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UK Board 9 Class Hindi Chapter 0 – वन्दना (संस्कृत विनोदिनी)

UK Board 9 Class Hindi Chapter 0 – वन्दना (संस्कृत विनोदिनी)

UK Board Solutions for Class 9th Hindi Chapter 0 – वन्दना (संस्कृत विनोदिनी)

पाठ का सार
हे सुरों की देवी भगवति सरस्वति! आपकी जय हो, हम आपके चरणों में प्रणाम करते हैं। हे परमब्रह्म परमेश्वर के नाद से युक्त वाणी की देवी! हम आपकी शरण में हैं। आप सर्वोत्तम शरणदायिनी और ऐश्वर्यशालिनी हो। देव एवं मुनिजन तुम्हारे चरणों की वन्दना करते हैं। नवरसों से युक्त सरस काव्य का गायन करनेवाली, प्रकाशमान् आभूषणोंवाली हे सरस्वति आपकी जय हो ।
हे श्वेत वर्ण और स्वच्छ शरीरवाली देवि! आप हमारे मनरूपी हंसों पर सदैव विराजमान् होकर हमारी मूर्खता को दूरकर ज्ञान का प्रकाश हमारे भीतर भर दो। ललित कलाओं और ज्ञान के प्रकाश से युक्त, वीणा और पुस्तक को धारण करनेवाली, मूर्खता और आलस्य के विष को दूर करनेवाली हे देवि ! हमारी बुद्धि तुम्हारे चरणों में बनी रहे ।
पाठाधारित अवबोधन-कार्य एवं भावानुवाद
(1) जय जय हे भगवति ……………. ते गच्छामः ॥ 
शब्दार्था: – सुरभारति = सुरों की देवी; तव = तुम्हारे; प्रणमामः = हम प्रणाम करते हैं; नाद = अनुगूँज; ब्रह्ममयि = परमब्रह्म परमेश्वर से युक्त; वागीश्वरि = वाणी की स्वामिनी; ते = तुम्हारी; गच्छामः = जाते हैं।
अन्वयः—हे भगवति सुरभारति! (तव) जय जय हे। (वयं) तव चरणौ प्रणमामः। हे ब्रह्म-नादमयि वागीश्वरि (तव) जय; (वयं) ते शरणं गच्छामः ।
सन्दर्भः—प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत विनोदिनी (भाग-प्रथमः )’ के ‘वन्दना’ नामक पाठ से उद्धृत है।
प्रसंगः– प्रस्तुत पद्यांश में माता सरस्वती की विशेषताओं का वर्णन करते हुए उनकी शरण में जाने की प्रार्थना की गई है।
हिन्दी-भावानुवादः—हे सुरो की देवि भगवति! आपकी जय-जयकार हो। हम तुम्हारे चरणों में प्रणाम करते हैं। हे परमब्रह्म परमेश्वर की अनुगूँज से युक्त वाणी की देवि! तुम्हारी जय हो; हम तुम्हारी शरण में जाते हैं।
भावार्थ:- भगवती सरस्वती को सुरों की देवी कहा जाता है; अत: कवि उनके इस रूप की जय-जयकार करता हुआ उनके चरणों की वन्दना उसे स्वीकार करने की प्रार्थना करता है । कवि कहता है कि हे वाणी की देवि! आप परमब्रह्म परमेश्वर की अनुगूँज से युक्त हो, हम तुम्हारे इस रूप की जय-जयकार करते हुए तुम्हारी शरण में आए हैं। तुम हमें अपनी शरण में लेकर हमारी रक्षा करो।
(2) त्वमसि शरण्या …………… रुचिराभरणा ॥
शब्दार्थाः – त्वमसि = (त्वम् + असि) तुम हो; शरण्या = शरण देनेवाली; त्रिभुवनधन्या = तीनों लोकों में ऐश्वर्यशालिनी; सुर = देवता; वन्दित = वन्दना करने योग्य; नवरसमधुरा = नौ रसों से मधुर; कवितामुखरा = काव्य को मुखरित करनेवाली; स्मित = मुस्कान, प्रसन्नता; रुचि = चमक, शोभा, कान्ति, प्रकाशमान्; आभरणा = आभूषणोंवाली।
अन्वयः -त्वं शरण्या, त्रिभुवनधन्या, सुर-मुनि – वन्दित – चरणा, नवरसमधुरा कवितामुखरा, स्मित- रुचि – रुचिराभरणा असि । तव जय जय ।
प्रसंग : – प्रस्तुत पद्यांश में सरस्वती की महिमा का गायन करते हुए उनकी वन्दना की गई है।
हिन्दी – भावानुवादः – तुम (एकमात्र) शरणदायिनी, तीनों लोकों में ऐश्वर्यशालिनी, देवताओं (और) मुनिजनों द्वारा चरणों की वन्दना की गई, नौ रसों से मधुर काव्य को कहनेवाली, मुस्कान की शोभा (और) प्रकाशमान् आभूषणोंवाली हो। (ऐसी) हे सरस्वति देवि आपकी जय-जयकार हो ।
