UK Board 10th Class Social Science – (इतिहास) – Chapter 2 भारत में राष्ट्रवाद
UK Board 10th Class Social Science – (इतिहास) – Chapter 2 भारत में राष्ट्रवाद
UK Board Solutions for Class 10th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (इतिहास) – Chapter 2 भारत में राष्ट्रवाद
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
• संक्षेप में लिखें
प्रश्न 1– व्याख्या करें-
(क) उपनिवेशों में राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन से जुड़ी हुई क्यों थी ?
(ख) पहले विश्वयुद्ध ने भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास में किस प्रकार योगदान दिया?
(ग) भारत के लोग रोलट एक्ट के विरोधी क्यों थे?
(घ) गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन को वापस लेने का फैसला क्यों लिया?
उत्तर- (क) उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन ने सभी जाति, वर्ग और सम्प्रदायों के लोगों को विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष के लिए एकजुट किया। इसने स्थानीय लोगों में राष्ट्रवादी और उदारवादी विचारों के आदान-प्रदान के लिए एक सुदृढ़ मंच प्रदान किया। इस प्रकार उपनिवेश विरोधी आन्दोलन सभी उपनिवेशों में राष्ट्रवाद के विकास के लिए सहायक बना।
(ख) प्रथम विश्वयुद्ध के समय, भारत में बढ़ते मूल्यों ने जनसामान्य के समक्ष कठिन स्थितियाँ उत्पन्न कर दी थीं। ग्रामीणों को सेना में भर्ती होने के लिए बाध्य किया गया। उनसे बेगार करवाई गई। इससे जनता में व्यापक रोष फैल गया। साथ ही फसल नष्ट होने से भारतीयों में ब्रिटिश विरोधी भावनाओं को बल मिला और राष्ट्रवादी भावनाएँ – जाग्रत हो उठीं।
(ग) ब्रिटिश विरोधी भावनाओं को रोकने के क्रम में रोलट एक्टं के अन्तर्गत भारतीय नेताओं को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बन्द रखा जा सकता था। इस कारण भारतीय रोलट एक्ट के विरोधी हो गए।
(घ) गोरखपुर के चौरी-चौरा में हुई हिंसक घटना के कारण 1922 ई० में गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन को वापस लेने का फैसला लिया।
प्रश्न 2 – सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है?
उत्तर- ‘सत्याग्रह’ जन-आन्दोलन की एक नवीन पद्धति थी। सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता था। इसका अर्थ यह था कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि आपका संघर्ष अन्याय के विरुद्ध है तो उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता का सहारा लिए बिना सत्याग्रही केवल अहिंसा द्वारा अपने संघर्ष में सफल हो सकता है। इसके लिए दमनकारी शत्रु की चेतना को झिंझोड़ना चाहिए।
प्रश्न 3 – निम्नलिखित पर अखबार के लिए रिपोर्ट लिखें-
(क) जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड
(ख) साइमन कमीशन ।
उत्तर-
|
(क) जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड : जनरल डायर ने बेकसूरों को गोली का निशाना बनाया
(13 अप्रैल, 1919 की घटना )
|
(ख) साइमन कमीशन |
| अमृतसर 13 अप्रैल । जलियाँवाला बाग में बहुत-से गाँवों के निवासी एक मेले में भाग लेने के लिए एकत्र हुए थे। इस बाग का मैदान चारों ओर से बन्द था। शहर से बाहर इस बाग में एकत्र हुए लोगों को पता नहीं था कि शहर में मार्शल-लॉ लागू है। भीड़ देखकर जनरल डायर हथियार लिए हुए सैनिकों के साथ वहाँ पहुँच गया। उसने बाग से निकलने का रास्ता बन्द कर दिया। इसके बाद उसके सिपाहियों ने भीड़ पर अन्धाधुन्ध फायरिंग कर दी। सैकड़ों लोग मारे गए। यह हत्याकाण्ड दर्दनाक था। सम्पूर्ण देश में लोग इससे उत्तेजित हो उठे। | ब्रिटेन की नई टोरी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन किया। राष्ट्रवादी आन्दोलन के जवाब में गठित किए गए इस आयोग को भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना था और उसके बारे में सुझाव देने थे। इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। सारे सदस्य अंग्रेज थे। 1928 ई० में जब साइमन कमीशन भारत आया तो उसका स्वागत ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ (साइमन कमीशन गो बैक) के नारों से किया गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग, सभी पार्टियों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। |
प्रश्न 4 – इस अध्याय में दी गई भारत माता की छवि और अध्याय-1 में दी गई जर्मेनिया की छवि की तुलना कीजिए।
उत्तर – जर्मेनिया की छबि जर्मन राष्ट्र की प्रतीक थी जबकि भारत माता की छवि भारत राष्ट्र की छवि थी। दोनों ही छवियों ने राष्ट्रवादियों की प्रेरित किया जिन्होंने अपने-अपने देश को एक करने और उदारवादी राष्ट्र का उद्देश्य प्राप्त करने के लिए कार्य किया। लेकिन भारत माता की छवि जर्मेनिया से इस अर्थ में भिन्न है कि भारत माता की छवि के निर्माण में धार्मिक तत्त्वों को आधार बनाया गया है। भारत माता एक हिन्दू देवी के रूप में (त्रिशूल) हथियार लिए और ध्वज लिए खड़ी है। यह धार्मिक गुण एक राष्ट्र की अवधारणा को प्रकट करता है जिसमें हिन्दुओं को अन्य दूसरी जातियों व धर्मों के साथ हिल-मिलकर रहने के लिए कहा गया है।
• चर्चा करें
प्रश्न 1 – 1921 में असहयोग आन्दोलन में शामिल होने वाले सभी सामाजिक समूहों की सूची बनाइए। इसके बाद उनमें से किन्हीं तीन को चुनकर उनकी आशाओं और संघर्षो के बारे में लिखते हुए यह दर्शाइए कि वे आन्दोलन में शामिल क्यों हुए?
