UK 10th Social Science

UK Board 10th Class Social Science – (राजनीति विज्ञान) – Chapter 8 लोकतन्त्र के चुनौतियाँ

UK Board 10th Class Social Science – (राजनीति विज्ञान) – Chapter 8 लोकतन्त्र के चुनौतियाँ

UK Board Solutions for Class 10th Social Science – सामाजिक विज्ञान – (राजनीति विज्ञान) – Chapter 8 लोकतन्त्र के चुनौतियाँ

पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर
1. अलग-अलग सन्दर्भ, अलग-अलग चुनौतियाँ
इनमें से प्रत्येक कार्टून लोकतन्त्र की एक चुनौती को दिखाता हैबताएँ कि वह चुनौती क्या है? यह भी बताएँ कि इस अध्याय में चुनौतियों की जो तीन श्रेणियाँ बताई गई हैं, यह उनमें से किस श्रेणी की चुनौती है।
मुबारक फिर चुने गए
उत्तर – विस्तार की चुनौती
लोकतन्त्र पर नजर
उत्तर – नींव रखने सम्बन्धी चुनौती
उदारवादी लैंगिक समानता
उत्तर – लोकतन्त्र का गहरा होना
चुनाव अभियान का पैसा
उत्तर – धन-बल की चुनौती
2. लोकतन्त्र की चुनौती का आपका विवरण
क्र० सं० उदाहरण तथा सन्दर्भ इस मामले में लोकतन्त्र की चुनौती का आपका विवरण
1. मैक्सिको – पी० आर०आई० की पराजय के बाद 2000 में दूसरा स्वतन्त्र चुनाव : पराजित उम्मीदवारों ने चुनावी धांधली की शिकायत की। लोकतन्त्र की मजबूती
2. चीन – कम्युनिस्ट पार्टी आर्थिक सुधार अपनाती है, परन्तु राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार बनाए रखती है। लोकतन्त्र के विस्तार की चुनौती
3. पाकिस्तान — जनरल मुशर्रफ जनमत संग्रह कराते हैं; मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप लगते हैं। बाहुबल की चुनौती
4. इराक – नई सरकार अपनी सत्तां कायम नहीं कर पाती। बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा । नींव डालने की चुनौती
5. दक्षिण अफ्रीका – मण्डेला का सक्रिय राजनीति से संन्यास; उनके उत्तराधिकारी मबेकी पर गोरे अल्पसंख्यकों को दी गई कुछ रियायतें वापस लेने का दबाव । लोकतन्त्र को मजबूत करना
6. अमेरिका, गुआंतानामो बे-संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव इसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हैं; अमेरिका का उनकी बातें मानने से इनकार । लोकतन्त्र के विस्तार एवं बाहुबल की चुनौती
7. सऊदी अरब – महिलाओं को सार्वजनिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं; धार्मिक अल्पसंख्यकों को आजादी नहीं । लोकतन्त्र को सुदृढ़ करने की चुनौती
8. यूगोस्लाविया – कोसोवो प्रान्त में सर्बी तथा अल्बानियाई लोगों के बीच जातीय तनाव; यूगोस्लाविया बिखर गया। लोकतन्त्र के विस्तार को चुनौती
9. बेल्जियम – संवैधानिक सुधारों का एक दौर चला परन्तु डच भाषी लोग असन्तुष्ट; उनकी अधिक स्वायत्तता की माँग । लोकतन्त्र की मजबूती की चुनौती
10. श्रीलंका — सरकार तथा लिट्टे के बीच शान्ति वार्ता भंग; हिंसा फिर से भड़की । लोकतन्त्र के विस्तार को चुनौती
11. अमेरिका, नागरिक अधिकार- अश्वेत लोगों को समान अधिकार मिले परन्तु वे अब भी गरीब, कम शिक्षित तथा कमजोर स्थिति में। लोकतन्त्र को सुदृढ़ करने की चुनौती
12. उत्तरी आयरलैण्ड– गृहयुद्ध समाप्ति पर कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट लोगों में पारस्परिक विश्वास का अभाव । लोकतन्त्र के विस्तार को चुनौती
13. नेपाल – संविधान सभा का चुनाव होने वाला है; तराई में असन्तोष; माओवादियों ने हथियार नहीं सौंपे। लोकतन्त्र की नींव डालने की चुनौती
14. बोलिविया- जल-संघर्ष के समर्थक मेशलेज प्रधानमन्त्री बने; बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने धमकी दी कि हम देश छोड़कर चले जाएँगे। धन-बल की चुनौती
3. नीचे लोकतान्त्रिक राजनीति के कुछ दायरों को खानों में रखा गया है। पिछले खण्ड में एक या एक से अधिक देशों में आपने कुछ चुनौतियाँ लक्ष्य की थीं। कुछ कार्टूनों में भी आपने इन्हें देखा। आप चाहें तो नीचे दिए गए खानों के मेल का ध्यान रखते हुए इन चुनौतियों को लिख सकते हैं। इसके अलावा भारत से भी इन खानों में दिए जाने वाले एक-एक उदाहरण दर्ज करें। यदि आपको कोई चुनौती इन खानों में फिट बैठती नहीं लगती तो आप नई श्रेणी बनाकर उनमें इन मुद्दों को रख सकते हैं।
1. संवैधानिक बनावट प्रत्येक लोकतन्त्र को संविधान की आवश्यकता होती है। संविधान का निर्माण सभी जातियों, धर्मों, लिंगों तथा क्षेत्रों के प्रतिनिधियों द्वारा होना चाहिए । इसका उद्देश्य देश में संसदीय लोकतन्त्र की स्थापना करना, संघीय ढाँचे को बनाए रखना, धर्म-निरपेक्षता को मजबूत करना तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना होना चाहिए।
2. लोकतान्त्रिक अधिकार निरंकुशतावादी शासन व्यवस्थाओं में लोकतन्त्र का विस्तार करना।
3. संस्थाओं का कामकाज गैर-लोकतान्त्रिक देशों में लोकतन्त्र की नींव डालने की चुनौती ।
4. चुनाव लोकतन्त्र को सुदृढ़ तथा गहरा करने की चुनौती ।
5. संघवाद, विकेन्द्रीकरण लोकतन्त्र को सुदृढ़ तथा गहरा करने की चुनौती ।
6. विविधता को समेटना लोकतन्त्र के विस्तार की चुनौती।
7. राजनीतिक संगठन निरंकुश राजतन्त्र तथा सैनिक तानाशाही वाले देशों में लोकतन्त्र की नींव डालने की चुनौती।
8. धार्मिक संगठन कोई अन्य श्रेणी धार्मिक. अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए लोकतन्त्र के विस्तार को चुनौती।
