UK 10th Social Science

UK Board 10th Class Social Science – (आपदा प्रबन्धन) – Chapter 1 आपदा का परिदृश्य

UK Board 10th Class Social Science – (आपदा प्रबन्धन) – Chapter 1 आपदा का परिदृश्य

UK Board Solutions for Class 10th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (आपदा प्रबन्धन) – Chapter 1 आपदा का परिदृश्य

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 – आपदा क्या है? इसके कारण व घटकों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर— आपदा का अर्थ
आपदा प्राकृतिक एवं मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न वह स्थिति है जो व्यापक रूप से प्राकृतिक एवं मानवीय सम्पदा को क्षति पहुँचाती है। आपदा से हुई क्षति एवं उसका प्रभाव मानव समाज की प्रतिरोध क्षमता से अधिक होता है, इसलिए इसमें बाहरी सहायता की आवश्यकता अनुभव की जाती है।
आपदा के कारण एवं घटक
आपदा प्राकृतिक एवं मानवजनित दोनों कारणों से उत्पन्न होती है। प्राकृतिक कारणों में पृथ्वी की आन्तरिक हलचलें तथा वायुमण्डलीय विक्षोभ महत्त्वपूर्ण होता है जबकि मानव जनित आपदाओं के लिए मानव की भूल, असावधानी एवं विध्वंसात्मक प्रवृत्तियाँ अधिक उत्तरदायी हैं।
आपदा घटकों के अन्तर्गत भौगोलिक स्थिति, जिसे भू-वैज्ञानिक एवं भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ और वायुमण्डलीय दशाएँ प्रभावित करती हैं तथा मानव की विभिन्न गतिविधि और सामाजिक-आर्थिक दशाएँ (जनसंख्या, निर्धनता, औद्योगिकीकरण एवं नगरीकरण) मुख्य रूप से सम्मिलित हैं जो आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति प्रभावित करती हैं।
प्रश्न 2 – आपदाओं के प्रति उत्तराखण्ड की स्थिति की विवेचना कीजिए ।
उत्तर – उत्तराखण्ड राज्य आपदाओं की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील राज्य है। यहाँ प्राकृतिक विषमताओं की व्यापकता एवं मानव के प्रकृतिविरुद्ध कार्यों के कारण आपदाओं की आवृत्ति अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक मिलती है। राज्य में एक ओर भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़, त्वरित बाढ़, हिमस्खलन, वनाग्नि ऐसी मौसमी आपदाएँ हैं जो वर्ष के एक विशेष समय में अत्यधिक आवृत्ति के साथ प्रभावशाली हो जाती हैं, तो दूसरी तरफ भूकम्प समय – समय पर अपने विनाशकारी तांडव से हानि पहुँचाता रहता है। मानवीय आपदाओं में यहाँ सड़क दुर्घटनाओं की बारम्बारता सर्वाधिक रहती है। ऐसी परिस्थितियों में जीवन-यापन तथा विकास के लिए आपदा प्रतिरोधक तन्त्र, योजनाओं व क्षमताओं का विकास अति आवश्यक है।
प्रश्न 3 – आपदा प्रबन्धन द्वारा क्षति को कम किया जा सकता है । वर्णन कीजिए।
उत्तर— आपदाओं का रोका जाना यद्यपि असम्भव है फिर भी हम आपदाओं को “प्रकृति का प्रकोप या ईश्वर का खेल’ मानकर इनके प्रतिरोध के प्रति उदासीन बनकर नहीं रह सकते हैं। आपदाओं के प्रतिरोध के लिए प्रभावशाली योजना और प्रबन्धन से यह सम्भव है कि इनसे होने वाली क्षति को न्यूनतम किया जा सके। आपदा संवेदनशील क्षेत्रों की जानकारी प्राप्त करके प्रतिरोधक उपायों का उपयोग कर क्षेत्र को सुरक्षित बनाने का प्रयास सम्भव है। इसमें प्रतिरोधक दीवारें, नालों की सफाई, वैकल्पिक मार्गों का निर्माण व अन्य उपायों को सम्मिलित करके आपदा से होने वाली क्षति को कम-से-कम किया जा सकता है। अतः सुरक्षित निर्माण विधियों और अन्य प्रबन्धात्मक उपायों से आपदा द्वारा होने वाली क्षति न्यूनतम हो सकती है।
प्रश्न 4 – आपदा प्रबन्धन के विभिन्न घटक (चरणों) का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- आपदा प्रबन्धन के चार घटक निम्नलिखित हैं-