उत्तर – 1921 ई० में असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित होने वाले सामाजिक समूह निम्नलिखित थे-
(i) मध्यम वर्ग के लोग (विद्यार्थी, प्रधानाध्यापक, शिक्षक, वकील, आदि) ।
(ii) मद्रास की गैर-ब्राह्मण पार्टी ‘जस्टिस पार्टी’ को छोड़कर अन्य राजनीतिक दल ।
(iii) व्यापारी ।
(iv) बाबा रामचन्द्र के नेतृत्व में अवध के किसान ।
(v) अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में आन्ध्र प्रदेश के आदिवासी ।
(vi) असम के बागानी मजदूर।
असहयोग आन्दोलन में क्यों शामिल हुए?
1. अवध के किसान – अवध के किसान इस काल में बड़े कष्ट में थे। उनके पास जमीनें नहीं थीं। उन्हें जमींदारों की जमीन पर कृषि कार्य करना पड़ता था। जिनके पास अपनी जमीन थी वे भी कर्ज में डूबे हुए थे। लेकिन एक संन्यासी बाबा रामचन्द्र ने गरीब किसानों का नेतृत्व करते हुए इसके विरुद्ध आन्दोलन छेड़ा। जवाहरलाल नेहरू की सहायता से 1920 . ई० में ‘अवध किसान सभा’ का गठन किया। यह आन्दोलन 1921 ई० के असहयोग – खिलाफत आन्दोलन में मिल गया था।
2. आन्ध्र प्रदेश के आदिवासी – औपनिवेशिक सरकार ने जंगलों को आरक्षित घोषित कर दिया था। आदिवासियों का जीवन जंगलों पर ही आश्रित था। वे बड़े कष्ट में थे। उनके नेता अल्लूरी सीताराम राजू ने उनका नेतृत्व किया जो गांधी जी का प्रशंसक था। लेकिन वह अहिंसा हिंसा का समर्थक था, आदिवासियों ने हिंसक रूप से सरकार का विरोध किया।
3. असम के बागानी मजदूर – बागान के मजदूरों को बागान से बाहर जाने की अनुमति न थी । जब उन्होंने सुना कि गांधीराज आ रहा है तो वे बागानों से निकलकर अपने-अपने गाँवों की ओर चल पड़े। स्टीमर और रेल की हड़ताल के कारण वे फँस गए और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
प्रश्न 2 – नमक यात्रा की चर्चा करते हुए स्पष्ट करें कि यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था।
उत्तर- 31 जनवरी, 1930 ई० को गांधी जी ने वायसराय इरविन को एक खत लिखा । इस खत में उन्होंने ग्यारह माँगों का उल्लेख किया गया था। इनमें से कुछ सामान्य माँगें थीं जबकि कुछ माँगें उद्योगपतियों से लेकर किसानों तक विभिन्न तबकों से जुड़ी हुई थीं। गांधी जी इन माँगों के माध्यम से समाज के सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ना चाहते थे ताकि सभी उनके अभियान में शामिल हो सकें। इनमें से सर्वाधिक प्रमुख माँग नमक कर को समाप्त करने के बारे में थी। सफलतापूर्वक नमक यात्रा निकालकर गांधी जी औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार को अपने सत्याग्रह के तरीके से उत्तर दिया। नमक यात्रा वास्तव में उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का एक सबसे बड़ा प्रतीक थी।
प्रश्न 3 – कल्पना कीजिए कि आप सिविल नाफरमानी आन्दोलन में हिस्सा लेने वाली महिला हैं। बताइए कि इस अनुभव का आपके जीवन में क्या अर्थ होता?