9. मजदूर संघ कोई अन्य श्रेणी प्रबन्धन में श्रमिकों की सहभागिता तथा स्वेच्छा से हड़ताल करने की स्वीकृति प्रदान करके आर्थिक लोकतन्त्र के विस्तार की चुनौती ।
4. आइए, इन श्रेणियों को नया वर्गीकरण करें। इस बार इसके लिए हम उन मानकों को आधार बनाएँगे जिनकी चर्चा अध्याय के पहले भाग में हुई है। इन सभी श्रेणियों के लिए कम-से-कम एक उदाहरण भारत में भी खोजें।
1. आधार तैयार करने की चुनौतियाँ दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करना तथा अन्य केन्द्रशासित प्रदेशों को भी राज्य का स्तर प्रदान करने का प्रयास करना।
2. विस्तार की चुनौती संसद तथा राज्य के विधान-मण्डलों में महिलाओं के लिए स्थानों का आरक्षण करना, तथा लिंग, जातीय, धार्मिक तथा भाषायी आधार पर किसी प्रकार का कोई भेदभाव न करना ।
3. लोकतन्त्र को गहराई तक मजबूत बनाने की चुनौती संविधान के मूलभूत ढाँचे में परिवर्तन न करना । एक साथ किसी राजनीतिक दल के अध्यक्ष तथा देश के सबसे ऊँचे पदों; जैसे— राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, उपराष्ट्रपति, उपप्रधानमन्त्री तथा लोकसभा के स्पीकर के पद को ग्रहण करना ।
5. आइए, अब सिर्फ भारत के विषय में विचार करें। समकालीन भारत के लोकतन्त्र के सामने आने वाली चुनौतियों पर गौर करें। इनमें से उन पाँच की सूची बनाएँ, जिन पर पहले ध्यान दिया जाना चाहिए। यह सूची प्राथमिकता को भी बताने वाली होनी चाहिए यानि आप जिस चुनौती को सबसे महत्त्वपूर्ण तथा भारी मानते हैं, उसे सबसे ऊपर रखें। शेष को इसी क्रम के बाद में । ऐसी चुनौती का एक उदाहरण दें तथा बताएँ कि आपकी प्राथमिकता में उसे कोई खास जगह क्यों दी गई है।
प्राथमिकता लोकतन्त्र की चुनौती उदाहरण प्राथमिकता का कारण
1. राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र प्रत्येक राजनीतिक दल में निश्चित अवधि मैं संगठ-नात्मक चुनाव होने चाहिए। राजनीतिक दल लोकतन्त्ररूपी गाड़ी की पटरियाँ हैं । अतः राजनीतिक दलों से परिवारवाद, भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद तथा संघ नेताओं की तानाशाही को समाप्त किया जाना चाहिए।
2. संविधान निर्माण देश, समय तथा परिस्थितियों के अनुरूप समय-समय पर संवैधानिक प्रावधानों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। संविधान लोकतन्त्र की सुरक्षा करता है। संवैधानिक सरकार लोकतन्त्र का सम्मान करती है। लोकतन्त्र को अर्थपूर्ण बनाने के लिए यह आवश्यक है कि संविधान के प्रति पूर्ण-निष्ठा तथा विश्वास बनाए रखा जाए।
3. लोकतन्त्र का विस्तार संसद तथा राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित करना। वर्तमान में प्रतिनिधि संस्थाओं में महिलाओं का बहुत कम प्रतिनिधित्व है। यह संख्या निरन्तर कम होती जा रही है।
4. लोकतन्त्र को सुदृढ़ करना राष्ट्र के सर्वोच्च पदों पर आसीन राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, उपराष्ट्रपति तथा स्पीकर के लिए यह प्रावधान होना चाहिए कि वे दो बार से अधिक चुनाव न लड़ें। सर्वोच्च पदों पर पहुँचने वाले व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि करना तथा अधिक-से-अधिक व्यक्तियों को अवसर प्रदान करना।
5. लोकतन्त्रीय अधिकार नागरिकों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना, निःशुल्क शिक्षा तथा स्वास्थ्य की व्यवस्था करना, सरकारी खर्चे पर प्रशिक्षण की सुविधा प्रदान करना। उदारवादी लोकतन्त्र को सार्थक बनाना जिससे प्रत्येक नागरिक को अधिकार तथा स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हो सकें।
6. (अपना नाम लिखें) ¨¨¨¨¨¨¨¨¨¨¨¨ की अच्छे लोकतन्त्र की परिभाषा (अधिकतम 50 शब्दों में)
उत्तर- क ख ग
अच्छे लोकतन्त्र की परिभाषा
अच्छा लोकतन्त्र सहमति का शासन है। यह जन – इच्छाओं तथा आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम है। इसमें राजनीतिक तथा सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय की भी व्यवस्था होती है। यह नागरिकों को अनेक प्रकार के अधिकार तथा स्वतन्त्रताओं की व्यवस्था करता है। यह राजनीतिक दलों तथा दबाव समूहों के निर्माण का अधिकार जनता को प्रदान करता है।
विशेषताएँ (सिर्फ बिन्दुवार लिखें। जितने बिन्दु आप बताना चाहें उतने बिन्दु आप बता सकते हैं। इसे कम-से-कम बिन्दुओं में निपटाने का प्रयास करें)
विशेषताएँ –
  1. जनसाधारण की राजनीतिक प्रक्रियाओं में सहभागिता ।
  2. जनसंचार के साधनों तथा प्रेस की स्वतन्त्रता ।
  3. विभिन्न साधनों द्वारा सकारात्मक जनमत की अभिव्यक्ति ।
  4. धर्म, जाति, लिंग, भाषा तथा वर्गों के आधार पर समाज के विभाजन को रोकना।
  5. नागरिकों को राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक स्वतन्त्रता प्रदान करना।
  6. देश में कृषि, उद्योग, परिवहन, संचार तथा मनोरंजन के साधनों एवं सुविधाओं की व्यवस्था करना।
  7. अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत के स्वाभिमान तथा प्रतिष्ठा को बनाए रखना।
  8. ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुविधाओं को उपलब्ध कराना।
7. (i) आपको यह अभ्यास कैसा लगा? (ii) क्या आपको इसमें आनन्द आया? (iii) क्या यह बहुत मुश्किल था ? (iv) क्या कुछ परेशानियाँ हुईं ? (v) क्या डर भी लगा ? (vi) क्या आपको लगता है कि इस पाठ्य पुस्तक ने इस महत्त्वपूर्ण अभ्यास में आपकी मदद नहीं की ? (vii) क्या आपको डर है कि आपकी परिभाषा गलत भी हो सकती है?
