UK Board 10 Class Hindi Chapter 3 – साना-साना हाथ जोड़ि….. (कृतिका)
UK Board 10 Class Hindi Chapter 3 – साना-साना हाथ जोड़ि….. (कृतिका)
UK Board Solutions for Class 10th Hindi Chapter 3 – साना-साना हाथ जोड़ि….. (कृतिका)
साना-साना हाथ जोड़ि …. (मधु काँकरिया)
1. पाठ्यपुस्तक में दिए गए प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1 – झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक (गैंगटॉक) लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था ?
उत्तर – लेखिका जब गंतोक पहुँची तो झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक उन्हें सम्मोहित करने लगा। वे सम्मोहित अवस्था में सोचने लगी—जैसे आसमान उल्टा पड़ा हो और सारे तारे बिखरकर नीचे टिमटिमा रहे हों। दूर पहाड़ी ढलानों पर तराई में सितारों के गुच्छ रोशनियों की एक झालर – सी बना रहे थे।
प्रश्न 2 – गंतोक (गैंगटॉक) को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ क्यों कहा गया?
उत्तर— गंतोक पर्वतीय नगर है। यहाँ के लोग ऊँचे-नीचे सँकरे पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए कठिन परिश्रम करते हैं। गंतोक का इतिहास और नगर की एक-एक वस्तु उनके कठिन परिश्रम की गवाही देती है। इसलिए लेखिका ने इसे ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ कहा है।
प्रश्न 3 – कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का फहराना किन अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है?
उत्तर – श्वेत पताकाएँ बौद्ध पताकाएँ हैं। किसी ध्वज की तरह फहराती ये पताकाएँ शान्ति और अहिंसा की प्रतीक हैं। इन पर मन्त्र लिखे रहते हैं। जब भी किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु होती है तो उसकी आत्मा की शान्ति के लिए शहर से दूर किसी भी पवित्र स्थान पर ये धीरे-धीरे स्वतः नष्ट हो जाती हैं। रंगीन पताकाएँ किसी नवीन कार्य एक सौ आठ श्वेत पताकाएँ फहरा दी जाती हैं। इन्हें उतारा नहीं जाता, को प्रारम्भ करते समय फहराई जाती हैं।
प्रश्न 4 – जितेन नोर्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति के बारे में, वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में क्या महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दीं? लिखिए।
उत्तर- जितेन नोर्गे लेखिका का ड्राइवर-कम-गाइड था। जितेन ने लेखिका को बौद्ध पताकाओं के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी।
जितेन बताने लगा — इस जगह का नाम है कवी-लोंग स्टॉक। यहाँ ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग हुई थी । तिब्बत के चीस-खे बम्सन ने लेपचाओं के शोमेन से कुंजतेक के साथ सन्धि-पत्र पर यहीं हस्ताक्षर भुटिया, सिक्किम की इन दोनों स्थानीय जातियों के बीच चले सुदीर्घ किए थे। एक पत्थर यहाँ स्मारक के रूप में भी है (लेप्याचार और झगड़ों के बाद शान्ति वार्त्ता का शुरूआती स्थल) ।
यहाँ की भौगोलिक स्थिति के बारे में जितेन ने बताया- “मैडम यह मैदानी नहीं, पहाड़ी इलाका है। मैदान की तरह यहाँ कोई भी आपको चिकना वर्बीला नहीं मिलेगा। यहाँ जीवन कठोर है। नीचे तराई में ले-देकर एक ही स्कूल है। दूर-दूर से बच्चे उसी स्कूल में जाते हैं। और सिर्फ पढ़ते ही नहीं हैं, इनमें से अधिकांश बच्चे शाम के समय अपनी माँओं के साथ मवेशियों को चराते हैं, पानी भरते हैं, जंगल से लकड़ियों के भारी-भारी गट्ठर ढोते हैं। खुद मैंने भी ढोए थे।” ।