उत्तर – सिविल नाफरमानी आन्दोलन में अनेक महिलाओं के साथ मैंने भी भाग लिया। मैंने देखा कि गांधी जी के सत्याग्रह के समय उनकी बातों को सुनने के लिए सभी महिलाएँ अपने-अपने घरों से बाहर आ जाती थीं। मैंने अन्य महिलाओं के साथ उस समय अनेक जुलूसों में भाग लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों एवं शराब की दुकानों की पिकेटिंग की। अनेक महिलाओं के साथ मैंने भी जेल यात्राएँ कीं। मैंने इस आन्दोलन के दौरान पाया कि शहरी क्षेत्रों में अधिकांश ऊँची जाति की महिलाएँ सक्रिय थीं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सम्पन्न कृषक परिवारों की महिलाएँ ही आन्दोलन में भाग ले रही थीं। गांधी जी के आह्वान पर मैंने भी राष्ट्र सेवा को अपना प्रथम कर्त्तव्य स्वीकार किया। मुझे अन्य महिलाओं की तरह लगने लगा कि हमारे जीवन में बदलाव आने वाला है। घर चलाना, चूल्हा-चौका सँभालना, अच्छी माँ एवं पत्नी के अतिरिक्त हम महिलाएँ देश की सेवा में अपना दायित्व भली-भाँति निभा सकती हैं। अब मुझे लगने लगा था कि हमें भी पुरुषों के समान महत्त्व मिलने लगेगा।
प्रश्न 4 – राजनीतिक नेता पृथक् निर्वाचिका के सवाल पर क्यों बँटे हुए थे?
उत्तर – राजनीतिक नेता भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे, जैसे डॉ० बी० आर० अम्बेडकर दलितों का नेतृत्व करते थे। इसी प्रकार मोहम्मद अली जिन्ना भारत के मुस्लिम सामाजिक समूह का नेतृत्व करते थे। ये नेतागण विशेष राजनीतिक अधिकारों और पृथक् निर्वाचन क्षेत्र माँगकर अपने अनुयायियों का जीवन स्तर ऊँचा उठाना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस पार्टी, विशेषकर गांधी जी का मानना था कि पृथक् निर्वाचन क्षेत्र भारत की एकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। वे इस माँग के विरुद्ध थे और एक बार इसके लिए आमरण अनशन पर भी बैठे थे। यही वे कारण थे कि राजनीतिक नेता पृथक् चुनाव क्षेत्रों के प्रश्न पर बँटे हुए थे।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
• विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 — गांधी-इरविन समझौते के प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर— सविनय अवज्ञा आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में 5 मार्च, 1931 ई० को गांधी-इरविन समझौता हुआ। इरविन उस समय भारत के वायसराय थे। इस समझौते के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे-
(1) सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया जाएगा।
(2) सरकार अध्यादेशों व मुकदमों को वापस ले लेगी ।
(3) हिंसात्मक अपराधियों को छोड़कर अन्य समस्त राजनीतिक बन्दियों को मुक्त कर दिया जाएगा।
(4) शराब, अफीम व विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर धरना देने वालों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
(5) समुद्र तट से एक निश्चित दूरी पर नमक बनाने की छूट होगी।
(6) जमानतें व जुर्माने वसूल नहीं किए जाएँगे।
(7) जिन व्यक्तियों ने सरकारी नौकरी छोड़ दी है, उन्हें वापस लेने में उदार नीति अपनाई जाएगी।
(8) कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।
(9) विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग नहीं किया जाएगा।
(10) कांग्रेस पुलिस अत्याचारों के विरुद्ध निष्पक्ष जाँच की माँग को त्याग देगी।
प्रश्न 2 – सविनय अवज्ञा आन्दोलन के क्या कारण थे? इसके क्या परिणाम रहे?