उत्तर- (i) मुझे यह अभ्यास बहुत अच्छा लगा क्योंकि इसका सम्बन्ध लोकतान्त्रिक व्यवस्था से था।
(ii) मुझे इससे पूर्व आनन्द की अनुभूति हुई क्योंकि पिछले अध्यायों में मैंने लोकतन्त्र से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन किया था। इसके विभिन्न तत्त्वों, विशेषताओं तथा आयामों की विस्तृत चर्चा की।
(iii) यह अध्याय बहुत कठिन नहीं था । लोकतन्त्र की परिभाषाएँ तथा विशेषताएँ बताना बहुत आसान है।
(iv) अभ्यास करने में मुझे किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं हुई । भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। यह विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है। इसका अनुभव मैं विगत चौदह-पन्द्रह वर्षों से निरन्तर कर रहा हूँ ।
(v) मुझे इसका अभ्यास करते हुए डर का अनुभव नहीं हुआ क्योंकि हमारा लोकतन्त्र अनेक वर्षों से सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। इसका मूल्यांकन एवं परीक्षण करते समय मुझे बिल्कुल भी डर का आभास नहीं हुआ।
(vi) नहीं, इस पाठ्य पुस्तक की भाषा बहुत सरल है तथा बोधगम्य है। विभिन्न उदाहरणों, चित्रों, वक्तव्यों तथा कार्टूनों के माध्यम से विषय – सामग्री को बहुत सरल बना दिया गया है जिससे तथ्यों का अध्ययन तथा विश्लेषण करने में बहुत सहायता मिलती है। पुस्तक के सातों अध्यायों में लोकतन्त्र के अर्थ, विशेषताओं, गुणों, समस्याओं, चुनौतियों आदि के साथ-साथ भारतीय दलीय प्रणाली के विषय में अच्छा लिखा गया है।
(vii) नहीं, मेरे मन तथा मस्तिष्क में इस प्रकार का कोई डर नहीं है।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
• विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – क्या साम्प्रदायिकता लोकतन्त्र के मार्ग में बाधक है? इसे दूर करने के उपायों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर- साम्प्रदायिकता : लोकतन्त्र के मार्ग में बाधक
साम्प्रदायिकता लोकतन्त्र के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। इसे अग्रलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है –
  1. साम्प्रदायिकता जनसमुदाय के मन तथा मस्तिष्क में निहित संकीर्ण मनोवृत्ति है जो लोकतन्त्र के सफल संचालन को बाधित करती है।
  2. साम्प्रदायिकता के कारण समाज में अनेक प्रकार के दंगे तथा उपद्रव होते हैं। यह लोकतन्त्र के अहिंसात्मक स्वरूप को छिन्न-भिन्न कर देता है। साम्प्रदायिक परिस्थितियों में लोकतन्त्र कुशलतापूर्वक कार्य नहीं कर सकता है।
  3. साम्प्रदायिकता घृणा, द्वेष, तनाव, संघर्ष तथा विवादों के लिए उत्तरदायी होती है। इससे समाज एवं राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा भाई-चारे को गहरा आघात लगता है। इस प्रकार का परिवेश लोकतन्त्र के लिए खतरा बन जाता है।
  4. साम्प्रदायिकता लोकतन्त्र के स्तम्भों – सहनशीलता, स्वतन्त्रता, समानता तथा बन्धुत्व – को धराशायी करने का प्रयास करती है।
  5. जब मतदाता साम्प्रदायिक भावना से प्रेरित होकर मतदान करते हैं, तो योग्य तथा कुशल उम्मीदवार का चयन बाधित हो जाता है।
साम्प्रदायिकता को समाप्त करने के उपाय
साम्प्रदायिकता को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित उपायों का सहारा लिया जा सकता है- –
  1. समाज एवं परिवार का यह दायित्व है कि बच्चों को ऐसे संस्कार प्रदान करें जिससे उनमें धार्मिक समभाव तथा सहिष्णुता जैसे गुणों का विकास हो ।
  2. माध्यमिक स्तर तक विद्यार्थियों के लिए नैतिक शिक्षा की व्यवस्था भी विद्यालयों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। विद्यार्थियों में सहनशीलता, सद्भावना, प्रेम, सहानुभूति, शान्ति तथा परीक्षा के प्रति अभिरुचि उत्पन्न की जानी चाहिए।
  3. सरकारी तथा स्वैच्छिक संस्थाओं का यह प्रयास होना चाहिए कि समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग शान्ति, पारस्परिक प्रेम तथा बन्धुत्व की भावना के साथ अपना जीवनयापन करें।
  4. विभिन्न मुहल्लों तथा गलियों में शान्ति समितियों की स्थापना की जानी चाहिए जिनमें समाज के प्रबुद्ध वर्गों, समाज सेवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षकों तथा स्वैच्छिक संगठनों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  5. जनसंचार के साधनों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि अपने कार्यक्रमों, डोकुमेण्ट्री तथा सीरियलों के माध्यमों से भी जन-साधारण को बन्धुत्व, सहनशीलता, प्रेम तथा सद्भावना का सन्देश दे जिससे समाज में सदैव सौहार्द की भावना बनी रहे तथा लोकतन्त्र और भी सुदृढ़ एवं शक्तिशाली होता जाए ।
प्रश्न 2 – जातिवाद किस प्रकार से लोकतन्त्र के मार्ग में बाधक है ? विवेचना कीजिए तथा इसे दूर करने के उपायों पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर- जातिवाद : लोकतन्त्र के मार्ग में बाधक
भारतीय समाज में जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। व्यक्तियों का सामाजिक जीवन जातिवाद से प्रभावित होता है। परन्तु अब जातिवाद ने राजनीति को प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया है। वोटों की राजनीति ने जातिवाद को प्रोत्साहित किया है तथा प्रत्येक राजनीतिक दल ने जाति के ‘आधार पर ‘वोट बैंको’ का निर्माण करना प्रारम्भ कर दिया है। जातिवाद अग्र प्रकार से लोकतन्त्र के मार्ग में बाधक है-