जितेन कुछ दिन पूर्व ही नेपाल से आया था। रास्ते में मिले फौजियों को देख उसे नेपाल के माओवादी याद आ गए थे। उसने लेखिका को बताया कि नेपाल में अभी हाल ही में सेना और माओवादियों के बीच जो मुठभेड़ हुई थी, उसमें हेलिकॉप्टर से बम बरसाकर हजारों माओवादी मार डाले गए थे – ” पर जिगरा देखिए इनका, जैसे ही इनका, कोई भी कामरेड नीचे गिरता था ये तुरंत अपने पीठ पर बँधी डोको में उसकी डेड बॉडी को डाल लेते। क्या मजाल कि एक भी लाश सरकार के हाथ लगी हो । मैडम अखबारों में आपने यह कहीं नहीं पढ़ा होगा।’ ין
” यूमथांग की घाटियों में एक नया आकर्षण और जुड़ गया था… ढेरों – ढेर प्रियुता और रूडोडेण्ड्रो के फूल । जितेन इनके विषय में लेखिका को बताने लगा, ‘बस पंद्रह दिनों में ही देखिएगा, पूरी घाटी फूलों से इस कदर भर जाएगी कि लगेगा फूलों की सेज रखी हो। “
लेखिका आगे बढ़ी। यहाँ रास्ते अपेक्षाकृत चौड़े थे, इस कारण खतरों का डर कम था । इन घाटियों में कई बन्दर भी दिखे। कुछ अकेले तो कुछ अपने बाल-बच्चों के साथ। इन्हें देख जितेन ने लेखिका को बताया- “मैडम हमारे यहाँ बन्दर का मांस भी खाया जाता है। कहते हैं कि इससे कैंसर नहीं होता है।’ “
” क्या? क्या तुमने खाया है बन्दर का मांस ? “
“मेरी बात छोड़िए मैडम, मैंने बन्दर तो क्या कुत्ते तक का मांस भी खाया है। “
सभी सैलानी जितेन को गप्पी समझ अविश्वास से उसे देख रहे थे, परन्तु लेखिका जानती थी कि जितेन सच बोल रहा था। इन पठारी इलाकों की भयावह गरीबी लेखिका झारखण्ड और दक्षिण बिहार के पठारी इलाकों में देख चुकी थी, जहाँ के आदिवासी सूअर तक का दूध पीने को विवश थे।
प्रश्न 5- लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी क्यों दिखाई दी ?
उत्तर – लेखिका जब यूमथांग की ओर जा रही थी तो उन्हें एक कुटिया के अन्दर घूमता चक्र दिखाई दिया। जितेन नोर्गे ने लेखिका को बताया कि यह धर्मचक्र है— प्रेयर व्हील । इसको घुमाने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
लेखिका उसकी बात सुनकर हँस पड़ती है और सोचने लगती है। कि चाहे मैदान हो अथवा पहाड़, तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बाद भी पूरे भारत की आत्मा एक जैसी है। सारे भारत के लोगों की आस्था, विश्वास, अन्धविश्वास, पाप-पुण्य की अवधारणाएँ सभी एक जैसे हैं।
प्रश्न 6 – जितेन नोर्गे की गाइड की भूमिका के बारे में विचार करते हुए लिखिए कि एक कुशलं गाइड में क्या गुण होते हैं?
उत्तर- जितेन नोर्गे की गाइड की भूमिका से पता चलता है कि एक कुशल गाइड में निम्नलिखित गुण होते हैं-
1. वह मृदुभाषी होता है।
2. उसे सम्बन्धित स्थान की भौगोलिक स्थिति, प्रकृति और जनजीवन की पूर्ण जानकारी होती है।
3. उसे क्षेत्र के सभी स्थानों व मार्गों का ज्ञान होता है।
4. गाइड को पर्यटक की प्रत्येक सुविधा का ध्यान रखना होता
5. गाइड को दृढ़संकल्पी होना आवश्यक है।
प्रश्न 7 – इस यात्रा वृत्तांत में लेखिका ने हिमालय के जिन-जिन रूपों का चित्र खींचा है, उन्हें अपने शब्दों में लिखिए ।
उत्तर- लेखिका गंतोक में थीं। उसे कंचनजंघा देखने की उत्सुकता थी। हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा ! पर मौसम अच्छा होने के बाद भी आसमान हल्के-हल्के बादलों से ढका था, इस कारण कंचनजंघा न दिखनी थी, न दिखी। पर सामने ही तरह-तरह के रंग-बिरंगे इतने सारे फूल दिखाई पड़े कि लेखिका को लगा कि वह फूलों के बाग में आ गई है। यात्रा में आगे बढ़ने पर हिमालय पहाड़ियों के रूप में नहीं, वरन् अपने विराट् रूप एवं वैभव के साथ सामने आने लगा था। न जाने कितने दर्शकों, यात्रियों और तीर्थानियों का काम्य हिमालय ! पल-पल परिवर्तित होता हिमालय!