  1. तैयारी – इसका अर्थ विपत्ति या आपदा का सामना और उससे बच निकलने के लिए तैयार रहना है। इसके अन्तर्गत समुदाय को आपदा का सामना करने योग्य बनाया जाता है।
  2. राहत और प्रत्युत्तर — इसमें प्रभावित व्यक्तियों को राहत पहुँचाने के लिए समुदाय को आवश्यक कुशलताओं से सम्पन्न करने पर जोर दिया जाता है।
  3. पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण – इस चरण में नए सिरे से जीवन को प्रारम्भ करने के लिए सहायता प्राप्त करने पर जोर दिया जाता है। अनिवार्य सेवाएँ बहाल की जाती हैं एवं रोजगार व मकानों को नए सिरे से शुरू करने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है।
  4. निवारण और शमन- इस चरण में सम्भावित आपदाओं के ‘जोखिम को कम करने के उपाय बताए जाते हैं । (चित्र 1.1)
प्रश्न 5 – भारत में आपदाओं से हुई क्षति के तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर— भारत में आपदाओं से हुई क्षति के तीन प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं-
  1. वर्ष 1999 में उड़ीसा (ओडिशा) राज्य में आया महाचक्रवात जिसके कारण लगभग 10,000 से अधिक लोगों की मृत्यु एवं करोड़ों रुपये की सम्पदा नष्ट हुई।
  2. वर्ष 2001 के भुज (गुजरात) में आए भूकम्प के कारण 20 हजार से अधिक लोगों की मृत्यु एवं हजारों बेघर हुए।
  3. वर्ष 2000 में सूखे से लगभग 6 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए।
प्रश्न 6 – उत्तराखण्ड आपदाओं के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर – (1) 20 अक्टूबर, 1991 ई० में उत्तरकाशी में आए भूकम्प से जनपद टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जनपदों में भारी तबाही हुई। इस भूकम्प से लगभग 800 व्यक्तियों की मृत्यु हुई, 5,000 से अधिक घायल हुए तथा 2,000 गाँवों की 4.5 लाख जनसंख्या प्रभावित हुई। एक अनुमान के अनुसार इस भूकम्प से अनुमानित 370 करोड़ से अधिक की कुल हानि हुई ।
(2) मालपा (पिथौरागढ़ ) 18 अगस्त, 1998 ई० में भू-स्खलन के कारण 219 से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हुई।
प्रश्न 7 – उत्तराखण्ड के भूकम्प सम्भावित क्षेत्रों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर – उत्तराखण्ड के भूकम्प सम्भावित क्षेत्रों को दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
  1. जोन पाँच ( अत्यधिक भूकम्प सम्भावित क्षेत्र ) – इसके अन्तर्गत राज्य के 4 जनपद- पिथौरागढ़, चमोली, बागेश्वर एवं रुद्रप्रयाग आते हैं।
  2. जोन चार ( अधिक भूकम्प सम्भावित क्षेत्र ) – इस क्षेत्र में कुल 9 जनपद सम्मिलित हैं। इनमें पौड़ी, टिहरी, अल्मोड़ा, चम्पावत, नैनीताल, उत्तरकाशी, देहरादून, हरिद्वार एवं ऊधमसिंह नगर जनपद आते हैं।
प्रश्न 8 – भू-स्खलन के क्या-क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं? भू-स्खलन सम्भावित क्षेत्रों में किन सावधानियों की आवश्यकता है?
उत्तर— पर्वतीय ढालों का कोई भाग जब जल तत्त्व भार की अधिकता एवं आधार चट्टानों के कटाव के कारण अपनी गुरुत्वीय स्थिति से असन्तुलित होकर अचानक तीव्रता के साथ सम्पूर्ण अथवा विच्छेदित खण्डों के रूप में गिरने लगता है तो यह घटना भू-स्खलन कहलाती है। भू-स्खलन प्रायः तीव्रगति से आकस्मिक उत्पन्न होने वाली प्राकृतिक आपदा है। भौतिक क्षति ओर जन-हानि इसके दो प्रमुख दुष्प्रभाव हैं। भू-स्खलन अपने मार्ग में आने वाले प्रत्येक पदार्थ, मानव बस्तियाँ, खेत-खलिहान, सड़क मार्ग आदि सभी को नष्ट कर देता है। भू-स्खलन से नदी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं जिससे नदी के ऊपरी भाग में बाढ़ आ जाती है, कभी – कभी किसी क्षेत्र में बड़ी झील बन जाती है जिसके टूटने पर त्वरित बाढ़ से भारी तबाही होती है। भू-स्खलन मानव समुदाय पर कहर बरसाने वाली प्राकृतिक आपदा है। भारत में इस आपदा का रौद्र रूप हिमालय पर्वतीय प्रदेश एवं पश्चिमी घाट में बरसात के दिनों में अधिक देखा जाता है। वस्तुतः हिमालय प्रदेश युवा वलित पर्वतों से बना है, जो विवर्तनिक दृष्टि से अत्यन्त अस्थिर एवं संवेदनशील भू-भाग है। यहाँ की भूगर्भिक संरचना भूकम्पीय तरंगों से प्रभावित होती रहती है। इसलिए यहाँ भू-स्खलन की घटनाएँ अधिक होती रहती हैं।