  1. जातिगत भावनाओं के आधार पर समाज का विभाजन हो जाता है जो सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न कर देता है। जातिवाद ने समाज में ऊँच-नीच का भेद स्थापित किया है। सवर्ण जातियों ने इसी आधार पर पिछड़ी जातियों, दलितों तथा निम्न जातियों का शोषण किया।
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में दबंग जाति के लोगों ने दलितों को मताधिकार से काफी समय तक वंचित रखा। उन्हें मतदान केन्द्रों पर मत डालने के लिए जाने नहीं दिया । यह लोकतन्त्र के लिए दुःखद स्थिति है।
  3. राजनीतिक दल अब चुनावों के लिए उम्मीदवारों का चयन करते समय जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हैं जिससे योग्य, सक्षम तथा कुशल प्रत्याशी टिकट प्राप्त करने से वंचित हो जाते हैं।
  4. मतदाताओं को भी जातिगत आधार पर मतदान करने के लिए | प्रेरित किया जाता है। मतदाता भी जातिगत भावनाओं में बहकर ऐसे उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करते हैं जो सर्वथा उपेक्षित हैं।
  5. यह जातिगत भावनाओं का ही परिणाम है कि जेलों के सींखचों में बन्द अपराधी भी चुनाव जीतने में सफल हो जाते हैं। अतः जातिवाद ने राजनीति में अपराधीकरण की प्रवृत्ति में वृद्धि की है। यह प्रवृत्ति लोकतन्त्र के लिए हानिकारक है।
  6. जाति प्रथा के कारण लोग विभिन्न समूहों में बँट जाते हैं तथा उनमें मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं जो राष्ट्र की एकता के लिए खतरा बन जाते हैं। देश की आपसी फूट लोकतन्त्र के सफल संचालन के मार्ग में अनेक प्रकार की बाधाएँ खड़ी कर देती है।
जातिवाद को समाप्त करने के उपाय
भारतीय समाज में जातिवाद को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित उपायों को अपनाया जा सकता है—
  1. कानून का निर्माण करके नाम के साथ जातिसूचक शब्दों के प्रयोग को प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए।
  2. सरकार को आरक्षण का आधार जाति को नहीं बनाना चाहिए, वरन् इसका आधार आर्थिक स्थिति को बनाना चाहिए।
  3. जातिवाद के विरुद्ध जागरूक तथा प्रबुद्ध जनमत का निर्माण किया जाना चाहिए। तथा इसे जनसंचार साधनों द्वारा व्यक्त किया जाना चाहिए।
  4. शिक्षा का व्यापक प्रचार तथा प्रसार किया जाना चाहिए । विद्यार्थियों का जाति की बुराइयों की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहिए।
प्रश्न 3 – क्षेत्रवाद लोकतन्त्र के मार्ग में किस प्रकार बाधक है? विवेचना कीजिए तथा इसे समाप्त करने के उपायों की चर्चा कीजिए।
उत्तर- क्षेत्रवाद : लोकतन्त्र के मार्ग में बाधक
क्षेत्रवाद लोकतन्त्र के मार्ग को निम्न प्रकार से बाधित करता है-
  1. क्षेत्रवाद के आधार पर राज्य केन्द्र सरकार से सौदेबाजी करते हैं। यह सौदेबाजी न केवल आर्थिक विकास के लिए होती है, वरन् अनेक बार. विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए भी होती है। यदि समस्या का समाधान नहीं होता है तो केन्द्रु तथा राज्यों में विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  2. राजनीतिक दल भी अपनी स्थिति को मजबूत बनाने के लिए क्षेत्रवाद का सहारा लेता है जो लोकतन्त्र के लिए हानिकारक है।
  3. मन्त्रिमण्डल के सदस्य भी क्षेत्रवाद की भावना से प्रेरित होकर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास पर अधिक बल देते हैं।
  4. क्षेत्रवाद कुछ सीमा तक भारतीय राजनीति में हिंसक गतिविधियों को भी प्रोत्साहित करने के लिए उत्तरदायी है। यह लोकतन्त्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए घातक है।
  5. क्षेत्रवाद के कारण ही क्षेत्रीय दलों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है। क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रवादी भावनाओं के स्थान पर संकीर्ण भावनाओं को उत्तेजित किया है जो लोकतन्त्र के लिए अच्छा नहीं है।
  6. क्षेत्रवाद के कारण बड़े राज्यों का विभाजन करके छोटे-छोटे राज्यों का निर्माण किया जा रहा है। यह राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता के लिए अच्छा नहीं है।
क्षेत्रवाद को समाप्त करने सम्बन्धी सुझाव
क्षेत्रवाद की समस्या के समाधान के कुछ प्रभावशाली उपाय निम्नलिखित हैं-
  1. सरकार को विकास कार्यक्रमों का निर्माण और उनका क्रियान्वयन कुछ इस प्रकार से करना चाहिए कि सन्तुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिल सके। यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि भारत में अब तक चलाए गए अधिकांश क्षेत्रीय आन्दोलनों के मूल में असन्तुलित आर्थिक विकास ही रहा है।
  2. विशिष्ट जातीय समुदाय की अपनी विशिष्टं संस्कृति और पहचान (Identity) को सुरक्षित रखने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। इस आशय के प्रावधान मौलिक अधिकारों के अनु० 29-30 में भी किए गए हैं। इन्हें पूर्ण ईमानदारी के साथ लागू किया जाना चाहिए। इससे जनजातीय समूहों के सांस्कृतिक एकाकीपन ( Cultural Alienation) को रोका जा सकेगा। ऐसे उपाय झारखण्ड और बोडोलैण्ड जैसे आन्दोलन के सन्दर्भ में विशेष लाभप्रद सिद्ध हो सकते हैं।
  3. जहाँ तक सम्भव हो पिछड़े हुए क्षेत्रों के आर्थिक विकास पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, जिससे उन्हें राष्ट्र की मुख्य विकास – धारा से जोड़ा जा सके। संघ सरकार को पिछड़े हुए क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान देने के लिए राज्य सरकारों को विशेष निर्देश देना चाहिए।