रास्ते वीरान, सँकरे और जलेबी की तरह घुमावदार होने लगे थे। हिमालय बड़ा होते-होते विशालकाय होने लगा था। घटाएँ गहराती – गहराती पाताल नापने लगी थीं। वादियाँ चौड़ी होने लगी थीं। उन भीमकाय पर्वतों के बीच और घाटियों के ऊपर बने सँकरे कच्चे-पक्के रास्तों से गुजरते यूँ लग रहा था, जैसे लेखिका किसी सघन हरियालीवाली गुफा के बीच हिचकोले खाती निकल रही हो ।
पल-पल परिवर्तित हिमालय ! कहीं चटक हरे रंग का मोटा कालीन ओढ़े तो कहीं हल्का पीलापन लिए, तो कहीं प्लास्तर उखड़ी दीवार की तरह पथरीला और देखते-ही-देखते परिदृश्य से सब छू-मन्तर “जैसे किसी ने जादू की छड़ी घुमा दी हो। सब पर बादलों की एक मोटी चादर। सब कुछ बादलमय ।
चित्रलिखित-सी लेखिका ‘माया’ और ‘छाया’ के इस अनूठे खेल को भर-भर आँखों देखती जा रही थी। प्रकृति जैसे लेखिका को सयानी बनाने के लिए जीवन – रहस्यों का उद्घाटन करने पर तुली हुई थी।
धीरे-धीरे धुन्ध की चादर थोड़ी छँटी। अब वहाँ पहाड़ नहीं, दो विपरीत दिशाओं से आते छाया-पहाड़ थे। और थोड़ी देर बाद ही वे छाया – पहाड़ अपने श्रेष्ठतम रूप में लेखिका के सामने थे। जीप थोड़ी देर के लिए रुकवा दी गई थी। लेखिका ने देखा कि सब ओर जैसे स्वर्ग का सा दृश्य था। नजरों के छोर तक खूबसूरती ही खूबसूरती । घाटियों और वादियों के दुर्लभ नजारे। वहीं कहीं लिखा था—’थिंक अपने को निरन्तर दे देने की अनुभूति कराते पर्वत, झरने, फूलों, ग्रीन।’
आश्चर्य! पलभर में ब्रह्माण्ड में कितना कुछ घटित हो रहा था। सतत प्रवाहमान् झरने, नीचे वेग से बहती तिस्ता नदी । सामने उठती धुन्ध । ऊपर मँडराते आवारा बादल । मद्धिम – मद्धिम हवा में हिलोरें लेते प्रियुता और रूडोडेण्ड्रो के फूलं । सब अपनी-अपनी लय, तान और प्रवाह में बहते हुए। चरैवेति-चरैवेति। और समय के इसी सतत प्रवाह में तिनके- सा बहता मानव ।
लेखिका को पहली बार अनुभव हुआ— जीवन का आनन्द यही चलायमान् सौन्दर्य है।
प्रश्न 8 – प्रकृति के उस अनन्त और विराट् स्वरूप को देखकर लेखिका को कैसी अनुभूति होती है?
उत्तर – प्रकृति के अनन्त और विराट् स्वरूप को देखकर लेखिका को जो अनुभूति होती है, उसे लेखिका ने निम्नलिखित शब्दों में प्रकट किया है—
“आदिम युग की किसी अभिशप्त राजकुमारी-सी मैं भी नीचे बिखरे भारी-भरकम पत्थरों पर बैठ झरने के संगीत के साथ ही आत्मा का संगीत सुनने लगी। थोड़ी देर बाद ही बहती जलधारा में पाँव डुबोया तो भीतर तक भीग गई। मन काव्यमय हो उठा। वह सत्य और सौंदर्य को छूने लगा।
जीवन की अनन्तता का प्रतीक वह झरना ..उन अद्भुत – अनूठे क्षणों में मुझमें जीवन की शक्ति का अहसास हो रहा था। इस कदर कि प्रतीत हुआ जैसे मैं स्वयं भी देश और काल की सरहदों से दूर बहती धारा बन बहने लगी हूँ। भीतर की सारी तामसिकताएँ और दुष्ट वासनाएँ इस निर्मल धारा में बह गईं। मन हुआ कि अनन्त समय तक ऐसे ही बहती रहूँ…..सुनती रहूँ इस झरने की पुकार को।”
प्रश्न 9 – प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनन्द में डूबी लेखिका को कौन-कौन-से दृश्य झकझोर गए?