अथवा टिप्पणी लिखिए – सविनय अवज्ञा आन्दोलन ।
उत्तर- सविनय अवज्ञा आन्दोलन
दिसम्बर 1921 ई० के अहमदाबाद अधिवेशन में महात्मा गांधी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाने का एकाधिकार दे दिया गया था, परन्तु चौरी-चौरा की हिंसक घटना, असहयोग आन्दोलन के स्थगन तथा महात्मा गांधी की गिरफ्तारी ने इस आन्दोलन की योजना को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारण
1927 ई० में साइमन कमीशन की नियुक्ति और उसके प्रतिवेदन ने देश भर में असन्तोष की लहर दौड़ा दी और सविनय अवज्ञा आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो गई। 1930 ई० में गांधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन को प्रारम्भ करने के निम्नलिखित प्रमुख कारण थे-
1. नेहरू रिपोर्ट की अस्वीकृति — सरकार ने सर्वदलीय सम्मेलन में पारित नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया जिससे भारत में संवैधानिक तथा उत्तरदायी शासन की माँग समाप्त होती दिखाई दी।
2. अत्यधिक आर्थिक मन्दी – उस समय भारत बहुत अधिक आर्थिक मन्दी (Economic Depression) की चपेट में था जिससे मजदूरों तथा कृषकों की आर्थिक दशा निरन्तर शोचनीय होती जा रही थी।
3. स्वतन्त्रता की माँग की अस्वीकृति — ब्रिटिश सरकार ने भारत को पूर्ण स्वराज्य देने से इनकार कर दिया था। वह अधिराज्य स्थिति (Dominion Status) के संविधान बनाने के लिए गोलमेज सम्मेलन को बुलाने के लिए तैयार न थी । इसलिए कांग्रेस के पास इस आन्दोलन को चलाने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प शेष नहीं था ।
4. बारडोली में सफल सत्याग्रह — ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध 1928 ई० के मध्य सरदार पटेल के नेतृत्व में किसानों ने बारडोली में एक सफल सत्याग्रह किया था जिसमें किसानों ने सरकार को भूमि – कर देने से इनकार कर दिया था। इस सफलता कांग्रेस का मनोबल बढ़ा जो अन्ततः सविनय अवज्ञा आन्दोलन को प्रारम्भ करने के लिए प्रेरक तत्त्व के रूप में सामने आया।
5. मेरठ षड्यन्त्र केस – 1929 ई० में सरकार ने कम्युनिस्ट नेताओं को गिरफ्तार करके उन पर केस चलाना प्रारम्भ कर दिया था जो मेरठ षड्यन्त्र केस के नाम प्रसिद्ध हुआ। इसमें अनेक व्यक्तियों पर राजद्रोह का अभियोग लगाकर उन्हें कठोर यातनाएँ दी गईं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए गांधी जी को बाध्य होकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करना पड़ा।
कालान्तर में यह आन्दोलन उग्र हो गया। 14 जुलाई, 1934 ई० को महात्मा गांधी ने जन-आन्दोलन को रोक दिया परन्तु व्यक्तिगत सत्याग्रह चलता रहा। इससे जनता का उत्साह निरन्तर कम होता गया तथा नैतिक पतन के चिह्न दिखाई देने प्रारम्भ हो गए। इसलिए 7 अप्रैल, 1934 ई० को महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया। जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस तथा पटेल आदि नेताओं ने गांधी जी के इस निर्णय की कटु आलोचना की।
परिणाम — सविनय अवज्ञा आन्दोलन के निम्नलिखित परिणाम सामने आए –
(1) इस आन्दोलन ने भारतीयों में राष्ट्रीय भावना को जाग्रत कर दिया।
(2) इस आन्दोलन के कारण ब्रिटिश सरकार का ध्यान भारत में संवैधानिक सुधार करने की ओर गया।
(3) इस आन्दोलन के प्रभाव से घबराकर शासन ने भारत में साम्प्रदायिकता को और अधिक बढ़ाने का प्रयत्न किया।
(4) इस आन्दोलन के दौरान पूना समझौते के माध्यम से हिन्दुओं और हरिजनों में पुनः एकता स्थापित हुई।
(5) इस आन्दोलन ने ही 1935 ई० के ‘भारतीय शासन अधिनियम’ की पृष्ठभूमि तैयार की।
प्रश्न 3 – रोलट एक्ट का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर- रोलट एक्ट
माण्टेग्यू की घोषणा के पश्चात् माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट तैयार हुई। इस रिपोर्ट को कार्यरूप देने के लिए 1919 ई० में एक अधिनियम पारित किया गया जिसमें प्रान्तों में आंशिक उत्तरदायी शासन स्थापित करने का उल्लेख किया गया, किन्तु औपनिवेशिक स्वराज के विषय में नीति स्पष्ट नहीं की गई। अतः स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया बल्कि राष्ट्रीय आन्दोलन में और तीव्रता आ गई। इस आन्दोलन का दमन करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने न्यायाधीश रोलट की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। फरवरी 1919 ई० में रोलट ने दो विधेयक प्रस्तावित किए जो पारित होने के पश्चात् रोलट एक्ट के नाम से प्रसिद्ध हुए। अनेक भारतीय नेताओं द्वारा इस कानून का विरोध किया गया, किन्तु ब्रिटिश सरकार ने 21 मार्च, 1919 ई० को इसे लागू किया। इस एक्ट के अनुसार किसी भी व्यक्ति को मात्र सन्देह पर ही गिरफ्तार किया जा सकता था अथवा गुप्त मुकदमा चलाकर उसे दण्डित किया जा सकता था। रोलट एक्ट को भारतीयों ने ‘काला कानून’ कहकर पुकारा । रोलट एक्ट के पास होने से गांधी जी का अंग्रेजों की न्यायप्रियता और ईमानदारी से विश्वास समाप्त हो गया। उन्होंने रोलट एक्ट के विरोध में जनमत तैयार करने के लिए देश का तूफानी दौरा किया और देशवासियों को सलाह दी कि वे सत्य और अहिंसा द्वारा इस ‘काले कानून’ का विरोध करें।
प्रश्न 4 – प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् गांधी जी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन क्यों शुरू किया? भारत के लोगों ने किन क्षेत्रों में ब्रिटिश सरकार से असहयोग किया?