भू-स्खलन सम्भावित क्षेत्रों में निम्नलिखित सावधानियाँ अपेक्षित हैं-
  1. पक्के रास्तों, वनस्पतिरहित सतहों आदि में बहते या जमा हुए पानी की निकासी जल ग्रहण बेसिन की ओर करनी चाहिए। जिससे भू-स्खलन हेतु पानी भूमि में प्रवेश न कर सके और जमीन पर फिसलन एवं बोझ न बढ़े।
  2. यदि सतही पानी भवनों या मकानों से होकर बहता है और वहाँ इसके प्रवाहित होने के स्थल उपलब्ध हैं तो एक हल्का-सा ढाल वाला कम गहरा गड्ढा बनाकर पानी को उस गड्ढे के द्वारा हरे-भरे क्षेत्र, गली की पटरी, सड़क जल निकास नाली या जल-संग्रहण क्षेत्र की ओर पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए।
  3. निकास के लिए सतह पर एकत्रित जल को ढलानों, ढीली मिट्टी और वनस्पतिरहित सतहों की ओर जाने से रोके। इससे भू-स्खलन की सम्भावनाओं में वृद्धि होती है।
  4. मजबूत नींव वाले भवन जो विशेषज्ञों द्वारा दिए गए डिजाइन के अनुसार बनाए जाते हैं, भू-स्खलन के प्रभाव को सहन करने के लिए अधिक सक्षम होते हैं। भूमिगत संयन्त्रों को भी उच्च तकनीक से ऐसे निर्मित करना चाहिए कि वे भू-स्खलन से क्षतिग्रस्त न हों।
  5. भू-स्खलनों को नियन्त्रित करने का सबसे सरल व सस्ता उपाय वनस्पति आवरण की सुरक्षा करना या वनस्पति को अधिकाधिक विकसित करना है। वनस्पति आवरण मिट्टी की ऊपरी सतह को निचली सतह के साथ बाँधे रखता है और स्थलीय जल के अनावश्यक प्रवाह एवं मृदा अपरदन अभियान चलाकर वृक्षारोपण किया जाना चाहिए तथा संरक्षित वन क्षेत्र का को न्यूनतम करता है। अतः भू-स्खलन को नियन्त्रित करने के लिए सतत विकास एवं संरक्षण होना चाहिए।
  6. खनिज उत्खनन एवं सड़कों के निर्माण हेतु पहाड़ों पर अनावश्यक खुदाई पर रोक होनी चाहिए। अत्यावश्यक सड़क निर्माण के बाद सड़कों के किनारे पहाड़ी ढालों की प्रतिरोधक दीवार अवश्य बनाई जानी चाहिए।
उपर्युक्त भू-स्खलन निवारक प्रबन्धन उपायों एवं विशिष्ट ध्यान देने योग्य बातों का पालन करने से भू-स्खलन को नियन्त्रित करना सुगम एवं सरल होगा जिससे इस आपदा से होने वाली क्षति भी न्यूनतम हो सकेगी।
प्रश्न 9 – आपदा प्रबन्धन की स्थितियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर— आपदा प्रबन्धन एक चरणबद्ध प्रक्रिया है जोकि आपदा न्यूनीकरण हेतु समाज व उसके पर्यावरण के लिए अनेक हितकारी उपाय सुझाती है। आपदा प्रबन्धन की निम्नलिखित तीन स्थितियाँ हैं-
  1. आपदा से पूर्व — इसके अन्तर्गत आपदा सम्भावित क्षेत्रों की पहचान करके सुरक्षित निर्माण विधियों के उपयोग पर विशेष बल देने के लिए जन समुदाय को जागरूक किया जाता है तथा आपदा के समय होने वाली क्षति को न्यूनतम करने के उपाय बताए जाते हैं।
  2. आपदा के दौरान — इसमें विभिन्न प्रकार के राहत, खोज व बचाव कार्यों को सम्मिलित किया जाता है। इसके लिए जीवनरक्षक कौशल से प्रशिक्षित लोगों की विशेष सहायता की आवश्यकता होती है।
  3. आपदा के पश्चात् — आपदा के बाद पुनः निर्माण या पुनः स्थापना हेतु विशेष प्रकार की वित्तीय सहायता, अनुदान और जोखिम बदले सहयोग आदि को सम्मिलित किया जाता है।

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