उत्तर – लेखिका यूमथांग के पहाड़ी मार्ग पर जीप से जा रही थी। तभी उसने देखा कि कुछ पहाड़ी औरतें पत्थरों पर बैठीं पत्थर तोड़ रहीं हैं। उनके कोमल हाथों में कुदाल और हथौड़े हैं। कइयों की पीठ पर बँधी डोको (बड़ी टोकरी) में उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। कुछ कुदाल को भरपूर ताकत से जमीन पर मार रही थीं। इतनी प्राकृतिक सुन्दरता के बीच भूख, मौत, गरीबी, दीनता और जिन्दा रहने के लिए जंग जारी थी। मातृत्व और श्रम – साधना साथ – साथ दिखाई दे रहे थे। ये महिलाएँ रास्तों को चौड़ा बना रही थीं। पहाड़ों पर रास्ता बनाना बड़ा कठिन कार्य है। इसमें जान भी चली जाती है। पहले डाइनामाइट से चट्टानों को उड़ा दिया जाता है। फिर बड़े-बड़े पत्थरों को तोड़-तोड़कर समान आकार के छोटे-छोटे पत्थरों में बदला जाता है। फिर बड़े से जाले में उन्हें लम्बी पट्टी की तरह बिछाकर कटे रास्तों पर बाड़े की तरह लगाया जाता है।
इसी प्रकार सफर आगे बढ़ता है। लेखिका को कुछ फौजी छावनियाँ दिखाई देती हैं।
लेखिका को ध्यान आया कि यह बॉर्डर एरिया है। थोड़ी दूरी पर ही चीन की सीमा है। एक फौजी से लेखिका ने कहा – “इतनी कड़कड़ाती ठंड में (उस समय तापमान माइनस 15 डिग्री सेल्सियस था ) आप लोगों को बहुत तकलीफ होती होगी।” फौजी हँस दिया—एक उदास हँसी, “आप चैन की नींद सो सकें, इसीलिए तो हम यहाँ पहरा दे रहे हैं। ‘ “
लेखिका का मन उदास हो गया। भीतर कुछ पिघलने लगा। महानगर में रहते हुए कभी ध्यान ही नहीं आया कि जिन बर्फीले क्षेत्रों में वैशाख के महीने में भी पाँच मिनट में ही हम ठिठुरने लगे थे, हमारे ये जवान पौष और माघ में भी, जबकि सिवाय पेट्रोल के सबकुछ जम जाता है, तैनात रहते हैं। और जिन सँकरे, घुमावदार और खतरनाक रास्तों से गुजरने भर में हमारे प्राण काँप उठते हैं, उन रास्तों को बनाने में जाने कितनों के जीवन अपने समय के पूर्व ही खत्म हो गए हैं।
इस प्रकार उपर्युक्त दोनों दृश्य लेखिका को अन्दर तक झकझोर गए। लेखिका के शब्दों में “यह पूरा सफर चेतना और अंतरात्मा में हलचल मचानेवाला था । “
प्रश्न 10 – सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव कराने में किन-किन लोगों का योगदान होता है? उल्लेख करें।
उत्तर — सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव कराने में गाइड, क्षेत्रीय नागरिक, पर्यटन विभाग तथा प्रकृतिप्रेमी व्यक्तियों का अत्यधिक योगदान रहता है।
प्रश्न 11 – ” कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती हैं।” इस कथन के आधार पर स्पष्ट करें कि आम जनता की देश की प्रगति में क्या भूमिका है?
उत्तर — भारत की जो आम जनता घरेलू उत्पादों को उत्पन्न करनेवाली आर्थिक गतिविधियों में लगी रहती है, उसमें सम्मिलित प्रमुख लोग हैं-
(1) किसान।
(2) कृषि श्रमिक |
(3) पशुपालन, वनोद्योग, मत्स्यपालन, आखेट एवं बागान, फल, वाटिका एवं सम्बन्धित क्रियाओं में लगे श्रमिक |
(4) खनन एवं उत्खनन में लगे श्रमिक।
(5) निर्माण कार्यों में लगे श्रमिक।
(6) परिवहन, भण्डारण एवं संचार में लगे श्रमिक |
(7) अन्य सेवाओं में लगे श्रमिक।
ये सभी अपने श्रम के रूप में बहुत कम लेकर समाज को बहुत अधिक वापस लौटा देते हैं। निश्चय ही इनकी राष्ट्र की प्रगति में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
प्रश्न 12 – आज की पीढ़ी द्वारा प्रकृति के साथ किस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है? इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए?