अथवा गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन क्यों प्रारम्भ किया? फिर किस कारण यह आन्दोलन वापस ले लिया?
अथवा असहयोग आन्दोलन के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर- असहयोग आन्दोलन के कारण
कांग्रेस ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 ई० में असहयोग आन्दोलन शुरू करने का निर्णय किया। यह एक क्रान्तिकारी कदम था। कांग्रेस ने पहली बार सक्रिय कार्यवाही अपनाने का निश्चय किया। इस क्रान्तिकारी परिवर्तन के अनेक कारण थे। अब तक महात्मा गांधी ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता में विश्वास करते थे और उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सरकार को पूरा सहयोग दिया था, किन्तु जलियाँवाला बाग नरसंहार, पंजाब में मार्शल लॉ और हण्टर कमेटी की जाँच ने उनका अंग्रेजों के न्याय से विश्वास उठा दिया। उन्होंने अनुभव किया कि अब पुराने तरीके छोड़ने होंगे। कांग्रेस से उदारवादियों के अलग हो जाने के बाद कांग्रेस पर पूरी तरह से गरमपन्थियों का नियन्त्रण हो गया। उधर तुर्की और मित्रराष्ट्रों में सेवर्स की सन्धि की कठोर शर्तों से मुसलमान भी रुष्ट थे। देश में अंग्रेजों के प्रति बड़ा असन्तोष था। महात्मा गांधी ने मुसलमानों के खिलाफत आन्दोलन में उनका साथ दिया तथा असहयोग आन्दोलन छेड़ने का विचार किया।
सितम्बर 1920 ई० में कलकत्ता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव रखा। सी० आर० दास, बी० सी० पाल, ऐनी बेसेण्ट, जिन्ना और मालवीय जी ने इसका विरोध किया, लेकिन दिसम्बर 1920 ई० में कांग्रेस के नियमित अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया तथा विरोधियों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया।
इस आन्दोलन के मुख्य बिन्दु थे— खिताबों तथा मानव पदों का त्याग, स्थानीय निकायों में नामजदगी वाले पदों से इस्तीफा, सरकारी दरबारों या सरकारी अफसरों के सम्मान में आयोजित उत्सवों में भाग न लेना, बच्चों को स्कूलों से हटा लेना, अदालतों का बहिष्कार, फौज में भरती का बहिष्कार आदि । असहयोगियों के लिए अहिंसा तथा सत्य का पालन करना आवश्यक था। गांधी जी को विश्वास था कि इस आन्दोलन से एक वर्ष में ‘स्वराज’ की प्राप्ति हो जाएगी।
इस आन्दोलन का भारतीय जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा। विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई। बहुत-से छात्रों ने स्कूल तथा कॉलेजों का बहिष्कार किया। महात्मा गांधी ने ‘केसर-ए-हिन्द’ का खिताब छोड़ दिया। 13 नवम्बर, 1921 ई० को प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन के समय बम्बई (मुम्बई) में हड़ताल रखी गई। दिसम्बर 1921 ई० में प्रिंस के कोलकाता आगमन पर भी हड़ताल रखी गई।
ब्रिटिश सरकार ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए व्यापक दमन चक्र चलाया। महात्मा गांधी के अलावा सभी कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। चौरी-चौरा की एक अप्रिय घटना के कारण महात्मा गांधी ने यह आन्दोलन 1922 ई० में वापस ले लिया।
• उत्तरीय प्रश्न लघु
प्रश्न 1 – असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर – असहयोग आन्दोलन के प्रमुख कार्यक्रम इस प्रकार थे-
(1) विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना। कांग्रेसियों को चरखा कातने का निर्देश दिया गया और जुलाहों को घरों पर कपड़ा बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