  4. क्षेत्रवादी आन्दोलनों की हिंसात्मक प्रवृत्ति पर कठोरता से अंकुश लगाया जाना चाहिए। सरकार को यह दृढ़तापूर्वक स्पष्ट कर देना चाहिए कि किसी भी प्रकार की क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति संविधान के दायरे में शान्तिपूर्ण ढंग से ही सम्भव है।
प्रश्न 4 – निरक्षरता से भारतीय लोकतन्त्र को क्या हानियाँ हो रही हैं? इसे समाप्त करने के लिए अपने सुझाव दीजिए ।
उत्तर- निरक्षरता से हानियाँ
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षित तथा निरक्षर व्यक्तियों की संख्या अधिक है। यह संख्या विशेषकर महिलाओं की है। निरक्षर जनसंख्या ने भारतीय लोकतन्त्र की निम्न प्रकार से क्षति की है-
  1. निरक्षरता के कारण व्यक्तियों का मानसिक विकास नहीं हो पाया है। उनके विचार तथा दृष्टिकोण पिछड़े हुए हैं। अतः वे प्रगतिशील नीतियों तथा कार्यक्रमों का विरोध करते हैं।
  2. निरक्षर अथवा अशिक्षित व्यक्तियों से यह आशा नहीं की जा सकती है कि वे अपने मत का प्रयोग उचित रूप में करेंगे। अशिक्षित लोग अनेक प्रकार की भावनाओं में बहकर मतदान करते हैं। अत: इस सम्बन्ध में मिल ने कहा था कि मतदान का अधिकार केवल उसी व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जो लिखना, पढ़ना तथा गणितं का ज्ञान रखता हो ।
  3. निरक्षरता लोकतन्त्र के लिए अभिशाप है। निरक्षर तथा अनपढ़ व्यक्तियों को अपने अधिकारों तथा कर्त्तव्यों का उचित ज्ञान नहीं होता है। अतः वे जागरूक नागरिक नहीं बन पाते हैं। यह जनमत के निर्माण की प्रक्रिया को भी बाधित करते हैं।
  4. निरक्षर लोग अन्धविश्वासी तथा परम्परावादी होते हैं। भाग्यवादी होने के कारण वे सामान्यतया गरीब तथा बेरोजगार रहते हैं। गरीबी लोकतन्त्र के लिए हानिकारक है।
निरक्षरता को समाप्त करने के सुझाव
निरक्षरता को समाप्त करने के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिए जा सकते हैं-
  1. सरकार को अधिक-से-अधिक शिक्षण संस्थाएँ खोलनी चाहिए तथा शिक्षा को निःशुल्क तथा अनिवार्य बना देना चाहिए।
  2. प्राथमिक शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए माता-पिता को यह परामर्श दिया जाना चाहिए कि वे अपने बच्चों को स्कूल अवश्य भेजें।
  3. बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि बनाए रखने के लिए उन्हें विद्यालय में हल्के नाश्ते अथवा भोजन की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा इसका व्यय सरकार को वहन करना चाहिए।
  4. देश के अधिकांश भागों में प्रौढ़ व्यक्तियों को साक्षर बनाने के उद्देश्य से प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए।
  5. जनसंचार के साधनों के द्वारा शिक्षा का व्यापक प्रचार तथा प्रसार किया जाना चाहिए।
प्रश्न 5 – भारतीय लोकतन्त्र के समक्ष कौन-सी चुनौतियाँ हैं ? विवेचना कीजिए।
उत्तर— भारतीय लोकतन्त्र के समक्ष चुनौतियाँ
भारत का लोकतन्त्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है। जबकि भारत के पड़ोसी राज्यों में लोकतन्त्र के किले ध्वस्त हो रहे हैं, भारत का लोकतन्त्र पूर्णतया सुरक्षित है। परन्तु वर्तमान में भारतीय लोकतन्त्र के समक्ष भी निम्न प्रकार की चुनौतियाँ हैं-
  1. साम्प्रदायिकता – साम्प्रदायिकता धर्मान्धता को जन्म देती है जिससे समाज में अनेक प्रकार के उपद्रव तथा दंगे होते रहते हैं। साम्प्रदायिकता की भावना में बहकर मतदाता अपने मत का सही प्रयोग नहीं करते हैं।
  2. जातिवाद – जातिवाद जातियों के आधार पर समाज का विभाजन कर देता है। समाज में छुआछूत तथा ऊँच-नीच की भावना व्याप्त हो जाती है।
  3. निरक्षरता- निरक्षरता लोकतन्त्र के लिए अभिशाप है। निरक्षर व्यक्ति अपने दायित्वों, कर्त्तव्यों तथा अधिकारों का सही प्रयोग नहीं कर सकता है। यह मतदान प्रक्रिया को भी प्रभावित करती है।
  4. क्षेत्रवाद – क्षेत्रवाद के कारण नागरिकों में राष्ट्रवादी भावनाएँ कम हो जाती हैं। वह दूसरे क्षेत्र में व्यक्तियों से ईर्ष्या तथा द्वेष करना प्रारम्भ कर देते हैं। क्षेत्रवाद के आधार पर वे स्वतन्त्र तथा सम्प्रभु राष्ट्र के निर्माण की भी माँग करना प्रारम्भ कर देते हैं।
  5. निर्धनता – निर्धनता भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को कमजोर करती है। गरीब तथा बेरोजगार व्यक्ति अपने अधिकारों का उचित प्रयोग नहीं कर सकता है। ये पूँजीपतियों के दबाव में आ जाते हैं।
  6. लैंगिक असमानता – लोकतन्त्र सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों की बात करता है परन्तु जिस समाज में महिलाओं तथा पुरुषों की स्थिति में असमानता होती है, वहाँ लोकतन्त्र को अनेक समस्याओं का ‘सामना करना पड़ता है।
  7. आर्थिक असमानता – जिस समाज में गरीबी तथा अमीरी में चौड़ी खाई होती है, उससे लोकतन्त्र की सफलता संदिग्ध हो जाती है। अमीर लोग गरीब व्यक्तियों के मतों को खरीद लेते हैं।
  8. भाषावाद— भाषा की समस्या ने भी लोकतान्त्रिक परम्पराओं को प्रभावित किया है। भाषा के प्रश्न को उठाकर राजनीतिज्ञ भाषा की राजनीति पर अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं। यह लोकतन्त्र के लिए गम्भीर चुनौती है।
प्रश्न 6–सामाजिक न्याय से आप क्या समझते हैं? भारतीय नागरिकों को सामाजिक न्याय किस प्रकार से प्रदान किया गया है ?