उत्तर- आज की पीढ़ी अपने स्वार्थ के लिए प्राकृतिक साधनों का अन्धाधुन्ध दोहन कर रही है। हरे-भरे जंगल काटे जा रहे हैं। कारखानों का धुआँ और कचरा प्राकृतिक पर्यावरण को गम्भीर रूप में प्रभावित कर रहा है। वायु के साथ-साथ नदियों का जल भी दूषित होता जा रहा है। प्रकृति के साथ इस खिलवाड़ से स्वयं मानव का जीवन संकट में है।
इसे रोकने के लिए हमें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना होगा और इनकी वृद्धि के प्रयास करने होंगे। वृक्षारोपण करना होगा, कारखानों में प्रदूषण नियन्त्रण के उपाय करने होंगे, कारखानों और नगरों के जल को परिष्कृत करके नदियों में डालना होगा। धुँआ छोड़नेवाले कारखानों एवं वाहनों पर नियन्त्रण करना होगा।
प्रश्न 13 – प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का जिक्र किया गया है। प्रदूषण के और कौन-कौन-से दुष्परिणाम सामने आए हैं ? लिखें।
उत्तर – पाठ में प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का जिक्र किया गया है। यह वायु प्रदूषण के कारण तापमान में हुई वृद्धि कारण हुआ है। ऐसे ही निम्नलिखित प्रदूषण आज व्याप्त हैं-
जल प्रदूषण का सर्वप्रमुख कारण होता है कल-कारखानों के दूषित जल का नदी-नालों या जल स्रोतों में छोड़ा जाना। बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं में तो यह दूषित जल सब ओर फैलकर भीषण दुर्गन्ध और महामारियाँ फैलाता है। मनुष्य द्वारा जलस्रोतों के पास मल-मूत्र त्त्याग से भी जल प्रदूषित होता है। पालतू जानवरों को नदी में नहलाने व घाटों पर कपड़े धोने से जल प्रदूषण फैलता है। कूड़ा-करकट नदी में बहाना, मुर्दों को नदी में प्रवाहित करना भी जल को प्रदूषित करता है।
वायु प्रदूषण के अनेक कारण हैं। वायु में स्थित ऑक्सीजन हमारे लिए प्राणवायु है। इसकी मात्रा घटने तथा वायु में कार्बन डाइ-ऑक्साइड तथा कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से वायु प्रदूषण का खतरा पैदा हो जाता है। नगरों में वाहनों द्वारा छोड़े गए धुएँ और गाँवों में चूल्हे तथा पत्थर के कोयले आदि के भी वायु प्रदूषण होता है। धूल-मिट्टी को हवा में मिश्रित करनेवाले सारे व्यवसाय इसका प्रमुख कारण हैं; जैसे— ईंट, चूना, सीमेण्ट, खनिज कोयला आदि से सम्बन्धित व्यवसाय । इसी प्रकार पशुवध, साबुन, चर्बी, चमड़ा आदि से सम्बन्धित उद्योग भी वायु प्रदूषण फैलाते हैं।
ध्वनि-प्रदूषण भी आधुनिक जीवन की एक बड़ी समस्या है। वह ध्वनि, जो अनुपयोगी और कष्टकर हो, ‘शोर’ है। आज संगीत की जगह शोर ने ले ली है। कल-कारखानों की खड़खड़, खुट – खुट, वाहनों की चीख-पुकार, सड़क की दुकानों पर जोरों से बजता गीत-संगीत, रेलगाड़ी की आवाज, हवाई जहाज का शोर, शादी-विवाह और पूजन आदि के समय लाउडस्पीकरों की बहरा करनेवाली तीव्र आवाज – ये सब ध्वनि-प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। टी०वी०, रेडियो का जोर-जोर से बजाना भी ध्वनि प्रदूषण पैदा करता है।
आणविक प्रदूषण सबसे खतरनाक प्रदूषण है। संसार के सभी देशों में आज अणु-शक्ति के क्षेत्र में अपनी-अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने की होड़ लगी हुई है। इस अणु-शक्ति को निश्चित अवधि से पूर्व नष्ट करने से या शत्रु देश पर इसका प्रयोग करने से आणविक प्रदूषण होता है।