(2) सरकार द्वारा दी गई उपाधियों तथा अवैतनिक पदों का त्याग।
(3) 1919 ई० के अधिनियम के अन्तर्गत होने वाले चुनावों का बहिष्कार तथा स्थानीय संस्थाओं में मनोनीत सदस्यों द्वारा त्याग-पत्र देना।
(4) सरकारी तथा अर्द्ध-सरकारी उत्सवों और समारोहों में उपस्थित न होना अथवा सरकारी दरबारों का बहिष्कार करना ।
(5) सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार ।
(6) सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करना ।
इसके अतिरिक्त इस आन्दोलन के रचनात्मक कार्यक्रम में अपनी शिक्षण संस्थाएँ खोलकर उसमें बच्चों को पढ़ाना, सरकारी अदालतों के स्थान पर अपनी अदालतें खोलना, घर-घर में चरखे और सूत कातने को लोकप्रिय बनाना, छुआछूत को दूर करना और हिन्दू-मुस्लिम एकता को पुष्ट करना आदि प्रमुख बातें थीं।
प्रश्न 2 – असहयोग आन्दोलन की उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि असहयोग आन्दोलन का भारत की जनता के मन में गहरा असर पड़ा। हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों ने इसे मान लिया । विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई । बहुत-से छात्रों ने स्कूल और कॉलेज छोड़ दिए और कांग्रेस ने ‘काशी विद्यापीठ’, ‘बनारस विद्यापीठ’, ‘गुजरात विद्यापीठ’, ‘बिहार विद्यापीठ’, ‘बंगाल नेशनल यूनिवर्सिटी’, ‘नेशनल कॉलेज, लाहौर’, ‘जामिया मिलिया दिल्ली’ और ‘नेशनल मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ की स्थापना की। सेठ जमनालाल बजाज ने घोषणा की कि मैं प्रैक्टिस न करने वाले वकीलों के गुजारे के लिए एक लाख रुपये सालाना दूँगा । कांग्रेस ने चालीस लाख स्वयंसेवक भरती किए। बीस हजार चरखे बनवाए गए। लोग पंचायतों द्वारा अपने फैसले करने लगे। महात्मा गांधी ने ‘केसर-ए-हिन्द’ का खिताब लौटा दिया और दूसरे लोगों ने उनके उदाहरण का अनुसरण किया। जब प्रिन्स ऑफ वेल्स 17 नवम्बर, 1921 ई० को बम्बई में उतरा, तब शहर में उस दिन पूरी हड़ताल रही। जब दिसम्बर 1921 ई० में वह कलकत्ता गया, तब वहाँ भी शहर में ऐसी ही हड़ताल रही।
प्रश्न 3 – गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापस क्यों लिया?
उत्तर- गांधी जी ने मुसलमानों के धार्मिक आन्दोलन अर्थात् ‘खिलाफत आन्दोलन’ को राष्ट्रीय भावना से जोड़कर बहुत बड़ी भूल की। इस भूल का परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रवादी, जो भारतीय समाज की समस्याओं के लिए लड़ रहे थे, बुरी तरह निराश हो गए। उन्हें गांधी जी की नीति पर सन्देह होने लगा। गांधी जी को विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार के परम भक्त मुसलमानों के इस आन्दोलन में साथ देने पर; वे लोग भी कांग्रेस का साथ देगे। लेकिन ऐसा न हुआ और मुसलमानों के विरुद्ध हिन्दुओं में भारी नफरत फैल गई। इसके फलस्वरूप जगह-जगह दंगे भड़के और जनता की शक्ति आपस में ही नष्ट होने लगी। सरकार की दमनकारी नीति इतनी उग्र हो गई कि सभी नेता जेल भेज दिए गए और आन्दोलन दिशाहीन हो गया। जनता का आक्रोश सरकारी दमन के विरुद्ध इतना उग्र हो उठा कि वह अहिंसात्मक नीति को त्यागकर क्रूर हिंसा पर उतारू हो गई। अपनी नीतियों के विरुद्ध जाते देखकर गांधी जी ने इस आन्दोलन को स्थगित कर दिया।
प्रश्न 4 – चौरी-चौरा काण्ड क्या था?