भावार्थ :- हे माता सरस्वति! आप संसार में सर्वोत्तम शरण देनेवाली हो अर्थात् आपके समान सहृदया अथवा दयालु शरणदायिनी कोई नहीं है। आप तीनों लोकों में सबसे अधिक ऐश्वर्यशालिनी हो, सभी देवता और मुनिगण आपके चरणों की वन्दना करते रहते हैं। तुम नौ रसों से मधुर काव्य की रचना और गायन करनेवाली तथा सदैव मुस्कान बिखेरनेवाली हो। तुम चमकते आभूषणों की कान्ति से सुशोभित हो। हे ऐसी कल्याणदायिनी माँ सरस्वती देवि! आपकी जय-जयकार हो ।
(3) आसीना भव …………… तनु विमले ॥
शब्दार्था:- आसीना = विराजमान्; भव = हो; मानसहंसे = मनरूपी हंस पर; कुन्द् = कुन्द का पुष्प; तुहिन = हिम (बर्फ/पाला); शशि = चन्द्रमा; धवले = श्वेत; हर = हरो, दूर करो; जडताम् = मूर्खता को; कुरु = करो; बोधिविकासम् = बुद्धि (ज्ञान) के विकास को; सितपङ्कज = श्वेत कमल; तनुविमले = स्वच्छ ( निर्मल) शरीरवाली।
अन्वयः—(त्वम्) कुन्द- तुहिन – शशि-धवले मानसहंसे आसीना भव। सितपङ्कज तनुविमले ( त्वम् अस्माकं ) जडतां हर, बोधिविकास कुरु। जय जय हे भगवति सुरभारति!
प्रसंग : – प्रस्तुत पद्यांश में सरस्वती की सब प्रकार के मलों और अज्ञान को हरनेवाली देवी के रूप में उपासना की गई है।
हिन्दी – भावानुवादः – (त्वम्) कुन्द – पुष्प, हिम, चन्द्रमा के समान श्वेत (और) मनरूपी हंस पर विराजमान हो। श्वेत कमलपुष्प के समान निर्मल शरीरवाली (तुम हमारी) मूर्खता (अज्ञानता) का हरण करो (और हमारी ) बुद्धि का विकास करो। हे सुरों की देवि भगवति! आपकी जय-जयकार हो ।
भावार्थ :- हे माँ सरस्वति! आप हमारे मनरूपी पवित्र हंस पर सदैव विराजती हो अर्थात् आप हमारे पवित्र मनों में सदैव निवास करती हो। आप कुन्द, पुष्प, हिम और चन्द्रमा के समान निर्मल और श्वेत कान्तिवाली हो। हे श्वेत कमल के समान निर्मल शरीरवाली ज्ञान की देवि! आप हमारी मूर्खता (जड़ता/अज्ञान) को दूर करो और हमारी बुद्धि का विकास करके हमें ज्ञान प्रदान करो। हे सुरों की देवि भगवति! आपकी जय-जयकार हो।
(4) ललितकलामयि ………….. विषहारिणि ॥
शब्दार्थ : – ललितकलामयि = ललित कलाओं से युक्त; ज्ञानविभामयि = ज्ञान के प्रकाश (आभा) से युक्त; धारिणि = धारण करनेवाली; मतिः = बुद्धि; आस्ताम् = हो; नः = हमारी; तव =तुम्हारे; पदकमले = चरणरूपी कमलों में; अयि = ओ, अरी; कुण्ठाविषहारिणि = कुण्ठा (हीनता) रूपी विष को दूर करनेवाली ।
अन्वयः – अयि ! ललितकलामयि, ज्ञानविभामयि, वीणा – पुस्तक-धारिणि, कुण्ठाविषहारिणि नः मतिः तवपदकमले आस्ताम् । जय जय हे|
प्रसंग:- प्रस्तुत पद्यांश में ललित कलाओं और ज्ञान की देवी के रूप में माँ सरस्वती की वन्दना की गई है।
हिन्दी – भावानुवादः – अरी! ललितकलाओं से युक्त, ज्ञान की आभा से युक्त, वीणा (और) पुस्तक को धारण करनेवाली, हीनता (कुण्ठा) रूपी विष का हरण करनेवाली (सरस्वति देवि!) हमारी बुद्धि तुम्हारे चरण-कमलों में स्थित हो । हे सुरों की देवि भगवति! आपकी जय-जयकार हो ।
भावार्थ:- ओ माँ, सरस्वति देवि! आप समस्त ललितकलाओं से युक्त और ज्ञान की आभा से सुशोभित हो। आप अपने हाथों में ज्ञान प्रदान करनेवाली वीणा और पुस्तक को धारण करती हो। कुण्ठा अर्थात् मन की हीनता के विष को ज्ञान के आलोक से दूर करनेवाली हो; इसलिए हमारी बुद्धि सदैव आपके चरणरूपी कमलों की आराधना में लगी रहे । हे सुरों की देवि भगवति! आपकी जय-जयकार हो ।

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