका पालन और कवियों द्वारा इसके पावन चरित्र का गान किया जाता है। हे भारतमाता हमारा मन भी सदा तुम्हारे चरणों की वन्दना और तुम्हारी संस्कृति एवं संस्कृत का चिन्तन करता रहे।
पाठाधारित अवबोधन-कार्य एवं भावानुवाद
(1) भारतमाता बुधजन …………. भारतजननी ॥
शब्दार्था :- बुधजनगीता = विद्वान् लोगों द्वारा गाई गई; पूता = पवित्र बनाई गई; शिरसि = सिर पर; विराजित = स्थित, सुशोभित; हिन्दुमहोदधि = हिन्द महासागर; सलिलम् = जल; जघने = जंघा पर; सस्य = फसल; लता = लताएँ; तरुवसनम् = वृक्षरूपी वस्त्र |
अन्वयः – बुधजन भारतमाता (स्तुति) गीता, निर्मलगङ्गाजल पूता । हिमगिरिमुकुटं शिरसि विराजित । हिन्दुमहोदधि – सलिलं चरणे (विराजित ) । सस्यलता-तरुवसनं जघने ( धारिता) । (ईदृशी) भारतजननी जय ।
हिन्दी- भावानुवादः – विद्वानों द्वारा भारतमाता के गीत गाए गए हैं, निर्मल गंगा-जल से (यह) पवित्र की गई है। हिमालय का मुकुट (इसके) सिर पर सुशोभित है, हिन्द महासागर का जल चरणों में ( सुशोभित है ) । फसल, लता और वृक्षरूपी वस्त्र (अपनी) जंघाओं पर ( धारण किए है) (ऐसी) भारतमाता की जय हो ।
व्याख्या – कवि भारतमाता के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करते हुए कहता है कि यह भारतमाता इतनी महिमाशाली है कि विद्वान् लोग इसकी महिमा के गीत गाते रहे हैं। गंगा का निर्मल और पवित्र जल इसको सींचकर इसकी पवित्रता को बनाए रखता है। इसके सिर पर हिमालय का श्वेत मुकुट है और चरणों में हिन्दसागर का जल सुशोभित है। वह सदैव इसके चरणों का प्रक्षालन करता रहता है। हरी-भरी फसलों से आच्छादित खेत और लताओं एवं वृक्षों से हरे-भरे वन वस्त्रों के समान इसको ढके हुए हैं। ऐसी भारतमाता की जय हो। सारा विश्व इसका गुणगान करता रहे। ॥
(2) ऋषिवर-घोषित ………….. जय भारतजननी ॥
शब्दार्था: – ऋषिवर = श्रेष्ठ मुनि; घोषित = घोषणा किए गए; पुलकिता = चेतन बनाई गई; कविवर = श्रेष्ठ कवि; गुम्फित = गूँथा गया; पावन = पवित्र; चरिता = चरित्रवाली; धीर = धैर्यशाली; नृप = राजा; शौर्य-पालिता = पराक्रम द्वारा पाली गई, रक्षा की।
अन्वयः – ऋषिवर – घोषित – मन्त्र – पुलकिता, कविवर पावन-चरिता – गुम्फित, धीर – वीर – नृप – शौर्य – पालिता भारतजननी जय।
हिन्दी – भावानुवादः — श्रेष्ठ मुनियों द्वारा घोषित मन्त्रों से चेतन की गई, श्रेष्ठ कवियों द्वारा गूँथी गई पवित्र चरित्रवाली (और) धैयशाली, वीर राजाओं द्वारा (अपने ) पराक्रम से पाली गई भारतमाता की जय हो ।
व्याख्या – श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों ने विश्व के लिए कल्याणकारी मन्त्रों का उच्चारण करके इसकी चेतना को जाग्रत किया है अर्थात् इस भारतभूमि के कण-कण में विश्वकल्याण की भावना समाहित है। श्रेष्ठ कवियों ने इसके पवित्र चरित्र को अपनी कविताओं में गूँथकर उसे जन-जन तक पहुँचाया है। धैर्यशाली वीर राजाओं ने अपने पराक्रम से इसका लालन-पालन और रक्षा की है। ऐसी गौरवशालिनी भारतमाता की जय हो ।
(3) मम मनसि …………… जय भारतजननी।
शब्दार्थाः – मनसि = मन में; तव = तुम्हारे; पदयुगलम् = दोनों चरण; सतत = निरन्तर, प्रगतिशील; चिन्तनम् = चिन्तन, विचार; मेलनम् = मेल, संयोग ।
अन्वयः – ( हे भारतमाता ! ) तब पदयुगलं मम मनसि सदा (अवस्थितम् ), संस्कृत संस्कृति (च) सतत – चिन्तनम्, भाव- राग-लयताल (मध्ये सदैव ) मेलनं भवतु । भारतजननी जय ।
हिन्दी – भावानुवादः – ( हे भारतमाता ! ) तुम्हारे दोनों चरण मेरे मन में सदा विराजमान् रहें, संस्कृत और संस्कृति का चिन्तन निरन्तर चलता रहे, भाव- राग, लय (और) ताल का समन्वय (मेल) रहे। (हे) भारतमाता (तुम्हारी) जय हो ।
व्याख्या – हे भारतमाता तुम्हारे चरणों का ध्यान मेरे मन में सदैव बना रहे। अर्थात् तुम्हारे प्रति मेरे मन में श्रद्धा और भक्ति सदैव बनी रहे, एकक्षण के लिए भी तुम्हारा विस्मरण मुझे न हो। अपनी भाषा संस्कृत और भारतीय संस्कृति का चिन्तन-मनन सदैव करते रहें कि इनकी उन्नति और विकास किस प्रकार सम्भव है। हमारे मन के भावों, लालसाओं, मन की उमंगों और क्रिया-कलापों में अर्थात् मन, वचन और कर्मों में समन्वय बना रहे। हे भारतमाता! तुम्हारी जय हो ।