उत्तर- सामाजिक न्याय का अर्थ
सामाजिक न्याय का तात्पर्य यह है कि समाज में धन तथा पदों का वितरण इस प्रकार से किया जाए जिससे योग्य, कुशल तथा क्षमतावान व्यक्ति उससे वंचित न हो जाए । अर्थात् समाज में विशेषाधिकारों का अन्त हो जाना चाहिए। समाज के सभी व्यक्ति जब यह महसूस करें कि उनके साथ कोई भेदभाव नहीं हो रहा है, उनके साथ अन्याय, शोषण तथा उत्पीड़न की कार्यवाही नहीं की जा रही है तो उस स्थिति का नाम ही सामाजिक न्याय है। सामाजिक न्याय में सभी लोगों को अपने विकास के समान सभी प्रकार के अवसर प्राप्त होते हैं।
भारत में प्राचीन समय में सामाजिक न्याय की उपेक्षा की गई थी। जातिगत आधार पर लोगों में ऊँच-नीच की भावनाएँ विद्यमान थीं तथा निम्न जाति के लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। लिंग के आधार पर पुरुषों तथा महिलाओं में भेदभाव किया जाता था ।
भारतीय नागरिकों के सामाजिक न्याय की व्यवस्था
भारतीय नागरिकों के लिए संवैधानिक प्रावधानों तथा विभिन्न अधिनियमों द्वारा सामाजिक न्याय की निम्नलिखित व्यवस्था की गई है-
  1. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक न्याय का जिक्र किया गया है। देश के सभी नागरिक सामाजिक दृष्टि से समान समझे जाएँगे। उनमें जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति, भाषा एवं संस्कृति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  2. सरकार विभिन्न कानूनों तथा नियमों का निर्माण करके तथा उन्हें सख्ती तथा ईमानदारी से लागू करके एवं सभी नागरिकों को सस्ता एवं शीघ्र न्याय प्रदान करके, सामाजिक न्याय की स्थिति को सुदृढ़ कर सकती है।
  3. नागरिकों को शिक्षा के पर्याप्त अवसर तथा प्रशिक्षण सुविधाएँ अधिक-से-अधिक प्रदान करके सामाजिक न्याय के स्वप्न को साकार कर सकते हैं। सभी नागरिकों में नैतिक शिष्टाचार तथा सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करके तथा गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों को भोजन आदि देकर सामाजिक न्याय प्रदान कर सकते हैं।
• लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षाओं तथा क्षेत्रवाद में अन्तर कीजिए।
उत्तर – क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षाओं तथा क्षेत्रवाद में निम्नलिखित अन्तर किया जा सकता है –
  1. ‘क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षा’ सकारात्मक अवधारणा है। यह अवधारणा इस ओर संकेत करती है कि क्षेत्र विशेष में निवास करने वाले व्यक्ति क्षेत्र का विकास करने के साथ-साथ सम्पूर्ण प्रदेश का सर्वांगीण विकास करना चाहते हैं।
  2. ‘क्षेत्रवाद’ नकारात्मक अवधारणा है। यह संकीर्ण मनोवृत्तियों पर आधारित होती है। यह केवल अपने क्षेत्र के विकास तक ही सीमित होती है। यह दूसरे क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों के प्रति घृणा, अविश्वास, असहयोग तथा द्वेष की भावना रखती है। क्षेत्रवाद को अनेक बार क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षाओं से प्रोत्साहन प्राप्त होता है, जब उस क्षेत्र का चहुँमुखी विकास नहीं हो रहा होता है।
प्रश्न 2 – चुनाव के समय धन, बल तथा बाहुबल के प्रभाव को कैसे कम किया जा सकता है? 