प्रदूषण के दुष्परिणाम – जल प्रदूषण से भयंकर रोग और महामारी फैलती हैं। हैजा, टाइफॉइड, पीलिया आदि जल प्रदूषण होनेवाले मुख्य रोग हैं। वायु प्रदूषण का दुष्परिणाम यह होता है कि लोग प्रायः हृदय रोग, श्वास रोग, नेत्र रोग, उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप, गले सम्बन्धी बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। बालू के महीन कण श्वास- वायु के द्वारा शरीर में जाने से तपेदिक की सम्भावना बढ़ जाती है। ध्वनि प्रदूषण भी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इससे केवल श्रवण-शक्ति के ह्रास की समस्या ही सामने नहीं आती, वरन् उच्च रक्तचाप, अल्सर, अनिद्रा, सिरदर्द आदि की भी समस्या घेरती है। आणविक प्रदूषण तो लाखों लोगों के प्राण ही ले लेता है। इसके प्रभाव से पलभर में लाखों-करोड़ों लोग अपंग हो जाते हैं, वनस्पतियाँ नष्ट हो जाती हैं। संक्षेप में प्रदूषण से सर्वत्र हानि – ही – हानि है।
प्रश्न 14 – ‘कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए ।
उत्तर— ‘कटाओ’ भारत का स्विट्जरलैण्ड कहलाता है। यह पूर्णत: प्राकृतिक स्थल है और हिमालय के बीच में बसा है। यहाँ अभी पर्यावरण प्रदूषण का असर नहीं है। यदि कंटाओ में किसी प्रकार की दुकान होगी तो लोग निश्चय ही दुकान से खरीदारी कर उससे बचे कागज, पन्नी, गत्ते, खाली बोतलें, टिन के डिब्बे आदि पहाड़ों पर ही फेंक देंगे। इस कारण ‘कटाओ’ में भी पर्यावरण प्रदूषण की समस्या खड़ी हो जाएगी। इसलिए कटाओ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है।
प्रश्न 15 – प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है?
उत्तर – हिमालय के हिमशिखर पूरे एशिया के जल के भण्डार व स्रोत हैं। सर्दियों में इन शिखरों पर बर्फ जम जाती है अर्थात् बर्फ के रूप में जल संगृहीत हो जाता है। गर्मियों में जब सभी जगह पानी के लिए त्राहि-त्राहि मचती है तो यह बर्फ शिलाएँ पिघल पिघलकर नदियों में जल के रूप में पहुँचती हैं और जन-जन के सूखे कण्ठों को शीतलता प्रदान करती हैं।
प्रश्न 16- – देश की सीमा पर बैठे फौजी किस तरह की कठिनाइयों से जूझते हैं? हमारा उनके प्रति क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए?
उत्तर – देश की सीमा पर बैठे फौजी अपना जीवन शीत, बर्फ, गर्म रेगिस्तान, वर्षा, दलदली क्षेत्र जैसी प्राकृतिक कठिनाइयों में व्यतीत करते हैं। इन्हीं के कारण हम अपने घरों में चैन की नींद सोते हैं। हम उनकी किसी प्रकार सहायता तो नहीं कर सकते; क्योंकि सीमा क्षेत्र निषिद्ध क्षेत्र होता है, फिर भी हम उनका आभार तो प्रकट कर ही सकते हैं। यदि आपात् स्थिति में उन्हें कभी हमारी सेवाओं की आवश्यकता हो तो हमें अवश्य ही उनकी सेवा के लिए तत्पर रहना चाहिए।
2. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1 – झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गैंगटॉक लेखिका को किस प्रकार सम्मोहित कर रहा था ?
अथवा गैंगटॉक के प्राकृतिक सौन्दर्य का निरूपण संक्षेप में कीजिए ।
‘उत्तर – लेखिका मधु काँकरिया ने हैरान होकर देखा – आसमान जैसे उलटा पड़ा था और सारे तारे बिखरकर नीचे टिमटिमा रहे थे। दूर….. ढलान लेती तराई पर सितारों के गुच्छे रोशनियों की एक झालर – सी बना रहे थे। क्या था वह ? वह रात में जगमगाता गैंगटॉक शहर था — इतिहास और वर्तमान के संधि-स्थल पर खड़ा मेहनतकश बादशाहों का वह एक ऐसा शहर था, जिसका सबकुछ सुन्दर था— सुबह, शाम, रात।
और वह रहस्यमयी सितारोंभरी रात लेखिका में सम्मोहन जगा रही थी, कुछ इस कदर कि उन जादूभरे क्षणों में उसका सब कुछ स्थगित था, अर्थहीन था …….. वह, उसकी चेतना, उसका आस-पास उसके भीतर – बाहर सिर्फ शून्य था और थी अतींद्रियता में डूबी रोशनी की वह जादुई झालर ।