उत्तर— जिस समय गांधी जी असहयोग आन्दोलन चला रहे थे, उस समय पुलिस द्वारा दमन करने के फलस्वरूप एक उत्तेजित भीड़ ने गोरखपुर के चौरी-चौरा नामक स्थान पर 5 फरवरी, 1922 ई० को 21 सिपाहियों एवं एक दरोगा को थाने में बन्द करके आग लगा दी। वे सब जलकर मर गए। गांधी जी को इस हिंसा से इतनी पीड़ा पहुँची कि उन्होंने असहयोग आन्दोलन बन्द कर दिया।
प्रश्न 5–जलियाँवाला बाग काण्ड पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर – रोलट एक्ट के विरोध में पंजाब के अमृतसर जिले की जनता अत्यन्त आक्रोशित थी। इस शहर में सैनिक शासन लागू करके नियन्त्रण जनरल डायर को दिया गया था। 12 अप्रैल, 1919 ई० को नगर में सार्वजनिक सभा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, जिसकी पूरी जानकारी जनता को नहीं कराई गई। 13 अप्रैल को बैसाखी का त्योहार था। इसी दिन सरकार की नीति का विरोध करने के लिए जलियाँवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। इस सभा का कार्य शान्तिपूर्वक चल रहा था। अब जनरल डायर ने 200 देशी और 50 गोरे सिपाहियों को साथ लेकर बाग़ के एकमात्र दरवाजे को रोक लिया और निहत्थी जनता पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। 10 मिनट तक निहत्थी भीड़ पर गोलियों की बौछार होती रही। इस हत्याकाण्ड में हजारों व्यक्ति मारे गए और असंख्य घायल हुए। इस घटना से भारतीयों में भयंकर असन्तोष की लहर दौड़ गई। का
प्रश्न 6 – सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ की उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर- आन्दोलन का तात्कालिक परिणाम यह था कि ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी और कांग्रेस की वर्किंग कमेटी के सब सदस्यों को बन्दीगृह में डाल दिया। कांग्रेस की संस्था को कानून के विरुद्ध घोषित कर दिया गया। उसके कार्यालयों पर पुलिस ने कब्जा कर लिया। ऐसी नीति सरकार ने कांग्रेस को कुचलने के लिए अपनाई । साधारण जनता ऐसी अवस्था में हाथ पर हाथ रखकर न बैठी रही। उसने भी सरकार के विरुद्ध विद्रोह आरम्भ किया। गांधी जी के मन में यह विचार ही न था कि सरकार उन्हें अकस्मात् ही बन्दी बना लेगी और इसलिए गांधी जी ने लोगों के सम्मुख अपना कार्यक्रम न रखा था। इसका परिणाम यह हुआ कि गांधी जी और कांग्रेस के नेताओं के गिरफ्तार होने के बाद आन्दोलन का पथ-प्रदर्शन करने के लिए कोई न रहा। जैसा लोगों के मन में आया वैसा ही किया। जब सरकार ने निर्दोष पुरुषों, स्त्रियों तथा बच्चों को गोली से उड़ा दिया, तब लोगों ने भी हिंसा की नीति अपनाई । जहाँ कहीं विदेशी मिले, उनको मार डाला गया। फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार की सत्ता भारत के कई भागों से उठ गई। बहुत कठिनाइयों के बाद ब्रिटिश सरकार अपनी सत्ता को देश में फिर से स्थापित करने में सफल हुई।
प्रश्न 7 – साइमन कमीशन’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। लिए दस वर्ष बाद एक रॉयल कमीशन की नियुक्ति की आवश्यकता थी।
उत्तर – सन् 1919 ई० के अधिनियम के अनुसार, उसकी जाँच के ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल ने आम चुनावों के भय से दो वर्ष पूर्व 1927 ई० में ही इस कमीशन की नियुक्ति कर दी। इस कमीशन के अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे, इसलिए यह साइमन कमीशन कहलाया। इसके सभी सदस्य अंग्रेज थे। इस श्वेत गौरांग कमीशन का भारतीयों ने बहिष्कार किया क्योंकि इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था।
3 फरवरी, 1928 ई० को कमीशन बम्बई उतरा । कमीशन का सारे भारत में स्थान-स्थान पर काले झण्डों से विरोध किया गया। पंजाब में भी विभिन्न स्थानों पर कमीशन का विरोध किया गया। लाहौर में लाजपतराय ने कमीशन के विरोध में एक विशाल जुलूस निकाला। पुलिस ने भीड़ एवं लाल लाजपतराय पर भीषण लाठी प्रहार किया। लाला जी के हृदय पर चोटें आईं, जिनके कारण शीघ्र ही उनकी मृत्यु हो गई। लखनऊ में भी गोविन्दबल्लभ पन्त व जवाहरलाल नेहरू पर लाठियाँ बरसाई गईं।
कमीशन दो बार भारत आया व दो वर्षों के परिश्रम के पश्चात् मई 1930 ई० में उसने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। प्रतिवेदन में प्रान्तों में उत्तरदायी सरकार की स्थापना, द्वैध शासन की समाप्ति, संघीय शासन की स्थापना, केन्द्रीय व्यवस्थापिका का पुनर्गठन, मताधिकार का विस्तार जैसी महत्त्वपूर्ण अनुशंसाएँ की गई थीं। यह प्रतिवेदन अब तक के सुधारों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। 1935 ई० का सुधार अधिनियम प्रमुखतः ‘साइमन कमीशन की संस्तुतियों पर ही आधारित था।
प्रश्न 8 – भारत के व्यवसायी वर्ग ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन समर्थन क्यों किया?