उत्तर – चुनाव के समय धन, बल तथा बाहुबल के प्रभाव को निम्न प्रकार कम किया जा सकता है-
  1. स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष चुनाव की व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को कठोर कानूनों का निर्माण करना चाहिए कि कोई भी उम्मीदवार मतदाताओं को उपहार देकर अथवा धन की थैलियाँ बाँटकर अपने पक्ष में मतदान न करा सके। जो उम्मीदवार अथवा राजनीतिक दल धन के बल पर मतदाताओं के मतों को खरीदने का प्रयास करता हुआ पाया जाए तो उसके विरुद्ध तुरन्त कठोर कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए।
  2. निर्वाचन आयोग को चुनाव में अधिकतम धन को व्यय करने की सीमा निश्चित कर देनी चाहिए। यदि प्रत्याशी अथवा राजनीतिक दल इस सीमा का अतिक्रमण करता है तो उसके नामांकन को अवैध घोषित किया जाना चाहिए तथा राजनीतिक दल की मान्यता को भी समाप्त कर देना चाहिए |
  3. भ्रष्ट तरीके अपनाकर विशिष्ट प्रत्याशियों के चुनाव परिणाम को न्यायपालिका भी अवैध घोषित कर सकती है।
  4. बाहुबलियों के चुनाव लड़ने तथा नामजद किए जाने को कानून द्वारा प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों को टिकट देते समय यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वे अच्छी छवि के व्यक्ति को ही टिकट दें।
  5. यदि प्रत्याशी उच्च नैतिक चरित्र के हैं तो वे धन, बल तथा बाहुबल को चुनाव से दूर रखेंगे। मतदाताओं का भी यह दायित्व है कि वे प्रबुद्ध वर्ग के उम्मीदवारों के पक्ष में अपना मतदान करें।
प्रश्न 3 – महिलाओं की दयनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी किन्हीं तीन कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर – महिलाओं की दयनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी तीन कारण निम्नलिखित हैं-
  1. महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमजोर माना जाता है। अतः उन्हें परिवार तथा समाज में पुरुषों के समान दर्जा नहीं दिया जाता है।
  2. पुरुषप्रधान समाज होने के कारण पुत्री की तुलना में पुत्र को अधिक महत्त्व दिया जाता है। पुत्री के जन्म पर परिवार वाले खुशी व्यक्त नहीं करते हैं। अतः महिलाएँ हीन भावना से ग्रसित हो जाती हैं जो कालान्तर में उनकी दयनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी होता है।
  3. महिलाओं पर दहेज लाने का दबाव डाला जाता है। दहेज की माँग पूरी करने के लिए महिला के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। लड़कियों की भ्रूण हत्या के लिए महिलाओं पर दबाव डाला जाता है। अशिक्षित तथा निरक्षर होने के कारण भी महिलाएँ पुरुषों के समान स्तर बनाने में असफल रही हैं।
प्रश्न 4– भारत में निर्धनता के क्या कारण हैं? संक्षेप में विवेचना कीजिए |
उत्तर- भारत में निर्धनता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
  1. भारत के व्यक्तियों का भाग्यवादी होना भी उनकी निर्धनता के लिए उत्तरदायी है।
  2. ब्रिटिश शासन ने भारत के लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धों को चौपट कर दिया था इसलिए भारत में गरीबी तथा बेरोजगारी निरन्तर बढ़ती चली गयी।
  3. ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम होते हैं। व्यक्ति अधिकांशतः कृषि मजदूर होते हैं जिनकी आय बहुत अधिक नहीं होती ।
  4. निरक्षरता, परिवार का बड़ा आकार, उत्तराधिकार कानून तथा जाति व्यवस्था कुछ ऐसे सामाजिक कारण हैं जिनसे गरीबी से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या कम नहीं हो पायी हैं।
  5. स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त सरकारी, स्वयंसेवी तथा वित्तीय संस्थाओं ने गरीबी उन्मूलन के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के कार्यक्रमों का निर्माण किया परन्तु उनका सही प्रकार से कार्यान्वयन नहीं हो पाया है। अतः गरीबी उन्मूलन के प्रयास सार्थक सिद्ध नहीं हुए हैं।
प्रश्न 5–भारत में क्षेत्रवाद के विकास के लिए उत्तरदायी किन्हीं तीन कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर — भारत में क्षेत्रवाद के विकास के लिए उत्तरदायी तीन कारण निम्नलिखित हैं-
  1. भारत के अनेक क्षेत्रों में असंतुलित विकास की समस्या क्षेत्रवाद की उत्पत्ति के लिए उत्तरदायी है। ब्रिटिश शासकों ने केवल उन्हीं क्षेत्रों का विकास किया जो व्यापार, उत्पादन एवं वाणिज्य की दृष्टि से उनके हित में थे। अतः अन्य क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ गए।
  2. अंग्रेजों ने भारत में कृषि क्षेत्र में विकास को प्राथमिकता प्रदान नहीं की जबकि भारत एक कृषिप्रधान देश था। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों की पूर्णतया उपेक्षा की। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त भी जितनी धनराशि ग्रामीण क्षेत्रों में व्यय की जाती थी उतनी किसी भी सरकार ने खर्च नहीं की। अतः इन क्षेत्रों में क्षेत्रवाद की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
  3. भौगोलिक असुविधाओं के कारण भी कुछ क्षेत्रों का विकास नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए – राजस्थान में पर्याप्त जल का न होना तथा बिहार व उड़ीसा में पर्याप्त शिक्षा व्यवस्था न होने के कारण इनमें विकास की गति बहुत धीमी हो गई है।
प्रश्न 6 – भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों के समक्ष जो सामाजिक तथा आर्थिक समस्याएँ हैं, उनका संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर- भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों के समक्ष प्रमुख रूप से निम्नलिखित सामाजिक तथा आर्थिक समस्याएँ हैं-
  1. भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश कृषक तथा श्रमिक निरक्षर हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाएँ अधिक निरक्षर हैं। अतः इन क्षेत्रों में निरक्षरता तथा अशिक्षा एक गम्भीर समस्या है।
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्ति अज्ञानता, अन्धविश्वास तथा भाग्यवादिता आदि की मानसिकता से प्रसित है। अतः यह मानसिकता भी एक समस्या है।
  3. भारत में भूमि के स्वामित्व में बहुत विषमता पायी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश परिवार भूमिहीन होते हैं। यह भूमिगत विषमताएँ गम्भीर समस्या है।
  4. बन्धक मजदूरी भी ग्रामीण क्षेत्रों में समस्या का कारण रही है।
  5. ग्रामीणों क्षेत्रों में बढ़ती जनसंख्या भी विकट समस्या के रूप में सामने आई है। जनसंख्या की वृद्धि बेरोजगारी के लिए उत्तरदायी है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की भी समस्या है।
प्रश्न 7 – भली-भाँति सुसूचित (Well-informed) एवं सामाजिक दृष्टि से जिम्मेदार नागरिकों की लोकतन्त्र को सार्थक बनाने के लिए क्यों आवश्यकता है? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – भली-भाँति सुसूचित एवं सामाजिक दृष्टि से जिम्मेदार नागरिकों की लोकतन्त्र को सार्थक बनाने के लिए निम्नलिखित कारणों से आवश्यकता है-
  1. लोकतन्त्र उत्तरदायी शासन व्यवस्था है। लोकतन्त्र में सभी नागरिकों को अपने अधिकारों तथा कर्त्तव्यों के प्रति सजग रहना पड़ता है। इसके लिए उन्हें विभिन्न प्रकार की सूचनाओं की आवश्यकता होती है। सुसूचित व्यक्ति ही जिम्मेदार नागरिक की भूमिका का निर्वाह कर सकता है।
  2. लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्थाओं में संविधान द्वारा नागरिकों को अनेक प्रकार के मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों में प्रबुद्ध स्वतन्त्रता, समानता तथा सामाजिक न्याय की भावना निहित होती है। एवं जागरूक नागरिक ही अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है; देश तथा समाज में सहनशीलता, सद्भावना तथा बन्धुत्व की भावना को विकसित कर सकता है। यह सब सुसूचित तथा सामाजिक दृष्टि से जिम्मेदार नागरिकों पर ही निर्भर करता है।
  3. स्वस्थ एवं जागरूक समाज की स्थापना के लिए भी यह आवश्यक है कि नागरिक पूर्ण रूप से सुसूचित हों। सुसूचित नागरिक ही समाज द्वारा निश्चित की गई भूमिकाओं को सही प्रकार से निभा पाएगा। वह समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध अपनी आवाज उठा सकता है। वह कुप्रथाओं तथा कुरीतियों का विरोध करके स्वस्थ समाज एवं राष्ट्र की नींव डाल सकता है तथा लोकतन्त्र को सार्थक बना सकता है।
• अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1 – लोकतन्त्र की दो चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- (i) साम्प्रदायिकता तथा (ii) जातिवाद |
प्रश्न 2 – भारत में गरीबी उन्मूलन के कोई दो उपाय सुझाइए ।
उत्तर – भारत में गरीबी उन्मूलन के दो उपाय निम्नलिखित हो सकते हैं-
(1) लघु और कुटीर उद्योग-धन्धों को बढ़ावा दिया जाए।
(2) ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जाए ।
प्रश्न 3 – भारत में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता में कमी के दो कारण लिखिए।
उत्तर – (1) राजनीति में नैतिक मूल्यों का ह्रास तथा (2) महिलाओं के पारिवारिक दायित्व |
प्रश्न 4- राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम 2005 से आप क्या समझते हैं?
उत्तर – लोगों की आर्थिक दशा सुधारने हेतु, देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की चुनौती से निपटना, ग्रामीण क्षेत्र के विकास का केन्द्र-बिन्दु है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम 2005 के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों को रोजगार प्रदान किया जाता है।
वर्तमान में इसका नाम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (मनरेगा) कर दिया गया है।
• बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1 – समकालीन विश्व में शासन का एक प्रमुख रूप है-
(अ) लोकतन्त्र
(ब) राजतन्त्र
(स) तानाशाह
(स) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर- (अ) लोकतन्त्र ।
प्रश्न: 2 – किसी लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था द्वारा सामना की जाने वाली समस्या को कहते हैं-
(अ) लोकतन्त्र की चुनौतियाँ
(ब) प्रतिनिधियों की चुनौतियाँ
(स) जनता की चुनौतियाँ
(द) तानाशाहों की चुनौतियाँ।
उत्तर – (अ) लोकतन्त्र की चुनौतियाँ ।
प्रश्न 3 – वर्तमान में लोकतन्त्र के रखवाले के तौर पर सक्रिय है-
(अ) सूचना का अधिकार
(ब) स्वतन्त्रता का अधिकार
(स) सम्पत्ति का अधिकार
(द) शिक्षा का अधिकार ।
उत्तर – (अ) सूचना का अधिकार ।
प्रश्न 4 – लोकतन्त्र की स्थापना की चुनौती है-
(अ) लोकतान्त्रिक संस्थाओं के काम-काज में सुधार करना
(ब) लोकतन्त्र को स्थानीय शासन की संस्थाओं में कार्यान्वित करना
(स) महिलाओं के प्रतिनिधित्व के विस्तार के प्रयत्न करना
(द) अलोकतान्त्रिक शासन को उखाड़ना ।
उत्तर- (द) अलोकतान्त्रिक शासन को उखाड़ना ।
प्रश्न 5 – निम्नलिखित में से कौन-सी लोकतन्त्र के विस्तार की चुनौती नहीं है-
(अ) सेना को सरकार पर नियन्त्रण रखने से दूर रखना
(ब) स्थानीय सरकार को अधिक शक्तियाँ देना
(स) निर्णय प्रक्रियाओं में महिलाओं और अल्पसंख्यकों को शामिल करना
(द) लोकतान्त्रिक शासन के मूल सिद्धान्तों को सभी इलाकों में लागू करना।
उत्तर – (अ) सेना को सरकार पर नियन्त्रण रखने से दूर करना ।
प्रश्न 6 – निम्नलिखित में से जो लोकतन्त्र को मजबूत करने की चुनौती है, वह है-
(अ) मौजूदा गैर – लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को गिराना
(ब) स्थानीय सरकारों को अधिक अधिकार सम्पन्न बनाना
(स) लोकतान्त्रिक संस्थाओं की कार्यपद्धति सुधारना
(द) संघ के सिद्धान्तों को उसकी इकाइयों में व्यावहारिक स्तर पर लागू करना।
उत्तर – ( स ) लोकतान्त्रिक संस्थाओं की कार्यपद्धति सुधारना ।

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