उत्तर – प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने अत्यधिक लाभ कमाया था और वे ताकतवर हो चुके थे। अपने कारोबार को फैलाने के लिए उन्होंने ऐसी औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया जिनके कारण उनकी व्यावसायिक गतिविधियों में बाधा आती थी। वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे और रुपया – स्टर्लिंग विदेशी विनिमय अनुपात में परिवर्तन चाहते थे जिससे आयात में कमी आ जाए। व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए उन्होंने सन् 1920 में भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस (इंडियन इण्डस्ट्रियल एण्ड | कमर्शियल कांग्रेस) और सन् 1927 में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (फेडरेशन ऑफ इण्डियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री-फिक्की) का गठन किया । पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी०डी० बिड़ला जैसे जाने-माने उद्योगपतियों के नेतृत्व में उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियन्त्रण का विरोध किया और पहले सविनय अवज्ञा आन्दोलन का समर्थन किया। उन्होंने आन्दोलन को आर्थिक सहायता प्रदान की और आयातित वस्तुओं को खरीदने या बेचने से इनकार कर दिया। अधिकांश व्यवसायी स्वराज को एक ऐसे युग के रूप में देखते थे जहाँ कारोबार पर औपनिवेशिक पाबन्दियाँ नहीं होंगी और व्यापार व उद्योग निर्बाध ढंग से फल-फूल सकेंगे। गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद व्यावसायिक संगठनों का उत्साह भी मन्द पड़ गया था।
• अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – ‘केसरी’ समाचार-पत्र का प्रकाशन किसके द्वारा किया गया ?
उत्तर – बाल गंगाधर तिलक |
प्रश्न 2 – महात्मा गांधी का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?
उत्तर – महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 ई० को पोरबन्दर (काठियावाड़) के एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था।
प्रश्न 3 – रोलट एक्ट कब पास हुआ था ?
उत्तर – सिडनी रोलट समिति की सिफारिश पर रोलट एक्ट 1918 ई० को पास हुआ था।
प्रश्न 4 – अली बन्धु कौन थे?
उत्तर— खिलाफत आन्दोलन के नेताओं में अली बन्धुओं का स्थान प्रमुख था। इनके नाम मुहम्मद अली और शौकत अली थे।
प्रश्न 5 – कांग्रेस ने महात्मा गांधी का नेतृत्व कब स्वीकार किया था?
उत्तर – कांग्रेस ने महात्मा गांधी का नेतृत्व सितम्बर 1920 ई० में कलकत्ता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में स्वीकार किया था।
प्रश्न 6 – असहयोग आन्दोलन क्या था?
उत्तर – 1920 ई० में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार के प्रति सहयोगी प्रवृत्ति को त्यागकर असहयोग करने का निर्णय लिया था, इसे ही असहयोग आन्दोलन कहते हैं।
प्रश्न 7 – असहयोग आन्दोलन कब और क्यों वापस लिया गया था ?
उत्तर – असहयोग आन्दोलन चौरी-चौरा की दुर्घटना के उपरान्त 1922 ई० में वापस लिया गया था।
प्रश्न 8 – साइमन कमीशन की नियुक्ति कब की गई थी ?
उत्तर – साइमन कमीशन की नियुक्ति 1927 ई० में की गई थी।
प्रश्न 9 – सविनय अवज्ञा आन्दोलन कब प्रारम्भ किया गया था?
उत्तर – सविनय अवज्ञा आन्दोलन गांधी जी ने मार्च 1930 ई० में चलाने का निर्णय लिया था।
• बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 – असहयोग आन्दोलन किसने चलाया था-
(अ) पं० मोतीलाल नेहरू
(ब) सरदार पटेल
(स) महात्मा गांधी
(द) मुहम्मद अली जिन्ना ।
उत्तर – ( स ) महात्मा गांधी ।
प्रश्न 2 – जलियाँवाला बाग कहाँ स्थित है-
(अ) लाहौर
(ब) पटियाला
(स) जालन्धर
(द) अमृतसर।
उत्तर- (द) अमृतसर ।
प्रश्न 3 – साइमन कमीशन भारत कब आया था-
(अ) 1927 ई० में
(ब) 1928 ई० में
(स) 1931 ई० में
(द) 1937 ई० में।
उत्तर- (ब) 1928 ई० में।
प्रश्न 4 – प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ किसकी रचना है—
(अ) महात्मा गांधी
(ब) जवाहरलाल नेहरू
(स) पं० मोतीलाल नेहरू
(द) मुहम्मद अली जिन्ना ।
उत्तर- (अ) महात्मा गांधी।
प्रश्न 5 – दाण्डी मार्च का आयोजन किस वर्ष किया गया था-
(अ) 1930 ई० में
(ब) 1932 ई० में
(स) 1940 ई० में
(द) 1942 ई० में।
उत्तर- (अ) 1930 ई० में।
